Tag: Mukesh Kumar Sinha

  • मासूम बूंदों की फुहार

    मासूम बूंदों की फुहार

    Mukesh Kumar Sinha

    खिलखिलाहट से परे
    रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान,
    उदासियों में जब ओस की बूंदों से
    छलक जाते हों आंसू
    तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
    ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना
    कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की!

    खिलखिलाते हुए जब भी तुमने कहा
    मेरी पहचान तुम से है बाबू
    मैंने बस उस समय तुम्हारे
    टूटे हुए दांतों के परे देखा
    दूर तक गुलाबी गुफाओं सा रास्ता
    ये सोचते हुए कि
    कहीं अन्दर धड़कता दिल भी तो होगा ना
    मेरे लिए

    खिलखिलाहट और मेरी खीज
    अन्योनाश्रय संबंधो में बंधा प्रेम ही तो था
    जिस वजह से
    झूलती चोटियों के साथ तुम्हारी मुस्कुराती, गाती आँखें
    और चौड़ा चमकता माथा
    चमकीली किरणों सा आसमान एक
    जो फैलकर
    बताता सूर्योदय के साथ
    कि पकी बालियों सी फसल बस कटने वाली है

    सुनो मेरी खीज से परे
    बस तुम खिलखिलाना
    सौगंध है तुम्हें
    ताकि बस तुम हो तो लगे ऐसा कि
    मेरे आसमान में भी उगती है धनक,
    कभी न कभी
    बारिश के बाद निकलती है एक टुकड़ा धूप
    और खिलती है फ़िज़ा
    मेरे लिए

                 Mukesh Kumar Sinha

    सुनो कि बार बार हूँ कह रहा
    खूब खिलखिलाती रहना
    महसूस करना
    मेरे साथ बह रही एक नदी
    मचलती, बिफरती, डूबती, उतराती
    जीवंत खिलखिलाती नदी
    बेशक मुझपर पड़ती रहे
    मासूम बूंदों की फुहार …

    समझे ना !!

  • छमिया

    छमिया

    Mukesh Kumar Sinha

    “छमिया” ही तो कहते हैं
    मोहल्ले से निकलने वाले
    सड़क पर, जो ढाबा है
    वहाँ पर चाय सुड़कते
    निठल्ले छोरे !
    जब भी वो निकलती है
    जाती है सड़क के पार
    बरतन माँजने
    केदार बाबू के घर !!

    Mukesh Kumar Sinha

    एक नवयुवती होने के नाते
    हिलती है उसकी कमर
    कभी कभी खिसकी होती है
    उसकी फटी हुई चोली
    दिख ही जाता है जिस्म
    जब होती है छोरों की नजर
    पर इसके अलावा
    कहाँ वो सोच पाते हैं
    भूखी है उसकी उदर !!

    आजकल “छमिया”” भी
    जानबूझ कर
    मटका देती हैं आंखे
    साथ ही लहरा देती है
    वो रूखे बालों वाली चोटी
    जो छोरों के दिल में
    ला देती है कहर
    आखिर घूरती आँखों
    के जहर
    से, वो शायद हो गई
    है, बेअसर !!

    “छमिया” आखिर समझने
    लगी है
    मिटाने के लिए भूख
    भरने के लिए उदर
    जरूरी है ये सफर
    अंतहीन सफर !!!

    कुछ शब्द, कुछ दर्द और जिंदगी
     बस इतना ही है मुख़्तसर !

  • अजीब सी लड़कियां

    अजीब सी लड़कियां

    Mukesh Kumar Sinha[divider style=’full’]

    वो अजीब लड़की
    सिगरेट पीते हुए साँसे तेज अन्दर लेती थी
    चिहुँक कर आँखे बाहर आने लगती हैं पर खुद को संभालते हुए,
    खूब सारा धुंआ
    गोल छल्ले में बना कर उड़ा देती है !

