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  • एक कविता के दो ड्राफ्ट्स, और दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

    कुमार विक्रम


    ड्राफ्ट १

    मैं प्रार्थना करता हूँ
    मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
    और भी अमीर हो जाये

    मैं चाहता हूँ
    मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
    और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए

    मेरी दिली ख्वाईश है
    शहर की सबसे नामी तवायफ
    और भी नामी हो जाए

    मेरी तमन्ना है
    मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
    और भी बड़ा दलाल बन जाए

    मैं उस दिन को देखने के लिए मरा जा रहा हूँ
    जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
    और भी बड़ा शोषक बन जाएगा

    जबसे मुझे यह इल्म हुआ है
    कि जब मेरे शहर के सबसे बड़े
    अमीर, गैंगस्टर, तवायफ, दलाल और शोषक
    हो जाएंगे पहले से भी
    और अधिक नीच, कमीने
    घिनौने, सस्ते और दरिंदे
    तब मेरा शहर और शहर के बाशिंदे
    अन्य सभी शहरों पर
    और उनके शहरियों पर
    चला पाएंगे डंडे।

    ड्राफ्ट २

    मैं प्रार्थना करता हूँ
    मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
    और भी अमीर हो जाये
    ताकि इस शहर की गरीबी जाए

    मैं चाहता हूँ
    मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
    और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए
    ताकि शहर सुसंकृत हो जाए

    मेरी दिली ख्वाइश है
    शहर की सबसे नामी तवायफ
    और भी नामी हो जाए
    ताकि शहर की महिलाएं सभ्य रह पाएं

    मेरी तमन्ना है
    मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
    और भी बड़ा दलाल बन जाए
    ताकि शहर से हेरा-फेरी ख़त्म हो जाए

    मैं उस दिन के लिए मरा जा रहा हूँ
    जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
    और भी बड़ा शोषक बन जाए
    ताकि शोषितों को मुक्ति मिल जाए

    फिलहाल मैं कब्र में आराम फरमा रहा हूँ
    और जीने की फरमाइशें कर रहा हूँ.

    दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

    मेरे शहर का अमीर और भी अमीर हुआ जा रहा है
    और मैं उससे आती अमीरियत की खुशबु सूंघने को बेताब हुआ जा रहा हूँ

    मेरे शहर का गैंगस्टर खून की रंगीन होली खेल रहा है
    और मैं उसमे रंगने को मरा जा रहा हूँ

    मेरे शहर की तवायफ के साक्षात्कार मुख्यपृष्ठों पर आ रहे हैं
    और मैं उसके संग फोटो खिंचवाने को भीड़ में लथ-पथ हुआ जा रहा हूँ

    मेरे शहर का दलाल शहर बेचने की कवायद कर रहा है
    और मैं उसके साथ बिकने को बेचैन हो रहा हूँ

    मेरे शहर का शोषक खून चूसने के नए तरकीबें ईज़ाद कर रहा है
    और मैं दौर दौर कर अपने खून की बोतलें उस तक पहुंचा रहा हूँ

    मैं फिलहाल जीने की फरमाइशें पूरी कर रहा हूँ
    और समयाभाव में साथ साथ अपनी कब्र भी खोद रहा हूँ


    credits : http://epaper.jansatta.com/c/3447521 

  • खिड़की से झांकते ये वृक्ष, क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं? –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    खिड़की से झांकते ये वृक्ष
    क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं?

    उनकी ऊँचाइयों पे इठलाती
    अनगिनत कोपलों पर रचा आश्वासन
    एक दमकती हुई हरियाली लिए
    इन बेनूर सी आँखों में
    अकारण ही चमकने लगता है

    उनकी टहनियों पर झूमती
    पगली सी गिलहरियों का नृत्य
    उनकी अठखेलियों का ज्वार लिए
    इन जड़ हो चुके पैरों में
    अकारण ही मचलने लगता है

    उन पर पात-पात फुदकती
    बैचेन सी गौरैया का गीत
    अपने अंतर की वीणा लिए
    इन बद्ध हो चुके कानों में
    अकारण ही गूंजने लगता है

    क्या हर टहनी, हर पात और गौरैया में
    मेरे ही प्राणों के स्पंदन नहीं छिपे हैं?
    क्या मुझमे उनकी जिजीविषा
    और उनमे मेरे स्वप्न नहीं छिपे हैं?

    मेरी इन धमनियों में तड़पता उनका जीवन
    और उनकी ऊंचाइयों में आकाश छूते मेरे स्वप्न
    क्या सहोदर सहयात्री नहीं हैं?

    एक से उद्गम से चले
    एक से गन्तव्य की तरफ
    एक ही पाथेय लिए

    फिर हर बार हर मोड़ पर मैं
    उनमे खुद को और खुद में उनको खोजता हूँ
    उन्ही के गीतों और नृत्यों से ताल मिलाते हुए
    हर गीत में अपनी ही आवाज खोजते हुए
    हर नृत्य में अपनी ही छवि गढ़ते हुए

    और अंत मेंअपने ही नवांकुरों का स्वप्न लिए
    उनकी जड़ों में लिपटी मिट्टी तक लौटता हूँ

    उनमे विश्राम पाकर
    सारे गीत, नृत्य और स्वप्न
    उन्हें सौंप जाता हूँ …

     

  • आधे कार्यकाल की समाप्ति पर कहां खड़ी है मोदी सरकार?

    प्रो० राम पुनियानी


    Narendra Modi

    नवंबर 2016 में मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो गया। इस सरकार का आंकलन हम किस प्रकार करें? कुछ टिप्पणीकार यह मानते हैं कि मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें देश आशाभरी निगाहों से देख रहा है और जो साहसिक कदम उठाने की क्षमता और इच्छा रखते हैं। उन्हें देश को बदल डालने का जनादेश मिला है और वे उसे पूरा करेंगे। जहां कुछ लोगों की यह सोच है, वहीं देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, मोदी और उनकी सरकार को इस रूप में नहीं देखता। यह सरकार अच्छे दिन लाने और देश के सभी नागरिकों के बैंक खातों में 15-15 लाख रूपए जमा करने के वायदे पर सत्ता में आई थी। न तो अच्छे दिन आए और ना ही 15 लाख रूपए। उलटे, मंहगाई बेलगाम हो गई और ऊपर से सरकार ने नोटबंदी के जिन्न को बोतल से निकाल आमजनों को भारी मुसीबत में फंसा दिया। ऐसा बताया जाता है कि देश भर में कम से कम 100 लोग बैंकों के बाहर लाइनों में खड़े रहने के दौरान इस दुनिया से विदा हो गए। रोज़ खाने-कमाने वालों का भारी नुकसान हुआ। लाखों प्रवासी श्रमिक अपना रोज़गार खो जाने के कारण अपने-अपने घरों को वापस लौटने पर मजबूर हो गए।

    इस सरकार की एक विशेषता है हर प्रकार की शक्तियों का एक व्यक्ति के हाथों में केन्द्रीयकरण। और वह व्यक्ति कौन है, इसका अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के आसपास एक आभामंडल का निर्माण कर दिया गया है। कैबीनेट मात्र एक समिति बनकर रह गई है जो श्री मोदी के निर्णयों पर ठप्पा लगाती है। इसका एक उदाहरण है विमुद्रीकरण के निर्णय को कैबिनेट की स्वीकृति। देश की विदेश नीति में भारी बदलाव किए जाने का ज़ोरशोर से ढिंढोरा पीटा गया। पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया और श्री मोदी, दर्जनों विदेश यात्राओं पर गए। आज ढाई साल बाद भारत के पाकिस्तान और नेपाल से रिश्ते पहले की तुलना में खराब हैं और दुनिया में भारत के सम्मान में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है।

    शक्तियों के केन्द्रीयकरण के साथ शुरू हुआ भाजपा और उसके साथी संघ परिवार के नेताओं के नफरत फैलाने वाले भाषणों का दौर। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों को खौफज़दा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। एक कैबीनेट मंत्री ने उन लोगों को हरामज़ादा बताया जो सरकार के साथ नहीं हैं। सरकार, विश्वविद्यालयों के कामकाज में हस्तक्षेप करने लगी। अयोग्य व्यक्तियों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों का मुखिया नियुक्त किया जाने लगा। इसका एक उदाहरण था गजेन्द्र चैहान की भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति। विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की गई जिनकी एकमात्र योग्यता संघ की विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। विश्वविद्यालयों में अभाविप की सक्रियता अचानक बढ़ गई और उसने सभी विश्वविद्यालयों, विशेषकर जेएनयू और हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, में प्रजातांत्रिक ढंग से चुने गए छात्रसंघों और अन्य संगठनों को दबाने का प्रयास शुरू कर दिया। जेएनयू में एक नकली सीडी के आधार पर कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया और रोहित वेम्युला को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया।

    संघ और उसके साथी संगठनों ने लव जिहाद और घर वापसी के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध अभियान छेड़ दिया। समाज को और विभाजित करने के लिए उन्होंने गोमांस और गाय को मुद्दा बनाया, जिसके नतीजे में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और गुजरात के ऊना में दलितों के साथ अमानवीय मारपीट की गई। अंधश्रद्धा के पैरोकार, केन्द्र में अपनी सरकार होने के कारण आश्वस्त थे कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। दाभोलकर की हत्या के बाद गोविंद पंसारे और एमएम कलबुर्गी की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। इन सब घटनाओं और देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कई प्रतिष्ठित कलाकारों, वैज्ञानिकों और अन्यों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए। शीर्ष स्तर पर एकाधिकारवादी व्यवहार और सामाजिक स्तर पर संघ परिवार के साथियों की कारगुज़ारियों के कारण स्थिति यहां तक बिगड़ गई कि एक समय भाजपा के साथी रहे अरूण शौरी ने वर्तमान स्थिति को ‘विकेन्द्रीकृत आपातकाल’ और ‘माफिया राज्य’ बताया।

