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  • आईए, करीना-सैफ के पुत्र तैमूर का स्वागत करें

    राम पुनियानी
    Rtd Prof, IIT Bombay

    हमारे समाज पर सांप्रदायिक मानसिकता की जकड़न भयावह है। हमारा समाज इतिहास को राजाओं के धर्म के चश्मे से देखता है। सांप्रदायिक विचारधारा, इतिहास की चुनिंदा घटनाओं और व्यक्तित्वों का इस्तेमाल, इतिहास का अपना संस्करण गढ़ने के लिए कर रही है। यही विचारधारा दोनों समुदायों के बीच घृणा के बीज बो रही है। मुस्लिम सांप्रदायिक तत्व, हिन्दुओं के प्रति घृणा फैलाते हैं तो हिन्दू संप्रदायवादी हमसे कहते हैं कि मुसलमानों से नफरत करो। इसी घृणा से उपजती है सांप्रदायिक हिंसा, जो कि अधिकांश मामलों में सोची-समझी साजिश के तहत भड़काई जाती है। इस हिंसा में मासूम लोग मारे जाते हैं और समाज का सांप्रदायिक ध्रुवीकरण होता है, जिसका लाभ सांप्रदायिक ताकतें उठाती हैं। सांप्रदायिक शक्तियां अंतर्धामिक विवाहों और ऐसे सांस्कृतिक आचरणों की विरोधी हैं, जो विभिन्न धर्मों के लोगों को एक करते हैं। इन दिनों मुस्लिम पुरूष और हिन्दू महिला के बीच विवाह को ‘लव जिहाद’ कहा जाता है और यहां तक कि इस तरह के विवाहों से उत्पन्न संतानों को भी निशाना बनाया जा रहा है।

    गत 20 सितंबर, 2016 को करीना कपूर और सैफ अली खान के पुत्र ने जन्म लिया। उन्होंने उसका नाम तैमूर (जिसे तिमूर भी उच्चारित किया जाता है) रखा। इसके बाद सोशल मीडिया पर बवाल मच गया। कई सांप्रदायिक तत्वों ने नवजात शिशु को कोसा। उनकी शिकायत यह थी कि बच्चे का नाम तैमूर क्यों रखा गया। तैमूर ने सन 1398 में दिल्ली पर आक्रमण कर लूटपाट की थी और बड़ी संख्या में आम लोगों की हत्या कर दी थी। यह दिलचस्प है कि उन दिनों दिल्ली पर तुर्की मुसलमान बादशाह मोहम्मद बिन तुगलक का शासन था।

    तैमूर, चंगेज़ खान और औरंगजे़ब को भारत के मध्यकालीन इतिहास का खलनायक बताया जाता है और उन्हें आज के भारतीय मुसलमानों से जोड़ा जाता है। चंगेज़ खान मंगोल था और उसने मंगोल साम्राज्य की स्थापना की थी। वह मुसलमान नहीं वरन शेमनिस्ट था। उसने भी उत्तर भारत में लूटपाट और मारकाट की थी। औरंगजे़ब को एक ऐसे तानाशाह के रूप में देखा जाता है जिसने जज़िया लगाया, लोगों को ज़बरन मुसलमान बनाया और हिन्दू मंदिरों को नष्ट किया। इन राजाओं का दानवीकरण तो किया ही जाता है, उनकी क्रूरताओं के लिए आज के भारतीय मुसलमानों को ज़िम्मेदार ठहराया जाता है। यह नितांत हास्यास्पद है। आज के भारतीय मुसलमानों का तैमूर, औरंगजे़ब या चंगेज़ खान से कोई लेना-देना नहीं है। ये राजा अलग-अलग धर्मों के थे और उन्होंने अपने धर्म के लिए लड़ाईयां नहीं लड़ी थीं।

    सभी विजयी राजा, चाहे वे किसी भी धर्म या क्षेत्र के रहे हों, विजित इलाके में लूटपाट और मारकाट करते थे। इस लूटपाट को औचित्यपूर्ण सिद्ध करने के लिए कई बार उनके दरबारी उसे धर्म से जोड़ देते थे। परंतु यह मानना भूल होगी कि किसी एक धर्म के राजा ही खूनखराबा और लूटमार करते थे। जिस युग की हम बात कर रहे हैं, उस युग में न तो कोई अंतर्राष्ट्रीय कानून था और ना ही राष्ट्रवाद की वह अवधारणा थी, जिससे हम आज परिचित हैं। राजा अपने साम्राज्य के मालिक हुआ करते थे और उनसे कोई प्रश्न पूछने की इजाजत किसी को नहीं थी। सभी धर्मों का पुरोहित वर्ग यह सिद्ध करने में लगा रहता था कि उनका राजा जो भी करता है, वह धर्म के अनुरूप है और उसे ईश्वर की स्वीकृति प्राप्त है। उस समय भारत जैसी कोई चीज़ अस्तित्व में नहीं थी और हर राज्य एक अलग देश था। हम सब जानते हैं कि बाबर को राणा सांगा ने आमंत्रित किया था ताकि वह बाबर के साथ मिलकर इब्राहिम लोधी को हरा सके। मुस्लिम राजाओं के दरबारों में उच्च पदों पर हिन्दू हुआ करते थे और यही बात हिन्दू राजाओं के बारे में भी सही थी।

    आज भारत में मुस्लिम राजाओं और ऐसे राजाओं, जो अपने नाम से मुसलमान लगते हैं, को खलनायक के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। दूसरी ओर, शिवाजी, राणा प्रताप और गोविंद सिंह जैसे नायकों को हिन्दुओं का नायक बताया जा रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे का कहना था कि शिवाजी, राणा प्रताप और गोविंद सिंह के सामने एक राष्ट्रवादी बतौर गांधीजी बौने थे। जहां आज शिवाजी को एक महान राष्ट्रीय नायक के रूप में महिमामंडित किया जा रहा है वहीं यह दिलचस्प है कि शुरूआत में देश के कुछ इलाकों, विशेषकर गुजरात व बंगाल में, शिवाजी को राष्ट्रीय नायक के रूप में स्वीकार करने का खासा प्रतिरोध हुआ था। ये वे दो इलाके हैं जहां शिवाजी की सेनाओं ने लूटमार की थी और बेगुनाहों को कत्ल किया था। आज हालत यह हो गई है कि अगर कोई कहे कि शिवाजी की सेना भी लूटमार और मारकाट करती थी तो उसे ‘राष्ट्रीय नायक’ का अपमान बताया जाता है। बाल सामंत नामक एक सज्जन, जो हिन्दू राष्ट्रवादियों के प्रिय बाल ठाकरे के नज़दीकी थे, ने अपनी पुस्तक ‘शिवकल्याण राजा’ में करीब 21 पृष्ठों के अध्याय में केवल शिवाजी की सेनाओं द्वारा की गई लूटमार का वर्णन किया है। उन्होंने डच व ब्रिटिश स्त्रोतों के हवाले से शिवाजी की सेना द्वारा बड़े पैमाने पर की गई लूटमार और हत्याओं का वर्णन किया है। अशोक ने कलिंग में किस तरह का कत्लेआम किया था और खून की नदियां बहाई थीं, यह हम सबको ज्ञात है। अधिकांश राजाओं ने या तो अपने साम्राज्य के विस्तार के लिए अथवा अपने शत्रुओं से बदला लेने के लिए युद्ध किए।

