Tag: Vivek Umrao Glendenning
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धार्मिक कथाएं व ग्रंथ, इतिहास व इतिहासकार
किसी भी धर्म की अधिकतर पौराणिक कथायें, उस धर्म के लोगों को स्थायी रूप से मानसिक गुलाम रूपी अनुगामी बनाने के लिए लिखी गईं हैं। ताकि धर्मों की अमानवीयता, ऋणात्मकता व शोषण वाले गहरे तत्वों पर कभी सवाल न खड़ा हो पाए।यही कारण है कि पौराणिक कथायें, कथाओं में सत्य तथ्यों के अस्तित्व का भ्रामक अनुभव कराती हुई, मनुष्य सभ्यता के विकास का दावा करते हुए उसको अपनी अनुकूलता की घेरेबंदी में मजबूती से बंद रखती हैं।एक उदाहरण स्वरूप यदि वैदिक काल के समय के दावेदार साहित्य, महाग्रंथों, महाकव्यों आदि में उद्धत कथाओं को यदि संज्ञान में लिया जाए तो वैदिक काल के बारे में यही साबित होता है कि उस काल्पनिक काल में मानव समाज एक आदर्श समाज था, जीवन मंगलमय था, व्यवस्था कल्याणकारी थी, सब कुछ संतुलित व व्यवस्थित था और धर्म, विज्ञान, तकनीक व मानव का विकास अपने चरम पर था।जब भी धार्मिक कल्पनाओं व कर्मकांडों को जबरदस्ती सही साबित करना होता है तो ऐतिहासिक शोधों की बात की जाती है।ऐसे मामलों में जिसे ऐतिहासिक शोध कहा जाता है यदि उस शोध का आधार वैज्ञानिक तथ्यों पर आधारित नहीं है, तो वह ऐतिहासिक शोध कल्पनाओं, काल्पनिक कथाओं व इन पर आधारित ग्रंथों, महाग्रंथों, काव्यों व महाकाव्यों आ्दि की बेसिरपैर की खिचड़ी के अलावे कुछ भी और नहीं होता है।भारत के बहुत इतिहासकार जिनकी किताबें पढ़ीं जातीं हैं और जिनके नाम की तूती बोलती रही है या बोलती है। जिनके नामों को सबूत के तौर पर दिया जाता है। वे दरअसल इतिहास के शोधों के नाम पर ऐसी ही खिचड़ियां बनाते, पकाते व परोसते रहे हैं।यही सबकुछ पढ़ कर हजारों लाखों ने PhD कर ली, यूनिवर्सिटीज में प्रोफेसर हो गए, देश के ऊंचे नौकरशाह हो गए। इसी सब घालमेल ने देश की शिक्षा व्यवस्था की दिशा व दशा की और शिक्षा व्यवस्था की खामी के लिए गाली देने के लिए लार्ड मैकाले जैसे कुछ लोग अनंतकाल के लिए भारत की शिक्षा व्यवस्था के लिए राक्षस घोषित कर दिए गए।बेसिकली हमारा देश ऐसे ही खोखले व सतही आधारों पर खड़ा है। हमें ही तय करना है कि हम खुद को, अगली पीढ़ी को, समाज को, देश को क्या देना चाहते हैं और कैसा बनते देखना चाहते हैं …. -
समाजवादी बिल्लियों का बड़ा परिवार और फ्रैंक हुजूर
सामाजिक यायावर
जो गांवों के हैं उन्होंने अपने गावों में या अपने घरों में घरेलू बिल्लियां देखी होगीं। भारत में पाई जाने वाली घरेलू बिल्ली धारीदार व छीटदार खूबसूरत होती है। अपनी दादी, नानी, माता, बुआ, मौसी, बहन व पत्नी आदि को खाने का सामान बिल्लियों से बचाने की जुगत के साथ रखते देखा होगा। उनमें से बहुतों ने अपने घरों में अपनी दादी व नानी के द्वारा हाथ से बनाई गई मिट्टी की अलमारियां देखीं होगीं जिनमें बाहर से कड़ी भी लगती थी जिसमें छोटा सा ताला भी लगाया जा सकता था। यह जुगत बिल्ली से भोजन व दूध को सुरक्षित करने के लिए होती थी।
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बीते दिनों में गांव के लोग पालतू पशुओं व पक्षियों के साथ परस्परता में जीवन जीते थे। कभी चूक हो जाने पर यदि बिल्ली दूध पी गई तो बिल्ली को जान से नहीं मारा जाता था। बिल्ली को घर से मार कर भगाया नहीं जाता था। जिन घरों में बिल्लियां होती थीं वे बिना पाली गई होने के बावजूद पालतू होती थीं। उन बिल्लियों के बच्चों के घर के बच्चों के साथ रिश्ते बनते थे। आज भी बहुत गावों में ऐसा होता है। शहरों में भी कभी कभार ऐसा देखने को मिलता है। लेकिन बिल्ली को घर के पारिवारिक सदस्य की तरह अधिकार देते हुए पालना, भारत में प्रचलन में नहीं है, कुछ लोग पालते हैं लेकिन प्रचलन में नहीं हैं। बिल्ली पालना आसान नहीं होता क्योंकि बिल्ली स्वतंत्र जीव होती है। .
बिल्ली की आप कितनी भी देखभाल कीजिए वह कभी आपकी गुलाम नहीं बनती है। बिल्ली कुत्ते की तरह आपकी अनुगामी, भक्त या स्वामिभक्त नहीं बनती है। आप बिल्ली को रोज कई बार भोजन खिलाइए लेकिन वह कभी आपके सामने कुत्ते की तरह लार चुआते हुए आपके तलुवे नहीं चाटेगी, आपके आगे अपनी पूछ नहीं हिलाएगी। आपसे जुड़े होने के बावजूद वह अपना वजूद आपके वजूद से स्वतंत्र रखती है।
अपना वजूद स्वतंत्र रखते हुए, अपनी दृष्टि स्पष्ट रखते हुए भी आपसे जुड़े रहने की, आपके साथ मित्रवत रहने की खासियत के कारण ही शायद आत्मकथा लेखक व संपादक फ्रैंक हुजूर बिल्लियों को समाजवादी कहते हैं। फ्रैंक हुजूर कहते हैं कि उन्होंने बिल्लियों से समाजवाद के कई अध्याय सीखे हैं। फ्रैंक हुजूर ने विश्व की कई हस्तियों की आत्मकथाएँ लिखीं हैं। पाकिस्तान के विश्वप्रसिद्ध क्रिकेट खिलाड़ी इमरान खान के जीवन के ऊपर भी किताब लिखी है। सोशलिस्ट फैक्टर नामक अंग्रेजी मासिक पत्रिका के संपादक भी हैं। फ्रैंक हुजूर की जीवन संगिनी बालीवुड में अभिनेत्री हैं। टीवी सीरियल्स में काम करतीं हैं। उन्होंने भी फ्रैंक हुजूर की 40 से अधिक बिल्लियों को अपने बच्चों की तरह स्वीकार कर रखा है।
फ्रैंक हुजूर ने दुनिया के विभिन्न देशों की कई प्रजातियों की 40 से अधिक बिल्लियां पाली हुई हैं। सभी का भोजन, रहने की व्यवस्था व स्वास्थ्य आदि की देखभाल की पूरी जिम्मेदारी फ्रैंक हुजूर पारिवारिक अभिभावक की तरह उठाते हैं। फ्रैंक हुजूर को अपनी प्रत्येक बिल्ली का नाम, उसके माता पिता, दादा दादी, नाना नानी, मौसी मौसा, बुआ फूफा, बहन भाई आदि सभी के नाम व इतिहास जुबानी याद रहता है। इनके घर में हर जगह बिल्लियां ही दिखाई देती हैं। आप फ्रैंक हुजूर से मिलने पहुंचिए तो मालूम पड़ा कि जिस कुर्सी पर या सोफे पर आप बैठने जा रहे हैं वहां पर पहले से ही एक बिल्ली आराम से पसरी हुई है। चिंता न कीजिए बिल्ली आपको देखने के कुछ देर बाद आपके लिए स्थान खाली करके अपने लिए कोई नई जगह जुगाड़ लेगी। कोई गिला शिकवा नहीं। कुर्सी के लिए कोई झगड़ा नहीं। 