    सरकार ने किसानों से उनकी ज़मीनें छीनने का प्रयास भी किया परंतु लोगो के कड़े विरोध के कारण यह सफल न हो सका। श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया और कुटीर व लघु उद्योगों के संरक्षण के लिए बनाए गए प्रावधान हटा दिए गए। बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति और उनकी ताकत में आशातीत वृद्धि हुई। बैंकों ने उद्योगपतियों के हज़ारों करोड़ रूपए के ऋण माफ कर दिए और विजय माल्या जैसे कुछ उद्योगपति, जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हज़ारों करोड़ रूपयों का ऋण था, विदेश भाग गए। कई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की गई परंतु ऐसा नहीं लगता कि इनसे आम लोगों, गरीब किसानों या श्रमिकों का सशक्तिकरण हुआ हो। विरोध और असहमति को कुचलने की अपनी नीति के अनुरूप, उन एनजीओ को सरकार ने परेशान करना शुरू कर दिया जो अल्पसंख्यक अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए काम कर रहे थे। उनके विदेशों से धन प्राप्त करने के अधिकार पर रोक लगा दी गई।

    अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारे प्रजातंत्र का एक प्रमुख हिस्सा रही है। परंतु आज हालात यह बन गए हैं कि जो भी सरकार के विरूद्ध कुछ कहता है, उसे देशद्रोही बता दिया जाता है। भारत माता की जय के नारों और सिनेमाघरों में जनगणमन बजाकर छद्म देशभक्ति को बढ़ाया दिया जा रहा है।

    मोदी की हिन्दुत्ववादी राजनीति के चलते, देश भर में अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ छुटपुट हिंसा में वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार मिटाने के लंबेचौड़े वायदे तो किए गए परंतु नोटबंदी ने भ्रष्टाचार के नए तरीकों का विकास करने में मदद की। देश का ज्यादातर काला धन या तो विदेशी बैंकों में जमा है या अचल संपत्ति व कीमती धातुओं के गहनों के रूप में है। जो थोड़ा-बहुत नगदी काला धन था, भी वह भी नोटबंदी से बाहर नहीं आ सका।

    शासक दल और उसके साथी संगठन जो भी कहें, आज आमजन दुःखी और परेशान हैं। कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता विश्वविद्यालयों के छात्रों के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं तो जिग्नेश मेवानी, दलितों के गुस्से को स्वर दे रहे हैं। ये प्रजातांत्रिक विरोध ही अब आशा की एकमात्र किरण हैं। यह भी संतोष का विषय है कि विभिन्न राजनैतिक दल, प्रजातंत्र को बचाने के लिए एक होने की कवायद कर रहे हैं। हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक व्यापक गठबंधन आकार लेगा।


    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • भारतीय समाज में इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    यूरोपीय और अमरीकी विश्वविद्यालयों (सभी नहीं) में और विशेष रूप से वहां के समाज में एक ख़ास प्रवृत्ति है। वहां छात्र छात्राएं गणित के साथ मनोविज्ञान या साहित्य भी पढ़ सकते हैं। आर्ट्स, साइंस, मेडिसिन, ह्यूमेनिटीज, मैनेजमेंट आदि के बीच कोई जाति व्यवस्था नहीं है। उनमें मेलजोल और "अंतर्जातीय विवाह" जैसे "अवैध" संबन्ध तेजी से बनते हैं। भारत के लिए ये 'अवैध' संबन्ध हैं जिनसे " नीच वर्ण संकर" जन्मते हैं। विभिन्न विषयों के मेलजोल को यूरोप में "इंटेरडीसीप्लिनरिटी" कहते हैं और इन से जन्मे वर्णसंकर को "इनोवेशन" कहते हैं। लेकिन भारत में ये सब पाप है। इसीलिये भारत सड़ रहा है।

    यूरोपीय समाज में जीवन यापन के लिए जितना जरूरी है उतना सीखने के बाद भी उनकी सीखने की क्षमता पर विराम नहीं आता। वे बचपन से बुढ़ापे तक सीखते ही जाते है। 'स्वामी' विवेकानन्द जब यूरोप प्रवास पर थे तब उन्होंने एक बूढ़े जर्मन को चाइनीज भाषा सीखने की कोशिश करते पाया था, विवेकानन्द ने एक आम भारतीय की तरह पूछा कि इस कठिन भाषा को आप कितने वर्षों में सीखकर क्या लाभ ले सकेंगे? उस बूढ़े व्यक्ति ने विवेकानन्द को देखकर कहा था कि अगर तुम एक युवा होकर भी ऐसे सवाल पूछते हो तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि तुम्हारा मुल्क और समाज अन्धकार में सड़ रहा होगा।

    उस व्यक्ति की बात कितनी सही है न? विवेकानन्द जैसे 'शरीर से युवा' भारतीय व्यक्ति भी मन से कितने बूढ़े हो सकते हैं, वे सच में भारत के सच्चे प्रतिनिधि थे। भारत की सारी समस्याएं उनके व्यक्तिगत रुझानों और मनोविज्ञान सहित उनके प्रश्न-उत्तरों में साफ़ झलकती हैं।

    खैर, तो यूरोपीय समाज में आजीविका से परे भी ज्ञान की खोज चलती है। लेकिन "धर्म अर्थ काम मोक्ष" की दिव्य युति का दावा करने वाला भारतीय समाज शिक्षा, पठन-पाठन और स्वस्थ बहसों पर हजारों साल से ताला लगाकर बैठा है। 'अर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन' सिर्फ समाज के एयरटाइट कम्पार्टमेंट्स में अलग अलग लेयर्स ने ही होते हैं और इन कम्पार्टमेंट्स और लेयर्स में आपस में कोई संवाद नहीं होता। इसीलिये एक गांव या राज्य के गुलाम बना लिए जाने पर भी "कलेक्टिव आर्ग्युमेंट" से किसी "एक" राजनितिक धार्मिक या सामरिक एकता का जन्म न हो सका और भारत दो हजार साल तक गुलाम रहा।

    भारतीय समाज के स्तरों में संवादहीनता आज भी इतनी भयानक है कि एक ही गाँव में एक हैंडपंप या तालाब के सूखने पर सभी ग्रामीणों को एक सा दुःख नहीं होता, कई लोग खुश भी हो सकते हैं। एक ही तालाब पर सबका एक सा अधिकार नहीं है तो एक सी चिंताएं भी क्योंकर होंगी भला? क्या ये सभ्य समाज के लक्षण हैं? क्या भारत सभ्य है?

    एक औसत भारतीय ज्ञान से और स्वाध्याय से या अपने सुरक्षित गढ़ से परे जाकर संवाद बनाने से इतना चिढ़ता क्यों है? आजीविका सुरक्षित कर लेने के बाद पड़ता लिखता क्यों नहीं? साइंस का छात्र दर्शन, साहित्य या इतिहास पढता क्यों नहीं?

    इसका गहरे से गहरा कारण है कि लंबे समय तक भारतीय मन परम्परागत आजीविका या पेशे से इतना अधिक बंधा हुआ है कि उस सुरक्षा से परे उसे कभी कुछ देखना ही जरूरी नहीं रहा है। वह परे का कुछ देख न सके इसके लिए धर्म और परम्परा ने भारी इंतेजाम किये हैं। आज पश्चिम के प्रभाव से स्थिति थोड़ी बदली है लेकिन भारत के धर्म और उससे जन्मे मनोविज्ञान का सातत्य बहुत अर्थो में अभी भी बना हुआ है। अतीत में एक कुम्हार, लोहार या किसान से यही अपेक्षा की गयी है कि वह अपने हुनर में पारंगत हो और भेषज, साहित्य, दर्शन, राजनीती, धर्म के आयामों में प्रवेश न करे। यही उम्मीद उनसे की गयी है जो धर्म दर्शन राजनीति आदि का "रोजगार" करते आये हैं।

    इस तरह इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है। इसी वजह से भारतीय धर्मशास्त्री भौतिक या प्राकृतिक विज्ञान से इतने बेखबर होते हैं कि वे पूजा पाठ से ग्रह नक्षत्रों की दिशा बदलने के दावों की बेवकूफी को देख ही नहीं पाते। यही बिमारी फिर पूरे समाज में फ़ैल जाती है। अब ये समाज सड़कर गुलाम हो जाये तो आश्चर्य कैसा?

