Category: Articles

  • जरूरी हो गया है

    Dhiraj Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    वो एक है
    अरे नही ! वो दो है
    नही नही वो अनेक है
    नही रे वो कण कण मे है

    वो एकमात्र है
    नही वो तो अंतिम है
    वो अनंत है,अपरंपार है
    वो सच्चा सत्य है
    नही वो सच्चा शिव है
    नही वो तो सच्चा सुन्दर है

    वो ऐसा है ,वो वैसा है
    वो फलाना है ,वो ढिमकाना है
    उसने यह किया,उसने वो किया
    वो यह करता है,वो वह करता है
    वो यह यह करेगा ,वो वह करेगा

    पर’ वो’ को बनाने वाले
    या उसका उत्पादन करने वाले को
    यह बखूबी पता होता है कि
    जिस झूठ की फैक्टरी से
    ‘ वो’ नामक झूठ का उत्पादन कर
    ‘ वो ‘बेचने का धंधा वो करता है
    जल्द ही लोग उब जाते है..
    तभी तो वो ‘वो’ को नये फलेवर या पैकेज मे
    बेचने का नया जुगाड़ तलाश कर ही लेता है
    यानि बोतल नया,शराब वही’ वो ‘

    ‘वो’ को बनाने वाले या….
    बनाकर धंधा करने वाले
    अब तक तो “येन केन प्रकरेण ‘
    सफल माने जा सकते है..
    जीतते रहे है…
    पर अब मामला संजीदा हो चला है….

    किसी ‘वैज्ञानिक’ ने एक प्रश्न पूछ लिया है कि
    ‘ वो’ बनाने वालों जरा बताओ कि..
    ‘ बिग बैंग’ के पहले तुम्हारा ‘ वो ‘ कहां था
    या वो कर क्या रहा था ?

    मामला दिलचस्प है और रहेगा…
    ‘ वो ‘ के उत्पादन कर्ता सच और झूठ के बीच के
    खेल के माहिर परन्तु शातिर खिलाड़ी रहे है..

    हम …
    दर्शक दीर्घा मे बैठे ठाले
    फेयर प्ले की उम्मीद नही कर सकते
    क्योंकि इतिहास जानते हुए
    हम अनजान नही रह सकते…

    पता होना चाहिए कि…
    ‘वो ‘ बनाने वालों के द्वारा फेंकी गयी
    रोटी के टुकड़ों पर पलने वाले
    कथित निर्णायकों ने
    ‘ गाड पार्टिकल’ नामक सीटी
    खेल शूरू होने से पहले ही
    बजानी शूरू कर दी है….

    हमेशा की तरह
    खेल खतरनाक है….
    जिंदगी की हार को
    खेल भावना से स्वीकार करने की
    परंपरा को छोड़ना जरूरी हो गया है…

  • अल्लां हूं अंकबर अल्लां आ आ आआआआआआआअ ..

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    यूट्यूब पर मैंने कोई विडियो देखी थी कभी जिसमें दुबई के किसी मॉल में कोई एकदम छोटी सी लड़की यूँ ठिठक गई है और मासूम पैरों से जैसे किसी आवाज़ का पीछा कर रही है. वह अज़ान की आवाज़ थी जो पास की किसी मस्ज़िद से आ रही थी. वह वाकई एक सुंदर सुरीली आवाज़ थी. हालांकि उस विडियो का शीर्षक कुछ इस प्रकार का रख दिया गया था – अज़ान की आवाज़ से ईसाई बच्ची सरप्राइइज्ड. सुंदर गायन सा ही अज़ान सऊदी अरब के शाही मस्ज़िद से सुनने को मिलता है. मैं एकबार हौज़ख़ास में प्रत्यूष के कमरे पर बैठा था, तब भी इतनी ही सुंदर आवाज़ सुनी थी और प्रत्यूष से इसका ज़िक्र किया था.

    लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. हमारे आसपास की मसाज़िद के बेसुरे मुअज़्ज़िन सच में ऐसी टेर लगाते हैं कि पहली इच्छा यही होती है कि ख़ुदा अभी इस मस्ज़िद पर आंधी-तूफ़ान-बिजली के रूप में अपनी करम बरसा इस व्यक्ति की आवाज़ को कंठ में ही दबोच ले. अलसुबह की अज़ान तो और भी अप्रिय लग सकती है.

    अल्लां हूं अंकबर अल्लां आ आ आआआआआआआअ ..

    बेगूसराय में हमारे मोहल्ले की अज़ान सुन एकाध बार मैंने विचार किया कि अज़ान के लिए मुअज़्ज़िन का चुनाव करने में शायद वे इस बात पर विचार करते हैं कि कौन अपनी नाक सबसे अधिक हुनर से दबाकर आवाज़ निकाल सकता है या किसकी आवाज़ अल्लाह ने ऐसी ही बनाकर ज़ुल्म करने को धरती पर भेजा है.

    खैर यह तो एक बात हुई.

    दूसरी बात यह हुई कि मुझे एक ऐसी लड़की से इश्क़ हुआ जो दिन में फ़ोन ही नहीं कर पाती थी. वह देर रात की फुसफुसाहट में मुझे फ़ोन करती और उसकी आधी बातें मुझे सुनाई ही नहीं पड़ती. मुझे व्हिस्प्रिंग वाला संवाद सिर्फ तब पसंद है जब हम दैहिक क्षणों में इतने क़रीब हों कि आवाज़ थोड़ी भी तेज़ हो तो देह की लय टूटती हो. उसने सामान्य आवाज़ का जो अवसर तलाशा वह शाम का समय होता था जब उसकी माँ और बहनें रसोई में व्यस्त हो और वह छत पर आकर मुझसे बात करे. लेकिन अन्याय हुआ यहाँ. मैं उससे रूमानी बातें करने की कोशिश करता और कोई द्वारपालों को कह रहा होता कि भाई कन्हैया से कह दो कि हम मिलने आए हैं. उसने मुझे बताया और मैंने सुना कि प्रतिदिन 7-9 और 5-7, चार घंटे यूँही कोई चिल्लाकर द्वारपालों से बात कर रहा होता या राम बनकर श्याम बनकर प्रभु जी से (प्रभु जोशी नहीं, ईश्वर) आने की विनती कर रही होती. न प्रभु जी कभी आए, न उनकी रोज़ की चिल्लपों बंद हुई, न मेरा इश्क़ परवान चढ़ा. मैं गंभीरता से सोचता हूँ तो उस लड़की से मेरे ब्रेक अप का सबसे बड़ा कारण उसके पड़ोस के मंदिर की कथित धार्मिकता ही रही.