यदि आप रात में फ्रैंक हुजूर के अतिथि हैं और यदि बिल्लियों को आप पसंद आ गए तो सुबह जब आप जगते हैं तो आपको आपके साथ बिस्तर में कई बिल्लियां सोती मिलेंगीं। मैं इन सब बातों के जीवंत अनुभव उनके घर में अतिथि के रूप में ले चुका हूं। चूंकि सिडनी, आस्ट्रेलिया में हमारे घर में कई बिल्लियां पारिवारिक सदस्यों के रूप में रहीं हैं, इसलिए मुझे फ्रैंक हुजूर के घर में बिल्लियों के साथ बहुत ही अधिक अच्छा लगता है। फ्रैंक हुजूर ने बिल्लियों के नाम दुनिया की हस्तियों के ऊपर रखे हैं। आपको विक्टोरिया, ब्रूटस, नेपोलियन, लेनिन, लोहिया, टीपू आदि ऐतिहासिक पात्रों के नाम इनकी बिल्लियों के नामों में मिल जाएंगें। बिल्लियों के समाजवादी दर्शन के बारे में फ्रैंक हुजूर ने एक बिल्ली “लार्ड बोका” जिसका देहांत हो चुका है के ऊपर काफी कुछ लिखा है। यदि आप इच्छुक हों तो आप http://lordboca.com और http://www.newskarnataka.com/india/man-who-built-a-shrine-in-the-memory-of-a-cat में जाकर A devine socialist cat के बारे में पढ़ सकते हैं।
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प्रतिक्रिया के कारण हो रही सामाजिक चेतनशीलता के लिए भाजपा, सहयोगी संगठन व भक्तगण धन्यवाद के पात्र हैं
सामाजिक यायावर
समाज में बने बनाए ढर्रों, मान्यताओं, परंपराओं, धारणाओं आदि पर सवाल उठना किसी न किसी कारक के कारण शुरू होता है। उत्प्रेरक कारक न होने पर सड़ांध के स्तर का होने के बावजूद ढर्रे, मान्यताएं, धारणाएं आदि ढोई जाती रहतीं हैं।
2014 में भाजपा की केंद्र सरकार आने के बाद भाजपा, सहयोगी संगठनों व भक्तगणों के बयानों, व्यवहारों व क्रियाकलापों के कारण लोग प्रतिक्रिया स्वरुप सवाल खड़ा करने लगे हैं। धर्म व जाति के मकड़जाल के प्रति आम लोगों की धारणाएं व मान्यताएं ढहने लगी हैं। लोग धर्म व जाति पर सवाल खड़ा करने लगे हैं, बहस करने लगे हैं। भले ही यह प्रतिक्रियात्मक हो लेकिन यह चिंगारी का काम कर रही है।
इस चिंगारी में घी का काम टीवी, अखबार जैसा मीडिया व सोशल मीडिया महत्वपूर्ण किरदार निभा रहा है। टीवी व अखबार का मीडिया तो लार चुआते लालची व पालतू कुत्ते की तरह व्यवहार करने व खुद को किंग-मेकर मानने के नशे व अहंकार के कारण सरकार बनने के बाद भी अब भी चुनाव प्रचार में ही लगा हुआ है। इस मीडिया की हैसियत दरबार के भांट जैसी हो गई है। जिसे सत्ता की शान में गाना गाना ही है नहीं तो लतियाकर दरबार से बाहर फेंक दिया जाएगा।
भला हो 2G जैसे घोटालों का जिनके कारण आम आदमी के हाथों में सस्ते मोबाइल व सस्ता इंटरनेट पहुंच गया और लोगों ने सोशल मीडिया का इस्तेमाल करना शुरू कर दिया। टीवी व अखबार में कुछ आया, नेताओं/धर्मगुरुओं आदि किसी ने कोई बयान दिया, इधर लोगों ने अपनी अपनी समझ, सोच व स्वार्थ के अनुसार उस पर अपनी प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी।
टीवी में किसी कार्यक्रम के लिए तैयारी करनी पड़ती है। अखबार छापना पड़ता है। लेकिन सोशल मीडिया में सिर्फ कुछ बटनें दाबनी पड़तीं हैं और बात जंगल में आग की तरह फैलती है। सोशल मीडिया में लोग परस्पर विरोधी विचारों को पढ़ते, देखते, सुनते, समझते हैं। वै जैसे भी हैं वैसे ही खुद को व्यक्त कर लेते हैं।
सोशल मीडिया में जो ढोंगी है वह बहुत अधिक बड़ा ढोंग कर लेता है। जो झूठ बोलता है वह बहुत अधिक बड़ा झूठ बोल लेता है। जो मक्खनबाज है वह बहुत अधिक बड़ी मक्खनबाजी कर लेता है। जो अंदर से हिंसक है वह मानसिक हिंसा कर लेता है। जो जैसा है और जो करना चाहता है वह सोशल मीडिया का वैसे ही प्रयोग करता है। लोग अपने जैसों के साथ जुड़ते हैं। जो जैसा है उसको वैसे लोग मिल जाते हैं। उसकी बात वाहे ऋणात्मक हो या धनात्मक हो, बुरी हो या अच्छी हो, उसकी पहुंच का दायरा बहुत गुना बढ़ जाता है।
भले ही कितना हो हल्ला हो, उपहास उड़ाया जाए, बेढंगे तर्क दिए जाएं लेकिन अब लोगों के अंदर की धार्मिक व जातीय धारणाओं व मान्यताओं को ढहने से बचा पाना असंभव है। ज्यों ज्यों सोशल मीडिया का दायरा बढ़ता जाएगा त्यों त्यों लोग अपना दर्द व झेला हुआ यथार्थ आपस में साझा करना शुरू करेगा।
चूंकि आम समाज के लोग अपने जीवन में बहुत कुछ झेलते हैं यही कारण है कि प्रतिक्रिया सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत तेजी से फैलती है। झेला हुआ दर्द आपस में एक बांड बन जाता है। ज्यों ज्यों दबे कुचले व शोषित जातियों के लोग भी अधिक से अधिक इंटरनेट व सोशल मीडिया का प्रयोग करना सीखते जाएंगें। प्रतिक्रियात्मक बदलावों की आग बढ़ती जाएगी। इसके लिए धरना प्रदर्शन, कैंडल मार्च में लोगों की संख्या का होना या न होना महत्व नहीं रखता है। क्योंकि सारा खेल तो उसके मन के भीतर चल रहा उठापटक का है।
स्त्रियां मंदिरों के लिए आंदोलन करने लगीं हैं। दलित छात्र एकजुट होने लगा है। ऐसा दिख रहा है कि आगे आने वाले समय में दलित व पिछड़ा भी एकजुट हो सकता है।
भले ही यह प्रतिक्रियास्वरूप हो लेकिन दीवारें तो ढहने लगी हैं। सबसे जरूरी बात है धारणाएं व मान्यताएं टूटना, उन पर सवाल खड़ा होना। इतना शुरू हो जाए तो फिर बहुत कुछ अपने आप टूटने लगेगा। मैं इसको समाज के लिए लंबी दूरी के लिए बेहतर मानता हूं।
चलते-चलते
2014 के चुनावों में लोगों ने अपने जीवन में बदलाव के लिए सत्ता सौपी थी। आम लोगों को उनके जीवन में आमूलचूल बदलाव का बहुत बड़ा सपना भी दिखाया गया था। मैंने 2014 में चुनावों के बाद एक पोस्ट में लिखा था कि अब भाजपा को मीडिया का प्रयोग अगले लोकसभा चुनाव तक नहीं करना चाहिए। क्योंकि अब भाजपा की सरकार है और यदि मीडिया फिजूल में जबरन सरकार की प्रशंसा करेगा तो लोग नाराज होना शुरू हो जाएंगें क्योंकि लोग धरातल में रहते हैं। सरकार यदि कुछ अच्छा करती है तो उसका प्रभाव व असर लोगो को अपने जीवन में दिखता है। इसके लिए मीडिया के ढोल मजीरे की जरूरत नहीं होती है। लेकिन मीडिया के प्रयोग को लोगों का माइंडसेट बनाने के लिए ब्रह्मास्त्र मानने की गलती लगातार व बारबार दुहराई जा रही है। अन्य राजनैतिक दलों के लोग भी यही पद्धति प्रयोग करना शुरू कर चुके हैं। यह सब जो भी हो रहा है वह भारत के लोगों की चेतनशीलता के लिए बहुत ही लाभदायक है।