    यूरोप या अमेरिका में ज्ञान के बढ़ने का राज़ क्या है?और भारत में ज्ञान, सभ्यता और संस्कृति के रसातल में पहुंचते जाने का राज़ क्या है? एक ही सूत्र है इसे समझने का, यूरोप में व्यक्तियों और ज्ञान के विषयों में संश्लेषण होता रहता है वहां विषयों और व्यक्तियों में अंतर्जातीय विवाह होते रहे हैं जो भारत में असंभव है। यूरोप में भूगोल पढ़ने वाला व्यक्ति दर्शन भी पढ़ सकता है। गणित या साहित्य के साथ मनोविज्ञान या संगीत भी पढ़ सकता है। लेकिन भारत में ये "शादी नहीं हो सकती" यहां साइंस ब्राह्मण है और आर्ट्स शुद्र है।

    अभी अमेरिका के MIT ने विज्ञान के छात्रों के प्रवेश के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि उनके पास मानविकी विषय के किसी प्रोफेसर का अनुशंसा पत्र होना आवश्यक है। मतलब कि क्वांटम मेकेनिक्स या इंजीनियरिंग के शोधार्थी को इतिहास, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, साहित्य आदि में से किसी एक विषय के विद्वान की तरफ से रिकमेंड किया जाना जरूरी है।

    कल्पना कीजिये कि भौतिकशास्त्र का जानकार यदि मनोविज्ञान भी समझता है तो उसकी खोज इंसानी समाज के लिए कितनी व्यवहारिक न होगी? वो जो मशीन या तकनीक बनायेगा उसमे इंसानी जरूरतों के उत्तर भी मिल सकेंगे। लेकिन भारतीय ज्ञान परम्परा की सुनें तो इस भौतिशास्त्री को इतिहास, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को छूना भी पाप है। वो इधर झांकेगा भी नहीं। इसीलिये भारत इनोवेशन नहीं करता सिर्फ यूरोपीय विज्ञानं का सबसे सस्ता भारतीय वर्जन बनाता है। ये खुद रॉकेट नहीं बना सकते लेकिन एक बार यूरोप में रॉकेट बन जाये तो ये सबसे सस्ता मंगल यान बनाकर खड़े हो जाएंगे और वेदों में से पुष्पक विमान लाकर बहस करने लगेंगे। लेकिन इससे इनकी मौलिक बिमारी का कोई इलाज नहीं होता, बल्कि वो बीमारी बढ़ती ही जाती है।

    इसीलिये अब "विश्वगुरु" को ईमानदारी से विश्व का शिष्य बनकर कुछ सीखना चाहिए। अब भारतीय बच्चों को समाज की ही नहीं बल्कि सिलेबस की और विषयों की जाति व्यवस्था को भी तोड़ना होगा।

    समाज में ही नहीं बल्कि ज्ञान विज्ञानं के विषयो में भी वर्णसंकर पैदा करने होंगे। विज्ञानं ने सिध्द कर दिया है कि वर्णसंकर अधिक प्रतिभाशाली और प्रबल होते हैं। लेकिन सनातनी भारतीय धर्म बुद्धि प्रतिभा की हत्यारी रही है। इस हत्यारी व्यवस्था को विराम लगाना होगा ताकि भारतीय विद्यार्थी भी सभ्य सुसंस्कृत होकर ज्ञान विज्ञान और खेल कूद की दुनिया में अपने को साबित कर सकें, ताकि सवा अरब का ये मुल्क दो चार नोबेल, ऑस्कर और ओलंपिक जीत सके और बार बार काल्पनिक सतयुग के बिल में घुसने की बजाय कलियुग में सम्मान से जीना सीख सके।

     

  • उस गुनाह की माफ़ी जो किया ही नहीं

    डा० नीलम महेंद्र

    [themify_hr color=”red”]

    दंगल फ़िल्म में गीता फोगट का किरदार निभाने वाली जायरा वसीम द्वारा सोशल मीडिया पर माफी माँगने की खबर पूरे देश ने पढ़ी और सुनी। आम आदमी से लेकर क्रिकेट और कला जगत, हर क्षेत्र से उसके समर्थन में देश आगे आया लेकिन सरकार की ओर से किसी ठोस कदम का इंतजार केवल जायरा ही नहीं पूरे देश को है।

    याद कीजिए अपने जवानी के दिन! सोलह साल की उम्र, कालेज के वो दिन, जवानी का जोश, आँखों में भविष्य के अनगिनत सपने, कुछ कर गुजरने का जज्बा,और कुछ ऐसा विश्वास कि हम तो वो हैं जो दुनिया को बदल सकते हैं। उम्र का वो दौर जब कुछ यूँ महसूस होता था कि पूरा जहाँ ही हमारा है, काश हमारे पंख होते लेकिन फिर भी बिना पंख के ही उड़ लेते थे।

    लेकिन जरा सोचिए क्या बीती होगी उस बच्ची पर जिसके पंख उड़ने से पहले ही काट दिए गए?
    क्या हुआ होगा उसके उस विश्वास का जब उसका आसमां ही उससे छीन लिया गया हो?
    कैसे ज़ार ज़ार रोया होगा उसका दिल जब दुनिया को बदलने का जज्बा रखने वाली उम्र में उसने दुनिया से उस गुनाह की  माफी मांगी होगी जो उसने किया ही नहीं?
    क्या हम एक आजाद देश में रहते हैं? क्या इसी को लोकतंत्र कहते हैं? क्या हमारे देश में जनता द्वारा चुनी हुई सरकारों की कानून व्यवस्था पर पकड़ है?
    मुठ्ठी भर असामाजिक तत्व अराजकता भय एवं असुरक्षा का माहौल कैसे फैला लेते हैं?
    कब तक ‘आजादी’ के नाम पर आजादी का ही गला घोंटा जाएगा?
    कब तक धर्म के नाम पर लड़कियों के साथ भेदभाव होता रहेगा?

    कैसी विडम्बना है कि पर्दे पर एक ऐसी लड़की जो किसी सूरत में लड़कों से कम नहीं है, का किरदार जीवंत करने वाली जायरा आज बेबसी और लाचारी  का प्रतीक बन गईं हैं। वो लड़की जिसने 10 वीं की परीक्षा में 92% मार्क्स प्राप्त किए हों उसके द्वारा इस प्रकार माफी माँगना  उसके लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए शर्मनाक है। और जिस ‘आज़ादी की लड़ाई ‘ के हिमायती इस्लाम के नाम पर उससे माफी मंगवा रहे हैं, न सिर्फ वे बल्कि उनका समर्थन करने वाले भी सोचें कि उनकी इस कायराना हरकत से  ‘इस्लाम’ या फिर उनकी ‘लड़ाई’ दोनों ही किसी ‘बड़प्पन’ के नहीं केवल ‘कट्टरता’  का प्रतीक बनते जा रहे हैं।

    यह उनकी कायरता की ही भावना है कि बुरहान वाणी की जगह जब आज भारतीय सिविल सेवा को टाप करने वाले आईएस अधिकारी शाह फैजल या फिर भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल परवेज रसूल और अब जायरा अगर देश की मुख्यधारा में शामिल होकर  कश्मीरी युवाओं के रोल माडल बन  जाएंगे तो उनके हाथों से कहीं पत्थर और बन्दूकें  छूट न जांए। नहीं तो क्या वजह है कि कथित आज़ादी की मांग करने वाले महिलाओं के संगठन दुख्तरन ए मिल्लत की महिलाओं के लिए कोई पाबंदी या फतवे नहीं हैं लेकिन वहीं की महिलाएं अगर ‘प्रगाश’ नाम का एक म्यूजिकल बैंड बनाती हैं तो उन्हें इसी आजादी और इस्लाम के नाम पर उसे बन्द करना पड़ता है? क्यों मलाला यूसुफजई और तस्लीमा नसरीन  जैसी महिलाओं को इस्लाम के नाम पर  विरोध का सामना करना पड़ता है?

    आज जरूरत इस बात की है कि पढ़े लिखे और सभ्य मुसलमान इस बात को समझें कि कुछ मुठ्ठी भर लोगों के सनकीपन से पूरी कौम बदनाम हो रही है और वे सभी एक होकर इन असामाजिक तत्वों का विरोध करें। ऐसा कौन सा धर्म है जो किसी रचनात्मकता का विरोध करना सिखाए ? वो समाज कैसे आगे बढ़ सकता है जिसमें महिलाओं को अपनी आजादी के लिए संघर्ष करना पड़े? किस मुँह से हम स्वयं को सभ्य और मानव भी कहते हैं?

    आज जायरा, इससे पहले शमी की पत्नी ! जो लोग खुद सामने आए बिना सोशल मीडिया जैसे उदार माध्यम का दुरुपयोग ‘मज़लूम कौशर’ नाम का पेज बनाकर कट्टरता फैलाने का काम कर रहे हैं उन्हें इसका माकूल जवाब उसी माध्यम से जनता तो दे ही चुकी है लेकिन यह जवाब असरदार तभी होगा जब इस पर एक ठोस सरकारी मुहर भी लगे जिससे सरकार, कानून और प्रशासन नाम की कोई चीज़ है इसका अहसास न सिर्फ जायरा और पूरे देश को हो बल्कि इनकी ताकत का अंदाजा अलगाववादियों को भी हो।

    यह समझ से परे है कि क्यों वहाँ की सरकार न तो अपनी आवाम को उनकी सुरक्षा का एहसास करा पा रही है और न ही अलगाववादियों को भय का। क्यों एक तरफ कश्मीर का आम आदमी डर के साए में जीने को मजबूर है तो दूसरी तरफ इन कट्टरपंथियों के हौसले इतने बुलंद हैं?