    सांप्रदायिक विचारधारा का बोलबाला बढ़ने के साथ ही इतिहास की विवेचना करने का तरीका भी बदल गया है। शिवाजी की सेना द्वारा की गई लूट को नरेन्द्र मोदी औरंगजे़ब की खज़ाने की लूट बता रहे हैं! मराठा सेनाओं द्वारा श्रीरंगपट्टनम के हिन्दू मंदिर को नष्ट किए जाने की घटना को सांप्रदायिक इतिहासकारों द्वारा छुपाया जाता है। सन 1857 का भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम भी इतिहास को तोड़ मरोड़कर प्रस्तुत करने वालों की कारगुज़ारियों का शिकार हुआ है। जहां हिन्दुत्व चिंतक सावरकर उसे भारत का पहला स्वाधीनता संग्राम बताते हैं वहीं इसी विचारधारा के एक अन्य बड़े झंडाबरदार गोलवलकर का कहना है कि यह विद्रोह इसलिए असफल हुआ क्योंकि इसका नेतृत्व एक मुसलमान, बहादुरशाह ज़फर के हाथों में था, जो हिन्दू सिपाहियों को लड़ने के लिए प्रेरित न कर सका। हम सब जानते हैं कि यह विद्रोह इसलिए असफल हुआ क्योंकि पंजाबियों और गोरखाओं ने अंग्रेज़ों का साथ दिया।

    सांप्रदायिक विचारधारा, इतिहास को तोड़नेमरोड़ने और उसके चुनिंदा हिस्सों को गलत ढंग से प्रस्तुत कर अपना उल्लू सीधा करती है। कुछ लोगों ने तो सभी हदें पार करते हुए, सैफ अली खान और करीना कपूर के नवजात पुत्र को आतंकवादी और जिहादी तक बता डाला। सभी बच्चों का इस दुनिया में स्वागत किया जाना चाहिए। सैफ अली खान ने ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ में प्रकाशित अपने लेख में लिखा है कि किस तरह उनके विवाह को लव जिहाद बताया गया था और उसका विरोध हुआ था। एक ट्वीट में हिन्दू लड़कियों को यह चेतावनी दी गई है कि वे मुसलमान लड़कों से विवाह न करें क्योंकि अगर वे ऐसा करेंगी तो वे किसी चंगेज़ खान या किसी तैमूर या किसी औरंगजे़ब को जन्म दे सकती हैं। विघटनकारी विचारधारा आखिर हमारी सोच को कितना नीचे गिराएगी।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • किसका दोष है यह

    डॉ नीलम महेंद्र


    पता नहीं यह दुर्भाग्य केवल उस नौजवान का है या पूरे देश का जिसके झोले में डिग्री , जेब में कलम लेकिन हाथ में झाड़ू और फावड़ा हो ।
    कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश में चपरासी अथवा सफाई कर्मचारी के पद के लिए सरकार द्वारा आवेदन मांगें गए थे जिसमें आवश्यकता  368 पदों की थी और योग्यता , प्राथमिक शिक्षा तथा साइकिल चलाना थी। इन पदों के लिए जो आवेदन प्राप्त हुए उनकी संख्या  23 लाख थी जिनमें से 25000 पोस्ट ग्रैजुएट , 255 पीएचडी   , इसके अलावा डाक्टर इंजीनियर और कामर्स विज्ञान जैसे विषयों से ग्रौजुएट शामिल थे।

    आइये अब चलते हैं   मध्यप्रदेश ,जहाँ  हवलदार के  पद के लिए भी कमोबेश इसी प्रकार की स्थिति से देश का सामना होता है, आवश्यकता  14000 पदों की है  ।शैक्षणिक योग्यता  हायर सेकन्डरी लेकिन आवेदक  9.24 लाख के ऊपर  जिनमें  1. www.oldhouseonline.com 19 लाख ग्रैजुएट हैं, 14562 पोस्ट ग्रैजुएट हैं  9629 इंजीनियर हैं 12 पीएचडी हैं ।

    ऐसी ही एक और परिस्थिति, जिसमें  माली के पद के लिए सरकार को लगभग 2000 पीएचडी धारकों के आवेदन प्राप्त हुए।
    जब सम्बन्धित अधिकारियों का ध्यान  पद के लिए आवश्यक योग्यता और आवेदकों की शैक्षणिक योग्यता के बीच इस विसंगति की ओर दिलाया गया   तो उनका कहना था कि हमारा काम परीक्षा कराना है आवेदकों की प्रोफाइल का निरीक्षण करना नहीं।

    इस सबके विपरीत, एक रिपोर्ट जिसके केंद्र में मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों के सरकारी विद्यालयों के  शिक्षक हैं।
    इनकी योग्यता  : देश के प्रधानमंत्री का नाम हो या राष्ट्रपति का नाम , किसी प्रदेश की राजधानी का नाम हो या सामान्य ज्ञान से जुड़ा कोई प्रश्न  , हर प्रश्न  अनुत्तरित  ! किसी भी प्रश्न का उत्तर देने में असक्षम ।

    कोई आश्चर्य नहीं कि इन प्रदेशों की परीक्षाओं के परिणाम  का उदाहरण बिहार माध्यमिक बोर्ड  ( दसवीं की परीक्षा ) में  दिखाई दिया जब बोर्ड को टॉप करने वाले विद्यार्थियों को उन विषयों तक के नाम नहीं पता जिनमें उन्होंने टाप किया है  ।

    लेकिन क्या यह घटनाएँ  हम सभी के लिए  , पूरे देश के लिए  , हमारी सरकारों के लिए एक चिंता का विषय नहीं होना चाहिए  ?
    न केवल समाज का हिस्सा होने के नाते अपितु स्वयं पालक होने के नाते , क्या यह हमारे बच्चों ही नहीं बल्कि इस देश के भी भविष्य के साथ खिलवाड़ नहीं है?

    दोष किसे दिया जाए  ! उन्हें जो अयोग्य होते हुए भी अपना स्वयं का वर्तमान सुधारने के लिए शिक्षक के पद पर आसीन तो हैं किन्तु उन बच्चों के भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगा रहे हैं जो कि कालांतर में स्वयं इस देश के भविष्य पर ही एक बड़ा प्रश्न चिन्ह बन जाएगा। या फिर उस सिस्टम को जिसमें प्रेतिभावन  युवा  अपने लिए अयोग्य पदों पर भी आवेदन करने के लिए मजबूर हैं और प्रतिभाहीन  व्यक्ति उन जिम्मेदार पदों पर काबिज है जिन पर देश के वर्तमान एवं भविष्य की जिम्मेदारी है।

    दोष उस बच्चे का है जिसे अपने विषय अथवा अपने पाठ्यक्रम का ज्ञान नहीं है अथवा उस शिक्षक का है जिस पर उसे पढ़ाने का जिम्मा है लेकिन स्वयं की अज्ञानता  के कारण उसे पढ़ा नहीं पाता। दोष उस शिक्षक का है जिसने  ‘ कुछ ले दे कर ‘ अथवा  ‘ जुगाड  ‘ से अपनी अयोग्यता के बावजूद किसी योग्य का हक मार कर नौकरी हासिल कर ली या फिर उस अधिकारी का जिसने आवेदक की योग्यता को ज्ञान के बजाय सिक्कों के तराज़ू में तोला! दोष उस अधिकारी का है जिसने अपने कर्तव्य का पालन करने के बजाय उस भ्रष्ट तंत्र के आगे हथियार डाल दिए या फिर उस भ्रष्ट तंत्र का जिसके बने बनाए सिस्टम में उस अधिकारी के पास एक ही रास्ता  होता है या तो सिस्टम में शामिल हो जाओ या फिर बाहर हो जाओ ।

    दोष आखिर किसका है हर उस पुरुष अथवा महिला का जिस पर अपने परिवार को पालने की जिम्मेदारी है जिसके लिए वह येन केन प्रकारेण कोई भी नौकरी पाने  की जुगत लगा लेता है और जो जीतता है वो सिकन्दर बन जाता है या फिर सदियों से चले आ रहे इस तथ्यात्मक सत्य की  कि जिसके पास लाठी होती है भैंस वही ले जाता है  ।

