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  • जाति-व्यवस्था और राजनीति

    “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”
    साभार- सामाजिक यायावर की किताब (पृष्ठ संख्या 260-261)
    www.books.groundreportindia.org

    हमें एक बात समझने का प्रयास करना होगा कि भारत में लोकतंत्र ठीक से स्थापित हो पाता, इसके पहले ही लोकतंत्र को भारत के लोगों ने ही उपेक्षित करना प्रारंभ कर दिया। शोषक जातियों ने राजतंत्र व कबीलातंत्र खत्म होते ही आजादी के बाद भरपेट मलाई खाने में खुद को व्यस्त किया और भ्रष्टाचार की शुरुआत करके उसे नए आयाम, नयी दिशायें व नयी ऊंचाइयों पर पहुँचा दिया।  यदि जाति-व्यवस्था नहीं होती तो भारत में भ्रष्टाचार की उत्पत्ति नहीं होती।  जाति-व्यवस्था के कारण परंपरा में ही शोषण करना और शोषितों के पुरुषार्थ का हक येनकेन प्रकारेण अपने पास ही रखना, सिखाया गया। यही सामाजिक अनुकूलन 1947 की राजनैतिक आजादी के बाद भ्रष्टाचार का प्रमुख आधारभूत कारक बना। राजनैतिक आजादी के बाद संवैधानिक-आरक्षण मिलने के कारण शोषित जातियाँ हजारों सालों के लगातार भीषण व घिनौने शोषण के बाद पहली बार, खुद को कुछ कुछ मनुष्य जैसा समझने के युगांतर नशे में कई दशक तक जीतीं रहीं। तब तक शोषक जातियों ने राजनैतिक, आर्थिक, धार्मिक व शैक्षणिक सत्ता की खूब मलाई खायी, खूब भ्रष्टाचार किया, जिसके परिणामस्वरूप लोकतंत्र के प्रति लोगों का विश्वास लगातार कमजोर हुआ।

    समय के साथ जब शोषित जातियाँ खुद को कुछ कुछ मनुष्य समझने के युगांतर नशे से बाहर आयीं। तो उन्होंने राजनैतिक सत्ता में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरू की और संख्याबल के कारण धीरे-धीरे शोषित जातियाँ राजनैतिक सत्ता प्राप्ति का आधार बनती गयीं। जब तक शोषित जातियाँ शोषक जातियों के लिए  राजनैतिक सत्ता की प्राप्ति में पिछलग्गू रहीं, तब तक शोषक जातियों को असुविधा नहीं हुई।  उनको समाज में, देश में, व्यवस्था तंत्र आदि में व्याप्त भ्रष्टाचार नहीं दिखा, या यूं कहा जाए कि भयंकर रूप से हो रहे भ्रष्टाचार को देखने की आवश्यकता नहीं लगी।

    1947 की राजनैतिक आजादी के बाद, शोषक जातियों ने शोषित जातियों को अपना पारंपरिक दास मानते हुए उनको राजनैतिक सत्ता से दूर रखा।  संवैधानिक आरक्षण के कारण जब शोषित जातियों के लोग सरकारी तंत्र में प्रवेश करने लगे और राजनैतिक सत्ता के महत्व को समझने लगे तब शोषक जातियों ने शोषित जातियों को बरगला कर अपना पिछलग्गू बनाकर राजनैतिक सत्ता की मलाई का भोग किया। किंतु समय के साथ-साथ ज्यों ज्यों राजनैतिक समझ आने के कारण जब शोषित जातियों ने अपनी राजनैतिक ताकत पहचान कर राजनैतिक सत्ताओं में अपनी सीधी व स्पष्ट दावेदारी पेश करनी शुरु की;  त्यों त्यों शोषक जातियों को व्यवस्था तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। शोषक जातियों को देश में सामाजिक परिवर्तन और ईमानदारी की आवश्यकता भीषण रूप से महसूस होने लग गयी और समय के साथ राजनैतिक व सामाजिक क्रांति की भीषण आवश्यकता की बातें होने लगीं। 

    शोषक जातियों को जाति-व्यवस्था नासूर व सडांध लगने लगी और जातिविहीन समाज की आवश्यकता दिखाई पड़ने लगी। सामाजिक परिवर्तन की लंबी लंबी बातों की आवश्यकता पड़ने लगी। जब तक शोषक जातियाँ आजाद भारत में राजनैतिक सत्ता की मलाई खातीं रहीं;  तब तक उन्हें भारतीय व्यवस्था तंत्रों में हजारों वर्षों से गहरे से व्याप्त न तो भ्रष्टाचार दिखा और न ही भारत की 1947 की राजनैतिक आजादी झूठी लगी।  किंतु ज्यों ज्यों शोषित जातियों ने राजनैतिक सत्ताओं में अपनी दावेदारी पेश करनी शुरु की और मलाई में अपने हिस्से की दावेदारी पेश करनी शुरू की;  शोषक जातियों को भारत की आजादी झूठी लगने लगी और तंत्रों में व्याप्त भ्रष्टाचार दिखने लगा। भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ और इन्हीं के ही इर्द-गिर्द घूमने वाले तत्वों आदि की लिखापढ़ी वाली तथाकथित ईमानदारी तक जबरन लोगों के दिलो दिमाग को संकुचित कर दिया गया।  जबकि भ्रष्टाचार को मुद्रा व बाजार के मौद्रिक लाभ आदि तत्वों जैसे अति-संकुचित दायरे में रखकर बिलकुल भी नहीं समझा जा सकता।  न ही इन तत्वों की शुद्धता के ढकोसलों से सामाजिक परिवर्तन ही किया जा सकता है और न ही इन ढकोसलों से भ्रष्टाचार ही समाप्त किया जा सकता है।

    भारत में राजनैतिक सत्ताओं की प्राप्ति से, कानूनों को बनाने या लागू करने से या जगह-जगह मोमबत्तियों को जलाने से या धरना करने से भ्रष्टाचार नहीं खतम होगा।  क्योंकि भारत में तंत्र नहीं समाज की विशेषाधिकृत जातियों का लगभग हर आदमी करप्ट है, और इस आदमी को भ्रष्ट बनाया “जाति-व्यवस्था” ने। भारतीय समाज में व्याप्त कमजोरियों में सबसे बड़ी कमजोरियों में एक तत्व यह भी है, कि भारत में जो अधिकतर ज्ञान है वह “सापेक्षिक” है;  और अधिकतर “वंशानुगत-भ्रष्टाचार और शोषण” को स्थापित व महिमामंडित करने पर ही आधारित है। इसीलिए समाज की मानसिकता को मनचाही दिशा में अनुकूलित करने के लिए कोई भी तर्क व परिभाषाएं तामझाम करके स्थापित की जा सकती हैं।  इसी चरित्र ने भ्रष्टाचार को संकुचित करने वाली परिभाषाएं गढ़ने में सरलता प्रदान की। जाति-व्यवस्था ही भारत में सर्वव्याप्त भ्रष्टाचार की मूलभूत जनक है और जाति-व्यवस्था सबसे हिंसक सामाजिक-तानाशाही है – यह समझने व स्वीकारने का भ्रूण भी नहीं उत्पन्न होने दिया और भ्रष्टाचार की प्रायोजित संकुचित परिभाषा में ही जड़ कर रख दिया।

    सामाजिक जड़ता भारतीय समाज का मूलभूत चरित्र है।  बहुत लोगों को एक बहुत बड़ी गलतफहमी रहती है कि भारत में तंत्र सफल है या सफल जैसा कुछ है, तभी आजादी के बाद इतने दशकों के बाद भी तंत्र चल रहा है और समाज की स्वीकार्यता के साथ चल रहा है।

    जो जैसा प्रायोजित हो गया उसका वैसे ही बिना प्रासंगिकता मूल्यांकन के चलते जाना, तंत्र के प्रति समाज की स्वीकार्यता न होकर वास्तव में सामाजिक जड़ता होती है। यह सामाजिक जड़ता वाला चरित्र हजारों सालों की वीभत्स व विद्रूप जाति-व्यवस्था का उत्पाद है, जिसमें जन्म-आधारित तिरस्कारों, शोषणों व दासता को दैवीय दंड-विधान मानकर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है। या जन्म-आधारित व्यवस्था के आधार पर स्वयं का दूसरों से श्रेष्ठ, पूजनीय व गौरवशाली होना दैवीय पुरस्कार मान कर नियति के रूप में स्वीकार करके जड़ हो लिया जाता है।

