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  • जामुन का भूत

    जामुन का भूत

    Shayak Alok


    किसी गाँव में जब गोबर नाम का गरीब मरा
    तो भूत हो गया
    तो वह भूत रहने लगा उसी गाँव के बँसवारी में
    पहलेपहल तो यह बात गाँव की कानी बुढ़िया ने कही और
    फिर किस्से शुरू हो गए

    एक दिन जब गोबर ने उठा पटक मारा
    पास वाले गाँव के सुखला साहूकार को
    और उसका बटुआ भी छीन लिया तब तो बड़ा हंगामा हुआ
    सुखला का गमछा पाया गया गाँव से दो कोस दूर
    ऐसा बिछा हुआ जैसे गोबर ही उस पर सुस्ताने दो दम मारा हो

    तो तय यह पाया गया कि हाथ पैर जोड़
    कर बुला लिया जाय रामनारायण पंडित को
    और खूब जोर से कच्चे धागे से बंधवा दिया जाय उस नासपीटे जामुन को
    जामुन जो बँसवारी का अकेला ऐसा पेड़ था
    जो बांस नहीं था

    लेकिन उसी रोज रात में घटी एक और घटना
    ‘न देखा न सुना’ – कहते हैं गाँव के बड़े बुजुर्ग
    बिशो सिंह के दरवाजे सत्तनारायण संपन्न करा
    के लौट रहे रामनारायण पंडित को
    बँसवारी के आगे धर दबोचा गोबर ने
    और ऐसा भूत मन्त्र मारा कि गूंगे हो गए बेचारे
    बोलते हैं तो सिर्फ चक्की के घिर्र घिर्र की आवाज़ आती है

    कहते हैं कि गोबर के दोमुंहे पुराने घर थी ऐसी ही एक चक्की जो
    उसके बाप ने अपने बाप के श्राद्ध में
    रामनारायण को गिरवी बेचा था

    खैर, जामुन के भूत को बाँध दिया गया और
    गोबर से शांत रहने की प्रार्थना की गई

    गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा
    उसका भूत
    हर शनिवार को खाता है बताशे
    कभी भूख बढ़ने पर जन्मते ही खा जाता है
    मवेशियों के बच्चे
    अपने साथी भूतों के भोज के लिए एक दिन जला डाला
    मुर्गों का दड़बा
    चबाई हड्डियाँ डोभे में फेंक दी

    गोबर के भूत ने न्याय लाया है गाँव में
    मुंह अँधेरे अब शौच जाने से नहीं डरती चंपा
    हर महीने सरसतिया के जिस्म पर आने वाला भूत
    अब नहीं आता
    गुनगुनाते हुए बड़े दालान से गुजर लेती है अठोत्तरी

    सुना है गोबर अन्य भूतों संग रोज रात को बँसवारी में करता है बैठकें
    हंसने और जोर जोर से बतियाने की आवाज़ आती है

    टीवीन्यूज़ पर जब से आई है गोबर की कहानी
    सरकार फिक्रमंद है आम जान माल को लेकर
    भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए
    और इसलिए सेना निपटेगी उनसे
    लोकसभा चुनाव के पहले पहल

    मज़े में जी रहे जामुन के भूत को दूसरा जामुन ढूंढना होगा.

    जामुन के भूत के साथी
  • राखी पर कुछ खुदरा नोट्स

    राखी पर कुछ खुदरा नोट्स

    Shayak Alok
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    विमर्श में बहन संबोधन लज्जास्पद है, अब। अब स्त्री कॉण्ट्रा-गर्ल है। एक सम्बन्ध विहीना। उसके पर्सोना को संबोधन संकटग्रस्त करता है। बहन शब्द, लाइफस्टाइल की कल्चर इंडस्ट्री ने, अपने तमाम उत्पाद के खिलाफ मानकर निषिद्ध कर दिया है। देह केंद्र में आने से, फिल्मों में पिछले 20 वर्षों में बहन पर कोई गाना नहीं आया। राखी पर रेडियो वालों को बड़ी किल्लत हो जाती है। वही गाने बजाने पड़ते है। भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना…

    आदि, आदि। अभी, बहन भाई के से कंडोम शेयर नहीं करती। लेकिन, टेलिजेनिक माये, बेटी के पर्स में कंडोम का पैकेट रख कर प्रसन्न होती, बरामद होती है। हो सकता, कोई नया कहानीकार ,बप्रकात हो , और ऐसी कथास्थिति, बुनकर, कथा में नवोन्मेष कर दे।


    प्रभु जोशी

    शुक्रिया कि आजतक किसी संस्कृतिविद ने यह कांस्पीरेसी थ्योरी नहीं दी कि अरे यह रक्षाबंधन तो बाजार की साजिश के प्रथम उदाहरण में से एक है जहाँ उद्देश्य राखी और मिठाई बेचना है. तमाम अंग्रेजीदां उत्सवों, यथा- वैलेंटाइन, मदर्स, फ्रेंडशिप पर यही फ़ॉर्मूला लागू करते हमारा हिंदी मन संतुष्टि पाता रहा है. वे कहते रहे हैं कि अरे भाई, माँ के लिए और प्रेम के लिए एक दिन ! .. उन्हें तो हम सालों भर स्नेह सम्मान देते रहें. फिर बहन के लिए एक दिवसीय व्यवस्था क्यों ? गणेश, शिव, हनुमान के लिए एक विशेष दिन निर्धारित क्यों ?.. आशय यह कि किसी भी श्रेणी के कुतर्क को दूसरे कुतर्क से पानी पानी (डाईल्युट!) किया जा सकता है.
    [themify_hr width=”200px”]

    कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेज मदद मांगी और हुमायूं ने सेना भेज दी. आसाराम नामक संत (कथित संत नहीं, संत मतलब व्यावहारिक तौर पर वही होता है जो आसाराम है और अन्य लोग हैं) ने कहा कि निर्भया ने फटाक दुपट्टे का कोर फाड़ा होता और अपने बलात्कारियों के हाथ पर बाँध भैया कह दिया होता तो बच जाती. अभी पिछले हफ्ते मैंने एक यूट्यूब विडियो देखा जहाँ संस्कृतिरक्षक एक प्रेमी युगल को पीट रहे थे और लड़की गुहार लगा रही थी कि भैया मत मारिए, मैं बीमार हूँ. और संस्कृतिरक्षक पूछता है कि बीमार हो मने, पीरियड चल रहा?

    और फिर फेसबुक है. इस कविता पर आपका आशीर्वाद चाहती हूँ भईया. मुझे बुझाता तो स और क नहीं है लेकिन सहमत दीदी.

    मैं बचपन में राखी को लेकर बेहद भावुक हो जाता था. आई मीन हिंदी फिल्मों के वे अद्भुत राखी दृश्य एंड यू ब्लडी डोंट हैव अ बहन मैन ! गुनाहे अजीम हुआ मुझसे. छठी कक्षा में मुझे अपनी एक सहपाठी से प्यार हो गया. प्यार मतलब पता नहीं क्या. उसकी उपस्थिति. और उसका वह स्नेह ! इसे बरक़रार रहना चाहिए था. सातवीं कक्षा में जूनियर स्कूल समाप्त होता और मैं उसे खो देता. मैं उसे नहीं खोना चाहता था. मैं सामाजिक आदर्शों के अनुकूल अपने संबंध की रक्षा चाहता था. मैंने उसे प्रपोज नहीं किया. मैंने कहा मुझे राखी दे दो. मैंने उसे एक चिट दी जिसपर लिख दिया – ‘फूलों का तारों का सबका कहना है/एक हजारों में मेरी बहना है’. वह मुस्कुराई, वह रोई, उसने राखी दी मुझे, लेकिन उसकी उपस्थिति ख़त्म हो गई उसी दिन. उसका वह स्नेह, वह सहजता, वह समाप्त. तीन साल बाद भी भूत ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा था और मैंने कविता लिखी थी इसपर –

    *
    किताब के अनचाहे पेज में रखी
    मेरी याद की एकमात्र पहचान
    जला क्यों नहीं देती तुम
    जब उसे कर नहीं सकती स्वीकार

    मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैंने वह अरमान भरा ख़त तुम्हें दिया था
    कितनी खुश थी तुम उन अनमोल ईहाओं पर विजय पाकर
    कभी चूमती स्निग्ध होठों से कभी अश्रुधारा बहाती उसपर
    मानो अश्क का परिचय करा रही हो

    दो पंक्तियों में सिमटा मेरा ख़त कितना भाता था तुम्हें
    कितनी मेहनत से चुराई थी मैंने दो पंक्तियाँ
    देव आनंद की आनंदमय पंक्तियां !

