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  • सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता —— भारत को किसी भी परिस्थिति में आदिवासी/दलित/शूद्र नेतृत्व व दिशा की जरूरत है

    हमें विभिन्न आर्थिक, राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा प्रायोजित नेतृत्वों को परिवर्तनकारी नेतृत्व के रूप में स्वीकारने की आत्मश्लाघा व प्रवंचना से बाहर आने की जरूरत है भले ही प्रायोजित नेतृत्व तात्कालिक तौर पर यह कितना भी अधिक लाभप्रद व परिवर्तनकारी दिख रहा हो।

    मूल बात कहने के पहले एक सच्चा घटनाक्रम सुनाना चाहता हूं। तब फेसबुक जैसी सोशल साइटें जीवन का अभिन्न अंग नहीं हुआ करतीं थीं। ईमानदारी की चोचलेबाजी या विकास के मसीहागिरी की चोचलेबाजी या लच्छेदार स्वादिष्ट भाषणों या कुछ समय की न्यायिक हिरासतें या पुलिस की दो चार लाठियाँ आदि किस्म की आम आदमी द्वारा झेली जाने वाली सामान्य व रोजमर्रा वाली घटनाएं रातोंरात राष्ट्रीय नेता व देश के परिवर्तन का कर्णधार नहीं बनाया करतीं थीं। उसी समय की बात है।

    भारत देश में एक राज्य है उसका नाम है केरल। उसी केरल राज्य की एक गांव की ग्राम सभा ने दुनिया में पेयपदार्थों की सबसे बड़ी कंपनियों में से एक की नाक में नकेल कसने व अपने गांव का भूलज व कृषि अर्थव्यवस्था बचाने के लिए उस कंपनी द्वारा उस गांव में स्थापित व संचालित बाटलिंग प्लांट बंद कराने का प्रस्ताव पारित किया।

    उस कंपनी ने ग्राम सभा के इस प्रस्ताव को केरल राज्य के हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट की एक बेंच ने अपने बयान में कहा कि ग्रामसभा को ऐसे प्रस्ताव पारित करने का अधिकार है, पानी सामाजिक संपत्ति है।

    फिर क्या था, भारत में आंदोलनों के लिए बने विभिन्न संगठनों के राष्ट्रीय स्तर के लोग, मैगसेसे पुरस्कृत कुछ लोग, फंडेड NGO वाले लोग आदि ने हाईकोर्ट की बेंच की उस बयान की कापियां निकलवाईं, उनके दस्तावेज बनाए, बुकलेट बनवाईं और देश भर में घूम घूम कर खूब बांटा। खूब प्रेस कांफ्रेस कीं। लग रहा था जैसे कि भारत में अब सामाजिक स्वामित्व सुदृढ़ हो जाएगा।

    इन लोगों ने हजारों प्रेस कांफ्रेस की होगीं, जहां जाते वहीं प्रेस कांफ्रेस करते और हाईकोर्ट की भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात करते, चिल्ला चिल्ला कर हाईकोर्ट के शान में कसीदे पढ़ते।

    इन सभी क्रियाकलापों से एक घटना हुई कि लोगों के दिलोदिमाग में बैठ गया कि कोर्ट हमेशा सही व समाज के लिए कल्याणकारी निर्णय देता है। कोर्ट पानी को सामाजिक संपत्ति मानता है। कोर्ट ग्रामसभा व ग्रामीण लोगों के प्रस्तावों का आदर देता है, महत्व देता है। दिलोदिमाग में यह सब बैठाया सामाजिक आंदोलनों के विभिन्न संगठनों के लोगों ने, मैगसेसे पुरस्कार पाने वालों आदि ने वह भी जागरूकता व चेतनशीलता आदि के नाम पर।

    अब देखते हैं आगे की घटना-

    लगभग एक या दो साल या कम ज्यादा समय के बाद केरल की उसी हाईकोर्ट ने अपनी बात पलट दिया।

    सामाजिक आंदोलनों के संगठनों के लोग, NGO  वाले लोग, मैगसेसे पुरस्कृत लोग आदि तो देश भर में यह बता चुके थे कि पानी सामाजिक संपत्ति है और ऐसा हाईकोर्ट कहता है। देश भर में घूम घूम कर लाखों करोड़ों लोगों के दिलोदिमाग में बहुत कुछ बैठा चुके थे। उसी कोर्ट ने अपनी बात बिलकुल पलट दिया।

    अब ये लोग जो लोगों के सामने ढेरों बातें दावे से ठोंकते हुए कर चुके थे। फिर से कैसे जाते उतने व उन्हीं लोगों के बीच यह कहने कि कोर्ट का निर्णय उचित नहीं, समाज के लिए कल्याणकारी नहीं। मान लीजिए यदि उन्हीं व उतने ही लोगों के पास किसी तरह जाना संभव भी होता तो भी लोग इनकी विरोधाभासी बातों पर विश्वास क्यों करते?

    केरल के गांव की घटना जो भारत में भूजल के सामाजिक स्वामित्व के मसले पर बहुत बड़ा परिवर्तनकारी आंदोलन का आधार बन सकती थो। उसकी बिना सोचे बिचारे तात्कालिक लाभ के लिए की जाने वाले क्रियाकलापों के कारण भ्रूण हत्या हो गई।

    लोगों के NGO को मिलने वाली ग्राँटों की राशि बढ़ गई, लोगों के नाम व पहचान बढ़ गई, लोग देश विदेश घूम लिए, लोगों सेलिब्रिटी बन गए, बहुत सारे पुरस्कारों का आदान प्रदान हो गया, लोगों को क्रांतिकारी होने का तमगा मिल गया।

    लेकिन आम समाज वहीं का वहीं रहा या यूं कहें कि भूजल पर सामाजिक स्वामित्व वाला मसला पीछे चला गया। अब कोई न तो केरल के गांव की बात करता है न ही भूजल पर सामाजिक स्वामित्व की बात होती है।

    भारत में फेसबुक जैसी साइटों के आने से एक बात हुई है कि हम रातोंरात किसी को भी छुटपुट, टटपुंजिया, तात्कालिक व प्रायोजित घटनाओं के कारण सामाजिक बदलाव व परिवर्तन का मसीहा मान लेते हैं। सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन का नेतृत्व मान कर अपना समर्पण दे देते हैं, हममें से बहुत लोग अंध भक्त भी बन जाते हैं जो कुछ भी सुनने समझने तक को तैयार नहीं होते।

    पता नहीं क्यों हम किसी तात्कालिक व अस्थाई लाभ के लिए परिवर्तनकारी नेतृत्वों के प्रायोजन में जुट पड़ते हैं, स्वयं को अंध समर्पित भी कर देते हैं। फिर कहते हैं कि दगा हो गया, समझ नहीं पाए।

    दरअसल सामाजिक प्रतिबद्धता व जीवन मूल्यों को लेकर जितने सतही व खोखले हम होते हैं। हमारी कल्पना का परिवर्तन भी उतना ही सतही व खोखला होता है। यही कारण होता है कि हम सतही व खोखले आधारों पर परिवर्तन के लिए प्रायोजित नेतृत्वों के लिए अपने आपको समर्पित कर देते हैं।

    जिनको हम प्रायोजित करते हैं उनकी तो मौज हो जाती है, लेकिन हम व हमारा देश वहीं का वहीं खड़ा रहता है या पीछे चला जाता है। यह बिलकुल वैसे ही है जैसे जब चिड़ियाँ खेत चुग जाती हैं तब हम चिल्लाते हैं कि खेत नहीं बचा पाए। लेकिन हम फिर वही गलती करते हैं, नई चिड़ियों पर विश्वास करते हैं, जो हमारे खेत फिर से चुगती हैं। हम फिर से ठगा महसूस करते हैं। कसमें खाते हैं मूर्ख न बनने की। लेकिन फिर हम नए प्रयोजनों में फंस कर नए बहाने व तर्कों को गढ़ने लगते हैं और फिर से ठगे जाते हैं। 

    भारत में पिछले कुछ वर्षों में मीडिया व सोशल साइट्स के द्वारा बहुत ही कम समय में कई परिवर्तनकारी नेतृत्वों को विभिन्न घटनाओं को आधार बना कर तेज गति से प्रायोजित किया गया है। उनको बिना सवाल सत्ताएं भी सौपी गईं लेकिन उनका वास्तविक चरित्र क्या रहा यह बाद में मालूम पड़ा और लोगों ने ठगा महसूस किया।

    कितनी बार हम मूर्ख बनेंगे कब तक ऐसा करते रहेंगे। हमें शार्ट कट बंद करने होगें। हमें बिना खुद को बदले हुए परिवर्तन देखने की लिप्सा से ऊपर उठना होगा।

    पहले हमको समझदार बनना होगा, प्रवंचना कभी भी अपने लिए समझदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती। बेईमानी कभी भी अपने लिए ईमानदार नेतृत्व की खोज या निर्माण नहीं कर सकती।

    सामाजिक परिवर्तन व नेतृत्व के मुद्दे पर शार्टकट हमेशा ही नुकसान दायी होता है जो हम प्रायोजित कर चुके होते हैं उससे लौटना या उसको लौटाना संभव नहीं होता।

    हमें ठोस होने की जरूरत है और हमें परिवर्तन के लिए दीर्घकालिक रास्तों को चुनने की जरूरत है। वास्तविक सामाजिक व राजनैतिक परिवर्तन कभी भी शार्टकट व टटपुंजिए तौर तरीकों से संभव नहीं।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
  • JNU जैसे संस्थानों की विशिष्टता विशेष अनुदानों, अनुग्रहों व संसदीय कानूनों की शक्तियों की देन है न कि अर्जित की हुई

    IIM, Calicut

    IIM, Calicut

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

    जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी (JNU) की स्थापना करना अच्छा निर्णय था। तत्कालीन प्रधानमंत्री व भारत सरकार की दूरगामी सोच का परिणाम था। JNU की स्थापना करने की मंशा में कोई दुर्भाव नहीं था, वरन् भारत देश की बेहतरी निहित थी। JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। JNU की स्थापना में JNU की स्थापना के क्षण से मिलने वाले विशेष अनुदानों व अनुग्रहों का बहुत बड़ा योगदान है। JNU की विशिष्टता सरकार से मिले इन्हीं विशिष्ट अनुदानों व अनुग्रहों के आधारभूत स्तंभों पर खड़ी है।

     

    JNU, New Delhi

    JNU, New Delhi

     

