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  • ध्यान में सबसे बड़ी बाधा: आत्मा का सिद्धांत –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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    ध्यान एक ऐसा विषय है जिसके बारे में सबसे ज्यादा धुंध बनाकर रखी जाती है और पूरा प्रयास किया जाता है कि इस सरल सी चीज को न समझते हुए लोग भ्रमित रहें. इस भ्रम का जान बूझकर निर्माण किया जाता है ताकि कुछ लोगों संस्थाओं और वर्गों की संगठित दुकानदारी और सामाजिक नियंत्रण बेरोकटोक बना रहे.

    ध्यान को चेतना या होश के एक विषय की भाँती समझना एक आयाम है और ध्यान सहित अध्यात्म को एक मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र के उपकरण की तरह देखना दूसरा आयाम है. अक्सर एक आयाम में बात करने वाले दूसरे आयाम की बात नहीं करते लेकिन मैं दोनों की बातें करूंगा ताकि बात पूरी तरह साफ़ हो जाए.

    पहले हम ध्यान को उसके चेतना और होश वाले अर्थ में समझते हैं. असल में ध्यान का अर्थ शुद्धतम होश से है. ध्यान करना या ध्यान लगाना शब्द मूलतः गलत है और ‘ध्यानपूर्ण होना’ या ‘ध्यान में होना’ शब्द ही सही है लेकिन भाषा की मजबूरी है कि ‘ध्यान करना’ एक प्रचलन बन गया है. इस हद तक ‘ध्यान करने’ की सलाह की भाषागत विवशता को माफ़ किया जा सकता है लेकिन दुर्भाग्य से मामला यहीं नहीं रुकता. जो परम्पराएं ध्यान फैलने ही नहीं देना चाहती और ध्यान के, होश के और तर्क के खिलाफ काल्पनिक इश्वर से याचना करते हुए ही जिनका जन्म हुआ है वे आजकल ध्यान की ठेकेदारी लेकर बैठ गयी हैं.

    इन शोषक और अन्धविश्वासी परम्पराओं से जब ध्यान की सबसे बड़ी प्रस्तावनाएँ आती हैं तब जरुरी हो जाता है कि उनकी प्रस्तावनाओं में छुपे षड्यंत्रों और विरोधाभासों की पोल खोली जाए.

    भारत में ध्यान की मौलिक प्रस्तावना श्रमणों (जैनों और बौद्धों) से आई है जो प्रार्थना और याचना की बजाय पुरुषार्थ और तर्कपूर्ण इंक्वाइरी में भरोसा रखते थे. इस प्रकार ध्यान ‘भौतिकवादी’ और ‘मनोवैज्ञानिकों’ की देन है. जिस क्रिया या अभ्यास को साधना या अध्यात्मिक अभ्यास कहकर बोझिल कर दिया गया है वह अपने क्षणभंगुर मन और सांत व्यक्तित्व के निष्पक्ष दर्शन के अलावा और कुछ भी नहीं है. इसमें एक वैज्ञानिक सी अप्रोच चाहिए जो अपने मन को प्रयोगशाला बनाकर उसमे हो रही उठा पटक को बिना निर्णय लिए बिना नाम दिए जानता रहे. इस तरह देखने जानने में समझ आता है कि हकीकत में घटनाओं, मन और व्यक्तित्व सहित जीवन और समय मात्र का भी कोई केंद्र नहीं है. सब कुछ संयोग है और सब कुछ और परिवर्तनशील है. ऐसे में अस्तित्व में खूंटे की तरह गाड़ दिए गये इश्वर की कल्पना भी एक मजाक भर है.

    यह भौतिकवाद की निष्पत्ति है. जैसे शरीर निरंतर वर्धमान है या क्षीण हो रहा है उसी तरह मन भी है, उसमे भी बाहरी संवेदनाएं और संस्कार प्रवेश कर रहे हैं और समय और परिस्थिति के अनुसार फलित हो रहे हैं. इस पूरे प्रवाह में आपके लिए करणीय इतना ही है कि इसे चुपचाप या तटस्थ होकर जानते रहें. यहाँ नोट करना चाहिए कि यह आतंरिक या मानसिक धरातल की तटस्थता है. सामाजिक और दुनियावी आयाम में इस तटस्थता का सीमित उपयोग ही हो सकता है.

    शरीर और मन सहित इनके समुच्चय अर्थात व्यक्तित्व को उसकी पूरी नग्नता में काम करते हुए देखना होता है. हमारी इंच इंच गतिविधि का पूरा होश हमें स्वयं होना चाहिए. जैसे अभी आप कुछ पढ़ रहे हैं, किसी कुर्सी पर बैठे हैं, पंखा चल रहा है, कोई गंध आ रही है, विचार चल रहे हैं, पैरों में जूते या चप्पल है, नाक पर चश्मा रखा है, कोई आवाज आ रही है, श्वास चल रही है कपड़ा बदन को छू रहा है पीठ से कुर्सी चिपकी है इत्यादि सारी घटनाओं को क्या आप एकसाथ इकट्ठे बिना विभाजन किये हुए जान सकते हैं? अगर हाँ तो यही ध्यान है.

    ऐसे सर्वग्राही होश के अर्थ में, ध्यान दुनिया की सबसे सरल चीज है. इसकी आन्तरिक संरचना भी बहुत सरल है. मूल रूप से इसकी केन्द्रीय प्रस्तावना इतनी ही है कि जो कुछ भी जानने में आता है वह क्षणभंगुर और संयोग या प्रवाह है उसे तूल देना और उससे बंधना या उसे किसी निर्णय के खांचे में बैठाना गलत है. अन्य परंपराएं आधी बात मानती हैं और आधी से डरती हैं. बुद्ध कहते हैं कि ज्ञान का विषय तो क्षणभंगुर है ही ज्ञाता भी क्षणभंगुर ही है, इनके बीच ज्ञान की जो ‘प्रक्रिया’ चल रही है वही असली है. उसका कोई केंद्र नहीं है.

    बुद्ध की यह प्रस्तावना ही ध्यान का सार है. और मूलतः यह अनत्ता की बात है. सरल शब्दों में इसका मतलब ये हुआ कि शरीर और मन सहित व्यक्तित्व भी समय के प्रवाह में एक संयोग की तरह उभरा है वह भी खो जाएगा. उसमे भविष्य या अतीत का प्रक्षेपण करना गलत है. अब जब शरीर मन के समुच्चय रूप इस व्यक्तित्व या आत्म का कोई ठोस अस्तित्व ही नहीं है तो इसके पहले और इसके बाद की अवस्था ही वास्तविक अवस्था हुई, मतलब ये कि इस शरीर और मन के संगठित होने या बनने के पहले की और इनके बिखर जाने के बाद की अवस्था ही वास्तविकता या सच्चाई है, और यह सच्चाई एकदम खालीपन या आकाश जैसी है.

    जैसे कमरे में कोई आया और घंटेभर बैठकर चला गया. ऐसे ही समय और आकाश के आंगन में आपका शरीर और मन आया और कुछ समय बाद चला गया. एक खालीपन में सब कुछ आया और चला गया. खालीपन ही बच रहा. यही खालीपन शून्य है. यही ध्यान या समाधी है.

    यह बहुत ही सरल बात है. फिर से देखिये, शरीर की एक एक संवेदना जब होश के घेरे में आ जाए, जब मन की एक एक संवेदना होश के घेरे में आ जाए तब होश एकदम से भभक उठता है. तब होश का कोई केंद्र नहीं होता और तब झूठा व्यक्तित्व या आत्म भी निरस्त हो जाता है तब समय का रेशा रेशा अनुभव होने लगता है. तब पहली बार पता चलता है कि समय भी होश के सामने बौना है और असल में समय बेहोशी में ही काम करता है. बेहोशी ही मन है और बेहोशी ही समय है. इसीलिये श्रमणों ने मन को ही समय कहा है. ये आप करके देख सकते हैं.

    अगर ऊपर बताये तरीके से आप सौ प्रतिशत संवेदनाओं को अभी एक क्षण में जान रहे हैं तो आप समय से या मन से एकदम आजाद हो जाते हैं. हालाँकि यह कहना गलत है कि आप आजाद हो जाते हैं, यह भाषा की दिक्कत है. असल में कहेंगे कि वहां आजादी की प्रक्रिया रह गयी. न कोई आजादी एक लक्ष्य रूप में है न कोई व्यक्ति आजादी के याचक के रूप में है.