    मैं मुखर्जी नगर इलाक़े में रहता था तो मैंने गौर किया कि हमारे प्रीलिम और मेन्स एग्जाम के तुरंत पहले अचानक से माता रानी के जगरातों की बाढ़ आ जाती थी. भारी चिढ़ में मैं यह सोचकर संतोष करता कि संभवतः हमें एग्जाम पास कराने के लिए यह मोहल्ले वालों का सामूहिक धार्मिक सहयोग है. हालांकि, माता रानी का गणित अधिक तेज़ निकलता रहा. हम फेल होते रहे और उनके ‘यूपीएससी एसपायरेंट’ किरायेदारों की संख्या बढ़ती रही और वे और मोटे होते रहे.

    बहिरकैफ़, ये सब पुरानी झेली हुई कहानियां हैं और इनपर बातें हम करते ही रहे हैं. अभी न जाने देश में कौन सी हवा चली है कि अचानक इन बातों को हमले के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. अब ये बातें किसी राय या विचार सी नहीं लगतीं, बल्कि ऐसा लगता है कि समुदाय विशेष पर हमले के लिए ही इसे खुलकर प्रकट किया जा रहा.

    मैंने कहीं पढ़ा कि कुरआन में ही कहीं यह ज़िक्र है कि ‘तब बोलो यदि तुम्हारा बोलना तुम्हारे चुप रहने से अधिक बेहतर हो.’ सोनू तो सुरीले गायक हैं. वे चार ट्वीट से भी अपनी बात नहीं समझा सकने के बजाय एक ट्विट से ही यह व्यंग्य करते कि मेरे पास की मस्ज़िद मुझे मुअज़्ज़िन रख ले या अत्याचार बंद करे, तो वे ज्यादा असर करते. खैर.

     

  • टुकड़ा टुकड़ा प्रेयसी

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    अपनी पहली भूमिका में वह गुनगुनाती है बेतरह

    अपने होठों को पांच प्रकार से घुमाकर
    पांच तरह की अभिव्यक्ति देती है
    पांच सौ प्रकार के संकेत
    पहले घुमाव से आखिरी तक में मीलों गुजर लेती है
    अतीत के मेरे प्रेम-हादसों की भरी-पूरी ट्रेन
    और मैं बिजली के तारों पर के नीलकंठ गिनता रहता हूँ

    होठों की तीसरी अभिव्यक्ति में ‘ओ’ बनाकर चूमती है मुझे
    मैं महसूसता हूँ मेरे होठों को कांपते हुए
    मेरी पाँचों इन्द्रियाँ जम जाती हैं
    उसके होठों की पांचवीं अभिव्यक्ति में उसके गाल पर गड्ढा बनता है

    दूसरी भूमिका में करवट बदलती है प्रेयसी
    मैं उसके खाली कंधों पर तिल ढूंढने लगता हूँ

    तिल की तलाश का कारवां सुस्त क़दम गुजरता है
    उसके एक एक रोमकूप से प्यास पुकारती है मुझे
    मैं लिखने लगता हूँ चुम्बनों में देह की भूख की पीड़ा
    मेरी भूख बढती जाती है
    उसके पेट का वलय सिहरन में प्रतिध्वनित होता है

    कलपती है प्रेयसी ..
    ‘बस शरीर नहीं हूँ मैं’ का हुंकार भरती
    अपनी तीसरी भूमिका में प्रवेश करती है प्रेयसी ..

    उठाती है वह सदियों के सवाल
    जमा हिसाब मांगती पूछती है प्रेम का प्रयोजन
    बार बार लौट जाती अतीत में मुझे धकिया कर
    मन के दरवाजे की सांकल अन्दर से बंद कर लेती है

    मैं मेरे कान सांकल में दर्ज रुक गयी स्त्री पर लगाकर रखता हूँ
    मैं सूंघता रहता हूँ रुक के बहकते पदचापों को

    उसकी चौथी भूमिका में
    आसमान पर घिर आते हैं हरसिंगार
    चींटियाँ सीढ़ी लगा हरसिंगार के नीचे उतरने की बाट जोहती हैं
    प्यास के कूप फिर पानी से भर आते हैं
    एक एक चींटी सौ सौ बार पानी से मुंह जूठा करती निर्वाण पा लेती है

    इसी दृश्य में मैं हरसिंगार सा महकता रहता हूँ
    वह बदहवास खाली पैर
    मेरी नाभि के गोल गोल घुमती मुझे ढूंढती रहती है

    उसे देखा मैंने फिर लौट जाते उसकी पांचवीं भूमिका में
    बुदबुदाती है स्त्री बने रहने के जादू मंतर
    बालों को कसकर बाँध लेती है
    एक बाल्टी पानी छपाक फेंक रात का फर्श धो देती है
    मेरा भीगना भीग जाता है

    उसकी अंतिम भूमिका में एक नीलकंठ फड़फड़ाता है बेतरह.

     

  • राजसत्ता

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    राजसत्ता एक ऐसा केंचुल है, जिसे ओढ़कर विषपायी सांप भी सम्मोहक दिखने लगता है।

    भूखे को रोटी मिल जाए और प्यासे को पानी तो यह देखना मुनासिब नहीं होता कि रोटी किसने दी और पानी किसने पिलाया।

    योगी आदित्यनाथ अगर उर्दू विश्वविद्यालय के लिए विशालकाय परिसर देते हैं, मुस्लिम युवतियों की सामूहिक शादी करवाते हैं और सरकार से उनका मेहर तय करवाते हैं तो उन्हें किसी को गले लगाने में क्या आपत्ति होगी? होनी भी क्यों चाहिए?

    कल अगर कोई मौलवी साहब शिक्षा मंत्री बन जाएं और वे संस्कृत के विस्तार की बातें करें, मंदिरों को जगहें आवंटित करने में जुट जाएं और भारतीय पुरातन वैदिक ग्रंथों के प्रकाशन और संचयन की बातें करने लगें तो मेरा ख़याल है कि वैज्ञानिक टेंपरामेंट वाले शिक्षा मंत्री के बजाय आम लोग ही नहीं, कट्टर हिन्दू भी उसे ही ज़्यादा पसंद करेंगे। आख़िर कट्टरता-कट्टरता का भी तो एक बहनापा होता ही है। ठीक ऐसे ही, हिन्दू मताग्रह और मुसलिम मताग्रह के बीच भी एक गर्भनाल का रिश्ता है।