    जाति-व्यवस्था से मुक्त होते ही भारतीय समाज के शोषक व शोषित दोनों ही प्रकार के वर्गों की जातियों में चारित्रिक व गुणात्मक परिवर्तन हो जायेगा। भारत, भारत के लोग व भारतीय समाज सभी वास्तव में स्वतंत्र होगें और खुली हवा में सांस ले पायेंगें। जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना भारत में कभी भी चारित्रिक बदलाव नहीं किया जा सकता है। यदि कोई जाति-व्यवस्था को समूल नष्ट किए बिना, भारत में सामाजिक, आर्थिक व राजनैतिक समाधान व विकास की बात करता है तो वह या तो नासमझ है या सामाजिक धोखा देता है, क्योंकि यह बिलकुल ही असंभव है।

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  • जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के विद्रूप स्तर तक पहुंचाया है

    सामाजिक यायावर

    सैकड़ों सालों तक शोषक जातियों ने अपना अधिकांश जीवन/मानसिक/सामाजिक ऊर्जा समाज के बहुसंख्य को अघोषित दास बनाए रखने में लगाया।  इससे पूरा समाज जड़ हो गया। शोषक जातियाँ भी और शोषित जातियाँ भीं। यदि मानवीयता व सामाजिकता के व्यापक संदर्भों में सूक्ष्मता से देखा जाए तो जाति-व्यवस्था ने शोषक व शोषित दोनों ही वर्गों की जातियों को जड़ता व कुंठा के विद्रूप स्तर तक पहुंचाया है। किंतु शोषक जातियों के लोग अपने विद्रूप अहंकारों और स्व-केंद्रित-स्वार्थ को जीवन का परम-लक्ष्य मानने के कारण, अब भी यह चिंतन करने को तैयार नहीं हैं कि भारतीय समाज भीषण रूप से जड़ हो चुका है, सड़ांध से भरपूर है। और इस सड़ांध के पराकाष्ठा तक पहुंचाने और समाज के लोगों की सोच, मानसिकता, मूल्यों व भावों को जड़ करने व जड़ता में ही बनाए रखने में केवल और केवल जाति-व्यवस्था की परम्परा का ही हाथ रहा है।

    शोषक जातियों को बिना वास्तविक पुरुषार्थ के ही उपलब्ध समस्त विलासिताओं को भोगने की बड़ी भयंकर लिप्सा हमेशा से रही है और आज भी है। और इसी लिप्सा-भोग प्राप्ति के लिए  किए जाने वाले विभिन्न प्रायोजनों को हम सामाजिक परिवर्तन, समाज निर्माण व देश का विकास आदि के लुभावने नामों से प्रायोजित करते आए हैं। यह लिप्सा ही सामाजिक आरक्षण अर्थात् जाति-व्यवस्था का मूलभूत कारण रही और आज भी हमारे समाज की जड़ता के मूलभूत कारकों में से है।

    दुखद है कि खुद को बहुत जागरूक मानने वाले और खुद को सामाजिक चेतनशील मानने वाले लोगों में, जो शोषक जातियों के हैं, अपने स्वार्थ की लिप्सा व जातिगत श्रेष्ठता का अहंकार इतना अधिक है कि वे शूद्रों के प्रति सिर्फ इसलिए  घृणा का भाव रखते हैं, क्योंकि शूद्र सत्ता में दावेदारी की बात करने लगा है और शोषक जातियों की महानता, ज्ञान और योग्यता में सवाल खड़े करने लगा है।

    बिना सामाजिक ईमानदारी के “जाति-व्यवस्था” का पत्ता भी नहीं हिलने वाला। शोषक जातियों की ओर से जब भी जाति-व्यवस्था के विरोध की बात आती है तो केवल दो मुद्दों तक ही सीमित रह जाती है- “ संवैधानिक-आरक्षण “ और “ जाति-व्यवस्था की राजनीति “।  दोनों ही मुद्दे शक्ति व सत्ता प्राप्त करने के अवयव हैं।

    यदि शोषक जातियाँ सच में ही सामाजिक ईमानदार होतीं और जाति-व्यवस्था को खतम करने के लिए थोड़ा सा भी गंभीर प्रयास करतीं तो जाति-व्यवस्था कब की खतम हो गई होती।  शोषक जातियों को केवल अपने अंदर से जाति-व्यवस्था की भावना वास्तव में खतम करनी है। इसके लिए बिना ढोंग के जीवंत रूप में जाति-व्यवस्था की भावना को गहरे से खींचकर खतम करने की जरूरत है। जो ईमानदार व मजबूत इच्छाशक्ति के साथ अपने अंदर गहरे जमी हुई घृणा व जाति-व्यवस्था की श्रेष्ठता के छुपे हुए अहंकार से खुद को बिना किसी ढोंग के बाहर निकालने से ही संभव है।

    जाति-व्यवस्था लोगों के मन में बहुत गहरे स्थापित है जो शाब्दिक भाषणों, परिभाषाओं, लिखावटों आदि से खतम नहीं होगी।  जाति-व्यवस्था का समाधान संवैधानिक व सामाजिक दोनों ही स्तर पर एक साथ ईमानदार प्रयासों से ही संभव है, इसके अतिरिक्त और कोई रास्ता भी नहीं ही है। यह समाधान ही नए समाज, नए देश व नए सामाजिक मूल्यों का निर्माण करेगा …. जो आज के मूल्यों से लाखों-करोड़ों गुना बेहतर व वास्तविक होगें और बिना कपट व धूर्तता के होगें।

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  • रोहित वेमुला को मेरी श्रद्धांजलि – आखिर कितनी मौतों के बाद हम सामाजिक संवेदनशील व ईमानदार होगें

    सामाजिक यायावर

    तब तक हम जाति के घिनौनेपन से नहीं लड़ सकते हैं और परंपरा में अगली पीढ़ियों के बच्चों की हत्याओं या आत्महत्याओं द्वारा समाज की विभूतियों को खोते रहेंगें। शाब्दिक, तात्कालिक व क्षणिक भावुकता से कुछ देर के लिए अपने बच्चों की हत्याओं व आत्महत्याओं पर आंसू बहा देने भर से कोई समाधान नहीं होने वाला। वास्तव में जाति-व्यवस्था ही हमारे समाज की जड़ता, कुंठा, भ्रष्टाचार, भीड़तंत्र, सामाजिक दासत्व व श्रमशीलता को तिरस्कृत करने की मानसिकता का आधारभूत पोषक तत्व है।

    जब तक हम यह बिना किसी लाग लपेट के यह नहीं मानेंगें कि भारतीय जाति-व्यवस्था कर्म आधारित व्यवस्था न होकर, श्रम को तिरस्कृत मानने वाली सामाजिक दासत्व को स्थापित करने वाली व्यवस्था थी और है। क्योंकि परंपरागत ऐसी घिनौनी गुलामी जिसमें गुलाम स्वतः ही अपनी पैदाइश से ही अपने ही माता-पिता, अभिभावकों व रिश्तेदारों द्वारा मानसिक रूप से स्वयं को गुलाम मानने के लिए प्रशिक्षित किया जाए। कभी भी किसी भी परिस्थिति में कर्म आधारित व्यवस्था हो ही नहीं सकती है। कोई भी बेहतर सामाजिक व्यवस्था बिना स्वयं उस व्यवस्था में ही निहित घिनौने बीजों के जाति व्यवस्था जैसी जन्म घिनौनी व धूर्त सामाजिक व्यवस्था की परिणति तक पहुंच ही नहीं सकती।

    भारतीय जाति-व्यवस्था के नियम, विधियां व मान्यतायें आदि ‘श्रमशीलता’ को तिरस्कृत करने के आधार पर स्थापित थे, और आज भी वैसे ही है। शारीरिक परिश्रम करने वाले लोगों को उपेक्षित व तिरस्कृत जातियों में रखा गया, उनके सामाजिक संपत्तियों पर अधिकार नगण्य थे, व्यक्तिगत संपत्ति रखने के, शिक्षा प्राप्त करके विद्वान् बनने के सहज, सरल व समान अधिकार नहीं थे। समाज की मुख्यधारा में उनका कोई स्थान नहीं था। वे शारीरिक श्रम करने वाले, मुख्य सामाजिक व्यवस्था से अलग तिरस्कृत सामाजिक-दास व्यवस्था में रहने के लिए  विवश सामाजिक-गुलाम थे।