कोई बड़ी बात नहीं कि आगामी पांच दस वर्षों में ही भारत के लोग भारत की मुख्य मीडिया व वर्तमान राजनैतिक दलों, जातियों व धार्मिक मान्यताओं व धारणाओं को बिलकुल ही गिराकर ढहाना शुरू कर दें।
कुछ भी हो समाज में ऐसी प्रतिक्रियाएं उत्पन्न करने के लिए भाजपा, सहयोगी संगठनों व भक्तों को जबरदस्त क्रेडिट जाता है।
सामाजिक यायावर
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मानव-निर्मित धर्म और बाबाओं का बाजार
“मानसिक, सामाजिक, आर्थिक स्वराज्य की ओर”
साभार – पृष्ठ संख्या 242 से 245मैंने कॉफी पीते मित्र से कहा कि सच्चे बाबाओं/गुरूओं/संतों को छोड़कर शेष बाबाओं के लिए भारत विश्व का सबसे बड़ा बाजार है।
मित्र : आपका मतलब भारत में कई प्रकार के बाबा होते हैं।
नोमेड : जी, बाबाओं के कई चारित्रिक प्रकार है। जैसे गरीबों के बाबा, मध्यवर्ग के बाबा, उच्च-मध्यवर्ग के बाबा, उच्चवर्ग के बाबा, व्यापारियों के बाबा, ऊंचे वेतन वाले नौकरीपेशा व नौकरशाहों के बाबा आदि।मित्र : भारत में इतने बाबा लोग क्यों हैं
नोमेड : इसका कारण भारत में मानव-निर्मित ईश्वर के प्रतिनिधियों की बहुत बड़ी संख्या का होना है। चूंकि परंपरा में मानव-निर्मित ईश्वर की अवधारणा में यह मान लिया गया है; कि ईश्वर जादू से समस्या हल कर देता है, ईश्वर जादू से मानवीय स्वार्थ की इच्छायें पूरी कर देता है, ईश्वर जादू से भोगविलास व ऐशोआराम की इच्छायें पूरी कर देता है। सारांश यह कि ईश्वर का काम मनुष्य को भोग-विलास करवाना है, जो ईश्वर भोग करवा दे वह महान् व शक्तिशाली, जो न भोग करवा पाएउस पर आस्था खतम करके दूसरे प्रकार के ईश्वर में आस्था रखना।भारतीय समाज में परंपरा में लोगों के मन में यह धार्मिक अनुकूलन बनाया गया है कि कुछ लोग ईश्वर से संपर्क रख सकते हैं, ईश्वर से संवाद कर सकते हैं, ईश्वर से सिद्धियां सीख सकते हैं, ईश्वर को मानव की इच्छा पूर्ति के लिए प्रसन्न कर सकते हैं और मुंहमांगा वरदान प्राप्त कर सकते हैं आदि आदि।
मित्र : मैं ठीक से समझा नहीं।
नोमेड : लड़का पैदा करना हो, लड़की न पैदा करना हो, छोटे बच्चे से लेकर ऊंचे वेतनमान की परीक्षा तक किसी में भी सफलता प्राप्त करनी हो, सुंदर पत्नी प्राप्त करनी हो, कमाऊ पति प्राप्त करना हो, बीमारी का इलाज करना हो, दुश्मन को क्षति पहुंचानी हो, नौकरी प्राप्त करनी हो, प्रमोशन प्राप्त करना हो, किराएपर मकान लेना हो, मकान के लिए किरायेदार मिलना हो, पति को दुरुस्त करना हो, पत्नी को दुरुस्त करना हो, बेईमानी करके उसको महानता में बदलना हो, काली करतूतों को सफेद करना हो, पाप करके किएगएपाप को पुण्य में परिवर्तित करना हो आदि आदि अनेकों प्रकार के चिल्लर कामकाज व आवश्यकतायें हैं। जिनके लिए लोगों को ईश्वरीय प्रतिनिधियों की आवश्यकता पड़ती है। भारत के लोगों की सहज मानसिकता है कि पुरुषार्थ के बजाय, काम कराने के लिए संपर्क व संबंध खोजते हैं। और ऐसी मानसिकता का कारक भी परंपरा में ईश्वरीय प्रतिनिधियों का प्रायोजित होना ही है।मित्र : इसका बाबा लोग से क्या रिश्ता है।
नोमेड : बहुत गहरा रिश्ता है। भारत में परंपरा में ऐसा धार्मिक अनुकूलन किया गया है कि कुछ लोग ईश्वर के प्रतिनिधि होते हैं जिनके माध्यम से ईश्वर मनुष्यों के साथ संपर्क रखते हैं। इन प्रतिनिधियों को बिना किसी भी शंका के पूरे समर्पण के साथ स्वीकारना है और इनके प्रति सेवा व समर्पण का भाव रखना है।मनुष्य हर उस तंत्र का मानसिक व वैचारिक अनुगामी होना स्वीकार कर लेता है, जो उसकी ऐश्वर्य, सुविधा व भोग-विलास की इच्छा की पूर्ति कराने का दावा करता है। तो जिन लोगों ईश्वर के साथ संपर्क रखने वाला प्रायोजित कर दिया जाता है, लोभी, मृत्यु व मृत्यु के पश्चात् नर्क की प्रताड़नाओं से भयभीत लोग उनको अपना गुरू स्वीकार कर लेते हैं, उनको पवित्र व पूजनीय मान लेते हैं ताकि उनके माध्यम से ईश्वर को प्रसन्न कर सकें और आकाशीय-स्वर्ग या भू-स्वर्ग आदि की प्राप्ति कर सकें।
मित्र : गुरू को तो बहुत महान् माना जाता है।
नोमेड : इसी मान्यता व अनुकूलन का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपने अनुयायी बनाते हैं और अनुयायियों में अपने प्रति बिना मूल्यांकन व विश्लेषण के अंधी आस्था पैदा व विकसित करते हैं, जिसके समक्ष कोई भी उचित तर्क व कारक आदि सभी व्यर्थ है, कूड़ा है, मिट्टी है, अस्तित्वहीन हैं, अप्रासांगिक हैं।पारंपरिक धार्मिक अनुकूलन में गुरू को सबसे अधिक महान् बताया गया है। इस मूल्य का दुरुपयोग करके बाजारू बाबा लोग अपनी गुरूता पर अंधी आस्था रखने का अनुकूलन स्थापित करते हैं और बिना शंका अंधी आस्था कायम रखने के लिए गुरू संपूर्ण है, ईश्वरीय चेतना से संपन्न है, ईश्वर की सक्रियता व अभिव्यक्ति का अंश है इसलिए शिष्य कभी गुरू से आगे नहीं जा सकता है आदि आदि गुरु-शिष्य परंपरा के रूप में प्रायोजित करते हैं।। शिष्य द्वारा गुरू पर शंका करना अक्षम्य अपराध है, इस अपराध के लिए गुरू को शिष्य को घोर से घोर दंड देने का अधिकार है। शिष्य को गुरू का मानसिक व शारीरिक दास बनना होता है।
मित्र : आप कहना चाहते हैं कि लोगों के मन में बैठी ऐसी परंपरागत सामाजिक व धार्मिक अनुकूलन का लाभ उठाने वाले बाजारू बाबा लोग हैं।
नोमेड : जी बिलकुल। बाजारू बाबा लोग बड़े चतुर हैं, भलीभांति समझते हैं कि भारतीय समाज के लोग धर्मभीरु हैं और स्वार्थ पूर्ति के लिए बिना पुरुषार्थ का शार्टकट खोजते हैं। और लोगों के लिए ईश्वर का मतलब जादू करके मनुष्य की भोगने की इच्छाओं की पूर्ति कराने वाला है।इसलिए जो मृत्यु के निकट नहीं हैं वे और अधिक सांसारिक भोगों के लिये; जो मृत्यु के निकट हैं वे जीवन भर किएगएस्वार्थ के कामों, हिंसा व पापों की जवाबदेही से बचकर स्वर्ग में ऐश्वर्य भोगने के जुगाड़ के लिये; बाबाओं रूपी ईश्वरीय प्रतिनिधियों के अनुगामी बनते हैं।
