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  • सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता —— भारत को किसी भी परिस्थिति में आदिवासी/दलित/शूद्र नेतृत्व व दिशा की जरूरत है

    हमें विभिन्न आर्थिक, राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा प्रायोजित नेतृत्वों को परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में स्वीकारने की आत्मश्लाघा व प्रवंचना से बाहर आने की जरूरत है भले ही प्रायोजित नेतृत्व तात्कालिक तौर पर यह कितना भी अधिक लाभप्रद व परिवर्तनकारी दिख रहा हो।

    मूल बात कहने के पहले एक सच्चा घटनाक्रम सुनाना चाहता हूं। तब फेसबुक जैसी सोशल साइटें जीवन का अभिन्न अंग नहीं हुआ करतीं थीं। ईमानदारी की चोचलेबाजी या विकास के मसीहागिरी की चोचलेबाजी या लच्छेदार स्वादिष्ट भाषणों या कुछ समय की न्यायिक हिरासतें या पुलिस की दो चार लाठियाँ आदि किस्म की आम आदमी द्वारा झेली जाने वाली सामान्य व रोजमर्रा वाली घटनाएं रातोंरात राष्ट्रीय नेता व देश के परिवर्तन का कर्णधार नहीं बनाया करतीं थीं। उसी समय की बात है।

    भारत देश में एक राज्य है उसका नाम है केरल। उसी केरल राज्य की एक गांव की ग्राम सभा ने दुनिया में पेयपदार्थों की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक की नाक में नकेल कसने व अपने गांव का भूलज व कृषि अर्थव्यवस्था बचाने के लिए उस कंपनी द्वारा उस गांव में स्थापित व संचालित बाटलिंग प्लांट बंद कराने का प्रस्ताव पारित किया।

    उस कंपनी ने ग्राम सभा के इस प्रस्ताव को केरल राज्य के हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक बेंच ने अपने बयान में कहा कि ग्रामसभा को ऐसे प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है, पानी सामाजिक संपत्ति है।

    फिर क्या था, भारत में आंदोलनों के लिए बने विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के लोग, मैगसेसे पुरस्कृत कुछ लोग, फंडेड NGO वाले लोग आदि ने हाईकोर्ट की बेंच की उस बयान की कापियां निकलवाईं, उनके दस्तावेज बनाए, बुकलेट बनवाईं और देश भर में घूम घूम कर खूब बांटा। खूब प्रेस कांफ्रेस कीं। लग रहा था जैसे कि भारत में अब सामाजिक स्वामित्व सुदृढ़ हो जाएगा।

    इन लोगों ने हजारों प्रेस कांफ्रेस की होगीं, जहां जाते वहीं प्रेस कांफ्रेस करते और हाईकोर्ट की भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात करते, चिल्ला चिल्ला कर हाईकोर्ट के शान में कसीदे पढ़ते।

    इन सभी क्रियाकलापों से एक घटना हुई कि लोगों के दिलोदिमाग में बैठ गया कि कोर्ट हमेशा सही व समाज के लिए कल्याणकारी निर्णय देता है। कोर्ट पानी को सामाजिक संपत्ति मानता है। कोर्ट ग्रामसभा व ग्रामीण लोगों के प्रस्तावों का आदर देता है, महत्व देता है। दिलोदिमाग में यह सब बैठाया सामाजिक आंदोलनों के विभिन्न संगठनों के लोगों ने, मैगसेसे पुरस्कार पाने वालों आदि ने वह भी जागरूकता व चेतनशीलता आदि के नाम पर।

    अब देखते हैं आगे की घटना-

    लगभग एक या दो साल या कम ज्यादा समय के बाद केरल की उसी हाईकोर्ट ने अपनी बात पलट दिया।

    सामाजिक आंदोलनों के संगठनों के लोग, NGO  वाले लोग, मैगसेसे पुरस्कृत लोग आदि तो देश भर में यह बता चुके थे कि पानी सामाजिक संपत्ति है और ऐसा हाईकोर्ट कहता है। देश भर में घूम घूम कर लाखों करोड़ों लोगों के दिलोदिमाग में बहुत कुछ बैठा चुके थे। उसी कोर्ट ने अपनी बात बिलकुल पलट दिया।

    अब ये लोग जो लोगों के सामने ढेरों बातें दावे से ठोंकते हुए कर चुके थे। फिर से कैसे जाते उतने व उन्हीं लोगों के बीच यह कहने कि कोर्ट का निर्णय उचित नहीं, समाज के लिए कल्याणकारी नहीं। मान लीजिए यदि उन्हीं व उतने ही लोगों के पास किसी तरह जाना संभव भी होता तो भी लोग इनकी विरोधाभासी बातों पर विश्वास क्यों करते?

    केरल के गांव की घटना जो भारत में भूजल के सामाजिक स्वामित्व के मसले पर बहुत बड़ा परिवर्तनकारी आंदोलन का आधार बन सकती थो। उसकी बिना सोचे बिचारे तात्कालिक लाभ के लिए की जाने वाले क्रियाकलापों के कारण भ्रूण हत्या हो गई।

    लोगों के NGO को मिलने वाली ग्राँटों की राशि बढ़ गई, लोगों के नाम व पहचान बढ़ गई, लोग देश विदेश घूम लिए, लोगों सेलिब्रिटी बन गए, बहुत सारे पुरस्कारों का आदान प्रदान हो गया, लोगों को क्रांतिकारी होने का तमगा मिल गया।

    लेकिन आम समाज वहीं का वहीं रहा या यूं कहें कि भूजल पर सामाजिक स्वामित्व वाला मसला पीछे चला गया। अब कोई न तो केरल के गांव की बात करता है न ही भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात होती है।

    भारत में फेसबुक जैसी साइटों के आने से एक बात हुई है कि हम रातोंरात किसी को भी छुटपुट, टटपुंजिया, तात्कालिक व प्रायोजित घटनाओं के कारण सामाजिक बदलाव व परिवर्तन का मसीहा मान लेते हैं। सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन का नेतृत्व मान कर अपना समर्पण दे देते हैं, हममें से बहुत लोग अंध भक्त भी बन जाते हैं जो कुछ भी सुनने समझने तक को तैयार नहीं होते।

    पता नहीं क्यों हम किसी तात्कालिक व अस्थाई लाभ के लिए परिवर्तनकारी नेतृत्वों के प्रायोजन में जुट पड़ते हैं, स्वयं को अंध समर्पित भी कर देते हैं। फिर कहते हैं कि दगा हो गया, समझ नहीं पाए।

    दरअसल सामाजिक प्रतिबद्धता व जीवन मूल्यों को लेकर जितने सतही व खोखले हम होते हैं। हमारी कल्पना का परिवर्तन भी उतना ही सतही व खोखला होता है। यही कारण होता है कि हम सतही व खोखले आधारों पर परिवर्तन के लिए प्रायोजित नेतृत्वों के लिए अपने आपको समर्पित कर देते हैं।

    जिनको हम प्रायोजित करते हैं उनकी तो मौज हो जाती है, लेकिन हम व हमारा देश वहीं का वहीं खड़ा रहता है या पीछे चला जाता है। यह बिलकुल वैसे ही है जैसे जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तब हम चिल्लाते हैं कि खेत नहीं बचा पाए। लेकिन हम फिर वही गलती करते हैं, नई चिड़ियों पर विश्वास करते हैं, जो हमारे खेत फिर से चुगती हैं। हम फिर से ठगा महसूस करते हैं। कसमें खाते हैं मूर्ख न बनने की। लेकिन फिर हम नए प्रयोजनों में फंस कर नए बहाने व तर्कों को गढ़ने लगते हैं और फिर से ठगे जाते हैं। 

    भारत में पिछले कुछ वर्षों में मीडिया व सोशल साइट्स के द्वारा बहुत ही कम समय में कई परिवर्तनकारी नेतृत्वों को विभिन्न घटनाओं को आधार बना कर तेज गति से प्रायोजित किया गया है। उनको बिना सवाल सत्ताएं भी सौपी गईं लेकिन उनका वास्तविक चरित्र क्या रहा यह बाद में मालूम पड़ा और लोगों ने ठगा महसूस किया।

    कितनी बार हम मूर्ख बनेंगे कब तक ऐसा करते रहेंगे। हमें शार्ट कट बंद करने होगें। हमें बिना खुद को बदले हुए परिवर्तन देखने की लिप्सा से ऊपर उठना होगा।

    पहले हमको समझदार बनना होगा, प्रवंचना कभी भी अपने लिए समझदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती। बेईमानी कभी भी अपने लिए ईमानदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती।

    सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता।

    हमें ठोस होने की जरूरत है और हमें परिवर्तन के लिए दीर्घकालिक रास्तों को चुनने की जरूरत है। वास्तविक सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन कभी भी शार्टकट व टटपुंजिए तौर तरीकों से संभव नहीं।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
  • JNU जैसे संस्थानों की विशिष्टता विशेष अनुदानों, अनुग्रहों व संसदीय कानूनों की शक्तियों की देन है न कि अर्जित की हुई