    डारविन ने अपनी “थियोरी आफ इवोल्यूशन ” में ‘सरवाइवल आफ द फिट्टेस्ट ‘ का उल्लेख किया है  अर्थात् जो सबसे ताकतवर होगा वही परिस्थितियों के सामने टिक पाएगा  किन्तु  ‘ताकत ‘ की परिभाषा ही जो समाज अपने लिए एक नई गढ़ ले  ! जहाँ ताकत बौद्धिक शारीरिक मानसिक अथवा आध्यात्मिक से इतर सर्वशक्तिमान ताकत केवल ‘धन’ की अथवा  ‘जुगाड़’ की हो तो दोष किसे दिया जाए  समाज को या  ‘ताकत ‘ को ! दोष किसे दिया जाए उस समाज को जिसमें यह विसंगतियाँ पनप रही हैं और सब खामोश हैं या फिर उस सरकार को जिसका पूरा तंत्र ही भ्रष्ट हो चुका है  ।

    दरअसल हमारे देश में न तो हुनर की कमी है न योग्यता की लेकिन नौकरी के लिए इन दोनों में से किसी को भी प्राथमिकता नहीं दी जाती  । यहाँ नौकरी मिलती है डिग्री से लेकिन डिग्री कैसे मिली यह पूछा नहीं जाता। इस देश और उसके युवा को उस सूर्योदय का इंतजार है जो उसके भविष्य के अंधकार को अपने प्रकाश से दूर करेगा, उसे उस दिन का इंतजार है जब देश अपनी प्रतिभाओं को पहचान कर उनका उचित उपयोग करेगा शोषण नहीं, जिस देश में अपने प्राकृतिक संसाधनों का और मानव संसाधनों दोनों का ही दुरुपयोग होता हो वह देश आगे कैसे जा सकता है  ?

    जहाँ प्रतिभा प्रभाव के आगे हार जाती हो वहाँ प्रभाव जीत तो जाता है लेकिन देश हार जाता है । इस देश के युवा को  उस दिन का इंतजार है जब योग्यता को उसका उचित स्थान एवं सम्मान मिलेगा। नौकरी और पद प्रभाव नहीं प्रतिभा से मिलेंगे  । न तो कोई पढ़ा लिखा बेरोजगार युवा मजबूर होगा अपनी कलम छोड़ कर झाड़ू पकड़ने के लिए न कोई अयोग्य व्यक्ति मजबूर होगा अपने परिवार की जरूरतों को पूरा  करने के लिए किसी योग्य व्यक्ति का हक मारने के लिए, न कोई बच्चा मजबूर होगा किसी अयोग्य शिक्षक से पढ़ने के लिए न कोई अधिकारी मजबूर होगा किसी अपात्र को पात्रता देने के लिए,जहाँ इस देश का युवा सिस्टम से हारने के बजाय सिस्टम को हरा दे जहाँ सिस्टम हार जाए और देश जीत जाए।

  • स्वराज यूनिवर्सिटी व स्वपथगामी नेटवर्क द्वारा आयोजित उदयपुर, राजस्थान में जीवन विद्या शिविर 5 – 12 मार्च 2017

    Swaraj University

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    शिविर के बारे में:

    जीवन विद्या शिविर (करीब 40 घंटे की अवधि की) एक गहरे अध्ययन की प्रक्रिया है, जिसमे जीवन के मौलिक परन्तु प्रायः उपेक्षित पहलुओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता है। आपसी सम्बन्ध, शिक्षा, समाज, प्रकृति, लक्ष्य, सफलता आदि पर एक गहरा संवाद होता है जिसके द्वारा प्रतिभागियों को ज़िन्दगी के भिन्न प्रतीत होने वाले पहलुओं के बीच की कड़ियाँ पहचानने व समझने का अवसर मिलता है। कोई प्रवचन या उपदेश नही होता। प्रबोधक द्वारा कुछ प्रस्ताव प्रस्तुत किये जाते हैं, और प्रतिभागियों को उनके आतंरिक विचारों, भयों, सम्भ्राँतियों, आकांक्षाओं आदि को जांचने में सहयोग किया जाता है।  क्रमशः ढेर सारी छिपी मान्यताएं उजागर होने लगती हैं और व्यक्ति को ज़िन्दगी के सूक्ष्म ताने बाने का एक नयी स्पष्टता से दर्शन होने लगता है; मानव में सकारात्मक सृजनशक्ति की नयी संभावनाओं का बोध होने लगता है।  एक सशक्त चिंतन-यात्रा का शिविर में प्रारम्भ तो होता है पर अंत नही …

    यह 8-दिवसीय पूर्णकालिक आवासीय शिविर है। उदयपुर, राजस्थान में आयोजित इस शिविर में कुल 30 प्रतिभागियों के लिए स्थान हैं, इस लिए पूर्व पंजीकरण करें।  शिविर में पूर्णकालिक प्रतिभागिता अनिवार्य है, आंशिक प्रतिभागिता की अनुमति नही है। शिविर के दौरान स्वैच्छिक श्रमदान करने का व व्यक्तिगत हुनरों के आदान-प्रदान का भी अवसर रहेगा।

    प्रबोधक:

    Vinish Gupta

    इस शिविर में प्रबोधन श्री विनीश गुप्ता करेंगे। वे लम्बे समय से विभिन्न सामाजिक व पर्यावरणीय अभियानों से जुड़े रहे हैं। करीब दस वर्ष तक वे बौद्ध परंपरा में भिक्षु भी रहे, जिस दौरान उन्हें भारतीय विचारधाराओं व तौर तरीकों को समझने का अवसर मिला। विनीश को उनके कार्यों में सहयोग मिलता है उनकी पत्नी करुणा मुरारजी से। शिक्षा का मानव संभावनाओं व विकास के साथ सम्बन्ध समझने में लम्बे समय से करुणा की रूचि रही है। अन्य विषय जिनके अध्ययन में वे रूचि रखती हैं: आहार, फ़िल्में, प्रक्रिया/इतिहास विश्लेषण, और सीखने-सिखाने व जीने के सामूहिक तौर तरीके।

    साथ लाएं:

    ओढ़ने व बिछाने की चादरें, तकिये का गिलाफ, कंबल/स्लीपिंग-बैग, निजी वस्त्र, पानी की बोतल, टॉर्च, तौलिया, साबुन आदि निजी उपयोग का सामान, आपके संस्था / कार्य से सम्बंधित सामग्री, व कुछ भी रचनात्मक जो आप को दूसरों के साथ करना / बांटना अच्छा लगता है।

    यह शिविर ‘उपहार संस्कृति’ पर आधारित है। यानि इस शिविर के लिए कोई निश्चित अनिवार्य शुल्क नही है।  हर प्रतिभागी पर करीब रुपए 3700 का खर्च आता है।  जिन्हे आवश्यकता हो उनके लिए छात्रवृत्तियां/सहयोग उपलब्ध हैं।  आप अधिक योगदान का सामर्थ्य रखते हों तो आपके योगदान से अन्य लोगों की प्रतिभागिता सुनिश्चित होने में सहयोग रहेगा।

    आर्थिक असमर्थता के कारण किसी की प्रतिभागिता बाधित नही होने दी जाएगी।  इस शिविर में भाग लेने के लिए यह ऑनलाइन फॉर्म भरें। या हमसे संपर्क करें <swarajuni.events@gmail.com>

  • दलित चेतना 

    आलोक नंदन


    वेदों-शास्त्रों के खिलाफ
    विषवमन करके मुटाती है
    दलित चेतना

    मनुस्मृति को मुंह में डालकर
    पघुराती है
    दलित चेतना

    अपने पूर्वजों के खिलाफ
    वर्णवादी व्यवहार पर
    कसमसाती है
    दलित चेतना

    एकलव्य के कटे हुये अंगूठे
    में अपना अक्स निहारती
    तर्कों का फन फैलाकर
    कभी राम पर कभी कृष्ण पर
    फुंफकारती है
    दलित चेतना।