मित्र : जुगाड के लिए क्या करना होता है।
नोमेड : जुगाड़ के लिए कुछ विशेष नहीं करना होता है। अलग-अलग बाबा अपना अलग तरीका लेकर चलता है ताकि अनुयायियों के अंदर गुरू की अद्वितीयता का अहसास भी हो और कर्मकांड करना बहुत दुष्कर भी न हो। इसलिए किसी पशु को कुछ खिलाना/नहलाना/पानी-पिलाना या किसी को दान करना आदि आदि; किसी रंग का कपड़ा पहनना या दान करनाआदि आदि; किसी दिन कुछ करना या न करना आदि आदि; माता पिता या बड़े-बूढ़ों के दिन में कई बार पैर छू लो या रात में किसी विशेष समय जग कर पैर छू लो आदि आदि, इससे माता पिता और बड़े बूढ़े भी गुरु जी के ऊपर प्रसन्न हो गएऔर उनका गुरू जी का प्रचार भी हो गया। इसी प्रकार का कुछ ऊटपटांग करना व करवाना और तर्को से किएजा रहे कर्मकांड का संबंध दैवीय प्रयोजन से सिद्ध कर देना।आजकल तो आध्यात्मिक बाबा लोग का फैशन आ गया है। जागरूक व पढ़ेलिखे लोग अपने लिए अलग प्रकार के आध्यात्मिक बाबा लोग चाहते हैं। एबाबा लोग इन लोगों को जीने का तरीका सिखाते हैं, व्यवहार करना सिखाते हैं, शांति सिखाते हैं, बाकायदा कोर्स कराते हैं, कोर्स की फीस लेते हैं। फीस लेना प्रोफेशनल्स को बाबा का प्रोफेशनल, ईमानदार व वजनदार होना सिद्ध करता है।
पैसे कमाने और ग्लैमर भोगने के लिए बेइंतहा दौड़-भाग करते ऊंचे वेतन वाले प्रोफेशनल्स लोग जब कभी अपने बाजारूपन से अलग हटकर कुछ सोचते हैं तो उनको अंदर से भय, असुरक्षा, घुटन व कुंठा आदि महसूसती है। तो इससे पलायन करने के लिए ये लोग अपने लिए किसी को अपना आध्यात्मिक गुरू मान लेते हैं और फिर गुरू के बताई पद्धतियों के नशे में छद्म शांति महसूसते हुए पूर्ववत जीवन जीने लगते हैं।
उपभोक्ता रूपी मनुष्य की हर वास्तविक/संभावित/आभासी आवश्यकता के लिए विकल्प प्रस्तुत कर देना ही, बाजार के तंत्र की सफलता व मजबूती है। बाजार में उपलब्ध आध्यात्मिक व गैर-आध्यात्मिक बाबा लोग भी ऐसे ही बाजारू विकल्प हैं। किसी ने लोगों से किसी बाबा के बारे में सुना, अपनी तथाकथित मूल्यांकन क्षमता व बौद्धिकता आदि से बाबा को तौला और पसंद आने पर उस बाबा को गुरू मान लिया। व्यक्ति को अपनी पसंद का गुरू बाजार में उपलब्ध है।
मित्र : इन बाबाओं के पास इतना पैसा कहा से आता है।
नोमेड : बाबा लोगों के पास मुख्यतः दो प्रकार के लोगों के द्वारा पैसा अधिक आता है। व्यापारी व व्यापारियों के परिवारों से और बड़ी कंपनियों में काम करने वाले प्रोफेशनल्स, नौकरशाहों व उनके परिवारों से।मित्र : ऐसा क्यों, व्यापारियों की बात तो समझ आती है लेकिन नौकरशाह व प्रोफेशनल्स …… अचरज की बात है।
नोमेड : ऐसा इसलिए कि व्यापारियों के बाद सबसे अधिक असंतुष्ट, भ्रमित व अनैतिक लोग एही लोग हैं। इन लोगों का भ्रम, अनैतिकता व अर्थ की ताकत का अहंकार इनको अंदर की शांति नहीं प्राप्त करने देते हैं। दूसरों की तुलना में पैसा अधिक होने से अहंकार का स्तर बहुत ही ऊंचा होने के कारण ये लोग अंदर की ईमानदारी के साथ सामाजिक भी नहीं हो पाते। बाबाओं का चेला बनने से, दूसरे चेलों के साथ तथाकथित सामाजिकता का ढोंग भी जीने को मिल जाता है।भारत में अमूमन व्यापारी वर्ग गैर पढ़ा लिखा होता है, इसलिए इनके धार्मिक बाबा लोग पढ़े-लिखे लोगों के बौद्धिक श्रेष्ठता के अहांकारों को नहीं सुहाते हैं। इसलिए पढे-लिखे व स्वयंभू जागरूक लोगों ने अपने लिए अलग किस्म के बाबा बना लिए हैं, जिनको ये लोग आध्यात्मिक बाबा कहना पसंद करते हैं, जो इनके तार्किक अहंकारों को तर्कों से तुष्ट करते हुएबाबागिरी करते हैं।
भारत में धार्मिक व आध्यात्मिक बाबागिरी बहुत बड़ा व ताकतवर उद्योग बन चुका है। ये लोग बाकायदा विभिन्न सत्ताओं जैसे बाजार व राजनैतिक सत्ताओं आदि के एजेंट की तरह भी काम करते हैं और अपने वेतनभोगी कर्मचारी भी रखते हैं। प्रचार कंपनियों से अपना प्रचार भी करवाते हैं और लाभ कमाते और कमवाते हैं। उद्योग बनने का एक कारण “आस्तिक व नास्तिक” की भ्रामक परिभाषाओं का प्रचलन भी है।
मित्र : आप आस्तिक या नास्तिक किसे कहते हैं।
नोमेड : बात मेरे कहने की नहीं है। बात आस्तिक व नास्तिक शब्दों के शाब्दिक अर्थ व किस संदर्भ में प्रयोग करने के लिए ये दोनों शब्द बनाए गए। इन शब्दों की शुरुआत होने का मत यह भी है कि वेदों को मानने वाला आस्तिक व वेदों को न मानने वाला नास्तिक है।यदि शाब्दिक अर्थ में जाएं तो इनका अर्थ कुछ यूँ निकलता है। आस्तिक = “जो है” उस पर विश्वास करने वाला और नास्तिक = “जो नहीं है” उस पर विश्वास करने वाला।
मानव-निर्मित ईश्वर तो मानव का गढा हुआ है, इसलिए मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करने का तात्पर्य “जो नहीं है” उस पर विश्वास करना हुआ। जो मानव-निर्मित ईश्वर पर विश्वास करते हैं वे भयंकर रूप से ‘नास्तिक’ होते हैं, वह भी जबरदस्त अहंकार व हिंसक भावना से ओतप्रोत क्योंकि ये लोग ईश्वर को मनमाफिक गढ़ते हैं। जो निर्विकार अस्तित्व पर विश्वास करता है केवल वही “आस्तिक” है, क्योंकि वह “जो है” उस पर विश्वास करता है।
लोग यदि इन दो शब्दों का अर्थ ही समझ लें तो जो बाबा लोग ढोंगी हैं, तो ऐसे बाबाओं के छद्म-जालों की मानसिक व वैचारिक दासताओं के चंगुल से बाहर निकलने की संभावना बनी रहती है।
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हम, हमारी स्मार्टनेस बनाम भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी – (भाग 01)

सामाजिक यायावर यह लेख-श्रंखला गंभीर, विचारशील, चिंतनशील व सामाजिक मुद्दों की धरातलीय हकीकत को समझने की दृष्टि रखने वाले लोगों के लिए है। भावनात्मक आवेग, धार्मिक/जातीय प्रतिक्रियाओं/आवेशों, राजनैतिक पूर्वाग्रहों व संरेखणों, अतथ्यात्मक/कुतर्क/वितर्क बहसबाजी करने वाले व वास्तविक विकास की समझ न रखने वाले महानुभावों के स्वाद के लिए इस लेख-श्रंखला में शायद ही कुछ हो।