    कांग्रेस तो हाल के वर्षों में कम्युनिस्टीकृत हुई है, वरना यही राग और स्वर तो अाज़ादी से पहले उसके नेताओं के हुआ करते थे। वे ही लोग राम मंदिर का ताला खुलवाते थे और हिंदू परंपराओं को मानते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू को आज लोग कितना भी सेक्युलर कहें, लेकिन उनके समय ही सारनाथ से निकले चार शेरों वाली प्रतिमा को राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बनाया गया। उपनिषद के वाक्य सत्यमेव जयते को राष्ट्रीय भावना माना गया और किसी भी सरकारी भवन के शिलान्यास पर हिंदू पंडितों से पूजा करवाने की परंपरा डाली गई।

    भाजपा और आरएसएस तो नाहक बदनाम हो रहे हैं, दरअसल बहुसंख्यक कट्टरता के बीज तो बाबा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय ही बोए गए। गांधी बाबा ने हर कदम पर भगवद्गीता की बात की और उसे राष्ट्रीय ग्रंथ से ज्यादा महत्व दिया। वे हर जगह रामराज्य की बात ही किया करते थे। नेहरू का राजनीतिक टेंपरामेंट चाहे कुछ भी हो, लेकिन वे राजसत्ता हासिल होने की संभावनाओं के कारण बाबा गांधी से चिपके रहे और सदा उनके प्रिय बने रहे। लेकिन गांधी धार्मिक होकर भी धर्मप्राण और सेक्युलर रहे, लेकिन जिन्ना जैसा नेता गैरधार्मिक और इस्लाम के प्रति परम अज्ञानी होकर भी घोर सांप्रदायिक हो गया।

    हम भले आरएसएस या भाजपा को आज हिंदू पुनरुत्थानवाद के लिए जिम्मेदार बताएं, लेकिन सच तो यह है कि हिन्दू मताग्रह की शुरुआत बंकिमचंद्र, तिलक, अरविंद, मदनमोहन मालवीय, वीर सावरकर, महात्मा गांधी सरीखे आधुनिक सुधारकों ने की थी। बंकिमचंद्र ने हिंदू पौराणिक गाथाओं का गान किया। तिलक ने शिवाजी की विरासत और गणेश चतुर्थी पर्व का राजनीतिक उपयोग शुरु किया। अरविंद ने काली की चेतना को उग्र किया। बंकिम जी के उपन्यास में हिन्दू मठ के सदस्य मुसलमानों के खिलाफ जिस वंदेमातरम् का आह्वान करते हैं, उसी वंदेमातरम को कांग्रेस ने ही राष्ट्रगान बनवाया। आज कांग्रेस को भले आरएसएस भाजपा के गौप्रेम पर आपत्ति हो, लेकिन सच यही है कि स्वयं गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा : “इसमें यानी हिन्दू धर्म में गौपूजा मेरी राय में मानवतावाद के क्रमिक विकास के प्रति एक शानदार परिणाम है।” बाेये पेड़ बबूल को, आम कहां तो खाय वाली कहावत शायद इसी संदर्भ में बनी हो तो अचरज़ नहीं।

    कांग्रेस के नेताओं ने पहले तो रामराज्य, गीता, वंदेमातरम्, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म आदि के माध्यम से राजनीति में धर्म को घुसेड़ा और मजे से राज किया; लेकिन जब पार्टी इन चीज़ों का रस निकाल चुकी, चुनावों और राजसत्ता की कुल्हाड़ी के गोगड़ों में गन्ने की तरह बार-बार पेरकर और बार-बार दुहरा-तिहरा करके पूरी तरह निचोड़ चुकी और मुसलमानों को भी जमकर इस्तेमाल कर चुकी तो अब चुके हुए हिन्दुत्व के गन्ने के छिलकों से बेचारे आरएसएस वाले और भाजपा वाले अपनी धूनी कुछ साल तापना चाहते हैं तो कांग्रेस हायतौबा मचा रही है। कम्युनिस्टों, लौहियावादियों, जेएनयू वालों, तरह-तरह के गतिशीलों-प्रगतिशीलों ने कांग्रेस को कभी इन मुद्दों पर कुछ कहा हो तो बताओ, लेकिन बीजेपी के बाबा आदित्यनाथ का राजभोग और टीवी पर उनका कुछ कवरेज जैसे लाहौलविलाकुव्वत करवाए दे रहा है! देखिए, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पतन हो गया है। कुछ है ही नहीं दिखाने के लिए। अरे क्या देश में एक बाबा ही रह गया है।

    सत्ता का लालच ऐसा ही होता है। वह इनसान की धुरी को पूरी तरह घुमा देता है। अब तक कांग्रेस को घुमाए रखा और अब वह योगियों को घुमा रहा है। आप स्वयं देख लें, कांग्रेस शासन के समय दुनिया के सबसे ताकतवर बाबाओं में एक बाबा रामदेव योग पर फोकस्ड थे और जैसे ही उनके मित्रों की सरकार आई, वे सामान बेचने लगे और वणिक् धर्म अपना लिया। आज तक जिस राजनीतिक दल की जो रेलगाड़ी चला करती थी, उसका नाम कांग्रेस था और सत्ता की मलाई खाने वाले कुर्सीलिप्सु उस ट्रेन पर सवार हो जाते थे। आजकल इस ट्रेन का नाम बदलकर भाजपा हो गया है और अब लोग कांग्रेस या अन्य दल छोड़कर इस पर सवार होने को उतावले हो रहे हैं। जिस तरह विमान में आम कुछ खास चीज़ें अपने साथ नहीं ले जा सकते, उसी तरह सत्ता के स्टेशन के भी कुछ रेस्ट्रिक्शनंस होते हैं। यहां भी आप छुरे, पाछने, तेजाब, उस्तरे, चाकूनुमा चीज़ें साथ नहीं रख सकते। अब जो योगिराज उत्तरप्रदेश की सत्ता संभाल रहा है, उसके कंठ में यह दम नहीं है कि वह गरज कर कह सके कि किसी एक मुसलमान ने किसी एक हिन्दू युवती से बलात्कार किया तो हम सौ मुसलिम युवतियों से बलात्कार करेंगे। अब इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बातें करने का अर्थ वे जानते हैं। सत्ता को आप भले बाहर से सांप कहें या ज़हर, आप उसका पान करने के लिए लालायित रहते हैं और हर समझौता करने को करने को तैयार। सत्ता सुंदरी कहें या विष कन्या, उसके अंग-प्रत्यंग का सम्मोहन हर ब्रह्मचारी और संन्यासी के लंगोट ढीले कर देता है! यह बात रीतिकाल में कवियों ने अपने दाेहों में कही, लेकिन आज के योगिराज इसे साबित भी करके दिखा रहे हैं।


    फेसबुक वाल से साभार

     

  • लक्ष्य की महिला टीम ने लखनऊ के गावं गोपरामऊ में एक सांय कालीन कैडर कैम्प का आयोजन किया

    15 April,

    लक्ष्य की महिला कमांडरों ने बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर  की जयंती के अवसर पर गांव वासियों को बधाई दी तथा बाबा साहेब की शिक्षाओं पर चलने की सलाह दी !

