Tag: Mukesh Kumar Sinha

  • स्त्री हूँ – माय चॉइस !

    Mukesh Kumar Sinha

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    स्त्री हूँ
    हाँ स्त्री ही हूँ
    कोई अजूबा नहीं हूँ, समझे न !

    क्या हुआ, मेरी मर्जी
    जब चाहूँ गिराऊं बिजलियाँ
    या फिर हो जाऊं मौन

    मेरी जिंदगी
    मेरी अपनी, स्वयं की
    जैसे मेरा खुद का तराशा हुआ
    पंच भुजिय प्रिज्म
    कौन सा रंग, कौन सा प्रकाश
    किस परावर्तन और किस अपवर्तन के साथ
    किस किस वेव लेंग्थ पर
    कहाँ कहाँ तक छितरे
    सब कुछ मेरी मर्जी !!

    मेरा चेहरा, मेरे लहराते बाल
    लगाऊं एंटी एजिंग क्रीम या ब्लीच कर दूं बाल
    या लगाऊं वही सफ़ेद पाउडर
    या ओढ़ लूं बुरका
    फिर, फिर क्या, मेरी मर्जी !

    मेरा जिस्म खुद का
    कितना ढकूँ, कितना उघाडू
    या कितना लोक लाज से छिप जाऊं
    या ढों लूँ कुछ सामाजिक मान्यताएं
    मेरी मर्जी
    तुम जानो, तुम्हारी नजरें
    तुम पहनों घोड़े के आँखों वाला चश्मा
    मैं तो बस इतराऊं, या वारी जाऊं
    मेरी मर्जी !

    है मेरे पास भी तुम्हारे जैसे ऑप्शन,
    ये, वो, या वो दूर वाला या सारे
    तुम्हे क्या !
    हो ऐसा ही मेरा नजरिया!
    हो मेरी चॉइस! माय चॉइस !!

    पर, यहीं आकर हो जाती हूँ अलग
    है एक जोड़ी अनुभूतियाँ
    फिर उससे जुडी जिम्मेदारियां
    बखूबी समझती हूँ

    और यही वजह, सहर्ष गले लगाया
    दिल दिमाग से अपनाया
    आफ्टर आल माय चॉइस टाइप्स फीलिंग
    है न मेरे पास भी !!
    —————
    माय चॉइस !

  • खुद की मौत !

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    सोने से कुछ देर पहले
    तकियें में चेहरा भींचे
    कुछ पलों के लिए रोकी थी साँसे
    महसूसना चाहता था
    खुद की मौत !
    आखिर आत्महत्या भी तो कुछ होती है न

    मरने के बाद होगा क्या
    नहीं समझ पाया
    पर, मरने से कुछ पल पहले कि
    यातना की रिहर्सल
    बता गयी, नहीं है क़ुव्वत मुझमे मरने की
    न चाहते हुए भी
    आई आवाज, अन्दर से, मत मारो !

    किसी दिन देखा था
    शांति व मोहब्बत के दूत
    सुर्ख सफेद फ़ाख्ते को
    कमरे में, चलते पंखे से टकरा कर
    थके-हारे टूटे डैने के साथ
    औंधे मुंह गिरते, बिस्तर पर
    दिल ने कहा – ऐसे ही चाहिए मौत !

    आह भरते मरने को अधीर फ़ाख्ते पर
    एक बिल्ले ने मारा था झपट्टा
    जैसे था, उसे इन्तजार एक मौत का
    पहुंच पाता फाख्ते के कंठ तक कुछ पानी की बूंदे
    बिल्ले के म्याऊं में थी आवाज
    ‘राम नाम सत्य है !’

    भोरे-भोरे
    निकला था सैर पर, कोई एक दिन
    एक सरपट दौड़ती मोटरकार ने
    रौंद दिया था एक आवारा कुत्ते को
    पल में, फटाक की आवाज़ के साथ
    सारी अंतड़ियाँ व पेट के अन्दर का मांस
    पड़े थे सड़क पर
    पर चिहुँकते हुए, दिल ने घबरा कर कहा
    नहीं मरना कुत्ते की मौत !

    चीटियाँ भी तो
    दब ही जाती हैं राहों में
    कहाँ रहता है ध्यान कि
    पैरों तले हुई हैं बहुत सी बिलखती मौत

    यानी है जिंदगी तो होगी मौत
    है मौत तो बहाने अनेक
    है मौत के अंदाज अलग अलग
    मरते हैं कमजोर लाचार
    पाते हैं वीरगति बलशाली

    बेशक कहूँ नहीं मरना है मुझे
    पर
    कुछ आँखे होंगी नम
    कभी न कभी, मेरे लिए भी ,
    शायद मेरे वजह से भी होगी
    छलकते पानी की सांद्रता उच्चतम स्तर पर !
    कुछ नमक तो मुझमे भी है ही न

    आखिर मौत के बाद का सन्नाटा
    क्यों दहाड़ें मारता प्रतीत होता है !!