    IIM, Calicut

    IIM, Calicut

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

    जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की स्थापना करना अच्छा निर्णय था। तत्कालीन प्रधानमंत्री व भारत सरकार की दूरगामी सोच का परिणाम था। JNU की स्थापना करने की मंशा में कोई दुर्भाव नहीं था, वरन् भारत देश की बेहतरी निहित थी। JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। JNU की स्थापना में JNU की स्थापना के क्षण से मिलने वाले विशेष अनुदानों व अनुग्रहों का बहुत बड़ा योगदान है। JNU की विशिष्टता सरकार से मिले इन्हीं विशिष्ट अनुदानों व अनुग्रहों के आधारभूत स्तंभों पर खड़ी है।

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

     

    • भारतीय संसद में JNU की स्थापना व विशिष्ट दर्जा देने के लिए कानून बना जो JNU को शक्ति देता है। JNU को संसदीय कानून का यह विशिष्ट स्तर स्थापना के समय से प्राप्त है। JNU ने यह स्तर अर्जित नहीं किया। सरकारी अनुग्रह था।
    • दिल्ली जैसी सघन जनसंख्या वाली राजधानी में एक यूनिवर्सिटी के लिए लगभग 1000 एकड़ जैसी बड़ी जमीन का अधिग्रहण किया गया।
    • छात्रों के रहने के लिए पर्याप्त से अधिक संख्या में सुविधा संपन्न छात्रावासों का निर्माण किया गया।
    • पढ़ाई, छात्रावास व भोजनालय की फीसें इतनी कम रखी गईं कि एक तरह से मुफ्त जैसा ही माना जा सकता है।
    • ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा में विशेष अंक देने का प्रावधान रखा गया ताकि गांवों के छात्र JNU में पहुंच सकें।
    • छात्रों का विकास हो, उनकी सोच दूरगामी हो, वे चिंतनशील बनें इसलिए समृद्ध व सुविधा संपन्न पुस्तकालयों व वाचनालयों की स्थापना की गई।
    • छात्रों की राजनैतिक चेतनशीलता का विकास हो इसलिए JNU के छात्रसंघ की स्थापना भी विशिष्ट रूप से की गई।
    • भारत में उपलब्ध योग्य लोगों का चयन शिक्षकों के रूप में किया गया।
    • शिक्षकों को बेहतर वेतन व सुविधाएं दी गईं।
    • आदि।

    भारत देश को JNU ने नहीं बनाया। भारत की आजादी में JNU का कोई योगदान नहीं। भारत के विकास में JNU का विशिष्ट योगदान नहीं। सामाजिक संसाधनों व संसदीय कानून रूपी विशिष्ट अनुग्रहों के आधारों पर JNU वजूद बना व खड़ा है। JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई नही है।

    फेसबुक में JNU के ऊपर लिखी गई मेरी पोस्टों पर JNU के लोगों की अधिकतर टिप्पणियां बेबुनियाद तर्कों पर रही हैं। JNU के शिक्षकों, छात्रों व भूतपूर्व छात्रों का यह कहना कि भारत में JNU सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, पूरी तरह बेबुनियाद व फिजूल बात है।

    जब JNU ने अपनी विशिष्टता अर्जित ही नहीं की है तो JNU के लोगों के अंदर लोकतांत्रिक समझ विकसित होने की बात कैसे हो सकती है। JNU को स्थापित करने वाले लोगों की सोच व दूरदृष्टि लोकतांत्रिक थी, जिसके कारण JNU का ढांचा ऐसा बना कि यह लोकतांत्रिक संस्थान हो जाता है।

    बने हुए ढांचे में जीने का मतलब उस ढांचे की समझ होने की अनिवार्यता नहीं है। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत में “सामाजिक समता” व “जाति-व्यवस्था के अंत” आदि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना सक्रिय योगदान करता होता। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत के गावों व किसानों के आर्थिक विकास की व्यवहारिक व धरातलीय योजनाएं बनाता होता। और भी बहुत करता होता।

    भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब व बेहद घटिया फैशन चल गया है जो शायद भारत के मीडिया के कारण उत्पन्न हुआ है। भारत में कुकरमुत्तों की तरह टीवी चैनल्स बने हैं जिनका काम सिर्फ बरसाती मेढ़कों की तरह शोर मचाते हुए टर्राना है। इस मीडिया का अधिकतर अर्थात लगभग 98% हिस्सा भारत के मेट्रों शहरों तक ही सीमित है, इस 98% प्रतिशत में भी बहुत बड़ा हिस्सा राजधानियों तक ही सीमित है। नेशनल मीडिया का तो मतलब ही दिल्ली राजधानी है।

    इसी मूर्खता भरे फैशन के कारण ही JNU को भारत की सभी विश्वविद्यालयों का प्रतिनिधि मान लिया गया है। मानो JNU ही पूरे भारत का विश्वविद्यालय है। मानो JNU ही भारत की विचारशीलता, चिंतनशीलता, सामाजिक सोच, सामाजिक प्रतिबद्धता, सामाजिक कर्मठता व राजनैतिक परिवर्तनों का केंद्र है।

    जैसे दिल्ली भारत नहीं है, भारत जैसे बड़े देश का केवल एक शहर है। बिलकुल वैसे ही JNU का मतलब भारत के सारे विश्वविद्यालय नहीं है। JNU भारत के अनेकों विश्वविद्यालयों में से एक विश्वविद्यालय है। चूंकि JNU दिल्ली में है जहां सारा मीडिया है और JNU की स्थापना विशिष्ट सरकारी व संसदीय अनुदानों व अनुग्रहों के द्वारा हुई है, इसलिए JNU में छींक आने का भी हंगामा होता है। वास्तव में हमारे, हमारे तंत्र व मीडिया का यह चरित्र देश के अन्य विश्वविद्यालयों व उनके छात्रों को कुंठित करता है, उनकी योग्यता, कार्यक्षमता व प्रतिभा को खंडित करता है।

    भारत के किसी भी विश्वविद्यालय को उसकी स्थापना के पहले क्षण से ऐसी विशिष्ट संसदीय व सरकारी अनुग्रह व अनुकंपाएं मिल जाएं तो उसका स्तर JNU के स्तर से कतई कम नहीं होगा भले ही उसको किसी बीहड़ में स्थापित किया जाए। इसकी संभावनाएं भी बहुत हैं कि ऐसे विश्वविद्यालयों का स्तर JNU के स्तर से बेहतर ही हो।

    JNU के लोगों को यह मूल्यांकन करना चाहिए कि जितना उनको भारत ने दिया है उसके एवज में वे भारत को क्या दे रहे हैं। यदि इसका मूल्यांकन हो तो यदि JNU के लोग ईमानदार होगें तो उनको शर्म आएगी। बिना अर्जित की हुई विशिष्टता पर अहंकार करना, दूसरों को अपने से हीन समझने की मानसिकता आदि JNU कितना लोकतांत्रिक है, कितना सामाजिक सोच का है, कितना स्वतंत्र चिंतक है, खुद ब खुद प्रमाणित कर देते हैं। धिक्कार पैदा होती है JNU के शिक्षकों व छात्रों के अहंकार व बड़बोलेपन को देखकर। भारत के लोगों ने JNU बनाया है, इसलिए भारत के लोग JNU से अधिक लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतन के हुए। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तब यह माना जा सकता था कि JNU को संस्थान के रूप में लोकतांत्रिक समझ है।

    देश में देश को बनाने व दिशा देने के लिए JNU से बड़े व गंभीर मुद्दे हैं। लेकिन चूंकि मीडिया कभी उन पर ध्यान नहीं देता। लोगों के वेस्टेड इंटरेस्ट व महात्वाकांक्षाओं के लिए उनकी कोई वैल्यू नहीं होती इसलिए वे मुद्दे हमेशा किनारे ही पडे रहते हैं। इसके बावजूद यह दावा किया जाता है कि देश के लिए सोचा व किया जाता है।

    देश के बहुत लोगों की दृष्टि में JNU पूरा भारत होगा, लेकिन मेरी दृष्टि में JNU सिर्फ और सिर्फ एक यूनिवर्सिटी है जिसकी स्थापना देश के विचारशील व दूरदृष्टिवान लोगों ने इस विश्वास से की थी कि इसके लोग सामाजिक विकास के लिए चिंतन करेंगें, निर्माण करेंगें, सामाजिक चेतनशीलता पैदा करेंगें न कि केवल नौकरी, पैसा, ग्लैमर, अय्याशी व कैरियर के पीछे ही भागेंगें। यदि JNU का उद्देश्य यही सब होना था तो संसद में JNU के लिए अलग से कानून बनाकर विशिष्टता देने की जरूरत ही क्या थी।

    भारत में सैकड़ों यूनिवर्सिटीज हैं जहां के छात्र अपना हर दिन दर्द में गुजारते हैं। मैं अपने जीवन में कई ऐसे छात्र नेताओं से मिला हूं जिनको पुलिस की पिटाई ने जीवन भर के लिए अपंग कर दिया और ये छात्र नेता JNU के छात्रसंघ अध्यक्ष की तुलना में बहुत ही बेहतर व दर्दीला भाषण देने की क्षमता व योग्यता रखते थे। भारत की इन सैकड़ों अनजानी यूनिवर्सिटीज के सैकड़ों हजारों छात्र नेता अपने जीवन में ढेरों फर्जी मुकदमें झेलते हैं।

    इन छात्रनेताओं व छात्रों का क्या? लेकिन कभी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती इन छात्र नेताओं के लिए। क्यों नहीं उठी। केवल इसलिए नहीं उठी क्योंकि वे ऐसे विश्वविद्यालयों से नहीं थे जिनको हर वर्ष अरबों रुपए की सरकारी अनुदान मिलता हो और जिनको संसद में विशेष कानून द्वारा संरक्षण व विशिष्टता प्राप्त हो। क्या दोष है इन विश्वविद्यालयों का और इनमें पढ़ने वाले छात्रों का?