    लक्ष्य की महिला कमांडर  रेखा आर्या ने बाबा साहेब डॉ बी आर आंबेडकर के योगदान को याद करते हुए उनके दुवारा बताये तीन मूलमंत्र शिक्षित बनो,संघठित रहो  व् संघर्ष करो को अपने  जीवन में अपनाने की अपील की ! उन्होंने शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि बाबा साहेब ने कहा था कि शिक्षा वो शेरनी का दूध है जो इसे पियेगा वो शेर की तरह दहाड़ेगा इसलिए हमें अपने बच्चो को शिक्षित अवश्य करना चाहिए, चाहे इसके लिए हमें कितने भी  कास्ट उठाने पड़े !

    लक्ष्य कमांडर संघमित्रा गौतम ने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की बात कही ! उन्होंने कहा   कि बाबा साहेब ने कहा था की गुलाम को गुलामी का अहसाश करा दो तो वो गुलामी की सारी जंजीरे तोड़ देगा ! उन्होंने कहा कि इसलिए  लक्ष्य की टीम गावं गावं जाकर  लोगो को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक कर रही है !

    लक्ष्य कमांडर सुषमा बाबू ने लोगो को  अन्धविश्वास से बचने की सलाह दी !  उन्होंने कहा की दलित समाज की दुर्गति का मुख्य कारण अन्धविश्वास ही है ! buy modafinil netherlands https://megacanabisdispensary.com/

    लक्ष्य के सलाहकार एम्. एल. आर्या ने लक्ष्य के कार्यो की विस्तार से चर्चा की ! गावं के  लोगो ने लक्ष्य की महिला कमांडरों के कार्यो की भूरि भूरि प्रशंशा की !

     

  • विजय दीवान व गांधी विचार

    Pushya Mitra

    [themify_hr color=”red”]

    ये विजय दीवान हैं. महाराष्ट्र में रहते हैं, पिछले दिनों चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह में भाग लेने पटना आये हुए थे. यहां उनको सुनने का मौका मिला. इनका जन्म ब्राह्मण जाति में हुआ था, मगर जब इनकी समझ बूझ बढ़ी तो इन्होंने तय किया कि वे मरी हुई गाय की चमड़ी को उतारने का काम करेंगे. बीस साल से वे यह काम कर भी रहे हैं. वे ऐसे पहले व्यक्ति नहीं हैं, जो यह काम कर रहे हैं. उनसे पहले गोपाल राव आहुजकर नामक एक व्यक्ति ने सवर्ण होने के बावजूद यह काम करना शुरू किया था. दरअसल महाराष्ट्र में एक परंपरा रही है, गांधीवादियों की जो जन्मना सवर्ण होने के बावजूद कथित रूप से दलितों के लिये तय पेशे को अपनाते हैं और उसी के हिसाब से जीना पसंद करते हैं.

    Vijay Divan

    विजय दीवान ने कहा कि गांधी कहते थे, कोई भी काम बुरा नहीं. हां, कोई भी काम स्वेच्छा से करना चाहिये, किसी पर लादना नहीं चाहिये. उन्होंने खास तौर पर यह संदेश दिया था कि सवर्णों को उन पेशों को अपनाना चाहिये, जो उन्होंने दलितों पर लादे हैं. उनसे प्रेरित होकर बिनोवा भावे और कई अन्य लोगों ने दलित बस्तियों में रह कर उन पेशों को अपनाने की कोशिश की. कुछ लोग आज तक यह काम कर रहे हैं. यह उद्धरण मैं उन लोगों के लिए पेश कर रहा हूं, जो यह दावा करते हैं कि गांधी का दलित प्रेम दिखावा था. वे केवल औपचारिकता करते थे.

    एक मित्र ने आज कहा कि अगर गांधीवादी तरीके से ही चला जाता तो दलितों को अधिकार मिलने में हजारों साल लग जाते. यह बात हिंसावादी भी कहते हैं कि अहिंसा से थोड़े ही आजादी मिली है, अहिंसा पर आधारित रहते तो हजारों साल में भी आजादी नहीं मिलती. वह तो सुभाष चंद्र बोस थे, जिनसे डर कर अंगरेजों ने भारत को आजादी दे दी. मगर ऐसा कहने वाले गांधी के प्रयासों से अवगत नहीं हैं. और ज्यादातर लोग पूना पैक्ट को ही आधार बनाकर गांधी की आलोचना करते हैं.

    पूना पैक्ट पर आंबेडकर ने जो करुणा दिखायी वह अविस्मरणीय है और निश्चित तौर पर यह फैसला उन्हें काफी बड़ा साबित कर देता है. मगर हमें यह भी याद रखना चाहिये कि पूना पैक्ट के बाद आंबेडकर से किये वायदे को पूरा करने के लिए गांधी ने क्या-क्या किया और इसमें उन्हें किन-किन का सहयोग मिला. वे देश भर के मंदिरों में घूमे और दलितों को प्रवेश दिलाने की कोशिश करते रहे. मगर दुर्भाग्यवश उन्हें अपनी ही पार्टी के लोगों का समर्थन नहीं मिल पाया. वे इस काम को करने के प्रयास में बिल्कुल अकेले पड़ गये थे. आखिरकार उन्हें कांग्रेस से त्यागपत्र दे देना पड़ा.

    आज हम गांधी और आंबेडकर की तुलना करने लगते हैं, मगर हमें यह याद रखना चाहिये कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों में सिर्फ गांधी ही थे जो आंबेडकर के विचारों से प्रभावित थे. उन्होंने ही बस इसे व्यवहार में अपनाया. बांकी लोगों के लिए गांधी का छुआछूत विरोधी अभियान एक मजाक था. गांधी ने दिल से चाहा था कि यह समाज बदले, लोग जाति प्रथा के कोढ़ से बाहर निकलें. मगर इसके लिए नेहरू, सुभाष, पटेल या राजेंद्र बाबू ने क्या किया यह कोई बता सकता है क्या… ?

    यह गांधी ही थे जिन्होंने आंबेडकर को संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष बनवाया. वरना नेहरू और पटेल इसके पक्ष में नहीं थे. इन लोगों के लिए दलितवाद एक राजनीतिक मसला भर था. गांधी की हत्या के बाद इन लोगों ने जगजीवन राम को खड़ा किया ताकि वे आंबेडकर की काट बन सकें और आंबेडकर राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ते गये.