    ठुमक कर कहती है
    देखो कैसे मैंने उसे उड़ा दिया धुंए में, बेचारा
    न मेरा रहा, न जिंदगी रही उसकी !

    फिर, नजरें बचा कर भीगती आँखों से कह देती
    उफ़, हिचकी आयी न,
    अन्दर तक चला गया धुंआ !
    अजीब ही है वो अजीब लड़की !

    वही अजीब लड़की, गियरवाली साइकिल को चलाते हुए
    फर्राटेदार उडाती है, और ठोक देती है
    मर्सिडीज का बोनट
    मुस्काते हुए कहती है सहेली से
    गलती से आँख भींचते हुए मैंने आगे देखा
    तो मुझे लगा, वही बैठा है उसमें !

    तभी तो जान से मारने का मन हुआ उसको
    सायकिल से मर्सिडीज का क़त्ल !
    अजीब लड़कियां ऐसे ही तो मारती हैं किसीको !
    है न !

    प्यार में पागल हो कर
    फिर मरने के बदले मारने का तरीका बताती हैं
    अजीब सी लड़कियां ….. !
    जिंदगी जीना जानती हैं
    शायद ये अजीब सी लड़कियां !

    अपने पहले ब्रेकअप के बाद
    दुसरे वाले बॉयफ्रेंड के उँगलियों को
    अपने मध्यमा और तर्जनी में दबाये
    खिलखिलाते हुए
    उसके मर्दानेपन को ढूंढते हुए कह उठती है
    यार उस जैसा नहीं तू !

    खूब सक्सेस का झंडा गाडती हैं,
    सीरियसनेस ऐसा कि भुल जाती है
    मम्मा पापा तक को
    पर अकेलेपन में चुपके से बिलख कर रोती हैं
    और अगर कोई सामने दिख जाए
    तो उसके आँखों में आँखे डाल
    कह उठती हैं, देखना तो कुछ चला गया है आँखों में
    ऐसी तो होती है ये अजीब सी लड़कियां !

    अजीब सी जिंदगी के
    अजीब अजीब पन्नों को
    अजब गजब पलों में रंगते हुए
    बेशक लगती हैं अलग ये अजीब सी लड़कियां
    पर धडकते धडकनों के साथ
    सीने पर रख कर अपना सर
    आँखे मूंदे, बेहद अपनी सी लगती हैं ये अजीब सी लड़कियां !!

  • सोलह आने सच

    सोलह आने सच

    Mukesh Kumar Sinha

    झूठ-मूठ में कहा था
    तुमसे करता हूँ प्यार
    और फिर उस प्यार के दरिया में
    डूबता चला गया
    ‘सच में’ !
    डूबते उतराते तब सोचने लगा
    किसने डुबोया
    कौन है ज़िम्मेदार?
    झूठ का चोगा पहनाने वाला गुनाहगार ?
    और वजह, इश्क़-मोहब्बत-प्यार ?

    हर दिन आँख बन्द होने से पहले
    खुद ही बदलता हूँ पोशाक
    दिलो दिमाग पे छाए
    झूठ के पुलिंदे को उतार
    अपनी स्वाभाविक सोंधी सुगंध के साथ
    मैं, हाँ मैं ही तो होता हूँ
    अपने वास्तविक ‘औरा’ में
    सच के करीब
    सच से साक्षात्कार करते हुए
    खुद से सवाल-जवाब करते हुए

    आखिर क्यों झूठ है
    है छल-कपट, जंग है,
    आखिर क्यों है ऐसा हमारा संसार
    क्यों अपने कद को बढ़ाने की
    कोशिश करते हैं
    जिसके नहीं होते हक़दार
    चाहते हैं पा जाएँ वो सम्मान
    तर्क-कुतर्क के झंडे तले
    क्यों चाहते हैं कहलायें
    सर्वशक्तिमान