    बाबा साहेब के कंधों पर सवार हो
    संविधान में जगह पाती है
    फिर भी प्रतिशोध की आग में
    धधकती है
    दलित चेतना

    मनु की खींची रेखाओं से
    बाहर निकलने की चाह में
    अकुलाती है
    दलित चेतना

    सदियों की दूरी तय करने के बावजूद
    वर्ण की दीवार पर
    अपना सिर मारकर
    पछाड़ खाती है
    दलित चेतना।

  • एक लंबी कविता

    आलोक नंदन


    झाड़ियों में उगती है,
    कंटीली झाड़ियों में
    और उनके संग खुद भी
    कंटीली हो जाती है
    चुभे तो लहू टपक पड़े,
    ऐसी है
    लंबी कविता।

    धरती के कोख में उस
    जगह पलती है
    जहां होता है
    पानी का अभाव ।

    पुस की रात में
    सड़क पर
    ठिठुरते हुये
    बुढ़े के नींद में ऊंघती है
    लंबी कविता !

    गंगा की मौजों पर
    सुबह कि सुर्खीली किरणों
    के फैलाव में अटखेलियां करती है
    लंबी कविता

    दुल्हन के अंग-प्रत्यंग पर
    सोलहों श्रृंगार में
    लजाती, सकुजाती
    और कसमसाती है
    लंबी कविता

    सेल में बंद
    किसी कैदी की बेड़ियों की
    खनखनाहट में
    आजादी के नगमें सुनाती है
    लंबी कविता।

    ध्यानमग्न साधक की बंद आंखों के बीच
    रश्मियों की तरह नजर आती है
    लंबी कविता।

    लंबी कविता उगती है
    बढ़ती है
    और फैलती है
    अमरलता मानिंद।

    मंत्रों व आयातों में
    उतरती है लंबी कविता।

    सुकरात, अरस्तु और मार्क्स की
    दाढ़ियों में
    युगों-युगो तक बढ़ती है
    लंबी कविता।

    पहली बारिश के बाद
    धरती की मटैली सोंधी महक बन कर
    सांसों में घुल जाती है
    लंबी कविता।

     

  • देश को गर्त में झोंकने की तथाकथित क्रांति के लिए आप भी उत्तरदायी हैं

    सामाजिक यायावर


    एक निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी आपके पास आता है। बेहूदा, खोखला व फर्जी दावा ठोंकता है कि उसने दुनिया भर के देशों की अर्थव्यवस्था का गहरा अध्ययन किया है।

    चूंकि आपने कभी जीवन में गहरा अध्ययन किया नहीं, गंभीर लोग आपकी सलाहकार व मित्र मंडलियों में दिखते नहीं। आप काल्पनिक व गढ़े गए इतिहास को वास्तविकता के रूप में प्रायोजित करते हुए जीते दीखते हैं क्योंकि ऐसा करने से अपनी सभ्यता के स्वयंभू महान होने का दंभ पूरा होता है। इसलिए आपने इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी के बेहूदे व फिजूल तर्कों को हाथों-हाथ लेकर देश को गर्त में पहुंचाने का कर्मकांड कर डाला।

    यह आदमी आपकी इन कमियों को जानता है, सबसे बड़ी बात यह आदमी यह भी जानता है कि आपको स्वयं को ऐतिहासिक क्रांतिकारी पुरुष के रूप में स्थापित करने की सनक है, जिस सनक के लिए आप कुछ भी कर सकते हैं। यह आदमी आपसे कुछ मिनट की औपचारिक मुलाकात करने का समय मांगता है। उसके नेटवर्क ऐसे होते हैं कि उसको आपसे औपचारिक मुलाकात करने का समय मिल जाता है।

    यह निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी आपसे मिलता है, आपको देश में आमूलचूल परिवर्तन के सपने हकीकत में बदलते दिखाता है। आप एक तीर से कई शिकार करने की राजनैतिक योजना बनाते हैं। आपने यह समझने का प्रयास नहीं किया कि यह आदमी जो दुनिया के देशों का अर्थशास्त्र समझने का दावा (बिलकुल ही फर्जी दावा) ठोंक रहा है वह भारतीय समाज व यहां के लोगों की मानसिकता को समझता है या नहीं।

    चूंकि आपको प्रवचन देने व प्रवचन सुनने के लिए प्रशिक्षित किया गया है इसलिए आपको प्रवचन सुनने के बाद उसको आगे बढ़ाते हुए प्रवचन देने की शीघ्रता रहती है। सो आपने एक मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी का स्वादिष्ट प्रवचन सुना और बिना योग्य, गंभीर व विशेषज्ञ लोगों से परामर्श किए उसके प्रवचन को देश के लोगों को प्रवचन के रूप में सुना दिया।

    किंतु यह प्रवचन केवल प्रवचन नहीं था, देश की हजारों वर्षों के ढांचे को तहस-नहस करने की बात थी। अरबों लोगों के विश्वास टूटने की बात थी। अरबों लोगों के सुचारु रूप से चल रहे जीवन में छीछालेदर होने की बात थी।

    इस आदमी को की शान में कई मित्रों ने बाकायदा आपके साथ उसकी फोटुओं के साथ साबित करते हुए यह बताया कि यह दुनिया का महान अर्थशास्त्री है जिसके आगे दुनिया के बड़े-बड़े अर्थशास्त्री पनाह मांगते हैं। जबकि मुझे पहले पल से ही यह आदमी मानसिक विकृत, झूठा, फरेबी, लफंगा व लुच्चा आदमी प्रतीत हुआ है।

    ये मित्रगण जिनको न तो भारतीय समाज की समझ है, न ही अर्थशास्त्र की, न ही इन्होंने कभी कोई ठोस जमीनी काम ही समाज के लिए किया है, न ही इन्होंने अपनी व्यक्तिगत व पारिवारिक जीवन की प्राथमिकताओं को सामाजिक प्राथमिकताओं के लिए भेंट ही चढ़ाया है। इन मित्रों के द्वारा इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी को महान अर्थशास्त्री मानने के पीछे उनके अपने मन के भीतर की ही वे कुंठित मानसिकताएं हैं जिनके कारण वे राजा या सामंत को सबसे योग्य, महान व दैवीय मानते हैं। इसलिए इस मानसिक विकृत, झूठे व फरेबी आदमी की महानता व योग्यता का सबसे बड़ी कसौटी यही है कि आपने इसकी बेहूदी बकवास लगभग दो घंटे तक सुनी, आपने इसकी बेहूदी बकवास पर देश में आमूलचूल परिवर्तित करने वाली ऐतिहासिक क्रांति के बीज खोजे।

    यह मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी आदमी व इसके दुमछुल्ले मित्र व जानपहचान वाले फायदे में रहे। यह आदमी मीडिया में स्थान पाया, क्रांतिकारी सोच रखने वाले महान चिंतक आदि जैसे होने की फर्जी वाहवाही लूटा। इस आदमी के मित्र व जानपहचान वाले मानसिक विकृति वाले इस दंभ का मजा लिए कि वे इस आदमी के मित्र हैं या इसको जानते हैं। 

    लेकिन आपका व देश का क्या हुआ ….. आपके ऊपर सवाल खड़े होना शुरू हुए, आपको अगंभीर पुरुष माना जाने लगा, देश के लोगों की जो हालत है वह यदि आपको सच में ही नहीं पता तो यह अत्यधिक चिंता वाली बात है …..। यदि आप सच में देश के प्रति सहज भाव रखते हैं तो आपको इस आदमी व इस आदमी के मित्रों व जानपहचान वालों जैसे लफंगों, मानसिक विकृत व अधकचरे ज्ञानी लोगों से बचना चाहिए क्योंकि अपने देश का माइंडसेट ऐसा है कि लफंगे ही मौज करते हैं।