    जाति-व्यवस्था के मूलभूत-कारकों को समझने के लिए, हमें जाति-व्यवस्था की उत्पत्ति का मूल्यांकन करना पड़ेगा। जाति-व्यवस्था को कर्म आधारित व्यवस्था मानने का मतलब है कि बहुत सारे ऊलजुलूल, अव्यावहारिक व मनगढ़ंत तथ्यों को, भलीभांति जानते हुए कि वे नितांत ही अपुष्ट व निराधार तथ्य हैं, स्वीकारना पड़ेगा।

    वर्तमान पीढ़ी ही भविष्य की पीढ़ियों की समझ का आधार होती है। हम जो बीज आज बोते हैं, जिन व्यवस्थाओं का निर्माण करते हैं, उनके आधार पर भविष्य की पीढ़ियां अपने जीवन में सामाजिक-अनुकूलन स्वीकारती हैं। इसलिए जाति-व्यवस्था रूपी सामाजिक-दासत्व की व्यवस्था के स्थापना काल में ऐसे नियम व विधियाँ बनाइ गईं; ऐसा साहित्य व इतिहास आदि लिखा व प्रायोजित किया गया कि सामाजिक-दासत्व की यह व्यवस्था शोषक वर्ग द्वारा स्थापित व्यवस्था के स्थान पर ईश्वरीय प्रावधान व मनुष्य के पूर्व-जन्मों के कर्मों की नियति-व्यवस्था प्रमाणित हो।

    धूर्ततापूर्ण चतुराई के साथ प्रायोजित व स्थापित सामाजिक-दासत्व व्यवस्था को समय के साथ पूर्व में रही कर्म आधारित वर्ण व्यवस्था मान लिया गया। चूंकि समाज के बहुसंख्यक ‘अवर्णों’ के पास संपत्ति, शिक्षा, ज्ञान व आत्मसम्मान के अधिकार नहीं थे, और बहुसंख्यक अवर्णों के परिश्रम के उत्पाद पर अल्पसंख्यक सवर्णों का अधिकार होता था, लालच व स्वार्थ के कारण सवर्णों ने जाति-व्यवस्था को और मजबूत ही किया और कालांतर में यह व्यवस्था पूर्व-जन्म के कर्मों पर आधारित दैवीय प्रयोजन व व्यवस्था के रूप में स्वीकृत व प्रमाणित मान ली गई।

    शोषक वर्ग द्वारा प्रायोजित व लिखित ग्रंथों में जो लिखा है उसको ही प्रमाणित मानने के स्थान पर यदि व्यावहारिकता व तर्कों के आधार पर यह स्वीकारते हुए कि मानव व मानव समाज समय के साथ सीखता है और परिपक्वता की ओर गति करता है, तथ्यात्मक विश्लेषण किया जाए तो यह साफ दिखने लगता है कि जाति-व्यवस्था ईश्वरीय व प्राकृतिक व्यवस्था न होकर, मनुष्य-निर्मित बहुत ही सोची समझी, चतुराई व कपट के साथ स्थापित सामाजिक दासत्व की कपटी व्यवस्था थी।

    मानव समाज का विकास और सामाजिक कुरीतियों व समस्याओं आदि का उन्मूलन व समाधान आदि  बिना वैज्ञानिक दृष्टि आधार के नहीं प्राप्त किया जा सकता है।  किसी सामाजिक व्यवस्था की मूल अवधारणा की प्रामाणिकता को उसके विभिन्न तत्वों के आधार पर ही विश्लेषित किया जा सकता है। अवधारणा की प्रामाणिकता को जबरन साबित करने के लिए  सुविधानुसार मनचाहे तत्वों व तथ्यों को ही प्रमाणिक मान लेने से वास्तविक तथ्यात्मक विश्लेषण नहीं हो पाता है।

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  • भाषा

    सामाजिक यायावर

    जोनाथन की माता जी मतलब हमारी साली साहिबा ने हमसे कहा कि मैं जोनाथन से हिंदी में बात किया करूं ताकि उसके मस्तिष्क में हिंदी के शब्द भी उसकी अपनी सहज भाषा के रूप में स्थापित होना शुरू हों। जोनाथन अभी भाषा का प्रयोग नहीं कर पाते हैं लेकिन हम लोगों की बातें समझने लगे हैं और बिना भाषा के ही हमारी बातों का प्रतिउत्तर देते हैं। मुझे बहुत अच्छा लगा उनकी सहजता को देखकर कि उन्होंने अपने पुत्र के लिए हिंदी भाषा जानने की इच्छा मुझसे जाहिर की।

    मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई क्योंकि दिखावटी व खोखले राष्ट्र व भाषा गौरव के कारण मैं उनको ईमानदारी से अपने समाज की भाषा-कुंठा की असलियत बता नहीं पाया। आखिर कैसे बताता कि हमारे देश भारत में अपने उन बच्चों को देखकर माता पिता बलइयां लेते हैं जो बच्चा हिंदी न जानने का ढोंग करता है और अमेरिकन स्टाइल में अंग्रेजी बोलने का बेढंगा ड्रामा करता है। उन रद्दी स्कूलों की फीस बहुत ऊंची होती है जिनकी खासियत सिर्फ यह होती है कि वे स्कूल में और घर में हिंदी की जगह अंग्रेजी भाषा के प्रयोग को प्राथमिकता देते हैं।

    मैंने अपने जीवन में बहुत सारे समुदायों से मिला हूं, बहुतों के साथ काम भी करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है लेकिन हिंदी भाषी लोगों के इतना भाषा कुंठित किसी समुदाय को नहीं देखा। भारत के अंदर भी उड़िया, बांग्ला, तमिल, तेलगू, मलयाली, कन्नड़, पंजाबी किसी समुदाय को देखिए कोई भी उतना भाषा कुंठित नहीं है जितना कि हिंदी भाषी समुदाय भाषा कुंठित है। पढ़ा लिखा तरक्की किया माना जाने वाला हिंदी भाषी समुदाय तो अपने बच्चों को हिंदी का प्रयोग न करने के लिए प्रोत्साहित करता है। खुद हिंदी भाषी ही खुद को दोयम दर्जे का मानता है।

    चलते-चलते यह भी बताना चाहूंगा कि विदेशों में लोग हिंदी या संस्कृत इसलिए नहीं सीखना चाहते कि इन भाषाओं में कोई दिव्यता है या महानता है।हमारे समाज की भाषागत कुंठा का स्तर यह है कि दिव्यता व महानता की फर्जी या तोड़े-मरोड़े तथ्यों के साथ उदाहरणों की बकवास पोस्टें व खबरें सोशल मीडिया व मुख्य मीडिया में सुर्खियों के साथ देखने को मिलती रहतीं हैं।

    दरअसल सच तो यह है कि पाश्चात्य देशों के लोगों को कई भाषाओं को जानने समझने का शौक होता है। वे अपने पूरा जीवन भाषाएं सीखने का प्रयास भी करते हैं। मैं आजतक जितने भी पाश्चात्य देशों के लोगों से विदेशों में मिला हूं वे चाहे मेरे मित्र हों या रिश्तेदार या जानपहचान वाले सभी बिना अपवाद कई कई अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के जानकार हैं।

    हिंदी व संस्कृत भाषा को भी जानने वाले विदेशियों की संख्या तो बहुत ही कम है। जिस भाषा के प्रयोग खुद उस भाषा के मूल समुदाय के लोग ही करने में दोयम दर्जे का महसूस करते हों उस भाषा को प्रतिष्ठित कैसे किया जा सकता है।

    अभी मेरे कोई संतान नहीं है लेकिन जब कभी मेेरे संतान होगी। मैं ऐसी व्यवस्था करने का प्रयास करूंगा कि शैशवावस्था से ही मेरी संतान हिंदी, अंग्रेजी, फ्रेंच, इटैलियन, जापानी व डच आदि भाषाओं को अपनी सहज भाषाओं के रूप में जानना पहचानना सीखे। क्योंकि इन भाषाओं को जानने वाले लोग मेरे निकट आस्ट्रेलियन परिवार में मौजूद हैं। कुछ निकट रिश्तेदार तो ऐसे भी हैं जो 15-20 अंतर्राष्ट्रीय भाषाओं के जानकार हैं। और तो और मैं उसको अपने गांव की गवांरू भाषा, पूर्वजों की भाषा राजस्थानी, मित्रों की भोजपुरिया भाषा व छत्तीसगढ़ की गोंडी आदिवासी भाषाओं को सीखने का भी बंदोबस्त करूंगा।

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  • यदि सच में ही “रोटी” आपके लिए जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा होती