    हमारी संवेदनशीलता, जागरूकता इन विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ क्यों नहीं जुड़ती है? क्या ये लोग भारत देश के नहीं है? क्या ये विश्वविद्यालय भारत देश के अंदर नहीं है। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तो बात समझ आ सकती थी कि JNU ने विशिष्टता अर्जित की है।

     

    IIM, Kozhikode

    IIM, Kozhikode

    जैसे JNU की विशिष्टता प्रायोजित है, अनुदान, अनुकंपा व अनुग्रहों के स्तंभों पर स्थापित है। तो ऐसा भारत के हर विश्वविद्यालय के साथ क्यों नहीं? एक ही देश के अंदर इतना भेदभाव क्यों? buy provigil south africa yanginstitute.com modafinil kup online इसीलिए मैं चाहता हूं कि या तो भारत के हर जिले में कम से कम एक JNU, IIT, IIMAIIMS आदि हो जिनको वैसी ही विशिष्ट अनुदान, अनुग्रह व संसदीय कानून की शक्ति आदि मिले जो JNU, IIT, IIM व AIIMS जैसे संस्थानों को इनकी स्थापना के क्षण से प्राप्त है। 

    JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं किया है, विशिष्टता प्रायोजित है, मिथक है। इसलिए देश के हर जिले में JNU(s) की स्थापना किया जाना कोई बड़ी बात नहीं। देश के लाखों करोड़ों युवाओं को हक है JNU जैसी विशिष्टता को भोगने का, उनको भी हक है खुद को लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतक मानने व कहलवाने का।

     

    देश का लाखों करोड़ों युवा पैदा होते ही केवल नौकरी पैसा व ग्लैमर पाने के लिए अंतहीन चूहादौड़ में झोंक दिए जाते हैं। कोचिंग सेंटर्स लूटते हैं, बच्चे आत्महत्याएं करते हैं, कुंठित होते हैं, हीन भावना से ग्रस्त होते हैं। प्रतिक्रिया वादी बनते हैं। इन्हीं प्रायोजित विशिष्टता वाले संस्थानों में पहुंचना ही बचपन से अपना मकसद चुन लेते हैं। कितना ओछा व छोटा मकसद होता है जीवन का। जो पहुंच गए वे आजीवन स्वयं को दूसरों की तुलना में विशिष्ट मानने के अहंकार में जीते हैं। जबकि यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो इन संस्थानों में प्रवेश पाने में रटने की योग्यता के अतिरिक्त कौन सी वास्तविक योग्यता होती है। किंतु चूंकि ऐसे संस्थानों की संख्या भारत की जनसंख्या के अनुपात में नगण्य है तथा अन्य संस्थानों को सरकारी विशिष्ट अनुग्रह मिलते नहीं हैं इसलिए एक मिथक स्थापित हो गया है कि जो भी इन संस्थानों में प्रवेश पाता है वह बहुत योग्य है, विशिष्ट है। 

     

    भारत के सुनहरे भविष्य के लिए शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता की स्थापना करने की प्रवृत्ति अब खतम कर देना चाहिए। भारत की संसद से हर उस कानून को खतम कर देना चाहिए जो किसी शैक्षणिक संस्थान को देश के अन्य संस्थानों की तुलना में विशिष्टता देता हो। क्योंकि भारत के किसी संस्थान ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। भारत की संसद ने ऐसे संस्थानों की स्थापना के पहले क्षण से ही उनको संवैधानिक रूप से विशिष्ट संस्थान होने की शक्ति दी है। 

     

    शैक्षणिक संस्थानों की विशिष्टता अर्जित की हुई होनी चाहिए न कि किसी राजकीय व संवैधानिक शक्ति व अनुग्रह के प्रायोजन से प्राप्त हुई होनी चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता देश व समाज के लिए दूरगामी रूप से बहुत ही अधिक हानिकारिक होती है और वास्तविक प्रतिभाओं को कुंठित करती है, प्रतिक्रियावादी बनाती है, असंवेदनशील बनाती है, हीन भावना से ग्रस्त करती है।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

  • सतयुग की अवधारणा मिथक है जो कर्म की अवहेलना भी करती है – मित्र के साथ संवाद

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (www.books.groundreportindia.org)
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    मित्र : सतयुग क्या है?

    सामाजिक यायावर : सतयुग एक ऐसा युग है जब सब कुछ सत्य पर आधारित है, सब कुछ ठीक होता है। मानव अपनी पूर्णता व मूल्यों की उच्चतर अवस्था को जीता है। सब कुछ सत्य पर आधारित, न्यायपूर्ण व कल्याणकारी होता है। सतयुग की अवधारणा में हर युग का काल नियत है; जैसे सतयुग सत्रह लाख अठ्ठाइस हजार वर्ष, त्रेतायुग बारह लाख छियानबे हजार वर्ष, द्वापरयुग आठ लाख चौसठ हजार वर्ष और कलियुग चार लाख बत्तीस हजार वर्ष।  

    हर युग में मनुष्य की औसत आयु भी नियत है, जैसे सतयुग में मनुष्य की औसत आयु एक लाख वर्ष, त्रेतायुग में मनुष्य की औसत आयु दस हजार वर्ष, द्वापरयुग में मनुष्य की औसत आयु एक हजार वर्ष और कलियुग में मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष।

    युगों की अवधारणा में सबसे लंबा युग ‘सतयुग’ है और मनुष्य की आयु सबसे लंबी एक लाख वर्ष मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि सतयुग में मनुष्य जीवन-मूल्य, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि की उच्चतर अवस्था को प्रामाणिकता के साथ जीता है।

    मित्र : आप क्या मानते हैं कि सतयुग था?
    सामाजिक यायावर : बिलकुल नहीं।

    मित्र : क्यों?
    सामाजिक यायावर : सतयुग की मूलभूत अवधारणा में ही बहुत छिद्र हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही, मनुष्य के कर्म का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है।

    मित्र : यह तो चौकाने वाली बात है। क्योंकि सद्कर्म ही तो सतयुग का मूलाधार है।
    सामाजिक यायावर : स्वर्ग व सतयुग आदि की हमारी अवधारणाओं के मूल में ही छिद्र हैं, भ्रम हैं, कोरी कल्पनायें हैं। यदि आप पूर्वाग्रह व भावुकता को परे रखकर विश्लेषण करें तो आप भी मेरे तर्कों से सहमत हो सकते हैं।

    लाखों वर्ष के सतयुग में मनुष्य द्वारा एक लाख वर्ष जैसे बहुत लंबे समय तक जीवन-मूल्यों, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि को जीते हुएऔर सद्कर्मों को करते रहने के बावजूद युग का समय पूरा होने पर एक दिन सतयुग का क्षय हो जाता है। 

    सतयुग से कलियुग के बीच में ‘त्रेतायुग’ व ‘द्वापरयुग’ भी हैं जो लाखों वर्षों के हैं। इन युगों में भी मनुष्य कितना भी सद्कर्म कर ले, लेकिन उसको पूर्व-निर्धारित नियति व दैवीय व्यवस्था के कारण बढ़ना कलियुग की ही ओर है।  कलियुग में कितने भी बुरे कर्म कर ले, बढ़ना ‘सतयुग’ की ही ओर है। क्योंकि कलियुग का समय खतम होते ही, “सतयुग” आ जायेगा। सतयुग से त्रेतायुग, त्रेतायुग से द्वापरयुग, द्वापरयुग से कलियुग, कलियुग से सतयुग, इस पूरे चक्र में सब कुछ पूर्वनिर्धारित व नियोजित है।

