‘एज इट इज़’ देखने का अभाव

Shayak Alok

मैं शोर और विशेषज्ञों के विश्लेषणों पर बहुत ज्यादा यकीन नहीं कर पाता. भारतीय सन्दर्भ में नीति विषयों पर तो इन विशेषज्ञों के अटकलों, अनुमानों और सुझावों को मैंने कभी भी काम लायक नहीं पाया है. मुझे उनके विचार बेहद किताबी लगते रहे हैं. चीजों को ‘एज इट इज़’ देखने के बेहद जरुरी मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का उनमें अभाव दीखता है. वे हमेशा कुछ विशेष ढूंढ लाते हैं और विशेष सलाह देने लगते हैं.

यह कहानी मोदी के दंभपूर्ण हुंकार से शुरू हुई कि वे पाकिस्तान को अलग थलग कर देंगे. मुझे तब भी यह बात हास्यास्पद लगी थी. अब इन दिनों भारतीय चिंताकार भारत के ही अलग थलग पड़ते जाने पर लेख लिख रहे. मुझे यह बात भी हास्यास्पद लग रही है.

गधे की अपनी उपयोगिता होती है और घोड़े की अपनी.

पहले पाकिस्तान पर ही आते हैं. पाकिस्तान एक लगभग फेल्ड स्टेट की स्थिति में है. उसकी यह स्थिति ही उसे दक्षिण एशिया में सबसे अधिक प्रासंगिक बना देती है. पाकिस्तान अमेरिका या चीन के जैसे काम आ सकता था/है, वैसा कोई अन्य देश नहीं आ सकता. अमेरिका के पाकिस्तान से कुछ दूर होते ही रूस ने भी इसलिए अपनी रूचि दर्शा दी है. भारत संप्रभुता का प्रश्न उठा बेल्ट एंड रोड समिट को स्कीप करता है, और पाकिस्तान संप्रभुता को ही दाँव पर लगा सीपेक को बी एंड आर का फ्लैगशिप बनाने में योगदान करता है.

भारत की शक्ति उसका आर्थिक आकार और उसका बाज़ार है. विश्व की रूचि भारत में इस कारण है. इस रूचि का परित्याग विश्व किसी भी कारण क्यों करेगा. चीन-भारत आर्थिक संबंध के वॉल्यूम को ही देख लें और उसका चीन की ओर झुकाव देख लें तो भारत ऐसा घोड़ा नहीं है जिसपर दाँव खेलने से चीन कभी भी पीछे हट जाएगा. रूस पर भी यही गणित लागू होता है. अमेरिका की भारत में बढ़ी रूचि का स्ट्रेटजिक गणित है और इसपर जाहिर ही हमारे चिंताकार फिलहाल चिंतित नहीं होंगे.

अमेरिका चीन रूस को पाकिस्तान जो सुविधाएं व सेवाएं दे सकता है, वह क्या संप्रभु भारत कभी दे सकता है ? आसान गणित है.

हाल यहाँ यह है कि हम यहाँ अपने ही टाटा को स्वदेशी प्लांट लगाने के लिए जमीन देने में मार मचा देते हैं जबकि पाकिस्तान अपनी हजारों एकड़ कृषिभूमियां चीन को खेती के प्रयोग के लिए सौंप रहा है.

एज इट इज़. ऐसा ही है. नैसर्गिक बनते बदलते समीकरण. दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान अपनी इस विशिष्ट स्थिति का ही उपभोग करते रहेंगे. मोदी हुंकार से न पाकिस्तान अलग थलग पड़ेगा, न ही किसी बैकफायर से भारत अलग थलग पड़ेगा.

भारतीय चिंताकार अधिक चिंतित इस बात पर भी दीखते हैं कि भारत के छह पड़ोसी बी एंड आर से चीन से भारी निवेश पाएंगे और भारत वंचित रहेगा. ये प्रायः इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी मद के निवेश हैं. प्रश्न है कि हम चीन से इसी शर्त और श्रेणी का निवेश लेने को कितने उद्यत हैं. जिनपिंग ने गुजरात में हमसे पिछली मुलाकात में जितने निवेश का वादा कर रखा, क्या उसे खींच लेगा ? रूठ जाएगा हमसे ? निवेश करना लाभ का व्यापार करना है, खैरात नही होता.

अब आते हैं रणनीतिक मसले पर. वैश्विक महत्वाकांक्षा जी रहा चीन भारत के किसी भी अवरोध से यदि नाराज होता है तो उसके पास आजमाने को क्या विकल्प हैं ? हमारी दुखती रग पाकिस्तान को थोड़ा और सहला देना ? इस उस मंच पर हमारे प्रवेश को थोड़ा बाधित कर देना ? किन्तु चीन का यह रुख तो मोदी-जिनपिंग के अच्छे दिनों से ही जारी है. युद्ध ? चीन को युद्ध करना हो तो दलाई लामा का बहाना ही पर्याप्त है.

मैं अभी एक चिंताकार को पढ़ रहा था एक्सप्रेस में. वे इतने भयभीत और उत्तेजित दिख रहे हैं कि अभी ही सरकार को पांच सौ प्रकार के नये प्रोजेक्ट शुरू करने की सलाह दे दी. मतलब कि वे तैयार बैठे थे कि एक जिनपिंग आएगा, जो स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की रणनीति आजमाने के बाद जब सशंकित होगा कि उसकी मनोवृति पकड़ में आ रही है तो फिर ओबीओआर आजमाएगा, और इस दरम्यान भारत यूँही बस बैठा रहेगा, और फिर वे अपनी सलाह दे सकेंगे.

अतीत में भी नाटो सिएटो फलना चिलना रूस अमेरिका में हमारे चिंताकारों ने यूँही वक्त जाया किया जबकि भारत ने अपनी आर्थिक/रणनीतिक राह उनके अटकलों अनुमानों सुझावों से परे जाकर पकड़ी और औसत से अधिक सफल भी रहा.