    मगर आज क्या हो गया है तुम्हें
    कहाँ खो गई तुम्हारी वह स्थायी जय जिसपर इठलाती इतराती थी तुम
    मैं समझ नहीं पाता हूँ
    लेकिन आज भी उन पंक्तियों को याद करता हूँ तो दोहराने की इच्छा होती है
    और तन्हाई में छत पर चढ़ प्रायः गुनगुना लेता हूँ
    ‘फूलों का तारों का सबका कहना है
    एक हजारों में मेरी बहना है’ …

    और फिर ऐसे ही एक दिन मैंने कहा कि मैं लौट जाना चाहता हूँ जहाँ से मैंने बात बदली थी. मैंने चिल्लाकर कहा खुद से कि प्यार करता हूँ तुमसे. तुम्हारी उपस्थिति और स्नेह के लिए सामाजिक आदर्शों का दबाव ओढ़ा था मैंने लिहाफ की तरह. मुझे माफ़ करो कि मैं प्यार ही करता हूँ तुमसे. लेकिन आदर्श और मान्यताएं यूँ आसानी से आपको नहीं छोड़ती. एक अपराधबोध में फंस गया और जलता रहा अगले दो वर्ष कि कैसे मनुष्य हो कि बात बदली तो उसपर टिके नहीं रहे और फिर वापस ! यह गुनाहे अजीम था मेरा. लेकिन पारो ने बचा लिया मुझे एक दिन. मैं बैठा था और पारो ने जैसे जोर से पुकारा – ‘’देव दाआआआआ….’’ दा दा दा दा. बंगाल के पास था मेरी मुक्ति का उपाय. वे अपनी लोकोक्ति में कहते थे कि ‘प्रेम का प्रथम डाक दादा को’ .. मुक्त हुआ तो मेरे मन ने विदा शब्द फूंक दिया पूरे प्रकरण व प्रयोजन को.

    अभी सोकर उठा कुछ देर पहले तो सुधा दी को याद किया. किसी राखी पर यह लिखा था उसके लिए.

    सुधा दी 

    मुझे खूब याद है जब मैं छोटा था-एकदम हाफ टिकट -तब राखी वाले दिन राखी बँधवाने के लिए खूब रोता था। स्मृति मुझे नर्सरी से कम से कम पाँचवी कक्षा तक ले जाती है जब तक मेरी माँ ने ही मुझे राखी बांधी और मैं दो रोज़ वह राखी बांधे इतराता घूमता रहता था। फिर सुधा दी आई एक बार…

    सुधा दी से अजब पारिवारिक रिश्ता था हमारा-पिता की तरफ के रिश्ते से वह मेरी बुआ लगती थी जबकि माँ की तरफ के रिश्ते से मेरी मौसेरी बहन। तो सुधा दी मुझे और मेरे पिता को साथ साथ राखी बांधती रही-बरसों बरस। पाँच फुट ऊंची वह गौरवर्णा आत्मीयता और मानसिक ऊर्जा की अप्रतिम प्रतिमूर्ति थी। याद नहीं आता कि हमारे पूरे खानदान मे कहीं किसी के घर छठी-शादी-श्राद्ध हो और वहाँ हमारी सुधा दी केंद्रीय भूमिका मे ना हो। सुधा दी को तो हमारे कुल देवता के वे गीत भी याद थे जो उनके पीछे की दो पीढ़ियों की मेरी परदादियो-परनानियों को भी याद ना थे। पिछले साल राखी पर आई तो माँ से अपनी दोनों बहुओं की शिकायत तो लगाई ही,माँ से मेरे ब्याह के बाबत तहक़ीक़ात भी की। जाते जाते कह गईं- “ब्याह कर लो भाय-फिर हम भी गीत-किस्सा गाते अवसान ग्रहण कर लेंगे”।

    दो हजार ग्यारह के दिसंबर माह मे मैं अपने तीन माह लंबे दिल्ली प्रवास पर था जब खबर मिली कि सुधा दी की दोनों किडनियाँ फ़ेल हो गयी हैं। महंगे इलाज मे अक्षम सुधा दी का परिवार उनके जाने के दिन गिनता रहा-दम साधे पूरी ज़िंदगी सीधी खड़ी रही सुधा दी बिस्तर पर पड़ी अपनी बची हुई साँसों को सोच समझ कर खर्च करती हुई जी चुकी ज़िंदगी का हिसाब करती रही। बीते बरस जेठ माह मे चली गयी सुधा दी । सावन की पूर्णमासी तक खुद को रोके रखने का साहस नहीं जुटा पायी होगी मेरी सुधा दी।

    कुमकुमिया (कुमकुम) और कंचनिया (कंचन) [ दोनों मेरी ममेरी बहने हैं-एक मेरे से तीन साल बड़ी है और दूसरी चार साल छोटी] पिछले साल मुझे राखी बांधने मेरे घर आई थीं । छोटी कंचनिया को उसकी ससुराल मेरी माँ ने बुलावा भेजा- “सुधिया ही बांधती थी- गई बेचारी – आ जाओ तुम ही और तीनों भाई को राखी बांध जाओ”। कुमकुमिया खुद आई । कुमकुमिया बड़ी है ना – जानती होगी कि राखी पर अपनी सुधा दी को ढूँढेंगे हम। मैं जानता हूँ इस साल भी जब कुमकुमिया मुझे राखी बांधेगी तो उसमे मुझे अपनी सुधा दी भी दिखेगी। और कुमकुमिया ज़रूर आँखें बड़ी करेगी और अपने हाथ का बनाया ‘पेडा’ मेरे मुंह मे ठुँसती हुई कहेगी- “ब्याह कर लो भाय”। ‘’

    और राखी पर बंदिनी को याद करता रहा हूँ इधर कुछ वर्षों से. अबके बरस भेजो भैया को बाबुल !

    और एक राखी पर यह लिखा मैंने. संयोग से बारिश आज भी है और उस रोज़ भी थी —

    न .. यूँ नहीं होनी चाहिए थी बारिश .. अभी नीचे गया गली में तो देखा वे जगह जगह सर छुपाती खड़ी हैं .. उनके बढ़िया परिधान खराब होंगे .. उन्हें अपने भाईयों को राखी बाँधने जाना था .. बच्चे गलियों में दौड़ नहीं लगा पा रहे .. उनकी माँओं ने मना कर रखा है कि कपड़े व तबियत खराब होंगे..

    मैं मेरा बचपन याद कर रहा हूँ .. नानीघर जाते थे हम .. गौरा गाँव .. नेशनल हायवे पर दो घंटे का सफ़र .. फिर एक लोकपरिया रस्ता जो नीचे उतरता था .. आगे देवी का मंदिर जहाँ पहुँचते माँ नोस्टालजिक होने लगती थी .. मंदिरों से बाहर निकलते स्त्री पुरुष जो माँ को देखते कहते थे – ‘ऐल्हो दाय राखी पे?’ .. फिर कई आंगनों को फर्लांगते अपने आँगन तक पहुंचना .. हर आँगन के चेहरे पर उतरती मुस्कुराहटें .. रस्ते में एक डोभा जो जलकुम्भियों से भरा था जिसमें भूत रहते थे .. हमारे आँगन से सटे आँगन से हम गुजरते तो चौकी वाली चाची (उन्हें नानी नहीं कहा कभी) हर बरस की भाँती बिल्कुल उसी जगह उसी कपड़े में बैठी हुई नजर आतीं .. बिना ब्लाउज के उजली साड़ी पहनी हुई .. एकदम सफ़ेद उनके बाल .. माँ को देखते हूं हूं की आवाज़ निकालतीं और फिर उनकी बहु दरवाजे की ओर झाँकती .. ‘दाय लौट्भो त हियों अयहियो’ .. चौकी वाली चाची और उनकी बहु दुनिया की दो सबसे सुन्दर स्त्रियाँ थीं .. फिर हम अपने आँगन पहुँचते .. जहाँ दुनिया की तीन अन्य सबसे सुन्दर स्त्रियाँ (मेरी तीनों मामी.. बड़ी को माँ पैतलिया वाली भौजी पुकारती हैं तो हम भी ऐसे ही बोलते रहे.. हम बच्चे उन्हें दीदी भी बोलते हैं, मंझली जिसे सब मंझली ही बोलते हैं और छोटी, बारो वाली या रजनी बहु .. रजनीकांत सिंह की पत्नी होने की वजह से रजनी बहु) माँ का स्वागत करतीं .. बच्चों में खूब जोश भर जाता फुआ को देखते .. कुछ बच्चे मेरे शहरी कपड़े छूकर देखते .. फिर पूरे दिन राखी बाँधने और खाने पीने का सिलसिला चलता .. मेरी तीन ममेरी बहनें होतीं वहां .. बड़ी वाली का नाम भूल रहा हूँ अभी .. उसका विवाह दुलारपुर गाँव में हुआ था .. उसकी सास और उसके पिता (मेरे मंझले मामू) बचपन के सहपाठी थे .. दो छोटी .. कुमकुमिया और कंचनिया .. और मेरी एक मौसेरी बहन .. सबकी सुधिया ..मेरी सुधा दी .. (जो नहीं रही अब .. पिछले दो साल राखी पर खूब याद किया था उसे) .. एक चीज जो खूब याद आती है तब की .. उनकी मिठाईयां गाँव के दूकान की बनी होती थी और मैं बमुश्किल निगल पाता था उन्हें .. घरों में बना पेड़ा भी होता था जिनमें चीनी ज्यादा होती थी और वे पिघले हुए दीखते थे .. पड़ोस की एक लड़की जो मेरी हमउम्र थी वह भी मुझे राखी बाँधने आती थी .. मुझे वह बेहद अच्छी लगती थी .. पर उसने दो लगातार साल मुझे राखी बाँधी .. मुझे बुरा लगता था ..