    जब सतयुग के उच्चतर निरपेक्ष-सद्कर्मों को जीने से मनुष्य सतयुग की निरंतरता नहीं बनाएरख सका तो कलियुग में उसके छोटे-छोटे सापेक्षिक-सद्कर्म का सतयुग के लिए कोई औचित्य ही नहीं, फिर भी कलियुग सतयुग की ओर बढ़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य कैसे भी कर्म करे। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग अपने समय से आयेंगें और जायेंगें, मनुष्य के कर्मों से इनका होना, न होना, आना, जाना आदि का कोई संबंध नहीं। 

    यही कारण है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही मनुष्य की ‘कर्मशीलता’ का कोई अस्तित्व व महत्व नहीं रह जाता है। मनुष्य के कर्म की कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती है। और सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही ‘कर्म’ औचित्यहीन और तिरस्कृत हो जाता है।

    यदि मनुष्य अपने जीवन में ‘कर्मशील’ बने रहना चाहता है, सद्कर्मों का प्रयास करते रहना चाहता है, कर्म को मानव जीवन का उद्देश्य मानते रहना चाहता है, तो मनुष्य को पूर्वनिर्धारित व नियोजित युगों की अवधारणा को अस्वीकार करना पड़ेगा। और यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर किसी भी क्षण से सतयुग या कलियुग में जीना शुरू कर सकता है।

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  • धार्मिक कथाएं व ग्रंथ, इतिहास व इतिहासकार

    सामाजिक यायावर
    सामाजिक यायावर
    किसी भी धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस धर्म के लोगों को स्थायी रूप से मानसिक गुलाम रूपी अनुगामी बनाने के लिए लिखी गईं हैं। ताकि धर्मों की अमानवीयता, ऋणात्मकता व शोषण वाले गहरे तत्वों पर कभी सवाल न खड़ा हो पाए।
     
    यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं।
     
    एक उदाहरण स्वरूप यदि वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल के बारे में यही साबित होता है कि उस काल्पनिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था और धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था।
     
    जब भी धार्मिक कल्पनाओं व कर्मकांडों को जबरदस्ती सही साबित करना होता है तो ऐतिहासिक शोधों की बात की जाती है।
     
    ऐसे मामलों में जिसे ऐतिहासिक शोध कहा जाता है यदि उस शोध का आधार वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, तो वह ऐतिहासिक शोध कल्पनाओं, काल्पनिक कथाओं व इन पर आधारित ग्रंथों, महाग्रंथों, काव्यों व महाकाव्यों आ्दि की बेसिरपैर की खिचड़ी के अलावे कुछ भी और नहीं होता है।
     
    भारत के बहुत इतिहासकार जिनकी किताबें पढ़ीं जातीं हैं और जिनके नाम की तूती बोलती रही है या बोलती है। जिनके नामों को सबूत के तौर पर दिया जाता है। वे दरअसल इतिहास के शोधों के नाम पर ऐसी ही खिचड़ियां बनाते, पकाते व परोसते रहे हैं।
     
    यही सबकुछ पढ़ कर हजारों लाखों ने PhD कर ली, यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर हो गए, देश के ऊंचे नौकरशाह हो गए। इसी सब घालमेल ने देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा व दशा की और शिक्षा व्यवस्था की खामी के लिए गाली देने के लिए लार्ड मैकाले जैसे कुछ लोग अनंतकाल के लिए भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए राक्षस घोषित कर दिए गए।
     
    बेसिकली हमारा देश ऐसे ही खोखले व सतही आधारों पर खड़ा है। हमें ही तय करना है कि हम खुद को, अगली पीढ़ी को, समाज को, देश को क्या देना चाहते हैं और कैसा बनते देखना चाहते हैं ….
     
     
     
     
  • मानव-निर्मित धर्म और बाबाओं का बाजार

    मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर
    साभार –
    पृष्ठ संख्या  242 से 245 

    मैंने कॉफी पीते मित्र से कहा कि सच्चे बाबाओं/गुरूओं/संतों को छोड़कर शेष बाबाओं के लिए  भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार है।

    मित्र : आपका मतलब भारत में कई प्रकार के बाबा होते हैं।
    नोमेड : जी, बाबाओं के कई चारित्रिक प्रकार है। जैसे गरीबों के बाबा, मध्यवर्ग के बाबा, उच्च-मध्यवर्ग के बाबा, उच्चवर्ग के बाबा, व्यापारियों के बाबा, ऊंचे वेतन वाले नौकरीपेशा व नौकरशाहों के बाबा आदि।

    मित्र : भारत में इतने बाबा लोग क्यों हैं
    नोमेड : इसका कारण भारत में मानव-निर्मित ईश्वर के प्रतिनिधियों की बहुत बड़ी संख्या का होना है। चूंकि परंपरा में मानव-निर्मित ईश्वर की अवधारणा में यह मान लिया गया है; कि ईश्वर जादू से समस्या हल कर देता है, ईश्वर जादू से मानवीय स्वार्थ की इच्छायें पूरी कर देता है, ईश्वर जादू से भोगविलास व ऐशोआराम की इच्छायें पूरी कर देता है। सारांश यह कि ईश्वर का काम मनुष्य को भोग-विलास करवाना है, जो ईश्वर भोग करवा दे वह महान् व शक्तिशाली, जो न भोग करवा पाएउस पर आस्था खतम करके दूसरे प्रकार के ईश्वर में आस्था रखना। 

    भारतीय समाज में परंपरा में लोगों के मन में यह धार्मिक अनुकूलन बनाया गया है कि कुछ लोग ईश्वर से संपर्क रख सकते हैं, ईश्वर से संवाद कर सकते हैं, ईश्वर से सिद्धियां सीख सकते हैं, ईश्वर को मानव की इच्छा पूर्ति के लिए प्रसन्न कर सकते हैं और मुंहमांगा वरदान प्राप्त कर सकते हैं आदि आदि।

    मित्र :  मैं ठीक से समझा नहीं।
    नोमेड : लड़का पैदा करना हो, लड़की न पैदा करना हो, छोटे बच्चे से लेकर ऊंचे वेतनमान की परीक्षा तक किसी में भी सफलता प्राप्त करनी हो, सुंदर पत्नी प्राप्त करनी हो, कमाऊ पति प्राप्त करना हो, बीमारी का इलाज करना हो, दुश्मन को क्षति पहुंचानी हो, नौकरी प्राप्त करनी हो, प्रमोशन प्राप्त करना हो, किराएपर मकान लेना हो, मकान के लिए किरायेदार मिलना हो, पति को दुरुस्त करना हो, पत्नी को दुरुस्त करना हो, बेईमानी करके उसको महानता में बदलना हो, काली करतूतों को सफेद करना हो, पाप करके किएगएपाप को पुण्य में परिवर्तित करना हो आदि आदि अनेकों प्रकार के चिल्लर कामकाज व आवश्यकतायें हैं। जिनके लिए लोगों को ईश्वरीय प्रतिनिधियों की आवश्यकता पड़ती है। भारत के लोगों की सहज मानसिकता है कि पुरुषार्थ के बजाय, काम कराने के लिए संपर्क व संबंध खोजते हैं। और ऐसी मानसिकता का कारक भी परंपरा में ईश्वरीय प्रतिनिधियों का प्रायोजित होना ही है।

    मित्र : इसका बाबा लोग से क्या रिश्ता है।
    नोमेड : बहुत गहरा रिश्ता है। भारत में परंपरा में ऐसा धार्मिक अनुकूलन किया गया है कि कुछ लोग ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं जिनके माध्यम से ईश्वर मनुष्यों के साथ संपर्क रखते हैं। इन प्रतिनिधियों को बिना किसी भी शंका के पूरे समर्पण के साथ स्वीकारना है और इनके प्रति सेवा व समर्पण का भाव रखना है।

    मनुष्य हर उस तंत्र का मानसिक व वैचारिक अनुगामी होना स्वीकार कर लेता है, जो उसकी ऐश्वर्य, सुविधा व भोग-विलास की इच्छा की पूर्ति कराने का दावा करता है। तो जिन लोगों ईश्वर के साथ संपर्क रखने वाला प्रायोजित कर दिया जाता है, लोभी, मृत्यु व मृत्यु के पश्चात् नर्क की प्रताड़नाओं से भयभीत लोग उनको अपना गुरू स्वीकार कर लेते हैं, उनको पवित्र व पूजनीय मान लेते हैं ताकि उनके माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न कर सकें और आकाशीय-स्वर्ग या भू-स्वर्ग आदि की प्राप्ति कर सकें।

    मित्र : गुरू को तो बहुत महान् माना जाता है।
    नोमेड : इसी मान्यता व अनुकूलन का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपने अनुयायी बनाते हैं और अनुयायियों में अपने प्रति बिना मूल्यांकन व विश्लेषण के अंधी आस्था पैदा व विकसित करते हैं, जिसके समक्ष कोई भी उचित तर्क व कारक आदि सभी व्यर्थ है, कूड़ा है, मिट्टी है, अस्तित्वहीन हैं, अप्रासांगिक हैं।