    मैंने जब लिखा कि मैं गांधी को नायक मानता हूं तो कई लोगों ने इसे इस रूप में लिया कि मैं आंबेडकर को या उनके विचारों को खारिज कर रहा हूं. ऐसा कतई नहीं है, आंबेडकर के विचारों में वह उत्तेजना है जो आपके सोच को एक झटके में बदल देती है. निश्चित तौर पर जिन लोगों ने जातिगत भेदभाव का जहर पिया है, उन्हें आंबेडकर के विचारों से शांति और प्रेरणा मिलती होगी. हमलोग इस बात को उस तरह महसूस नहीं कर सकते. हम दलित नहीं हो सकते और न ही हमें यह ढोंग करना चाहिये कि हम दलितों का दर्द समझते हैं. हमारा काम इतना ही है कि हम खुद को बदलें और विरासत में हमें जो भेद-भाव की प्रवृत्ति मिली है उससे उबरें.

    जहां तक मेरे गांधी को नायक मानने की बात है, उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि गांधी एक छतरी की तरह थे, जहां हर बेहतर विचार जगह पाता था और फूलने-फलने का अवसर भी. वे समाज को बदलना चाहते थे, मगर एक को दूसरे का दुश्मन बना कर नहीं. वे हर किसी को प्रेम से बदलना चाहते थे, चाहे वे अंगरेज ही क्यों न हों. इसी वजह से उनके आंदोलनों में कटुता कम पैदा हुई. मैं इसलिए उन्हें पसंद करता हूं और जातिगत भेदभाव को मिटाने को लेकर उनके जो प्रयास थे, तरीके थे, उनमें आस्था व्यक्त करता हूं. इसका मतलब यह नहीं कि मैं आंबेडकर से असहमत हूं. इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि मैं दोनों से सहमत होते हुए दोनों में से गांधी को बेहतर विकल्प मानता हूं.


    फेसबुक वाल से साभार

  • आप सुन लें कि आज शाम मैं मनुष्यतर हुआ हूँ – आज वह प्रेम की शाम थी

    Aman Tripathi

    [themify_hr color=”red”]

    आज शाम का वक्त मैंने
    एक लड़की के साथ बिताया है
    उसको मैं बहन कहता हूँ
    पहले नहीं मिला था कभी उससे
    जानता भी नहीं था कुछ महीने पहले
    नहीं जानने को नहीं जानते हुए
    जानने को जानने के बीच का
    समय पाटते हुए मैंने
    आज शाम का वक्त एक लड़की के साथ बिताया है

    मैंने और उसने तमाम बातें की हैं
    वह इस शहर में पहली बार आयी थी
    मैं जो उससे थोड़ा पहले पहली बार इस शहर में आया था
    उसे यह शहर अपने शहर की तरह घुमा रहा था
    मैंने उसे शहर में नदी दिखायी और
    शहर का सबसे पुराना कॉफी हाउस दिखाया
    वह किसी भी और लड़की की तरह थी
    उससे मिलना किसी भी और लड़की की तरह था
    उसने भी किसी भी और लड़की की तरह
    मेरे न बोलने या कम बोलने का इलज़ाम लगाया
    जबकि मैं यह मानता हूँ कि मैं ठीक-ठाक बोलता हूँ

    आप कहेंगे ऐसा क्या है
    आप कहेंगे कोई किसी लड़की से मिलता है
    जिसे वह बहन या कुछ भी कहता है
    इसमें किसी की क्या रुचि हो सकती है

    मैं बस यह बताना चाहता हूँ आपसे
    आज शाम तमाम हत्याओं दुर्घटनाओं मौतों आत्महत्याओं निन्दाओं षड्यन्त्रों बलात्कारों बयानों और मज़ाकों और विदूषकों के बीच और अछूते रहते हुए
    मैंने अपना समय एक लड़की उसकी बातों और किताबों और नदी के साथ बिताया है
    आप सुन लें कि आज शाम मैं मनुष्यतर हुआ हूँ
    आज वह प्रेम की शाम थी.

     

  • बाबरी मस्ज़िद-राममंदिर विवादः न्याय ज़रूरी

    राम पुनियानी

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    एक लंबे इंतज़ार के बाद, उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति जेएस खेहर ने कहा है कि काफी समय से लंबित रामजन्मभूमि बाबरी मस्ज़िद विवाद का हल न्यायालय के बाहर निकाला जाना चाहिए। उन्होंने इस मसले को सुलझाने के लिए मध्यस्थ की भूमिका निभाने का प्रस्ताव भी दिया। संघ परिवार के अधिकांश सदस्यों ने खेहर के इस कदम की प्रशंसा की। इसके विपरीत, मुस्लिम नेताओं के एक बड़े तबके और अन्यों ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि उच्चतम न्यायालय समझौते से समस्या का हल निकालने की बात क्यों कर रहा है, जबकि लोग न्यायालय में जाते ही इसलिए हैं ताकि उन्हें न्याय मिल सके।

    उच्चतम न्यायालय, बाबरी मस्जिद प्रकरण में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के सन 2010 के निर्णय के विरूद्ध की गई अपील की सुनवाई कर रहा है। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा था कि विवादित भूमि को तीन भागों में विभाजित कर दिया जाए। यह निर्णय भी सभी पक्षों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास अधिक था, न्याय करने का कम। इस भूमि पर निर्मोही अखाड़ा और सुन्नी वक्फ बोर्ड ने दावा किया था। उच्च न्यायालय ने यह कहा कि भूमि के तीन हिस्से कर उसे निर्मोही अखाड़ा, सुन्नी वक्फ बोर्ड और रामलला विराजमान के बीच बराबर-बराबर बांट दिया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी कहा कि चूंकि हिन्दू यह मानते हैं कि विवादित स्थान भगवान राम की जन्मभूमि है इसलिए जिस स्थान पर मस्ज़िद का मुख्य गुम्बद था, उसके नीचे की ज़मीन हिन्दुओं को आवंटित की जानी चाहिए। इसके बाद, विजयी मुद्रा में आरएसएस के मुखिया ने कहा था कि अब उस स्थल पर एक भव्य राममंदिर के निर्माण का रास्ता साफ हो गया है और इस ‘राष्ट्रीय कार्य’ में सभी पक्षों को सहयोग करना चाहिए।