    इस प्रक्रिया को एक अभ्यास के रूप में चरणबद्ध ढंग से लिया जा सकता है. जैसे बुद्ध श्वासों पर अवधान को ध्यान की शुरुआत बताते हैं. फिर श्वासों से होते हुए शरीर और मन की संवेदना पर जाते हैं उसके बाद संवेदना को जान रही आभासी सत्ता को भी निशाने पर लेते हैं. इस तरह एक निरंतर जागरूकता का बढ़ता हुआ दायरा बना रहता है. इस होश की अवस्था में तत्काल ही शरीर मन और समय से दूरी बन जाती है.

    यह तत्काल ही मुक्त करने लगता है भविष्य में किसी एकमुश्त निर्वाण की कोई आवश्यकता नहीं, वह होता भी नहीं. अभी आप जितने होशपूर्ण हैं उतने ही आप निर्वाण में हैं. पूरा होश पूरा निर्वाण है. यह अभी इसी जगत की बात है, इसका परलोक और विदेह मुक्ति जैसी मूर्खताओं से कोई संबंध नहीं. इसे अभी आप करके देख सकते हैं. आप हिसाब किताब और योजनाओं के बोझ में जितने दबे हैं उतने डिप्रेशन और तनाव में होंगे यही बंधन है. आप जितने निर्विचार और आकाश की तरह होंगे उतने क्रिएटिव होंगे उतने आजाद होंगे, ये तत्काल मुक्ति है.

    अब आते हैं इसके सामाजिक नियंत्रण वाले पक्ष पर. जैसा ऊपर मैंने लिखा कि कुछ ईश्वरवादी याचक और प्रार्थना वाली संस्कृतियाँ भी रही हैं जो वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण ओबजर्वेशन में नहीं बल्कि किसी काल्पनिक इश्वर की शक्ति आशीर्वाद समर्पण और शरणागती आदि आदि में भरोसा रखती हैं. अब तो श्रमण धर्म भी इन्ही के एक रूप में बदल गये हैं. बुद्ध और महावीर भी पूजे जाते हैं. https://www.methanol.org/ modafinil prescription online reddit ये गलत है. ऐसी याचक परम्पराओं को ब्राह्मण पोअर्न्प्रा कहा गया है. ये श्रमणों से विपरीत परम्परा है.

    यह असल में ज्ञान या विज्ञान की परंपरा नहीं बल्कि सामाजिक नियंत्रण की राजनीति है. यह श्रमणों द्वारा निर्मित ज्ञान का इस्तेमाल समाज को कंट्रोल करने में करती है और होशियारी से अपनी चालबाजियों सहित सृष्टि जीवन और जगत के केंद्र में एक काल्पनिक इश्वर और आत्मा को बैठा देती है. इनमे से और जहरीली परम्पराएं हैं जो इनसे भी आगे बढ़कर पुनर्जन्म की भी बातें करती हैं.

    अब ऐसी परम्पराओं के ध्यान की प्रस्तावना पर आइये. ये कहते हैं कि एक विशुद्ध और निर्लिप्त आत्मा होती है जो शरीर मन और विचारों से परे होती है. जब शरीर मन और विचार सहित संस्कारों की परछाई पीछे छुट जाती है तब यह आत्मा स्वयं को जानती है. इसे आत्मसाक्षात्कार कहते हैं. कुछ परंपरायें इसे ही अंतिम बताती हैं और कुछ इससे आगे जाकर परमात्मा को भी खड़ा करती हैं और उसके आधार पर एक और बड़ी राजनीति खेलती हैं. हालाँकि इनकी तथाकथित ‘आत्मसाक्षात्कार’ की टेक्नोलोजी वही है जो श्रमण बुद्ध ने बताई है. लेकिन वे बुद्ध का नाम नहीं लेते.

    बुद्ध के अनुसार शरीर और मन सहित विचार और संस्कार और स्वयं समय भी एक संयोग है इसलिए क्षणभंगुर है इसलिए उनकी कोई सत्ता नहीं है और इसीलिये खालीपन या सबकी अनुपस्थिति ही एकमात्र सच्चाई है. इसकी उपमा बुद्ध ने शुन्य और आकाश से दी है. इस आकाश को चिदाकाश और ओमाकाश और न जाने क्या क्या नाम देकर वेदान्तियों ने अपना जाल फैलाया है.

    अब मजा ये कि इसी आकाश भाव की प्रशंसा ब्राह्मणी और ईश्वरवादी परम्पराएं भी करती हैं लेकिन बड़ी चतुराई से इसे आकाश या शुन्य न कहकर आत्मा और परमात्मा का नाम दे देते हैं. फिर कहते हैं कि आत्मा सनातन होती है. अनंतकाल की स्मृति लिए वह एक से दुसरे गर्भ में घुमती रहती है जब तक कि सारी स्मृतियों और संस्कारों से मुक्त न हो जाए. अब यहाँ खेल देखिये. अगर आपका एक आत्मा के रूप में ठोस अस्तित्व है और आपका लाखों वर्ष का अतीत है जो कभी डिलीट नहीं किया जा सकता तो मुक्ति या आजादी का क्या अर्थ हुआ? तब आप लाखों वर्षों में बने हुए मन के बोझ से कैसे बच सकेंगे? और बचने की प्रक्रिया के दौरान जो कर्म हो रहे हैं उनका हिसाब कब होगा?

    इतनी बड़ी हार्ड डिस्क में इतनी मेमोरी को मेनेज करने के लिए तब एक सुपर कम्प्यूटर की कल्पना करनी पड़ती है. उस सुपर कम्प्यूटर को इश्वर कहा जाता है, जिसके बारे में ये दावा है कि वो गूगल बाबा की तरह सबकुछ जानता है सबकी मेमोरी रोज स्केन करता है और अपना निर्णय भी देता है. इस तरह ये हार्ड डिस्क स्वयं (अर्थात एक आदमी या व्यक्तित्व या आत्मा) एक जीता जागता केंद्र है जिसका अपना ठोस ‘स्व’ है और अतीत और भविष्य है और उसके बाद ये सज्जन हैं जो इश्वर कहलाते हैं ये भी अनंत से अनंत तक फैले हैं और फैसला करते हैं. अब ये दो केंद्र हैं.

    पहली दिक्कत ये कि पहला केंद्र अर्थात आत्मा भी सनातन है और न मिटाई जा सकती है न जलाई जा सकती न सुखाई जा सकती है. ऐसे में उसका एक ठोस अस्तित्व हुआ जिसमे बसी हुई स्मृतियाँ भी ठोस हो गईं जिन्हें अन्कीया या डिलीट करने के लिए ध्यान करना है. ऐसी परम्पराओं का ध्यान असल में उनकी सांसारिक याचना का ही आंतरिक और मानसिक अभ्यास होता है. जैसे ये बाहर याचना करते हैं वैसे ही भीतर भी इश्वर से प्रार्थना करते हैं कि उनकी हार्ड डिस्क की मेमोरी उड़ा दे या डिस्क फोर्मेट कर दे. इसी को मुक्ति कहते हैं. अब एक और मजा देखिये ये हार्ड डिस्क पूरी तरह संस्कारों स्मृतियों और अस्मिता से मुक्त होने के बावजूद एक व्यक्तिव की तरह मुक्ति को अनुभव करती है. ये बड़ी गजब की जलेबी है जो सिर्फ ब्राह्मणी सिद्धांतकार ही बना सकते हैं.

    आत्मा मुक्त होकर भी एक व्यक्ति के रूप में मुक्ति का आनन्द भोगती है और परमात्मा भी वहीं बगल में जमे रहते हैं. मतलब कि दो केंद्र जो पहले थे वे अब भी उसी ठसक के साथ बने हुए हैं और मुक्ति या आजादी भी घटित हो गयी. ये गजब की जलेबी है.

    हालाँकि ब्राह्मणी परंपरा भी उपर उपर ये जरुर कहती है कि ‘मैं और मेरे’ से या आत्मभाव से मुक्ति ही मुक्ति है. लेकिन ऐसी श्रमण अर्थ की भौतिकवादी मुक्ति की सलाह और टेक्नोलोजी को चुराते हुए भी वे आत्मा को जमीन में खूंटे की तरह स्थिर रखते हैं. जबकि बुद्ध कहते हैं कि आपके व्यक्तिव या स्थाई मन या शरीर जैसा कुछ नहीं है. थोड़ा विश्राम लेकर इसे देख समझ लो. मन को देखो शरीर को देखो कि कैसे रोज बदलता है. इस तरह एक केंद्र का आभास सहज ही टूट जाता है. यही आजादी है या निर्वाण है जो होश के साथ रोज इंच इंच बढ़ता है.