    मृगतृष्णा सा रचा हुआ है भ्रम
    झूठ का पहला अंकुरण
    कब कैसे क्यों
    इस धरती पर प्रस्फुटित हुआ होगा
    किसके मन के अन्दर से
    छितरा होगा इसका बीज
    जो किस उर्वर भूमि पर पला होगा
    झूठ की इस अजब गजब बुआई ने
    सच के फलक को
    बना दिया रेगिस्तान
    आज तो झूठ ही झूठ ने रच रखा है
    आडम्बर
    और बैठा है ससम्मान

    तभी तो
    झूठ के जंजाल में
    खुद को बाखुशी बाँध
    दी गयी झूठी तसल्ली की भँवर में
    डूबता चला गया मैं
    मात्र मैं, या सब, शायद अधिकांश
    इस झूठ के तह में छिपा है
    कुलबुलाते सच का मौन
    तभी तो
    ढिंढोरा पीट कर बताते हैं
    ‘सफ़ेद झूठ’
    झूठ झूठ चिल्ला कर
    उसको बनाते हैं
    सोलह आने सच

    अपने अपने नजरिये का सच !!

  • स्मृतियाँ

    स्मृतियाँ

    Mukesh Kumar Sinha

    थोडा बुझा सा मन और
    वैसा ही कुछ मौसम
    शून्य आसमान पर टिकी नजरें, और
    ठंडी हवा के झोंके के साथ

    जागी, उम्मीद बरसात की
    उम्मीद छमकते बूंदों की
    उम्मीद मन के जागने की !!

    होने लगी स्मृतियों की बरसात
    मन भी हो चुका बेपरवाह
    सुदूर कहीं ठंडी सिहरन वाली हवा

    सूखी-सूखी धूल धूसरित भूमि
    सौंधी खुश्बू बिखेरती पानी की बूंदे
    मन भी तो, होने लगा बेपरवाह
    टप-टप की म्यूजिक के बैकग्राउंड के साथ
    छिछला बरसाती पानी
    सूरज की उस पर पड़ती सीधी किरणें
    परावर्तित हो, दे रही
    सप्तरंगी चकमक फीलिंग !

    गोल गोल गड्ढों में जमा
    स्टील की थाली सा चमकता पानी
    चमकते जल
    और उसमे पल-पल
    बदलती तस्वीरें

    एकदम से आ ही गयी एक
    चंचल शोख मुस्कराहट
    क्योंकि
    एक थाली में था मैं निक्कर टीशर्ट में
    तो, दुसरे में जगमगा रही थी तुम
    रेनबो कलर वाले फ्रॉक में !!

    नकचढ़ी तुम, अकडू मैं
    मुस्कुराते मन ने कहा तुम्हे ‘धप्पा’
    और खेलने लगे आइस-पाइस
    तो कभी उसी पानी में मारा बॉल
    खेला ‘पिट्टो’

    ठंडा बरसाती पानी ने बरसा ही दिया मन
    खिलखिलाया आसमान
    सहेजी स्मृतियों के साथ…….!

    ओ बारिश की बूँदें
    फिर बरसना ………
    खोलूं खिड़की या दरवाजा ……

    करूँगा इन्तजार
    तुम्हारा और उस
    नकचढ़ी का भी ..!!

    आओगे न!
    ये बारिश की बूंदें और स्मृतियाँ !!

  • एक चुटकी मुस्कान

    एक चुटकी मुस्कान

    Mukesh Kumar Sinha

    होंठ के कोने से चिहुंकी थी हलकी सी मुस्कराहट
    आखिर दूर सामने जो वो चहकी,
    नजरें मिली, भर गयी उम्मीदें
    हाँ, उम्मीदें अंतस से लाती है हंसी !!

    माँ के आँचल में दबा, था अस्तव्यस्त
    छुटकू सा बालक, स्तनपान करता
    तभी आँचल के कोने से दिख गए पापा
    मुस्काया, होंठ छूटे और फिर खिलखिलाया
    आखिर जन्मदाता ही देते हैं पहली हंसी
    भरते हैं जीवन में किलकारियाँ !!