    और एक रोज़ यह घटना हुई तो यह लिखा –

    लीजिये .. मन गई राखी हमारी .. मेरे नीचे वाले फ्लोर पर कोई कोलेज छात्रा रहती है .. उससे झगड़ा हुआ था पिछले महिने मेरा पानी के लिए .. (सारा पानी केजरीवाल ने बहा दिया अपने 49 दिनों के स्टंट में तो पानी के लिए युद्ध तो होना ही है ) .. तो आई अभी और पूछा कि राखी बाँधी आपने .. मैंने झूठ मूठ कह दिया कि हाँ .. फिर उसने कहा कि मैंने मंदिर में हनुमान जी को बाँधा पर अच्छा नहीं लग रहा .. आपको बाँध दूँ .. मैंने हाँ कह दिया और वह बाँध गई है .. हालांकि मैंने बदले में उसे कुछ नहीं दिया .. मैं नहीं चाहता कि बाद में मैं यह सोचूं कि उसने राखी इसलिए बाँधी कि मैं उसे सौ दो सौ रुपये दूँ ( आखिर दुनिया में कुछ भी हो सकता है !) .. अभी देखूंगा एक दो महिने उसका व्यवहार .. उसने भाई की तरह ट्रीट करना जारी रखा तो उसे एक कुरती खरीद दूंगा .. एक इयरिंग भी खरीद दूंगा .. अच्छा लगा .. थोड़ा अजीब किन्तु आत्मीय ..

     

  • मार डालो

    मार डालो
    _______________

    मुझे मार डालो मेरी मूर्खता के लिए

    मुझे मेरी जाति, मेरे धर्म, मेरे रवायत के लिए मार डालो
    मुझे मार डालो कि मैं यहीं पैदा हुआ यहीं मरूँगा
    और तुम हो घोड़ों पर आए दूधिया ईश्वरों की फ़ौज

    मुझे मार डालो कि तुम यहीं थे
    मैं आया था हांफता हुंकारता कालक्रम में देर से
    कि मेरी शहतीर पर जमा खून तुम्हारा है

    मुझे मार डालो कि अल्लाह है निगेहबां
    उस दुनिया में बाकियों के लिए जगह नहीं

    मुझे मेरी बौद्धिकता के लिए मार डालो

    मुझे मार डालो कि मेरी भूख इतनी बढ़ गई है
    कि किसी अगले क्षण तुम्हारा दूध का कटोरा झटकने
    मैं तुम्हें मार दूंगा

    मुझे मार डालो कि तुम सोचते हो मेरे साम्राज्य की ईंटें
    तुम्हारी अस्थियों पर खड़ी हैं
    कि मानते हो इस प्रासाद का रंग है तुम्हारे खून का रंग

    मुझे मार डालो इसलिए भी कि मैं तुम्हें मारता रहा हूँ
    साल पीढ़ी सदी तक
    इसलिए भी कि अनुमान है तुम्हें कि यह वक़्त तुम्हारा है

    मुझे मार डालो मेरे अलग लिंग के लिए
    इसलिए कि हमारे अंग एक प्राकृतिक खांचे में अब फिट नहीं बैठते
    कि मुझे अब ज्यादा चाहिए

    मुझे मार डालो एक तर्क पर कि सारे तर्क तुम्हारे हैं
    तंत्र तुम्हारा है कि
    अतार्किक तरीके से मार डालो मुझे
    मुझे मार डालो कि तुम्हें नहीं है इस तंत्र पर यकीन

    सब सबको मार डालो.

  • वाचालता इस युग की प्रमुख प्रवृति बन गई है

    Shayak Alok

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    मुझे लगता है कि शासन व प्रशासन में बहुत कुछ अप्रत्यक्ष-नीतिक (कूटनीतिक) रखना उचित होता है. मैं इसे लोकशैली के एक वक्तव्य से पुष्टि देता रहा हूँ कि ‘मार कम बपराहट ज्यादा’ का प्रयोग लाभप्रद होता है. इसका आशय यह होता है कि साध्य को अधिक प्रकट बनाए रखना, न कि साधन प्रयोग पर एक दंभ बनाए रखना. मायावती की रैली से लौटते दलित-ईसाई-मजदूर युवक की हत्या मामले में उन्होंने यह हुनर आजमाया. buy zolpidem er 12.5 mg https://www.livermedic.com/ ambient online magazin उन्होंने न केवल अलसुबह परिवार को दबाव में ले मृतक का दाह-संस्कार कर दिया बल्कि उसी रात कई राजपूत युवकों को हिरासत में भी लिया. इससे संतुलनकारी स्थिति बनती है और प्रशासन के पास रचनात्मक स्पेस होता है कि वह बाकी कार्रवाई को नियंत्रण में अंजाम दे सके. अपने क़स्बाई पत्रकारिता दिनों में मैंने लोकल प्रशासन (एसपी-डीएम) को प्रायः इसी नीति से काम करते देखा है. शासन या प्रशासन को खुला पक्षकार नहीं बनना चाहिए. पक्षधरता सियासत का अवगुण है.

    मेजर गोगोई के मामले में बेहद आसानी से सेना के अंदर सेना प्रशासन द्वारा यह मैसेज कन्वे किया जा सकता था कि मेजर ने जो किया वह हालात के अनुसार एकदम सही था. यह मैसेज कन्वे करने की आवश्यकता भी नहीं थी यदि सेना जानती ही है कि विपरीत परिस्थितियों में वह प्रायः मनोनुकूल कार्रवाई उपाय अपनाती ही रही है. उत्तरपूर्व से कश्मीर तक सेना पर बलात्कार के आरोप लगते रहे हैं, आंतरिक कार्रवाइयों की बातें भी होती ही रहती हैं, लेकिन क्या पब्लिक डोमेन में ऐसी बातें प्रमुखता से आती हैं कि वास्तविक रूप से किसी सैन्य अधिकारी पर बलात्कार आरोप पर कोई कार्रवाई हुई. तो क्या नीति रही उनकी कि उन्होंने इसे अप्रत्यक्ष-नीतिक बनांये रखा है ताकि न तो सेना का कथित ‘मोरेल’ डाउन हो, न उन्हें पब्लिक आउटरेज से अकेले व सीधे मुक़ाबिल होने को विवश होना पड़े.

    किन्तु यूँ मेजर गोगोई को सम्मानित कर सेना प्रशासन पक्षकार बन गई. पहले से असंतुष्ट कश्मीर को एक और खराब मैसेज गया. यदि कश्मीरी भारतीय नागरिक ही हैं तो फिर प्रश्न तो बनता है कि संस्थागत पक्षधरता और नागरिक पक्षधरता के बीच सेना ने किसके प्रति पूर्वग्रह रखा. यह धैल किस्म का लोकतंत्र हुआ यदि सेना सैनिकों व नागरिकों में से सैनिकों को ही बस अपना समझे. यह ऐसा ही है कि एक बार किसी इजरायली मंत्री ने यह कह दिया था कि चयन यदि हमारे बच्चों की मौत और फ़लस्तीनी बच्चों की मौत में से एक का करना हो तो मैं फ़लस्तीनी बच्चों को चुनूँगा.

    सफल कूटनीति यह होनी थी कि मेजर गोगोई मामले पर सेना प्रशासन का बयान होता (या किसी बयान की आवश्यकता ही नहीं थी) कि मेजर गोगोई ने एक परिस्थिति में एक निर्णय लिया और उचित प्रतीत होता है, किन्तु इसके समानांतर नागरिक प्रशासन ( हमारी सरकार !) का यह बयान रहता कि सेना अधिकतम संयम बरते कि इस मामले की निष्पक्ष जांच करे. हुआ यह कि सेना ने मेजर को सम्मानित कर दिया और सरकार के लोग ‘जश्ननुमा’ बयान में लग गए.