    • भारतीय संसद में JNU की स्थापना व विशिष्ट दर्जा देने के लिए कानून बना जो JNU को शक्ति देता है। JNU को संसदीय कानून का यह विशिष्ट स्तर स्थापना के समय से प्राप्त है। JNU ने यह स्तर अर्जित नहीं किया। सरकारी अनुग्रह था।
    • दिल्ली जैसी सघन जनसंख्या वाली राजधानी में एक यूनिवर्सिटी के लिए लगभग 1000 एकड़ जैसी बड़ी जमीन का अधिग्रहण किया गया।
    • छात्रों के रहने के लिए पर्याप्त से अधिक संख्या में सुविधा संपन्न छात्रावासों का निर्माण किया गया।
    • पढ़ाई, छात्रावास व भोजनालय की फीसें इतनी कम रखी गईं कि एक तरह से मुफ्त जैसा ही माना जा सकता है।
    • ग्रामीण व पिछड़े क्षेत्रों के छात्रों के लिए प्रवेश परीक्षा में विशेष अंक देने का प्रावधान रखा गया ताकि गांवों के छात्र JNU में पहुंच सकें।
    • छात्रों का विकास हो, उनकी सोच दूरगामी हो, वे चिंतनशील बनें इसलिए समृद्ध व सुविधा संपन्न पुस्तकालयों व वाचनालयों की स्थापना की गई।
    • छात्रों की राजनैतिक चेतनशीलता का विकास हो इसलिए JNU के छात्रसंघ की स्थापना भी विशिष्ट रूप से की गई।
    • भारत में उपलब्ध योग्य लोगों का चयन शिक्षकों के रूप में किया गया।
    • शिक्षकों को बेहतर वेतन व सुविधाएं दी गईं।
    • आदि।

    भारत देश को JNU ने नहीं बनाया। भारत की आजादी में JNU का कोई योगदान नहीं। भारत के विकास में JNU का विशिष्ट योगदान नहीं। सामाजिक संसाधनों व संसदीय कानून रूपी विशिष्ट अनुग्रहों के आधारों पर JNU वजूद बना व खड़ा है। JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई नही है।

    फेसबुक में JNU के ऊपर लिखी गई मेरी पोस्टों पर JNU के लोगों की अधिकतर टिप्पणियां बेबुनियाद तर्कों पर रही हैं। JNU के शिक्षकों, छात्रों व भूतपूर्व छात्रों का यह कहना कि भारत में JNU सबसे अधिक लोकतांत्रिक है, पूरी तरह बेबुनियाद व फिजूल बात है।

    जब JNU ने अपनी विशिष्टता अर्जित ही नहीं की है तो JNU के लोगों के अंदर लोकतांत्रिक समझ विकसित होने की बात कैसे हो सकती है। JNU को स्थापित करने वाले लोगों की सोच व दूरदृष्टि लोकतांत्रिक थी, जिसके कारण JNU का ढांचा ऐसा बना कि यह लोकतांत्रिक संस्थान हो जाता है।

    बने हुए ढांचे में जीने का मतलब उस ढांचे की समझ होने की अनिवार्यता नहीं है। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत में “सामाजिक समता” व “जाति-व्यवस्था के अंत” आदि सबसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर अपना सक्रिय योगदान करता होता। JNU के लोगों में यदि लोकतांत्रिक समझ होती तो JNU भारत के गावों व किसानों के आर्थिक विकास की व्यवहारिक व धरातलीय योजनाएं बनाता होता। और भी बहुत करता होता।

    भारत में पिछले कुछ वर्षों से एक अजीब व बेहद घटिया फैशन चल गया है जो शायद भारत के मीडिया के कारण उत्पन्न हुआ है। भारत में कुकरमुत्तों की तरह टीवी चैनल्स बने हैं जिनका काम सिर्फ बरसाती मेढ़कों की तरह शोर मचाते हुए टर्राना है। इस मीडिया का अधिकतर अर्थात लगभग 98% हिस्सा भारत के मेट्रों शहरों तक ही सीमित है, इस 98% प्रतिशत में भी बहुत बड़ा हिस्सा राजधानियों तक ही सीमित है। नेशनल मीडिया का तो मतलब ही दिल्ली राजधानी है।

    इसी मूर्खता भरे फैशन के कारण ही JNU को भारत की सभी विश्वविद्यालयों का प्रतिनिधि मान लिया गया है। मानो JNU ही पूरे भारत का विश्वविद्यालय है। मानो JNU ही भारत की विचारशीलता, चिंतनशीलता, सामाजिक सोच, सामाजिक प्रतिबद्धता, सामाजिक कर्मठता व राजनैतिक परिवर्तनों का केंद्र है।

    जैसे दिल्ली भारत नहीं है, भारत जैसे बड़े देश का केवल एक शहर है। बिलकुल वैसे ही JNU का मतलब भारत के सारे विश्वविद्यालय नहीं है। JNU भारत के अनेकों विश्वविद्यालयों में से एक विश्वविद्यालय है। चूंकि JNU दिल्ली में है जहां सारा मीडिया है और JNU की स्थापना विशिष्ट सरकारी व संसदीय अनुदानों व अनुग्रहों के द्वारा हुई है, इसलिए JNU में छींक आने का भी हंगामा होता है। वास्तव में हमारे, हमारे तंत्र व मीडिया का यह चरित्र देश के अन्य विश्वविद्यालयों व उनके छात्रों को कुंठित करता है, उनकी योग्यता, कार्यक्षमता व प्रतिभा को खंडित करता है।

    भारत के किसी भी विश्वविद्यालय को उसकी स्थापना के पहले क्षण से ऐसी विशिष्ट संसदीय व सरकारी अनुग्रह व अनुकंपाएं मिल जाएं तो उसका स्तर JNU के स्तर से कतई कम नहीं होगा भले ही उसको किसी बीहड़ में स्थापित किया जाए। इसकी संभावनाएं भी बहुत हैं कि ऐसे विश्वविद्यालयों का स्तर JNU के स्तर से बेहतर ही हो।

    JNU के लोगों को यह मूल्यांकन करना चाहिए कि जितना उनको भारत ने दिया है उसके एवज में वे भारत को क्या दे रहे हैं। यदि इसका मूल्यांकन हो तो यदि JNU के लोग ईमानदार होगें तो उनको शर्म आएगी। बिना अर्जित की हुई विशिष्टता पर अहंकार करना, दूसरों को अपने से हीन समझने की मानसिकता आदि JNU कितना लोकतांत्रिक है, कितना सामाजिक सोच का है, कितना स्वतंत्र चिंतक है, खुद ब खुद प्रमाणित कर देते हैं। धिक्कार पैदा होती है JNU के शिक्षकों व छात्रों के अहंकार व बड़बोलेपन को देखकर। भारत के लोगों ने JNU बनाया है, इसलिए भारत के लोग JNU से अधिक लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतन के हुए। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तब यह माना जा सकता था कि JNU को संस्थान के रूप में लोकतांत्रिक समझ है।

    देश में देश को बनाने व दिशा देने के लिए JNU से बड़े व गंभीर मुद्दे हैं। लेकिन चूंकि मीडिया कभी उन पर ध्यान नहीं देता। लोगों के वेस्टेड इंटरेस्ट व महात्वाकांक्षाओं के लिए उनकी कोई वैल्यू नहीं होती इसलिए वे मुद्दे हमेशा किनारे ही पडे रहते हैं। इसके बावजूद यह दावा किया जाता है कि देश के लिए सोचा व किया जाता है।

    देश के बहुत लोगों की दृष्टि में JNU पूरा भारत होगा, लेकिन मेरी दृष्टि में JNU सिर्फ और सिर्फ एक यूनिवर्सिटी है जिसकी स्थापना देश के विचारशील व दूरदृष्टिवान लोगों ने इस विश्वास से की थी कि इसके लोग सामाजिक विकास के लिए चिंतन करेंगें, निर्माण करेंगें, सामाजिक चेतनशीलता पैदा करेंगें न कि केवल नौकरी, पैसा, ग्लैमर, अय्याशी व कैरियर के पीछे ही भागेंगें। यदि JNU का उद्देश्य यही सब होना था तो संसद में JNU के लिए अलग से कानून बनाकर विशिष्टता देने की जरूरत ही क्या थी।

    भारत में सैकड़ों यूनिवर्सिटीज हैं जहां के छात्र अपना हर दिन दर्द में गुजारते हैं। मैं अपने जीवन में कई ऐसे छात्र नेताओं से मिला हूं जिनको पुलिस की पिटाई ने जीवन भर के लिए अपंग कर दिया और ये छात्र नेता JNU के छात्रसंघ अध्यक्ष की तुलना में बहुत ही बेहतर व दर्दीला भाषण देने की क्षमता व योग्यता रखते थे। भारत की इन सैकड़ों अनजानी यूनिवर्सिटीज के सैकड़ों हजारों छात्र नेता अपने जीवन में ढेरों फर्जी मुकदमें झेलते हैं।

    इन छात्रनेताओं व छात्रों का क्या? लेकिन कभी कहीं से कोई आवाज नहीं उठती इन छात्र नेताओं के लिए। क्यों नहीं उठी। केवल इसलिए नहीं उठी क्योंकि वे ऐसे विश्वविद्यालयों से नहीं थे जिनको हर वर्ष अरबों रुपए की सरकारी अनुदान मिलता हो और जिनको संसद में विशेष कानून द्वारा संरक्षण व विशिष्टता प्राप्त हो। क्या दोष है इन विश्वविद्यालयों का और इनमें पढ़ने वाले छात्रों का?

    हमारी संवेदनशीलता, जागरूकता इन विश्वविद्यालयों के छात्रों के साथ क्यों नहीं जुड़ती है? क्या ये लोग भारत देश के नहीं है? क्या ये विश्वविद्यालय भारत देश के अंदर नहीं है। यदि JNU की विशिष्टता अर्जित की हुई होती तो बात समझ आ सकती थी कि JNU ने विशिष्टता अर्जित की है।

     

    IIM, Kozhikode

    IIM, Kozhikode

    जैसे JNU की विशिष्टता प्रायोजित है, अनुदान, अनुकंपा व अनुग्रहों के स्तंभों पर स्थापित है। तो ऐसा भारत के हर विश्वविद्यालय के साथ क्यों नहीं? एक ही देश के अंदर इतना भेदभाव क्यों? buy provigil south africa yanginstitute.com modafinil kup online इसीलिए मैं चाहता हूं कि या तो भारत के हर जिले में कम से कम एक JNU, IIT, IIMAIIMS आदि हो जिनको वैसी ही विशिष्ट अनुदान, अनुग्रह व संसदीय कानून की शक्ति आदि मिले जो JNU, IIT, IIM व AIIMS जैसे संस्थानों को इनकी स्थापना के क्षण से प्राप्त है। 

    JNU ने विशिष्टता अर्जित नहीं किया है, विशिष्टता प्रायोजित है, मिथक है। इसलिए देश के हर जिले में JNU(s) की स्थापना किया जाना कोई बड़ी बात नहीं। देश के लाखों करोड़ों युवाओं को हक है JNU जैसी विशिष्टता को भोगने का, उनको भी हक है खुद को लोकतांत्रिक, सामाजिक व स्वतंत्र चिंतक मानने व कहलवाने का।

     