  • तेज धड़कनों का सच

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    तेज धड़कनों का सच
    समय के साथ बदल जाता है

    कभी देखते ही
    या स्पर्श भर से
    स्वमेव तेज रुधिर धार
    बता देती थी
    हृदय के अलिंद निलय के बीच
    लाल-श्वेत रक्त कोशिकाएं भी
    करने लगती थी प्रेमालाप
    वजह होती थीं ‘तुम’

    इन दिनों उम्र के साथ
    धड़कनों ने फिर से
    शुरू की है तेज़ी दिखानी
    वजह बेशक
    दिल द मामला है
    जहाँ कभी बसती थी ‘तुम’

    तुम और तुम्हारा स्पर्श
    उन दिनों
    कोलेस्ट्रॉल पिघला देते थे
    शायद!
    पर, इन दिनों उसी कोलेस्ट्रॉल ने
    दिल के कुछ नसों के भीतर
    बसा लिया है डेरा
    बढ़ा दिया करती हैं धड़कनें
    ख़ाम्ख़्वाह!

    मेडिकल रिपोर्ट्स
    बता रही हैं
    करवानी ही होगी
    एंजियोप्लास्टी
    आखिर तुम व तुम्हारा स्पर्श
    सम्भव भी तो नहीं है!

     

  • “इन्तजार”

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    1.

    सह लूँगा
    तुम्हारी हर आलोचना
    गालियाँ भी ….
    आखिर इनके बीच जल कर ही तो
    फिनिक्स की तरह,
    जन्म लूँगा ….. !!
    इन्तजार करना बस !! 

    2.

    ज़िन्दगी की चक्की में
    खुद को इतना पीस दिया
    कि, ‘सच’, कुछ खोते चले गए
    बस कर रहा अब इन्तजार
    पिसने के बाद पाने का….

    3.

    मेरी राख पर
    जब पनपेगा गुलाब
    तब ‘सिर्फ तुम’ समझ लेना
    प्रेम के फूल !!
    इन्तजार करूँगा सिंचित होने का

    .

  • कविता – “टचवुड”

    Mukesh Kumar Sinha

    अव्यवस्थित भावनाओं को
    बेवजह समेटने की कोशिश भर हैं
    मेरी प्रेम कविताएं

    जिसकी शुरूआती पंक्तियां
    गुलाबी दबी मुस्कुराहटों के साथ
    चाहती हैं
    हो जाएं तुम्हें समर्पित

    पर स्वछंद हंसते डिंपल से जड़ी मुस्कान और
    तुम्हारे परफेक्ट आई क्यू के कॉकटेल में
    कहीं खोती हुई ये कविता
    प्रेम की चाहत को जज़्ब करती है
    जैसे जींस के पीछे के पॉकेट में बटुए को दबाये
    तुमसे कहना चाहती है
    ‘आज तो कॉफी का बिल तुम ही भरना’
    प्रेम भी तो अर्थव्यवस्था का मारा हुआ है आखिर

    सारी वैचारिक्ताएं शहीद हो जाती है
    जब तुम कॉफी हाउस में
    टेबल पर उचककर
    चाहती हो मेरे आँखों में झांकना
    लेकिन मेरी फिसलती नज़र
    मौन होकर भी पूछती है
    तुम्हारे टीशर्ट का साइज़ एक्सएल है न?

    बिना इतराये, ख़ार खाये
    कहती हो तुम, शोख मुस्कराहट के साथ
    ‘ओये! ऊपर देख।’

    मैं भी, तब
    इस ‘ओये’ पर चाहता हूँ
    हो जाऊं कुर्बान
    पर पढ़ा है, अब मजनूं मरते नहीं

    मेरा तुम्हारे लिए आकर्षण
    तुम्हारा मेरे प्रति झुकाव
    हम दोनों के बीच
    पनपता रहस्यमयी अहसास
    जैसे जेम्स हेडली चेज़ का जासूसी उपान्यास
    अंतिम पन्ने से पता चलेगा
    प्रेम ही तो है,
    अनबिलिवेबल प्रेम!

    नहीं मेरे अहमक!
    वी आर ओनली फ्रेंड्स
    – तुम्हारे मादक होंठ काँपे थे
    कोई न,
    दोस्त तो हैं न!
    टचवुड!


    फेसवुक वाल से साभार