  • सबको सम्मति दे भगवान

    डा० नीलम महेंद्र

    [themify_hr color=”red”]

    यह सही है कि लफ्जों में इतनी ताकत होती है कि किसी पुरानी डायरी के पन्नों पर कुछ समय पहले चली हुई कलम आज कोई तूफान लाने की क्षमता रखती है लेकिन किसी डायरी के खाली पन्ने भी आँधियाँ ला सकते हैं ऐसा शायद पहली बार हो रहा है। खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के 2017 के वो कैलेंडर और डायरी आज देश भर में चर्चा में हैं जिनके बारे में तो अधिकतर भारतीयों को शायद इससे पहले पता भी न हो। कारण है गाँधी जी की जगह मोदी की तस्वीर।

    पूरा देश गाँधी प्रेम में उबल रहा है कि गाँधी की जगह कोई नहीं ले सकता,केवल चरखे के पीछे बैठकर फोटो खिंचाने से कोई गाँधी नहीं बन सकता आदि आदि। सही भी है आखिर गाँधी जी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और पूरा देश उनसे बहुत प्यार करता है और उनकी इज्जत करता है।
    लेकिन गाँधी जी को सही मायनों में हममें से कितनों ने समझा है?

    गाँधी जी कहते थे कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है। आज जो लोग गाँधी जी के नाम को रो रहे हैं इनमें से कितनों ने अपने भय या असुरक्षा की भावना पर विजय हासिल की है? यह असुरक्षा की भावना नहीं तो क्या है कि एक तरफ आप चिल्ला रहे हैं कि गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता और दूसरी तरफ इसे बेमतलब मुद्दा भी बना रहे हैं! क्योंकि आप केवल इन शब्दों को ‘कह’ रहे हैं, इनके सहारे जनमानस को बहकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। अगर आप अपने कहे शब्दों को ‘समझते’ तो इस बात को मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि यह तो अटल सत्य है ही कि गाँधी जी की जगह कोई नहीं ले सकता।

    गाँधी जी ही हमारे गाँधी हैं और रहेंगे । लेकिन जो असली भावना आपको डरा रही है वो यह है कि आप ही की गलतियों के कारण आज मोदी भी उस मुकाम पर पँहुच गए हैं कि कोई उनकी जगह भी नहीं ले सकता।विपक्ष तो क्या सरकार या फिर खुद उनकी ही पार्टी में भी उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है कम से कम आज तो नहीं। गाँधी जी को आज जो रो रहे हैं और कह रहे हैं कि गाँधी को खादी से और खादी को गाँधी से कोई अलग नहीं कर सकता उन्होंने इतने साल गाँधी के लिए या फिर खादी के लिए क्या किया।

    दरअसल वो गाँधी को नहीं उस नाम को रो रहे हैं जिस नाम को उन्होंने अपने कापी राइट से अधिक कभी कुछ नहीं समझा। इतने सालों गाँधी जी के लिए कुछ किया गया तो यह कि देश भर में लगभग 64 सरकारी स्कीमें उनके नाम पर खोली गईं , 24 खेलों के टूर्नामेंट और ट्रोफी उनके नाम पर रखे गये,15 स्कालरशिप उनके नाम पर दी गई,19 स्टेडियम उनके नाम पर खोले गए,39 अस्पतालों का नाम उनके नाम पर रखा गया,74 बिल्डिंग और सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे गए,5 एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा गया आदि आदि लिस्ट बहुत लम्बी है। इसके अलावा 2 अक्तूबर को बापू की समाधि पर फूल चढ़ाकर उनके प्रिय भजनों का आयोजन और दूरदर्शन पर ‘गाँधी’ फ़िल्म का प्रसारण। बस कर लिया बापू को याद!

    क्या यहीं तक सीमित है हमारा ‘बापू प्रेम ‘?
    हमारे राष्ट्र पिता के प्रति इतनी ही है हमारी भक्ति ?
    यही सच्ची श्रद्धा है जिसके हकदार हैं हमारे बापू ?

    तो फिर वो क्या है जब देश का प्रधानमंत्री जिसके नाम के साथ गाँधी तो नहीं लगा लेकिन आजादी के 70 साल बाद जब देश की बागडोर अपने हाथों में लेता है तो गाँधी जी के सपने को यथार्थ में बदलने के उद्देश्य से ‘स्वच्छ भारत ‘ अभियान की शुरुआत करता है और उसका प्रतीक चिह्न गाँधी जी के चश्मे को रखता है?

    वो क्या है जब यही प्रधानमंत्री गाँधी जी की 150 वीं जयन्ति के अवसर पर 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का बीड़ा उठाता है? यहाँ इस प्रश्न पर तो बात ही नहीं की जा रही कि इतने सालों जिस ‘गाँधीवादी’ पार्टी का शासन था उसने इस दिशा में क्या कदम उठाए या फिर आजादी के इतने सालों बाद भी किसी  प्रधानमंत्री को इस मूलभूत स्तर पर काम क्यों करना पड़ रहा है।

    वो क्या है जब प्रधानमंत्री ‘मन की बात ‘ में देशवासियों से ‘गाँधी की खादी’ अपनाने का आह्वान करते हैं तो खादी की बिक्री में 125% की बढोत्तरी दर्ज होती है (इंडिया टुडे की रिपोर्ट) ।

    वो क्या है जब मोदी नारा देते हैं  “खादी फार नेशन , खादी फार फैशन ” ?

    वो क्या है जब प्रधानमंत्री खादी के उन्नयन के लिए पंजाब में 500 महिलाओं को चरखा बाँटने वाले आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं?

    गाँधी जी अपने बाथरूम की सफाई खुद ही करते थे तो आज जो गाँधी के नाम पर विलाप कर रहे हैं उनमें से कितने उनका अनुसरण करते हैं?
    और वो क्या है जब इस देश का प्रधानमंत्री उनका अनुसरण करते हुए न सिर्फ खुद हाथ में झाड़ू पकड़ कर सफाई अभियान की शुरुआत करते हैं बल्कि पूरे देश को प्रेरित करते हैं?

    लेकिन यह अजीब सी बात है कि जब प्रधानमंत्री के हाथों में झाड़ू होता है तो कोई सवाल नहीं करता लेकिन उन्हीं हाथों में चरखा आ जाता है तो मुद्दा बन जाता है?

    आपको इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता कि खादी की बिक्री जो कि कांग्रेस के शासन काल के 50 सालों में 2 से 7% थी   पिछले दो वर्षों में बढ़कर 34% तक पहुँच गई। आपको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले भी 6 बार जब बापू इस कैलेंडर में नहीं थे वो भी आप ही के शासन काल में 1996,2002,2005,2011,2012,2013, में तब आपने इसे मुद्दा नहीं बनाया था तो आपके लिए गाँधी जी की ही प्रिय प्रार्थना ‘आप सबको सम्मति दे भगवान ‘।

    गाँधी जी केवल चरखा और खादी तक सीमित नहीं हैं वो एक विचारधारा हैं जीवन जीने की शैली हैं नैतिकता सच्चाई दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के साथ साथ अहिंसा के प्रतीक हैं। वे व्यक्ति नहीं अपने आप में एक संस्था हैं। इससे बड़ी बात क्या होगी कि वे केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाते हैं। जब भारत के गाँधी पर अमेरिका के जान ब्रिले  फिल्म लिखते हैं और रिचर्ड एटनबोरो निर्देशित करते हैं तो वे गाँधी को हमसे छीनते नहीं हैं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को उनके व्यक्तित्व एवं विचारधारा से अवगत कराते हैं, उनकी सीमाएं भारत को लाँघ जाती हैं। तो जो लोग आज कैलेंडर की तस्वीर पर बवाल मचा रहे हैं वे अपनी असुरक्षा की भावना से बाहर निकल कर समझें कि गाँधी जी इतने छोटे नहीं कि किसी तस्वीर के पीछे छिपाए जांए ।

  • चुनाव प्रक्रिया एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है

    प्रो० राम पुनियानी
    IIT Bombay (Rtd)

    पिछले कुछ दशकों में धर्मनिरपेक्षता शब्द को बदनाम करने और उसके अर्थ को तोड़ने-मरोड़ने के कई प्रयास हुए हैं। भारत के संदर्भ में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ है सभी धर्मों का बराबर सम्मान और इस सिद्धांत का कड़ाई से अनुपालन कि राज्य की नीतियां किसी धर्म से प्रभावित या निर्देशित नहीं होंगी। यही भारतीय संविधान का मूल स्वर भी है। शासक राजनीतिक दलों द्वारा धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों की गलत विवेचना के कारण साम्प्रदायिक तत्वों को धर्मनिरपेक्षता पर ही प्रश्नचिन्ह लगाने का बहाना मिल गया है।

    इस पृष्ठभूमि में, उच्चतम न्यायालय की सात सदस्यीय पीठ का यह निर्णय स्वागतयोग्य व राहत पहुंचाने वाला है कि ‘‘चुनाव प्रक्रिया एक धर्मनिरपेक्ष गतिविधि है’’। इस निर्णय से उन सभी लोगों को प्रसन्नता हुई है जो बहुवाद में निहित न्याय के मूल्यों के हामी हैं। उच्चतम न्यायालय ने कहा है कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और किसी भी धर्मनिरपेक्ष राज्य में चुनावी प्रक्रिया के दौरान धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों की अवहेलना और उनका उल्लंघन नहीं होना चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनैतिक उद्देश्यों के लिए धर्म का दुरूपयोग, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 123 के अधीन भ्रष्ट आचरण है। न्यायालय ने यह भी कहा कि चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता और शुद्धता के संरक्षण की ज़िम्मेदारी केवल चुनाव लड़ रहे उम्मीदवार की नहीं है। उसके एजेंटों का आचरण और उसका चुनावी घोषणापत्र भी धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के अनुरूप होना चाहिए।