    देश का लाखों करोड़ों युवा पैदा होते ही केवल नौकरी पैसा व ग्लैमर पाने के लिए अंतहीन चूहादौड़ में झोंक दिए जाते हैं। कोचिंग सेंटर्स लूटते हैं, बच्चे आत्महत्याएं करते हैं, कुंठित होते हैं, हीन भावना से ग्रस्त होते हैं। प्रतिक्रिया वादी बनते हैं। इन्हीं प्रायोजित विशिष्टता वाले संस्थानों में पहुंचना ही बचपन से अपना मकसद चुन लेते हैं। कितना ओछा व छोटा मकसद होता है जीवन का। जो पहुंच गए वे आजीवन स्वयं को दूसरों की तुलना में विशिष्ट मानने के अहंकार में जीते हैं। जबकि यदि सूक्ष्मता से देखा जाए तो इन संस्थानों में प्रवेश पाने में रटने की योग्यता के अतिरिक्त कौन सी वास्तविक योग्यता होती है। किंतु चूंकि ऐसे संस्थानों की संख्या भारत की जनसंख्या के अनुपात में नगण्य है तथा अन्य संस्थानों को सरकारी विशिष्ट अनुग्रह मिलते नहीं हैं इसलिए एक मिथक स्थापित हो गया है कि जो भी इन संस्थानों में प्रवेश पाता है वह बहुत योग्य है, विशिष्ट है। 

     

    भारत के सुनहरे भविष्य के लिए शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता की स्थापना करने की प्रवृत्ति अब खतम कर देना चाहिए। भारत की संसद से हर उस कानून को खतम कर देना चाहिए जो किसी शैक्षणिक संस्थान को देश के अन्य संस्थानों की तुलना में विशिष्टता देता हो। क्योंकि भारत के किसी संस्थान ने विशिष्टता अर्जित नहीं की है। भारत की संसद ने ऐसे संस्थानों की स्थापना के पहले क्षण से ही उनको संवैधानिक रूप से विशिष्ट संस्थान होने की शक्ति दी है। 

     

    शैक्षणिक संस्थानों की विशिष्टता अर्जित की हुई होनी चाहिए न कि किसी राजकीय व संवैधानिक शक्ति व अनुग्रह के प्रायोजन से प्राप्त हुई होनी चाहिए। शैक्षणिक संस्थानों की प्रायोजित विशिष्टता देश व समाज के लिए दूरगामी रूप से बहुत ही अधिक हानिकारिक होती है और वास्तविक प्रतिभाओं को कुंठित करती है, प्रतिक्रियावादी बनाती है, असंवेदनशील बनाती है, हीन भावना से ग्रस्त करती है।

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    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग
    “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

  • क्या मैं अंदर आ सकती हूं, भगवन् :: आराधनास्थलों में प्रवेश के लिए महिलाओं का संघर्ष

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    शनि मंदिर शिंगणापुर, महाराष्ट्र
    शनि मंदिर
    शिंगणापुर, महाराष्ट्र

    यह अजीब संयोग है कि इन दिनों मुसलमान और हिन्दू समुदायों की महिलाओं को एक ही मुद्दे पर संघर्ष करना पड़ रहा है- आराधनास्थलों में प्रवेश के मुद्दे पर। जहां ‘भूमाता बिग्रेड‘ की महिलाएं, शनि शिगनापुर (अहमदनगर, महाराष्ट्र) मंदिर में प्रवेश का अधिकार पाने के लिए संर्घषरत हैं वहीं मुंबई में हाजी अली की दरगाह तक फिर से पहुंच पाने के लिए महिलाएं कानूनी लड़ाई लड़ रही हैं। सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का मसला तो गरमाया हुआ है ही। अनुकरणनीय साहस प्रदर्शित करते हुए हाल में बड़ी संख्या में महिलाएं कई बसों में शनि शिगनापुर मंदिर पहुंची परंतु उन्हें मंदिर में प्रवेश नहीं करने दिया गया। पुलिस ने उन्हें रोकने के लिए बल प्रयोग किया।

    Haji Ali Dargah Mumbai, Maharashtra
    Haji Ali Dargah
    Mumbai, Maharashtra

    शनि शिगनापुर में पुरूषों को तो चबूतरे पर चढ़ने का अधिकार है परंतु महिलाओं के लिए इसकी मनाही है क्योंकि ऐसा कहा जाता है कि चबूतरे पर चढ़ने वाली महिलाओं को शनि महाराज की बुरी नजर लग जाएगी। इस तरह यह दावा किया जाता है कि महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध के पीछे आध्यात्मिक कारण हैं। दक्षिणपंथी दैनिक ‘सनातन प्रभात‘ ने लिखा कि हिन्दू परंपराओं की रक्षा के लिए महिलाओं के आंदोलन को रोका जाना चाहिए। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ ने मंदिर के गर्भगृह में महिलाओं के प्रवेश पर प्रतिबंध को उचित ठहराया। भूमाता ब्रिग्रेड की तृप्ति देसाई के नेतृत्व में चल रहे आंदोलन पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए आध्यात्मिक गुरू श्री श्री रविशंकर ने महिलाओं के संगठनों और मंदिर के ट्रस्टियों के बीच मध्यस्थता करने की पहल की। आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ की यह राय है कि वर्तमान में लागू किसी भी नियम को बदलने के पूर्व, संबंधित धर्मस्थलों की परंपरा और प्रतिष्ठा का संरक्षण सुनिश्चित किया जाना चाहिए।

    सबरीमला के बारे में तर्क यह है कि मंदिर के अधिष्ठाता देव ब्रम्हचारी हैं और प्रजनन योग्य आयु समूह की महिलाओं से उनका ध्यान बंटेगा। हम सबको याद है कि कुछ वर्षों पहले एक महिला आईएएस अधिकारी, जो अपनी आधिकारिक हैसियत से मंदिर की वार्षिक तीर्थयात्रा के लिए इंतजामात का निरीक्षण करने पहुंची थी, को भी मंदिर में नहीं घुसने दिया गया था। मुंबई की हाजी अली दरगाह के मामले में भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन नामक संगठन ने हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर कर यह मांग की है कि वहां महिलाओं के प्रवेश के अधिकार को बहाल किया जाए। दरगाह में महिलाओं का प्रवेश सन् 2012 में प्रतिबंधित कर दिया गया था। महिला समूहों ने संविधान के विभिन्न प्रावधानों को उद्धत किया है जो लिंग के आधार पर किसी भी प्रकार के भेदभाव का निषेध करते हैं। दरगाह के ट्रस्टियों का यह कहना है कि यह प्रतिबंध महिलाओं की सुरक्षा की दृष्टि से लगाया गया है। यह तर्क निहायत बेहूदा है। उसी तरह, सबरीमला के बारे में पहले यह तर्क दिया जाता था कि मंदिर तक पहुंचने का रास्ता दुर्गम है और महिलाओं के लिए उसे तय करना मुश्किल होगा। बाद में देवस्वम् बोर्ड त्रावणकोर ने यह स्पष्टीकरण दिया कि महिलाओं का प्रवेश इसलिए प्रतिबंधित है क्योंकि भगवान अय्यपा ब्रम्हचारी हैं। मंदिर के संचालकों का कहना था कि प्रजनन योग्य आयु की महिलाओं की उपस्थिति से ब्रम्हचारी भगवान का मन भटकेगा।

    brunei-masjidमस्जिदों में प्रवेश के मामले में महिलाओं की स्थिति अलग-अलग देशों में अलग-अलग है। इस संदर्भ में दक्षिण एशिया के देश सबसे खराब और तुर्की आदि सबसे बेहतर हैं। हिन्दू मंदिरों में भी एक से नियम नहीं हैं। आराधनास्थलों में महिलाओं के प्रवेश को प्रतिबंधित या सीमित करने के लिए कई बहाने किए जाते हैं। कई देशों में कानूनी तौर पर महिलाओं और पुरूषों को समान दर्जा प्राप्त है परंतु परंपरा के नाम पर इन आराधनास्थलों के संचालकगण महिलाओं को पूर्ण पहुंच देने से बचते आए हैं। आराधनास्थलों में पितृसत्तात्मकता का बोलबाला है।

    चर्चों के मामले में स्थिति कुछ अलग है। वहां महिलाओं के प्रवेश पर किसी प्रकार का कोई प्रतिबंध नहीं है परंतु महिलाओं को पादरियों के पदक्रम में उच्च स्थान नहीं दिया जाता। उसी तरह, हिन्दू मंदिरों और मुस्लिम मस्जिदों में महिलाएं पंडित व मौलवी नहीं होतीं। अगर एकाध जगह ऐसा है भी तो वह अपवादस्वरूप ही है।

    constitution-of-indiaहमारा संविधान महिलाओं और पुरूषों की समानता की गारंटी देता है। परंतु हमारे कानून शायद आराधनास्थलों पर लागू नहीं होते, जिनके कर्ताधर्ता अक्सर दकियानूसी होते हैं। सामान्यतः, भारत में आराधनास्थलों के संचालकमंडलों में महिलाओं को कोई जगह नहीं मिलती। हिन्दुओं के मामले में जाति एक अन्य कारक है। इसमें कोई संदेह नहीं कि व्यावहारिक तौर पर मुसलमानों और ईसाईयों में भी जातियां हैं परंतु इन धर्मों के आराधनास्थलों के दरवाजे सभी के लिए खुले हैं। इसके विपरीत, बाबा साहेब आम्बेडकर को दलितों को मंदिरों में प्रवेश दिलवाने के लिए कालाराम मंदिर आंदोलन चलाना पड़ा था और अंततः वे इतने निराश हो गए कि उन्होंने हिन्दू धर्म ही त्याग दिया। उनका कहना था कि हिन्दू धर्म, ब्राम्हणवादी धर्मशास्त्र पर आधारित है व मूलतः पदानुक्रमित है। सच तो यह है कि अधिकांश धर्मों के सांगठनिक ढांचे में पदानुक्रम आम है।

    Trupti Desai Bhumata Brigade
    Trupti Desai
    Bhumata Brigade

    अगर हम संपूर्ण दक्षिण एशिया की बात करें तो मस्जिदों, दरगाहों और मंदिरों में महिलाओं के मामले में कई कठोर नियम हैं। इन्हें परंपरा के नाम पर थोपा जाता है। यद्यपि विभिन्न धर्मों में इस मामले में कुछ अंतर हैं परंतु जहां तक महिलाओं के साथ व्यवहार का प्रश्न है, सभी धर्म उनके साथ भेदभाव करते हैं। इस भेदभाव की गहनता इस बात पर निर्भर करती है कि संबंधित राष्ट्र या क्षेत्र कितना धर्मनिरपेक्ष है। यहां धर्मनिरपेक्षता से अर्थ है जमींदारों और पुरोहित वर्ग के चंगुल से मुक्ति। यद्यपि यह सभी के बारे में सही नहीं है परंतु समाज का एक बड़ा वर्ग महिलाओं को पुरूषों से कमतर और पुरूषों की संपत्ति मानता है। इस दृष्टि से महिलाओं द्वारा आराधनास्थलों में प्रवेश का अधिकार हासिल करने के लिए चलाए जा रहे आंदोलन स्वागत योग्य हैं।

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    Bhumata Brigade
    Bhumata Brigade

    लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यात्रा को हमेशा दकियानूसी तत्वों के कड़े विरोध का सामना करना पड़ा है। दकियानूसी तत्व, जाति और लिंग के सामंती पदक्रम को बनाए रखना चाहते हैं। चाहे वह बीसवीं सदी की शुरूआत का अमरीका का ईसाई कट्टरवाद हो या अफगानिस्तान, ईरान या पाकिस्तान का इस्लामिक कट्टरवाद या भारत में हिन्दू साम्प्रदायिकता के बढ़ते कदम – ये सभी महिलाओं को पराधीन रखना चाहते हैं। हमें आशा है कि इन समस्याओं और रोड़ों के बावजूद, लैंगिक समानता की ओर महिलाओं की यह यात्रा तब तक जारी रहेगी जब तक कि उन्हें पुरूषों के समकक्ष दर्जा और अधिकार हासिल न हो जाएं।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)
    Dr Ram Puniyani Rtd Prof, IIT Bombay
    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay
  • सतयुग की अवधारणा मिथक है जो कर्म की अवहेलना भी करती है – मित्र के साथ संवाद

    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग "सामाजिक यायावर" * लेखक - "मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (http://www.books.groundreportindia.org) * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार * संपादक - ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)
    विवेक उमराव ग्लेंडेनिंग “सामाजिक यायावर”
    * लेखक – “मानसिक, सामाजिक आर्थिक स्वराज्य की ओर (www.books.groundreportindia.org)
    * मान्यता प्राप्त अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार
    * संपादक – ग्राउंड रिपोर्ट इंडिया (www.groundreportindia.org)

    मित्र : सतयुग क्या है?