    लेकिन दुर्भाग्य ये है कि हमारे आसपास के लोग ब्राह्मणी धारणा के प्रभाव में आत्मा और परमात्मा को सनातन मानते हैं और आँख बंद करके इस आत्मा और परमात्मा को खोजते हैं. एक खालीपन या अनुपस्थिति की तरफ ले जाने वाली कोई भी विधि उनपर काम नहीं करती क्योंकि दो दो सनातन सांड उनके मन में दंगल कर रहे होते हैं. इन सांडों को लड़ाने वाली परंपरा भी अंतिम रूप से यही कहती है कि अंत में आत्मा परमात्मा नहीं बल्कि कोरा निराकार बच रहता है वही परम समाधान है.

    लेकिन वहां तक जाने की पहली शर्त ही वे पूरी नहीं होने देते और निराकार की बजाय दो दो आकारों में और लाखों साल के अतीत और भविष्य में इस तरह उलझाते हैं कि आदमी आँख बंद करके निरंतर बदलते शरीर और मन की क्षणभंगुरता की बजाय इन दो सनातन केंद्र को खोजने लगता है.

    इस तरह ब्राह्मणी परंपरा जो ध्यान की जो विधि सिखाती है और इसका जो लक्ष्य बताती है उनमे भारी विरोध है. आत्मा को सनातन बताती है और आत्मभाव से मुक्त होने को मुक्ति बताती है. अब अगर आत्मा सनातन है तो आत्मभाव भी सनातन ही हुआ ना? उससे कैसे छुटकारा होगा? इसी उलझन को कम करने के लिए वे काल्पनिक इश्वर को खड़ा करते हैं कि इसकी कृपा से सब हो जाएगा, श्रृद्धा रखो.

    बुद्ध कहते हैं कि ये दोनों सांड – आत्मा और परमात्मा हैं ही नहीं. शरीर मन और इनके समुच्चय रूप इस आभासी मैं की सत्ता भी निरंतर बदल रही है और इसे जानने वाला यह होश भी निरंतर बदल रहा है इस तरह एक बदलने वाली चीज दूसरी बदलने वाली चीज को जान रही है इसलिए कोई खूंटा या केंद्र है ही नहीं. इनके बीच में ज्ञान की प्रक्रिया चल रही है जो खुद भी बदलती जाती है. इसीलिये तटस्थता या उपेक्षा या आजादी संभव है. इस तरह बुद्ध को ठीक से समझें तो अनत्ता ही ध्यान है, यही शुन्य है और यही मन और शरीर को अपनी ही काल्पनिक कैद से आजाद और निर्भार करने वाली वास्तविक उपेक्षा या आजादी है.

  • अंत की शुरूआत

    Kumar Vikram

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    अंत में उसने कहा था
    कि अंत में सब ठीक हो जाएगा
    अंतत: सबक़ा भला होगा
    मैंने सोचा था
    अंत अंत में ही आएगा
    मुझे यह इल्म नहीं था
    कि अंत दरअसल
    एक रोज़ाना ख़बर थी
    और अंत अंत में नहीं
    बल्कि हर पल
    आने वाले अंत की
    एक बानगी दिखाता जाएगा
    शायद मेरी ही तरह
    उसे भी यह अंदाज़ा नहीं था
    कि वह जिस अंत की बात कर रहा था
    वह दरअसल अंत नहीं
    बल्कि अंत की सिर्फ़ शुरूआत थी।

     

  • समाजवादी पार्टी वाले “समाजवादियों” के लिए

    Vivek “सामाजिक यायावर”

    जब से उत्तर प्रदेश के चुनाव में समाजवादी पार्टी की पराजय हुई है तब से अधिकतर समाजवादी फेसबुक में आंय बांय सांय बोले जा रहे हैं। कोई अखिलेश यादव को दोष देता है, कोई अवसरवादी युवाओं व नेताओं को दोष देता है, कोई चाटुकारों को दोष देता है। आरोप प्रत्यारोप का संगम चल रहा है। मैंने सोचा कि मैं भी विचारक के रूप में अपनी खरी-खरी बात रख दूं भले ही मैं समाजवादी पार्टी का सदस्य नहीं हूं। इसी बहाने समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों की सहिष्णुता व अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य वाले मूल्य पर उनकी आस्था व समझ का भी कुछ आकलन हो जाएगा।

    आपको अटपटा लग रहा होगा कि मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादी क्यों लिख रहा हूं। वह इसलिए कि जैसे भारतीय वामपंथी पार्टी का होने का मतलब वामपंथ की समझ या वामपंथी होना नहीं होता, जैसे बहुजन समाज पार्टी का होने का मतलब बहुजन होना या बहुजन के प्रति प्रतिबद्ध होना नहीं होता जैसे भारतीय जनता पार्टी का होने का मतलब हिंदूत्व की समझ रखने वाला या हिंदू होना नही होता बिलकुल वैसे ही समाजवादी पार्टी का होने का मतलब समाजवादी होना नहीं होता। लेकिन चूंकि ऐसा माना जाता है, प्रचलन में आ गया है इसलिए मैं समाजवादी पार्टी वाले समाजवादियों कह रहा हूं।

    आप लोगों की प्रतिक्रियाओं से ऐसा प्रतीत हो रहा है मानो आपको पराजय बर्दाश्त नहीं हो पा रही है। आपमें से बहुत लोग यह कहते हैं कि उन्होंने समाजवादी पार्टी की सरकार से कभी कुछ नहीं लिया। मेरा कहना है कि भले ही आपने पार्टी की सरकार से कुछ नहीं लिया हो लेकिन आपकी पार्टी की सरकार होना ही आपके अंदर मनोवैज्ञानिक आत्मविश्वास, प्रसन्नता व भावनात्मक आवेग आदि बनाए रखता है। इसलिए कौन कितना मलाई खाया, कौन कितना किसके चिपका रहा इत्यादि बातों का कोई विशेष मायने नहीं।

    मायने यह रखता है कि जो नुक्ताचीनी आप अब निकाल रहे हैं वह नुक्ताचीनी आपने पार्टी के सरकार में पांच साल रहते हुए क्यों नहीं की। मान लिया जाए कि आपने की भी तो पूरी शिद्दत से लगातार क्यों नहीं की। अपने भीतर गहराई में झांकिए, यदि थोड़ी सी भी दृष्टि होगी तो उत्तर आपको मिल जाएगा।

    मैं तो यही सुझाव दूंगा कि नुक्ताचीनी निकालना बंद कर दीजिए। जमीन पर उतरिए या जो जमीन पर उतरें हों उनके साथ बिना छल व धोखे व हिडेन-एजेंडे के साथ खड़े होइए बिना शर्त। यदि ऐसा न कर पाइए तो अपनी रोजी-रोटी पाइए, भविष्य में जब यदि कभी समाजवादी पार्टी की सरकार बनती है तो फिर समाजवादी बन लीजिएगा। इतना करने में आखिर मुश्किल क्या है, कठिनाई कहां है। बहुत सरल है।

    Akhilesh Yadav

    आपमें से बहुत लोग सोशल मीडिया के माध्यम से अखिलेश यादव को यह बताने में लगे हैं कि उन्होंने किस पर विश्वास करके गलती किया, फलां किया ढिका किया वगैरह-वगैरह। दूर से आलोचना करना बहुत आसान है। लेकिन जब सत्ता हाथ में होती है तब लोगों व लोगों की मानसिकताओं को फिल्टर कर पाना बहुत ही मुश्किल होता है। यह भी तो संभव है कि यदि आप अखिलेश यादव से चिपके होते तो आपका भी चरित्र सत्ता ग्लैमर के कारण वैसा ही हो गया होता जैसा कि उन लोगों का हुआ जिनके चिपकने को आप आज नाजायज ठहरा रहे हैं।

    चुनावी धींगामुस्ती में किसके क्या बयान थे, यह सब यदि छोड़कर ईमानदारी से बात की जाए तो यह मानना पड़ेगा कि अखिलेश यादव ने काम किया और काम करने का प्रयास किया। मैं समाजवादी पार्टी व उसके लोगों की बात नहीं कर रहा हूं। मैं सिर्फ और सिर्फ अखिलेश यादव की बात कर रहा हूं।