    निर्णय में यह भी कहा गया है कि चुने हुए जनप्रतिनिधि की सोच और आचरण दोनों धर्मनिरपेक्ष होने चाहिए और यह भी कि धार्मिक अल्पसंख्यकों के हित में सकारात्मक कार्यवाही, धर्मनिरपेक्ष आचरण का हिस्सा है। यह निर्णय न्याय के उन मूल्यों के अनुरूप भी है जो धर्मनिरपेक्ष प्रजातंत्र की नींव होते हैं। इस निर्णय ने भारतीय संविधान के निर्माताओं द्वारा प्रतिपादित धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों को मानो नवजीवन दिया है।

    इस निर्णय का कई राजनीतिक दलों ने स्वागत किया है और इनमें वे दल भी शामिल हैं जो धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाते आए हैं और जिन्होंने धार्मिक पहचान का इस्तेमाल अपनी ताकत में वृद्धि के लिए किया है। इस निर्णय ने हमें वह रास्ता दिखाया है, जिस पर बहुवादी भारत को चलना चाहिए-एक ऐसे भारत को जिसमें सभी की गरिमा और अधिकारों की रक्षा हो सके। इसके साथ ही, इस निर्णय को लागू करने में आने वाली चुनौतियों का आंकलन करना भी ज़रूरी है।

    यह निर्णय उन हस्तक्षेपकर्ताओं के प्रयासों से आया है जो उच्चतम न्यायालय से यह मांग कर रहे थे कि वह 1995 के अपने कुख्यात ‘हिन्दुत्व निर्णय’ पर पुनर्विचार करे। इस निर्णय में यह कहा गया था कि हिन्दू धर्म व हिन्दुत्व इतना विविधवर्णी है कि उसे परिभाषित करना मुश्किल है और इसलिए वह ‘‘जीवन जीने का एक तरीका है’’। यह निर्णय हिन्दू धर्म की प्रकृति के कारण इसके संबंध में व्याप्त भ्रांतियों से उपजा था। हिन्दू धर्म का कोई पैगंबर नहीं है और इसमें कई धार्मिक परंपराएं शामिल हैं, जिनमें से कुछ परस्पर विरोधाभासी हैं। परंतु इसके बावजूद भी हिन्दू, धर्मशास्त्र और समाजशास्त्र की दृष्टि से एक विशिष्ट धर्म है, जिसकी अपनी पवित्र पुस्तकें, कर्मकांड और देवी-देवता हैं। अदालत ने 1995 के अपने निर्णय के इस महत्वपूर्ण पक्ष पर कोई राय व्यक्त नहीं की है। दो दशक से भी ज्यादा पुराने निर्णय के इस पक्ष पर पुनर्विचार आवश्यक है क्योंकि करोड़ों हिन्दू अपने धर्म को एक धर्म के रूप में ही देखते हैं जीवन जीने के तरीके के रूप में नहीं।

    इस मुद्दे पर कोई राय व्यक्त न कर उच्चतम न्यायालय ने सांप्रदायिक ताकतों को यह छूट दे दी है कि वे हिन्दू धर्म और हिन्दुत्व के नाम पर वोट मांगते रहें और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम के प्रावधानों के तहत सज़ा पाने से बचे रहें। इस विसंगति के कारण सांप्रदायिक ताकतें चुनावी लाभ के लिए धर्म का दुरूपयोग करती रहेंगी और कानून उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकेगा। इसके अतिरिक्त, ‘धार्मिक पहचान’ का इस्तेमाल हिंसा भड़काने और समाज को धर्म के आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया जाता रहा है। चाहे मुद्दा राम मंदिर का हो या गोमांस का, उसके सांप्रदायिक स्वरूप को हम नज़रअंदाज़ नहीं कर सकते। पिछले लगभग तीन दशकों से इस तरह के मुद्दों का उपयोग राजनैतिक लाभ के लिए किया जाता रहा है। अदालत ने इस तरह के मुद्दों, जिनका इस्तेमाल धर्म के नाम पर लोगों को एकजुट करने के लिए किया जाता रहा है, के बारे में कुछ नहीं कहा है। धार्मिक पहचान का राजनैतिक उपयोग, धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के खिलाफ है। हमारे देश को इस तरह के भावनात्मक मुद्दों को राजनीति से बचना होगा। जब तक यह नहीं होगा तब तक कुछ राजनैतिक दल धर्म के नाम पर वोट मांगते रहेंगे।

    हम सबको याद है कि सन 2014 के आम चुनाव के पहले नरेन्द्र मोदी ने मुंबई में अपनी एक सभा में कहा था कि मैं एक हिन्दू परिवार में जन्मा था और मैं राष्ट्रवादी हूं इसलिए मैं हिन्दू राष्ट्रवादी हूं। उनके भाषण के इस हिस्से की बड़ी-बड़ी होर्डिंग पूरे मुंबई शहर में लगाई गई थीं। क्या यह भ्रष्ट आचरण नहीं है? क्या अकबरूद्दीन ओवैसी और संघ परिवार के योगी आदित्यनाथ, प्रवीण तोगड़िया, साध्वी निरंजन ज्योति और अन्यों के घृणा फैलाने वाले भाषण राजनीतिक लाभ पाने के लिए धर्म के दुरूपयोग की सीमा में नहीं आते? क्या इस तरह के भाषणों को भ्रष्ट आचरण नहीं माना जाना चाहिए? colombia.co धर्म के आधार पर वोट मांगने के लिए धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल भी आम है। इनमें इस्लामिक और हिन्दू दोनों प्रतीक शामिल हैं। कुछ उम्मीदवार अपने पोस्टरों पर हिन्दू देवी-देवताओं के चित्र छपवाते हैं तो कुछ अपनी तुलना किसी देवी या देवता से करते हैं। इसे हम क्या कहेंगे? कुछ समय पहले, उत्तरप्रदेश भाजपा के अध्यक्ष के.पी. मौर्य को एक पोस्टर में भगवान कृष्ण के रूप में दिखाया गया था जो मुलायम सिंह यादव परिवार के कौरवों से मुकाबला कर रहे हैं। अगर राजनीति को धर्मनिरपेक्ष होना चाहिए तो हम इस तरह के आचरण को कैसे नज़रअंदाज़ कर सकते हैं।

    दूसरी ओर, समाज के हाशिए पर पड़े वर्गों से जुड़े मुद्दे भी महत्वपूर्ण हैं। कुछ वंचित और निर्धन समुदायों की मांगें धर्म और राजनीति से जुड़ी हो सकती हैं। भारत में हमेशा से अलग-अलग कारकों से कुछ समुदायों का शोषण और दमन होता आया है। इनमें आदिवासी, दलित और धार्मिक अल्पसंख्यक शामिल हैं। इन वर्गों की बदहाली को रेखांकित करने वाली कई तथ्यात्मक रपटें उपलब्ध हैं, जिनमें सच्चर समिति की रपट शामिल है। इन वर्गों की मांगों को पूरा करने को ‘‘सकारात्मक कार्यवाही’’ की श्रेणी में रखा जाना चाहिए, जो संविधान के धर्मनिरपेक्ष प्रजातांत्रिक चरित्र के अनुरूप है। इस तरह की मांगों पर किसी भी स्थिति में धर्म या जाति का लेबिल चस्पा नहीं किया जाना चाहिए।

    उच्चतम न्यायालय ने हमें रास्ता दिखाया है परंतु जब तक समाज में धर्मनिरपेक्ष मूल्यों की पुनर्स्थापना नहीं होती तब तक हम सही अर्थों में न्याय और शांति की स्थापना नहीं कर पाएंगे। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • अनुशासन कि आड़ में कहीं शोषण तो नहीं

    डा० नीलम महेंद्र


     

    भ्रष्टाचार जिसकी जड़ें इस देश को भीतर से खोखला कर रही हैं उससे यह देश कैसे लड़ेगा? यह बात सही है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने काफी अरसे बाद इस देश के बच्चे बूढ़े जवान तक में एक उम्मीद जगाई है। इस देश का आम आदमी भ्रष्टाचार और सिस्टम के आगे हार कर उसे अपनी नियति स्वीकार करने के लिए मजबूर हो चुका था,उसे ऐसी कोई जगह नहीं दिखती थी जहाँ वह न्याय की अपेक्षा भी कर सके। लेकिन  आज वह अन्याय के विरुद्ध आवाज उठा रहा है।

    सोशल मीडिया नाम की जो ताकत उसके हाथ आई है उसका उपयोग वह सफलतापूर्वक अपनी आवाज प्रधानमंत्री तक ही नहीं, पूरे देश तक पहुँचाने के लिए कर रहा है। देखा जाए तो देश में इस समय यह एक आदर्श स्थिति चल रही है जिसमें एक तरफ प्रधानमंत्री अपनी मन की बात देशवासियों तक पहुंचा रहे हैं तो दूसरी ओर देशवासियों के पास भी इस तरह के साधन हैं कि वे अपनी मन की बात न सिर्फ प्रधानमंत्री बल्कि पूरे देश तक पहुंचा पा रहे हैं।

    शायद आम आदमी के हाथ आए सोशल मीडिया नामक इस हथियार के सहारे ही प्रधानमंत्री भ्रष्टाचार पर काबू कर पांए  क्योंकि सिस्टम तो करप्ट है ही और जो लोग सिस्टम का हिस्सा हैं वे अपनी आदतों से मजबूर हैं तो कोई मजबूरी ही उन्हें अपनी सालों पुरानी आदतों से मुक्त कर पाएगी!