    बीच का कोई रचनात्मक स्पेस मिला ही नहीं, बाँधा गया युवक स्टोन-पेल्टर भी नहीं साबित हुआ, कश्मीरियों का असंतोष इस घटना से बढ़ा होगा वह अलग.

    इस उत्सवधर्मी सरकार और ओवरकांफिडेंट सेना को इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि कश्मीर का अंतिम उपचार लोहे के जोर से नहीं बल्कि कश्मीरियों को विश्वास में लेकर ही होना है. हमने सत्तर साल से कश्मीर को सिर्फ लोह के दम से नहीं बचा रखा बल्कि संवादात्मक और संवेदनात्मक उपायों से भी बचा रखा है.

    किन्तु हम मोदी युग में हैं. सारे पाठ ही किसी और दिशा को प्रस्तावित हैं. भाषिक व व्यवहारपरक वाचालता इस युग की प्रमुख प्रवृति बन गई है.

     

  • ह्यूमर

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    एक दृश्य यह है कि डेविड लेटरमैन एक छत से नीचे झाँक रहे हैं और कहते हैं कि अमेरिका में जेनरेटर तब चलता है जब बिजली के तार पर कोई पेड़ गिर गया हो. वे फिर यह भी कहते हैं भारत में इतने डीजल जेनरेटर हैं कि पूरे ऑस्ट्रेलिया को बिजली की आपूर्ति की जा सकती है. सौर ऊर्जा की विशिष्टता बताने के लिए वे कहते हैं कि देखो, मैं इसे छू सकता हूँ और कोई खतरा नहीं है. मैं अपना सर इसके नीचे रख सकता हूँ.

    डेविड लेटरमैन नेशनल जियोग्राफिक के डाक्यूमेंट्री सीरिज ‘इयर्स ऑफ़ लिविंग डेंजरसली’ के लिए तब भारत में थे और जलवायु परिवर्तन व ऊर्जा के उपयोग पर भारत की दशा दिशा का आकलन कर रहे थे. प्रसिद्ध पूर्व टीवी होस्ट और कॉमेडियन डेविड लेटरमैन ने इस क्रम में प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू भी लिया था और इंटरव्यू के बाद कहा कि मैं उम्मीद कर रहा था कि वे आज रात मुझे यहीं रुक जाने को कहेंगे.

    डोनाल्ड ट्रम्प के दावेदारी के तुरंत बाद डेविड ने एक मंच से यह टिप्पणी की – ‘’मैं सेवानिवृत हुआ …मुझे कोई अफ़सोस नहीं है, मैं खुश था. मैं कुछ वास्तविक दोस्त बनाऊंगा. मैं आत्मतुष्ट था. संतुष्ट था. तृप्त था, और फिर कुछ दिन पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने यह कह दिया है कि वे राष्ट्रपति पद के लिए खड़े हो रहे हैं. मुझसे जीवन की सबसे बड़ी भूल हो गई है.’’

    इसी हफ्ते डेविड को ‘मार्क ट्वेन प्राइज़ फॉर अमेरिकन ह्यूमर’ दिया गया है.

    अमेरिकन ह्यूमर

    प्रत्येक देश में हास-परिहास की अपनी भाषिक संस्कृति होती है जो अभिव्यक्ति के तरीके पर निर्भर होती है और यही उसे विशिष्ट बनाती है. अमेरिकी ह्यूमर के पितामह माने जाते प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘’अमेरिकी हास-परिहास फ्रेंच, जर्मन, स्कॉच या अंग्रेज हास-परिहास से बिल्कुल अलग है. और यह अंतर अभिव्यक्ति के तरीके का अंतर है. भले इसकी उत्पत्ति अंग्रेज ह्यूमर से हुई है लेकिन अमेरकी ह्यूमर अनूठा है. सिद्धांततः जब कोई अंग्रेज लिखता है या कहानी सुनाता है तो हास्य बिंदु पर जोर देता है और विस्मयादी का प्रयोग करता है. कहानी कहने वाला अमेरिकी ऐसा नहीं करता. वह ह्यूमर से होने वाले प्रभाव से प्रकटतः बेपरवाह बना रहता है.

    भारतीय परंपरा में हास-परिहास के दो अद्वितीय लोकचर्चित किरदार हुए. तेनाली राम और बीरबल. तेनाली राम राजा कृष्णदेव राय के दरबार के अष्टदिग्गजों में से एक थे और प्रसिद्ध कवि थे. लोक में उन्हें ‘विकट कवि’ के रूप में प्रतिष्ठा हासिल है जिसका ढीला ढाला अर्थ विदूषक या मसखरा है. राजा बीरबल अकबर के दरबार में थे और अपनी हाजिरजवाबी के लिए लोकचर्चित हुए. एक प्रकार से कह सकते हैं कि भारतीय परंपरा का ह्यूमर भाषाई सौष्ठव या अभिव्यक्ति के तरीके के बजाय सहज बुद्धि के त्वरित प्रयोग व वाकपटुता से अधिक प्रेरणा लेता रहा. यूँ भी भारतीय अभिव्यक्ति परंपरा में हाव-भाव अभिनय, बोलने या चुप रहने के तरीके और भाषा के इस्तेमाल के बजाय कहे गए ‘कंटेंट’ पर अधिक जोर रहता है.

    एक कथा है कि नेहरु सीढियां उतरते लडखडा गए तो राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें संभाला. नेहरु ने शुक्रिया कहा कि आपने संभाल लिया. दिनकर ने जवाब में कहा कि राजनीति जब भी लड़खड़ाएगी तब साहित्य उसे सहारा देगा. यह भारतीय ह्यूमर का एक क्लासिक उदाहरण है. एक और कथा में नेहरु संसद में देश को हौसला दे रहे थे कि चीन द्वारा हड़प ली गई भूमि में यूँ भी कुछ नहीं उगता. इस पर महावीर त्यागी ने तुरंत जवाब दिया कि आपके सर पर भी कुछ नहीं उगता तो क्या इसे किसी और को सौंप दिया जाए.

    हास-परिहास में फोर्मेट की भी अपनी विशेष भूमिका व योगदान है. यह फोर्मेट भी कई स्तरों पर निर्मित होता है और फोर्मेट के भीतर कई दूसरे फोर्मेट देखे जा सकते हैं. परदे की कॉमेडी, साहित्यिक व्यंग्य, हास्य कविताएं, राजनीतिक कटाक्ष और रोजमर्रा के आम जीवन में प्रासंगिक लोककहावतों के साथ दर्शाया जाता हास-परिहास मूल में अलग अलग प्रवृतियों व प्रभाव को प्रकट करता रहा है. इनके बीच का अंतर निश्चय ही किसी बौद्धिक अवलंब के बिना पर देखा जा सकता है. एक ही फिल्म में कॉमेडियन, हीरो-हीरोइन और विलेन द्वारा प्रस्तुत हास-परिहास में एक साफ़ अंतर दीखता है. एक ही साहित्यिक व्यंग्य में लेखक के सवाल और किसी किरदार के जवाब से दो अलग तरह का ह्यूमर-इफेक्ट पैदा होता है.

    मेरे हिसाब से भारतीय ह्यूमर का प्रतिनिधित्व एडिटोरियल पन्ने पर लिखने वाले हमारे कुछ स्तंभकार कर पाते हैं. कुछ प्रतिनिधित्व वरुण ग्रोवर एवं अन्य कुछ स्टैंडअप कॉमेडियन कर पाते हैं वरना यह ‘’आर्ट’’ हम कुछ तो जरुर खो रहे हैं.

    भारतीय ह्यूमर का सबसे अधिक संक्रमण इन दिनों राजनीति व न्यूज़ मीडिया में देखने को मिल रहा है. वे जैसे किसी कुंठा से उत्पन्न होते हैं और किसी मनोविनोद के बजाय एक कड़वाहट छोड़ने पर समाप्त हो जाते हैं. संसद में कई बार किसी सदस्य के वक्तव्य में उत्कृष्ट ह्यूमर नजर आ जाता है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और हमारे सबसे बड़े प्रधानमंत्री उम्मीदवार ज्यादातर बार हल्के चुटकुले या चुभते कटाक्ष पर ही अपनी प्रतिभा समाप्त कर लेते हैं और बौद्धिक चर्या का मनोविनोद प्रस्तुत नहीं कर पाते.