    जो आपने किया, करने के बाद भी जिस तरीके से हैंडल किया व कर रहे हैं; उससे लोगों को इतना तो स्पष्ट मालूम पड़ता जा ही रहा है कि आपमें देश को लफंगई के माइंडसेट से मुक्त कर पाने की दृष्टि, योग्यता व क्षमता नहीं; आप देश को समझते नहीं। इसलिए देश हित में बेहतर यही है कि केवल आप स्वयं को लुच्चों-लफंगों के स्वादिष्ट व लुभावने प्रस्तावों, दावों व तर्कों आदि के प्रभाव से ही मुक्त रख पाएं ताकि कम से कम देश और अधिक गर्त में तो नहीं पहुंचेगा।

     

    चलते-चलते :

     

    संभव है कि आपको लगता हो कि कबीलाई सोच व सभ्यता अबतक कि सबसे बेहतरीन सोच व सभ्यता थी। हो सकता हो आपको लगता हो कि चाणक्य का अर्थशास्त्र जो कबीलाई तौर-तरीकों पर आधारित था, वह दुनिया का सबसे बेहतरीन अर्थशास्त्र है। हो सकता हो आपको लगता हो कि देश के लोग मूर्ख हैं, उनको जैसे चाहे वैसे हांका जा सकता है।

     

    लेकिन मुझे लगता है कि देश के लोगों ने आप पर विश्वास किया था क्योंकि उनको लगा था कि आप उनके सपनों व कल्पनाओं को साझा करते हैं। आप उनको उनके सपनों व कल्पनाओं का देश बनाकर देंगें। बहुत लोग अब भी ऐसा ही सोचते हैं। लेकिन बहुत लोग ऐसे भी हैं जो अब यह मानने लगे हैं कि आपसे ऐसा संभव नहीं।

     

    जिन लोगों ने सिर्फ बैठे-बैठाए अय्याशी करने के लिए आपको ऐशोआराम उपलब्ध करवाने की शक्ति रखने वाला अवतार मानकर आपको बिना सवाल राजपाट सौंप दिया। आपको लगता है कि ऐसे लोग कबीलाई सभ्यता की ओर वापस जाना चाहेंगे। मुझे तो बिलकुल नहीं लगता है। आखिर कब तक लोग आपकी इन बातों पर विश्वास करते रहेंगे कि इतना कष्ट और झेल लो फिर जीवन स्वर्ग जैसा हो जाएगा। आखिर कब तक फर्जी सपनों व कल्पनाओं को देखते हुए लोग सब्र करते रहेंगे।

     

    दरअसल यह आदमी जो निहायत ही मानसिक विकृत, झूठा व फरेबी है, की बात मानकर आपने लोगों के मन में गंभीर व चिंतनीय सवाल पैदा कर दिए हैं कि कहीं ऐसा तो नहीं कि आप केवल सपने दिखाते हैं, उन सपनों को धरातल में उतारने के लिए आप लोगों से कष्ट भोगने व बलिदान करने की मांग के ऊपर मांग प्रस्तुत करते हैं जबकि वास्तव में सपनों को धरातल पर उतार पाने की दृष्टि, सोच, समझ, योग्यता व क्षमता आप में नहीं है। …….

     

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  • मेरे प्रिय मुख्यमंत्री : नृपेन दा

    P. K. Siddharth

    राष्ट्रीय अध्यक्ष, भारतीय सुराज दल
    www.pksiddharth.in
    www.suraajdal.org

    [themify_hr color=”red”]

    1981 में मेरी नियुक्ति भारतीय पुलिस सेवा में हुई. प्रशिक्षण के बाद मुझे त्रिपुरा काडर मिला जहां एक वामपंथी सरकार थी और उसके शीर्ष पर थे एक 78 वर्षीय मुख्यमंत्री श्री नृपेन चक्रवर्ती

    Late Nirpen Chakraborty

    मैंने सब डिविजनल पुलिस ऑफिसर के तौर पर अपना काम शुरू किया, लेकिन मुझे इस बात का जरा भी एहसास नहीं था कि मैं जिस मुख्यमंत्री के अधीन काम कर रहा था वह न केवल देश के बल्कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ राजनेताओं में से एक था, और सर्वश्रेष्ठ मुख्यमंत्रियों में से भी एक। मुझे भी इसका भी ज़रा भी भान नहीं था कि यह एक व्यक्ति मेरे जीवन को आकार देने में अप्रत्यक्ष रुप से एक बड़ी भूमिका अदा करेगा। मुझे राजनीति की कोई समझ नहीं थी, सिर्फ प्रशासकीय बुद्धि थी। मगर आने वाले दिनों में टुकड़ों-टुकड़ों में मैंने इस महान व्यक्तित्व से सीखना शुरू किया।

    त्रिपुरा एक छोटा-सा राज्य है, उस समय जिसकी जान-संख्या थी केवल 28 लाख। पश्चिम बंगाल के एक बड़-से जिले के बराबर था। अपने प्रशासकीय उत्साह में एक दिन मैंने अधीनस्थों को आदेश दिया कि एक सड़क के किनारे जो छोटी दुकानें और गुमटियां लगी थीं, उन्हें हटा दिया जाए। हुक्म तामील हुई। एक हफ्ते के बाद मुख्यमंत्री का कार्यक्रम मेरे क्षेत्र में था। जाहिर है कि मुझे उपस्थित रहना था, सो हुआ।  नृपेन दा ने मुझे बुलाया और हल्के से मेरे कंधे पर अपना हाथ रखा। केमोन आछेन?’,  उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने कहा, ‘भालो आछी। उन्होंने मुझसे पूछा कि मेरी मासिक तनख्वाह क्या थी। मैंने कहा 1200 रुपए। उन्होंने मुझसे पूछा कि क्या मुझे पता है कि जिन छोटी दुकानों को मैंने उजाड़ दिया, उन  दुकान चलाने वालों की मासिक आय क्या थी? मैं हतप्रभ हुआ! मैंने कहा, ‘नहीं

    नृपेंद्र दा ने मुझे धीमे स्वर में समझाया ताकि आस-पास के लोग सुन न पाएं। उन्होंने कहा, ‘आपने कानून लागू कर बड़ा अच्छा किया, लेकिन एक बात याद रखिएगा। हम इन्हें रोजगार नहीं दे सकते तो जो रोजगार वह अपने लिए स्वयं जुटा रहे हैं, क्या हमें उसे नष्ट कर देना चाहिए? यह प्रश्न पूछ कर वे आगे बढ़ गए। मैं पीछे ठिठक कर खड़ा रह गया। अगले कई दिनों तक नृपेन दा की बातों ने मेरी नींद में हलचल पैदा की, और तभी अंकुरित हुई मेरे ह्रदय में गरीब के लिए करुणा, जो तब तक मेरे धर्मग्रंथ भी मेरे अंदर अंकुरित नहीं कर पाए थे। मैंने उसके बाद के प्रशासकीय जीवन में दुकानें सिर्फ उन्हीं जगहों से हटवाईं जहाँ वे ट्रैफिक को गंभीर रूप से बाधित करती थीं। उन्हें भी वैकल्पिक व्यवस्था प्रदान करने की कोशिश की।

    मुख्यमंत्री जब मेरे क्षेत्र से गुजरते थे तो नियम के अनुसार मैं अपने अनुमंडल की सीमा पर पुलिस बल के साथ उनकी अगवाई करने के लिए खड़ा होता था। मैंने लक्ष्य करना शुरू किया कि मैं अपनी घड़ी उनके मूवमेंट के हिसाब से ठीक कर सकता थाक्योंकि वे कभी एक मिनट भी लेट नहीं होते थे। इस मामले में तो उन्होंने बिना एक शब्द कहे अपना संदेश सदा के लिए छोड़ दिया।