    सामाजिक यायावर
     
    दरअसल यदि आपके लिए रोटी जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा होती तो आप कहीं किसी दूसरे के खेत में मजदूरी कर रहे होते, कहीं किसी आढ़ती के यहां बोरी ढो रहे होते, कही किसी कस्बे या शहर में रिक्शा खींच रहे होते।
     
    भारत देश में करोड़ों लोग वास्तव में हैं जिनके लिए सच में ही रोटी जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा है और वे अपना पूरा जीवन रोटी की ही मशक्कत में अपना जीवन वास्तव में घिसटा रहे होते हैं।
     
    आपके लिए मुद्दा है भोग-विलास का जीवन और दूसरों की तुलना में सामंती अौकात वाली हैसियत प्राप्त करना। क्योंकि आपका पेट वास्तव में भरा है, वास्तविकता यह है कि आपके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण मुद्दा रोटी नहीं है।
     
    आपके पेट भरे हैं इसी कारण एक दो अपवादों को छोड़कर आप सभी भोग-विलास व सामंती औकात आदि की प्राप्ति के लिए ही अपना जीवन लगाते हैं। दुनिया में जितने सारे झूठ, छल प्रपंच, शोषण, अमानवीयता, टुच्चई, नीचता, भ्रष्टाचार, हिंसा, पतन, बर्बरता, क्रूरता आदि तत्व ऊपर से नीचे तक दिखते हैं ये सब पेट भरे लोगों की देन हैं जो पहचान, भोग-विलास का जीवन व सामंती औकात आदि के लिए अपना जीवन जीते हैं और इन्हीं तत्वों की दौड़ में आजीवन लगे रहते हैं। जबकि रोना रोते हैं रोटी का।
     
    काश सच में ही रोटी आपके जीवन का सबसे बड़ा मुद्दा होती तो आप इतने खोखले नहीं होते, इतने असंवेदनशील नहीं होते, दोहरे चरित्र के नहीं होते, झूठ नहीं गढ़ते होते। साथ ही आप कुछ और होते या न होते लेकिन बेहतर मनुष्य जरूर ही होते।
     
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  • पंचायत चुनावों में पढ़ाई को अनिवार्य बनाना लोकतांत्रिक व मौलिक अधिकारों का हनन

    सामाजिक यायावर


    साभार – http://panchayatkhabar.com

    स्कूली पढ़ाई किसी व्यक्ति की समझदारी का मापदंड नहीं हो सकती है। निरक्षर व्यक्ति भी बहुत अधिक समझदार व बहुत बेहतर जनप्रतिनिधि हो सकता है। बहुत ऊंची डिग्रीधारी व्यक्ति भी बहुत धूर्त जनप्रतिनिधि हो सकता है। पंचायती चुनावों में ही नहीं किसी भी प्रकार के जनभागीदारी वाले चुनावों में देश के हर आदमी को चुनाव लड़ने का हक वैसे ही होना चाहिए जैसे कि देश के हर आदमी को मतदान देने का हक है।स्कूली शिक्षा को बहुत अधिक तरजीह देने जैसी मूर्खता या अहंकार करने का सामाजिक दंश देश के लोगों को देने की जरूरत बिलकुल भी नहीं है।

    लोग स्कूल जा रहे हैं, समय के साथ साथ अपने आप सभी साक्षर लोग ही चुनाव लड़ेगें। यदि किसी क्षेत्र के लोग किसी अनपढ़ को अपना जन प्रतिनिधि नहीं देखना चाहते हैं तो उनके पास अनपढ़ व्यक्ति को मतदान न करने का विकल्प सुरक्षित है। यह लोगों को तय करने दीजिए कि उन्हें अपना जन प्रतिनिधि निरक्षर चाहिए या साक्षर, ऐसा करने का उनके पास अधिकार भी है। या फिर देश के लोगो से मतदान का अधिकार भी हड़प कर लीजिए।

    भारत देश को चलाने वाले सरकारी कर्मचारी, अधिकारी व नौकरशाह ही हैं। नीचे से लेकर ऊपर तक हर स्तर पर कार्यकारी अधिकार इन्हीं लोगों के पास होते हैं। ये लोग पढ़े लिखे होते हैं, ऐसा माना जाता है कि बहुत ही अधिक कठिन परीक्षाओं को पार करके नौकरी पाते हैं। फिर भी इनमें से अधिकतर लोगों ने देश व समाज की हालात खराब कर रखी है, भ्रष्टाचार को समाज व जीवन का मूलभूत अंग बना दिया है। पूरी चालाकी के साथ हर बात का ठीकरा नेताओं के सिर पर फोड़ देते हैं जबकि सारे कार्यकारी अधिकार इन्हीं सरकारी कर्मचारियों व अधिकारियों के पास होते हैं।

    देश के किसी विभाग की बात कीजिए, सभी में खूब पढ़े लिखे लोग नीचे से लेकर ऊपर तक बैठे हैं। लेकिन सामंती अधिकार, अनापशनाप वेतन व सुविधाओं को भोगने के बावजूद ये पढ़े लिखे सरकारी कर्मचारी व अधिकारी देश के लोगों के प्रति न तो संवेदनशील होते हैं और न ही जिम्मेदार होते हैं।

    नदियों को मार दिया है, प्रदूषण की भयंकर हालत कर रखी है, हर स्तर पर शिक्षा व्यवस्था को बाजारू बना दिया है। गांवों को घटिया, पिछड़ा व अजागरूक बता कर खतम करने का कुचक्र रचा गया है। अब ताबूत में अंतिम कील ठोकने के लिए पंचायती चुनावों को लड़ने के लिए स्कूली शिक्षा को अनिवार्य बनाया जा रहा है।

    पहले इस बात पर इमानदारी से खुली चर्चा तो की जाए कि पढ़े लिखों ने देश को क्या दिया और गांव के गवांरो ने देश को क्या दिया है। यदि ईमानदारी से चर्चा की जाएगी तो बिलकुल साफ दिखेगा कि गांव के गवारों ने देश को बहुत कुछ दिया है। यहां तक कि पढ़े लिखों व शहरी लोगों की जरूरतों की पूर्ति का आधार भी गांव व गवांर ही हैं।

    उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गये निर्देश पर रोक लगाने के लिए संसद को चर्चा करनी चाहिए। कानून संसद बनाती है। देश का संविधान उच्चतम न्यायालय ने नहीं बनाया है। देश  के मालिक व दिशा निर्देशक देश के आम लोग हैं न कि कोई सरकार या कोई न्यायालय। संरकार और संसद को जनहित में निर्णय लेना चाहिए।

  • भारत के अधिकतर लोग सेलिब्रटी अवतारों के जरखरीद गुलाम बनने को ही, अपने जीवन का लक्ष्य, उद्देश्य व सार्थकता मान बैठे हैं

    विवेक ‘नोमेड’
    सामाजिक यायावर

    हम भारतीय फेसबुक का अधिकतर प्रयोग खुद को मानसिक गुलाम बनाने व मानसिक गुलामी की गतिविधियों को करने में ही गुजारते हैं।

    • जीवन की समझ, दृष्टि, सार्थकता आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।
    • समाज की समझ, दृष्टि, सार्थकता आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।
    • सामाजिक ईमानदारी व प्रतिबद्धता आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।
    • समाज व मनुष्य के वास्तविक विकास व समाधान आदि से दूर दूर तक कोई नाता नहीं।

    चूकि हमारे समाज में मौलिकता, दृष्टि व वैज्ञानिक दृष्टिकोण को कुंठित किया जाता है इसलिए हमारे समाज के सेलिब्रिटी लोग या तो अंधो में काने किसिम के होते हैं या नकलची होते हैं या प्रायोजित होते हैं। हम भारतीय ऐसे कुंठित लोगों को सेलिब्रिटी व अवतार बनाकर खुद को उनके जरखरीद गुलाम के रूप में उनकी वाहवाही व समर्थन आदि के लिए समर्पित कर उनकी कुंठा आदि को महानता व दिव्यता आदि के रूप में स्थापित व प्रतिष्ठित करने में अपनी जीवनी ऊर्जा का प्रयोग करने लगते हैं।

    दरअसल हम भी उन्हीं की तरह खोखले, अमौलिक, दृष्टिहीन, अवैज्ञानिक मानसिकता के होते हैं, हम भी उन्हीं की तरह ग्लैमर भोगना चाहते हैं, इसलिए हम उनमें अपनी लिप्साओं का अक्श देखते हैं और खुद को उनका अघोषित मानसिक गुलाम बना देते हैं।