    अभिव्यक्ति का एक अन्य संकट ‘रेस्पोंसिबिलिटी’ का है. मुझे डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक बात बेहद पसंद आई थी जो उन्होंने एक निजी संवाद में कही थी. उन्होंने कहा कि ‘सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ के साथ लेखक में या किसी भी प्रतिनिधि या व्यक्ति में ‘सेन्स ऑफ़ रेस्पोंसिबिलिटी’ भी अवश्य हो, तब असल आनंद है.

    चर्चित कवि श्री मंगलेश डबराल को किसी किरदार की तरह रखते हुए अब मैं कुछ उदाहरण दूंगा :-

    1. ह्यूमर : मंगलेश डबराल मुझसे तीन बार टकराए और तीनों बार एक ही तीन सवाल पूछे – कि मैं कैसा हूँ, कहाँ रहता हूँ, और क्या करता हूँ. तीनों बार उन्होंने मंच से मोबाइल, टॉर्च और पहाड़ तीन कविताएं सुनाई.
    2. व्यंग्य : वे पहाड़ से कुछ कविताएं लिए आए थे, दिल्ली में बात नहीं बनी, इन दिनों वे फिर कविताओं के लिए पहाड़ की ओर ताक रहे हैं.
    3. कटाक्ष : डबराल कैंप के कवियों में (कवयित्रियों में भी) बची रहे थोड़ी सी लज्जा.
    4. फूहड़ता : वे थोड़े लंप (हिंदी और अंग्रेजी इनिशियल) किस्म के व्यक्ति हैं.
    5. हास्य : वे श्री प्रभात रंजन से हिंदी में नाराज हुए और श्री वीरेन्द्र यादव से अंग्रेजी में उनकी शिकायत करने लगे.

     

  • ‘एज इट इज़’ देखने का अभाव

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    मैं शोर और विशेषज्ञों के विश्लेषणों पर बहुत ज्यादा यकीन नहीं कर पाता. भारतीय सन्दर्भ में नीति विषयों पर तो इन विशेषज्ञों के अटकलों, अनुमानों और सुझावों को मैंने कभी भी काम लायक नहीं पाया है. मुझे उनके विचार बेहद किताबी लगते रहे हैं. चीजों को ‘एज इट इज़’ देखने के बेहद जरुरी मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का उनमें अभाव दीखता है. वे हमेशा कुछ विशेष ढूंढ लाते हैं और विशेष सलाह देने लगते हैं.

    यह कहानी मोदी के दंभपूर्ण हुंकार से शुरू हुई कि वे पाकिस्तान को अलग थलग कर देंगे. मुझे तब भी यह बात हास्यास्पद लगी थी. अब इन दिनों भारतीय चिंताकार भारत के ही अलग थलग पड़ते जाने पर लेख लिख रहे. मुझे यह बात भी हास्यास्पद लग रही है.

    गधे की अपनी उपयोगिता होती है और घोड़े की अपनी.

    पहले पाकिस्तान पर ही आते हैं. पाकिस्तान एक लगभग फेल्ड स्टेट की स्थिति में है. उसकी यह स्थिति ही उसे दक्षिण एशिया में सबसे अधिक प्रासंगिक बना देती है. पाकिस्तान अमेरिका या चीन के जैसे काम आ सकता था/है, वैसा कोई अन्य देश नहीं आ सकता. अमेरिका के पाकिस्तान से कुछ दूर होते ही रूस ने भी इसलिए अपनी रूचि दर्शा दी है. भारत संप्रभुता का प्रश्न उठा बेल्ट एंड रोड समिट को स्कीप करता है, और पाकिस्तान संप्रभुता को ही दाँव पर लगा सीपेक को बी एंड आर का फ्लैगशिप बनाने में योगदान करता है.

    भारत की शक्ति उसका आर्थिक आकार और उसका बाज़ार है. विश्व की रूचि भारत में इस कारण है. इस रूचि का परित्याग विश्व किसी भी कारण क्यों करेगा. चीन-भारत आर्थिक संबंध के वॉल्यूम को ही देख लें और उसका चीन की ओर झुकाव देख लें तो भारत ऐसा घोड़ा नहीं है जिसपर दाँव खेलने से चीन कभी भी पीछे हट जाएगा. रूस पर भी यही गणित लागू होता है. अमेरिका की भारत में बढ़ी रूचि का स्ट्रेटजिक गणित है और इसपर जाहिर ही हमारे चिंताकार फिलहाल चिंतित नहीं होंगे.

    अमेरिका चीन रूस को पाकिस्तान जो सुविधाएं व सेवाएं दे सकता है, वह क्या संप्रभु भारत कभी दे सकता है ? आसान गणित है.

    हाल यहाँ यह है कि हम यहाँ अपने ही टाटा को स्वदेशी प्लांट लगाने के लिए जमीन देने में मार मचा देते हैं जबकि पाकिस्तान अपनी हजारों एकड़ कृषिभूमियां चीन को खेती के प्रयोग के लिए सौंप रहा है.

    एज इट इज़. ऐसा ही है. नैसर्गिक बनते बदलते समीकरण. दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान अपनी इस विशिष्ट स्थिति का ही उपभोग करते रहेंगे. मोदी हुंकार से न पाकिस्तान अलग थलग पड़ेगा, न ही किसी बैकफायर से भारत अलग थलग पड़ेगा.

    भारतीय चिंताकार अधिक चिंतित इस बात पर भी दीखते हैं कि भारत के छह पड़ोसी बी एंड आर से चीन से भारी निवेश पाएंगे और भारत वंचित रहेगा. ये प्रायः इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी मद के निवेश हैं. प्रश्न है कि हम चीन से इसी शर्त और श्रेणी का निवेश लेने को कितने उद्यत हैं. जिनपिंग ने गुजरात में हमसे पिछली मुलाकात में जितने निवेश का वादा कर रखा, क्या उसे खींच लेगा ? रूठ जाएगा हमसे ? निवेश करना लाभ का व्यापार करना है, खैरात नही होता.

    अब आते हैं रणनीतिक मसले पर. वैश्विक महत्वाकांक्षा जी रहा चीन भारत के किसी भी अवरोध से यदि नाराज होता है तो उसके पास आजमाने को क्या विकल्प हैं ? हमारी दुखती रग पाकिस्तान को थोड़ा और सहला देना ? इस उस मंच पर हमारे प्रवेश को थोड़ा बाधित कर देना ? किन्तु चीन का यह रुख तो मोदी-जिनपिंग के अच्छे दिनों से ही जारी है. युद्ध ? चीन को युद्ध करना हो तो दलाई लामा का बहाना ही पर्याप्त है.

    मैं अभी एक चिंताकार को पढ़ रहा था एक्सप्रेस में. वे इतने भयभीत और उत्तेजित दिख रहे हैं कि अभी ही सरकार को पांच सौ प्रकार के नये प्रोजेक्ट शुरू करने की सलाह दे दी. मतलब कि वे तैयार बैठे थे कि एक जिनपिंग आएगा, जो स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की रणनीति आजमाने के बाद जब सशंकित होगा कि उसकी मनोवृति पकड़ में आ रही है तो फिर ओबीओआर आजमाएगा, और इस दरम्यान भारत यूँही बस बैठा रहेगा, और फिर वे अपनी सलाह दे सकेंगे.

    अतीत में भी नाटो सिएटो फलना चिलना रूस अमेरिका में हमारे चिंताकारों ने यूँही वक्त जाया किया जबकि भारत ने अपनी आर्थिक/रणनीतिक राह उनके अटकलों अनुमानों सुझावों से परे जाकर पकड़ी और औसत से अधिक सफल भी रहा.

     

  • ‘कविता का जोखिम’

    Shayak Alok

    ‘कविता का जोखिम’ विषय पर हिंदी अकादमी, दिल्ली के मंच से दिया गया मेरा वक्तव्य – शायक

    [themify_hr color=”red”]

    मैं भी लिखकर लाया हूँ. अभी रवीश कुमार पुरस्कार लेने गए थे तो कहा कि ‘उम्र हो गई है तो सोचा कुछ लिखकर लाते हैं.’ उसके बाद उन्होंने कविता की भाषा में कुछ भारी बातें कहीं. घड़ी की टिक टिक. आहट. ब्लाह ब्लाह. भाषण लिखकर ले जाना अच्छा ही होता है. इससे भटकने और दुनिया को भटकाने पर कुछ रोक लग सकती है.

    अभी आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि मैं रवीश कुमार पर व्यंग्य कर रहा रहा हूँ और कुछ लोग सोच रहे होंगे कि लगता है ये महाशय भी एनडीटीवी प्रकार के बुद्धिजीवी हैं. इस समय का सबसे बड़ा जोखिम यही है कि एक कवि भी अपना मुंह खोले तो उसे सामने लगी दो कतारों में से एक में खड़ा कर दिया जाता है. कविता का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि ऐसी तय कतारों के बीच कविता अपनी सुसंगत जगह कैसे बनाए.