    हाल ही में बी.एस.एफ  के जवान तेज बहादुर यादव जो ऐच्छिक सेवा निवृत्ति के तहत 31 जनवरी को रिटायर हो रहे हैं  जाते जाते देश के सामने सेना में सैनिकों की दशा पर प्रश्नचिन्ह लगा गए। कटघड़े में न सिर्फ  वह सेना है  पर जिस पर पूरा देश गर्व करता है बल्कि सरकार के साथ साथ पूरा विपक्ष भी है क्योंकि आज जो विपक्ष में हैं कल वे ही तो सरकार में थे।

    तो 2010 में ही जब कैग ने अपनी रिपोर्ट में पाक और चीन सीमा पर तैनात जवानों को मिलने वाले  भोजन, उसकी  गुणवत्ता  और  मात्रा में भी निम्न स्तर के होने की  जानकार दी थी तो तब की सरकार ने, या फिर आज की सरकार ने 2016 की कैग की रिपोर्ट पर क्या एक्शन लिया?

    कटघड़े में तो सभी खड़े हैं।

    खैर उन्होंने अपनी और अपने साथियों की आवाज को प्रधानमंत्री तथा देशवासियों तक पहुंचाने के लिए इसी हथियार का इस्तेमाल किया।
    ‘भूखे भजन न होए गोपाला, यह रही तेरी घंटी माला’ की तर्ज पर उन्होंने प्रधानमंत्री से गुहार लगाई। उनका वीडियोसोशल मीडिया पर इतना  वाइरल  हुआ कि उनकी जो आवाज उनके सीनियर अधिकारी नहीं सुन पा रहे थे या सुनना नहीं चाह रहे थे उस आवाज को आज पूरा देश सुन रहा है।

    वह आवाज अखबारों की हेडलाइन और चैनलों की प्राइम टाइम कवरेज बन गई है। जो काम 6 सालों से कैग की रिपोर्ट नहीं कर पाई वो एक सैनिक की आवाज कर गई क्योंकि इसे सुनने वाले वो नेता या अधिकारी नहीं थे जिन्हें एक जवान के दर्द से कोई फर्क नहीं पड़ता बल्कि इसे सुनने वाला था वो आम आदमी जो एक दूसरे के दर्द को न सिर्फ समझता है बल्कि महसूस भी करता है। और चूँकि लोकतंत्र में सत्ता की चाबी इसी आम आदमी के हाथ है तो जो दर्द इस आदमी ने महसूस किया है उसका इलाज शायद सत्ताधारियों को अब ढूँढना होगा। खबर के वाइरल होते ही सरकार हरकत में आई जांच के आदेश दिए गए, सरकार अपनी जांच कर रही है और बी.एस.एफ. अपनी। जांच शुरू हो चुकी है और साथ ही आरोप प्रत्यारोंपों का दौर भी। कुछ ‘राष्ट्रवादियों’ का कहना है कि इस प्रकार सेना की बदनामी देश के हित में नहीं है और जो सैनिक दाल पर सवाल उठा रहा है पहले उसका इलाज जरूरी है। उन सभी से एक सवाल।

    देश क्या है? हम सब ही तो देश बनाते हैं। सेना क्या है? यह सैनिक ही तो सेना बनाते हैं। जिस देश की सेना अपने सैनिक के मूल भूत अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकती वह सैनिक उस देश की सीमओं की रक्षा कैसे करेगा? जिस देश की सेना में उसके सैनिक की रोटी तक भ्रष्टाचार के दानव की भेंट चढ़ जाती हो वह भी अपने ही उच्च पद के अधिकारियों के कारण उस देश में हम  किस राष्ट्रवाद की बातें करते हैं ?
    जो लोग सैनिक की इस हरकत को अनुशासनहीनता मान रहे हैं वे स्वयं दिल पर हाथ रखकर कहें कि ऐसे दुर्गम स्थान पर जहाँ जीवित रहने के लिए ही प्रकृति से पल पल संघर्ष  पड़ता है,  वहाँ जो भोजन वीडियो में दिखाया गया है उस भोजन के साथ वे 11 घंटे की ड्यूटी दे सकते हैं।
    जवान द्वारा लगाए गए आरोपों की जांच जरूर की जानी चाहिए। अगर आरोप सही हैं तो दोषी अधिकारियों को सजा मिले और सैनिकों को न्याय। लेकिन अगर आरोप झूठे हैं तो सेना के कानून के तहत उस जवान पर कार्यवाही निश्चित ही होगी।

    दरअसल भ्रष्टाचार केवल सरकार के सिविल डिपार्टमेंट तक सीमित हो, ऐसा नहीं है, सेना भी इससे अछूती नहीं है। आपको शायद यह जानकार  आश्चर्य हो कि आजाद भारत में  जो सबसे पहला घोटाला सामने आया था वो 1955 में सेना का ही जीप घोटाला था। उसके बाद 1987 में बोफोर्स घोटाला, 1999 ताबूत घोटाला, 2007 राशन आपूर्ति घोटाला, 2009 आदर्श घोटाला, 2013अगस्तावेस्टलैंड घोटाला, यह सभी घोटाले सेना में हुए हैं। रिटायर्ड एयर चीफ एस पी  त्यागी को हाल ही में सीबीआई द्वारा अगस्तावेस्टलैंड घोटाले की जांच के अन्तर्गत  हिरासत में लिया गया है।

    इसके अलावा अभी कुछ समय पहले सेना में प्रोमोशन के सिलसिले में एक नया स्कैम भी सामने आया था जिसके लिए आर्म्ड फोर्स  ट्रिब्यूनल ने रक्षा मंत्रालय और सेना को सिस्टम में वायरस की तरह घुसते भ्रष्टाचार पर काबू करने के लिए कहा है। इसके साथ ही कोर्ट ने एक लेफ्टानेंट जनरल का प्रोमोशन भी रद्द कर दिया था।

    अगर हम वाकई में राष्ट्र हित के विषय मे सोचते हैं तो हमें कुछ ख़ास लोगों द्वारा उनके स्वार्थ पूर्ति के उद्देश्य से बनाए गए स्वघोषित आदर्शों और कुछ भारी भरकम शब्दों के साये से बाहर निकल कर स्वतंत्र रूप से सही और गलत के बीच के अंतर को समझना होगा। एक तथ्य यह भी है कि सेना में डिसिप्लिन सर्वोपरि होता है। हर सैनिक को ट्रेनिंग का पहला पाठ यही पढ़ाया जाता है कि अपने सीनियर की हर बात हर औडर को बिना कोई सवाल पूछे मानना है और यह सही भी है। बिना डिसिप्लिन के आर्मी की कल्पना भी असम्भव है। आप सोच कर सकते हैं कि युद्ध की स्थिति में कोई जवान अपने सीनियर की बात मानने से मना कर दे तो ऐसी इनडिसिप्लिनड  सेना  के कारण उस देश का क्या हश्र होगा। लेकिन एक सत्य यह भी है कि इसी अनुशासन की आड़ में काफी बातें जवान न तो बोलने की हिम्मत जुटा पाते हैं न विरोध कर पाते हैं।

    तो अनुशासन अपनी जगह है लेकिन डिसिप्लिन की आड़ में शोषण न तो  सैनिक के लिए अच्छा है न सेना के लिए।

  • क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले?

    त्रिभुवन


    क्या इस देश में ऐसा कोई है, जिस पर आरोप लगें और वह उन्हें खुले मन से स्वीकार कर ले? बीएसएफ के जवान तेज बहादुर ने बाकायदा विडियो डालकर बुरे खाने पर जो प्रश्न उठाए हैं, उन्होंने बीएसएफ के अफ़सरों और केंद्रीय गृह मंत्रालय की उस व्यवस्था के रुपहले झूठ की कलई खोल दी है।

    अब बीएसएफ के आईजी और डीआईजी से लेकर केंद्रीय गृह मंत्रालय तक ने खाने-पीने की चीज़ों को दुरुस्त करने के बजाय खुले तौर पर असलियत सामने लाने वाले तेज बहादुर को ही प्रताड़ित करना शुरू कर दिया है। यह भारतीय बलों की अंदरूनी हक़ीक़त है।

    बीएसएफ के एक जवान की हूक और तड़प ने पूरी व्यवस्था के भीतरी कोढ़ को सामने ला दिया है। यह सच मैंने सीमा की रिपोर्टिंग करते हुए बहुत नज़दीक से देखा है कि सेना और अर्धसैनिक बलों के आला अफ़सर किन रंगीनियों और रानाइयों में रहते और मौज-मज़ा करते हैं और आम सैनिक किस तरह हाथों को खंजर बनाकर सेना या बीएसएफ के ताज़ को दमकाते हैं।

    मैंने स्वयं देखा है कि साधुवाली, सूरतगढ़ और लालगढ़ छावनी से सेना के अधिकारी किस तरह ट्रकों को सुनसान इलाकों में ले जाकर डीजल बेचा करते थे। मैं जिन दिनों एक साप्ताहिक अख़बार निकाला करता था, उन दिन जहां से कागज़ खरीदता था, वहां से सेना के अधिकारी एक पचास पैसे वाले स्कैच पैन को दस रुपए में खरीदने का बिल लिया करते थे। बीएसएफ के बटालियनों में जब कभी किसी कार्यक्रम के लिए गए, अफ़सर माैज-मजा करते थे और सिपाही तेज बहादुर की तरह ही कलपते थे, लेकिन उनकी सुनता कौन है?

