Tag: Mukesh Kumar Sinha

  • महलों का घर

    महलों का घर

    Mukesh Kumar Sinha

    देखी है मैंने
    ऊँची चहारदीवारियों के बीच 
    बड़े गेट के पीछे छिपा 
    बिन खिड़कियों का घर

    चहारदीवारी में छिपके 
    सांस थामें
    बिना हिले डुले 
    आहिस्ते से अपने टांगों पर
    टिका हुआ घर

    इंटरकॉम और
    स्क्रीन वाले फोन के साथ
    धुंधले पड़े गेट पे लगे
    डोर आईज से 
    पूरा पता लेकर 
    बताता है सन्तरी
    कोई आया है।
    फिर भी, ऐसे घरों में
    बना रहता है डर

    बिन बच्चों के खिलखिलाहट के भी
    हवाओं के सहारे झूलते झूले 
    उनींदी सी खोयी रहती है 
    किसी अनजाने के आने के उम्मीद में
    जबकि 
    शेर से दिखने वाले
    दहाड़ रहे होते हैं कुत्ते
    पर, बैठे होते हैं 
    वो कुछ खास लोग 
    घर के अंदर 
    जहाँ होता है तलघर

    बेशक इन घरों में भी 
    जीवंत होती हैं साँसे 
    पर रुक-रुक कर थमती सी लगती है 
    ये साँसे 
    ईंट गारे से नींव की शुरुआत के साथ 
    जिन्होंने पूरी उम्र काट दी फ़ुटपाथ पे रहकर
    वे मजदूर बना रहे होते हैं विशाल घर

    चंचल चमकते ख़्वाबों के साथ 
    बनता हुआ 
    विशाल महलों सा घर 
    कब पैसों की अधिकतम आवाजाही 
    और उसके बाद देख कर 
    सिसकता डर 
    मजार सा बन जाता है घर

    अपने ख्वाबों की विशाल चमक को 
    आँखों के सामने खिलते देखने की चाह लिए
    महल को मज़ार बनते देख
    एकांतवास में 
    सिसकता है अंदर का डर

    तभी तो
    ठिठकती साँसों की सरगोशी में
    परकोटों के सन्नाटों की चुभन
    जोहती हैं आमद आहट का धन
    चाहरदीवारी बनना चाहता है
    किलकारियों वाला घर।

    Mukesh Kumar Sinha

  • गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    गाँव – स्मृतियों की पोटली — Mukesh Kumar Sinha

    Mukesh Kumar Sinha

    पहुंचा हूँ गाँव अपने….
    जाने कितनी भूली बिसरी सुधियों की पोटली सहेजता..
    अब ज़रा सा आगे ही रुकेगी बस 
    और, दूर दिखाई दे रहा है वो ढलान 
    चौक कहते थे सब ग्रामवासी
    कूद के बस से उतरा और निगाहें खोजने लगीं 
    वो खपरैल जिसमें चलता था 
    “चित्रगुप्त पुस्तकालय” 
    कहाँ गया वो .?

    कहाँ गयी वो लाईब्रेरी 
    जिसने हमें मानवता का पहला पाठ पढ़ाया 
    हमें मानव से इंसान बनाया था
    बचपन के ढेरों अजब-गजब पल
    खुशियां-दर्द-शोक, हार-जीत
    सहेजा था इसके खंभे की ओट से झांकते हुए
    धूम धूम धड़ाम धड़ाम 
    यादों के लश्कर दिमाग़ में अंधेरा कर गये
    फिर स्मृति की मशाल लिये लौटा वही 
    जहाँ जीया था मैंने, मेरा बचपन
    इन दिनों ‘मनरेगा’ ने बदल दी रंग रूपरेखा 
    नहीं दिखी वो अपनी पुरानी लाइब्रेरी!