    कविता के जोखिम पर अकादमिक भाषा व परिभाषा में एक युवा कवि के पास निर्णयपूर्वक कुछ कह सकने की सुविधा बेहद कम है. मेरे पास संशय अधिक है कि साध्य क्या है और हमें कौन से टूल्स आजमाने हैं. इसलिए मैं आपका बेहद कम समय लूँगा और कुछ उलझी हुई बातें ही कहूँगा. सबसे पहले तो कविता की परिभाषा का ही संकट है जहाँ एक सुविज्ञ अध्येता एक परिभाषा गढ़ता है तो दूसरा उसपर दूसरे प्रकार की आपत्तियां लादता हुआ उपहास करने लगता है. आप नामवर सिंह, डा. नगेन्द्र और जगदीश गुप्त के नाम यहाँ रख लें. मैंने पढ़ा कि ‘जकड़ी जा रही सभ्यता में कला की स्वायत्तता का प्रश्न ही कला का जोखिम है.’ अगर स्वायत्तता की आधारभूमि को हम केंद्र में रख भी लें, कि यह कला या कविता का सबसे बड़ा जोखिम है, तो इस स्वायत्तता की परिधि का ठीक ठीक निर्धारण कठिन है. पहला संकट, कि बहस स्वायत्तता तक ही नहीं ठहरी हुई है.

    एक दूसरा विचार सापेक्षिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता का है. इसमें भी सुधार व आदर्श की गुंजाइश की मांग रखते हुए स्वयत्तता अर्थात ऑटोनोमी, को अस्मिता अर्थात आइडेंटिटी से स्थानापन्न कर देने का प्रस्ताव है. अब अस्मिता को लेकर संकट यह है कि इसका सृजन मनुष्य अपनी आत्मचेतना के अंदर करता है, इसलिए वह सपनों व आकांक्षाओं में भटकती रहेगी. हेगेल ने अस्मिता के बारे में यह कह रखा है कि अस्मिता हमेशा दूसरों के विरुद्ध होती है. इससे एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जहाँ दूसरे को नष्ट कर हम सम्पूर्ण बनना चाहते हैं लेकिन दूसरा नष्ट होता है तो उसके बिना हमारा ही अस्तित्व नष्ट हो जाता है. यह बात निर्मल वर्मा ने कही है. सापेक्ष स्वायत्तता का हिंदी विचार नामवर सिंह ने लोकप्रिय कराया है. बीच में अशोक वाजपेयी यह प्रस्ताव लेकर आए हैं कि कविता की स्वायत्तता का आग्रह उसे राजनीति या जनजीवन से विमुख करना नहीं है और इसलिए वे कविता के लिए राजनीति सी किसी सत्ता या समकक्षता की मांग रखते हैं. किन्तु यहीं फिर वे राजनीति को उपलब्ध प्रणाली, ढांचे या व्यवस्था पर कोई विचार नहीं करते और कविता के जोखिम के किसी प्रश्न से उलझते हुए सीधे ‘इधर के कवियों में बौद्धिक ठसपन और एंद्रियता के अभाव’ की शिकायत करने लगते हैं.

    आर्ट या आर्टफॉर्म के जोखिम को फिर आइडियोलॉजी के रु ब रु देखा गया है. चेतना के परिप्रेक्ष्य में आइडियोलॉजी को एकमात्र चुनौती कला से ही मिलती है क्योंकि वह स्वतंत्र स्थिति की आकांक्षा रखती है, लेकिन ऐसा करने पर फिर कला ही संदिग्ध हो उठती है क्योंकि उससे आइडियोलॉजी की कथित पवित्रता भंग होती है.

    इसी प्रकार कविता के जोखिम को हम फिर प्रासंगिकता और उपादेयता से समझने का प्रयास करते हैं. कला की प्रासंगिकता बढ़ी है क्योंकि आधुनिक युग में मनुष्य की स्वतंत्रता गहन संकट में है, लेकिन विरोधाभास यह है कि कला ने अपनी स्वतंत्रता का स्वैच्छिक परित्याग कर खुद को किसी फ्रेम में जकड़ लेना स्वीकार कर लिया है. आइडियोलॉजी एक फैशन की तरह भी कविता पर हावी हुआ है कि चलन में यही है तो यही लिखते हैं. निर्मल वर्मा आह भरते हुए कहते हैं कि जिनके पास शब्द हैं उनके पास सत्य नहीं और जिनके पास अपने असहनीय अनुभवों का सत्य है, शब्दों पर उनका अधिकार नहीं.

    कविता के जोखिम से जुड़े विषयों पर गोएटे, फाकनर, हेगेल, मार्क्स, कैसिरर, फ्रायड, विटगेन्सटाईन आदि के हवाले से बहुत सी बातें कही जा सकती हैं लेकिन मुझे संशय है कि फिर भी कविता के जोखिम के इस प्रश्न को अंतिम-अनंतिम तरीके से सुलझाया जा सकता हो.

    बातें हैं बातों का क्या !

    यह ऐसा है कि एक मछली की कहानी में कई मछलियाँ उसे तैरने का पाठ देती रहीं. अथाह जल में नहीं जाना, उथाह तल पर नहीं आना. हरे रंग से डरना. लाल पर भरोसा मत करना. मैंने एक दिन श्री प्रभु जोशी से पूछा कि आखिर में उस मछली का क्या बन पड़ा ? उन्होंने कहा कि एक नए विमर्श में उसपर खोज जारी है, अभी वह मछली ही नहीं मिल रही.

    कुछ दिन पूर्व विश्व कविता दिवस पर मैंने चिली के प्रसिद्ध कवि निकानोर पर्रा की एक कविता का अनुवाद किया जो नवोदित कवियों को संबोधित है.

    जैसे तुम्हारा मन हो वैसे लिखो
    किसी भी शैली में जो तुम्हें पसंद हो

    बहुत खून बह चुका इस पुल के नीचे
    महज इस भ्रम के नाम पर
    कि केवल एक ही रास्ता है जो सही है

    कविता में सबकुछ स्वीकृत है

    बेशक लेकिन लिखो तो केवल एक शर्त पर
    कि खाली पन्ने को भरोगे तो बेहतर से भरोगे.

    मेरे लिए कविता अपने बोध और अनुभूति से की गई संवाद की एक क्रिया है क्योंकि मैं खुद को सबसे पहले एक इकाई मनुष्य और एक नागरिक के रूप में देखता हूँ. मेरे सामने कविता का सबसे बड़ा जोखिम मेरे खुद के बचे रहने का जोखिम है क्योंकि समय का इतिहास लगातार एक संक्रमण से गुजरता हुआ जब मेरे समय तक पहुंचा है तब राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक रूप से पूरा विश्व एक बिसुबियस क्रेटर पर बैठा नजर आता है. इस प्रकार प्रत्येक इकाई मनुष्य, और नागरिक के ऐतिहासिक संवाद की जिम्मेवारी बढ़ गई है.
    हम एक दृश्य जगत में जीते हैं तो हमारी प्रकट चुनौतियाँ सर्वप्रथम इस दृश्य जगत की चुनौतियाँ ही हैं और हमें हमारे हथियारों या उपस्करों के साथ इसका तात्कालिक मुकाबला करना है.

    मैं कविता के जोखिम के प्रश्न को कविता के अंदर का प्रश्न नहीं रखना चाहता. मैं इसे चेतना-अवचेतना के गुह्य कक्षों से नहीं गुजारना चाहता. न ही मैं इसे महान पवित्रता के किसी अखंड दरवाजे की तरह समय के तोप के आगे निरीह छोड़ देने के पक्ष में हूँ. मैं कविता और साहित्य को संवाद और संदेश के माध्यम के रूप में देखना चाहता हूँ जो दृश्य जगत की समस्याओं से सीधे वार्तालाप में सक्षम हो. मैं सिनेमा की तरह इस माध्यम के विस्तार के पक्ष में हूँ.

    अगर कविता का सबसे बड़ा जोखिम अपने लिए स्वायत्तता की तलाश ही है तो हमें इसके लिए एक स्थूल व्यवस्था का निर्माण करना होगा. हमें उस व्यवस्था के संचालन के लिए ईमानदार स्थितियों की रचना करनी होगी. हमें लेखक संगठनों की भूमिकाओं का विस्तार करना होगा. अकादमी-विश्वविद्यालयों-संस्थानों और संगठनों के बीच एक संवादपरक व सहयोगपरक समन्वय की राह जाना होगा.