    यदि नाजायज लोगों के चिपके होने के बावजूद अखिलेश यादव बेहतर सोच रख पाते हैं, बेहतर काम करने के लिए प्रयास कर पाते हैं। तो इसका मतलब यह है कि उन पर किसी के चिपके होने का कोई खास अंतर नहीं पड़ता। राजनैतिक त्रुटियां किससे नहीं होती हैं। सभी से होती हैं। राजनीति में हार जीत चलती रहती है। राजनीति में हारना या जीतना उतना महत्वपूर्ण नहीं होता जितना कि अपने नेता पर विश्वास रखना और हार में भी साथ खड़े रहना।

    यदि आपको यह लगता है कि हार के जिन कारणों का विश्लेषण आप कर पा रहे हैं वह अखिलेश नहीं कर पाने में सक्षम नहीं हैं। तब अखिलेश यादव को अपने नेता के रूप में मानने का मतलब ही क्या रहा जाता है। जमीनी कार्यकर्ताओं के बारे में समझ धक्के खाने, धोखे खाने के बाद आती है। जो नेता अपनी हार के कारणों का विश्लेषण न कर पाए। जो नेता अपनी हार से सीख न ले पाए। यदि आपकी दृष्टि में अखिलेश यादव हार के कारणों का विश्लेषण कर पाने में, हार से सीख ले पाने में सक्षम नहीं तो आपके द्वारा उनको नेता के रूप में स्वीकारने का कोई मतलब नहीं रह जाता है।

    ऐसा भी नहीं है कि आप पूरे प्रदेश के हर एक गांव की जमीनी हकीकत से वाकिफ हैं। ऐसा भी नहीं है कि आपने जमीन में बहुत बड़े काम किए हैं, लोगों के लिए भीषण संघर्ष किए हैं, जिनके कारण आपमें विशिष्ट क्षमता आ गई है घर बैठे जमीनी कारणों व हकीकत को समझने का। आप सिर्फ तार्किक व आवेगात्मक कयास लगा रहे हैं जिसे आप हार के कारणों के विश्लेषण का नाम दे रहे हैं।

    मूलभूत प्रश्न यह है कि आप अपने स्तर पर भरपूर ऊर्जा के साथ पांच वर्षों तक क्या करते रहे? आपने लोगों की मानसिकता अपने स्तर पर विकसित क्यों नहीं की। घर में बैठे-बैठे पोस्ट-अपडेट करने को जमीनी संघर्ष व योगदान मानने की उथली मानसिकता से तो आप बाहर निकल नहीं पा रहे हैं, किंतु अखिलेश यादव को बताना चाहते हैं कि वे क्या करें या न करें। यदि आपको विश्वास है कि अखिलेश यादव ने लोगों के लिए बेहतर काम करने का प्रयास किया तो उन पर विश्वास कीजिए। उनके साथ खड़े होइए। यदि आपको लगता है कि अखिलेश ने कोई काम नहीं किया, तो ऐसे नेता के पीछे समय व ऊर्जा बर्बाद करने का कोई औचित्य नहीं।

    आप हार को इस रूप में भी तो देख सकते हैं कि अखिलेश को जमीनी हकीकत से रूबरू होने का अवसर मिलेगा। जमीनी कार्यकर्ताओं के प्रति उनकी दृष्टि व समझ अधिक स्पष्ट होगी। यदि आपको लगता है कि आप बेहतर हैं, आप अधिक सक्षम हैं तो आपको अपनी पार्टी की कमान संभालनी चाहिए। मेरी समझ में आपकी यह बात समझ न आ रही कि सत्ता में न रहने, लोगों के लिए जमीनी पर रहते हुए संघर्ष करने से इतनी बेचैनी क्यों?

    आप तो भाजपा की तरह प्रयोगधर्मी व इच्छाशक्ति के धनी भी नहीं हैं कि आडवाणी जी को किनारे लगाकर मोदी जी को ले आवें। बिना किसी का चेहरा आगे किए हुए लहलहाते हुए सत्ता प्राप्त कर लें और आदित्यनाथ जी को मुख्यमंत्री बना दें और कोई चूं तक न करे उल्टे शान में रुदालियों व भांटों की तरह कसीदें पढ़ना शुरू कर दें।

    भाजपा तो समाजवादी होने का दावा नहीं करती फिर भी उसके कार्यकर्ता बिना मुंह बिचकाए बिलकुल जमीन पर घिसटते हुए अपनी पार्टी का प्रचार करते हैं। समाजवादी पार्टी तो समाजवादियों की पार्टी है फिर कार्यकर्ताओं को जमीन पर घिसटते हुए पार्टी का प्रचार करने में क्या झिझक। सत्ता किसी भी पार्टी की हो, सत्ता से सटे हुए लोग कमोवेश वही होते हैं। इसलिए कौन सत्ता से कैसे सटा है, से नहीं, जमीनी प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं की लगातार की मेहनत से पार्टियां सत्ता तक पहुंचती हैं।

    खुलेमन से स्वीकारिए कि भाजपा ने मेहनत की, लोगों का माइंडसेट को अपने फेवर में करने में कामयाब रही। कारण चाहे जो भी रहे हों लेकिन लोगों को यह लगा कि समाजवादी यादवों की पार्टी है इसलिए अधिकतर पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी से दूर हो गईं। इस जमीनी तथ्य का अखिलेश यादव से कुछ लोग कितना सटे रहे से कोई मतलब नहीं। हां यह आपकी व्यक्तिगत खुन्नस का विषय जरूर हो सकता है। वैसी ही खुन्नस जैसी कि पिछड़ी जातियां समाजवादी पार्टी के सत्ता पर आने से यादवों के व्यवहारों के कारण यादवों से रखने लगतीं हैं।

    यदि हो सके तो अपने स्तर पर समाजवादी पार्टी को मजबूत कीजिए। हर जाति के लोगों का दिल जीतिए। समाज के लोगों को लगे कि समाजवादी पार्टी उनकी अपनी पार्टी है। अब वे जमाने लद गए जब आपने बिना वास्तविक जमीनी आधार वाले किसी बेहूदे आदमी को उठाकर पद दे दिया और सोच लिया कि अब उस आदमी की जाति के सारे लोग लहालहा कर आपके साथ खड़े हो जाएंगें।

    भविष्य में विजय प्राप्त करना आसान नहीं। रगड़ना पड़ेगा खुद को, तपाना पड़ेगा खुद को, जमीन पर लोगों के बीच। वास्तविक जनाधार वाले नेताओं से डरिए नहीं, उनको साथ जोड़िए, तालमेल बनाइए, साझेदारी कीजिए, हिस्सेदारी दीजिए। हर स्तर पर साझा करना सीखिए, हर स्तर पर हिस्सेदारी देना सीखिए।

    यदि आपको लगता है कि आप सही हैं लेकिन आपका नेता अक्षम है, दृष्टिहीन है, कान का कच्चा है तो बदल दीजिए अपने नेता को। किंतु यदि आपको लगता है कि आपका नेता गुणी है तो उस पर विश्वास कीजिए, नुक्ताचीनी की बजाय उसके निर्णयों के साथ खड़े रहिए इस विश्वास के साथ कि आपका नेता भी कारणों का विश्लेषण करने में कम से कम उतना सक्षम है जितना कि आप हैं।

    चलते चलते एक बात बताना चाहता हूं, भाजपा आपके एजेंडे तय करती है। भाजपा जिस चुनावी रणनीति का प्रयोग आज करती है आप उस रणनीति का प्रयोग कल करते हैं जबकि भाजपा कल एक नई रणनीति के साथ चुनाव में अपना परचम लहरा रहा होती है। आपको भाजपा का अनुसरण करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा का प्रतिरोध करने की जरूरत नहीं, आपको भाजपा के एजेंडों के विरोध में अपने एजेंडे तय करने की जरूरत नहीं। ऐसा करके तो आप भाजपा को और अधिक मजबूत ही करते हैं।

    आप अपने एजेंडे खुद तय कीजिए जो आम लोगों के अपने एजेंडे हों। आप सत्ता में आएं या न आएं लेकिन एजेंडे अपने रखिए। भाजपा चुपचाप 10 साल सत्ता से बाहर रहकर भी अपने एजेंडे में काम करती रहती और एक दिन अचानक पूरे देश में कब्जा कर लेती है।