    कई लोगों को इस निर्णय से बहुत धक्का पहुंचा था। इन लोगों का कहना था कि उस स्थल पर बाबरी मस्ज़िद लगभग 500 सालों से खड़ी थी और वह स्थान सुन्नी वक्फ बोर्ड के कब्ज़े में था। विवाद की शुरूआत 19वीं सदी में हुई। सन 1885 में अदालत ने हिन्दुओं को मस्ज़िद के बाहर स्थित चबूतरे पर एक शेड का निर्माण करने की अनुमति देने से भी इंकार कर दिया था। इसके बाद, सन 1949 में मस्ज़िद के अंदर ज़बरदस्ती रामलला की एक मूर्ति स्थापित कर दी गई और इसके बाद से विवाद और बढ़ गया। मूर्ति की स्थापना एक सोचे-समझे षड़यंत्र के तहत की गई थी। यद्यपि तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध किया था परंतु उत्तरप्रदेश प्रशासन ने उनकी एक न सुनी। इसके बाद, मस्ज़िद के मुख्य दरवाजे़ को सील कर दिया गया। सन 1996 में दक्षिणपंथियों के दबाव में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने मस्ज़िद के ताले खुलवा दिए।

    उस समय तक इस मुद्दे पर विहिप आंदोलन चला रही थी। इसके पश्चात, लालकृष्ण आडवाणी ने इस मुद्दे को   हथिया लिया। वे उस समय भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष थे और उन्हें यह महसूस हुआ कि इस मुद्दे से उनकी पार्टी को राजनीतिक लाभ मिल सकता है। इस मुद्दे का इस्तेमाल हिन्दू मतों का ध्रुवीकरण करने के लिए किया गया। मंडल आयोग की सिफारिशें लागू होने के बाद, आडवाणी के नेतृत्व में देश भर में रथयात्रा निकाली गई। जो लोग अन्य पिछड़ा वर्गों को आरक्षण देने के खिलाफ थे, उन्होंने इस आंदोलन में बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया।

    भाजपा ने यद्यपि मंडल आयोग की रपट को लागू किए जाने का प्रत्यक्ष विरोध नहीं किया परंतु उसने इसके विरोधियों को राममंदिर आंदोलन की छतरी तले लामबंद करने की भरपूर कोशिश की, जिसमें वह सफल भी रही। कुछ टिप्पणीकारों ने इसे मंडल बनाम कमंडल की राजनीति बताया।

    इस आंदोलन ने देश में सामाजिक सद्भाव और शांति को भंग किया। इस आंदोलन का चरम था बाबरी मस्ज़िद का ध्वंस। इसमें आरएसएस ने प्रमुख भूमिका निभाई और तत्कालीन प्रधानमंत्री पीव्ही नरसिम्हाराव चुप्पी साधे रहे। स्थानीय प्रशासन ने कोई कार्यवाही नहीं की और राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री कल्याण सिंह ने वहां लोगों को इकट्ठा होने दिया। यह उन्होंने इस तथ्य के बावजूद किया कि उन्होंने उच्चतम न्यायालय से यह वायदा किया था कि बाबरी मस्जिद की रक्षा की जाएगी। जब बाबरी मस्ज़िद गिराई जा रही थी, उस समय नरसिम्हाराव ने अपने आपको पूजा के कमरे में बंद कर लिया। बाद में उन्होंने यह वायदा किया कि ठीक उसी स्थान पर मस्ज़िद का पुनर्निमाण किया जाएगा।

    इसके पश्चात्, तथाकथित पुरातत्वविदों ने, जो दरअसल कारसेवक ही थे, यह साबित करने का प्रयास किया कि मस्जिद की नींव, मंदिर के अवशेषों पर खड़ी है। विवादित भूमि पर किसी समय मंदिर था, इसका कोई प्रमाणिक ऐतिहासिक या पुरातत्वीय सबूत उपलब्ध नहीं है। यही कारण है कि उच्च न्यायालय को दो-तिहाई भूमि हिन्दुओं को सौंपने के अपने निर्णय का आधार ‘आस्था’ को बनाना पड़ा। बाबरी मस्ज़िद का ध्वंस, आज़ाद भारत के इतिहास का सबसे बड़ा अपराध था परंतु इसके दोषियों को आज तक सज़ा नहीं दी जा सकी है।

    लिब्रहान आयोग ने बाबरी मस्ज़िद के ध्वंस को षड़यंत्र का नतीजा तो बताया परंतु दुर्भाग्यवश उसने अपनी रपट प्रस्तुत करने में बहुत देरी कर दी। जले पर नमक छिड़कते हुए इस अपराध के बाद, आडवाणी और उनके साथी और मज़बूत होकर उभरे। बाबरी मस्जिद के ढहाए जाने के बाद देश भर में भीषण सांप्रदायिक हिंसा हुई। मुंबई, भोपाल और सूरत में सैंकड़ों लोगों ने अपनी जानें गवांईं। दंगाईयों को भी आज तक सज़ा नहीं मिल सकी है।

    अदालतें न्याय देने के लिए बनाई जाती हैं। यह दुःखद है कि उच्च न्यायालय ने सबूतों की बजाए आस्था को अपने निर्णय का आधार बनाया। उच्चतम न्यायालय देश की सबसे बड़ी न्यायिक संस्था है। उससे यह अपेक्षा की जा सकती है कि वह पूरे मुद्दे को केवल और केवल कानूनी दृष्टि से देखेगी और अब तक हुई भूलों को सुधारेगी। अगर अदालत ही समझौते की बात करने लगेगी तो न्याय कहां से होगा। इस मुद्दे पर हिन्दू समूहों ने अभी से यह कहना शुरू कर दिया है कि मुसलमानों को उस स्थान पर राममंदिर बनने देना चाहिए और उन्हें मस्ज़िद के लिए अन्यत्र भूमि दे दी जाएगी। जहां तक सत्ता की ताकत का संबंध है, दोनों पक्षों में कोई तुलना नहीं की जा सकती।

    भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी और कई अन्यों ने यह धमकी दी है कि अगर मुसलमान विवादित भूमि पर अपना दावा नहीं छोड़ते तो संसद में भाजपा के सदस्यों की पर्याप्त संख्या होने के बाद विधेयक लाकर भूमि पर राममंदिर निर्माण की राह प्रशस्त की जाएगी। इस तरह की धमकी देना घोर अनैतिक है। सभी पक्षों के साथ न्याय किया जाना चाहिए। अभी से कई मस्ज़िदों को मंदिरों में बदलने की बात कही जा रही है। अगर फैसला अदालत के बाहर होगा तो हिन्दू राष्ट्रवादी, जो दूसरे पक्ष से कहीं अधिक आक्रामक और शक्तिशाली हैं, अपनी मनमानी करेंगे। दूसरी मस्ज़िदों को मंदिर में बदलने के प्रयासों को तुरंत रोका जाना चाहिए। ये अनावश्यक और मुसलमानों को आतंकित करने वाले हैं।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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  • चुनाव में हमें कोई – अपने जाल में फंसाता है

    Vimal Kumar

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    तुम शराब पीते हो
    और मैं उसे हाथ तक नहीं लगाता
    आओ हम इस बात पर
    एक दूसरे को नीचा दिखाएँ