    पारंपरिक धार्मिक अनुकूलन में गुरू को सबसे अधिक महान् बताया गया है। इस मूल्य का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपनी गुरूता पर अंधी आस्था रखने का अनुकूलन स्थापित करते हैं और बिना शंका अंधी आस्था कायम रखने के लिए गुरू संपूर्ण है, ईश्वरीय चेतना से संपन्न है, ईश्वर की सक्रियता व अभिव्यक्ति का अंश है इसलिए  शिष्य कभी गुरू से आगे नहीं जा सकता है आदि आदि गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में प्रायोजित करते हैं।। शिष्य द्वारा गुरू पर शंका करना अक्षम्य अपराध है, इस अपराध के लिए गुरू को शिष्य को घोर से घोर दंड देने का अधिकार है। शिष्य को गुरू का मानसिक व शारीरिक दास बनना होता है।

    मित्र : आप कहना चाहते हैं कि लोगों के मन में बैठी ऐसी परंपरागत सामाजिक व धार्मिक अनुकूलन का लाभ उठाने वाले बाजारू बाबा लोग हैं।
    नोमेड : जी बिलकुल। बाजारू बाबा लोग बड़े चतुर हैं, भलीभांति समझते हैं कि भारतीय समाज के लोग धर्मभीरु हैं और स्वार्थ पूर्ति के लिए बिना पुरुषार्थ का शार्टकट खोजते हैं। और लोगों के लिए ईश्वर का मतलब जादू करके मनुष्य की भोगने की इच्छाओं की पूर्ति कराने वाला है।

    इसलिए  जो मृत्यु के निकट नहीं हैं वे और अधिक सांसारिक भोगों के लिये; जो मृत्यु के निकट हैं वे जीवन भर किएगएस्वार्थ के कामों, हिंसा व पापों की जवाबदेही से बचकर स्वर्ग में ऐश्वर्य भोगने के जुगाड़ के लिये; बाबाओं रूपी ईश्वरीय प्रतिनिधियों के अनुगामी बनते हैं।

    मित्र : जुगाड के लिए क्या करना होता है।
    नोमेड : जुगाड़ के लिए कुछ विशेष नहीं करना होता है। अलग-अलग बाबा अपना अलग तरीका लेकर चलता है ताकि अनुयायियों के अंदर गुरू की अद्वितीयता का अहसास भी हो और कर्मकांड करना बहुत दुष्कर भी न हो। इसलिए  किसी पशु को कुछ खिलाना/नहलाना/पानी-पिलाना या किसी को दान करना आदि आदि; किसी रंग का कपड़ा पहनना या दान करनाआदि आदि; किसी दिन कुछ करना या न करना आदि आदि;  माता पिता या बड़े-बूढ़ों के दिन में कई बार पैर छू लो या रात में किसी विशेष समय जग कर पैर छू लो आदि आदि, इससे माता पिता और बड़े बूढ़े भी गुरु जी के ऊपर प्रसन्न हो गएऔर उनका गुरू जी का प्रचार भी हो गया। इसी प्रकार का कुछ ऊटपटांग करना व करवाना और तर्को से किएजा रहे कर्मकांड का संबंध दैवीय प्रयोजन से सिद्ध कर देना। 

    आजकल तो आध्यात्मिक बाबा लोग का फैशन आ गया है। जागरूक व पढ़ेलिखे लोग अपने लिए अलग प्रकार के आध्यात्मिक बाबा लोग चाहते हैं। एबाबा लोग इन लोगों को जीने का तरीका सिखाते हैं, व्यवहार करना सिखाते हैं, शांति सिखाते हैं, बाकायदा कोर्स कराते हैं, कोर्स की फीस लेते हैं। फीस लेना प्रोफेशनल्स को बाबा का प्रोफेशनल, ईमानदार व वजनदार होना सिद्ध करता है।

    पैसे कमाने और ग्लैमर भोगने के लिए बेइंतहा दौड़-भाग करते ऊंचे वेतन वाले प्रोफेशनल्स लोग जब कभी अपने बाजारूपन से अलग हटकर कुछ सोचते हैं तो उनको अंदर से भय, असुरक्षा, घुटन व कुंठा आदि महसूसती है। तो इससे पलायन करने के लिए ये लोग अपने लिए किसी को अपना आध्यात्मिक गुरू मान लेते हैं और फिर गुरू के बताई पद्धतियों के नशे में छद्म शांति महसूसते हुए पूर्ववत जीवन जीने लगते हैं।

    उपभोक्ता रूपी मनुष्य की हर वास्तविक/संभावित/आभासी आवश्यकता के लिए विकल्प प्रस्तुत कर देना ही, बाजार के तंत्र की सफलता व मजबूती है। बाजार में उपलब्ध आध्यात्मिक व गैर-आध्यात्मिक बाबा लोग भी ऐसे ही बाजारू विकल्प हैं। किसी ने लोगों से किसी बाबा के बारे में सुना, अपनी तथाकथित मूल्यांकन क्षमता व बौद्धिकता आदि से बाबा को तौला और पसंद आने पर उस बाबा को गुरू मान लिया।  व्यक्ति को अपनी पसंद का गुरू बाजार में उपलब्ध है।

    मित्र : इन बाबाओं के पास इतना पैसा कहा से आता है।
    नोमेड : बाबा लोगों के पास मुख्यतः दो प्रकार के लोगों के द्वारा पैसा अधिक आता है। व्यापारी व व्यापारियों के परिवारों से और बड़ी कंपनियों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स, नौकरशाहों व उनके परिवारों से।

    मित्र : ऐसा क्यों, व्यापारियों की बात तो समझ आती है लेकिन नौकरशाह व प्रोफेशनल्स …… अचरज की बात है।
    नोमेड : ऐसा इसलिए  कि व्यापारियों के बाद सबसे अधिक असंतुष्ट, भ्रमित व अनैतिक लोग एही लोग हैं। इन लोगों का भ्रम, अनैतिकता व अर्थ की ताकत का अहंकार इनको अंदर की शांति नहीं प्राप्त करने देते हैं। दूसरों की तुलना में पैसा अधिक होने से अहंकार का स्तर बहुत ही ऊंचा होने के कारण ये लोग अंदर की ईमानदारी के साथ सामाजिक भी नहीं हो पाते। बाबाओं का चेला बनने से, दूसरे चेलों के साथ तथाकथित सामाजिकता का ढोंग भी जीने को मिल जाता है।

    भारत में अमूमन व्यापारी वर्ग गैर पढ़ा लिखा होता है, इसलिए इनके धार्मिक बाबा लोग पढ़े-लिखे लोगों के बौद्धिक श्रेष्ठता के अहांकारों को नहीं सुहाते हैं। इसलिए पढे-लिखे व स्वयंभू जागरूक लोगों ने अपने लिए अलग किस्म के बाबा बना लिए हैं, जिनको ये लोग आध्यात्मिक बाबा कहना पसंद करते हैं, जो इनके तार्किक अहंकारों को तर्कों से तुष्ट करते हुएबाबागिरी करते हैं।

    भारत में धार्मिक व आध्यात्मिक बाबागिरी बहुत बड़ा व ताकतवर उद्योग बन चुका है। ये लोग बाकायदा विभिन्न सत्ताओं जैसे बाजार व राजनैतिक सत्ताओं आदि के एजेंट की तरह भी काम करते हैं और अपने वेतनभोगी कर्मचारी भी रखते हैं। प्रचार कंपनियों से अपना प्रचार भी करवाते हैं और लाभ कमाते और कमवाते हैं। उद्योग बनने का एक कारण “आस्तिक व नास्तिक” की भ्रामक परिभाषाओं का प्रचलन भी है।

    मित्र : आप आस्तिक या नास्तिक किसे कहते हैं।
    नोमेड : बात मेरे कहने की नहीं है। बात आस्तिक व नास्तिक शब्दों के शाब्दिक अर्थ व किस संदर्भ में प्रयोग करने के लिए ये दोनों शब्द बनाए गए। इन शब्दों की शुरुआत होने का मत यह भी है कि वेदों को मानने वाला आस्तिक व वेदों को न मानने वाला नास्तिक है।

    यदि शाब्दिक अर्थ में जाएं तो इनका अर्थ कुछ यूँ निकलता है। आस्तिक = “जो है” उस पर विश्वास करने वाला और नास्तिक = “जो नहीं है” उस पर विश्वास करने वाला।

    मानव-निर्मित ईश्वर तो मानव का गढा हुआ है, इसलिए मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करने का तात्पर्य “जो नहीं है” उस पर विश्वास करना हुआ। जो मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करते हैं वे भयंकर रूप से ‘नास्तिक’ होते हैं, वह भी जबरदस्त अहंकार व हिंसक भावना से ओतप्रोत क्योंकि ये लोग ईश्वर को मनमाफिक गढ़ते हैं। जो निर्विकार अस्तित्व पर विश्वास करता है केवल वही “आस्तिक” है, क्योंकि वह “जो है” उस पर विश्वास करता है।