    पिछले वर्ष मैंने श्री उदय प्रकाश को एक चिट्ठी लिखी और उनसे आग्रह किया कि पुरस्कार कोई कृपा नहीं हो बल्कि एक युवा प्रतिनिधि संवाद स्वर चुनने की इच्छा हो जो हमारे साथ या हमारे समानांतर हांक लगा सके.

    युवाओं के लिए उपलब्ध, चिन्हित होने के जो भी मौके हैं, वहां मैंने लोकतांत्रिक और सुगढ़ प्रक्रिया की अपेक्षा रखी. मैंने कहा कि साहित्य में नोबेल का उदाहरण हमारे सामने है तो हम इस प्रकार से चयन क्यों नहीं कर सकते कि इस दस को हमने अंतिम रूप से चुना और यह एक पुरस्कृत हुआ. मैंने अपेक्षा रखी कि भारत भूषण का पुरस्कारदाता अपनी प्रस्तावना लिखे तो उसमें जिक्र करे कि पिछले वर्ष उसने किन किन युवा कवियों की कौन कौन सी कविताएं पढ़ अपने अंतिम निर्णय को चुना. मैंने यह प्रस्ताव दिया कि उसके लिए खुद चुन सकना कठिन हो तो वह कविताएं आमंत्रित ही कर ले. बेढब व्यवस्था की सवारी करती कविता दूसरी सत्ताओं से आदर्श की मांग कैसे कर सकती है?

    प्रतिनिधित्व का महत्व है. आवक पीढ़ी को चिन्हित करने का भी. कविता का जोखिम नई प्रतिनिधि पीढ़ी को तैयार करना है. हम इसे कविभरोसे नहीं छोड़ सकते कि वह जो पाए अपनी खुद की गोटियाँ फिट कर पाए. आपकी इच्छा है कि कविता राजनीति सरीखी कोई स्वायत्त सत्ता हो और आपका योगदान यह कि आप शोरशराबे के साथ एक बेकार का मजमा जुटाते है, कोई ढांचा बनाने की कोशिश नहीं करते.

    दो वर्ष पहले अशरफ फ़याद का मामला सामने आया. अशरफ फ़याद फिलिस्तीनी मूल के युवा कवि हैं और सऊदी अरब में रहते हैं. सऊदी सरकार ने ईशनिंदा के आरोप में उन्हें बंदी बना लिया और फांसी की सज़ा सुना दी. पूरी दुनिया में इस सजा पर लेखकों के प्रोटेस्ट सामने आ रहे थे. लेकिन दिल्ली हमारी चुप थी. हिंदी में सबसे पहले इस विषय को केरल से कवयित्री रति सक्सेना ने उठाया. मैंने फ़याद की अंग्रेजी अनुवादक मोना करीम से संपर्क किया और पहली बार अशरफ की दस क्रांतिकारी कविताओं को हिंदी में लेकर आया. और हिंदी की प्रतिक्रिया ऐसी कि फेसबुक पर घूम घूमकर कवयित्री से दिवाली विशेषांक के लिए कविताएं मांगने वाला हमारा बड़ा कवि-संपादक इस संवाद के प्रकाशन में कोई रूचि नहीं रखता !

    निराशा होती है. बहुत बहुत निराशा होती है. बहुत निराशा होती है कि 2014 के विकल्पहीन वैचारिक विप्लव काल के बाद जहाँ कविता की आक्रामकता हमारा प्रतिनिधित्व करती, वहां आप हमपर अर्थविहीन बिंबों और कविता की खिलंदड़ी को थोप देते हैं. हम हिंदी के लोग बचपन से नीरो को कोसते बड़े होते हैं कि रोम जल रहा था तब वह बाँसुरी बजा रहा था, लेकिन जब हमारे घर आग लगी तब हम खुद बाँसुरी सुनने में लग पड़े. तो मैं बेहद जोर देकर कहता हूँ कि कविता का जोखिम कवियों और कविताओं की इस आंतरिक दुनिया के धैल बेईमान बोध और समीकरण को ध्वस्त करना है.

    कविता को एक बड़ा खतरा उसकी नष्ट होती जाती स्वीकार्यता से भी है. हमने अखबारों में कितनी ही भाग जाती लड़कियों की खबरें पढ़ी. लेकिन हम उन लड़कियों की संवेदना से तब गहरे जुड़े जब आलोक धन्वा ने भागी हुई लड़कियां लिखी. हमने हताशा में बैठे हुए किसी किरदार को उतनी गहराई से यूँ नहीं महसूसा जैसा विनोद कुमार शुक्ल के हाथ बढ़ाने के बाद महसूसा. कविताएं, ख़बरों और दृश्यों की संवेदनात्मक पुष्टि थी. वह असर खोता जा रहा. सोशल मीडिया के आगमन के बाद कविताएं भी रोजमर्रा के पोस्ट की तरह लिखी जा रहीं और हम कविताओं को रोजमर्रा की ख़बरों की तरह देखते हुए गुजर जा रहे. कविताएं जैसे सिंथेटिक उत्पाद भी बन गई हैं जहाँ प्रथम पुरुष के साथ दुनिया के तमाम इतर पीड़ा का रोज़ाना उत्पादन किया जा सकता है. ऐसी पीड़ा किसे झकझोरेगी जिसका कर्ता उस पीड़ा से दूरस्थ संबंध रखता है.

    मैं अपने युवा साथियों से भी संबोधित होना चाहूंगा कि वे एक दूसरे की कविता को किसी साझा उपलब्धि की तरह देखें और जो कविता, समय से खुले मुठभेड़ में रत हो, तुरंत आकर उसका कंधा थाम लें, ताकि वह लड़खड़ा जंग न हार जाए.

    कवि हूँ मैं, तो अंत में एक कविता से ही अपनी बात समाप्त करूँगा. यह कविता संवाद के जोखिम पर है जो मेरे चिरंतन संशय के साथ ही समाप्त हो जाती है. चिरंतन संशय ने नीत्शे को पागल कर दिया और टालस्टाय ने अपने अंतिम दिनों में पूछा कि – क्या कला का कोई अर्थ है?

    अंत में यही होगा बहुत से बहुत कि
    तुम उठा डाल दोगे मुझे पागलखाने में
    एक बयान जारी कर कहोगे कि नहीं था यह किसी के पक्ष में
    न लाल हरा न नीला केसरिया !
    कि इसने मुझे भी
    मेरे विरोधियों को भी गालियाँ बकी
    कि प्रेस वार्ता के बाद के शराब भोज में
    मुझे जानने वाला संपादक तुम्हारे कान में कहेगा-
    ‘ ठीक किया .. अजब पागल था ‘

    वे जो मुझे कनखियों से देखते हैं
    जो इस दौरान चुप थे, रहे थे ताक में
    मुस्कुराएंगे
    वे जो कविताएं लिखते हैं, मेरी कविताएं चबाएंगे.

    यह भी होगा कि
    पागलखाने की सलाखों से मैं हंसूंगा तुमपर
    कुछ और ही जोर से, और चिल्लाऊंगा
    और तुम्हें लिखेंग चिट्ठियाँ वे कुछ
    जो मेरी तरह शोक में थे ऐसे संक्रमित समय पक्ष के

    अंत में यह होगा कि तुम्हारे तमाम पक्षों के खिलाफ
    मेरे पक्ष की संख्या में इजाफा होगा
    या यह होगा कि इस मुल्क में
    पागलखानों की तादाद बढ़ानी होगी तुम्हें.

     

  • शांति वाया कश्मीर

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    शांति धमाके से आएगी
    गोलियों की दनदनाहट
    और विशाल नरभक्षी गिद्धों की फड़फड़ाहट से आएगी

    दुनिया का जोर गणित है
    कि एक और आखिरी शोर
    और शांति आ जाएगी

    वरना इसके लिए अनवरत संघर्ष का वादा है

    अनुमान है कि शांति आएगी
    तो दबे चुपके पांव नहीं आएगी

    सीरिया से फ़लस्तीन वाया कश्मीर तक
    शांति आएगी
    हमारे सारे प्रयास मुल्लबिस हैं

    शांति विशाल प्रतिकारी मजमों
    बदले की हत्याओं और
    टीवी की एक्सक्लूसिव रिपोर्टों के बाद आएगी

    धरती नामक गुमशुदा औरत
    देखेगी एक आखिरी मृत चेहरे पर आखिर उभर आया अजूबा
    और हाथ उठा इसकी पुष्टि करेगी

    लटकाये पांव कब्र में एक दरख्त
    सबसे बाद में
    एक और बच्चे के शव को सौंपेगा कुछ फूल
    और देखेगा कि शांति आ चुकी है.