    सामाजिक यायावर : सतयुग एक ऐसा युग है जब सब कुछ सत्य पर आधारित है, सब कुछ ठीक होता है। मानव अपनी पूर्णता व मूल्यों की उच्चतर अवस्था को जीता है। सब कुछ सत्य पर आधारित, न्यायपूर्ण व कल्याणकारी होता है। सतयुग की अवधारणा में हर युग का काल नियत है; जैसे सतयुग सत्रह लाख अठ्ठाइस हजार वर्ष, त्रेतायुग बारह लाख छियानबे हजार वर्ष, द्वापरयुग आठ लाख चौसठ हजार वर्ष और कलियुग चार लाख बत्तीस हजार वर्ष।  

    हर युग में मनुष्य की औसत आयु भी नियत है, जैसे सतयुग में मनुष्य की औसत आयु एक लाख वर्ष, त्रेतायुग में मनुष्य की औसत आयु दस हजार वर्ष, द्वापरयुग में मनुष्य की औसत आयु एक हजार वर्ष और कलियुग में मनुष्य की औसत आयु सौ वर्ष।

    युगों की अवधारणा में सबसे लंबा युग ‘सतयुग’ है और मनुष्य की आयु सबसे लंबी एक लाख वर्ष मानी जाती है। ऐसा माना जाता है कि सतयुग में मनुष्य जीवन-मूल्य, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि की उच्चतर अवस्था को प्रामाणिकता के साथ जीता है।

    मित्र : आप क्या मानते हैं कि सतयुग था?
    सामाजिक यायावर : बिलकुल नहीं।

    मित्र : क्यों?
    सामाजिक यायावर : सतयुग की मूलभूत अवधारणा में ही बहुत छिद्र हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही, मनुष्य के कर्म का कोई औचित्य ही नहीं रह जाता है।

    मित्र : यह तो चौकाने वाली बात है। क्योंकि सद्कर्म ही तो सतयुग का मूलाधार है।
    सामाजिक यायावर : स्वर्ग व सतयुग आदि की हमारी अवधारणाओं के मूल में ही छिद्र हैं, भ्रम हैं, कोरी कल्पनायें हैं। यदि आप पूर्वाग्रह व भावुकता को परे रखकर विश्लेषण करें तो आप भी मेरे तर्कों से सहमत हो सकते हैं।

    लाखों वर्ष के सतयुग में मनुष्य द्वारा एक लाख वर्ष जैसे बहुत लंबे समय तक जीवन-मूल्यों, नैतिकता, ईमानदारी, प्रकृति के साथ व्यवस्था-संतुलन व सत्य आदि को जीते हुएऔर सद्कर्मों को करते रहने के बावजूद युग का समय पूरा होने पर एक दिन सतयुग का क्षय हो जाता है। 

    सतयुग से कलियुग के बीच में ‘त्रेतायुग’ व ‘द्वापरयुग’ भी हैं जो लाखों वर्षों के हैं। इन युगों में भी मनुष्य कितना भी सद्कर्म कर ले, लेकिन उसको पूर्व-निर्धारित नियति व दैवीय व्यवस्था के कारण बढ़ना कलियुग की ही ओर है।  कलियुग में कितने भी बुरे कर्म कर ले, बढ़ना ‘सतयुग’ की ही ओर है। क्योंकि कलियुग का समय खतम होते ही, “सतयुग” आ जायेगा। सतयुग से त्रेतायुग, त्रेतायुग से द्वापरयुग, द्वापरयुग से कलियुग, कलियुग से सतयुग, इस पूरे चक्र में सब कुछ पूर्वनिर्धारित व नियोजित है।

    जब सतयुग के उच्चतर निरपेक्ष-सद्कर्मों को जीने से मनुष्य सतयुग की निरंतरता नहीं बनाएरख सका तो कलियुग में उसके छोटे-छोटे सापेक्षिक-सद्कर्म का सतयुग के लिए कोई औचित्य ही नहीं, फिर भी कलियुग सतयुग की ओर बढ़ता है। इसका अर्थ यह हुआ कि मनुष्य कैसे भी कर्म करे। सतयुग, त्रेतायुग, द्वापरयुग व कलियुग अपने समय से आयेंगें और जायेंगें, मनुष्य के कर्मों से इनका होना, न होना, आना, जाना आदि का कोई संबंध नहीं। 

    यही कारण है कि सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही मनुष्य की ‘कर्मशीलता’ का कोई अस्तित्व व महत्व नहीं रह जाता है। मनुष्य के कर्म की कोई प्रासंगिकता नहीं रह जाती है। और सतयुग की अवधारणा को स्वीकारते ही ‘कर्म’ औचित्यहीन और तिरस्कृत हो जाता है।

    यदि मनुष्य अपने जीवन में ‘कर्मशील’ बने रहना चाहता है, सद्कर्मों का प्रयास करते रहना चाहता है, कर्म को मानव जीवन का उद्देश्य मानते रहना चाहता है, तो मनुष्य को पूर्वनिर्धारित व नियोजित युगों की अवधारणा को अस्वीकार करना पड़ेगा। और यह मानना पड़ेगा कि मनुष्य अपने कर्मों के आधार पर किसी भी क्षण से सतयुग या कलियुग में जीना शुरू कर सकता है।

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  • भारत के मेट्रो शहर में झोलाछाप डा० मद्रासी द्वारा खूनी बवासीर का शर्तिया इलाज

    सामाजिक यायावर

    2016-02-09-bavasir-shartiya-ilaj-02

    यह लेख भारत में सत्य घटनाओं पर आधारित है। सरकारी नौकरी करने वाला एक इंजीनियर कई वर्षों से बवासीर से परेशान था। उसके किसी मित्र ने बताया कि उसी शहर में एक मद्रासी है जो बवासीर का शर्तिया इलाज करता है। इंजीनियर मद्रासी का पता लेकर पहुंचता है। पॉश एरिया में कई मंजिला घर, लंबी कारें घर के सामने खड़ी हुईं। इंजीनियर अंदर गया। अंदर कई पढ़ी लिखी खूबसूरत लड़कियां भी अपनी-अपनी बारी आने के इंतजार में बैठी हुईं। इंजीनियर भी अपनी बारी के इंतजार में एक कुर्सी पर बैठ गया।

    इंजीनियर भी उस चलताऊ मनोविज्ञान से पीड़ित था जिसमें अंग्रेजी में गिटगिटाने व कांवेँट में पढ़ने को जागरूकता, योग्यता व बुद्धिमत्ता की कसौटी माना जाता है। अंग्रेजी में गिटगिटाती कांवेंट की पढ़ी हुईं खूबसूरत लड़कियों को मरीजों के रूप में देखकर इंजीनियर को लगा कि अब बवासीर का इलाज शर्तिया हो ही जाएगा।

    इंजीनियर साहब देखते कि जब भी कोई स्त्री या पुरुष पर्दे के अंदर दूसरे कमरे में जाता तो डाक्टर की “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” जैसी दबंग आवाजें आतीं, फिर कराहने की आवाजें आने लगतीं। 15-20 मिनट बाद वह स्त्री या पुरुष पर्दे वाले कमरे से बाहर आते और चुपचाप बाहर चले जाते।

    काफी देर तक यह प्रक्रिया देखते रहते हुए इंतजार करने के बाद इंजीनियर साहब का नंबर आया। इंजीनियर साहब उस मद्रासी से पहली बार मिल रहे थे। मद्रासी ने इंजीनियर साहब से यह तक नहीं पूछा कि इनको कौन सी बीमारी है मानो मद्रासी को पता ही था कि यहां आने वाला हर बीमार बवासीर का ही बीमार है।

    मद्रासी ने कहा “खोलो”। इंजीनियर साहब बिलकुल नहीं समझ पाए कि ये क्या खोलें? इंजीनियर साहब ने पूछा कि क्या खोलें? मद्रासी बोला कि आप यहां क्यों आएं हैं, इंजीनियर साहब बोले कि बवासीर के इलाज के लिए। मद्रासी बोला कि बवासीर कहां होता है? इंजीनियर साहब चुप हो गए। मद्रासी बोला कि इसमें शर्माने की क्या बात है बताइए कि बवासीर गांड़ में होता है। इसलिए जब मैंने कहा कि खोलो तो इसका मतलब हुआ कि आप अपनी पैंट व अंडरवियर उतार कर मेरे सामने अपनी गांड़ खोलकर दिखाइए।

    इंजीनियर साहब वहीं पड़े एक तखत पर लेट गए और अपनी गांड़ खोल कर मद्रासी को दिखाने लगे। मद्रासी ने अपनी उंगली बिना किसी दस्ताने के सीधे इंजीनियर साहब के गुदाद्वार में डालने लगे। मद्रासी बोला “और खोलो” अरे भई “और फैलाकर खोलो”। इंजीनियर साहब ने “और खोला” उसके बाद “और फैलाकर खोला”। उंगली डालते हुए मद्रासी बोला कि मुह खोलकर हवा निकालिए जगह बनाइए तभी तो उंगली अंदर जाएगी, इंजीनयर साहब ने कराहते हुए मुंह खोला। मद्रासी ने पहले एक उंगली फिर दो उंगलियां गुदाद्वार में पूरी तरह डाल कर अंदर खूब अच्छे से घुमाते हुए इंजीनियर साहब को हुए बवासीर का कारण जाना व समझा। 

    इंजीनियर साहब के गुदा में जीवन में पहली बार कोई उंगली गई थी। मद्रासी का भारी हाथ और भारी हाथ की भारी उंगलियां। इंजीनियर साहब को बेइंतहा दर्द था लेकिन करें तो करें क्या। आखिर शर्तिया इलाज जो करवाना था। इंजीनियर साहब कुछ और समझे हों या न समझे हों लेकिन अंदर से बाहर आती “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” व कराहने जैसी आवाजों का मतलब बखूबी समझ चुके थे। 