    हम अपनी लिप्साओं व दमित इच्छाओं के आधार पर अपने लिए सेलिब्रिटी अवतार चुन लेते हैं, और उस अवतार का अक्श खुद को मानकर मन की गहराइयों में अपनी लिप्साओं व दमित इच्छाओं को जीने के सैडिज्म में जीने लगते हैं। हम सैडिज्म के इस नशे को तोड़ना नहीं चाहते हैं, इसलिए हम हर उस बात, तथ्य, चिंतन, विचार व व्यक्ति के प्रति हिंसक हो उठते हैं जो हमें इस सैडिज्म से बाहर निकालने का प्रयास करता है या हमारे सैडिज्म को तोड़ता है। दरअसल हम कुंठित सैडिस्ट हैं इसीलिए हम अपने लिए अवतार बनाते हैं और खुद ही खुद को उनका जरखरीद मानसिक गुलाम बनाते हैं।

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    ये स्थितियां व गतियां मनुष्य, समाज व देश को बहुत पीछे ले जातीं हैं।
    हम हंगामा चाहे जो करें,
    हम ढोंग चाहे जो करें,
    हम ख्याली पुलाव चाहे जो बनाएं,
    हम जुमले चाहे जितने दें,
    हम चाहे जितने झूठ के पुलंदे बनाएं,
    हम नारे चाहे जितने लगाएं।

    हम जब तक सैडिस्ट रहेंगें,
    हम जब तक सैडिज्म में जीते रहेंगें,
    हम, हमारा समाज, हमारा देश और अधिक कुंठित ही होता जाएगा, पीछे ही जाएगा।

  • जाति, आरक्षण, योग्यता व हमारी धूर्तता व ढोंग

    विवेक ‘नोमेड’
    सामाजिक यायावर

    जब तक जाति जैसी सबसे पुरानी व सबसे घिनौनी सामाजिक दास व्यवस्था का समूल नाश नहीं होता| तब तक भारत में संवैधानिक आरक्षण खतम नहीं किया जा सकता है| भले ही पूरे देश को गृह युद्ध की आग में झोंक दिया जाए, तब भी नहीं| गृह युद्ध में 70-80 प्रतिशत शारीरिक मजबूत व संघर्ष करने वाले लोगों के समक्ष 25-30 प्रतिशत लोग कैसे ठहर पाएंगे। इसकी कल्पना भी दिलचस्प है।

    महज सरकारी नौकरी व सुविधा व भ्रष्टाचार की नदियों में डुबकी लगाने की अय्याशी के भोग के लिए संवैधानिक आरक्षण का विरोध करने वालों को जाति व्यवस्था में स्वयं को शूद्रों की कैटेगरी में रख कर उन परंपरागत जुल्मों के बारे में भी सोचना चाहिए जो शूद्रों पर लगातार किए गए और आज भी किए जा रहे हैं| चंद सरकारी नौकरियों के न मिलने पर रात दिन आरक्षण को गाली देने वाले धूर्तों की सोच की इतनी छोटी सी भी हैसियत नहीं कि वे जाति व्यवस्था में शूद्रों की स्थितियों की कल्पना तक कर पाएं|

    मुद्दा यदि योग्यता का है, तो आजादी के बाद सरकारी नौकरी के सर्वोच्च पदों व नीति निर्माता स्तर की नौकरशाही में रहते हुए भी देश व समाज के विकास में क्या योगदान रहा इसकी भी खुली बहस होनी चाहिए| योग्यता का मतलब परीक्षा में अंक पाना नहीं होता| शिक्षक कौन हैं, शिक्षा प्रणाली क्या है, परीक्षाओं के मापदंड क्या हैं ऐसी बहुत से गंभीर मसलों पर भी बहस होना चाहिए| योग्यता को साबित करने का दारोमदार टुच्ची व ओछी परीक्षाओं व उनमें प्राप्त अंकों तक ही सीमित करना सामाजिक खणयंत्र के सिवाय कुछ भी और नहीं। यदि मामला योग्यता का है तो बिना सरकारी नौकरी पाए, बिना सरकारी सुविधा पाए देश व समाज का विकास किया जा सकता है, तो दिखाइए योग्यता| या फिर योग्यता का मानदंड व कसौटी सिर्फ और सिर्फ सरकारी नौकरी व सुविधा व भ्रष्टाचार की ऐशबाजी तक ही सीमित है|

    देश को आरक्षण ने बहुत कुछ दिया है, शोषण कम हुआ है, जाति की अभेद्य दीवारों पर धक्के लगे हैं। जिन लोगों को परंपरा में नालियों में रहते हुए जीवन यापन करने के लिए विवश किया गया उनने बेहतर स्थानो में बेहतर घर बनाए। जिन लोगों को परंपरा में शिक्षा का अधिकार नहीं दिया गया, उनने लिखना पढ़ना सीखा। जिन लोगों को परंपरा में कुंठित किया गया उनको दो कौड़ी की परीक्षाओं में प्राप्त अंकों को योग्यता का आधार व सबूत मानकर अयोग्य बताना नीचता व धूर्तता व बेशर्मी है।

    योग्यता का लक्ष्य सरकारी नौकरी की अय्याशी भोगने तक ही क्यों सीमित रहती है। वैसे भी सरकारी नौकरियां लगातार घटाई जा रहीं हैं। योग्यता तो दिखावटी बहाना है, मामला तो सत्ता शक्ति व ऐशबाजी में भागीदारी न देने का है। देश के सर्वोच्च नौकरशाही स्तर के पदों पर कितने दलित पहुंचे, इस पर बहस होनी चाहिए। किसी भी स्तर की सरकारी नौकरी योग्यता के द्वारा प्राप्त की जाती आई है, यह कहना बेहूदी धूर्तता व बेहूदा मजाक के अलावा कुछ भी और नहीं।

    भारत में जातिवादी धूर्तता की नीचता व टुच्चई की इंतहा यह है, कि यहां आज तक कभी भी एक पल के लिए भी आरक्षण का स्वागत अशूद्रों द्वारा नहीं किया गया। आरक्षण के विरोध के लिए बेशर्म व धूर्त तर्क दिए जाते हैं और साबित किया जाता है कि आरक्षण से देश व समाज का कितना नुकसान होता है। यह सारा खेल केवल और केवल सरकारी नौकरी को भोगने व सत्ता शक्ति के लिए ही किया जाता है।

    सरकारी नौकरी व सत्ता शक्ति को भोगने की कड़ी में हजारों लाखों अशूद्र लोगो द्वारा आजादी के बाद से ही फर्जी जाति प्रमाणपत्र बनवा कर फर्जी तरीके से सरकारी नौकरियां को पाकर शूद्रों का शोषण किया गया है, उनका संवैधानिक हक मारकर संवैधानिक अपराध किया गया है। ऐसे धूर्त व नीचता भरे लोगों व समाज से वास्तविक संवेदनशीलता की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।

    वैसे यदि किसी सरकार में, किसी मीडिया में, किसी व्यापारी में, किसी में बिना जाति का समूल नाश किए संवैधानिक आरक्षण हटाने का बूता हो तो हटा दे। फेसबुक, व्हाट्सअप आदि में फर्जी बकवास करके खुद को कर्मशील, क्रांतिकारी व परिवर्तनकारी समझने वाले लोग यदि गृह युद्ध की विभीषिका पीढ़ी दर पीढ़ी झेल सकते हों तो भी आरक्षण को नहीं हटाया जा सकता है।

    धूर्तता, नीचता, ढोंग व हिंसा से जबरिया सामाजिक समाधान मिलने के युग अब जा चुके हैं। समाज को अपनी वास्तविकता व वास्तविक हैसियत व क्षमता कभी नहीं भूलना चाहिए। सामाजिक समाधान के लिए सामाजिक ईमानदारी अब जरूरी है। हमें अपनी नीचता, टुच्चई, धूर्तता, कपटता व कमीनीपंथी भरे ढोंग से बाहर आने का प्रयास करना चाहिए।