मेरा प्रयास सदैव यही रहता है कि मैं कोरी भावुकता, भावनात्मक आवेग, धार्मिक या जातीय उन्माद/प्रतिक्रिया, खोखले तर्को/तथ्यों, निहित स्वार्थों/पूर्वाग्रहों व राजनैतिक पूर्वाग्रहों/संरेखणों आदि के आधार पर न लिखूं। संभवतः यही कारण है कि सोशल साइट्स में विचारशील व सामाजिक दृष्टिवान लोग ही मुझे पढ़ते हैं और मेरा लिखा पसंद करते हैं। मेरे साथ ऐसा बहुत बार हो चुका है कि मेरी बातों की गहराई लंबे समय बाद समझी गई है और स्वीकृत की गई है। यहां तक कि मेरे जमीनी कामों के प्रमुख साथियों को भी मेरी बातों को समझने में कई-कई वर्ष कभी कभी पांच से दस वर्ष तक भी लग गए हैं।
मैं सन् 2013 से सन् 2015 तक कई बार भारत में प्रस्तावित रेडीमेड स्मार्ट सिटी, बनारस को क्योटो शहर बनाने जैसे मुद्दों पर सोशल मीडिया में लिख चुका हूं। आजकल कुछ पाठकों ने इन मुद्दों पर लिखे गए मेरे पुराने छोटे बड़े लेखों को खोज कर फिर से उन पर टिप्पणियां देना शुरू किया है। इसलिए स्मार्ट सिटी पर यह लेख-श्रंखला मित्रों को प्रस्तुत है।
हम भारतीयों की वर्तमान मानसिकता, सोच, समझ, कंडीशनिंग व जीवन शैली के आधार पर स्मार्ट सिटी कैसे हो सकते हैं। इस पर बात करने के पहले हम स्मार्ट सिटी क्यों चाहते हैं इसको समझने का प्रयास होना चाहिए।
दरअसल हम दिखावटी तौर पर कितना भी भारत व भारतीय संस्कृति की महानता का दावा ठोंकते रहें, कितना भी ड्रामेबाजी करते रहें लेकिन वास्तव में हमारे अंदर पाश्चात्य देशों व उनकी जीवन शैली ही आदर्श के रूप में स्थापित रहती है। हम मुंह से कुछ भी बोलते रहें लेकिन हम अपनी जीवन शैली में पाश्चात्य देशों की शैली का ही अनुकरण करते हैं व करना चाहते हैं।
हम रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों तक में अपने बच्चों को पढ़ाना अपनी स्मार्टनेस समझते हैं। हर शहर, हर कस्बे में कुकुरमुत्तों की तरह अंग्रेजी मीडियम स्कूल खुल गए हैं। हम अपने बच्चों को वहां भेजते हुए फक्र महसूस करते हैं।हिंदी मीडियम स्कूलों की तुलना में कई गुना अधिक फीस भी देते हैं। हमारे बच्चे भी हिंदी मीडियम स्कूलों में जाने वाले बच्चों से स्वयं को श्रेष्ठ समझते हैं और उन बच्चों को हीन व हेय मानते हैं। ऐसी सोच हम खुद भी रखते हैं।
दरअसल हम रेडीमेड तरीके से स्मार्ट होना चाहते हैं, हम रेडीमेड तरीके से विकसित होना चाहते हैं। इसलिए बाजार जाते हैं और स्मार्ट बनने के रेडीमेड टोटके खोजते हैं। हम जींस व टीशर्ट पहनना शुरू कर देते हैं, सुपर मार्केट में सामान खरीदना शुरू कर देते हैं भले ही हमें जींस, टीशर्ट व सुपर मार्केट की कतई जरूरत न हो। हम अपने बच्चों को स्मार्ट करना चाहते हैं तो उनको रद्दी से रद्दी अंग्रेजी मीडियम स्कूलों में भी महंगी से महंगी फीस भरकर भेजते हैं। लाखों रुपए सालाना डोनेशन देकर रद्दी इंजीनियरिंग व मेडिकल कालेजों में भेजते हैं, यदि ज्यादे रुपयों का जुगाड़ हो गया तो विदेशों में लाखों रुपए महीना फीस व खर्चों का इंतजाम करके बच्चों को डिग्री लेने के लिए भेजते हैं वह बात अलग है कि बच्चा डिग्री लेकर भी परजीवी की तरह ही रहता है। लेकिन हम तो खुद को अपने गली मुहल्ले में स्मार्ट साबित कर लेते हैं।
जो साधारण मोबाइल का प्रयोग करता है वह स्मार्ट नहीं है, जो आईफोन का प्रयोग करता है वह स्मार्ट है। जो लड़की जींस व टीशर्ट पहने वह स्मार्ट, जो लड़की सलवार कुर्ता दुपट्टा पहने वह दकियानूसी। जो टाई पहने वह स्मार्ट जो कुर्ता पायजामा पहने वह दकियानूसी। जो बियर पिए, वाइन पिए वह स्मार्ट जो अपने हाथ की बनाई महुआ की दारू पिए वह पिछड़ा व हीन। जो महंगी मोटरसाइकिल में चले वह स्मार्ट, जो साइकिल में चले या पैदल चले वह पिछड़ा, मूर्ख व हीन।
यही इसी प्रकार की बाजार से खरीदी जाने वाली सतही सड़कछाप स्मार्टनेस, सफलताएं, उपलब्धियां आदि ही हमारी जीवन शैली बन चुकी हैं, और हमारे जीवन का उद्देश्य व उपलब्धियां भी। हमारे अंदर इसी बाजारू स्मार्टनेस व इसके सतहीपन के कारण ही हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जा रहे हैं। हम सबकुछ बाजार से रेडीमेड खरीदना चाहते हैं, हमारा सबकुछ बाजार से ही तय हो रहा है। बाजार से खरीदने के लिए हमें धन व संपत्ति चाहिए होता है। इसलिए धन व संपत्ति के लिए हम दिन प्रतिदिन अधिक भ्रष्ट होते चले जाते हैं, सतही व खोखले होते चले जाते हैं।
हमारे अंदर आविष्कार, अनुसंधान व निर्माण करने की सोच व क्रियाशीलता नहीं होती, वास्तविक उद्यमशीलता नहीं होती है। होने की बात छोड़िए हम इन गुणों का तिरस्कार करते हैं, उपहास करते हैं। जैसे हम, वैसा हमारा समाज, वैसे हमारे व्यापारी व उद्योगपति, वैसे हमारे जन प्रतिनिधि, वैसे हमारे नौकरशाह और वैसे ही हमारे नीतिनिर्माता।
हमारे अंदर स्मार्ट सिटी के प्रति नशा इसलिए सवार है क्योंकि हम अपने अंदर पाश्चात्य देशों की तरह साफ सुथरे चमचमाते शहरों व जीवन शैली को रेडीमेड तरीके से जीना चाहते हैं। स्मार्ट सिटी के बारे में हमारी कल्पना है कि अचानक हमारे शहरों को अमेरिका का न्यूयार्क, इंग्लैंड का लंदन, फ्रांस का पेरिस, आस्ट्रेलिया का सिडनी बना दिया जाएगा। हमें लगता है कि ऐसे शहर बाजार से रेडीमेड खरीदे जा सकते हैं। स्मार्ट सिटी के नाम पर यह जितनी कवायद हो रही है, वह बाजार से रेडीमेड स्मार्ट सिटी खरीद कर कहीं रख देने जैसी ही कवायद है। विश्वास कीजिए हमारे स्मार्ट सिटी भी सड़कछाप, सतही व टपोरी टाइप ही होगें।
इस लेख पर कुछ बात हुई हमारी अपनी स्मार्टनेस पर। हमारे प्रस्तावित स्मार्ट सिटीज पर बात श्रंखला की अगली कड़ी में।
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स्त्री का शरीर व शरीर के अंग भड़काऊ नहीं होते, स्तन व योनि जैसे यौनांग भी नहीं
सामाजिक यायावर
शुचिता के नाम पर, संस्कार के नाम पर, संस्कृति के नाम पर, शालीनता के नाम पर, सौंदर्य के नाम पर स्त्रियों के पहनावे आदि पर सवाल खड़े करना बहुत अधिक आम बात है। यहां तक कि बलात्कार, छेड़खानी व बदतमीजी आदि का ठीकरा भी स्त्री के पहनावे पर ही फोड़ दिया जाता है।