    जब मैं एस पी बना दो तो कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े पुलिस अधिकारी यूनियन के एक अनुशासहीन सब-इंस्पेक्टर को विभागीय कार्रवाई कर नौकरी से बर्खास्त कर दिया। परिणाम वही हुआ जो होता है। 8महीने में मेरा तबादला सीपीएम पार्टी के दबाव में नृपेन दा को करना पड़ा। उनका कद बहुत बड़ा था लेकिन वे पार्टी से बड़े नहीं थे। मेरे स्थानांतरण के पहले वे  मेरे जिले में आए, मुझे डिनर पर बुलाया, और दार्शनिक बातें कीं।  मुझे तब तक नहीं पता था कि वे इतने पढ़े-लिखे व्यक्ति थे। मुझे उस दिन समझ में नहीं आया दर्शनशास्त्र और राजनीति शास्त्र के प्रसंग वे क्यों उठा रहे थे। लेकिन जब स्थानांतरण का आदेश मेरे हाथ में दो-चार दिनों के बाद आया तब मेरी समझ में कुछ बात आई। राजनीति में रहने वाले एक महापुरुष को भी कभी-कभी समझौते करने पड़ते हैं। उनके लिए मेरा स्थानांतरण एक समझौता था। अपनी पार्टी के साथ।

    जब तक नृपेन दा मुख्यमंत्री रहे, उन्होंने एयर-कंडिशनर का प्रयोग नहीं किया। उनके चेंबर में एक सीलिंग फैन और एक पेडस्टल फैन रहा करते थे। जब मुख्यमंत्री ए सी का प्रयोग नहीं कर रहा हो तो मंत्री कैसे करतेचीफ सेक्रेटरी और डी जी पी कैसे करते? और जब चीफ सेक्रेटरी और डी जी पी नहीं लगाते तो कलेक्टर और एस पी  कैसे लगाते? कुछ ऐसी संस्कृति बनाकर रखी उन्होंने त्रिपुरा में। बाद में जब कांग्रेस की सरकार सत्ता में आई तब हर मंत्री और हर अधिकारी के चेंबर में एयर-कंडीशनर की बहारआई।

    एक बार पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री ज्योति बसु महोदय त्रिपुरा आए। उन्होंने इच्छा जाहिर की कि वे सर्किट हाउस में नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री- निवास में रुकेंगे। ऐसा ही हुआ। सुबह-सुबह ज्योति बसु महोदय बाथरूम में स्नान करने गए तो उन्होंने टॉवेल की मांग की। उन्हें टॉवेल की जगह गमछादिया गया – वही लाल गमछा जो आप मजदूर के कंधे पर पाते हैं। अब भला ज्योति बाबू उस गमछे से कैसे शरीर कैसे पोछते? ‘भद्र लोगथे! उन्होंने गमछा लेने से मना कर दिया!  तुरंत प्रशासन हरकत में आ गया, और गाड़ी सर्किट हाउस में भेज कर वहां से ज्योति बाबू के लिए टॉवल की व्यवस्था की गई। ऐसे सरल व्यक्ति से हमारे नृपेन दा!

    1978 से 1988 तक दस वर्षों तक लगातार त्रिपुरा के मुख्यमंत्री रहने के बाद एक दिन आया जब वही हुआ जो एक लोकतंत्र में होता है। जनता ने परिवर्तन की मांग की, और कांग्रेस सत्ता में आ गई। नृपेन दा मुख्यमंत्री नहीं रहे। जब इस अविवाहित मुख्य मंत्री ने अपना सरकारी निवास छोड़ा तो सरकारी गाड़ी में नहीं छोड़ा। एक रिक्शे पर दो संदुकें रखीं और सौ रूपए किराए वाले एक कमरे में चले गए। एक संदूक में उनके कपड़े थे और दूसरे संदूक में उनकी किताबें! उनके पास और कुछ नहीं था!

     

  • स्वर्ण भारत पार्टी प्रधानमंत्रीजी से राज्य वित्तपोषण द्वारा प्रति वोट के आधार पर चुनावों की फंडिंग का आग्रह करती है 

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    Sanjay Sonawani

    श्री संजय सोनवणी, अध्यक्ष स्वर्ण भारत पार्टी (भारत की एकमात्र लिबरल पार्टी), ने श्री मोदी के राज्य वित्तपोषण आधार पर चुनावों कीफंडिंग के प्रस्ताव का स्वागत किया। स्वर्ण भारत पार्टी (एस बी पी) के घोषणापत्र में पूर्ण विस्तार से राज्य वित्तपोषण आधार पर प्रति वोटसे चुनावों की फंडिंग के प्रस्ताव को – जोकि अच्छी शासन प्रणाली स्थापित करनें के लिए आवश्यक है – समझाया गया है ।

    यह समाज और देश के हित में है कि ईमानदार और सक्षम उम्मीदवार चुनावों में लड़नें के लिए आगे आएं। अच्छे और बेदाग उम्मीदवार जनताकी जायदाद हैं, किसी भी अन्य जनहित कल्याण से भी ज्यादा। हम देश के नागरिकों को ऐसी छवि के उम्मीदवारों को चुनावों में उतारनें केलिए प्रोत्साहित करने के प्रस्ताव का स्वागत करना चाहिए।

    जबकि चुनावों की सफलता केवल चुनावी खर्च पर निर्धारित नहीं होती, त्रासदी यह है कि आज की व्यवस्था में अच्छे और ईमानदार उम्मीदवारशुरू करनें से पहले ही वर्तमान प्रणाली द्वारा एक तरफ बैठा दिए जाते हैं। ईमानदार व शक्षम मध्य श्रेणी के उम्मीदवार या गरीब उम्मीदवारचुनाव लड़नें से पहले ही मना कर देतें हैं क्योंकि चुनाव को हारने पर, चुनाव लड़नें में लगी हुई ईमानदारी से कमाई हुई रकम का पूरा नुकसान होसकता है। हालाँकि पार्टियां ईमानदार उम्मीदवारों की फंडिंग कर सकती हैं, पर जो पार्टी अपना ज़मीर भ्रष्ट पूंजीपतियों को नहीं बेचती, ऐसीपार्टी को फंडिंग ही कहाँ मिलती है?

    राज्य वित्तपोषण आधार पर प्रति वोट चुनावों की फंडिंग एक सरल और पारदर्शी उपाय है। यह प्रस्ताव पारदर्शी और प्रोत्साहन-संगत है। उक्तव्यवस्था को सफलतापूर्वक कई देशों में कार्यान्वित किया है। स्वर्ण भारत पार्टी का सुझाव है की उम्मीदवार को प्रति मिली हुई वोट पर रु 20की भरपाई सरकार की ओर से करी जाये जिसकी अधिकतम सीमा रु 70 लाख तक प्रत्येक लोकसभा क्षेत्र तक सीमित हो। यह आकलनसुधारा जा सकता है।

    साथ ही चुनाव में उम्मीदवार की जमानत के लिए जमा धनराशि को प्रभावित रूप से बढाना होगा जिससे केवल गंभीर उम्मीदवार ही चुनाव मेंलडें। विधायकों और सांसदों की आय को प्रभावित रूप से बढ़ाना होगा तथा सभी भत्तों और पेंशन को पूरी तरह समाप्त करना होगा।

    कुछ लोग राज्य वित्तपोषण का विरोध यह तर्क देते हुए करतें हैं की राजनीति एक समाज सेवा का कार्य है।यह सुझाव देना – कि चुनावीप्रतिनिधियों को अपनी जीवन भर की कमाई को “देश की खातिर” कुर्बान कर देना चाहिए – बिलकुल बेतुकी बात है। मूलभूत रूप से वर्तमानव्यवस्था पथभ्रस्ट है, जिसके परिणाम के साक्षी हम सभी हैं। वर्तमान व्यवस्था में जो भी सत्ता के मुकाम तक पहुँच जाता है वह गारंटी के साथभ्रस्ट बन जाता है ।

