स्त्री मातृभूमि और राष्ट्रवाद –Sanjay Jothe

Sanjay Jothe

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स्त्री का माता
माता का मातृभूमि
और मातृभूमि का
राष्ट्र बन जाना
गजब की छलांग है ना?

जैसे नथनी की नकेल चढ़ी नाक के नीचे
अचानक मूंछें उग जाएँ
खाप के ताऊ जैसी

जैसे सिंदूर की लक्ष्मण रेखा के बराबर से
अदृश्य सी सीमा खिंच जाए
लाइन ऑफ़ कंट्रोल जैसी

जैसे घूंघट के जीने पर्दे से सटकर
कोई लंबी सी दीवार खड़ी हो जाये
बर्लिन की दीवार जैसी

स्त्री की माँ होने की
या मातृभूमि की राष्ट्र होने की यात्रा
क्या इसी ढंग से होनी जरूरी है?

क्या स्त्री का माँ हो जाना
और मातृभूमि का राष्ट्र बन जाना
धर्म या भगवान रूपी पिता को
स्त्री, माता और भूमि तीनों पर
अतिरिक्त अधिकार नहीं दे देता?

सच तो ये है कि एक स्त्री से
उसके स्त्री होने का अधिकार छीनने के लिए ही
मातृत्व और माँ की महिमा रची जाती है
भूमि के आँचल पर दावा करने के लिए ही
मातृभूमि और रक्षा के आदर्श रचे जाते हैं

और इन आदर्शों को संरक्षण देने के लिए
राष्ट्र और राष्ट्रवाद का अवतार धरे
वही सनातन धूर्त – परमात्मा और धर्म
बार बार साकार होते हैं

स्त्री, माता और मातृभूमि
तीनों को काबू रखने के लिए
हर युग में, हर दौर में …

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