    लोग यदि इन दो शब्दों का अर्थ ही समझ लें तो जो बाबा लोग ढोंगी हैं, तो ऐसे बाबाओं के छद्म-जालों की मानसिक व वैचारिक दासताओं के चंगुल से बाहर निकलने की संभावना बनी रहती है।

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  • हम, हमारी स्मार्टनेस बनाम भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी – (भाग 01)

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    सामाजिक यायावर

    यह लेख-श्रंखला गंभीर, विचारशील, चिंतनशील व सामाजिक मुद्दों की धरातलीय हकीकत को समझने की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए है। भावनात्मक आवेग, धार्मिक/जातीय प्रतिक्रियाओं/आवेशों, राजनैतिक पूर्वाग्रहों व संरेखणों, अतथ्यात्मक/कुतर्क/वितर्क बहसबाजी करने वाले व वास्तविक विकास की समझ न रखने वाले महानुभावों के स्वाद के लिए इस लेख-श्रंखला में शायद ही कुछ हो।

    मेरा प्रयास सदैव यही रहता है कि मैं कोरी भावुकता, भावनात्मक आवेग, धार्मिक या जातीय उन्माद/प्रतिक्रिया, खोखले तर्को/तथ्यों, निहित स्वार्थों/पूर्वाग्रहों व राजनैतिक पूर्वाग्रहों/संरेखणों आदि के आधार पर न लिखूं। संभवतः यही कारण है कि सोशल साइट्स में विचारशील व सामाजिक दृष्टिवान लोग ही मुझे पढ़ते हैं और मेरा लिखा पसंद करते हैं। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हो चुका है कि मेरी बातों की गहराई लंबे समय बाद समझी गई है और स्वीकृत की गई है। यहां तक कि मेरे जमीनी कामों के प्रमुख साथियों को भी मेरी बातों को समझने में कई-कई वर्ष कभी कभी पांच से दस वर्ष तक भी लग गए हैं।

    मैं सन् 2013 से सन् 2015 तक कई बार भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी, बनारस को क्योटो शहर बनाने जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया में लिख चुका हूं। आजकल कुछ पाठकों ने इन मुद्दों पर लिखे गए मेरे पुराने छोटे बड़े लेखों को खोज कर फिर से उन पर टिप्पणियां देना शुरू किया है। इसलिए स्मार्ट सिटी पर यह लेख-श्रंखला मित्रों को प्रस्तुत है।

    हम भारतीयों की वर्तमान मानसिकता, सोच, समझ, कंडीशनिंग व जीवन शैली के आधार पर स्मार्ट सिटी कैसे हो सकते हैं। इस पर बात करने के पहले हम स्मार्ट सिटी क्यों चाहते हैं इसको समझने का प्रयास होना चाहिए।

    दरअसल हम दिखावटी तौर पर कितना भी भारत व भारतीय संस्कृति की महानता का दावा ठोंकते रहें, कितना भी ड्रामेबाजी करते रहें लेकिन वास्तव में हमारे अंदर पाश्चात्य देशों व उनकी जीवन शैली ही आदर्श के रूप में स्थापित रहती है। हम मुंह से कुछ भी बोलते रहें लेकिन हम अपनी जीवन शैली में पाश्चात्य देशों की शैली का ही अनुकरण करते हैं व करना चाहते हैं।

    हम रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों तक में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी स्मार्टनेस समझते हैं। हर शहर, हर कस्बे में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी मीडियम स्कूल खुल गए हैं। हम अपने बच्चों को वहां  भेजते हुए फक्र महसूस करते हैं।हिंदी मीडियम स्कूलों की तुलना में कई गुना अधिक फीस भी देते हैं। हमारे बच्चे भी हिंदी मीडियम स्कूलों में जाने वाले बच्चों से स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं और उन बच्चों को हीन व हेय मानते हैं। ऐसी सोच हम खुद भी रखते हैं।

    दरअसल हम रेडीमेड तरीके से स्मार्ट होना चाहते हैं, हम रेडीमेड तरीके से विकसित होना चाहते हैं। इसलिए बाजार जाते हैं और स्मार्ट बनने के रेडीमेड टोटके खोजते हैं। हम जींस व टीशर्ट पहनना शुरू कर देते हैं, सुपर मार्केट में सामान खरीदना शुरू कर देते हैं भले ही हमें जींस, टीशर्ट व सुपर मार्केट की कतई जरूरत न हो। हम अपने बच्चों को स्मार्ट करना चाहते हैं तो उनको रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में भी महंगी से महंगी फीस भरकर भेजते हैं। लाखों रुपए सालाना डोनेशन देकर रद्दी इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेजों में भेजते हैं, यदि ज्यादे रुपयों का जुगाड़ हो गया तो विदेशों में लाखों रुपए महीना फीस व खर्चों का इंतजाम करके बच्चों को डिग्री लेने के लिए भेजते हैं वह बात अलग है कि बच्चा डिग्री लेकर भी परजीवी की तरह ही रहता है। लेकिन हम तो खुद को अपने गली मुहल्ले में स्मार्ट साबित कर लेते हैं।

    जो साधारण मोबाइल का प्रयोग करता है वह स्मार्ट नहीं है, जो आईफोन का प्रयोग करता है वह स्मार्ट है। जो लड़की जींस व टीशर्ट पहने वह स्मार्ट, जो लड़की सलवार कुर्ता दुपट्टा पहने वह दकियानूसी। जो टाई पहने वह स्मार्ट जो कुर्ता पायजामा पहने वह दकियानूसी। जो बियर पिए, वाइन पिए वह स्मार्ट जो अपने हाथ की बनाई महुआ की दारू पिए वह पिछड़ा व हीन। जो महंगी मोटरसाइकिल में चले वह स्मार्ट, जो साइकिल में चले या पैदल चले वह पिछड़ा, मूर्ख व हीन।

    यही इसी प्रकार की बाजार से खरीदी जाने वाली सतही सड़कछाप स्मार्टनेस, सफलताएं, उपलब्धियां आदि ही हमारी जीवन शैली बन चुकी हैं, और हमारे जीवन का उद्देश्य व उपलब्धियां भी। हमारे अंदर इसी बाजारू स्मार्टनेस व इसके सतहीपन के कारण ही हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं। हम सबकुछ बाजार से रेडीमेड खरीदना चाहते हैं, हमारा सबकुछ बाजार से ही तय हो रहा है। बाजार से खरीदने के लिए हमें धन व संपत्ति चाहिए होता है। इसलिए धन व संपत्ति के लिए हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जाते हैं, सतही व खोखले होते चले जाते हैं।

    हमारे अंदर आविष्कार, अनुसंधान व निर्माण करने की सोच व क्रियाशीलता नहीं होती, वास्तविक उद्यमशीलता नहीं होती है। होने की बात छोड़िए हम इन गुणों का तिरस्कार करते हैं, उपहास करते हैं। जैसे हम, वैसा हमारा समाज, वैसे हमारे व्यापारी व उद्योगपति, वैसे हमारे जन प्रतिनिधि, वैसे हमारे नौकरशाह और वैसे ही हमारे नीतिनिर्माता।

    हमारे अंदर स्मार्ट सिटी के प्रति नशा इसलिए सवार है क्योंकि हम अपने अंदर पाश्चात्य देशों की तरह साफ सुथरे चमचमाते शहरों व जीवन शैली को रेडीमेड तरीके से जीना चाहते हैं। स्मार्ट सिटी के बारे में हमारी कल्पना है कि अचानक हमारे शहरों को अमेरिका का न्यूयार्क, इंग्लैंड का लंदन, फ्रांस का पेरिस, आस्ट्रेलिया का सिडनी बना दिया जाएगा। हमें लगता है कि ऐसे शहर बाजार से रेडीमेड खरीदे जा सकते हैं। स्मार्ट सिटी के नाम पर यह जितनी कवायद हो रही है, वह बाजार से रेडीमेड स्मार्ट सिटी खरीद कर कहीं रख देने जैसी ही कवायद है। विश्वास कीजिए हमारे स्मार्ट सिटी भी सड़कछाप, सतही व टपोरी टाइप ही होगें।

    इस लेख पर कुछ बात हुई हमारी अपनी स्मार्टनेस पर। हमारे प्रस्तावित स्मार्ट सिटीज पर बात श्रंखला की अगली कड़ी में। 

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  • दिल्ली जिंदा लाशों का मरता हुआ जहरीला शहर है

    सामाजिक यायावर

    लगभग 11 वर्ष पूर्व सन् 2005 की बात है। मैं दिल्ली के बसंतकुंज इलाके में एक वैज्ञानिक मित्र के यहां अतिथि था। पास के बाजार में गया हुआ था। वहीं एक व्यापारी के यहां अचानक ही चर्चा शुरू हो गई, चर्चा को मोड़कर मैं पानी पर ले आया। मेरे अतिरिक्त चार-पांच लोग थे, सभी अमीर व पढ़े लिखे, करोड़ों का कारोबार करने वाले लोग।
     