    सुधरी हुई व्यवस्था में, जबकि भ्रष्ट उम्मीदवार शायद ईमानदार उम्मीदवारों से काफी ज्यादा पैसा चुनाव में खर्च करेंगी, तब भी ईमानदारउम्मीदवार चुनावों में लड़नें का साहस जुटा पाएंगे क्योंकि नई चुनाव व्यवस्था में उनके दिवालियापन का खतरा निश्चित ही प्रभावित रूप से घटजायेगा। व्यवस्था के सम्पूर्ण परिवर्तन के लिए यह शुरुआत सक्षम होगी। करदाताओं द्वारा दिए गए कर का प्रति वोट के लिए भुगतानकरदाताओं के लिए उत्कृष्ट मूल्य है क्योंकि भ्रस्टाचार और अयोग्यता के कारण देश पर लाखों करोड़ों का भार पड़ता है जोकि देश की जी डी पीका दस गुने से भी ज्यादा नुकसान करता है। पिछले 70 वर्षों से आम तौर पर भ्रष्ट और अयोग्य उम्मीदवारों द्वारा देश को धोखा दिया गया है।आइये, भारतवर्ष के ईमानदार लोगों को मौका दें।

    श्री सोनवणी ने कहा की एस बी पी दृढ़ रूप से श्री मोदी के राज्य वित्तपोषण के सुझाव का समर्थन करती है – परन्तु केवल प्रति मत के आधारपर फंडिंग के लिए। यहाँ यह ज़ोर देना जरूरी है कि केवल उक्त चुनाव के सुधार को स्थापित करना पर्याप्त नहीं होगा। एस बी पी केघोषणापत्र में विस्तार से प्रेषित सभी मूलभूत सुधारों को स्थापित करनें की आवश्यकता है, तभी देश पुनः सोने की चिड़िया बन सकता हैं।

  • सिनेमा हॉलों में राष्ट्रगान – ज़बरिया देशभक्ति

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

    [themify_hr color=”red”]

     

    उच्चतम न्यायालय ने नवंबर 2016 में यह आदेश जारी किया कि सभी सिनेमा हॉलों में ‘‘मातृभूमि के प्रति प्रेम की खातिर’’ हर फिल्म शो के पहले राष्ट्रगान बजाया जाए। इस आदेश से व्यक्तिगत स्वतंत्रता और कानूनी बाध्यताओं के परस्पर संबंधों पर बहस शुरू हो गई है। यह आदेश देश में बढ़ती असहिष्णुता की पृष्ठभूमि में आया है। विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या इस तरह की कानूनी बाध्यताओं से लोगों में राष्ट्रपे्रम जगाया जा सकता है। कुछ टिप्पणीकारों का कहना है कि यह आदेश नागरिक अधिकारों पर हमला है। कुछ दशकों पहले तक, सिनेमा हॉलों में फिल्म की समाप्ति के बाद राष्ट्रगान बजाया जाता था। उस समय यह देखा गया था कि राष्ट्रगान के समय लोग थियेटर से बाहर निकलने लगते थे। अब महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाने लगा है। सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ने यह निर्देश दिया है कि देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रगान बजाया जाए और इस दौरान थियेटर के दरवाजे बंद रखे जाएं।

    राष्ट्रीय ध्वज और अन्य राष्ट्रीय प्रतीकों के सम्मान की रक्षा की लिए देश में पहले से ही कई कानून लागू हैं। कुछ मामलों में कानूनों व नियमों और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के बीच टकराव के उदाहरण सामने आए हैं। केरल में जेहनोवास विटनेस नामक एक पंथ के विद्यार्थियों ने अपने स्कूल में यह कहकर राष्ट्रगान गाने से इंकार कर दिया था कि ऐसा करना मूर्ति पूजा होगी, जो कि उनकी धार्मिक आस्थाओं के अनुरूप नहीं है। इन विद्यार्थियों को स्कूल से निष्कासित कर दिया गया। मामला उच्चतम न्यायालय तक गया, जिसने विद्यार्थियों के पक्ष में फैसला दिया और उनका निष्कासन रद्द कर दिया गया।

    प्रजातंत्र में नागरिकों के अधिकारों और राज्य के प्रति उनके कर्तव्यों में संतुलन आवश्यक है। इसीलिए संविधान सभी नागरिकों को कुछ मूलाधिकार देता है और उन्हें अभिव्यक्ति की आज़ादी भी उपलब्ध करवाता है। एक दशक पहले, उच्चतम न्यायालय ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के पक्ष में अपना निर्णय दिया था। ऐसा लगता है कि अब गंगा उलटी बह रही है। बात-बात पर ‘‘राष्ट्रवाद, मातृभूमि के प्रति प्रेम और देशभक्ति’’ जैसे जुमलों को उछाला जा रहा है। जो लोग सत्ताधारी दल या सरकार की नीतियों से असहमत हैं, उन्हें राष्ट्रविरोधी बताया जा रहा है और यह कहा जा रहा है कि वे ‘‘देशभक्त’’ नहीं हैं। यहां तक कि एटीएम या बैंकों के बाहर अपने ही खातों से पैसा निकालने के लिए घंटों कतार में खड़े रहने का भी महिमामंडन किया जा रहा है। यह कहा जा रहा है कि यह देशभक्ति है और राष्ट्र की खातिर लोग लाईनों में घंटों खड़े हैं। ये कतारें मोदी सरकार द्वारा लिए गए नोटबंदी के निर्णय का परिणाम हैं और इन्हें देशभक्ति से जोड़ा जाना हास्यास्पद प्रतीत होता है। उच्चतम न्यायालय का यह आदेश एक ऐसे समय आया है जब देशभक्ति और राष्ट्रवाद जैसी अवधारणाओं का इस्तेमाल, असहमति और विरोध को दबाने के लिए किया जा रहा है।

    जबसे मोदी सरकार सत्ता में आई है, तभी से वह अपने विरोधियों की राष्ट्रभक्ति/राष्ट्रवाद पर प्रश्नचिन्ह लगा रही है। हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन की गतिविधियों को ‘राष्ट्रविरोधी’ बताया गया और तत्कालीन केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री के दबाव में विश्वविद्यालय के कुलपति ने रोहित वेम्युला को होस्टल से निकाल दिया और उसकी शिष्यवृत्ति बंद कर दी। इसके बाद, रोहित ने आत्महत्या कर ली। ऐसा ही कुछ दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में हुआ, जहां जेएनयू छात्रसंघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार और उनके साथियों को कटघरे में खड़ा करने के लिए एक नकली सीडी कुछ टेलिवीजन न्यूज़ चैनलों पर चलाई गई। कन्हैया कुमार को देशद्रोही करार दे दिया गया। बाद में यह सामने आया कि कन्हैया कुमार ने तथाकथित देशद्रोही नारे लगाए ही नहीं थे। वैसे भी, संवैधानिक स्थिति यह है कि केवल नारे लगाना देशद्रोह नहीं है।  देशभक्ति और राष्ट्रवाद के मुद्दों पर भड़काए जा रहे जुनून के नतीजे में गोवा में राष्ट्रगान के समय खड़े न होने पर एक ऐसे व्यक्ति की पिटाई कर दी गई जो व्हीलचेयर से उठ भी नहीं सकता था। मुंबई में एक युवा पटकथा लेखक को राष्ट्रगान के समय खड़े न होने पर सिनेमा हॉल से धक्के देकर बाहर निकाल दिया गया।