  • भारतीय-दाम्पत्य जीवन व परिवार के व्यवहारिक मूल्य

    सामाजिक यायावर

    जैसे हम मानव-निर्मित ईश्वर को वास्तविक ईश्वर माने हुए हैं, माने हुए हैं कि हमारी सभ्यता विश्व की सर्वश्रेष्ठ सभ्यता है। वैसे ही और भी बहुत कुछ हम यूं ही माने हुए हैं और माने हुए को मनवाने के लिए दूसरों को अपशब्द कहते हैं, अपमानित करते हैं। अपने द्वारा माने हुए को जबरन तथ्यपरक सिद्ध करने के लिए  दूसरों के प्रति स्वयं को हिंसक भी बनाते हैं। बिलकुल ऐसे ही हम, बस यूं ही मान बैठे हैं कि भारतीय संस्कृति के परिवार व पारिवारिक मूल्य विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं। यदि, बस यूं ही मान लेने की अनुकूलता व बंद-दिमाग की जिद से बाहर आकर परिवार व पारिवारिक मूल्यों का ठोस धरातल पर मूल्यांकन किया जाए; तो परिवार की नीव हिंसा, ढोंग, झूठ, बाजारूपन व उपभोक्तावाद से भरी हुई दिखती है।

    हम समाज व देश निर्माण, विश्वगुरू होने की संस्कृति आदि का दावा करते हैं लेकिन मनुष्य व समाज को जीवन मूल्य व संस्कार देने वाली मूलभूत ईकाई परिवार के प्रति कतई गंभीर व जिम्मेदार नहीं होते हैं। हमने परिवार व परिवार की मूलभूत ईकाई विवाह को बाजारू बना रखा है जो मनुष्य में जीवन मूल्यों व संस्कारों को समृद्ध करने के बजाय संभावना के भ्रूण को भी नष्ट करता है।

    हम अपने जीवन साथी तक के चुनाव में अंदर से ईमानदार नहीं होते जबकि हम समाज व देश के निर्माण, विकास व समृद्धि की बात करते हैं। हम भूल जाते हैं कि देश व समाज का निर्माण मनुष्यों के निर्माण से होता है और मनुष्य के निर्माण की मूलभूत इकाईयाँ परिवार व विवाह हैं। जहां परिवार नहीं, वहां समाज नहीं; जहां समाज नही, वहां देश नहीं। खोखलेपन, दोहरेपन व सतहीपन आदि से व्यक्ति, परिवार, समाज व देश कुछ भी न तो निर्मित होता है और न ही समृद्ध होता है।

    यदि ईमानदारी व सूक्ष्मता से पारिवारिक मूल्यों के तत्वों को देखा जाए तो देश व समाज में व्याप्त भ्रष्टाचार की नीव जाति-व्यवस्था के साथ-साथ भारतीय परिवार भी है।

    परिवार में संस्कार व संस्कृति के मायने :

    संस्कृति बोलचाल की भाषा, कपड़े पहनने व भोजन करने के तौर तरीको, त्योहारों व पूजापाठ के कर्मकांडो आदि तक ही संकुचित होती है। वास्तविक जीवन मूल्यों व आंतरिक भाव संवेदना का कोई औचित्य नहीं होता है, उल्टे तिरस्कृत किए जाते हैं।

    संस्कारित स्त्री का तात्पर्य कि निर्धारित किए गए कपड़े पहने, किसी पुरुष से मित्रता न करे, प्रेम की स्वतंत्रता की मांग न करे। किसी पुरुष से कल्पना में भी भावात्मक प्रेम भी न करे। विवाह अर्थात् माता पिता जिस पुरुष से शारीरिक संभोग करने के लिए  निर्धारण करें केवल उसी पुरुष से शारीरिक संभोग करे और उस पुरुष के लिए  संताने पैदा करे। बचपन से विवाह तक माता पिता व भाई आदि की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले और विवाह पश्चात् अपने सास ससुर व पति की आज्ञाकारी रहे और उनके अनुसार ढले।

    संस्कारित पुरुष का तात्पर्य कि पुरुष परिवार के लिए  संपत्तियां अर्जित करे और सुविधाएं एकत्र करे और संपत्तियों व सुविधाओं से अपने माता पिता, पत्नी व संतानों की देखभाल करे। बचपन से लेकर युवा होने तक माता पिता ने देखभाल किया है इसलिए   पुत्र अपने माता पिता की मृत्यु तक उनकी देखभाल करे और आज्ञाकारी बन कर रहे। केवल संपत्ति व सुविधा अर्जित करने के तौर तरीको में विशेषज्ञता प्राप्त करे और माता पिता जिस स्त्री से विवाह कर दें, उसी स्त्री के साथ शारीरिक संभोग करे और उस स्त्री का प्रयोग अपने लिए  संताने उत्पन्न करने के लिए  करे।   

    माता पिता द्वारा तय किया गया विवाह :

    माता-पिता द्वारा तय किए गए विवाह में लड़की व लड़के को सभ्यता व संस्कारों के मूल्यों की कसौटी में मूल्यांकन करने का जबरदस्त प्रचलन है, इस प्रचलन को लड़का या लड़की को परिवार व समाज की संस्कृति की रक्षा व समृद्धि के लिए  ठोंक बजाकर चुनना कहा जाता है; इस प्रक्रिया में बहुत सारी लड़कियां व लड़के अस्वीकृत किए जाते हैं, ताकि अपने पुत्र के लिए  सेवाभावी संस्कारी पत्नी और पुत्री के लिए  देखभाल करने वाला प्रतिष्ठित पति खोजा जा सके।

    पुत्रवधू के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़की अपने ही धर्म व जाति की हो, लड़की स्वर्ग की अप्सरा जैसी सुंदर हो, बहुत अमीर घर की हो या अच्छे वेतन व सुविधा वाली सरकारी या गैर सरकारी नौकरी करती हो या दोनो, मुंहमागा दहेज लेकर आए, भाई न हों तो और बेहतर ताकि माता पिता की चल-अचल संपत्ति में हिस्सा भी मिले, प्रतिष्ठित परिवार की हो ताकि लड़के वालों का सामाजिक कद भी बढ़ जाए आदि आदि प्रकार की सभ्यता व संस्कारों से संपन्न गुणी लड़की को पुत्र की पत्नी होने के लिए  प्राथमिकता दी जाती है।

    ऊपर बताए गए मानकों की सभ्य व संस्कारी लड़की मिलने पर उसको चलाकर देखा जाता है ताकि उसके लंगड़ेपन की जांच हो सके, गाना गवाकर देखा जाता है ताकि उसके गूंगेपन की जांच हो सके, किसी प्रकार जुगत लगाकर लड़की के शरीर के आंतरिक अंगों को भी किसी विश्वसनीय महिला द्वारा देखे जाने का प्रयास किया जाता है ताकि शरीर में दाग-धब्बे आदि की जानकारी हो पाए, कुछ संस्कृतिवान लोग तो लड़की के अंतः वस्त्र तक उतरवा कर जांच करना चाहते हैं ताकि शरीर में छुपे हुए दाग व धब्बों की पूरी जानकारी मिल सके और वे लड़की के परिवार वालों से ठगा हुआ न महसूस करें।

    जामाता के संस्कारी होने के मूल्य :

    लड़का अपने ही धर्म व जाति का हो।  लड़के के माता पिता के पास चल अचल संपत्ति हो या लड़का ऊंचे वेतनमान व सुविधाओं की सरकारी या गैरसरकारी नौकरी करता हो या दोनो। लड़का सुंदर हो किंतु यदि लड़का बहुत अमीर है और बदसूरत है तो उसकी अमीरी के कारण उसको सुंदर और सुपात्र मान लिया जाता है। लड़का इकलौता हो तो और अच्छा, लड़के की बहन न हो तो और अच्छा। लड़का ऊपरी कमाई वाली सरकारी नौकरी में हो तो सबसे अधिक संस्कारी और सुपात्र माना जाता है।

    माता पिता द्वारा तय किए गए विवाहों को परंपरा में केवल इसलिए   सामाजिक रूप से प्रतिष्ठित किया गया है क्योंकि इसमें लड़का या लड़की अपना जीवन साथी अपनी विचारशीलता व समझ के आधार पर नहीं बल्कि अपने माता पिता की इच्छा के आधार पर चुनते हैं।

    प्रेम विवाह :

    चूंकि परंपरा में प्रेम को स्त्री पुरुष के मध्य यौन संभोग तक ही संकुचित कर दिया गया है; इसलिए   माता पिता के द्वारा तय किए गए विवाह और प्रेम विवाह में केवल एक ही अंतर रह पाता है, वह यह कि एक में माता पिता द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है जबकि दूसरे में अपने द्वारा पसंद किए गए मनुष्य के साथ यौन संभोग किया जाता है। बाकी सब कुछ समान ही रहता है।