    इन सबका कहना था कि सरकार कुछ नही करती। इनका मानना था कि पानी के समाधान के लिए धरती के अंदर खूब गहरे से पानी निकाल लाने वाली मशीनों का इंतजाम होना चाहिए। यदि ऐसी मशीने नहीं हैं तो ऐसी मशीने खोजी जाएं। वैज्ञानिक व इंजीनियर किसलिए हैं। तो यह थी इन लोगों की पानी के मुद्दे पर समझ।
    जबकि बहुत गांवों के गरीब व अनपढ़ लोग अपने छोटे छोटे प्रयासों से धरती के अंदर पानी की मात्रा बढ़ा रहे थे, पानी पैदा कर रहे थे।
     
    दिल्ली जो दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है। जहां पेड़ पौधे वैसे भी न के बराबर हैं। वहां के लोग हर साल पेड़ों को छटवाते हैं, डालें कटवाते हैं वह भी केवल इस बहाने से कि बिजली का तार गुजरता है।
     
    पेड़ों को काटने के इस संगठित काम को अंजाम देती है दिल्ली महानगरपालिकाएं। दिल्ली महानगरपालिकाएं हर साल पेड़ काटती व छाटती है। दिल्ली में तो ऐसे ऐसे लोग हैं कि यदि नगरपालिका उनके इलाके में पेड़ काटना भूल जाती है तो दबाव डाल कर पेड़ कटवाते हैं।
     
    मरते हुए शहर को आखिर कब तक देश की राजधानी के तौर पर घसीटा जा सकता है। बिना तैयारी के किए जाने वाले आड-इवेन जैसे अदूरदर्शी प्रचार टोटकों से किसी मुर्दा शहर को जीवित नहीं किया जा सकता है। तभी तो मरते हुए जहरीले शहर के लोग आड-इवेन के नियम की काट के तौर पर दो-तीन सप्ताहों में ही 60 हजार नईं कारों को खरीद लेते हैं।
     
    भारत की राजधानी आज नहीं तो कल दिल्ली से हटनी ही है। सवाल यह खड़ा होता है कि जिस दिन दिल्ली राजधानी नहीं रहेगी उस दिन दिल्ली का आदमी करेगा क्या, क्योंकि तब तो प्रापर्टी की कीमतें आसमान की जगह जमीन छू रही होगीं तब भी कोई लेने वाला न होगा। दिल्ली का अधिकतर आदमी तो दिल्ली के राजधानी होने के कारण आसमान छूती कीमतों की प्रापर्टी व राजधानी होने के सुविधाओं को ही खा रहा है।
     
    भारत की आजादी के समय दिल्ली में सैकड़ों वाटर बाडीज थीं। उफनाती यमुना नदी थी और जंगल थे। प्रापर्टी से पैसे बनाने के लालच में वाटरबाडीज व जंगलों को नष्ट करके कंक्रीट की बिल्डिंगें खड़ी कर दी गईं। और तो और जब कुछ नहीं बचा तो यमुना नदी को भी पाटना शुरू करके बिल्डिंगें बनानी शुृुरू कर दीं।
     
    सबसे बड़ा सवाल तो भारत देश के लोगों के लिए है जिनके खून पसीने की कमाई से देश की राजधानी चलती है, कि –
    क्या किसी सभ्य देश की राजधानी इतनी ही सड़ियल व जहरीली होनी चाहिए…….
     
     
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  • वर्तमान भारत में जाति का अंत करना ही असली समाजवाद

    सामाजिक यायावर

    मेरे पिता के एक ब्राह्मण मित्र ने चमार जाति की लड़की से शादी की। पति पत्नी दोनो लड़ते झगड़ते व प्रेम करते हुए संतानों को पालते पोषते एक दूसरे के साथ आर्थिक विपन्नता के बावजूद जीवन जीते आ रहे हैं। मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि उनमें से एक ब्राह्मण व एक चमार है, जबकि मैं लगभग एक वर्ष तक उन्हीं की गाय का दूध उनके घर से लाता रहा। आंटी जी गाय की देखभाल करती थीं और गाय को दुहतीं थीं। दूध का हिसाब किताब भी आंटी जी ही रखती थीं। अंकल जी तो फक्कड़ थे उनको पैसों का हिसाब किताब कभी समझ न आया। बहुत लोग उनको समाजवादी चूतिया कहते रहे, आज भी वही भाव रखते हैं भले ही मुंह से कहें नहीं। वर्षों बाद जब मैं बारहवीं कक्षा में पहुंचा तब अचानक किसी चर्चा के दौरान कुछ लोगों से यह बात मालूम हुई कि उनका विवाह अंतर्जातीय विवाह है।

    मेरे अपने असल जीवन में मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो ब्राह्मण या शूद्र जाति के हैं और उनका पति/पत्नी शूद्र या ब्राह्मण है। एक-आध अपवादों को छोड़कर उनमें से किसी ने बहुत गहरी साजिश या ऊंचे दर्जे की महानता के कारण शादी नहीं किया। जानपहचान हुई, प्रेम हुआ और माता पिता परिवार को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह को धरातल में उतार लाए। माता पिता को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह करना सहज घटना है, अपनी जाति में भी प्रेम विवाह करने पर भी ऐसा झेलना पड़ता है।

    मैं उन ब्राह्मणों को बहुत आदरणीय मानता हूं जिन्होंने अपनी शादी शूद्र के साथ की और उनके परिवार ने शूद्र को अपना दामाद या बहू स्वीकार किया। मैं उन शूद्रों को क्रांतिकारी मानता हूं जिन्होंने ब्राह्मणों से घृणा करने की बजाय उनको प्रेम करना सिखाया और पारिवारिक संबंधों की स्थापना की। ये भले ही छिटपुट घटनाएं हों लेकिन ये ही वे लोग हैं जो जाति का अंत करने जैसे महा-सामाजिक-आंदोलन के पथबंधु हैं।

    जाति का अंत घृणा, तिरस्कार, उपेक्षा, प्रतिक्रिया आदि से नहीं बल्कि प्रेम, सहजता व सौहार्द से ही हो सकता है। हम माने या न माने लेकिन यह कटु यथार्थ है कि जाति का अंत सहज व प्रेमपूर्ण अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों से ही हो सकता है।

    जो लोग यह दावा करते नहीं अघाते कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित दास व्यवस्था न होकर कर्म/व्यवसाय आधारित महान सामाजिक व्यवस्था थी। तो संस्कृति व महानता के ये दावेदार लोग अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों को क्यों नहीं पूरे जोरशोर से प्रोत्साहित व प्रयोजित नहीं करते हैं क्योंकि विज्ञान, उद्योग, लोकतंत्र व बाजार आदि ने तो कर्म/व्यवसाय के मायने व परिभाषाएं ही पूरी तरह से बदल दी हैं।

    समाज का विकास व सामाजिक समाधान समाज के लोगों के आपसी सौहार्द व प्रेम से ही संभव है। किसी सभ्य व विकसित समाज में जो बुरा था/है उसे ईमानदारी व खुले मन से स्वीकारते हुए समझदारी के साथ बुराई को तिलांजलि दे देना ही उचित रहता है।

    जाति व्यवस्था ने जितना नुकसान किया है उसका हिसाब किताब किया जाए तो हजारों वर्षों तक सरकारी व प्राइवेट नौकरियों व हर स्तर के शैक्षणिक संस्थानों में 70% से अधिक आरक्षण भी कम पड़ जाएगा। लेकिन यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आपस में प्रेम व सहज भाव से वैवाहिक संबंध स्थापित करने लगे तो अगली पीढ़ी से ही जाति का अंत दिखना शुरू हो जाएगा।

    हम जाति नहीं मानते हैं जैसे फर्जी बातों व नारों से जाति का अंत कभी नहीं होगा, उल्टे अंदर की टीस व प्रतिक्रिया और बढ़ती जाएगी। समाज किसी भी राजनैतिक दल, धर्म व सरकार आदि से बहुत बहुत अधिक बड़ा होता है। जाति का अंत किसी धर्म, राजनैतिक दल या सरकार के बूते की बात नहीं। जाति का अंत करने का निर्णय समाज को लेना चाहिए और आज नहीं तो कल लेना पड़ेगा ही।

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  • जाति-व्यवस्था और राजनीति

    “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”
    साभार- सामाजिक यायावर की किताब (पृष्ठ संख्या 260-261)
    www.books.groundreportindia.org