    तुम गाय का दूध पीते हो
    और हम उबले अंडे खाते हैं
    आओ इस बात पर
    हम एक दूसरे को चाकू दिखाएँ

    तुम रोमियो हो
    इसलिए लफंगे हो
    मैं कृष्ण हूँ
    तो सच्चा प्रेमी हूँ

    आओ उस बात पर
    हम बात पर एक दूसरे को चिढाये

    तुम हमारी कौम के नहीं हो
    तो देशद्रोही हो
    मैं इस मुल्क का हूँ
    तो मैं देशभक्त हूँ
    आओ इस बात पर
    एक दूसरे के खिलाफ नफरत फैलाएं

    क्या अब इस मुल्क में
    सच बोलनेवाला कोई नहीं बचा है
    जो यह कहे
    तुम भी बेरोजगार हो
    और हम भी नौकरी के लिए भटक रहे हैं

    तुम भी परेशान हो
    हम भी परेशान हैं
    तुम भी इस देश की धड़कन हो
    हम भी इस देश की जान हैं.

    तुम भी अब केवल मतदाता हो
    हम भी केवल मतदाता हैं
    हर बार
    चुनाव में हमें कोई
    अपने जाल में फंसाता है.

     

  • हिंदू महिला बनाम मुस्लिम महिला :: हमारे दोहरे मानदंड

    Tribhuvan


     

    मैं और पूनम रात को “आजतक” पर श्वेतासिंह की रिपोर्ट देख रहे थे। सात मुस्लिम औरतों की कहानी, जो तीन तलाक से पीड़ित हैं।

    भारतीय मुस्लिम महिलाएं जिस कदर पीड़ित हैं, वह पीड़ा बहुत चिंताजनक है और इस समय सर्वाेच्च प्राथमिकता से समाधान की मांग करती है। इसमें कोई दो राय नहीं है। मुस्लिम समाज को अपने भीतर की ऐसी कालिख को खुद आगे बढ़कर धो-पौंछ डालना चाहिए। वक़्त की चाल और ज़माने की नज़ाकत को समझना चाहिए। वक़्त की मार बहुत ख़तरनाक़ होती है। जो इसे नहीं समझता, वह अगर तलवार से बच जाता है तो फूल से कटना पड़ता है।

    लेकिन . . .
    मैंने कभी नहीं देखा कि श्वेतासिंह ने इस दौर में यह रिपोर्ट भी की हो कि हमारे देश में हर साल 7646 तरुणियों को दहेज-हत्या की बलिवेदी पर बलिदान कर दिया जाता है। तलाक के बहाने छोड़ देना, सताना, ज़ुल्मो सितम करना और अमानुषिक प्रताड़नाएं देना श्वेतासिंह जैसी मेधावी एंकरों के लिए शायद मानीं नहीं रखता। कदाचित इसलिए कि तलाक़-तलाक़ और तलाक़ किसी महिला के लिए दहेज लोभियों के हाथों हत्याएं कर देने से तो कम ही बुरा है।

    यह तो हमारी नैतिकता है। यह हमारा मानदंड है। श्वेतासिंह जैसी तेजस्वी बहनों की यह तो विवेकशीलता है!

    यह आंकड़ा कदाचित् श्वेतासिंह को शायद नहीं चौंकाता, लेकिन घर बैठी मेरी पत्नी को ज़रूर चिंतित करता है कि इस देश के हिन्दू समाज में पति और रिश्तेदार हर साल 1,13,548 युवतियों को क्रूरतापूर्ण ढंग से घरों से बेदखल कर देते हैं। उन्हें सताते हैं और ज़ुल्मोसितम ढाते हैं।

    ये अत्याचार ठीक वैसे ही हैं, जैसे मुस्लिम औरतों के साथ उनके पति करते हैं। छल-कपट और धोखा। इन अत्याचारों की कहानी बहन श्वेतासिंह अपने चैनल पर बहुत नफ़ासत भरे शब्दों में चबा-चबाकर बता रही थीं।

    हमने तथ्यों को देखना शुरू किया और काफी कुछ खंगाल डाला। दहेज हत्याएं हाें, बलात्कार हों या स्त्री की मर्यादाओं को धूल धूसरित करना। हे भगवान्। ऐसा भयावह सच और ऐसी भयावनी चुप्पियां! लेकिन दहेज हत्याओं] रिश्तेदारों से प्रताड़ित हिंदू लड़कियों अौर उनकी मर्यादाओं को तार-तार कर देने वाले ये आंकड़े न तो राष्ट्रद्रोही जेएनयू से आए हैं और न ही किसी गद्दार अलीगढ़ विश्वविद्यालय से जारी हुए हैं।

    ये आंकड़े 2015 के नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के हैं और इस रिपोर्ट को तैयार करने वाले देश के मेधावी आईपीएस ऑफिसर हैं। इनमें मुसलमान तो न के बराबर हैं। सबके सब हिन्दू हैं। तन-मन और प्राण से।

    अगर हम थोड़ी सी संवेदनशीलता से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की रिपोर्ट पढ़ें तो यह आंकड़ा रुला देता है कि हमारे महान् स्त्री मर्यादा वाले देश में हर साल 34,676 युवतियों से रेप होते हैं।

    मैं जाना नहीं चाहता, लेकिन इसके भीतर नग्न सत्य से अवगत होना शुरू करूं तो पीड़ित बहनें और बेटियां भी हिन्दू ही हैं और उत्पीड़क राक्षस का वैसे तो कोई धर्म होता नहीं, लेकिन जिस तरह आजकल लोग नामों से पहचान करते हैं तो मैं कहना चाहूंगा कि इनमें गैरहिन्दू एक या दो प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं।

    तीन तलाक एक ऐसा जख्म है, जो न केवल मरहम मांग रहा है, बल्कि एक बड़े चीरफाड़ की चाहत भी रखता है, लेकिन साहब आप जो इतने सुसंस्कृतिवादी बने फिरते हैं, अपने घरों की हालत भी एक बार देख लो।

    आप जैसे गोभक्त हैं, वैसे ही आप स्त्री भक्त भी हैं। आप जैसे नारी को महान् बनाते आए हैं, वैसे ही गाय भी हमारे देश में महान् रही है। लेकिन हक़ीक़त पाखंड का पहाड़ है। इसे हर लाख साधु भी नहीं बदल सकते। एक दो की तो बात ही छोड़िए। अगर किसी ने कड़वाहट भरे सत्य आपके सामने रखे तो आप उस साधु को दूध में शीशा घिसकर दे देते हैं और एक सामाजिक क्रांति अधर में ही मर जाती है।