    परिवार में सहज प्रेम व पारस्परिक विश्वास की जीवंतता न होने से युवक या युवती को सहज प्रेम की अनुभूति नहीं होती। परिवार में यौन से संबंधित चर्चा बच्चों व किशोरों के लिए  प्रतिबंधित होती है, अश्लीलता माना जाता है।

    माता पिता आपस में यौन संभोग करते हैं किंतु यह मानने को तैयार नहीं होते कि स्त्री और पुरुष दोनों के शरीर व शारीरिक क्रियायें प्राकृतिक हैं, कुछ भी बुरा नही, कुछ भी छुपाने लायक नहीं। स्त्री के अंगों को अश्लील मानते हैं, छुपाने लायक मानते हैं।

    उचित जानकारी के अभाव में किशोर यौन कुंठित हो जाता है, इसलिए   अपवाद को छोड़कर प्रेम विवाह में भी सहज प्रेम प्रस्फुटित नहीं हो पाता है; प्रेमी प्रेमिका सहज प्रेम व यौन आकर्षण में अंतर ही नहीं कर पाते परिणामस्वरूप उनका प्रेम विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण व वासना तक ही संकुचित हो जाता है।

    यही कारण है कि बहुत मामलों में लड़की अपने प्रेमी को एक झटके में केवल इसलिए छोड़ देती है कि उसके माता पिता द्वारा खोजा गया लड़का उसके प्रेमी की तुलना में अधिक अमीर और कमाऊ है; और ऐसा करते ही उस लड़की को उसके माता पिता व परिवार द्वारा समझदार, तीव्रबुद्धि व संस्कारी मान लिया जाता है। प्रेमी के साथ यौन संबंधो के बावजूद उस लड़की को चरित्रवान व संस्कारी लड़की माना जाता है।

    ऐसा ही लड़के के लिए  भी है; जब वह माता पिता द्वारा खोजी गई अमीर लड़की, दहेज व सुविधाओं आदि के लिए  अपनी प्रेमिका को एक झटके में छोड़ देता है।

    प्रेम विवाह व माता पिता द्वारा तय किए विवाह का चरित्र बिलकुल एक सा ही होने के बावजूद प्रेम विवाह सामाजिक रूप से केवल इसलिए   तिरस्कृत होता है क्योंकि प्रेम विवाह में जाति या धर्म के बाहर का मनुष्य प्रेमी या प्रेमिका हो सकता है और माता पिता के द्वारा निर्धारित किए गए मनुष्य के बजाय अपनी पसंद के मनुष्य के साथ यौन संबंध बनाए जाते हैं और संतानोत्पत्ति की जाती है।

    परिवार में पति पत्नी  :

    अपवादों को छोड़कर विवाह होने के पश्चात् कुछ दिनों तक दोनों पक्षों की ओर से सामंजस्य, संतुलन आदि का ढोंग चलता है। लेकिन समय के साथ-साथ जब पति पत्नी अपने वास्तविक चरित्र के साथ जीना शुरू करते हैं, तो आपसी टकराहटें शुरू होतीं हैं। ऐसी स्थिति आने पर जो पति पत्नी अपने स्वार्थ व अहंकार से बाहर आकर संतुलन नहीं कायम कर पाते हैं, वे अपने वैवाहिक जीवन को नर्क बनाते हैं।

    दरअसल लड़का, लड़की, माता, पिता आदि यह भूल जाते हैं कि उनमे अच्छाई व बुराई दोनों ही हैं और वे समाज व परिवार की अनुकूलता के ही उत्पाद हैं; जैसे वे खुद हैं वैसे ही उनकी पत्नी, पति, बहू, दामाद, पुत्र, पुत्री आदि भी हैं।

    ये लोग स्वार्थ, लिप्सा व बाजारू भोग के नशे के अंधेपन में यह भूल जाते हैं कि विचार, संस्कार, विनम्रता, शुद्धता, प्रेम, समर्पण, त्याग आदि मूल्य जीवन में जीवंतता से जिए जाते हैं।  ऐसे लोगों की ईमानदारी, विश्वास व प्रेम का कोई ‘वास्तविक जीवन मूल्य’ नहीं होता।  ऐसे लोग पूरा जीवन रोते झींकते गुजारते हैं और समय के साथ-साथ परिवार व समाज में जाने अनजाने ऋणात्मकता ही बढ़ाते हैं।

    परंपरा में विवाह संस्था में सहज व स्वतंत्र जीवन सहचरत्व का मूल्य विकसित करने के बजाय स्त्री व पुरुष के यौन संबंध से संतान पैदा करने व पैदा की गई संतान को अपने जैसा ही संकुचित, अनुकूलित, कुंठित व परतंत्र बनाने वाली संस्था बना दिया गया है; जिसमें मनुष्य के भावों, प्रेम व स्वतंत्रता आदि का कोई स्थान व महत्व नहीं है। सब कुछ बने बनाए ढांचे से ही तय होता है।

    परिवार में बच्चे :

    चूंकि विवाह संस्था के ढांचे में ही सहज प्रेम उपेक्षित व तिरस्कृत किया जाता है, इसलिए   बच्चों का पालन पोषण भी ढांचे की अनुकूलता के संकुचित प्रभाव क्षेत्र के दायरे में ही होता है। अनुकूलता के प्रभाव क्षेत्र से बाहर आने का प्रयास करना ही संस्कृति व संस्कार का ध्वस्त होना मान लिया जाता है।

    माता पिता व परिवार द्वारा बच्चों में स्वतंत्र व वैज्ञानिक दृष्टिकोण की संभावना तक की भ्रूण हत्या की जाती है। बच्चे  स्वतंत्र अस्तित्व वाले चेतनशील जीवंत मनुष्य के बजाय माता पिता की व्यक्तिगत संपत्ति माने जाते हैं; यही कारण है कि माता पिता व बच्चों के संबंध सहज व मौलिक प्रेम के बजाय अनकही किंतु तीव्र अपेक्षाओं के व्यापाराना लेनदेन पर आधारित होते हैं।

    ऐसी अनुकूलता व कुंठित वातावरण मनुष्य व समाज का विकास व चेतनशीलता अवरुद्ध कर देते हैं और बचपन से ही मानसिकता दूषित व कुंठित कर देते हैं।  बच्चा मौलिकता व स्वतंत्रता के बजाय व्युत्पन्न अनुकूलता की परतंत्रता की ओर बढ़ता जाता है और इन्ही के सख्त व संकुचित दायरों में आजीवन कुंठित होकर रह जाता है। ऐसे ही चक्रों के कारण कुंठा व मानसिक परतंत्रता पीढ़ी दर पीढ़ी और गहरे व्याप्त होती चली जाती है।   

    चलते-चलते :

    परिवार व विवाह संस्था के भावों व मूल्यों को अपनी जरूरत के अनुसार परिभाषित करके प्रायोजित करते हुए कुंठित व परतंत्र मानसिकता के व्यापाराना ढांचे को संस्कृति का नाम दे दिया गया है। यही कारण है कि वास्तविक जीवन-मूल्य, संस्कार, संस्कृति, स्वतंत्रता व चेतनशीलता आदि अपवाद परिवार में ही परिलक्षित होता है।

    साभार – “मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर” किताब के एक खंड से लिया गया.

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  • किताब की प्रस्तावना :: देश व समाज का निर्माण मनुष्य का दायित्व है

    मनुष्य के बिना देश हो ही नहीं सकता, और जहां कहीं भी मनुष्य होगा वहां देश होगा ही होगा। मनुष्य बड़ा है देश से, क्योंकि मनुष्य बनाता है देश। देश की सत्ता, मूल्य, नियम-कानून, रीति-रिवाज, खानपान, रहन-सहन, भाषा, लिपि, धर्म, धार्मिक कर्मकांड व संस्कृति सभी कुछ मनुष्य ही बनाता व निर्धारित करता है। मनुष्य है तो देश है, बिना मनुष्य के देश का कोई अस्तित्व नहीं। यही सहज सामाजिक तथ्य है, शेष तर्क व परिभाषायें राजनैतिक व धार्मिक सत्ताओं द्वारा अपने वर्तमान अस्तित्व के लिये तोड़मरोड़ कर उनके अपने निहित-स्वार्थों के लिये थोपी गयीं परिभाषायें व तर्क हैं।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है। देश मनुष्य की अपनी जीवंतता व उसके जीवन में व्याप्त परस्परता की जीवंतता से बनता है, इसलिये देश राजनैतिक सीमाओं की निर्जीव-वस्तु न होकर, जीवंत-वास्तविकता होता है जिसका निर्माता मनुष्य होता है। मनुष्य और देश का गूढ़ गतिशील, चारित्रिक व जीवंत-रचनात्मक संबंध होता है।