    धैर्य, रणनीति, जमीनी संगठन व प्रतिबद्ध कार्यकर्ता यह चार भाजपा के मूलभूत विजयी तत्व हैं। आप इन चारों में कमजोर हैं।

    पार कैसे लगेगा यह सोचने की बजाय आप तो आपसे में ही छीछालेदर करने में लिप्त हैं। अब मर्जी आपकी, आप मुझे चाहे गरिया लें या मेरी बातों पर मनन कर लें। आपकी अपनी समझ, आपकी अपनी खुशी।

    शुभकामनाओं सहित,

    सामाजिक यायावर

  • जामुन का भूत

    Shayak Alok

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    यह अजब कहानी है. कोई दलित मरा है तो उस दलित के मर कर भूत हो जाने की कहानी उसी वर्ग की तरफ से (कानी बुढ़िया) फैलाई गई है. (प्रतिरोध ने मिथक रच लिया है क्योंकि मिथक अंधाधुंध समर्थन के लिए मनोवैज्ञानिक काम करता है). और अब यह भूत सत्ता के सब प्रतीकों पर हमला कर रहा है. पहले उसने किसी प्रतीक में आर्थिक शोषण तंत्र (साहूकार) को पटका और फिर उसे पवित्र घोषित करने वाली ब्राह्मणवादी व्यवस्था (राम नारायण पंडित) को, जिसका उससे नेक्सस है. यह नेक्सस न केवल आर्थिक शोषण तंत्र को धार्मिक नैतिकता प्रदान करने में है बल्कि ब्राह्मण वर्ग खुद भी सदियों से आर्थिक शोषण का प्रकट भागीदार है (उसके बाप के बाप ने). यह कविता फिर एक हमला उस विडंबना पर कर देती है जहाँ जिंदा नंगे भूखों का कोई महत्व नहीं, लेकिन मृत पत्थर प्रतीकों को किसी अलौकिक भय से पूजा जाता है (गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत हर शनिवार को खाता है बताशे ). विमर्श का उत्थान यह है कि अफवाह से उभारा गया यह नायक या यह प्रतिरोध केवल हमलों तक सीमित नहीं है बल्कि अपने शोषित वर्ग के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना भी करने लगा है. यह स्थापना उस वर्ग का भय दूर करने और उसे साहस देने में प्रकट है (नहीं डरती चंपा). और अंत में कविता चुनावी लोकतंत्र के संक्रमण पर हमला कर देती है जहाँ यह नग्न खुलासा कर देती है कि एक शोषित वर्ग के उभार के विरुद्ध सामाजिक-आर्थिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता के बीच एक गठजोड़ हो जाता है (भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए). मैंने यहाँ भारतीय संदर्भ का वास्तविक पाठ ही लिया है जहाँ शोषितों के किसी प्रतिरोध आंदोलन को शोषितों के विरुद्ध ही प्रस्तावित कर सरकारें उनके दमन का तर्क ढूंढती हैं. एक अजीब बात और हुई है कि प्रेमचंद की कई कहानियों के विवश व नैसर्गिक व सुरंग-बंद अंत की तरह यह कविता यूँही समाप्त नहीं होती और एक संभावना, एक रौशनी का संकेत देती है कि जामुन का भूत नया जामुन ढूंढ सकता है.

    [themify_hr color=”orange” width=”300px”]

    जामुन का भूत

    किसी गाँव में जब गोबर नाम का दलित मरा तो भूत हो गया
    तो वह भूत रहने लगा उसी गाँव के बँसवारी में
    पहलेपहल तो यह बात कानी बुढ़िया ने कही और
    फिर किस्से शुरू हो गए.

    एक दिन जब गोबर ने उठा पटक मारा बगल गाँव के सुखला साहूकार को
    और उसका बटुआ भी छीन लिया तब तो बड़ा हंगामा हुआ
    सुखला का गमछा पाया गया गाँव से दो कोस दूर
    ऐसा बिछा हुआ जैसे गोबर ही उस पर सुस्ताने दो दम मारा हो.

    तो तय यह पाया गया कि हाथ पैर जोड़ कर बुला लिया जाय रामनारायण पंडित को
    और खूब जोर से कच्चे धागे से बंधवा दिया जाए उस नासपीटे जामुन को
    जामुन जो बँसवारी का अकेला ऐसा पेड़ था जो बांस नहीं था.

    लेकिन उसी रोज रात में घटी एक और घटना
    ‘न देखा न सुना’ – कहती है रामजपन की माई भी
    बिशो सिंह के दरवाजे सत्तनारायण संपन्न करा के लौट रहे रामनारायण पंडित को
    बँसवारी के आगे धर दबोचा गोबर ने
    और ऐसा भूत मन्त्र मारा कि गूंगे हो गए बेचारे
    बोलते हैं तो सिर्फ चक्की के घिर्र घिर्र की आवाज़ आती है.

    कहते हैं कि गोबर के दोमुंहे पुराने घर थी ऐसी ही एक चक्की जो
    उसके बाप ने अपने बाप के श्राद्ध में रामनारायण को गिरवी बेचा था.

    खैर जामुन के भूत को बाँध दिया गया और गोबर से शांत रहने की प्रार्थना की गई.

    गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत
    हर शनिवार को खाता है बताशे
    कभी भूख बढ़ने पर जन्मते ही खा जाता है मवेशियों के बच्चे
    अपने साथी भूतों के भोज के लिए एक दिन जला डाला मुर्गों का दड़बा
    चबाई हड्डियाँ डोभे में फेंक दी.

    गोबर के भूत ने न्याय भी लाया है गाँव में
    मुंह अँधेरे अब शौच जाने से नहीं डरती चंपा
    हर महीने सरसतिया के जिस्म पर आने वाला भूत अब नहीं आता
    गुनगुनाते हुए बड़े दालान से गुजर लेती है अठोतरी.

    सुना है गोबर अन्य भूतों संग रोज रात को बँसवारी में करता है बैठकें
    हंसने और जोर जोर से बतियाने की आवाज़ आती है.

    टीवी पर जब से आई है गोबर की कहानी
    सरकार फिक्रमंद है आम जान माल को लेकर
    भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए
    इसलिए सेना निपटेगी उनसे लोकसभा चुनाव के पहले पहल.

    मजे में जी रहे जामुन के भूत को दूसरा जामुन ढूंढना होगा.

    .

  • समझदारों की समझ

    Bhanwar Meghwanshi
    संपादक – शून्यकाल

    [themify_hr color=”red”]

    एक सेकुलर ने
    दूसरे सेकुलर को
    सेकुलरिज्म समझाया
    दूसरे को समझ में आ गया
    हालाँकि दोनों ही
    पहले से समझे हुए थे ।

    एक लोकतंत्र समर्थक ने
    दूसरे जम्हूरियत पसन्द इंसान को
    डेमोक्रेसी पर सहमत किया
    सहमति बन गयी
    क्योकि उनमे पहले से ही
    सहमति थी ।

    एक साम्राज्यवाद विरोधी ने
    दूसरे फासीवाद विरोधी को
    इंक़लाब भेजा।
    लौट आया तुरंत ही
    इंक़लाब,
    इस तरह देर तक
    गूंजते रहे
    इंक़लाब ज़िंदाबाद के नारे ।

    एक साम्यवादी ने
    दूसरे समाजवादी से की बात
    बात समझ गए दोनों
    बात बन गई
    इस तरह चलती रही
    जीवन भर बातें ही बातें ।

    एक एक्टिविस्ट ने
    दूसरे ग्रासरूट वर्कर से
    साझा किया
    एक्शन प्लान,
    करने लगे वे
    मिल कर काम
    करने के सिवा उन्हें
    कुछ भी नहीं था पता
    इसलिए करते रहे
    जीवन भर काम ।

    एक से दस तक
    दस से पचास तक
    एक ,दो ,तीन दशक
    लगभग आधी सदी तक
    वे सब मिलते रहे
    आपस में,
    करते रहे बातें
    पिलाते रहे भाषण
    एक दूसरे को।

    बेहद समझदार लोग थे
    हद दर्जे के समझदार
    नासमझी की हद तक पहुंचे
    वे समझदार लोग।

    ताज़िन्दगी उन्होंने
    सहमत लोगों को
    और सहमत किया।
    समझे हुओं को
    और समझाया।