    मैं आज शाम जब प्रतापगढ़ से लौट रहा था तो हमारे तरुण फ़ोटो जर्नलिस्ट अमित ने कुछ फ़ोटो करने के लिए हमें रुकने को कहा। उस रास्ते पर कोई दस गाएं मेरे पास से गुजरी होंगी, सबके देहों पर लाठियों, गंडासों और अन्य धारदार हथियारों के निशान थे। अंतड़ियां भूख से बाहर आ रही थीं। मानो, कह रही हों ये जीना भी कोई जीना है! शायद हमारे यहां इसीलिए कन्याओं की तुलना गऊ से की जाती है। दोनों की तकदीर है कि वह कसाई के घर जाए कि भूखों मार देने वाले किसान के कि किसी अच्छे परिवार के, जो दूध न भी दे तो खूब खिलाए-पिलाए और सेवा करे। यह कहानी अंदर तक झकझोर देती है।

    आप कानून बनाते हैं और कहते हैं कि गाय को उत्पीड़ित करने वाले को अब आजीवन करावास होगा। आपने ऐसे कानून स्त्री सुरक्षा के नाम पर एक नहीं, हजार बना रखे हैं। आपके यहां कितने ही तो आयोग हैं। पुलिस के महिला थाने हैं। कितनी ही आईपीएस हैं और कितनी ही महिलाएं सबल राजनीतिज्ञ हैं, लेकिन ज़मीनी हालात अब भी बहुत दारुण हैं।

    लेकिन अगर आप गाैरक्षा के लिए आजीवन कारावास का कानून बना रहे हैं तो क्या आप देश की बहन-बेटियों को सताने वाले दहेज लोभियों को सार्वजनिक रूप से फांसी देने का कानून पारित नहीं कर देना चाहिए?

    साहब, एक आंकड़ा है 2125 का।

    ये वे अभागी बेटियां-बहनें हैं, जिनसे हर साल गैंगरेप होता है। इनमें 90 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू ही हैं और अपराधी 95 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू।

    कहां-कहां आंखें मूंदकर रखेंगी आप श्वेतासिंह।

    औरत को तीन तलाक और परित्यकता, देहज पीड़िता में मत बांटो।

    औरत औरत है। वह सृष्टि का सृजन करती है। उसकी सुरक्षा, संरक्षा और पोषण के लिए एक साथ एक जैसे कानून दो और अपराधियों के लिए एक जैसी सजाएं तय करो। उनमें मत देखो कि कौन हिन्दू और कौन मुसलमान।

    परित्यक्त करने वाले को भी आजीवन कारावास दो, दहेज लेने वाले को भी और तीन तलाक देने वाले को भी।

    हर आैरत को पिता और पति की संपत्ति में अधिकार दो। उसका पति बाहर कमाता है या नौकरीपेशा है और औरत नौकरीपेशा नहीं है तो उसके घर के कामकाज का एक पारिश्रमिक तय करो। पति की तनख्वाह का एक हिस्सा उसे मिले। यह प्रतिशत में ही होना चाहिए। क्या मुसलमान और क्या हिन्दू।

    हमारे ज़हन में न्याय नहीं है। हमारे ज़ेहन मेरी जाति महान, तेरी निकृष्ट और मेरा धर्म महान तेरा धर्म पतित वाली सोच से लबालब भरे हैं।

    अगर हम एक फ़ेयर आैर जस्ट सोसाइटी बनाना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें संवेदनशील और सुसंस्कृत होना होगा। इसकी ज़रूरत महसूस करनी होगी।

    ऐसा नहीं हो सकता श्वेता सिंह कि आपके धर्म में तो कानून बन गया इसलिए दहेज के लिए हत्याओं की खबरों को नीचे पट्‌टी पर भी न चलाओ और तीन तलाक पर वन आवर का पूरा प्रोग्राम करके ऐसे साबित करो कि देखो, मुल्लो तुम्हारा कोई धर्म है! औरतों को घर से निकाल देते हो तलाक-तलाक-तलाक कहकर। देखो, हमारा महान् धर्म! हम हर साल 1 लाख 13 हज़ार 548 औरतों को घर से क्रूरतापूर्वक बेदखल करते हैं, 34 हजार 651 से बलात्कार जैसा पाशविक अपराध होता है, 82 हजार 800 आैरतों की शुचिता को तार-तार करते हैं और 7646 को जीवित जला डालते हैं, लेकिन हमारे यहां कानून बन चुके हैं और हम सबने आधुनिकतावादी सभ्य होने के समस्त सम्मोहक आवरण पहन लिए हैं, इसलिए हम इतना कुछ करके भी तुम अनपढों से बहुत सभ्य कहलाते हैं।

    लेकिन याद रखो कि एक फेयर और जस्ट साेसाइटी लोगों के चैतन्य से ही बन सकती है। कोई कानून, कोई अदालत, कोई दल, कोई धर्म, कोई जाति, कोई समुदाय, कोई आंदोलन, कोई मीडिया औरत के लिए तब तक एक श्रेष्ठ समाज का निर्माण नहीं कर सकता जब तक कि लोगों के दिलोदिमाग की भूमियों पर न्यायशीलता, विवेकशीलता, समानता, स्वच्छता और निर्मलता की शस्यश्यामलता नहीं लहलहाएगी।

    यह धरती औरत के लिए रहने लायक तभी बनेगी जब आप बलात्कारी मानसिकता से ऊपर उठ जाएंगे और औरत पर किसी तरह की शुचिताओं का बोझ नहीं डाला जाएगा। पुरुष हिन्दू होकर कानून बना लेता है और औरत दग्ध हाेती रहती है। पुरुष इस्लाम और कुरआने-पाक की बात करता है, लेकिन वह औरत को बंदिनी तो बनाना चाहता है, लेकिन वे सब आज़ादियां और अधिकार देने से पीछे हट जाता है, जो कुरआन में दी जाती हैं, लेकिन सामाजिक रूप से पुरुष के खिलाफ़ पड़ती हैं। ठीक ऐसा ही चरित्र अन्य धर्मों का है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण आज का अमेरिका है, जहां 46 राष्ट्रपति हो चुके हैं और 226 साल बीत चुके हैं, वहां लोकतंत्र आए, लेकिन मज़ाल कि किसी औरत को वह देश राष्ट्रपति बन लेने दे। दुनिया के इस सबसे ताकतवर देश में ऐसा व्यक्ति तो राष्ट्रपति बन सकता है, जो महिलाओं से याैन दुर्व्यवहार के लिए कुख्यात हो, लेकिन आर्थिक सदाचरण के मामले में थोड़ा संदिग्ध महिला राष्ट्रपति नहीं बन सकती।


    Credits: Tribhuvan’s facebook wall.