     

  • अल्लां हूं अंकबर अल्लां आ आ आआआआआआआअ ..

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    यूट्यूब पर मैंने कोई विडियो देखी थी कभी जिसमें दुबई के किसी मॉल में कोई एकदम छोटी सी लड़की यूँ ठिठक गई है और मासूम पैरों से जैसे किसी आवाज़ का पीछा कर रही है. वह अज़ान की आवाज़ थी जो पास की किसी मस्ज़िद से आ रही थी. वह वाकई एक सुंदर सुरीली आवाज़ थी. हालांकि उस विडियो का शीर्षक कुछ इस प्रकार का रख दिया गया था – अज़ान की आवाज़ से ईसाई बच्ची सरप्राइइज्ड. सुंदर गायन सा ही अज़ान सऊदी अरब के शाही मस्ज़िद से सुनने को मिलता है. मैं एकबार हौज़ख़ास में प्रत्यूष के कमरे पर बैठा था, तब भी इतनी ही सुंदर आवाज़ सुनी थी और प्रत्यूष से इसका ज़िक्र किया था.

    लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. हमारे आसपास की मसाज़िद के बेसुरे मुअज़्ज़िन सच में ऐसी टेर लगाते हैं कि पहली इच्छा यही होती है कि ख़ुदा अभी इस मस्ज़िद पर आंधी-तूफ़ान-बिजली के रूप में अपनी करम बरसा इस व्यक्ति की आवाज़ को कंठ में ही दबोच ले. अलसुबह की अज़ान तो और भी अप्रिय लग सकती है.

    अल्लां हूं अंकबर अल्लां आ आ आआआआआआआअ ..

    बेगूसराय में हमारे मोहल्ले की अज़ान सुन एकाध बार मैंने विचार किया कि अज़ान के लिए मुअज़्ज़िन का चुनाव करने में शायद वे इस बात पर विचार करते हैं कि कौन अपनी नाक सबसे अधिक हुनर से दबाकर आवाज़ निकाल सकता है या किसकी आवाज़ अल्लाह ने ऐसी ही बनाकर ज़ुल्म करने को धरती पर भेजा है.

    खैर यह तो एक बात हुई.

    दूसरी बात यह हुई कि मुझे एक ऐसी लड़की से इश्क़ हुआ जो दिन में फ़ोन ही नहीं कर पाती थी. वह देर रात की फुसफुसाहट में मुझे फ़ोन करती और उसकी आधी बातें मुझे सुनाई ही नहीं पड़ती. मुझे व्हिस्प्रिंग वाला संवाद सिर्फ तब पसंद है जब हम दैहिक क्षणों में इतने क़रीब हों कि आवाज़ थोड़ी भी तेज़ हो तो देह की लय टूटती हो. उसने सामान्य आवाज़ का जो अवसर तलाशा वह शाम का समय होता था जब उसकी माँ और बहनें रसोई में व्यस्त हो और वह छत पर आकर मुझसे बात करे. लेकिन अन्याय हुआ यहाँ. मैं उससे रूमानी बातें करने की कोशिश करता और कोई द्वारपालों को कह रहा होता कि भाई कन्हैया से कह दो कि हम मिलने आए हैं. उसने मुझे बताया और मैंने सुना कि प्रतिदिन 7-9 और 5-7, चार घंटे यूँही कोई चिल्लाकर द्वारपालों से बात कर रहा होता या राम बनकर श्याम बनकर प्रभु जी से (प्रभु जोशी नहीं, ईश्वर) आने की विनती कर रही होती. न प्रभु जी कभी आए, न उनकी रोज़ की चिल्लपों बंद हुई, न मेरा इश्क़ परवान चढ़ा. मैं गंभीरता से सोचता हूँ तो उस लड़की से मेरे ब्रेक अप का सबसे बड़ा कारण उसके पड़ोस के मंदिर की कथित धार्मिकता ही रही.

    मैं मुखर्जी नगर इलाक़े में रहता था तो मैंने गौर किया कि हमारे प्रीलिम और मेन्स एग्जाम के तुरंत पहले अचानक से माता रानी के जगरातों की बाढ़ आ जाती थी. भारी चिढ़ में मैं यह सोचकर संतोष करता कि संभवतः हमें एग्जाम पास कराने के लिए यह मोहल्ले वालों का सामूहिक धार्मिक सहयोग है. हालांकि, माता रानी का गणित अधिक तेज़ निकलता रहा. हम फेल होते रहे और उनके ‘यूपीएससी एसपायरेंट’ किरायेदारों की संख्या बढ़ती रही और वे और मोटे होते रहे.

    बहिरकैफ़, ये सब पुरानी झेली हुई कहानियां हैं और इनपर बातें हम करते ही रहे हैं. अभी न जाने देश में कौन सी हवा चली है कि अचानक इन बातों को हमले के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. अब ये बातें किसी राय या विचार सी नहीं लगतीं, बल्कि ऐसा लगता है कि समुदाय विशेष पर हमले के लिए ही इसे खुलकर प्रकट किया जा रहा.

    मैंने कहीं पढ़ा कि कुरआन में ही कहीं यह ज़िक्र है कि ‘तब बोलो यदि तुम्हारा बोलना तुम्हारे चुप रहने से अधिक बेहतर हो.’ सोनू तो सुरीले गायक हैं. वे चार ट्वीट से भी अपनी बात नहीं समझा सकने के बजाय एक ट्विट से ही यह व्यंग्य करते कि मेरे पास की मस्ज़िद मुझे मुअज़्ज़िन रख ले या अत्याचार बंद करे, तो वे ज्यादा असर करते. खैर.

     

  • टुकड़ा टुकड़ा प्रेयसी

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    अपनी पहली भूमिका में वह गुनगुनाती है बेतरह

    अपने होठों को पांच प्रकार से घुमाकर
    पांच तरह की अभिव्यक्ति देती है
    पांच सौ प्रकार के संकेत
    पहले घुमाव से आखिरी तक में मीलों गुजर लेती है
    अतीत के मेरे प्रेम-हादसों की भरी-पूरी ट्रेन
    और मैं बिजली के तारों पर के नीलकंठ गिनता रहता हूँ

    होठों की तीसरी अभिव्यक्ति में ‘ओ’ बनाकर चूमती है मुझे
    मैं महसूसता हूँ मेरे होठों को कांपते हुए
    मेरी पाँचों इन्द्रियाँ जम जाती हैं
    उसके होठों की पांचवीं अभिव्यक्ति में उसके गाल पर गड्ढा बनता है

    दूसरी भूमिका में करवट बदलती है प्रेयसी
    मैं उसके खाली कंधों पर तिल ढूंढने लगता हूँ

    तिल की तलाश का कारवां सुस्त क़दम गुजरता है
    उसके एक एक रोमकूप से प्यास पुकारती है मुझे
    मैं लिखने लगता हूँ चुम्बनों में देह की भूख की पीड़ा
    मेरी भूख बढती जाती है
    उसके पेट का वलय सिहरन में प्रतिध्वनित होता है

    कलपती है प्रेयसी ..
    ‘बस शरीर नहीं हूँ मैं’ का हुंकार भरती
    अपनी तीसरी भूमिका में प्रवेश करती है प्रेयसी ..

    उठाती है वह सदियों के सवाल
    जमा हिसाब मांगती पूछती है प्रेम का प्रयोजन
    बार बार लौट जाती अतीत में मुझे धकिया कर
    मन के दरवाजे की सांकल अन्दर से बंद कर लेती है

    मैं मेरे कान सांकल में दर्ज रुक गयी स्त्री पर लगाकर रखता हूँ
    मैं सूंघता रहता हूँ रुक के बहकते पदचापों को

    उसकी चौथी भूमिका में
    आसमान पर घिर आते हैं हरसिंगार
    चींटियाँ सीढ़ी लगा हरसिंगार के नीचे उतरने की बाट जोहती हैं
    प्यास के कूप फिर पानी से भर आते हैं
    एक एक चींटी सौ सौ बार पानी से मुंह जूठा करती निर्वाण पा लेती है

    इसी दृश्य में मैं हरसिंगार सा महकता रहता हूँ
    वह बदहवास खाली पैर
    मेरी नाभि के गोल गोल घुमती मुझे ढूंढती रहती है

    उसे देखा मैंने फिर लौट जाते उसकी पांचवीं भूमिका में
    बुदबुदाती है स्त्री बने रहने के जादू मंतर
    बालों को कसकर बाँध लेती है
    एक बाल्टी पानी छपाक फेंक रात का फर्श धो देती है
    मेरा भीगना भीग जाता है

    उसकी अंतिम भूमिका में एक नीलकंठ फड़फड़ाता है बेतरह.