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सतयुग की अवधारणा मिथक है जो कर्म की अवहेलना भी करती है – मित्र के साथ संवाद

विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग “सामाजिक यायावर”
* लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (www.books.groundreportindia.org)
* मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
* संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

मित्र : सतयुग क्या है?

सामाजिक यायावर : सतयुग एक ऐसा युग है जब सब कुछ सत्य पर आधारित है, सब कुछ ठीक होता है। मानव अपनी पूर्णता व मूल्यों की उच्चतर अवस्था को जीता है। सब कुछ सत्य पर आधारित, न्यायपूर्ण व कल्याणकारी होता है। सतयुग की अवधारणा में हर युग का काल नियत है; जैसे सतयुग सत्रह लाख अठ्ठाइस हजार वर्ष, त्रेतायुग बारह लाख छियानबे हजार वर्ष, द्वापरयुग आठ लाख चौसठ हजार वर्ष और कलियुग चार लाख बत्तीस हजार वर्ष।  

हर युग में मनुष्य की औसत आयु भी नियत है, जैसे सतयुग में मनुष्य की औसत आयु एक लाख वर्ष, त्रेतायुग में मनुष्य की औसत आयु दस हजार वर्ष, द्वापरयुग में मनुष्य की औसत आयु एक हजार वर्ष और कलियुग में मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष।

युगों की अवधारणा में सबसे लंबा युग ‘सतयुग’ है और मनुष्य की आयु सबसे लंबी एक लाख वर्ष मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि सतयुग में मनुष्य जीवन-मूल्य, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि की उच्चतर अवस्था को प्रामाणिकता के साथ जीता है।

मित्र : आप क्या मानते हैं कि सतयुग था?
सामाजिक यायावर : बिलकुल नहीं।

मित्र : क्यों?
सामाजिक यायावर : सतयुग की मूलभूत अवधारणा में ही बहुत छिद्र हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही, मनुष्य के कर्म का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है।

मित्र : यह तो चौकाने वाली बात है। क्योंकि सद्कर्म ही तो सतयुग का मूलाधार है।
सामाजिक यायावर : स्वर्ग व सतयुग आदि की हमारी अवधारणाओं के मूल में ही छिद्र हैं, भ्रम हैं, कोरी कल्पनायें हैं। यदि आप पूर्वाग्रह व भावुकता को परे रखकर विश्लेषण करें तो आप भी मेरे तर्कों से सहमत हो सकते हैं।

लाखों वर्ष के सतयुग में मनुष्य द्वारा एक लाख वर्ष जैसे बहुत लंबे समय तक जीवन-मूल्यों, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि को जीते हुएऔर सद्कर्मों को करते रहने के बावजूद युग का समय पूरा होने पर एक दिन सतयुग का क्षय हो जाता है। 

सतयुग से कलियुग के बीच में ‘त्रेतायुग’ व ‘द्वापरयुग’ भी हैं जो लाखों वर्षों के हैं। इन युगों में भी मनुष्य कितना भी सद्कर्म कर ले, लेकिन उसको पूर्व-निर्धारित नियति व दैवीय व्यवस्था के कारण बढ़ना कलियुग की ही ओर है।  कलियुग में कितने भी बुरे कर्म कर ले, बढ़ना ‘सतयुग’ की ही ओर है। क्योंकि कलियुग का समय खतम होते ही, “सतयुग” आ जायेगा। सतयुग से त्रेतायुग, त्रेतायुग से द्वापरयुग, द्वापरयुग से कलियुग, कलियुग से सतयुग, इस पूरे चक्र में सब कुछ पूर्वनिर्धारित व नियोजित है।

जब सतयुग के उच्चतर निरपेक्ष-सद्कर्मों को जीने से मनुष्य सतयुग की निरंतरता नहीं बनाएरख सका तो कलियुग में उसके छोटे-छोटे सापेक्षिक-सद्कर्म का सतयुग के लिए कोई औचित्य ही नहीं, फिर भी कलियुग सतयुग की ओर बढ़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य कैसे भी कर्म करे। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग अपने समय से आयेंगें और जायेंगें, मनुष्य के कर्मों से इनका होना, न होना, आना, जाना आदि का कोई संबंध नहीं। 

यही कारण है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही मनुष्य की ‘कर्मशीलता’ का कोई अस्तित्व व महत्व नहीं रह जाता है। मनुष्य के कर्म की कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती है। और सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही ‘कर्म’ औचित्यहीन और तिरस्कृत हो जाता है।

यदि मनुष्य अपने जीवन में ‘कर्मशील’ बने रहना चाहता है, सद्कर्मों का प्रयास करते रहना चाहता है, कर्म को मानव जीवन का उद्देश्य मानते रहना चाहता है, तो मनुष्य को पूर्वनिर्धारित व नियोजित युगों की अवधारणा को अस्वीकार करना पड़ेगा। और यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर किसी भी क्षण से सतयुग या कलियुग में जीना शुरू कर सकता है।

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