    फासीवाद,ब्रह्मनवाद,
    साम्राज्यवाद,अन्धराष्ट्रवाद
    अधिनायकवाद, धर्मनिरपेक्षवाद
    जैसे भारीभरकम शब्द
    अलापते रहे।

    जन के बीच गये ही नहीं
    पर जनता के नाम पर
    किये सारे काम ।

    अंततः
    ड्राईंग रूमो ,सभा ,सम्मेलनों,
    सेमिनारों ,अकादमिक बहसों ,रिसर्चों
    तक सिमट गए।

    फिर वे सिरे से सहमत,
    निरे समझदार लोग
    एक दिन इतिहास बन गए,
    उनके धुर विरोधी
    सत्ता पर काबिज़ हो गए।
    और उन्होंने इतिहास ही
    बदल डाला।
    इस तरह वे स्मृति शेष
    हो गए।

    समझदारों का यह खेल
    आज भी जारी है ।
    उन्हीं पचास लोगों को
    पचास लोगों द्वारा
    पचास वर्षों से
    पचास बातों के ज़रिये
    कन्विन्स किया जा रहा है।
    ऑलरेडी कन्विन्स लोग
    फिर से कन्विंस हो रहे है।

    अन्ततः जब सब समझे हुयों ने
    पहले से ही समझदारों को
    और भयंकर समझा दिया।
    तो जाहिर है कि
    सबको समझ में भी
    आ ही गया।

    हालाँकि जिनको समझना था
    वे आज तक नहीं समझे।
    जिन पर समझाने की
    ज़िम्मेदारी थी
    वे खुद नहीं समझ पाये
    कि समझाना क्या है ?
    तो क्या खाक समझाते वो?

    .

  • बूचड़खाने –

    25-30  साल पहले तक तो किसानों के लिए पशु-पालन कोई मुश्किल काम न था , पशुओं के लिए बड़े चारागाह छोड़े जाते थे, उसी में तालाब भी खुदवाएं जाते थे। पशु चरते, तालाब कीचड़ आदि में आराम फरमाते। दुधारू पशु समय पर अपने खूंटे तक भी पहुँचना समझते थे। किसान ने बाजारों से दूरी बनाई हुई थी। आपसी ताल मेल और निर्भरता इतनी बेहतर थी की मशीनरी आदि की जरुरत भी महसूस न होती थी।  खाने के लिए पैदा किया , पैदा कर के खाया यही क्रम चलता रहता था, पैदा भी जरूरत से बहुत ज्यादा नहीं किया जाता था।

    मुद्रा के बिना  लोगों का काम आराम से चलता रहता था , इन सब में खुद के लिए भी खूब समय बच जाता था लेकिन जिस समाज में बाज़ार  मेहनतकश और उत्पादक वर्ग के शोषण करने के लिए तैयार किया गया हो तो वह वर्ग इसकी चपेट में कैसे न आता। आपको शिक्षा, कपडे, भोजन , चिकित्सा , सुविधाएं आदि सब बाजार से खरीदना है। अगर यही सब आधुनिकता है तो किसान वर्ग क्यों न होड़ करता, आधुनिकता में वह क्यों न फँसता !

    आज की तारीख में घास के मैदान नहीं है, तालाब नाममात्र के बचे है। पशुपालन एक आदमी के दिन रात का काम है उन्हें पानी पिलाना होता है, चारे की व्यवस्था करनी होती है, दूध समय पर दुहना होता है आप किसी भी काम में नागा नहीं कर सकते। खल चौकर की व्यवस्था भी बाहर से ही करनी है। किसानों को खेती से पैसे हाथों हाथ नहीं मिलते उसके लिए फसल पकने व उसके बिकने तक का इंतजार करना होता है। दैनिक जरूरतों को पूरा करने के लिए वह दुधारू पशुओं पर निर्भर है जिनका दूध बेच कर उसे आय होती रहती है। पशुओं का और उसके परिवार के छोटे मोटे खर्च निकलते रहते है। मोटा मोटा इतना समझ लीजिए आज की तारीख में अगर आप 30-40 हजार की नौकरी करते है, शहर में रहते है आप एक गाय या भैंस जो दुधारू भी हो के रहने-खाने का खर्च नहीं उठा सकते।

    किसान भी जो पशु पुराने हो जाते है, दूध नहीं दे पाते , बीमार हो जाते है उन्हें निकालते रहना होता है। पशुओं की संख्या भी बढ़ती है जगह के हिसाब से उनकी संख्या भी मेंटेन करके रखनी होती है। कई बार अचानक किसी पारिवारिक जरूरत के लिए पशु बेचने होते है।

    अब आप बताइये एक किसान बूढ़े बीमार पशुओं का क्या करेगा, पैसे के बिना नए पशु कहाँ से खरीदेगा। ऐसा तो है नहीं की आप वापिस पुराने तौर तरीकों पर लौटने के लिए किसानों की मदद कर रहे हो। आपकी कोरी धार्मिक भावुकता, चूतियापे में तो पशुओ के रेट गिर जाते है, उन्हें ग्राहक नहीं मिलते लेकिन पहले से ही आधुनिक होने की छटपटाहट , बाजार से ताल मेल करने के सहर्ष में जुटे किसानों की इन क़दमों  से जो कमर टूटती है, मानसिक उत्पीड़न होता है वह क्या करे !

  • स्त्री मातृभूमि और राष्ट्रवाद –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    [themify_hr color=”red”]

     

    स्त्री का माता
    माता का मातृभूमि
    और मातृभूमि का
    राष्ट्र बन जाना
    गजब की छलांग है ना?

    जैसे नथनी की नकेल चढ़ी नाक के नीचे
    अचानक मूंछें उग जाएँ
    खाप के ताऊ जैसी

    जैसे सिंदूर की लक्ष्मण रेखा के बराबर से
    अदृश्य सी सीमा खिंच जाए
    लाइन ऑफ़ कंट्रोल जैसी

    जैसे घूंघट के जीने पर्दे से सटकर
    कोई लंबी सी दीवार खड़ी हो जाये
    बर्लिन की दीवार जैसी

    स्त्री की माँ होने की
    या मातृभूमि की राष्ट्र होने की यात्रा
    क्या इसी ढंग से होनी जरूरी है?

    क्या स्त्री का माँ हो जाना
    और मातृभूमि का राष्ट्र बन जाना
    धर्म या भगवान रूपी पिता को
    स्त्री, माता और भूमि तीनों पर
    अतिरिक्त अधिकार नहीं दे देता?

    सच तो ये है कि एक स्त्री से
    उसके स्त्री होने का अधिकार छीनने के लिए ही
    मातृत्व और माँ की महिमा रची जाती है
    भूमि के आँचल पर दावा करने के लिए ही
    मातृभूमि और रक्षा के आदर्श रचे जाते हैं

    और इन आदर्शों को संरक्षण देने के लिए
    राष्ट्र और राष्ट्रवाद का अवतार धरे
    वही सनातन धूर्त – परमात्मा और धर्म
    बार बार साकार होते हैं

    स्त्री, माता और मातृभूमि
    तीनों को काबू रखने के लिए
    हर युग में, हर दौर में …

  • राष्ट्रवाद-देशभक्ति पर जुनून का झंझावत

    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay

    [themify_hr color=”red”]

     

    दिल्ली के रामजस कॉलेज में हुए विवाद, जिसके चलते उमर खालिद को वहां इस आधार पर भाषण नहीं देने दिया गया कि उन्होंने राष्ट्र-विरोधी नारे लगाए थे, के बाद कई लोगों, जिनमें जानेमाने गायक अभिजीत भट्टाचार्य शामिल हैं, ने अभाविप का समर्थन किया है। पिछले साल की नौ फरवरी से, षासक दल की राजनीति से असहमत व्यक्तियों पर राष्ट्र-विरोधी का लेबल चस्पा करने का सिलसिला जारी है। ऐसे लोग विशेषकर निशाने पर हैं जो ‘कश्मीर-समर्थक’ और ‘भारत-विरोधी’ नारे लगाते हैं। किसी क्षेत्र के लिए स्वायत्तता की मांग करना, अलग राज्य की मांग उठाना या इनके समर्थन में नारे लगाना, हमारे संविधान की दृष्टि में क्या राष्ट्र-विरोध है?