    हमें एक बात समझने का प्रयास करना होगा कि भारत में लोकतंत्र ठीक से स्थापित हो पाता, इसके पहले ही लोकतंत्र को भारत के लोगों ने ही उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। शोषक जातियों ने राजतंत्र व कबीलातंत्र खत्म होते ही आजादी के बाद भरपेट मलाई खाने में खुद को व्यस्त किया और भ्रष्टाचार की शुरुआत करके उसे नए आयाम, नयी दिशायें व नयी ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया।  यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो भारत में भ्रष्टाचार की उत्पत्ति नहीं होती।  जाति-व्यवस्था के कारण परंपरा में ही शोषण करना और शोषितों के पुरुषार्थ का हक येनकेन प्रकारेण अपने पास ही रखना, सिखाया गया। यही सामाजिक अनुकूलन 1947 की राजनैतिक आजादी के बाद भ्रष्टाचार का प्रमुख आधारभूत कारक बना। राजनैतिक आजादी के बाद संवैधानिक-आरक्षण मिलने के कारण शोषित जातियाँ हजारों सालों के लगातार भीषण व घिनौने शोषण के बाद पहली बार, खुद को कुछ कुछ मनुष्य जैसा समझने के युगांतर नशे में कई दशक तक जीतीं रहीं। तब तक शोषक जातियों ने राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक व शैक्षणिक सत्ता की खूब मलाई खायी, खूब भ्रष्टाचार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास लगातार कमजोर हुआ।

    समय के साथ जब शोषित जातियाँ खुद को कुछ कुछ मनुष्य समझने के युगांतर नशे से बाहर आयीं। तो उन्होंने राजनैतिक सत्ता में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरू की और संख्याबल के कारण धीरे-धीरे शोषित जातियाँ राजनैतिक सत्ता प्राप्ति का आधार बनती गयीं। जब तक शोषित जातियाँ शोषक जातियों के लिए  राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति में पिछलग्गू रहीं, तब तक शोषक जातियों को असुविधा नहीं हुई।  उनको समाज में, देश में, व्यवस्था तंत्र आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं दिखा, या यूं कहा जाए कि भयंकर रूप से हो रहे भ्रष्टाचार को देखने की आवश्यकता नहीं लगी।

    1947 की राजनैतिक आजादी के बाद, शोषक जातियों ने शोषित जातियों को अपना पारंपरिक दास मानते हुए उनको राजनैतिक सत्ता से दूर रखा।  संवैधानिक आरक्षण के कारण जब शोषित जातियों के लोग सरकारी तंत्र में प्रवेश करने लगे और राजनैतिक सत्ता के महत्व को समझने लगे तब शोषक जातियों ने शोषित जातियों को बरगला कर अपना पिछलग्गू बनाकर राजनैतिक सत्ता की मलाई का भोग किया। किंतु समय के साथ-साथ ज्यों ज्यों राजनैतिक समझ आने के कारण जब शोषित जातियों ने अपनी राजनैतिक ताकत पहचान कर राजनैतिक सत्ताओं में अपनी सीधी व स्पष्ट दावेदारी पेश करनी शुरु की;  त्यों त्यों शोषक जातियों को व्यवस्था तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। शोषक जातियों को देश में सामाजिक परिवर्तन और ईमानदारी की आवश्यकता भीषण रूप से महसूस होने लग गयी और समय के साथ राजनैतिक व सामाजिक क्रांति की भीषण आवश्यकता की बातें होने लगीं। 

    शोषक जातियों को जाति-व्यवस्था नासूर व सडांध लगने लगी और जातिविहीन समाज की आवश्यकता दिखाई पड़ने लगी। सामाजिक परिवर्तन की लंबी लंबी बातों की आवश्यकता पड़ने लगी। जब तक शोषक जातियाँ आजाद भारत में राजनैतिक सत्ता की मलाई खातीं रहीं;  तब तक उन्हें भारतीय व्यवस्था तंत्रों में हजारों वर्षों से गहरे से व्याप्त न तो भ्रष्टाचार दिखा और न ही भारत की 1947 की राजनैतिक आजादी झूठी लगी।  किंतु ज्यों ज्यों शोषित जातियों ने राजनैतिक सत्ताओं में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरु की और मलाई में अपने हिस्से की दावेदारी पेश करनी शुरू की;  शोषक जातियों को भारत की आजादी झूठी लगने लगी और तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ और इन्हीं के ही इर्द-गिर्द घूमने वाले तत्वों आदि की लिखापढ़ी वाली तथाकथित ईमानदारी तक जबरन लोगों के दिलो दिमाग को संकुचित कर दिया गया।  जबकि भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ आदि तत्वों जैसे अति-संकुचित दायरे में रखकर बिलकुल भी नहीं समझा जा सकता।  न ही इन तत्वों की शुद्धता के ढकोसलों से सामाजिक परिवर्तन ही किया जा सकता है और न ही इन ढकोसलों से भ्रष्टाचार ही समाप्त किया जा सकता है।

    भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनाने या लागू करने से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलाने से या धरना करने से भ्रष्टाचार नहीं खतम होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज की विशेषाधिकृत जातियों का लगभग हर आदमी करप्ट है, और इस आदमी को भ्रष्ट बनाया “जाति-व्यवस्था” ने। भारतीय समाज में व्याप्त कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरियों में एक तत्व यह भी है, कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है;  और अधिकतर “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” को स्थापित व महिमामंडित करने पर ही आधारित है। इसीलिए समाज की मानसिकता को मनचाही दिशा में अनुकूलित करने के लिए कोई भी तर्क व परिभाषाएं तामझाम करके स्थापित की जा सकती हैं।  इसी चरित्र ने भ्रष्टाचार को संकुचित करने वाली परिभाषाएं गढ़ने में सरलता प्रदान की। जाति-व्यवस्था ही भारत में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार की मूलभूत जनक है और जाति-व्यवस्था सबसे हिंसक सामाजिक-तानाशाही है – यह समझने व स्वीकारने का भ्रूण भी नहीं उत्पन्न होने दिया और भ्रष्टाचार की प्रायोजित संकुचित परिभाषा में ही जड़ कर रख दिया।

    सामाजिक जड़ता भारतीय समाज का मूलभूत चरित्र है।  बहुत लोगों को एक बहुत बड़ी गलतफहमी रहती है कि भारत में तंत्र सफल है या सफल जैसा कुछ है, तभी आजादी के बाद इतने दशकों के बाद भी तंत्र चल रहा है और समाज की स्वीकार्यता के साथ चल रहा है।

    जो जैसा प्रायोजित हो गया उसका वैसे ही बिना प्रासंगिकता मूल्यांकन के चलते जाना, तंत्र के प्रति समाज की स्वीकार्यता न होकर वास्तव में सामाजिक जड़ता होती है। यह सामाजिक जड़ता वाला चरित्र हजारों सालों की वीभत्स व विद्रूप जाति-व्यवस्था का उत्पाद है, जिसमें जन्म-आधारित तिरस्कारों, शोषणों व दासता को दैवीय दंड-विधान मानकर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है। या जन्म-आधारित व्यवस्था के आधार पर स्वयं का दूसरों से श्रेष्ठ, पूजनीय व गौरवशाली होना दैवीय पुरस्कार मान कर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है।

    जाति-व्यवस्था से मुक्त होते ही भारतीय समाज के शोषक व शोषित दोनों ही प्रकार के वर्गों की जातियों में चारित्रिक व गुणात्मक परिवर्तन हो जायेगा। भारत, भारत के लोग व भारतीय समाज सभी वास्तव में स्वतंत्र होगें और खुली हवा में सांस ले पायेंगें। जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना भारत में कभी भी चारित्रिक बदलाव नहीं किया जा सकता है। यदि कोई जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना, भारत में सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक समाधान व विकास की बात करता है तो वह या तो नासमझ है या सामाजिक धोखा देता है, क्योंकि यह बिलकुल ही असंभव है।

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  • रोहित वेमुला को मेरी श्रद्धांजलि – आखिर कितनी मौतों के बाद हम सामाजिक संवेदनशील व ईमानदार होगें

    सामाजिक यायावर

    तब तक हम जाति के घिनौनेपन से नहीं लड़ सकते हैं और परंपरा में अगली पीढ़ियों के बच्चों की हत्याओं या आत्महत्याओं द्वारा समाज की विभूतियों को खोते रहेंगें। शाब्दिक, तात्कालिक व क्षणिक भावुकता से कुछ देर के लिए अपने बच्चों की हत्याओं व आत्महत्याओं पर आंसू बहा देने भर से कोई समाधान नहीं होने वाला। वास्तव में जाति-व्यवस्था ही हमारे समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है।

    जब तक हम यह बिना किसी लाग लपेट के यह नहीं मानेंगें कि भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी और है। क्योंकि परंपरागत ऐसी घिनौनी गुलामी जिसमें गुलाम स्वतः ही अपनी पैदाइश से ही अपने ही माता-पिता, अभिभावकों व रिश्तेदारों द्वारा मानसिक रूप से स्वयं को गुलाम मानने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। कभी भी किसी भी परिस्थिति में कर्म आधारित व्यवस्था हो ही नहीं सकती है। कोई भी बेहतर सामाजिक व्यवस्था बिना स्वयं उस व्यवस्था में ही निहित घिनौने बीजों के जाति व्यवस्था जैसी जन्म घिनौनी व धूर्त सामाजिक व्यवस्था की परिणति तक पहुंच ही नहीं सकती।

    भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए, हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है।

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