    आपने बीएसएफ के डीअाईजी मान का तर्क तो सुना ही होगा कि तेज बहादुर निजी कारणों से नाराज है। तेज बहादुर का मानसिक संतुलन ठीक नहीं है। इस देश में जो भी व्यक्ति सच कहता है या किसी ताकतवर संस्था के खिलाफ आवाज़ उठाता है तो उसे पागल ही करार दिया जाता है। इस देश का यही ऐतिहासिक सच है। आप सेना के, सुप्रीम कोर्ट के और प्रधानमंत्री सहित किसी अन्य ताकतवर संस्था के खिलाफ़ कुछ बोलेंगे तो कह दिया जाएगा कि आप अमेरिका के या किसी पाकिस्तान एजेंसी के एजेंट हैं!

    तेज बहादुर पागल ही तो है, जिसने यह जानते हुए कि उसका और उस जैसे लाखों जवानों का हर रोज़ जिन चंगेज़ों और नादिरशाहों से वास्ता पड़ता है, वे हेलिकॉप्टरों और युद्धक विमानों की खरीद का सौदा करते हुए तीन-चार सौ करोड़ रुपए से यों ही गिफ्ट में कमा लेते हैं। ऐसे लोगों के पास किसी तेज बहादुर की दाल का पानी मापने और उसमें कितने दाने हैं, यह गिनने की भला फ़ुर्सत होगी? तेज बहादुर पागल नहीं तो क्या है, जो यह जानते बूझतेऔर देखते हुए एक विडियो वायरल करता है कि उसका सामना कितने ही सुल्ताने-ज़ाबिर से हर रोज़ होगा।

    तेज बहादुर तो बीएसएफ का जवान है और वह जब बीएसएफ के अफ़सरों पर प्रश्न भर उठाता है। बीएसएफ के आला अफ़सर उसे मनोरोगी भी साबित कर सकते हैं, लेकिन उस मीडिया को क्या कहेंगे, जिसमें सुधीर चौधरी जैसे वज्रमूर्ख और सरेआम भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे लोग ऐसे राजनीतिक दलों को पाकिस्तानी एजेंट घोषित करने लगते हैं, जो केंद्र सरकार या प्रधानमंत्री के खि़लाफ़ एक होने का संवैधानिक और लोकतांत्रिक अधिकार रखते हैं।

    ऐसा ही दौर 1975 से 1977 के दौरान आया था जब इंदिरा इज़ इंडिया और इंडिया इज़ इंदिरा का नारा सत्ता प्रतिष्ठानों से जुड़े सुधीर चौधरी लगाया करते थे। भारत में सुलतानों से मुहब्बत का दौर आज का नहीं है। यह बहुत पुराना रोग है। सुलतानों के इश्क में पागल हुए लोग ऐसे होते हैं, जो स्वतंत्रता के नूर और अभिव्यक्तियों के चंद्रमा को फेंककर सुलतान के जूते झाड़ने में फ़ख़्र महसूस करते हैं।

    अब तो क्या मीडिया और क्या सेना, सभी एक ही धारा में बह रहे हैं। क्या संत और क्या मतिमंत। भारत में कभी एक दौर था जब कुंभनदास जैसे संत हुए थे। जिस समय बड़े बड़े राजे-महाराजे अक़बर बादशाह के दरबार में हाजिर हो चुके थे तो कुंभनदास को अक़बर बादशाह ने अपनी राजधानी सीकरी में बुलाया और एक पद सुनाने को कहा तो बाबा कुंभनदास ने टिकट या सत्ता में हिस्सेदारी नहीं मांगी। वे बोले : ‘संतन को कहा सिकरी सो काम। आवत जात पनहियाँ टूटी। बिसरि गयो हरि नाम। जिनको मुख देखे दु:ख उपजत। तिनको करिबे परी सलाम!’ अरे ओ अक़बर बादहशाह, मुझ संत को तेरी सीकरी से क्या लेना देना।यहां आया और यहां से पैदल जाऊंगा, क्योंकि मैं हाथी घोड़े तो चढ़ता नहीं, मेरी पन्हैयां यानी जूतियां टूट गई हैं। जो आने-जाने में देर हुई, उतने समय में मैं ईश्वर चिंतन करता। और बादशाह की तो शक्ल देखकर तो दिन खराब हो जाता है और देख मेरा दुर्भाग्य कि तुझे सलाम करना पड़ रहा है। और एक आज के संत हैं। निकृष्टता और पतन के चरम पर।

    लोकनायक जयप्रकाश नारायण से लेकर आम आदमी तक जब इंदिरा सरकार के लौहावरण के खिलाफ जनयुद्ध में उतरा तो सत्ता प्रतिष्ठानों ने उन सबको विदेशी शक्तियों के इशारे पर काम करने वाला घोषित करके जेलों में डाल दिया। ये आरोप कम्युनिस्टों के एक खेमे पर भी लगे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के नेताओं पर भी। ये आरोप भारतीय जनता पार्टी के पुराने संस्करण भारतीय जन संघ पर भी मंढे़ गए और लोहियावादियों-समाजवादियों पर भी। इंदिरा गांधी और उनके मूर्ख और आत्मघाती प्रशंसकों ने विरोधियों को क्या-क्या नहीं कहा। लेकिन अफ़सोस आज नरेंद्र मोदी के भक्त और राष्ट्रीय स्वयं सेवक के अनुयायी उस इंदिरा मार्ग का अनुसरण बड़े गर्व से कर रहे हैं।आज उन्हें उन अंधेरों में नूर ही नूर नज़र आ रहा है, जिनके लिए वे कभी जेल गए थे।

    लिहाजा, बीएसएफ के जिस साहसी जवान ने विडियो डालकर जिस सच को देश के सामने ला दिया है, वह बीएसएफ ही नहीं, केंद्रीय गृह मंत्रालय तक को पच नहीं रहा है। बेहतर ये है कि बीएसएफ और गृह मंत्रालय सेना और बीएसएफ के जवानों की जमीनी खबर ले और सच को सच माने। ऐसे साहसी सैनिक को दंडित करने के बजाय भ्रष्टाचार से सड़ती व्यवस्था को दुरुस्त करे। यह ऐसा ही समय है जब सेना के अफ़सरों के खिलाफ जवानों को अपनी बात रखने का हक़ और अधिकार हो और सुप्रीम कोर्ट अपनी पवित्रता से बाहर आकर आंख में आंख डालने का साहस करे। क्या इस बहादुर देश को सवालों से डरा हुआ सुप्रीम कोर्ट चाहिए? क्या इस देश को ऐसी सेना चाहिए, जो प्रश्नों से डरे? alprazolam for sleep online https://www.veterinary-practice.com/ अब समय आ गया है कि सुप्रीम कोर्ट साहस दिखाए और कंटेप्ट ऑव कोर्ट जैसे दकियानूसी, अलोकतांत्रिक और बेसिरपैर के कानून को अब तिरोहित कर दे। अब तूफ़ाने तरब का वक्त गया सत्ता की शक्तियो!

    पवित्रता यही है कि पवित्रता के अलावा कुछ भी पवित्र नहीं है। न सेना, न अर्धसेना, न प्रधानमंत्री, न राष्ट्रपति, न सुप्रीम कोर्ट और न प्रभु स्वयं। अब वह दौर बीत चुका है जब सेना, अदालतें और बादशाहतें खलीफा थीं। अब खलीफा है तो वह जनता है। लोक है। इस लोक से ऊपर कुछ नहीं है। आप जिस लोक के लिए हैं, आप जिस जनता के लिए हैं, आप जिस नागरिक के लिए हैं, उसे यह अधिकार है कि वह आप पर सवाल उठाए। सवालों से बचने की कोशिश करेंगे तो किसी से नहीं बच पाएंगे। जो सवाल से बचने की कोशिश करेगा, वह भ्रष्ट ही होगा। वह निकृष्ट ही होगा। तेज बहादुर ने अर्ध सैनिक बल की रसाेई की बदहाली का सवाल उठाया है, लेकिन यह सवाल बता रहा है कि देश और व्यवस्था के चूल्हे पर ज़ुल्म, झूठ और निकृष्ट पतन किस तरह पक रहे हैं। मैं बहादुर जवान तेज बहादुर के साहस को प्रणाम करता हूं। वह ज़ुल्मत-कदे में शम्म-ए-फ़रोज़ां लेकर दाखिल हुआ एक साहसी व्यक्ति है। हमें उसके साहस के साथ खड़ा होना चाहिए।


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  • नेता जी ने शायद ऐसा अन्त तो नहीं सोचा होगा

    डा० नीलम महेंद्र


    देश के सबसे बड़े प्रदेश  उत्तर प्रदेश के सबसे शक्तिशाली राजनैतिक परिवार में कुछ समय से चल रहा राजनैतिक ड्रामा लगभग अपने क्लाइमैक्स पर पहुंच ही गया ( कुछ कुछ फेरबदल के साथ )। दरअसल यू पी के  होने वाले चुनावों और मुलायम सिंह की छवि को देखते हुए  केवल उनके राजनैतिक विरोधी ही नहीं बल्कि लगभग हर किसी को उनकी यह पारिवारिक उथल पुथल महज एक ड्रामा ही दिखाई दे रहा था , वो क्या कहते हैं  न महज एक पोलीटिकल स्टंट आखिर वो पटकथा ही क्या जिसके केंद्र में कोई रोमांच न हो  !