बकवास, कुतर्क, मानसिक विकृति, वैचारिक विकृति व बेहूदगी के आवेश/आवेग में कहा कुछ भी जाए लेकिन यह एक तथ्य है कि यदि कोई पुरुष स्त्री को भोग्या के तौर पर नहीं देखता है तो उसके सामने यदि स्त्री निर्वस्त्र भी खड़ी है तो उस पुरुष में कामवासना का भाव नहीं आएगा। वह स्त्री के शरीर को एक साधारण वस्तु के रूप में सहजता से ही स्वीकारेगा।
जब बचपन से ही लड़कों के अंदर लड़की को यौन रूप से पुरुष के द्वारा भोग्या और लड़कियों के अंदर खुद को यौन भोग्या माने जाने के रूप में जबरन ठूंस दिया जाता है। तो लड़के की मानसिक कंडीशनिंग लड़की को भोग्या के रूप में देखने की और लड़की की मानसिक कंडीशनिंग खुद को भोग्या के रूप में देखने की हो जाती है। बहुत गहरे अंदर अवचेतन में यह कंडीशनिंग पैठ बना लेती है और मन के भावों व विचारों को नियंत्रित करने लगती है।
स्त्री के पहनावे आदि की बात की जाती है। किंतु जिनको स्त्री को भोग्या के रूप में देखना होता है वे पूरे कपड़े पहने स्त्री को भी ऐसे देखते हैं जैसे कि कपड़ों को भेदकर स्त्री का हर अंग देख लेगें और पकड़ कर भंभोड़ डालेंगें। इसको समझने के लिए के लिए बहुत बड़ी बहस की जरूरत नहीं है, सहजता से समझा जा सकता है।
स्त्री के स्तन जो ब्रा व ब्लाउज से ढके रहते हैं, ऊपर से पल्लू रहता है तब भी देखने वाला पुरुष ऐसे देखता है जैसे सबकुछ दिख रहा है। स्तनों को मसलने तक की कल्पनाएं कर लेता है। ब्रा, ब्लाउज व पल्लू आदि की बात छोड़िए। स्त्री यदि रजाई से ढकी भी लेटी हो और उसका कोई अंग न दिख रहा हो, केवल पुरुष को यह मालूम पड़ जाए कि रजाई के अंदर स्त्री है तब भी उसके सारे अंगों की कल्पना वैसे ही करेगा जैसे कि सामने देख रहा हो। सारे यौनांगों की कल्पनाएं कर डालेगा। स्त्री पैंटी पहने होगी, पैंटी के ऊपर सलवार या पैंट या साड़ी या लहंगा या कुछ और। लेकिन देखने वाला पुरुष स्त्री द्वारा पहने गए दो तीन परतों के कपड़ों को भेदकर भी योनि व चूतड़ों को देखने और भभोड़ने की कल्पना कर लेता है।
यदि स्त्री के यौनांग पुरुष में कामुकता पैदा करते हैं तो एक नवजात बच्ची की योनि के द्वारा या एक बहुत वृद्ध महिला के अंग भी कामुकता पैदा करने चाहिए। किशोर व युवा उम्र की स्त्रियों के अंगों से कामुकता पैदा होती है ऐसा क्यों?
यदि स्तन व योनियां पुरुष में कामुकता पैदा करती हैं तो गाय, भैंस, बिल्ली, बकरी, भेंड़, कुतिया, गदही, घोड़ी, हथिनी, ऊंटनी आदि पशुओं की मादाओं के पास भी स्तन व योनियां होती हैं और ये मादाएं बिना कपड़े पहने खुलेआम घूमती रहती हैं, तब पुरुषों में कामुकता क्यों नहीं पैदा होती है जबकि इन पशु-मादाओं की योनि की बाहरी बनावट लगभग मनुष्य स्त्री की योनि के जैसी होती है।
पुरुष अपनी बकरियों, भैंसों, गायों, भेड़ों, घोड़ी, गदही, ऊँटनी आदि को पशु पुरुष के पास गर्भाधान के लिए लेकर खुद जाता है, पशु उसके सामने ही यौन क्रिया करते हैं इसके बावजूद पुरुष के अंदर बकरी, भैंस, गाय, भेंड़, गदही, घोड़ी आदि से सेक्स करने की इच्छा क्यों नहीं पैदा होती है जबकि उसकी आंख के सामने ही पशु मादा की योनि में पशु पुरुष अपने शिश्न को प्रवेश कराता है, यौन क्रिया करते हुए योनि के अंदर वीर्यपात करता है।
मैं ऐसे कई आदिवासी समाजों से मिल चुका हूं जहां आज भी स्त्रियां अपने स्तनों को नहीं ढकती हैं। उन समाजों के पुरुषों के अंदर तो स्त्री के स्तन देखकर कामुकता या वासना नहीं पैदा होती है। आदिवासी समाज में बलात्कार नहीं होते हैं। आदिवासी समाज में छेड़खानी नहीं होती है। जबकि स्त्री तो अर्धनग्न रहती है। स्त्री पुरुष दोनो दारू पीते हैं। स्त्री अर्धनग्न, स्त्री पुरुष दोनो दारू के नशे में लेकिन फिर भी नहीं बहकते हैं, बलात्कार नहीं होते हैं, यौन छेड़खानी की बेहूदीगियां नहीं होती हैं। जो पुरुष स्त्री को भोग्या के रूप में न देखकर अपने ही जैसे मनुष्य के रूप में देखता है उसको क्या फर्क पड़ता है कि स्त्री ने कपड़े पहने हैं या नहीं पहने हैं।
वास्तविक तथ्य तो यही है कि वासना मानसिक होती है। वासना किसी शारीरिक अंग के आकार प्रकार पर निर्भर नहीं होती है। दरअसल पुरुष के द्वारा स्वयं की वासना कामुकता के लिए स्त्री को गुलाम बनाने या प्रतिबंधित करने की जरूरत नहीं है। यदि जरूरत है तो खुद के अंदर स्त्री को अपने जैसा ही मनुष्य स्वीकारने की, स्त्री के स्वतंत्रता के अधिकार को स्वीकारने की।
स्त्री को यौन भोग्या के रूप में देखना, स्त्री शरीर के प्रति कामुक बने रहना मानसिक यौन विकृति है। वैसे ही जैसे मानसिक यौन विकृत पिता अपनी पुत्री व भाई अपनी बहन से संभोग करता है। हमारे समाज में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं भले ही इन घटनाओं के सच को दबा दिया जाता हो।
मैं तो कहता हूं कि जिन लोगों को यह लगता है कि स्त्री के अंग स्तन व योनि कामुकता बढ़ाते हैं उन लोगों को बकरी, कुतिया, घोड़ी, गदही, भेंड़, भैंस व गाय आदि के साथ भी यौन क्रिया करना चाहिए। योनि ही तो है क्या फर्क पड़ता है किस प्रजाति के जीव की है। सभी योनियां चमड़ी, नसों व धमनियों आदि से ही तो निर्मित होती है।
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दिल्ली जिंदा लाशों का मरता हुआ जहरीला शहर है
सामाजिक यायावर