    हंसी, खिलखिलाहट, हो हो हो …….हां हा हा
    जीने के लिए है लाइफ लाइन
    इसलिए तो मुस्कुराते फोटो के लिए
    कहते हैं चीज या पनीर, और
    क्लिक पर मुस्कुरा जाता है चेहरा …… !!
    ताकि गंभीर भी कहलायें
    हंसमुख व फोटोजनिक !!

    कभी दर्द से कराहो या हो
    शोक संतृप्त दृश्य, हो सब गमगीन
    और, लगे कोई बच्चा खिलखिलाने
    फिर देखना, कैसे छूटेगा फव्वारा
    खिलखिलाहटों का, दर्द की झील से निकल कर !!

    अन्दर से आ रही हो हंसी, और खिलखिलाओ
    समझ में आती है बात
    पर कभी रोते रोते
    कुछ ऐसे जगाओ खयालात
    ताकि हंस पड़े जज्बात !!
    तब खुद से कहोगे क्या बात क्या बात!!

    वैसे हंसी होती है प्यार, न्यारी
    दिल दिमाग और स्वास्थ्य
    के लिए भरती है पिचकारी
    हंसी को हो वजह कुछ भी
    पर जब खिलखिलाएं खुद की
    बेवकूफियों और गलतियों पर
    वो हंसी, हो जाएँ खुद पर कुर्बान
    कहता है तब मन !!

    हंसो हंसो, बन जाओ लाफिंग बुद्धा
    ताकि कहलाओ स्वयंसिद्धा !!

    जिंदगी का जायका ही बदल देती है
    एक चुटकी मुस्कान !!

  • लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    Mukesh Kumar Sinha

    लड़कियों से जुड़ी बहुत बातें होती है
    कविताओं में
    लेकिन नहीं दिखते,
    हमें दर्द या परेशानियों को जज़्ब करते
    कुछ लड़के
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए, अपनों के सपनों के साथ

    वो लड़के नहीं होते भागे हुए
    भगाए गए जरुर कहा जा सकता है उन्हें
    क्योंकि घर छोड़ने के अंतिम पलों तक
    वो सुबकते हैं,
    माँ का पल्लू पकड़ कर कह उठते हैं
    “नहीं जाना अम्मा
    जी तो रहे हैं, तुम्हारे छाँव में
    मत भेजो न, ऐसे परदेश
    जबरदस्ती!”

    पर, फिर भी
    विस्थापन के अवश्यम्भावी दौर में
    रूमानियत को दगा देते हुए
    घर से निकलते हुए निहारते हैं दूर तलक
    मैया को, ओसरा को
    रिक्शे से जाते हुए
    गर्दन अंत तक टेढ़ी कर
    जैसे विदा होते समय करती है बेटियां
    जैसे सीमा पर जा रहा हो सैनिक
    समेटे रहते हैं कुछ चिट्ठियाँ
    जिसमे ‘महबूबा इन मेकिंग’ ने भेजी थी कुछ फ़िल्मी शायरी

    वो लड़के
    घर छोड़ते ही, ट्रेन के डब्बे में बैठने के बाद
    लेते हैं ज़ोर की सांस
    और फिर भीतर तक अपने को समझा पाते हैं
    अब उन्हें ख़ुद रखना होगा अपना ध्यान
    फिर अपने बर्थ के नीचे बेडिंग सरका कर
    थम्स अप की बोतल में भरे पानी की लेते हैं घूँट
    पांच रूपये में चाय का एक कप खरीद कर
    सुड़कते हैं ऐसे, जैसे हो चुके हों व्यस्क
    करते हैं राजनीति पर बात,
    खेल की दुनिया से इतर