    यहीं तो पढ़ी थी प्रेमचंद की गोदान
    कैसी टीस से भर गया था बालमन
    और वो, राजन इकबाल सीरीज के बाल उपन्यास 
    अहा कैसे ढल जाते थे हम भी उन पात्रों में
    यहीं चोरी से पढ़े थे इब्ने सफ़ी और 
    सुरेन्द्र मोहन पाठक के जासूसी, थ्रिलर नावेल
    फिर खुद में फीलिंग आती शरलॉक होम्स की
    की थी गांव की लड़कियों की जासूसी
    ये लोकप्रिय उपान्यास
    लुगदी साहित्य कहलाता है इन दिनों

    हाँ, एक रूमानी बात बताऊँ तो
    वहीँ सीखी, रानी को अपना बनाना
    हर दिन घंटो कैरम पर फिसलती उंगलियां
    और क्वीन मेरी हो, सबसे पहले
    इसकी होती जद्दोजहद ! 
    क्या क्या जतन करते थे उसे पाने के लिये
    क्या करेगा उस शिद्दत से कोई आज का आशिक़ 
    अपनी माशूक़ के लिये उस दर्ज़े की मशक़्कत
    वही होती थी टारगेट 
    यहीं खेल-खेल में चमकी थी
    क्वीन सी एक प्यारी सी लड़की
    फ्रॉक व लहराते बालों में

    हाँ इसके सामने हुआ करती थी
    हमारी परचून की दूकान
    जहां संतरे की गोली की मिठास…
    वो हाज़में की चटकारा देती गोलियां
    या लाल मिर्च से रंगी दाल मोठ
    सब हासिल था चवन्नी में
    दस पैसे की जीरा-मरीच 
    या अठन्नी का सरसो तेल भी बेचा
    छोटे छोटे हाथों से 
    यहीं पर जाना था भूख दर्द देती है
    और नमक की बोरी रहती थी बाहर पड़ी
    वैसे ही
    जैसे उनदिनों आंसुओं से बनता हो नमक

    स्कूल से लौट कर या जाने से पहले
    वजह बेवजह 
    जब भी *मैया* का अचरा नहीं मिला तो
    उदासियों के आंसुओं को सहेजा था 
    इसके भुसभुसे से दीवाल में 
    एक दो तीन अल्हड़ फ्रॉक वाली लड़कियों को
    निहारा भी, छिप कर यहाँ

    और बताना भूल गया
    यही है वो जगह जहां बसंत पंचमी झूमती
    वीणावादिनी की मधुर तान अलापती
    वो प्रसाद को ललचाती हमारी जिव्हायें
    क्या भूलें क्या सुनायें
    खेत-गाछी-टाल-नदी
    जाते आते लोग
    गाय-भैंस-बकरियां सूअर की संवेदनाएं भी
    देखते हुए वहीँ घंटों बतियाते अपने से
    कितनी हलचल… कैसा कोलाहल
    तितली के पीछे भागते, जुगनू पकड़ते
    तब किसे पता था क्या होती है हमिंग बर्ड

    नम आँखों से बस् सोच रहे
    जाने कहाँ खो गया बचपन हमारा
    खुश्क है दम
    आँख है नम.
    काश.!!!
    लौट आये
    बचपन की
    वो बयार पुरनम……।

    आखिर इसी पुस्तकालय ने कहा था कभी
    तू सच में बच्चा है !
    सोचता हूँ, फिर ढूंढूं वहीँ बचपन !
    एक प्रतिध्वनि कौंधी कहीं अंदर
    कि
    क्या सच्ची स्मृतियां कविता नहीं हो सकती !

    Mukesh Kumar Sinha

  • महलों सा घर

    महलों सा घर

    Mukesh Kumar Sinha

    देखी है मैंने
    ऊँची चहारदीवारियों के बीच 
    बड़े गेट के पीछे छिपा 
    बिन खिड़कियों का घर

    चहारदीवारी में छिपके 
    सांस थामें
    बिना हिले डुले 
    आहिस्ते से अपने टांगों पर
    टिका हुआ घर

    इंटरकॉम और
    स्क्रीन वाले फोन के साथ
    धुंधले पड़े गेट पे लगे
    डोर आईज से 
    पूरा पता लेकर 
    बताता है सन्तरी
    कोई आया है।
    फिर भी, ऐसे घरों में
    बना रहता है डर