    देश के सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर पूर्व में विचार किया है। खलिस्तान के नाम से एक अलग सिक्ख देश की मांग के समर्थन में नारे लगाने को उच्चतम न्यायालय ने राष्ट्रद्रोह मानने से इंकार कर दिया था। इसके पहले, सन 1962 में, केदारनाथ बनाम बिहार शासन प्रकरण में अपने निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने कहा था कि देशद्रोह का अभियोग उसी व्यक्ति पर लगाया जा सकता है, जो ‘‘ऐसा कोई कार्य करे, जिसका उद्देश्य अव्यवस्था फैलाना, कानून और व्यवस्था को बिगाड़ना या हिंसा भड़काना हो।’’

    इसी तरह, उच्चतम न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश मार्कंडेय काटजू के अनुसार ‘‘आज़ादी इत्यादि की मांग करना और उसके समर्थन में नारे लगाना तब तक अपराध नहीं है जब तक कि कोई व्यक्ति इससे आगे जाकर 1) हिंसा करे, 2) हिंसा आयोजित करे या 3) हिंसा भड़काए।’’

    स्पष्ट है कि अभाविप-आरएसएस की इस मुद्दे पर सोच, देश के कानून के अनुरूप नहीं है और ना ही भारतीय संविधान के मूल्यों से मेल खाती है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के मामले में पुलिस ने कन्हैया कुमार, उमर खालिद और उनके साथियों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार तो कर लिया परंतु आज तक वह न्यायालय में उनके खिलाफ अभियोगपत्र दाखिल नहीं कर सकी है। यह ज़रूरी है कि हमारे पुलिसकर्मी, देश के कानून से अच्छी तरह से वाकिफ हों। आश्चर्यजनक तो यह है कि कई वरिष्ठ भाजपा नेताओं, जिनमें केन्द्र और राज्य सरकारों के मंत्री शामिल हैं, ने भी इसी तरह की बातें कहीं हैं।

    भारत के सीमावर्ती इलाकों जैसे उत्तरपूर्व, तमिलनाडु, पंजाब और कष्मीर में समय-समय पर इन क्षेत्रों को अलग देश बनाए जाने की मांग उठती रही है। कई राजनीतिक दलों ने भी इस तरह की मांग का समर्थन किया है और उसके पक्ष में नारे बुलंद किए हैं। राज्यसभा में द्रविड़ नायक और द्रविड़ मुनित्र कषगम के सर्वोच्च नेता सीएन अन्नादुरई ने तमिलनाडु को देश से अलग किए जाने की मांग की थी। इस तरह की बातें स्वाधीनता के बाद से ही देश में कही जा रही हैं परंतु हाल के कुछ वर्षों में इन्हें राष्ट्र की एकता के लिए खतरा बताया जाने लगा है।

    इसका मुख्य कारण है संघ परिवार की विचारधारा। यह विचारधारा, भारतीय राष्ट्रवाद की उस अवधारणा से सहमत नहीं है, जो राष्ट्रीय आंदोलन से उभरी। संघ परिवार, हिन्दू राष्ट्रवाद का हामी है। भारत में राष्ट्रवाद की अवधारणा का विकास उस दौर में हुआ जब हम पर अंग्रेज़ों का शासन था। एक ओर था भारतीय राष्ट्रवाद, जो समावेशी था तो दूसरी ओर थे मुस्लिम और हिन्दू राष्ट्रवाद, जो अपने-अपने ढंग से अतीत का प्रस्तुतिकरण करते थे।

    भारतीय राष्ट्रवाद, भारत के भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले सभी लोगों को भारतीय मानता है और उनकी सांझा परंपरा और संस्कृति पर ज़ोर देता है। गांधीजी की पुस्तक ‘हिन्द स्वराज’ और जवाहरलाल नेहरू रचित ‘भारत एक खोज’, भारत के इतिहास को धर्म से ऊपर उठने का इतिहास बताती हैं। मुस्लिम राष्ट्रवादियों का मानना था कि आठवीं सदी ईस्वी में सिन्ध में मोहम्मद-बिन-कासिम के अपना शासन स्थापित करने के साथ भारत में मुस्लिम राष्ट्रवाद का उदय हुआ। उनका कहना था कि मुसलमान इस देश के शासक रहे हैं और वे ही इसके असली मालिक हैं। हिन्दू राष्ट्रवादी इससे कहीं पीछे जाकर अपने को आर्यों का वंशज बताते हैं और यह साबित करने की कोशिश करते हैं कि यह देश हमेशा से हिन्दू रहा है और हिन्दू ही यहां के मूल निवासी हैं। इसी को साबित करने के लिए शंकराचार्य ने भारत भूमि के चारों कोनों पर मठों की स्थापना की थी। इतिहास के ये दोनों ही संस्करण, समाज को स्थिर और अपरिवर्तनशील मानते हैं। वे उत्पादन के साधनों में परिवर्तन और अलग-अलग साम्राज्यों के उदय के देश पर प्रभाव को नजरअंदाज करते हुए, पूरे इतिहास को एक रंग में रंगने पर आमादा हैं।

    यूरोप में राष्ट्रवाद की अवधारणा की शुरूआत, औद्योगिक समाज के उदय और आधुनिक शिक्षा व संचार के साधनों के विकास के साथ हुई। एक भौगोलिक क्षेत्र में रहने वाले लोग स्वयं को राष्ट्र-राज्य बताने लगे। भारत का इतिहास, पशुपालक आर्यों से शुरू होकर कृषि-आधारित राज्यों से होते हुए औपनिवेशिक भारत तक पहुंचा। इस दौरान सामाजिक रिश्तों में कई परिवर्तन आए। औपनिवेशिक राज्य ने उस अधोसंरचना का विकास किया, जिससे भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारत एक राष्ट्र बना। इसके राष्ट्र बनने की राह को प्रशस्त किया हमारे स्वाधीनता संग्राम ने, जो दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन था।

    वर्तमान में देश पर हावी सांप्रदायिक विमर्श, सामाजिक परिवर्तनों को नज़रअंदाज़ करता है। वह शंकराचार्य द्वारा चार मठों की स्थापना और गांधी के लोगों को भारतीय के रूप में एक होने के आह्वान के बीच के अंतर को समझने को ही तैयार नहीं है। वह यह नहीं समझ पा रहा है कि औपनिवेशिक काल के पहले, नागरिकता की कोई अवधारणा नहीं थी और आधुनिक अधोसंरचना के विकास के साथ ही नागरिकता की अवधारणा भी उभरी। हिन्दू राष्ट्रवादी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि भौगोलिक क्षेत्र ही राष्ट्र का आधार है। वे यह मानते हैं कि हिन्दू संस्कृति, भारतीय नागरिकता की एकमात्र कसौटी है। वे धर्म को संस्कृति का चोला पहना रहे हैं। इसीलिए वे कहते हैं कि हिन्दू अप्रवासी भारतीयों को भारत में नागरिक के अधिकार मिलने चाहिए।

    हिन्दुत्ववादियों का अति-राष्ट्रवाद, भारत के ‘‘गौरवशाली अतीत’’ और ‘‘अखंड भारत’’ की उनकी अवधारणाओं से जुड़ा हुआ है। वे यह समझना ही नहीं चाहते कि राष्ट्र-राज्य के विकास की क्या प्रक्रिया होती है। वे देश के कानूनों का भी सम्मान नहीं करना चाहते। उनके लिए राष्ट्रवाद एक भावनात्मक मुद्दा है और वे इसका इस्तेमाल लोगों का समर्थन हासिल करने के लिए करना चाहते हैं। वे यह स्वीकार करने को तैयार नहीं हैं कि प्रजातंत्र में विविध विचारों और परस्पर विरोधी विचारधाराओं के लिए जगह होनी चाहिए। जिस राष्ट्र-राज्य में ऐसा नहीं होगा, वह जिंदा नहीं रह सकेगा।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • योगी आदित्यनाथ बनाम विपक्ष

    Vivek “सामाजिक यायावर Social Wayfarer”

    अभी शपथ ग्रहण भी नहीं हुआ और आप हुआ-हुआ करने लगे। यदि हुआ-हुआ ही करना था तो भाजपा को इतने भारी बहुमत से जिताया क्यों। यदि आपको यह लगता है कि भारी बहुमत EVM की करामात है तो उतरिए सड़क पर और बचाइए लोकतंत्र को, खाइए लाठियां, जाइए जेल, करिए अपना सीना पुलिस की बंदूक से निकलने वाली गोली के सामने। फेसबुक व whatsapp से दुनिया नहीं चलती है। आप एक समय की रोटी नहीं कमा सकते फेसबुक व whatsapp में मैसेजों को कापी, फारवर्ड करके, और दुनिया बदलने का ख्वाब देखते हैं।