    कल तक,
    हर बॉल पर बेवजह ‘हाऊ इज देट’ चिल्लाते रहने वाले
    ये छोकरे घर से बाहर निकलते ही
    चाहते हैं, उनके समझ का लोहा माने दुनिया
    पर मासूमियत की धरोहर ऐसी कि घंटे भर में
    डब्बे के बाथरूम में जाकर फफक पड़ते हैं
    बुदबुदाते हैं, एक लड़की का नाम
    मारते हैं मुक्का दरवाज़े पर

    ये अकेले लड़के
    मैया-बाबा से दूर,
    रात को सोते हैं बल्व ऑन करके
    रूम मेट से बनाते है बहाना
    लेट नाइट रीडिंग का
    सोते वक्त, बन्द पलकों में नहीं देखना चाहते
    वो खास सपना
    जो अम्मा-बाबा ने पकड़ाई थी पोटली में बांध के

    आखिर करें भी तो क्या ये लड़के
    महानगर की सड़कें
    हर दिन करने लगती है गुस्ताखियाँ
    बता देती है औकात, घर से बहुत दूर भटकते लड़के का सच
    जो राजपथ के घास पर चित लेटे देख रहें हैं
    डूबते सूरज की लालिमा

    मेहनत और बचपन की किताबी बौद्धिकता छांटते हुए
    साथ ही बेल्ट से दबाये अपने अहमियत की बुशर्ट
    स को श कहते हुए देते हैं परिचय
    करते हैं नाकाम कोशिश दुनिया जीतने की
    पर हर दिन कहता है इंटरव्यूअर
    ‘आई विल कॉल यु लेटर’
    या हमने सेलेक्ट कर लिया किसी ओर को

    हर नए दिन में
    पानी की किल्लत को झेलते हुए
    शर्ट बनियान धोते हुए, भींगे हाथों से
    पोछ लेते हैं आंसुओं का नमक
    क्योंकि घर में तो बादशाहत थी
    फेंक देते थे शर्ट आलना पर

    ये लड़के
    मोबाइल पर बाबा को चहकते हुए बताते हैं
    सड़कों की लंबाई
    मेट्रों की सफाई
    प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान,
    कनाट प्लेस के लहराते झंडे की करते हैं बखान
    पर नहीं बता पाते कि पापा नहीं मिल पाई
    अब तक नौकरी
    या अम्मा, ऑमलेट बनाते हुए जल गई कोहनी

    खैर, दिन बदलता है
    आखिर दिख जाता है दम
    मिलती है नौकरी, होते हैं पर्स में पैसे
    जो फिर भी होते हैं बाबा के सपने से बेहद कम
    हाँ नहीं मिलता वो प्यार और दुलार
    जो बरसता था उनपर
    पर ये जिद्दी लड़के
    घर से ताज़िंदगी दूर रहकर भी
    घर-गांव-चौक-डगर को जीते हैं हर पल

    हाँ सच
    ऐसे ही तो होते हैं लड़के
    लड़कपन को तह कर तहों में दबा कर
    पुरुषार्थ के लिए तैयार यकबयक
    अचानक बड़े हो जाने की करते हैं कोशिश
    और इन कोशिशों के बीच अकेलेपन में सुबक उठते हैं

    मानों न
    कुछ लड़के भी होते हैं
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए अपनों के सपनों के साथ।

  • चाय या दोस्ती की मिठास

    ख़त्म हो चुके चाय के कप के
    तलों में बची कुछ बूँद चाय
    अब ऐसी ही मित्रता है
    कुछ बेहतरीन शख्सियतों की
    ‘मेरे लिए’
    कभी ये दोस्ती की चाय का कप
    था लबालब,
    गर्मजोशी ऐसी, जैसे भाप उगलता कप
    हर पल सुगंध ऐसे जैसे
    चाय के साथ इलायची की अलबेली सुगन्ध
    मित्रता में रिश्ते का छौंक व
    जिंदादिली से भरपूर मिठास
    हर सिप को जिया है !!
    खैर ! कप के चाय की अंतिम बून्द
    शायद सूख चुकी या सूखने वाली है
    पंखा भी तो पांच पर चल रहा !
    फिर भी
    दोस्ती जिंदाबाद के नारे के साथ
    ऐसे लिखते हुए भी
    उम्मीद कर रहा है
    फिर से एक और चाय का कप ।
    मौसम की आद्रता बचाये रखेगी
    चाय या दोस्ती की मिठास
    समझे न !
    उम्मीद ही अहमियत है ! https://karensingermd.com