    बिन बच्चों के खिलखिलाहट के भी
    हवाओं के सहारे झूलते झूले 
    उनींदी सी खोयी रहती है 
    किसी अनजाने के आने के उम्मीद में
    जबकि 
    शेर से दिखने वाले
    दहाड़ रहे होते हैं कुत्ते
    पर, बैठे होते हैं 
    वो कुछ खास लोग 
    घर के अंदर 
    जहाँ होता है तलघर

    बेशक इन घरों में भी 
    जीवंत होती हैं साँसे 
    पर रुक-रुक कर थमती सी लगती है 
    ये साँसे 
    ईंट गारे से नींव की शुरुआत के साथ 
    जिन्होंने पूरी उम्र काट दी फ़ुटपाथ पे रहकर
    वे मजदूर बना रहे होते हैं विशाल घर

    चंचल चमकते ख़्वाबों के साथ 
    बनता हुआ 
    विशाल महलों सा घर 
    कब पैसों की अधिकतम आवाजाही 
    और उसके बाद देख कर 
    सिसकता डर 
    मजार सा बन जाता है घर

    अपने ख्वाबों की विशाल चमक को 
    आँखों के सामने खिलते देखने की चाह लिए
    महल को मज़ार बनते देख
    एकांतवास में 
    सिसकता है अंदर का डर

    तभी तो
    ठिठकती साँसों की सरगोशी में
    परकोटों के सन्नाटों की चुभन
    जोहती हैं आमद आहट का धन
    चाहरदीवारी बनना चाहता है
    किलकारियों वाला घर।

    Mukesh Kumar Sinha

  • खिलखिलाती पहचान

    खिलखिलाती पहचान

    Mukesh Kumar Sinha

    खिलखिलाहट से परे
    रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान, 
    उदासियों में जब ओस की बूंदों से
    छलक जाते हों आंसू 
    तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
    ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना 
    कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की

    खिलखिलाते हुए जब भी तुमने कहा 
    मेरी पहचान तुम से है बाबू 
    मैंने बस उस समय तुम्हारे
    टूटे हुए दांतों के परे देखा 
    दूर तक गुलाबी गुफाओं सा रास्ता 
    ये सोचते हुए कि 
    कहीं अन्दर धड़कता दिल भी तो होगा ना 
    मेरे लिए 
    गुलाबी श्वांस नली, लग रही थी आकाशगंगा 
    और खोज जारी थी मेरे लिए धधकते गुलाबी दिल की 
    कुछ बृहस्पति ग्रह की तरह

    खिलखिलाहट और मेरी खीज 
    अन्योनाश्रय संबंधो में बंधा प्रेम ही तो था 
    जिस वजह से 
    झूलती चोटियों के साथ तुम्हारी मुस्कुराती, गाती आँखें
    और चौड़ा चमकता माथा 
    चमकीली किरणों सा आसमान एक
    जो फैलकर 
    बताता सूर्योदय के साथ
    कि पकी बालियों सी फसल बस कटने वाली है 
    या फिर 
    कुम्भ सा पवित्र चेहरा तो नहीं तुम्हारा 
    जहाँ त्रिवेणी छमकते हुए मिट जाती हैं

    सुनो मेरी खीज से परे 
    बस तुम खिलखिलाना 
    सौगंध है तुम्हें
    ताकि बस तुम हो तो लगे ऐसा कि 
    मेरे आसमान में भी उगती है धनक,
    कभी न कभी 
    बारिश के बाद निकलती है एक टुकड़ा धूप 
    और खिलती है फ़िज़ा
    सिर्फ मेरे लिए 
    सुन रहे हो न मेरी आकाश गंगा

    सुनो कि 
    बार बार हूँ कह रहा
    खूब खिलखिलाती रहना 
    महसूस करना
    मेरे साथ बह रही एक नदी 
    मचलती, बिफरती, डूबती, उतराती
    जीवंत खिलखिलाती नदी 
    बेशक मुझपर पड़ती रहे 
    मासूम बूंदों की फुहार … 
    याद रखना नदियाँ चुप नहीं रहती

    समझे ना !