    इंजीनियर साहब की इसी हालात में मद्रासी से बवासीर का शर्तिया इलाज करवाने के पैकेजों में बातचीत शुरू हुई। मद्रासी बोला कि कोई चिंताजनक बात नहीं है, बवासीर ठीक हो जाएगा। इंजीनियर साहब ने कुछ महीने का 30 हजार रुपए वाला पैकेज पसंद किया। इस पैकेज में इंजीनियर साहब को कुछ महीनों तक रोज मद्रासी के पास आना था और मद्रासी की उंगलियों को अपनी गुदा के भीतर लेते हुए गुदा नली में कोई मलहम वगैरह लगवाना था।

    इंजीनियर साहब बिना नागा रोज मद्रासी के पास आते। मद्रासी “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” जैसे आदेश देता, इंजीनियर साहब के मुंह से कराहने की आवाजें आतीं और मद्रासी उंगलियां डालकर अच्छे से चारों तरफ घुमाते हुए कोई मलहम लगाता। इस पूरी प्रक्रिया के बाद इंजीनियर साहब कई घंटे चलने के काबिल नहीं रहते लेकिन बवासीर के शर्तिया इलाज के लिए सब प्रकार का दर्द झेलते।

    भगंदर :

    लगभग एक महीने बाद मद्रासी ने इंजीनियर साहब को सूचित किया कि इनको भयंकर वाला भगंदर (फिस्टुला) है। इसलिए इलाज लंबा चलेगा। इंजीनियर साहब ने मद्रासी के पैर पकड़े और बोले कि हमको ठीक कर दीजिए, बहुत तकलीफ है। मद्रासी ने बताया कि भगंदर का पैकेज बवासीर के पैकेज से अतिरिक्त लेना पड़ेगा। इंजीनयर साहब सहमत हुए। अब बवासीर व भगंदर का इलाज चलने लगा। मद्रासी उसी तरह रोज इंजीनियर साहब के गुदा में उंगलियां डालकर अच्छे से घुमाते हुए कोई मलहम लगाता रहा। लेकिन अब बवासीर के साथ-साथ भगंदर का भी इलाज हो रहा था। इंजीनियर साहब यह मानकर चल रहे थे कि मलहम बदल गया होगा। नया बदला हुआ मलहम बवासीर व भगंदर के इलाज के लिए होगा। अब इंजीनियर साहब का कांबो इलाज चलने लगा।

    मछली की आंख से बनी गुदा रिंग :

    फिर लगभग एक महीने बाद मद्रासी ने इंजीनियर साहब को एक नई सूचना दी कि गुदा को सिकोड़ने फैलाने वाली उनकी गुदा रिंग टूटी हुई है, बदलनी पड़ेगी। इंजीनियर साहब बोले कि कैसे बदलेगी? मद्रासी बोला कि मछली की आंख से बनती है और बढ़िया काम करती है, चिंता वाली कोई बात नहीं है।

    गुदा रिंग बदलवाने के लिए इंजीनियर साहब के सहमत होने पर मद्रासी ने बताया कि रिंग का खर्चा बवासीर वाले पैकेज के अतिरिक्त होगा। इंजीनियर साहब ने मछली की आंख से बनी गुदा रिंग का अतिरिक्त खर्चा दिया।

    मद्रासी ने एक दिन “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो” के साथ-साथ “ऐसे ही फैलाकर खोले रहो” वाला वाक्य भी बोला और इंजीनियर साहब 30-40 मिनट तक अपनी गुदा अपने हाथों से पकड़ कर खींच कर फैलाते हुए खोले रहे और मद्रासी बिना दस्तानों के अपनी मोटी-मोटी उंगलियों को इंजीनियर साहब की गुदा के अंदर डालते निकालते रहने के बाद बोला कि लो भई आपकी गुदा रिंग बदल गई अब मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग लग चुकी है।

    न कोई आपरेशन, न कोई चीर फाड़। मद्रासी ने इंजीनियर साहब की गुदा में अपनी मोटी मोटी उंगलियां डालने और निकालने की प्रक्रिया लगभग 30-40 मिनट तक दुहराई और मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग जादुई तरीके से डाल दी। इंजीनियर साहब बहुत खुश हैं कि बिना आपरेशन व चीर-फाड़ के उनकी गुदा-रिंग बदल गई और मछली की आंख से बनी गुदा-रिंग लग गई।

     

    चलते-चलते :

    इंजीनियर साहब व मद्रासी की बातें खुल कर होनें लगीं थीं। मद्रासी ने उनको बताया कि उसने अपने जीवन में एक से बढ़कर एक हजारों स्त्रियों के यौनांग देखे और उनकी गुदाओं में महीनों उंगलियां डाली और मलहम लगाते हुए इलाज किए।

    मद्रासी बहुत कम पढ़ा लिखा है, शायद पांचवी या छठवीं तक ही पढ़ा है, लेकिन बहुत पढ़े लिखे लोगों के बवासीर, भगंदर व गुदा-रिंग आदि का शर्तिया इलाज “खोलो” “और खोलो” “और फैलाकर खोलो”, मोटी मोटी बिना दस्तानों की उंगलियों, मलहम व मछली की आंख आदि से बनी गुदा-रिंगो आदि-आदि पैकेज के साथ करता है।

    मद्रासी की संताने अमेरिका में पढाई करतीं हैं, उनकी पढ़ाई का सारा खर्चा मद्रासी अपने द्वारा किए गए शर्तिया इलाज की कमाई से उठाता है। करोड़ों का घर है, करोड़ों के कई प्लाट हैं। आलीशान कारे हैं। पत्नी के पास लाखों रुपयों के गहने हैं। और भी बहुत कुछ है।

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  • धार्मिक कथाएं व ग्रंथ, इतिहास व इतिहासकार

    सामाजिक यायावर
    सामाजिक यायावर
    किसी भी धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस धर्म के लोगों को स्थायी रूप से मानसिक गुलाम रूपी अनुगामी बनाने के लिए लिखी गईं हैं। ताकि धर्मों की अमानवीयता, ऋणात्मकता व शोषण वाले गहरे तत्वों पर कभी सवाल न खड़ा हो पाए।
     
    यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं।
     
    एक उदाहरण स्वरूप यदि वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल के बारे में यही साबित होता है कि उस काल्पनिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था और धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था।
     
    जब भी धार्मिक कल्पनाओं व कर्मकांडों को जबरदस्ती सही साबित करना होता है तो ऐतिहासिक शोधों की बात की जाती है।
     
    ऐसे मामलों में जिसे ऐतिहासिक शोध कहा जाता है यदि उस शोध का आधार वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, तो वह ऐतिहासिक शोध कल्पनाओं, काल्पनिक कथाओं व इन पर आधारित ग्रंथों, महाग्रंथों, काव्यों व महाकाव्यों आ्दि की बेसिरपैर की खिचड़ी के अलावे कुछ भी और नहीं होता है।
     
    भारत के बहुत इतिहासकार जिनकी किताबें पढ़ीं जातीं हैं और जिनके नाम की तूती बोलती रही है या बोलती है। जिनके नामों को सबूत के तौर पर दिया जाता है। वे दरअसल इतिहास के शोधों के नाम पर ऐसी ही खिचड़ियां बनाते, पकाते व परोसते रहे हैं।
     
    यही सबकुछ पढ़ कर हजारों लाखों ने PhD कर ली, यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर हो गए, देश के ऊंचे नौकरशाह हो गए। इसी सब घालमेल ने देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा व दशा की और शिक्षा व्यवस्था की खामी के लिए गाली देने के लिए लार्ड मैकाले जैसे कुछ लोग अनंतकाल के लिए भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए राक्षस घोषित कर दिए गए।
     
    बेसिकली हमारा देश ऐसे ही खोखले व सतही आधारों पर खड़ा है। हमें ही तय करना है कि हम खुद को, अगली पीढ़ी को, समाज को, देश को क्या देना चाहते हैं और कैसा बनते देखना चाहते हैं ….
     
     
     
     
  • समाजवादी बिल्लियों का बड़ा परिवार और फ्रैंक हुजूर

    सामाजिक यायावर

    जो गांवों के हैं उन्होंने अपने गावों में या अपने घरों में घरेलू बिल्लियां देखी होगीं। भारत में पाई जाने वाली घरेलू बिल्ली धारीदार व छीटदार खूबसूरत होती है। अपनी दादी, नानी, माता, बुआ, मौसी, बहन व पत्नी आदि को खाने का सामान बिल्लियों से बचाने की जुगत के साथ रखते देखा होगा। उनमें से बहुतों ने अपने घरों में अपनी दादी व नानी के द्वारा हाथ से बनाई गई मिट्टी की अलमारियां देखीं होगीं जिनमें बाहर से कड़ी भी लगती थी जिसमें छोटा सा ताला भी लगाया जा सकता था। यह जुगत बिल्ली से भोजन व दूध को सुरक्षित करने के लिए होती थी।

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    frank-hujur-cat-008बीते दिनों में गांव के लोग पालतू पशुओं व पक्षियों के साथ परस्परता में जीवन जीते थे। कभी चूक हो जाने पर यदि बिल्ली दूध पी गई तो बिल्ली को जान से नहीं मारा जाता था। बिल्ली को घर से मार कर भगाया नहीं जाता था। जिन घरों में बिल्लियां होती थीं वे बिना पाली गई होने के बावजूद पालतू होती थीं। उन बिल्लियों के बच्चों के घर के बच्चों के साथ रिश्ते बनते थे। आज भी बहुत गावों में ऐसा होता है। शहरों में भी कभी कभार ऐसा देखने को मिलता है। लेकिन बिल्ली को घर के पारिवारिक सदस्य की तरह अधिकार देते हुए पालना, भारत में प्रचलन में नहीं है, कुछ लोग पालते हैं लेकिन प्रचलन में नहीं हैं। बिल्ली पालना आसान नहीं होता क्योंकि बिल्ली स्वतंत्र जीव होती है। 

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    बिल्ली की आप कितनी भी देखभाल कीजिए वह कभी आपकी गुलाम नहीं बनती है। बिल्ली कुत्ते की तरह आपकी अनुगामी, भक्त या स्वामिभक्त नहीं बनती है। आप बिल्ली को रोज कई बार भोजन खिलाइए लेकिन वह कभी आपके सामने कुत्ते की तरह लार चुआते हुए आपके तलुवे नहीं चाटेगी, आपके आगे अपनी पूछ नहीं हिलाएगी। आपसे जुड़े होने के बावजूद वह अपना वजूद आपके वजूद से स्वतंत्र रखती है।