    सबकुछ ठीक ही चल रहा था। एक पात्र था  अखिलेश , तो दूसरा  शिवपाल और जिस  को वो दोनों ही पाना चाहते थे , वह थी सत्ता की शक्ति। पटकथा भी बेहद सधी हुई , एक को नायक बनाने के लिए घटनाक्रम लिखे गए तो दूसरा खुदबखुद ही दर्शकों की नजरों में खलनायक बनता गया । 1992 में समाजवादी पार्टी के गठन से लेकर आज तक पार्टी पर नेताजी का पूरा कंट्रोल था ।भले ही अपने भाईयों के साथ उन्होंने इसे सींचा था लेकिन ‘नेताजी  ‘ तो एक ही थे जिनके बिना पत्ता भी नहीं हिल सकता था। यह उन्हीं की पटकथा का कमाल था कि आज अखिलेश को पार्टी से निकाले जाने के बाद पार्टी के 200 से भी अधिक लगभग 90%  विधायक मुलायम शिवपाल नहीं अखिलेश के साथ हैं 2012 के चुनावी दंगल  में उन्होंने अखिलेश को पहली बार जनता के सामने रखा।

    मुलायम की कूटनीति और अखिलेश की मेहनत से समाजवादी पार्टी की साइकिल ने वो स्पीड पकड़ी कि सबको पछाड़ती हुई आगे निकल गई। शिवपाल की महत्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं के विपरीत अखिलेश को न सिर्फ सी एम की कुर्सी मिली बल्कि जनता को उनका युवराज मिल गया। उनके पूरे कार्यकाल में जनता को यही संदेश गया कि वे एक ऐसे नई पीढ़ी के युवा नेता हैं जो एक नई सोच और जोश के रथ पर यूपी को विकास की राह पर आगे ले जाने के लिए प्रयासरत हैं। वे ईमानदारी और मेहनत से प्रदेश के बुनियादी ढांचे में सुधार से  लाकर आम आदमी के जीवन स्तर को सुधारने के लिए प्रतिबद्ध  हैं  और अपनी इस  छवि निर्माण में  वे काफी हद तक सफल भी हुए हैं।
    जिस रिकॉर्ड समय में आगरा लखनऊ एकस्प्रेस हाईवे बनकर तैयार हुआ है वह यूपी की नौकरशाही के इतिहास को देखते हुए अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि है। आज लखनऊ मेट्रो केवल अखिलेश का  ड्रीम प्रोजेक्ट नहीं रह गया है बल्कि उसने यूपी के हर आमोखास की आँखों में भविष्य के सपने और दिल को उम्मीदों की रोशनी से भर दिया है। अखिलेश के सम्पूर्ण कार्यकाल में मुलायम सिंह की सबसे बड़ी उपलब्धि  अखिलेश की यही छवि निर्माण रही।

    किसी भी नेता को जनता का इससे अधिक प्यार क्या मिलेगा कि विकास का जो भी काम हो रहा है उसका क्रेडिट लेने वाला वह अकेला हो लेकिन जो असफलताएं एवं अनुपलब्धियाँ हों वह किसी और के कारण हों । मसलन प्रदेश में गुंडा राज हो या भू माफिया हो अथवा कानून व्यवस्था पर कमजोर पकड़ हो सब अपने चाचा और अपने पिता के आगे एक आज्ञाकारी पुत्र के कुछ बोल न पाने के कारण हो। सार्वजनिक मंचों पर पिता द्वारा अपमानित होकर भी हंसते रहना और कहना कि वो कौन सा बेटा है जो पिता की डाँट खाए बगैर बड़ा हुआ है या फिर चाचा के सामने बेबस हो जाना। यह सभी उस पटकथा का हिस्सा था जिसके पात्रों को यह सब जी रहे थे।

    असली कहानी तब शुरू होती है जब शिवपाल के कहने पर मुलायम ,आजम खान और अमर सिंह से हाथ मिलाते  हैं तो अखिलेश विद्रोह करते हैं। जनता के दिल में अखिलेश के लिए सहानुभूति की लहर दौड़ जाती है और उनकी साफ सुथरी छवि पर जनता की मुहर लग जाती है। फिर  एक दिन मुलायम सपा के उम्मीदवारों की लिस्ट शिवपाल के ‘दबाव ‘ में घोषित करते हैं जिनमें अखिलेश समर्थकों की कोई जगह नहीं है तो दूसरे ही दिन अखिलेश अपनी लिस्ट घोषित करते हैं। लोगों तक स्पष्ट संदेश जाता है कि मुलायम  शिवपाल के ‘दबाव ‘ में हैं न भाई को छोड़ पा रहे हैं न बेटे को । और चूँकि वह लिस्ट अपराधिक तत्वों तथा बाहुबलियों से भरी थी, अखिलेश को मंजूर नहीं थी और ‘साफ सुथरी राजनीति ‘ के लिए वे ‘परिवार ‘ से ऊपर ‘पार्टी ‘ को रखते हैं । यह  अलग बात है कि जो लिस्ट अखिलेश ने जारी की बाहुबली  उसमें भी कम नहीं थे।

    शिवपाल भले ही न जानते हों कि वे क्या कर रहे हैं  (अखिलेश की छवि निर्माण में उनकी बलि ली जा रही है) ) लेकिन मुलायम भली भाँति जानते थे वे क्या कर रहे हैं । 2014 में उन्होंने जब अखिलेश को सी एम की कुर्सी दी थी तो कहा था कि प्रदेश बेटे के हाथों सौंप कर अब वह केंद्र में अपना ध्यान और शक्ति दोनों लगाएंगे। इस दिशा में उन्होंने प्रयास भी किए , लालू के साथ मिलकर महागठबन्धन भी बनाया जो कालांतर में महाठगबन्धन ही साबित हुआ।

    2014 के चुनावों में जनता ने जब सब कुछ कीचड़ कर दिया और पूरे देश में कमल खिला दिया तो वे समझ गए कि केंद्र में उनके पास तो क्या पूरे विपक्ष के पास आज करने के लिए कुछ ख़ास नहीं है तो वापस प्रदेश में ध्यान लगाया लेकिन अब तक लगभग दो साल बीत चुके थे और समय के साथ उन्हीं की दी साइकिल पर बैठ कर बेटा काफी आगे निकल चुका था। जबकि वो प्रदेश से निकल कर केंद्र में जाने की चाह में बहुत पीछे जा चुके थे , हवा के बहाव में वे वहाँ भी खड़े नहीं रह पाए जहाँ पर वह थे।

    दिल्ली तो शुरू से ही दूर थी लेकिन सैफई भी छूट जाएगी इसे जब तक मुलायम समझ पाते तब तक काफी देर हो चुकी थी। मुलायम सोचते थे कि आखिर तक कहानी में पटकथा वो ही चलती है जो लेखक लिखता है लेकिन शायद यह भूल गए कि फिल्म हो या कहानी उसकी पटकथा बेशक लेखक लिखता है लेकिन जिंदगी की पटकथा लिखने वाला तो एक ही है वो परमपिता परमेश्वर और उसके आगे अच्छे अच्छों की पटकथा फेल हो जाती है। जिन पात्रों और जिस पटकथा को ये सभी जी रहे थे उसके कैरेक्टर में सभी इतने इन्वोल्व हो गए कि कलाइमैक्स आते आते वे सभी अपने मूल व्यक्तित्व को भूल कर कैरेक्टर के रंग में रंग चुके थे। शिवपाल अब तक समझ चुके थे कि कुर्सी की डोर उनके हाथों से छूट चुकी है किन्तु हार नहीं मान रहे थे, अपने वफादारों को टिकट दिलवा कर हारी हुई लड़ाई जीतने की कोशिश रहे थे। अखिलेश को अब सत्ता पर किसी और का नियंत्रण  स्वीकार कतई नहीं था  और टिकट देने में स्वतंत्र हाथ चाहते थे।

    मुलायम जिन्होंने पटकथा लिखी थी और कहानी की शुरुआत में जो पात्र उनके हाथों की कथपुतली थे  आज अपनी अपनी डोर से मुक्त हो चुके थे। परदे के पीछे  अखिलेश और शिवपाल को यह याद दिलाने की उनकी हर कोशिश नाकाम होती गई कि वे सिर्फ कहानी के पात्र हैं डायरेक्टर तो स्वयं मुलायम हैं।  लेकिन न तो शिवपाल सुनने को तैयार थे और न ही अखिलेश। पार्टी परिवार और कहानी तीनों ही उनके हाथ से फिसल चुके थे  । जिस पटकथा के अन्त में अखिलेश शिवपाल को चारों खाने चित्त करके विजेता बनकर और मुलायम  एक बेबस भाई और पिता के बीच फंसे ‘ नेताजी ‘बन कर उभरते  जिन्हें जनता की सहानुभूति प्राप्त होती उसका अन्त अब बदल चुका था । बात चुनाव आयोग तक पहुँच गई । जिस अखिलेश ने यू पी के लोगों के दिलों के सहारे सत्ता तक की अपनी राह लगभग पक्की कर ली थी , आज उनका मुकाबला न सिर्फ सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी के बाद बदले हुए परिदृश्य से है बल्कि चुनाव आयोग तक पहुँच चुकी सपा की ही अन्दरूनी फूट से भी है । वो चिंगारी कब खेलते  खेलते लौ बन गई खुद मुलायम भी नहीं समझपाए । जो समाजवादी पार्टी अपने दम पर सरकार बनाने का माद्दा रखती थी आज कांग्रेस के साथ गठबंधन की ओर अग्रसर है।

    जिस राजनीति को मुलायम शतरंज कि बिसात समझ कर खेल रहे थे वे स्वयं उसका मोहरा बन जायेंगे यह तो शायद उन्होंने भी नहीं सोचा होगा ।