    Mukesh Kumar Sinha

  • खून का दबाव व मिठास

    खून का दबाव व मिठास

    Mukesh Kumar Sinha

    जी रहे हैं या यूँ कहें कि जी रहे थे 
    ढेरों परेशानियों संग 
    थी कुछ खुशियाँ भी हमारे हिस्से 
    जिनको सतरंगी नजरों के साथ 
    हमने महसूस कर
    बिखेरी खिलखिलाहटें

    कुछ अहमियत रखते अपनों के लिए 
    हम चमकती बिंदिया ही रहे
    उनके चौड़े माथे की

    इन्ही बीतते हुए समयों में 
    कुछ खूबियाँ ढूंढ कर सहेजी भी 
    कभी-कभी गुनगुनाते हुए 
    ढेरों कामों को निपटाया 
    तो, डायरियों में 
    कुछ आड़े-तिरछे शब्दों को जमा कर 
    लिख डाली थी कई सारी कवितायेँ 
    जिंदगी चली जा रही थी 
    चले जा रहे थे हम भी 
    सफ़र-हमसफ़र के छाँव तले

    पर तभी 
    जिंदगी अपने कार्यकुशलता के दवाब तले 
    कब कुलबुलाने लगी 
    कब रक्तवाहिनियों में बहते रक्त ने 
    दीवारों पर डाला दबाव
    अंदाजा तक नहीं लगा

    इन्ही कुछ समयों में 
    हुआ कुछ अलग सा परिवर्तन 
    क्योंकि 
    ताजिंदगी अपने मीठे स्वाभाव के लिए जाने गए 
    पर शायद अपने मीठे स्वाभाव को 
    पता नहीं कब 
    बहा दिया अपने ही धमनियों में 
    और वहां भी बहने लगी मिठास 
    दौड़ने लगी चीटियाँ रक्त के साथ

    अंततः
    फिर एक रोज 
    बैठे थे हरे केबिन में 
    स्टेथोस्कोप के साथ मुस्कुराते हुए 
    डॉक्टर ने 
    स्फाइगनोमैनोमीटर पर नजर अटकाए हुए 
    कर दी घोषणा कि
    बढ़ा है ब्लड प्रेशर 
    बढ़ गयी है मिठास आपके रक्त में 
    और पर्ची का बांया कोना 
    135/105 के साथ बढे हुए 
    पीपी फास्टिंग के साथ चिढ़ा रहा था हमें

    बदल चुकी ज़िन्दगी में
    ढेर सारी आशंकाओं के साथ प्राथमिकताएँ भी
    पीड़ा और खौफ़ की पुड़िया
    चुपके से बंधी मुट्ठी के बीच 
    उंगलियों की झिर्रियों से लगी झांकने
    डॉक्टर की हिदायतें व
    परहेज़ की लंबी फेहरिस्त
    मानो जीवन का नया सूत्र थमा 
    हाथ पकड़ उजाले में ले जा रही 
    माथे पर पसीने के बूँद 
    पसीजे हाथों से सहेजे
    आहिस्ता से पर्स के अंदर वाली तह में दबा
    इनडेपामाइड और एमिकोलन की पत्तियों से 
    हवा दी अपने चेहरे को

    फिर होंठो के कोनों से 
    मुस्कुराते हुए अपने से अपनों को देखा 
    और धीरे से कहा 
    बस इतना आश्वस्त करो 
    गर मुस्कुराते हुए हमें झेलो 
    तो झेल लेंगे इन 
    बेवजह के दुश्मनों को भी
    जो दोस्त बन बैठे हैं

    देख लेना, अगले सप्ताह 
    जब निकलेगा रक्त उंगली के पोर से
    तो उनमे नहीं होगी 
    मिठास 
    और न ही 
    माथे पर छमकेगा पसीना 
    रक्तचाप की वजह से

    अब सारा गुस्सा 
    पीड़ाएँ हो जायेंगी धाराशायी 
    बस हौले से हथेली को 
    दबा कर कह देना
    ‘आल इज वेल’
    और फिर हम डूब जाएंगे 
    अपनी मुस्कुराहटों संग 
    अपनी ही खास दुनिया में

    आखिर इतना तो सच है न कि
    बीपी शुगर से 
    ज्यादा अहमियत रखतें हैं हम

    मानते हो न ऐसा !!