लगभग 11 वर्ष पूर्व सन् 2005 की बात है। मैं दिल्ली के बसंतकुंज इलाके में एक वैज्ञानिक मित्र के यहां अतिथि था। पास के बाजार में गया हुआ था। वहीं एक व्यापारी के यहां अचानक ही चर्चा शुरू हो गई, चर्चा को मोड़कर मैं पानी पर ले आया। मेरे अतिरिक्त चार-पांच लोग थे, सभी अमीर व पढ़े लिखे, करोड़ों का कारोबार करने वाले लोग।इन सबका कहना था कि सरकार कुछ नही करती। इनका मानना था कि पानी के समाधान के लिए धरती के अंदर खूब गहरे से पानी निकाल लाने वाली मशीनों का इंतजाम होना चाहिए। यदि ऐसी मशीने नहीं हैं तो ऐसी मशीने खोजी जाएं। वैज्ञानिक व इंजीनियर किसलिए हैं। तो यह थी इन लोगों की पानी के मुद्दे पर समझ।जबकि बहुत गांवों के गरीब व अनपढ़ लोग अपने छोटे छोटे प्रयासों से धरती के अंदर पानी की मात्रा बढ़ा रहे थे, पानी पैदा कर रहे थे।दिल्ली जो दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर है। जहां पेड़ पौधे वैसे भी न के बराबर हैं। वहां के लोग हर साल पेड़ों को छटवाते हैं, डालें कटवाते हैं वह भी केवल इस बहाने से कि बिजली का तार गुजरता है।पेड़ों को काटने के इस संगठित काम को अंजाम देती है दिल्ली महानगरपालिकाएं। दिल्ली महानगरपालिकाएं हर साल पेड़ काटती व छाटती है। दिल्ली में तो ऐसे ऐसे लोग हैं कि यदि नगरपालिका उनके इलाके में पेड़ काटना भूल जाती है तो दबाव डाल कर पेड़ कटवाते हैं।मरते हुए शहर को आखिर कब तक देश की राजधानी के तौर पर घसीटा जा सकता है। बिना तैयारी के किए जाने वाले आड-इवेन जैसे अदूरदर्शी प्रचार टोटकों से किसी मुर्दा शहर को जीवित नहीं किया जा सकता है। तभी तो मरते हुए जहरीले शहर के लोग आड-इवेन के नियम की काट के तौर पर दो-तीन सप्ताहों में ही 60 हजार नईं कारों को खरीद लेते हैं।भारत की राजधानी आज नहीं तो कल दिल्ली से हटनी ही है। सवाल यह खड़ा होता है कि जिस दिन दिल्ली राजधानी नहीं रहेगी उस दिन दिल्ली का आदमी करेगा क्या, क्योंकि तब तो प्रापर्टी की कीमतें आसमान की जगह जमीन छू रही होगीं तब भी कोई लेने वाला न होगा। दिल्ली का अधिकतर आदमी तो दिल्ली के राजधानी होने के कारण आसमान छूती कीमतों की प्रापर्टी व राजधानी होने के सुविधाओं को ही खा रहा है।भारत की आजादी के समय दिल्ली में सैकड़ों वाटर बाडीज थीं। उफनाती यमुना नदी थी और जंगल थे। प्रापर्टी से पैसे बनाने के लालच में वाटरबाडीज व जंगलों को नष्ट करके कंक्रीट की बिल्डिंगें खड़ी कर दी गईं। और तो और जब कुछ नहीं बचा तो यमुना नदी को भी पाटना शुरू करके बिल्डिंगें बनानी शुृुरू कर दीं।सबसे बड़ा सवाल तो भारत देश के लोगों के लिए है जिनके खून पसीने की कमाई से देश की राजधानी चलती है, कि –क्या किसी सभ्य देश की राजधानी इतनी ही सड़ियल व जहरीली होनी चाहिए…….. -
वर्तमान भारत में जाति का अंत करना ही असली समाजवाद
सामाजिक यायावर
मेरे पिता के एक ब्राह्मण मित्र ने चमार जाति की लड़की से शादी की। पति पत्नी दोनो लड़ते झगड़ते व प्रेम करते हुए संतानों को पालते पोषते एक दूसरे के साथ आर्थिक विपन्नता के बावजूद जीवन जीते आ रहे हैं। मुझे कभी महसूस ही नहीं हुआ कि उनमें से एक ब्राह्मण व एक चमार है, जबकि मैं लगभग एक वर्ष तक उन्हीं की गाय का दूध उनके घर से लाता रहा। आंटी जी गाय की देखभाल करती थीं और गाय को दुहतीं थीं। दूध का हिसाब किताब भी आंटी जी ही रखती थीं। अंकल जी तो फक्कड़ थे उनको पैसों का हिसाब किताब कभी समझ न आया। बहुत लोग उनको समाजवादी चूतिया कहते रहे, आज भी वही भाव रखते हैं भले ही मुंह से कहें नहीं। वर्षों बाद जब मैं बारहवीं कक्षा में पहुंचा तब अचानक किसी चर्चा के दौरान कुछ लोगों से यह बात मालूम हुई कि उनका विवाह अंतर्जातीय विवाह है।
मेरे अपने असल जीवन में मैं ऐसे कई लोगों को जानता हूं जो ब्राह्मण या शूद्र जाति के हैं और उनका पति/पत्नी शूद्र या ब्राह्मण है। एक-आध अपवादों को छोड़कर उनमें से किसी ने बहुत गहरी साजिश या ऊंचे दर्जे की महानता के कारण शादी नहीं किया। जानपहचान हुई, प्रेम हुआ और माता पिता परिवार को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह को धरातल में उतार लाए। माता पिता को तैयार करके या विद्रोह करके विवाह करना सहज घटना है, अपनी जाति में भी प्रेम विवाह करने पर भी ऐसा झेलना पड़ता है।
मैं उन ब्राह्मणों को बहुत आदरणीय मानता हूं जिन्होंने अपनी शादी शूद्र के साथ की और उनके परिवार ने शूद्र को अपना दामाद या बहू स्वीकार किया। मैं उन शूद्रों को क्रांतिकारी मानता हूं जिन्होंने ब्राह्मणों से घृणा करने की बजाय उनको प्रेम करना सिखाया और पारिवारिक संबंधों की स्थापना की। ये भले ही छिटपुट घटनाएं हों लेकिन ये ही वे लोग हैं जो जाति का अंत करने जैसे महा-सामाजिक-आंदोलन के पथबंधु हैं।
जाति का अंत घृणा, तिरस्कार, उपेक्षा, प्रतिक्रिया आदि से नहीं बल्कि प्रेम, सहजता व सौहार्द से ही हो सकता है। हम माने या न माने लेकिन यह कटु यथार्थ है कि जाति का अंत सहज व प्रेमपूर्ण अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों से ही हो सकता है।
जो लोग यह दावा करते नहीं अघाते कि जाति व्यवस्था जन्म आधारित दास व्यवस्था न होकर कर्म/व्यवसाय आधारित महान सामाजिक व्यवस्था थी। तो संस्कृति व महानता के ये दावेदार लोग अंतर्रजातीय वैवाहिक संबंधों को क्यों नहीं पूरे जोरशोर से प्रोत्साहित व प्रयोजित नहीं करते हैं क्योंकि विज्ञान, उद्योग, लोकतंत्र व बाजार आदि ने तो कर्म/व्यवसाय के मायने व परिभाषाएं ही पूरी तरह से बदल दी हैं।
समाज का विकास व सामाजिक समाधान समाज के लोगों के आपसी सौहार्द व प्रेम से ही संभव है। किसी सभ्य व विकसित समाज में जो बुरा था/है उसे ईमानदारी व खुले मन से स्वीकारते हुए समझदारी के साथ बुराई को तिलांजलि दे देना ही उचित रहता है।
जाति व्यवस्था ने जितना नुकसान किया है उसका हिसाब किताब किया जाए तो हजारों वर्षों तक सरकारी व प्राइवेट नौकरियों व हर स्तर के शैक्षणिक संस्थानों में 70% से अधिक आरक्षण भी कम पड़ जाएगा। लेकिन यदि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र आपस में प्रेम व सहज भाव से वैवाहिक संबंध स्थापित करने लगे तो अगली पीढ़ी से ही जाति का अंत दिखना शुरू हो जाएगा।
हम जाति नहीं मानते हैं जैसे फर्जी बातों व नारों से जाति का अंत कभी नहीं होगा, उल्टे अंदर की टीस व प्रतिक्रिया और बढ़ती जाएगी। समाज किसी भी राजनैतिक दल, धर्म व सरकार आदि से बहुत बहुत अधिक बड़ा होता है। जाति का अंत किसी धर्म, राजनैतिक दल या सरकार के बूते की बात नहीं। जाति का अंत करने का निर्णय समाज को लेना चाहिए और आज नहीं तो कल लेना पड़ेगा ही।
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क्या सच में ही भारतीय समाज में कर्म को महान मान कर जिया जाता है ….