    अपना वजूद स्वतंत्र रखते हुए, अपनी दृष्टि स्पष्ट रखते हुए भी आपसे जुड़े रहने की, आपके साथ मित्रवत रहने की खासियत के कारण ही शायद आत्मकथा लेखक व संपादक फ्रैंक हुजूर बिल्लियों को समाजवादी कहते हैं। फ्रैंक हुजूर कहते हैं कि उन्होंने बिल्लियों से समाजवाद के कई अध्याय सीखे हैं। फ्रैंक हुजूर ने विश्व की कई हस्तियों की आत्मकथाएँ लिखीं हैं। पाकिस्तान के विश्वप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान के जीवन के ऊपर भी किताब लिखी है। सोशलिस्ट फैक्टर नामक अंग्रेजी मासिक पत्रिका के संपादक भी हैं। फ्रैंक हुजूर की जीवन संगिनी बालीवुड में अभिनेत्री हैं। टीवी सीरियल्स में काम करतीं हैं। उन्होंने भी फ्रैंक हुजूर की 40 से अधिक बिल्लियों को अपने बच्चों की तरह स्वीकार कर रखा है।

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    frank-hujur-cat-001फ्रैंक हुजूर ने दुनिया के विभिन्न देशों की कई प्रजातियों की 40 से अधिक बिल्लियां पाली हुई हैं। सभी का भोजन, रहने की व्यवस्था व स्वास्थ्य आदि की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी फ्रैंक हुजूर पारिवारिक अभिभावक की तरह उठाते हैं। फ्रैंक हुजूर को अपनी प्रत्येक बिल्ली का नाम, उसके माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, मौसी मौसा, बुआ फूफा, बहन भाई आदि सभी के नाम व इतिहास जुबानी याद रहता है। इनके घर में हर जगह बिल्लियां ही दिखाई देती हैं। आप फ्रैंक हुजूर से मिलने पहुंचिए तो मालूम पड़ा कि जिस कुर्सी पर या सोफे पर आप बैठने जा रहे हैं वहां पर पहले से ही एक बिल्ली आराम से पसरी हुई है। चिंता न कीजिए बिल्ली आपको देखने के कुछ देर बाद आपके लिए स्थान खाली करके अपने लिए कोई नई जगह जुगाड़ लेगी। कोई गिला शिकवा नहीं। कुर्सी के लिए कोई झगड़ा नहीं। 

    frank-hujur-cat-002यदि आप रात में फ्रैंक हुजूर के अतिथि हैं और यदि बिल्लियों को आप पसंद आ गए तो सुबह जब आप जगते हैं तो आपको आपके साथ बिस्तर में कई बिल्लियां सोती मिलेंगीं। मैं इन सब बातों के जीवंत अनुभव उनके घर में अतिथि के रूप में ले चुका हूं। चूंकि सिडनी, आस्ट्रेलिया में हमारे घर में कई बिल्लियां पारिवारिक सदस्यों के रूप में रहीं हैं, इसलिए मुझे फ्रैंक हुजूर के घर में बिल्लियों के साथ बहुत ही अधिक अच्छा लगता है।

    फ्रैंक हुजूर ने बिल्लियों के नाम दुनिया की हस्तियों के ऊपर रखे हैं। आपको विक्टोरिया, ब्रूटस, नेपोलियन, लेनिन, लोहिया, टीपू आदि ऐतिहासिक पात्रों के नाम इनकी बिल्लियों के नामों में मिल जाएंगें। बिल्लियों के समाजवादी दर्शन के बारे में फ्रैंक हुजूर ने एक बिल्ली “लार्ड बोका” जिसका देहांत हो चुका है के ऊपर काफी कुछ लिखा है। यदि आप इच्छुक हों तो आप http://lordboca.com और http://www.newskarnataka.com/india/man-who-built-a-shrine-in-the-memory-of-a-cat में जाकर A devine socialist cat के बारे में पढ़ सकते हैं।

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  • प्रतिक्रिया के कारण हो रही सामाजिक चेतनशीलता के लिए भाजपा, सहयोगी संगठन व भक्तगण धन्यवाद के पात्र हैं

    सामाजिक यायावर

    समाज में बने बनाए ढर्रों, मान्यताओं, परंपराओं, धारणाओं आदि पर सवाल उठना किसी न किसी कारक के कारण शुरू होता है। उत्प्रेरक कारक न होने पर सड़ांध के स्तर का होने के बावजूद ढर्रे, मान्यताएं, धारणाएं आदि ढोई जाती रहतीं हैं।

    2014 में भाजपा की केंद्र सरकार आने के बाद भाजपा, सहयोगी संगठनों व भक्तगणों के बयानों, व्यवहारों व क्रियाकलापों के कारण लोग प्रतिक्रिया स्वरुप सवाल खड़ा करने लगे हैं। धर्म जाति के मकड़जाल के प्रति आम लोगों की धारणाएं मान्यताएं ढहने लगी हैं। लोग धर्म जाति पर सवाल खड़ा करने लगे हैं, बहस करने लगे हैं। भले ही यह प्रतिक्रियात्मक हो लेकिन यह चिंगारी का काम कर रही है।

    इस चिंगारी में घी का काम टीवी, अखबार जैसा मीडिया व सोशल मीडिया महत्वपूर्ण किरदार निभा रहा है। टीवी व अखबार का मीडिया तो लार चुआते लालची व पालतू कुत्ते की तरह व्यवहार करने व खुद को किंग-मेकर मानने के नशे व अहंकार के कारण सरकार बनने के बाद भी अब भी चुनाव प्रचार में ही लगा हुआ है। इस मीडिया की हैसियत दरबार के भांट जैसी हो गई है। जिसे सत्ता की शान में गाना गाना ही है नहीं तो लतियाकर दरबार से बाहर फेंक दिया जाएगा।

    भला हो 2G जैसे घोटालों का जिनके कारण आम आदमी के हाथों में सस्ते मोबाइल व सस्ता इंटरनेट पहुंच गया और लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। टीवी व अखबार में कुछ आया, नेताओं/धर्मगुरुओं आदि किसी ने कोई बयान दिया, इधर लोगों ने अपनी अपनी समझ, सोच व स्वार्थ के अनुसार उस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी।

    टीवी में किसी कार्यक्रम के लिए तैयारी करनी पड़ती है। अखबार छापना पड़ता है। लेकिन सोशल मीडिया में सिर्फ कुछ बटनें दाबनी पड़तीं हैं और बात जंगल में आग की तरह फैलती है। सोशल मीडिया में लोग परस्पर विरोधी विचारों को पढ़ते, देखते, सुनते, समझते हैं। वै जैसे भी हैं वैसे ही खुद को व्यक्त कर लेते हैं।

    सोशल मीडिया में जो ढोंगी है वह बहुत अधिक बड़ा ढोंग कर लेता है। जो झूठ बोलता है वह बहुत अधिक बड़ा झूठ बोल लेता है। जो मक्खनबाज है वह बहुत अधिक बड़ी मक्खनबाजी कर लेता है। जो अंदर से हिंसक है वह मानसिक हिंसा कर लेता है। जो जैसा है और जो करना चाहता है वह सोशल मीडिया का वैसे ही प्रयोग करता है। लोग अपने जैसों के साथ जुड़ते हैं। जो जैसा है उसको वैसे लोग मिल जाते हैं। उसकी बात वाहे ऋणात्मक हो या धनात्मक हो, बुरी हो या अच्छी हो, उसकी पहुंच का दायरा बहुत गुना बढ़ जाता है।

    भले ही कितना हो हल्ला हो, उपहास उड़ाया जाए, बेढंगे तर्क दिए जाएं लेकिन अब लोगों के अंदर की धार्मिक व जातीय धारणाओं व मान्यताओं को ढहने से बचा पाना असंभव है। ज्यों ज्यों सोशल मीडिया का दायरा बढ़ता जाएगा त्यों त्यों लोग अपना दर्द व झेला हुआ यथार्थ आपस में साझा करना शुरू करेगा। 

    चूंकि आम समाज के लोग अपने जीवन में बहुत कुछ झेलते हैं यही कारण है कि प्रतिक्रिया सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत तेजी से फैलती है। झेला हुआ दर्द आपस में एक बांड बन जाता है। ज्यों ज्यों दबे कुचले व शोषित जातियों के लोग भी अधिक से अधिक इंटरनेट व सोशल मीडिया का प्रयोग करना सीखते जाएंगें। प्रतिक्रियात्मक बदलावों की आग बढ़ती जाएगी। इसके लिए धरना प्रदर्शन, कैंडल मार्च में लोगों की संख्या का होना या न होना महत्व नहीं रखता है। क्योंकि सारा खेल तो उसके मन के भीतर चल रहा उठापटक का है। 

    स्त्रियां मंदिरों के लिए आंदोलन करने लगीं हैं। दलित छात्र एकजुट होने लगा है। ऐसा दिख रहा है कि आगे आने वाले समय में दलित व पिछड़ा भी एकजुट हो सकता है।

    भले ही यह प्रतिक्रियास्वरूप हो लेकिन दीवारें तो ढहने लगी हैं। सबसे जरूरी बात है धारणाएं मान्यताएं टूटना, उन पर सवाल खड़ा होना। इतना शुरू हो जाए तो फिर बहुत कुछ अपने आप टूटने लगेगा। मैं इसको समाज के लिए लंबी दूरी के लिए बेहतर मानता हूं।

    चलते-चलते

    2014 के चुनावों में लोगों ने अपने जीवन में बदलाव के लिए सत्ता सौपी थी। आम लोगों को उनके जीवन में आमूलचूल बदलाव का बहुत बड़ा सपना भी दिखाया गया था। मैंने 2014 में चुनावों के बाद एक पोस्ट में लिखा था कि अब भाजपा को मीडिया का प्रयोग अगले लोकसभा चुनाव तक नहीं करना चाहिए। क्योंकि अब भाजपा की सरकार है और यदि मीडिया फिजूल में जबरन सरकार की प्रशंसा करेगा तो लोग नाराज होना शुरू हो जाएंगें क्योंकि लोग धरातल में रहते हैं। सरकार यदि कुछ अच्छा करती है तो उसका प्रभाव व असर लोगो को अपने जीवन में दिखता है। इसके लिए मीडिया के ढोल मजीरे की जरूरत नहीं होती है। लेकिन मीडिया के प्रयोग को लोगों का माइंडसेट बनाने के लिए ब्रह्मास्त्र मानने की गलती लगातार व बारबार दुहराई जा रही है। अन्य राजनैतिक दलों के लोग भी यही पद्धति प्रयोग करना शुरू कर चुके हैं। यह सब जो भी हो रहा है वह भारत के लोगों की चेतनशीलता के लिए बहुत ही लाभदायक है।

    कोई बड़ी बात नहीं कि आगामी पांच दस वर्षों में ही भारत के लोग भारत की मुख्य मीडिया व वर्तमान राजनैतिक दलों, जातियों व धार्मिक मान्यताओं व धारणाओं को बिलकुल ही गिराकर ढहाना शुरू कर दें।

    कुछ भी हो समाज में ऐसी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करने के लिए भाजपा, सहयोगी संगठनों व भक्तों को जबरदस्त क्रेडिट जाता है।

    सामाजिक यायावर

     

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  • मानव-निर्मित धर्म और बाबाओं का बाजार

    मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर
    साभार –
    पृष्ठ संख्या  242 से 245 

    मैंने कॉफी पीते मित्र से कहा कि सच्चे बाबाओं/गुरूओं/संतों को छोड़कर शेष बाबाओं के लिए  भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार है।