    Mukesh Kumar Sinha

  • समय

    समय

    Mukesh Kumar Sinha

    1.
    मिट्टी हो रहे 
    हैं समय के साथ 
    भूल जाना तो नियति है
    पर याद रखना, 
    अंकुर फूटेंगे फिर कभी

    बस मन को नम रखना
    ताकि सहेजे पल, 
    खिलखिला पड़े, 
    तुम्हारे होंठो पर !!

    2.
    प्रेमसिक्त ललछौं भोर से 
    डूबते गुलाबी सूरज तक का 
    बीता हुआ समय

    पाँव भारी कर गया उन्मुक्त जवां दिलों को 
    कि अब रिश्ता उम्मीद से है !

    3.
    दस्तक समय की 
    बताने को आतुर, कि
    चूक चुके हो तुम

    याद रखना 
    नहीं होता कोई अपना!

    4.
    जिंदगी की धूप छाँव में
    कुछ तो हरियाली होगी ही

    बहती जा रही समय की 
    इस नदी में
    प्रेम के कुछ द्वीप तो होंगे ही

    5.
    हथेली पर पगडंडी सी रेखाएँ 
    और घड़ी की सुइयां
    बदस्तूर 
    बढ़ते हुए बता रही हैं

    बदलते समय के साथ, 
    बदलेगी जिंदगी
    उम्मीद बनाये निहार रहा हूँ ।

    6
    समय, 
    तेरी लकीरें 
    क्यों खारिज कर देती है 
    मुझे हरबार!

    Mukesh Kumar Sinha

  • घिसी हुई चप्पल

    घिसी हुई चप्पल

    Mukesh Kumar Sinha

    घिसी हुई चप्पल 
    पड़ी थी पायताने में 
    थी एक उलटी पड़ी 
    एक थी सीधी

    औंधा पडा था चेहरा मेरा 
    तकिये में दबी पड़ी थी आँखे 
    था आँखे मीचे 
    सोच रहा था देखूं कोई हसीं सपना 
    पर बंद आँखों के परिदृश्य में 
    नीचे पड़ी 
    घिसते चप्पल की बेरुखी 
    दिख ही जा रही थी 
    बता दे रही थी, अपने तलवे के प्रति बेरुखापन

    तभी खुल गयी आँख 
    खुद से खुद ने कहा 
    लगता है जाना है किसी यात्रा पर 
    तभी तो दिख रही है चप्पल 
    पर ये टूटी चप्पल ही क्यों 
    क्योंकि बता रही मुझे 
    मेरे स्थिति की परिस्थिति

    साम्राज्यवाद के प्रतीक पलंग पर लेटे हुए 
    मजदूरवाद को जीवंत करता हुआ 
    घिसा हुआ चप्पल 
    बार बार मस्तिष्क में डेरा जमा कर 
    खुलते बंद आँखों में पर्दा हटाते हुए 
    बता रहा था 
    कि चलो किसी यात्रा पर 
    झंडे का डंडा पकडे 
    ताकि सार्थक क़दमों के 
    एक दो तीन चार के कदमताल के साथ 
    हम भी समझ पायें
    चप्पल की अहमियत

    एक पल को मुस्काते हुए 
    हुई इच्छा कि खुद को कहूँ 
    मत चलो नंगे पाँव 
    चुभ जायेंगे कील या कोई नश्तर 
    पर 
    वीर तुम बढे चलो – के देशभक्ति शब्दों से 
    मर्द के दर्द को पी जाने व्यथा 
    आ गयी चेहरे पर

    नींद टूट चुकी थी
    पहन ली थी चप्पल
    जा रहा था ………!
    नए चप्पल को खरीदने
    ताकि
    चेहरे की इज्जत बरकरार रहे पांवों में !