    कुछ बातें बिलकुल चुस्ती के साथ गांठ में बांध कर समझ लीजिए।

    या तो यह स्वीकारिए कि संघ व भाजपा के कार्यकर्ता जमीन से लेकर सोशल मीडिया में हर स्तर पर आपसे बेहतर हैं। वोट फेसबुक व whatsapp की लफ्फाजी से नहीं मिलता। वोट जमीन पर उतर कर अपने नेता के लिए मेहनत करने से मिलता है। वोट जब रोड-शो करने से नहीं मिलता तो फेसबुक व whatsapp में मैसेज फारवर्ड करने से कैसे मिल सकता है।

    या यदि आप यह मानते हैं कि EVM के कारण भाजपा को बहुमत मिला, तो जैसा मैंने पोस्ट की शुरुआत में कहा कि उतरिए सड़कों पर, संघर्ष कीजिए। लफ्फाजी से बिलकुल भी काम नहीं चलेगा।

    मैं जानता हूं कि आपमें बूता नहीं कि आप सड़क पर उतर कर संघर्ष कर पाएं। कभी जमीन पर उतर कर समाज के लिए काम व संघर्ष किया हो तो कुछ हिम्मत भी पड़े। आप में से जो अपवाद हैं उनकी बात नहीं कर रहा हूं।

    आपको मेरी बात बुरी लगे या भली, यह आपकी अपनी सोच का स्तर। उत्तर प्रदेश में मायावती जी के दिन लद गए, मायावती जी के दिन लदने का मतलब बसपा के दिन लद गए। चैप्टर क्लोज। भावुक मत होइए, कड़वा सच है। EVM होती या न होती, मायावती जी की हालत कम-अधिक यही होती जो है।

    अब बात आती है अखिलेश जी की। तो उनको वास्तविक जमीन पर उतरना पड़ेगा, एक आम जमीनी नेता की तरह। खुद को पूरी ताकत के साथ यादवों के अतिरिक्त अन्य पिछड़ी जातियों के मान्य व लोकप्रिय नेता के तौर पर स्थापित व साबित करना होगा। इसके अलावा कोई और विकल्प नहीं। यही परीक्षा है अखिलेश जी की, उनकी राजनैतिक सूझबूझ, सांगठनिक क्षमता व दूरदर्शिता की।

    जितना मैं भाजपा व संघ को समझता हूं उसके आधार पर मैं योगी आदित्यनाथ जी को मोदी जी के बाद भाजपा के भावी प्रधानमंत्री के रूप में देख रहा हूं। मोदी जी शायद कुल दो टर्म तक प्रधानमंत्री रहेंगे, उसके बाद योगी आदित्यनाथ जी प्रधानमंत्री के रूप में पारी खेलेंगे।

    मोदी जी ने गुजरात दंगों के लिए बदनाम हुए लेकिन पूरे देश में खुद को विकास पुरुष के रूप स्थापित कर लिया। योगी जी के खाते में गुजरात दंगों जैसा कुछ है भी नहीं। तब क्या योगी जी खुद को विकास पुरुष व शांत पुरुष के रूप में स्थापित नहीं कर पाएंगें। क्या मुश्किल है। योगी आदित्यनाथ जी के राजनैतिक पैतरों वाले बयानों में मिट्टी डालकर भूल जाइए।

    केंद्र सरकार उनकी, राज्य में भारी बहुमत के साथ हैं। जितने मर्जी उतने राजमार्ग बनवा कर एयरोप्लेन उतरवा कर विकास पुरुष बन जाएंगें।  यदि एक प्रतिशत भी मान लीजिए कि योगी जी ने संतुलन के साथ काम किया तो कैसे रोक पाएंगें आप उनको। इस बार न रोक पाए तो अगली बार कैसे रोक लेंगें।

    लोगों को लगा कि भाजपा अखिलेश जी से बेहतर काम करेगी, अवसर दिया। यदि योगी जी बेहतर काम करते हैं तो अखिलेश जी को और अधिक बेहतर कामों के विचारों के साथ लोगों को लुभाना पड़ेगा।

    Yogi Adityanath, CM, Uttar Pradesh

    मैं तो चाहता हूं कि योगी आदित्यनाथ जी अच्छा काम करें। ताकि उनके विपक्ष को और अधिक अच्छे कामों की मंशा के साथ आगे आना होना। यह एक बेहतर राजनीति की शुरुआत होगी।

    काम करने की प्रतिस्पर्धा वाली राजनीति से डर किस बात का। यदि ऐसा हो पाया तो यह तो भारत की राजनीति में बहुत ही अधिक बेहतर शुरूआत होगी।

    आप 2012 से मोदी का विरोध करते आ रहे हैं। क्या उखाड़ लिया। 2014 में भारी बहुमत से केंद्र में सरकार बनाई। आप और अधिक विरोध करने लगे। उन्होंने नोटबंदी लागू कर दी। आपको लगा कि रसगुल्ला आ गया मुंह में। आपने और अधिक विरोध किया।

    आपका विरोध हवाई है। आप लोगों के बीच नहीं जाते। आप जमीन पर नहीं जाते हैं। आप तर्क गढ़ते हैं जमीन पर न जाने के। परिणाम देख लीजिए, आपने जितना विरोध किया मोदी जी उतने ही ताकतवर बनते गए।  उत्तर प्रदेश में भारी बहुमत से सरकार बनाने जा रहे हैं। लगभग पूरा देश उनका है।

    जो आपने मोदी जी के साथ किया वही आप योगी आदित्यनाथ जी के साथ कर रहे हैं। वे अभी मुख्यमंत्री बने नहीं आपने उनका विरोध करना शुरू कर दिया। अवसर दीजिए, धैर्य रखिए एक साल तक उनको सत्ता को समझने बूझने दीजिए। फिर कुछ कहिए।

    चलते-चलते :

    यदि आप यह सोच कर चल रहे हैं कि आप सड़क पर नहीं उतरेंगें, संघर्ष नहीं करेंगे। तब भी सत्ता अपने आप रसगुल्ले की तरह आपके मुंह में आ गिरेगी तो आप शेखचिल्ली हैं।

    यदि आप EVM को गलत मानते हैं तब भी, EVM को गलत नहीं मानते हैं तब भी। दोनों ही सूरत में आपको जमीन पर उतरना होगा और संघर्ष करना होगा। नए तौर तरीकों के साथ। सवाल यह है कि क्या आप ऐसा कर पाएंगें।

    बैठे ठाले राजनीति करने व सत्ता पाने के दिन लद गए, बेहतर हो कि आप इस बात को जितनी जल्दी हो सके स्वीकार कर लें। आपको संघर्ष करना पड़ेगा, मेहनत करनी पड़ेगी। चाहे EVM हो या EVM  न हो।

  • शेर

    Vimal Kumar

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    शेर अगर तुम्हारे साथ बैठ कर
    नाश्ता करने लगे डाइनिंग टेबल पर
    तो यह मत समझना कि वह आदमी बन गया है

    शेर अगर तुम्हारे साथ
    पिक्चर हाल में बैठकर फिल्म देखने लगे
    तो यह मत समझना कि वह कोई दर्शक बन गया है .
    शेर अगर तुम्हे अपनी बाहों में ले ले
    फिर तुम्हे चूमने लगे तो यह मत समझ लेना कि वह तुम्हारा प्रेमी बन गया है शेर अगर किसी दिन तुम्हारा आंसू पोंछने लगे
    जेब से रुमाल निकाल कर
    तो यह मत समझना कि वह तुम्हारा वाकई हमदर्दबन गया है

    शेर अगर अपने गले में माला डाल ले
    शंख ध्वनि करने लगे मंदिर में
    बजाने लगे घड़ियाल
    तो यह मत समझना कि वह अब पुजारी बन गया है

    शेर अगर किसी दिन चुनाव जीतकर
    देश का
    प्रधानमंत्रीही बन जाये
    देने लगे लोकतंत्र की दुहाई
    तो यह मत समझना कि वह कोई महा पुरुष बन गया है

    शेर को खून का स्वाद लग चूका है
    वह कितना भी विनम्र और शालीन दिखे
    वह कोई दार्शनिक नहीं है एक दिन झपट्टा मार कर
    तुम्हे डकार ही जायेगा