  • कुछ अभिव्यक्ति बहुत साधारण होती है, पर सच्ची होती है

    Mukesh Kr Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    मेरी हर कविता
    अपनी प्रसव पीड़ा झेलने के बाद
    सृजन के तद्पूरांत
    जब पन्ने पर हो चुकी होती है उकेरित
    यहाँ तक की कुछ पाठक वर्ग भी
    मिल चुके होते हैं
    फिर भी फुसफुसाती हुई कहती है
    फिर से सोचो यार
    क्या नहीं लगता तुम्हें
    है बदलाव की जरूरत !!

    कभी लगता है भाव है अधूरा
    कभी दर्द नहीं उभरता
    कभी प्यार नहीं खिल पाता,
    कभी तो शुरुआत ही लड़खड़ा जाती, तो
    कभी अंत सही नहीं होता

    शायद पुरजोर कोशिश के बावजूद
    नहीं रख पाता अपनी बात व सोच
    रह जाती है आधी अधूरी !!
    चाहता हूँ कुछ ऐसा कौंधे
    कि उभर पाये भाव, खिल पाये प्यार
    दिखे खिलखिलाती जिंदगी, फूल पत्तियाँ
    सजे व गूँथे हो हर शब्द
    सृजित हो पाये एक पूर्ण व सुंदर कविता

    चलो फिर कोशिश करेंगे कभी
    आखिर उम्मीद और अभिलाषा जरूरी है
    भविष्य के बेहतरी के लिए !!

     

  • प्रेम

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    1.
    मुट्ठी भर अक्षर
    लो उढ़ेल दिए पन्नो पर

    टूटी फूटी ही सही, समझ लेना
    लिखी गयी प्रेम कविता
    सिर्फ तुम्हारे लिए !!

    2.
    प्रेम
    वो निर्मल जल
    जो सुखी नदी की रेत को हटाते ही
    एकदम से जमा हो
    कल-कल शीतल निर्मल !

    प्रेमसिक्त मन गर्मी में भी
    रखता है चाहत रेत हटाने की !

    3.
    मेरे हथेली में
    है कटी फटी रेखाए
    जीवन, भाग्य और प्रेम की
    पर है एक खुशियों का द्वीप
    ठीक बाएं कोने पर

    तभी, उम्मीदें जवां हैं

    4.
    मेरी राख पर
    जब भी पनपेगा गुलाब
    तब ‘सिर्फ तुम’ समझ लेना
    प्रेम के फूल !!

    इन्तजार करूँगा सिंचित होने का
    तुमने कहा तो था
    सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों तोड़ना भाता है तुम्हे !

    5.
    प्रेमसिक्त संवेदनाओं को
    घेर दिया मैंने चीन की दीवार से

    पर कहाँ मानता दिल
    वो तो पीसा की मीनार सा
    झुक ही जाता है तुम्हारे प्रति
    ठीक पंद्रह डिग्री के कोण पर ..

    चलो ताजमहल के सामने वाली बेंच पर
    खिंचवायें एक युगल तस्वीर !

    6.
    प्रेमसिक्त ललछौं भोर से
    डूबते गुलाबी सूरज तक का
    बीता हुआ समय
    पाँव भारी कर गया उन्मुक्त जवां दिलों को

    कोई नहीं,
    अब रिश्ता उम्मीद से है !