    Mukesh Kumar Sinha


    Mukesh Kumar Sinha

  • पिता के जूते

    पिता के जूते

    Mukesh Kumar Sinha

    जूता पिता का 
    पहली बार पहना था तीन दशक पहले
    जब उन्होंने कहा था –
    टाइट है, काटने लगा है पैर
    तुम ही पहन लो 
    पापा का संवाद था बड़े होते बेटे के साथ 
    अधिकार को कमी की पैकिंग में लपेट कर 
    कहा गया था शायद
    पर सुन ही नहीं सका था ‘मैं’

    पहली बार 
    बांधते हुए जूते 
    दिल कह रहा था 
    मर्द वाली फ़ीलिंग के लिए 
    ज़रूरी है 
    4 नंबर के सैंडल के बदले 
    7 नंबर के लेस वाले 
    पिता के या पिता जैसे जूते पहने ही जाएं

    चमकते पुराने जूते और 
    अॉल्टर करवाए हुए पुरानी पैंट पहने 
    साईकल पर 
    उनके साथ 
    करते हुए सफ़र 
    उनसे ही बतियाते हुए बता रहा था 
    पहली बार
    घर के खर्चे कम करने की जरुरत और तरीके 
    अपनी परचून की दुकान की लाभ-हानि 
    स्वयं के पढ़ाई की अहमियत और पढने के सलीके

    पिता की हूँ-हाँ से बेखबर 
    7 नंबर के जोड़े ने शुरू जो कर दिया था दिखाना असर 
    तभी तो चौदह-पंद्रह वर्षीय छोकरे को 
    पहली बार समझ में आई थी 
    अहमियत पिता की 
    उनके मेहनत की 
    और इन सबसे ऊपर 
    उनके होने की

    तब से
    ज़िंदगी भी जूते और जूते के लेस के साथ 
    भागती रही 
    बिना उलझाए, बिना रुके 
    उसी सात नंबर में 
    कभी कभी पिता के साथ
    पर, अधिकतर समय उनसे दूर
    बहुत-बहुत दूर

    वो अंतिम दिन भी आया जब 
    उनकेे चले जाने के बाद 
    पिता के जूते देख 
    माँ से पूछा क्या, बस कह डाला
    मैं ही पहन लूं इसको अब…… !!

    एक बार फिर 
    पैर को जूते में डाल 
    खुद को पिता सा महसूस कर 
    नज़रे दौड़ा रहा था दूर तलक

    है अब अजब सी सोच 
    जिस दिन भी भीतर
    मन होता है डाँवाडोल
    पिता के जूते पहन 
    दिल की धडकनों के ऊपर हलके से हथेली को रख कर 
    कह उठता हूँ 
    आल इज़ वेल, आल इज़ वेल 
    लक्की चार्म की तरह

    शायद होता है एक संवाद
    स्वर्गवासी पिता के स्नेह के साथ 
    जो बेशक है पूर्णतया आभासी 
    पर होती है आत्मिक संतुष्टि 
    होगा सबकुछ बेहतर 
    कहीं प्लेटोनिक आशीर्वाद तो नहीं
    जिसका माध्यम भर है ये ख़ास जूता

    हाँ 
    आज फिर 
    पॉलिश्ड, चकमक
    पिता के जूते पहन
    बढ़ता जा रहा हूं

    जल्दी पहुँचना जो है काम पर।

    Mukesh Kumar Sinha


    Mukesh Kumar Sinha

  • अव्यवस्थित सुनहरी भावनाओं को समेटती- मेरी प्रेम कविताएं

    अव्यवस्थित सुनहरी भावनाओं को समेटती- मेरी प्रेम कविताएं

    Mukesh Kumar Sinha[divider style=’right’]

    अव्यवस्थित
    सुनहरी भावनाओं को
    बेवजह समेटने की कोशिश भर हैं
    मेरी प्रेम कविताएं