    जिस दिन भारत का मनुष्य यह यथार्थ समझ जायेगा कि देश मूलरूप से मनुष्यों से बनता है, न कि निर्जीव कानूनों, कानून की किताबों, संविधानों, धार्मिक सत्ताओं या राजनैतिक सत्ताओं से; उस दिन भारत का मनुष्य अपने देश का पूरा का पूरा चरित्र एक झटके में बदल लेगा।

    यही बदलाव का दिन वास्तविक व व्यापक परिवर्तन का दिन होता है। सत्ता को चलानें वाले वैयक्तिक-समूहों, दलगत-समूहों को बदलना वास्तविक व व्यापक परिवर्तन नहीं होता है।

    मनुष्य देश का जनक, निर्माता, पोषक व उत्तमता तक पहुंचाने वाला होता है, इस यथार्थ को समझना व चारित्रिक रूप से जीना ही मनुष्य का लोकतांत्रिक होना है। मनुष्य की इस लोकतांत्रिकता के द्वारा ही उसका देश लोकतांत्रिक बनता है। किसी देश को उस देश को बनाने वाले मनुष्य लोकतांत्रिक बनाते है, दूसरे शब्दों में लोकतांत्रिक मनुष्य ही देश को लोकतांत्रिक बनाता है, न कि देश का कानून, संविधान व सत्ता प्रणाली। सत्ता प्रणाली राजतंत्रीय होते हुये भी देश व देश का मनुष्य लोकतांत्रिक हो सकता है।

    मनुष्य देश का निर्माण करता है। देश का निर्माण धार्मिक समूहों, राजनैतिक समूहों व आर्थिक तंत्रों आदि पर न तो निर्भर करता है और न ही इन सब से देश निर्माण की अपेक्षा ही की जानी चाहिये।

    देश निर्माण मनुष्य की जिम्मेदारी है। धार्मिक समूह, राजनैतिक समूह व आर्थिक तंत्र आदि मनुष्य द्वारा निर्मित देश के विभिन्न अवयव होते हैं, जिनको वर्तमान प्रासांगिकतानुसार परिवर्तित किया जा सकता है। मनुष्य देश निर्माण की प्रक्रिया में विभिन्न अवयवों का निर्माण करता है, फिर उन्हें परिवर्तित करता है। अवयवों के निर्माण व परिवर्तन की प्रक्रिया में वह सीखता है और बेहतर निर्माता बनता है। और यही बनाना और सीखना ही मूलरूप में लोकतांत्रिक होना होता है…. यही है लोकतंत्र का मूलभाव।

    देश मूल रूप में मनुष्य की सामाजिकता की गतिशील-जीवंत-चारित्रिक रचनात्मकता है। इसलिये जैसा मनुष्य होगा वैसा ही देश होगा। मनुष्य जब चाहे तब देश का नाम, देश की परंपरायें, देश के कानून, देश का संविधान, देश का भूगोल, यहां तक कि देश का नाम तक बदल सकता है।

    सत्ताओं में व्यापक-सामाजिक-परिवर्तन का कोई सामाजिक-अवतार नहीं होता
    सामाजिक-अवतार राजनैतिक, धार्मिक व आर्थिक सत्ताओं से इतर आम-मनुष्य के समाज में होते हैं

    राजनैतिक, धार्मिक, आर्थिक व नौकरशाही तंत्रों में कोई भीसामाजिक-अवतार नहीं होता जो सामाजिक-अवतार जैसे दिखते हैं वे सभी किसी न प्रकार से व किसी न किसी स्तर पर प्रायोजित ही होते हैं। सामाजिक-अवतार तो आम समाज से अंकुरित व पुष्पित होते है और मनुष्य निर्मित सत्ताओं के बिना रहते हैं। क्योंकि यदि सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित सत्ताओं के द्वारा समाधान की शक्ति प्राप्त करते हैं, तो ऐसे सामाजिक-अवतार मनुष्य निर्मित उन्ही तंत्रों के ही अधीन हुये, जिन तंत्रों को परिवर्तित करने की आवश्यकता है। ऐसी परिस्थिति में तंत्रों की सत्ताओं के विरुद्ध जानें का साहस व दृष्टि हो ही नही सकती है।  इसीलिये तंत्रों द्वारा प्रायोजित सामाजिक-अवतार कभी भी सामाजिक समाधान व परिवर्तन की ओर नहीं चल पाते है, ऐसे सामाजिक-अवतारों की उपलब्धियाँ भी प्रायोजित ही होती हैं।

    भारतीय समाज में तो कुत्ता, बिल्ली, चूहा, सुअर, चिड़िया, सांप, कछुआ, गाय, बैल आदि जैसे गैर-मानव योनि जीव भी सामाजिक-अवतारों के रूप में प्रतिस्थापित किये गये हैं। इनको किसी भी प्रकार की मानव निर्मित सत्ताओं की ताकत नहीं मिली।

    सामाजिक-अवतार यदि सत्ताधीश है तो वह वास्तव में आम मानव का वास्तविक सक्रिय आदर्श नहीं हो सकता क्योंकि मानव निर्मित सत्ताओं की रूप-रेखा शुंडाकार-स्तंभ (पिरामिड) की तरह होती है, जिसमें सबसे नीचे का आधार सबसे चौड़ा और सबसे ऊपर की चोटी सबसे नुकीली और सबसे कम चौड़ी होती है।

    मानव निर्मित सत्ताओं में जो जितना ऊपर होगा वह उतना ही कम चौड़ा और अधिक नुकीला होगा और अपने से बहुत ही अधिक लोगों को दबाकर व दबाये रहते हुये ही और ऊपर पहुँचता है। इसीलिये मानव निर्मित तंत्रों के सत्ताधीश लोग कभी भी आम मनुष्य के प्रति संवेदनशील नहीं हो पाते, व्यापक-समाधान की दृष्टि नही रख पाते हैं। यही कारक है जिनके कारण ऐसे लोग सामाजिक परिवर्तन व समाधान के सामाजिक-अवतार नहीं हो पाते हैं। सामाजिक-अवतार तो बहुत सहज, सामान्य व मानव निर्मित तंत्रों की सत्ताओं के बिना ही हो पाते हैं।

    विश्व में अ-आयुधनिक सहज वैज्ञानिक-आविष्कार, सामाजिक परिवर्तन, सामाजिक विकास, वैचारिक क्रांतियां आदि आम समाज से निकले आम मनुष्यों द्वारा मनुष्य-निर्मित धार्मिक, राजनैतिक, आर्थिक आदि सत्ताओं का विरोध व प्रताड़ना झेलकर ही हुये हैं।

    यह किताब धन, मोहकता व मीडिया आदि के प्रायोजन के कारण बड़े दिखने वाले अदूरदर्शी व तात्कालिक लक्ष्य वाले कामों की चर्चा को नहीं करेगी या अत्यधिक प्रासांगिक होने पर ही करेगी। किताब मे ईमानदार व दूरदृष्टि वाले प्रयासो की चर्चा की गई है। जिनसे वास्तव मे समाज का वास्तविक विकास हो सकता है, दिखा है, हुआ है। इनमें से लगभग सभी कामों को या तो मैने नजदीक से देखा है, या मै खुद सक्रिय रूप से भागीदार रहा हूँ। यह किताब उद्योगपति, नौकरशाह, किसान, सामाजिक-संस्था आदि के द्वार आम-मनुष्य के तौर पर किये गये कार्यों व प्रयासों की बात करती है, जिनने देश व समाज को उत्तमता की ओर बढ़ने की दिशा दी, प्रेरित किया, गति दी।

    यह किताब उन लोगों के लिये बहुत कुछ लिये हुये है, जो लोग भारतीय समाज के विकास व समाधान के लिये ईमानदार सोच व प्रतिबद्धता रखते हैं।

    यह किताब ऐसे ही मनुष्यों को समर्पित है, ऐसे ही लोगों की चर्चा करती है, जो संज्ञानता या बिना-संज्ञानता के देश के निर्माण, पोषण व उत्तमता की ओर ले जाने के लिये विचार करते हैं, प्रयास करते हैं, कर्म करते हैं।

    —–
    द्वारा
    विवेक ग्लेंडेनिंग उमराव ‘नोमेड’
    www.nomadhermitage.groundreportindia.org