सामाजिक यायावर
जब मैं बालक था तब मुझे रटाया गया कि कर्म ही पूजा है, कर्म ही प्रधान है, कर्म ही ईश्वर है। खूब किस्से कहानियां सुनाए गए, नैतिक शिक्षा में रटाया गया। जब स्वतंत्र चिंतन शुरू किया तो पाया कि भारतीय सामाजिक ढांचे में कर्म का तो कोई महत्व ही नही है, उल्टा कर्म तिरस्कारित है। सबसे महत्वपूर्ण तो जाति है। जो जाति जितना अधिक कर्मशील है वह उतना ही नीच मानी जाती है, वह उतना ही अधिक अछूत है। आधुनिक काल में भी यही दिखाई दिया कि जो जितना अधिक कर्म करता है वह उतना ही अधिक शोषित है।
लगभग 17 साल पहले रात में 9 से 12 का मूवी शो देखने जा रहा था। मिथुन चक्रवर्ती की कोई मूवी थी। जिस रिक्शे में मैं बैठा था उसको एक किशोर चला रहा था। उससे यूं ही कर्म पर बातचीत शुरू हो गई। वह बोला कि कर्म ही पूजा है, कर्म ही ईश्वर है।
मैंने कहा कि आपके पिता क्या करते थे, बोला कि वे पूरा जीवन रिक्शा चलाते रहे। मैंने पूछा कि रिक्शा चलाना कर्म है कि नहीं, बोला बहुत ज्यादा कर्म है। मैंने कहा कि आपके पिता पूरा जीवन कर्म किए, आप कर्म कर रहे हैं आपके पिता ने किसी का शोषण नहीं किया होगा, आप भी शोषण नहीं करते होगें। फिर भी आपका जीवन कष्ट से भरा है।
आपको तो बड़े व प्रतिष्ठित मंदिरों में घंटों लाईन में धक्के खाते हुए भगवान की मूर्ति के दर्शन दूर से होते होगें जबकि बड़े व्यापारी को, बड़े नेता को, बड़े नौककशाह को, पुजारी को मंदिर में विशिष्ट व्यवस्था दी जाती है। जबकि कर्म को ईश्वर कहा गया है, इसलिए आपको विशिष्ट माना जाना चाहिए।
मैंने कहा कि एक नौकरशाह ने केवल कुछ किताबें रटकर किसी परीक्षा में कुछ अंक लाकर इतना बड़ा कर्म कर लिया कि उसको पूरा जीवन कुछ भी करने की जरूरत नहीं, आजीवन मौज ही मौज। यहां तक कि उसके पति/पत्नी व बच्चों को भी कोई कर्म करने की जरूरत नहीं। सबकी मौज और खूब मौज।
किताब रटना कर्म हो गया इतना बड़ा व महान कर्म हो गया कि केवल साल दो साल कुछ किताबें रट लीं और आजीवन की मौज, दूसरों का शोषण करने का अधिकार, दूसरों की मेहनत पर कानूनी हक भी मिल गया। जबकि रात दिन हाड़तोड़ मेहनत करना कर्म नहीं हुआ। बाप हाड़तोड़ मेहनत करता रहा, बेटा भी करता रह गया। फिर भी आजीवन शोषण, तिरस्कार व दुत्कार। वह भी उस समाज में जहां सबको रटाया जाता है कि कर्म ही पूजा है, कर्म ही ईश्वर है।
मैंने पूछा कि टैक्सी खरीदने वाला अधिक कर्म करता है या टैक्सी को रात दिन चलाने वाला ड्राईवर। जवाब आया ड्राईवर, मैंने पूछा कि तब ड्राईवर टैक्सी के साथ मुफ्त क्यों मिलता है और पूरा लाभ बिना कर्म किए ही टैक्सी खरीदने वाले के पास क्यों जाता है और ड्राईवर को उसी के द्वारा कमाई गई रकम में से बहुत ही कम रकम वेतन के रूप में साथ में गाली गलौच व तिरस्कार बोनस में मिलता है।
ऐसे ही उदाहरण भरे पड़े हैं। रिक्शावाला किशोर बोला कि क्या कर्म से कुछ नहीं होता। मैने पूछा कि अमीर अधिक कर्म करता है कि गरीब, जवाब आया कि गरीब अधिक कर्म करता है। पूछा कि अमीर का बच्चा अधिक कर्म करता है कि गरीब का बच्चा, जवाब आया कि अमीर का बच्चा को कोई काम न करना पड़े यही तो अमीरी है।
मैंने कहा कि इन सब असल जीवन के लाखों जीवंत उदाहरणों से क्या संदेश मिलता है। किशोर बोला कि यह संदेश मिलता है कि गरीब अधिक कर्मशील है और अमीर बहुत ही कम कर्मशील है। मैंने उससे कहा कि हर बात को रटने के पहले उसको वास्तविकता में तौल कर देखिए। नहीं तो हजारों सालों तक पिता व पुत्र रिक्शा ही चलाता रहेगा और तिरस्कारित व शोषित भी होता रहेगा।
मैंने कहा कि भारत सिर्फ कर्म की महानता का नारा लगाने का ढोंग करता है जबकि कर्म को बेइंतहा तिरस्कारित करने की परंपरा चलती आई है। जरूरत है कि कर्म को नारेबाजी से इतर वास्तव में प्रतिष्ठित किए जाने की। कर्म को यदि भारतीय समाज सच में ही महान मानता और तिरस्कारित नहीं करता होता तो इस समाज में न जाति होती, न दहेज और न ही हर स्तर पर भ्रष्टाचार।
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बच्चे को स्वावलंबिता पैदा होने के दिन से सिखाई जाती है

मैं, जोनाथन और मेरी जीवन साथी मैं सोफे पर पसरा पड़ा हुआ था, कहीं जाने का मन नहीं था, कुछ देर आराम करने का मन था। जोनाथन जो मेरी साली साहिबा के पुत्र हैं मेरे पास मेरा एक चप्पल लेकर आए फिर दूसरा लेकर आए। फिर मेरी उंगली पकड़ते हैं और बच्चों के खेलने के लिए बने पार्क में चलने के लिए खींचते हैं।
एक डेढ़ वर्ष का शिशु जो ठीक से बोलना नहीं जानता है, उसने इतने प्यार से सेवा करते हुए साथ चलने के लिए आमंत्रित किया तो अस्वीकार करना संभव न हो पाया। छोटे से शिशु का सहज भाव से बिना शब्दों के संवाद करना आनंदित कर गया।
जोनाथन अभी जनवरी महीने में कुछ दिन पहले ही डेढ़ वर्ष की आयु के हुए हैं। इनके माता पिता का घर समुद्र के बहुत निकट है, इसलिए इनके क्षेत्र में सड़कों पर ढाल व चढ़ाई हैं। जोनाथन ढाल व चढा़ई पर भरपूर दबंगई से उतरते व चढ़ते हैं। रास्ते में चलते हुए फूल, पत्ती, कार आदि के बारे में उंगली से दिखते हुए अपनी भाषा में जानकारी देने का काम करते हुए चलते हैं। कहीं कुत्ता व बिल्ली दिख गए तो कुछ देर तक वहीं खड़े रहते हैं ताकि उनसे मित्रता का कोई जुगाड़ जम सके। फिर आगे बढ़ लेते हैं। इनके चलने की शैली फोटो में देखी जा सकती है। अभी इनका मन है तो उंगली पकड़े हैं नहीं तो जनाब उंगली भी नहीं पकड़ते हैं और ढाल व चढ़ाई पर उतरते व चढ़ते हैं।