    मित्र : आपका मतलब भारत में कई प्रकार के बाबा होते हैं।
    नोमेड : जी, बाबाओं के कई चारित्रिक प्रकार है। जैसे गरीबों के बाबा, मध्यवर्ग के बाबा, उच्च-मध्यवर्ग के बाबा, उच्चवर्ग के बाबा, व्यापारियों के बाबा, ऊंचे वेतन वाले नौकरीपेशा व नौकरशाहों के बाबा आदि।

    मित्र : भारत में इतने बाबा लोग क्यों हैं
    नोमेड : इसका कारण भारत में मानव-निर्मित ईश्वर के प्रतिनिधियों की बहुत बड़ी संख्या का होना है। चूंकि परंपरा में मानव-निर्मित ईश्वर की अवधारणा में यह मान लिया गया है; कि ईश्वर जादू से समस्या हल कर देता है, ईश्वर जादू से मानवीय स्वार्थ की इच्छायें पूरी कर देता है, ईश्वर जादू से भोगविलास व ऐशोआराम की इच्छायें पूरी कर देता है। सारांश यह कि ईश्वर का काम मनुष्य को भोग-विलास करवाना है, जो ईश्वर भोग करवा दे वह महान् व शक्तिशाली, जो न भोग करवा पाएउस पर आस्था खतम करके दूसरे प्रकार के ईश्वर में आस्था रखना। 

    भारतीय समाज में परंपरा में लोगों के मन में यह धार्मिक अनुकूलन बनाया गया है कि कुछ लोग ईश्वर से संपर्क रख सकते हैं, ईश्वर से संवाद कर सकते हैं, ईश्वर से सिद्धियां सीख सकते हैं, ईश्वर को मानव की इच्छा पूर्ति के लिए प्रसन्न कर सकते हैं और मुंहमांगा वरदान प्राप्त कर सकते हैं आदि आदि।

    मित्र :  मैं ठीक से समझा नहीं।
    नोमेड : लड़का पैदा करना हो, लड़की न पैदा करना हो, छोटे बच्चे से लेकर ऊंचे वेतनमान की परीक्षा तक किसी में भी सफलता प्राप्त करनी हो, सुंदर पत्नी प्राप्त करनी हो, कमाऊ पति प्राप्त करना हो, बीमारी का इलाज करना हो, दुश्मन को क्षति पहुंचानी हो, नौकरी प्राप्त करनी हो, प्रमोशन प्राप्त करना हो, किराएपर मकान लेना हो, मकान के लिए किरायेदार मिलना हो, पति को दुरुस्त करना हो, पत्नी को दुरुस्त करना हो, बेईमानी करके उसको महानता में बदलना हो, काली करतूतों को सफेद करना हो, पाप करके किएगएपाप को पुण्य में परिवर्तित करना हो आदि आदि अनेकों प्रकार के चिल्लर कामकाज व आवश्यकतायें हैं। जिनके लिए लोगों को ईश्वरीय प्रतिनिधियों की आवश्यकता पड़ती है। भारत के लोगों की सहज मानसिकता है कि पुरुषार्थ के बजाय, काम कराने के लिए संपर्क व संबंध खोजते हैं। और ऐसी मानसिकता का कारक भी परंपरा में ईश्वरीय प्रतिनिधियों का प्रायोजित होना ही है।

    मित्र : इसका बाबा लोग से क्या रिश्ता है।
    नोमेड : बहुत गहरा रिश्ता है। भारत में परंपरा में ऐसा धार्मिक अनुकूलन किया गया है कि कुछ लोग ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं जिनके माध्यम से ईश्वर मनुष्यों के साथ संपर्क रखते हैं। इन प्रतिनिधियों को बिना किसी भी शंका के पूरे समर्पण के साथ स्वीकारना है और इनके प्रति सेवा व समर्पण का भाव रखना है।

    मनुष्य हर उस तंत्र का मानसिक व वैचारिक अनुगामी होना स्वीकार कर लेता है, जो उसकी ऐश्वर्य, सुविधा व भोग-विलास की इच्छा की पूर्ति कराने का दावा करता है। तो जिन लोगों ईश्वर के साथ संपर्क रखने वाला प्रायोजित कर दिया जाता है, लोभी, मृत्यु व मृत्यु के पश्चात् नर्क की प्रताड़नाओं से भयभीत लोग उनको अपना गुरू स्वीकार कर लेते हैं, उनको पवित्र व पूजनीय मान लेते हैं ताकि उनके माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न कर सकें और आकाशीय-स्वर्ग या भू-स्वर्ग आदि की प्राप्ति कर सकें।

    मित्र : गुरू को तो बहुत महान् माना जाता है।
    नोमेड : इसी मान्यता व अनुकूलन का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपने अनुयायी बनाते हैं और अनुयायियों में अपने प्रति बिना मूल्यांकन व विश्लेषण के अंधी आस्था पैदा व विकसित करते हैं, जिसके समक्ष कोई भी उचित तर्क व कारक आदि सभी व्यर्थ है, कूड़ा है, मिट्टी है, अस्तित्वहीन हैं, अप्रासांगिक हैं।

    पारंपरिक धार्मिक अनुकूलन में गुरू को सबसे अधिक महान् बताया गया है। इस मूल्य का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपनी गुरूता पर अंधी आस्था रखने का अनुकूलन स्थापित करते हैं और बिना शंका अंधी आस्था कायम रखने के लिए गुरू संपूर्ण है, ईश्वरीय चेतना से संपन्न है, ईश्वर की सक्रियता व अभिव्यक्ति का अंश है इसलिए  शिष्य कभी गुरू से आगे नहीं जा सकता है आदि आदि गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में प्रायोजित करते हैं।। शिष्य द्वारा गुरू पर शंका करना अक्षम्य अपराध है, इस अपराध के लिए गुरू को शिष्य को घोर से घोर दंड देने का अधिकार है। शिष्य को गुरू का मानसिक व शारीरिक दास बनना होता है।

    मित्र : आप कहना चाहते हैं कि लोगों के मन में बैठी ऐसी परंपरागत सामाजिक व धार्मिक अनुकूलन का लाभ उठाने वाले बाजारू बाबा लोग हैं।
    नोमेड : जी बिलकुल। बाजारू बाबा लोग बड़े चतुर हैं, भलीभांति समझते हैं कि भारतीय समाज के लोग धर्मभीरु हैं और स्वार्थ पूर्ति के लिए बिना पुरुषार्थ का शार्टकट खोजते हैं। और लोगों के लिए ईश्वर का मतलब जादू करके मनुष्य की भोगने की इच्छाओं की पूर्ति कराने वाला है।

    इसलिए  जो मृत्यु के निकट नहीं हैं वे और अधिक सांसारिक भोगों के लिये; जो मृत्यु के निकट हैं वे जीवन भर किएगएस्वार्थ के कामों, हिंसा व पापों की जवाबदेही से बचकर स्वर्ग में ऐश्वर्य भोगने के जुगाड़ के लिये; बाबाओं रूपी ईश्वरीय प्रतिनिधियों के अनुगामी बनते हैं।

    मित्र : जुगाड के लिए क्या करना होता है।
    नोमेड : जुगाड़ के लिए कुछ विशेष नहीं करना होता है। अलग-अलग बाबा अपना अलग तरीका लेकर चलता है ताकि अनुयायियों के अंदर गुरू की अद्वितीयता का अहसास भी हो और कर्मकांड करना बहुत दुष्कर भी न हो। इसलिए  किसी पशु को कुछ खिलाना/नहलाना/पानी-पिलाना या किसी को दान करना आदि आदि; किसी रंग का कपड़ा पहनना या दान करनाआदि आदि; किसी दिन कुछ करना या न करना आदि आदि;  माता पिता या बड़े-बूढ़ों के दिन में कई बार पैर छू लो या रात में किसी विशेष समय जग कर पैर छू लो आदि आदि, इससे माता पिता और बड़े बूढ़े भी गुरु जी के ऊपर प्रसन्न हो गएऔर उनका गुरू जी का प्रचार भी हो गया। इसी प्रकार का कुछ ऊटपटांग करना व करवाना और तर्को से किएजा रहे कर्मकांड का संबंध दैवीय प्रयोजन से सिद्ध कर देना। 

    आजकल तो आध्यात्मिक बाबा लोग का फैशन आ गया है। जागरूक व पढ़ेलिखे लोग अपने लिए अलग प्रकार के आध्यात्मिक बाबा लोग चाहते हैं। एबाबा लोग इन लोगों को जीने का तरीका सिखाते हैं, व्यवहार करना सिखाते हैं, शांति सिखाते हैं, बाकायदा कोर्स कराते हैं, कोर्स की फीस लेते हैं। फीस लेना प्रोफेशनल्स को बाबा का प्रोफेशनल, ईमानदार व वजनदार होना सिद्ध करता है।

    पैसे कमाने और ग्लैमर भोगने के लिए बेइंतहा दौड़-भाग करते ऊंचे वेतन वाले प्रोफेशनल्स लोग जब कभी अपने बाजारूपन से अलग हटकर कुछ सोचते हैं तो उनको अंदर से भय, असुरक्षा, घुटन व कुंठा आदि महसूसती है। तो इससे पलायन करने के लिए ये लोग अपने लिए किसी को अपना आध्यात्मिक गुरू मान लेते हैं और फिर गुरू के बताई पद्धतियों के नशे में छद्म शांति महसूसते हुए पूर्ववत जीवन जीने लगते हैं।

    उपभोक्ता रूपी मनुष्य की हर वास्तविक/संभावित/आभासी आवश्यकता के लिए विकल्प प्रस्तुत कर देना ही, बाजार के तंत्र की सफलता व मजबूती है। बाजार में उपलब्ध आध्यात्मिक व गैर-आध्यात्मिक बाबा लोग भी ऐसे ही बाजारू विकल्प हैं। किसी ने लोगों से किसी बाबा के बारे में सुना, अपनी तथाकथित मूल्यांकन क्षमता व बौद्धिकता आदि से बाबा को तौला और पसंद आने पर उस बाबा को गुरू मान लिया।  व्यक्ति को अपनी पसंद का गुरू बाजार में उपलब्ध है।

    मित्र : इन बाबाओं के पास इतना पैसा कहा से आता है।
    नोमेड : बाबा लोगों के पास मुख्यतः दो प्रकार के लोगों के द्वारा पैसा अधिक आता है। व्यापारी व व्यापारियों के परिवारों से और बड़ी कंपनियों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स, नौकरशाहों व उनके परिवारों से।

    मित्र : ऐसा क्यों, व्यापारियों की बात तो समझ आती है लेकिन नौकरशाह व प्रोफेशनल्स …… अचरज की बात है।
    नोमेड : ऐसा इसलिए  कि व्यापारियों के बाद सबसे अधिक असंतुष्ट, भ्रमित व अनैतिक लोग एही लोग हैं। इन लोगों का भ्रम, अनैतिकता व अर्थ की ताकत का अहंकार इनको अंदर की शांति नहीं प्राप्त करने देते हैं। दूसरों की तुलना में पैसा अधिक होने से अहंकार का स्तर बहुत ही ऊंचा होने के कारण ये लोग अंदर की ईमानदारी के साथ सामाजिक भी नहीं हो पाते। बाबाओं का चेला बनने से, दूसरे चेलों के साथ तथाकथित सामाजिकता का ढोंग भी जीने को मिल जाता है।