    राष्ट्रवाद के मुद्दे पर इस तरह की ज़ोर-जबरदस्ती, चिंता का विषय है। देशभक्ति क्या है और देशभक्त कौन है, इसे परिभाषित करना आसान नहीं है। जब देश में राजाओं और नवाबों का शासन था, उस समय वे अपने प्रजाजनों से यह अपेक्षा करते थे कि वे उनके प्रति पूरी तरह वफादार रहें। राजा के प्रति वफादार न रहने की सज़ा बहुत कड़ी थी जिसमें हाथ काट देने से लेकर मृत्युदंड तक शामिल था।

    ब्रिटिश राज में देश में दो तरह के राष्ट्रवाद एक साथ अस्तित्व में थे। एक ओर उद्योगपतियों, श्रमिकों और शिक्षित लोगों का उभरता हुआ वर्ग था, जो धर्मनिरपेक्ष-प्रजातांत्रिक भारत के निर्माण के लिए साम्राज्यवाद व औपनिवेशवाद के खिलाफ खड़ा था। सरकार की निगाह में ये लोग देशभक्त नहीं थे। धर्म के नाम पर राष्ट्रवाद की शुरूआत, राजाओं और ज़मींदारों ने की। वे अंग्रेज़ों के प्रति वफादार थे। ब्रिटिश साम्राज्य इन वर्गों को देशभक्त मानता था। उनकी संस्था यूनाईटेड इंडिया पेट्रिऑटिक एसोसिएशन, धार्मिक राष्ट्रवाद की जनक बनी। मुस्लिम राष्ट्रवादी और हिन्दू राष्ट्रवादी दोनों ब्रिटिश शासकों के प्रति वफादार थे और तत्कालीन सरकार की निगाहों में देशभक्त थे। ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध जो राष्ट्रवाद संघर्षरत था, वह व्यापक और समावेशी था और किसी एक जाति, धर्म या वर्ग तक सीमित नहीं था। मुस्लिम लीग और हिन्दू महासभा-आरएसएस का राष्ट्रवाद, धार्मिक पहचान के आसपास बुना गया था। इसके विपरीत, महात्मा गांधी के नेतृत्व वाला राष्ट्रवाद, प्रजातांत्रिक मूल्यों और धर्मनिरपेक्षता पर आधारित था और उदारवादी था। स्वाधीनता के बाद, सांप्रदायिक संगठनों ने राज्य के प्रति संपूर्ण निष्ठा को राष्ट्रवाद का पर्यायवाची मान लिया। जो भी लोग सरकार या राज्य से सहमत नहीं हैं, वे देशभक्त नहीं हैं। यह ठीक वही अवधारणा है जो राजाओं और नवाबों की थी। यह ठीक वही अवधारणा है जो दुनिया के सभी तानाशाहों की थी और है।

    संघ व भाजपा इस समय देश में जो वातावरण बना रहे हैं, उससे एकाधिकारवाद और तानाशाही की पदचाप सुनाई दे रही है। राजाओं-नवाबों के शासनकाल में शासक सर्वोच्च था और सभी प्रजाजन उसके अधीन थे। राजा के प्रति वफादारी ही देशभक्ति थी। तानाशाह भी जनता से अपने प्रति पूर्ण समर्पण और वफादारी चाहते हैं और इसे ही देशभक्ति बताते हैं। आरएसएस-भाजपा का यह मानना है कि राज्य सर्वोच्च है और नागरिकों को केवल उसके प्रति अपने कर्तव्यों का पालन करना चाहिए। ऐसा लगता है कि उच्चतम न्यायालय का यह आदेश, इसी तरह की मानसिकता की उपज है।

    इस तरह का अतिराष्ट्रवाद, प्रजातंत्र को तानाशाही में बदल सकता है। हमें उम्मीद है कि उच्चतम न्यायालय को इस तथ्य का अहसास होगा और वह अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करेगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • पाखण्डी जातिवाद

    भंवर मेघवंशी


    मुझे कुछ कहना है
    जाति विरोधी
    मगर घनघोर
    जातिवादी एक्टिविस्टों से !

    जातिवादी गटर के
    घृणित कीड़ों
    तुमसे यह भी
    ना हुआ बर्दाश्त
    कि कोई दलित
    पहन ले
    तुमसे अच्छे
    कपड़े
    रहे तुमसे
    बड़े मकान में .

    तुम साईकिलो के
    मारते रहो पैडल
    या घसीटते रहो
    पग पैदल पैदल
    और तुम्हारा ही
    साथी दलित
    बैठने लगे
    गाड़ियों में .

    भले ही तुम
    सामाजिक कार्यकर्ता की
    खाल ओढ़ चुके हो
    पर हो जातिवादी भेड़िये
    तुमसे यह कैसे
    सहन हो सकता है
    कि कोई दलित
    डालकर
    तुम्हारी आँखों में
    आँखें
    करने लगे
    तुमसे तीखे सवाल.

    तुम बातें न्याय की
    मंत्र समानता के
    दोहराते रहते हो
    भले ही मंचो पर
    लेकिन
    असल जिन्दगी में
    तुमने कब जिया
    इन शब्दों को ?

    सिखाये शब्द
    दोहराना
    उन्हें जीना
    नहीं होता
    उधार के तोतों .

    जब कोई दलित
    करने लगता है
    तुमसे बराबरी
    बढ़ जाता है
    तुमसे आगे .

    तब तुम्हारा
    सारा लोकतंत्र
    हवा हो जाता है
    सारी महानता
    का उतरने लगता है
    अचानक आवरण.

    तब जातिवाद के
    विषैले सांपों
    तुम्हारी केंचुली
    उतरने लगती है
    यकबयक.

    तुम कितने भी
    संगठन बना लो
    या कर लो
    विपश्यना के ढोंग
    सतसंगों में गा लो
    भजन मीठे मीठे
    तुम कितनी ही
    कर लो बातों से
    अपनी काया को
    कंचन
    पर तुम्हारे भीतर
    जातिवाद का कीडा
    रेंगता ही रहता है
    हरदम ,हरवक्त.

    तुम्हारी धमनियों में
    जातिवाद बहता है
    रक्त बनकर
    समाजसेवा के
    नाम पर
    अपना पेट भर रहे
    निर्लज्ज निकम्मे
    जातिवादी रोटेडों,
    तुम सब कुछ
    हो सकते हो
    पर कभी भी
    नहीं बन सकते
    इंसान.

    तुम्हारी
    रग रग में
    भरा है जातिवाद
    जिससे आती
    सड़ान्ध अब
    असह्य
    हो चुकी है.

    इसलिये हे
    सिविल सोसायटी के
    स्वयम्भूं
    नैतिक पवित्रों ,
    हे एक्टिविस्ट
    प्रजाति के
    परम पाखण्डियों ,
    आज से मैं
    खारिज करता हूं तुमको
    तुम भी कर देना
    खारिज मुझको.

    मैं पूरे होशो हवाश में
    यह करता हूं दावा
    कि तुमसे कुछ भी
    नहीं बदला
    ना ही कुछ बदलेगा
    हरी घास के
    ग्रीन स्नेंकों .

    हम जो आज
    वंचित है ,दलित है
    पीडि़त है
    हम वक्त के
    सपेरे है ..
    बजायेंगे बीन
    ढूंढ़ लेंगे तुमको
    एक न एक दिन
    और कुचल देंगे
    तुम्हारा फन
    पूरी निर्ममता से…
    जाति की गहन गुफाओं
    को लगा देंगे आग
    वर्ण और जाति के
    बिलों में भर देंगे पानी
    हवा को कर देंगे
    धुंआ धुंआ .

    पक्का यकीं है
    हमको ,कि
    हम हर कीमत पर
    हरा देंगे
    तुम्हारे इस
    घृणित जातिवाद को.