    जिसकी शुरूआती पंक्तियां
    गुलाबी दबी मुस्कुराहटों के साथ
    चाहती हैं
    हो जाएं तुम्हें समर्पित

    पर स्वछंद हंसते डिंपल से जड़ी मुस्कान और
    तुम्हारे परफेक्ट आई क्यू के कॉकटेल में
    कहीं खोती हुई ये कविता
    प्रेम की चाहत को जज़्ब करती है
    जैसे जींस के पीछे के पॉकेट में बटुए को दबाये
    तुमसे कहना चाहती है
    ‘आज तो कॉफी का बिल तुम ही भरना’
    प्रेम भी तो अर्थव्यवस्था का मारा हुआ है आखिर
    पर कैफे कॉफी डे के कॉफी पर
    बना दिल
    पीता हूँ ऐसे, जैसे
    प्रेम को आत्मसात करा हूँ
    बूंद दर बूंद।

    सारी वैचारिक्ताएं शहीद हो जाती है
    जब तुम कॉफी हाउस में
    टेबल पर उचककर
    चाहती हो मेरे आँखों में झांकना
    लेकिन मेरी फिसलती नज़र
    मौन होकर भी पूछती है
    तुम्हारे टीशर्ट का साइज़ एक्सएल है न?
    बिना इतराये, ख़ार खाये
    कहती हो तुम, शोख मुस्कराहट के साथ
    ‘ओये! ऊपर देख।’

    मैं भी, तब
    इस ‘ओये’ पर चाहता हूँ
    हो जाऊं कुर्बान
    पर पढ़ा है, अब मजनूं मरते नहीं
    बेहोश भी कहाँ होते हैं
    बस एक तीक्ष्ण मुस्कुराहट भर
    रह गया है ये प्यार
    है न

    Mukesh Kumar Sinha

    वैसे
    मेरा तुम्हारे लिए आकर्षण
    तुम्हारा मेरे प्रति झुकाव
    हम दोनों के बीच
    पनपता रहस्यमयी अहसास
    जैसे जेम्स हेडली चेज़ का जासूसी उपान्यास
    अंतिम पन्ने से पता चलेगा
    प्रेम ही तो है,
    अनबिलिवेबल प्रेम!

    नहीं मेरे अहमक!
    वी आर ओनली फ्रेंड्स
    – तुम्हारे मादक होंठ काँपे थे

    कोई न,
    दोस्त तो हैं न!
    टचवुड!

  • प्रेम – असहमति

    प्रेम – असहमति

    Mukesh Kumar Sinha

    असहमतियां
    नही होती
    हर समय
    सहमति का विपरीत

    असहमति
    कई बार
    बस ये जताने के लिए भी
    होती है
    कि समझ पाए अहमियत ।

    विरोध
    वक़्त बेवक्त
    किया जाता है
    सबसे अपनों का

    विरोध
    में छिपा होता है
    सुझाव
    कि समझा करो
    या, ऐसे तो समझोगे न !

    प्रेम
    में भी कई बार
    करना पड़ता है
    ‘न’ का सामना

    प्रेम
    का उत्सव सरीखा
    किस डे/ हग डे
    में असहमतियां
    झिझक भी हो सकती है
    जो, प्रेम का विरोध तो नहीं

    प्रेम
    में बहते हुए
    प्रोमिस डे के दिन कहना
    कि प्रोमिस करो
    प्रेम करते रहोगे न
    शायद उम्मीदों का गुलाब ही तो है

    Mukesh Kumar Sinha

    प्रेम
    कितना चॉकलेटी होता है न
    तभी तो
    चुप्पियां सहमति समझी जाती है
    फिर भी चिल्ल्ला कर
    जताना चाहते हैं प्रेम

    प्रेम सिक्त नजरें
    मौन हो कर भी
    बता देती है
    हवाओं में गुलाबी सुगंध है ।

    असहमति
    भी प्रेम ही है
    समझे न
    माय वेलेंटाइन !!