    भारत में अमूमन व्यापारी वर्ग गैर पढ़ा लिखा होता है, इसलिए इनके धार्मिक बाबा लोग पढ़े-लिखे लोगों के बौद्धिक श्रेष्ठता के अहांकारों को नहीं सुहाते हैं। इसलिए पढे-लिखे व स्वयंभू जागरूक लोगों ने अपने लिए अलग किस्म के बाबा बना लिए हैं, जिनको ये लोग आध्यात्मिक बाबा कहना पसंद करते हैं, जो इनके तार्किक अहंकारों को तर्कों से तुष्ट करते हुएबाबागिरी करते हैं।

    भारत में धार्मिक व आध्यात्मिक बाबागिरी बहुत बड़ा व ताकतवर उद्योग बन चुका है। ये लोग बाकायदा विभिन्न सत्ताओं जैसे बाजार व राजनैतिक सत्ताओं आदि के एजेंट की तरह भी काम करते हैं और अपने वेतनभोगी कर्मचारी भी रखते हैं। प्रचार कंपनियों से अपना प्रचार भी करवाते हैं और लाभ कमाते और कमवाते हैं। उद्योग बनने का एक कारण “आस्तिक व नास्तिक” की भ्रामक परिभाषाओं का प्रचलन भी है।

    मित्र : आप आस्तिक या नास्तिक किसे कहते हैं।
    नोमेड : बात मेरे कहने की नहीं है। बात आस्तिक व नास्तिक शब्दों के शाब्दिक अर्थ व किस संदर्भ में प्रयोग करने के लिए ये दोनों शब्द बनाए गए। इन शब्दों की शुरुआत होने का मत यह भी है कि वेदों को मानने वाला आस्तिक व वेदों को न मानने वाला नास्तिक है।

    यदि शाब्दिक अर्थ में जाएं तो इनका अर्थ कुछ यूँ निकलता है। आस्तिक = “जो है” उस पर विश्वास करने वाला और नास्तिक = “जो नहीं है” उस पर विश्वास करने वाला।

    मानव-निर्मित ईश्वर तो मानव का गढा हुआ है, इसलिए मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करने का तात्पर्य “जो नहीं है” उस पर विश्वास करना हुआ। जो मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करते हैं वे भयंकर रूप से ‘नास्तिक’ होते हैं, वह भी जबरदस्त अहंकार व हिंसक भावना से ओतप्रोत क्योंकि ये लोग ईश्वर को मनमाफिक गढ़ते हैं। जो निर्विकार अस्तित्व पर विश्वास करता है केवल वही “आस्तिक” है, क्योंकि वह “जो है” उस पर विश्वास करता है।

    लोग यदि इन दो शब्दों का अर्थ ही समझ लें तो जो बाबा लोग ढोंगी हैं, तो ऐसे बाबाओं के छद्म-जालों की मानसिक व वैचारिक दासताओं के चंगुल से बाहर निकलने की संभावना बनी रहती है।

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  • हम, हमारी स्मार्टनेस बनाम भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी – (भाग 01)

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    सामाजिक यायावर

    यह लेख-श्रंखला गंभीर, विचारशील, चिंतनशील व सामाजिक मुद्दों की धरातलीय हकीकत को समझने की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए है। भावनात्मक आवेग, धार्मिक/जातीय प्रतिक्रियाओं/आवेशों, राजनैतिक पूर्वाग्रहों व संरेखणों, अतथ्यात्मक/कुतर्क/वितर्क बहसबाजी करने वाले व वास्तविक विकास की समझ न रखने वाले महानुभावों के स्वाद के लिए इस लेख-श्रंखला में शायद ही कुछ हो।

    मेरा प्रयास सदैव यही रहता है कि मैं कोरी भावुकता, भावनात्मक आवेग, धार्मिक या जातीय उन्माद/प्रतिक्रिया, खोखले तर्को/तथ्यों, निहित स्वार्थों/पूर्वाग्रहों व राजनैतिक पूर्वाग्रहों/संरेखणों आदि के आधार पर न लिखूं। संभवतः यही कारण है कि सोशल साइट्स में विचारशील व सामाजिक दृष्टिवान लोग ही मुझे पढ़ते हैं और मेरा लिखा पसंद करते हैं। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हो चुका है कि मेरी बातों की गहराई लंबे समय बाद समझी गई है और स्वीकृत की गई है। यहां तक कि मेरे जमीनी कामों के प्रमुख साथियों को भी मेरी बातों को समझने में कई-कई वर्ष कभी कभी पांच से दस वर्ष तक भी लग गए हैं।

    मैं सन् 2013 से सन् 2015 तक कई बार भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी, बनारस को क्योटो शहर बनाने जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया में लिख चुका हूं। आजकल कुछ पाठकों ने इन मुद्दों पर लिखे गए मेरे पुराने छोटे बड़े लेखों को खोज कर फिर से उन पर टिप्पणियां देना शुरू किया है। इसलिए स्मार्ट सिटी पर यह लेख-श्रंखला मित्रों को प्रस्तुत है।

    हम भारतीयों की वर्तमान मानसिकता, सोच, समझ, कंडीशनिंग व जीवन शैली के आधार पर स्मार्ट सिटी कैसे हो सकते हैं। इस पर बात करने के पहले हम स्मार्ट सिटी क्यों चाहते हैं इसको समझने का प्रयास होना चाहिए।

    दरअसल हम दिखावटी तौर पर कितना भी भारत व भारतीय संस्कृति की महानता का दावा ठोंकते रहें, कितना भी ड्रामेबाजी करते रहें लेकिन वास्तव में हमारे अंदर पाश्चात्य देशों व उनकी जीवन शैली ही आदर्श के रूप में स्थापित रहती है। हम मुंह से कुछ भी बोलते रहें लेकिन हम अपनी जीवन शैली में पाश्चात्य देशों की शैली का ही अनुकरण करते हैं व करना चाहते हैं।

    हम रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों तक में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी स्मार्टनेस समझते हैं। हर शहर, हर कस्बे में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी मीडियम स्कूल खुल गए हैं। हम अपने बच्चों को वहां  भेजते हुए फक्र महसूस करते हैं।हिंदी मीडियम स्कूलों की तुलना में कई गुना अधिक फीस भी देते हैं। हमारे बच्चे भी हिंदी मीडियम स्कूलों में जाने वाले बच्चों से स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं और उन बच्चों को हीन व हेय मानते हैं। ऐसी सोच हम खुद भी रखते हैं।

    दरअसल हम रेडीमेड तरीके से स्मार्ट होना चाहते हैं, हम रेडीमेड तरीके से विकसित होना चाहते हैं। इसलिए बाजार जाते हैं और स्मार्ट बनने के रेडीमेड टोटके खोजते हैं। हम जींस व टीशर्ट पहनना शुरू कर देते हैं, सुपर मार्केट में सामान खरीदना शुरू कर देते हैं भले ही हमें जींस, टीशर्ट व सुपर मार्केट की कतई जरूरत न हो। हम अपने बच्चों को स्मार्ट करना चाहते हैं तो उनको रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में भी महंगी से महंगी फीस भरकर भेजते हैं। लाखों रुपए सालाना डोनेशन देकर रद्दी इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेजों में भेजते हैं, यदि ज्यादे रुपयों का जुगाड़ हो गया तो विदेशों में लाखों रुपए महीना फीस व खर्चों का इंतजाम करके बच्चों को डिग्री लेने के लिए भेजते हैं वह बात अलग है कि बच्चा डिग्री लेकर भी परजीवी की तरह ही रहता है। लेकिन हम तो खुद को अपने गली मुहल्ले में स्मार्ट साबित कर लेते हैं।

    जो साधारण मोबाइल का प्रयोग करता है वह स्मार्ट नहीं है, जो आईफोन का प्रयोग करता है वह स्मार्ट है। जो लड़की जींस व टीशर्ट पहने वह स्मार्ट, जो लड़की सलवार कुर्ता दुपट्टा पहने वह दकियानूसी। जो टाई पहने वह स्मार्ट जो कुर्ता पायजामा पहने वह दकियानूसी। जो बियर पिए, वाइन पिए वह स्मार्ट जो अपने हाथ की बनाई महुआ की दारू पिए वह पिछड़ा व हीन। जो महंगी मोटरसाइकिल में चले वह स्मार्ट, जो साइकिल में चले या पैदल चले वह पिछड़ा, मूर्ख व हीन।

    यही इसी प्रकार की बाजार से खरीदी जाने वाली सतही सड़कछाप स्मार्टनेस, सफलताएं, उपलब्धियां आदि ही हमारी जीवन शैली बन चुकी हैं, और हमारे जीवन का उद्देश्य व उपलब्धियां भी। हमारे अंदर इसी बाजारू स्मार्टनेस व इसके सतहीपन के कारण ही हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं। हम सबकुछ बाजार से रेडीमेड खरीदना चाहते हैं, हमारा सबकुछ बाजार से ही तय हो रहा है। बाजार से खरीदने के लिए हमें धन व संपत्ति चाहिए होता है। इसलिए धन व संपत्ति के लिए हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जाते हैं, सतही व खोखले होते चले जाते हैं।

    हमारे अंदर आविष्कार, अनुसंधान व निर्माण करने की सोच व क्रियाशीलता नहीं होती, वास्तविक उद्यमशीलता नहीं होती है। होने की बात छोड़िए हम इन गुणों का तिरस्कार करते हैं, उपहास करते हैं। जैसे हम, वैसा हमारा समाज, वैसे हमारे व्यापारी व उद्योगपति, वैसे हमारे जन प्रतिनिधि, वैसे हमारे नौकरशाह और वैसे ही हमारे नीतिनिर्माता।

    हमारे अंदर स्मार्ट सिटी के प्रति नशा इसलिए सवार है क्योंकि हम अपने अंदर पाश्चात्य देशों की तरह साफ सुथरे चमचमाते शहरों व जीवन शैली को रेडीमेड तरीके से जीना चाहते हैं। स्मार्ट सिटी के बारे में हमारी कल्पना है कि अचानक हमारे शहरों को अमेरिका का न्यूयार्क, इंग्लैंड का लंदन, फ्रांस का पेरिस, आस्ट्रेलिया का सिडनी बना दिया जाएगा। हमें लगता है कि ऐसे शहर बाजार से रेडीमेड खरीदे जा सकते हैं। स्मार्ट सिटी के नाम पर यह जितनी कवायद हो रही है, वह बाजार से रेडीमेड स्मार्ट सिटी खरीद कर कहीं रख देने जैसी ही कवायद है। विश्वास कीजिए हमारे स्मार्ट सिटी भी सड़कछाप, सतही व टपोरी टाइप ही होगें।

    इस लेख पर कुछ बात हुई हमारी अपनी स्मार्टनेस पर। हमारे प्रस्तावित स्मार्ट सिटीज पर बात श्रंखला की अगली कड़ी में। 

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