जामुन का भूत

Shayak Alok

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यह अजब कहानी है. कोई दलित मरा है तो उस दलित के मर कर भूत हो जाने की कहानी उसी वर्ग की तरफ से (कानी बुढ़िया) फैलाई गई है. (प्रतिरोध ने मिथक रच लिया है क्योंकि मिथक अंधाधुंध समर्थन के लिए मनोवैज्ञानिक काम करता है). और अब यह भूत सत्ता के सब प्रतीकों पर हमला कर रहा है. पहले उसने किसी प्रतीक में आर्थिक शोषण तंत्र (साहूकार) को पटका और फिर उसे पवित्र घोषित करने वाली ब्राह्मणवादी व्यवस्था (राम नारायण पंडित) को, जिसका उससे नेक्सस है. यह नेक्सस न केवल आर्थिक शोषण तंत्र को धार्मिक नैतिकता प्रदान करने में है बल्कि ब्राह्मण वर्ग खुद भी सदियों से आर्थिक शोषण का प्रकट भागीदार है (उसके बाप के बाप ने). यह कविता फिर एक हमला उस विडंबना पर कर देती है जहाँ जिंदा नंगे भूखों का कोई महत्व नहीं, लेकिन मृत पत्थर प्रतीकों को किसी अलौकिक भय से पूजा जाता है (गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत हर शनिवार को खाता है बताशे ). विमर्श का उत्थान यह है कि अफवाह से उभारा गया यह नायक या यह प्रतिरोध केवल हमलों तक सीमित नहीं है बल्कि अपने शोषित वर्ग के लिए न्यायपूर्ण व्यवस्था की स्थापना भी करने लगा है. यह स्थापना उस वर्ग का भय दूर करने और उसे साहस देने में प्रकट है (नहीं डरती चंपा). और अंत में कविता चुनावी लोकतंत्र के संक्रमण पर हमला कर देती है जहाँ यह नग्न खुलासा कर देती है कि एक शोषित वर्ग के उभार के विरुद्ध सामाजिक-आर्थिक सत्ता और राजनीतिक सत्ता के बीच एक गठजोड़ हो जाता है (भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए). मैंने यहाँ भारतीय संदर्भ का वास्तविक पाठ ही लिया है जहाँ शोषितों के किसी प्रतिरोध आंदोलन को शोषितों के विरुद्ध ही प्रस्तावित कर सरकारें उनके दमन का तर्क ढूंढती हैं. एक अजीब बात और हुई है कि प्रेमचंद की कई कहानियों के विवश व नैसर्गिक व सुरंग-बंद अंत की तरह यह कविता यूँही समाप्त नहीं होती और एक संभावना, एक रौशनी का संकेत देती है कि जामुन का भूत नया जामुन ढूंढ सकता है.

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जामुन का भूत

किसी गाँव में जब गोबर नाम का दलित मरा तो भूत हो गया
तो वह भूत रहने लगा उसी गाँव के बँसवारी में
पहलेपहल तो यह बात कानी बुढ़िया ने कही और
फिर किस्से शुरू हो गए.

एक दिन जब गोबर ने उठा पटक मारा बगल गाँव के सुखला साहूकार को
और उसका बटुआ भी छीन लिया तब तो बड़ा हंगामा हुआ
सुखला का गमछा पाया गया गाँव से दो कोस दूर
ऐसा बिछा हुआ जैसे गोबर ही उस पर सुस्ताने दो दम मारा हो.

तो तय यह पाया गया कि हाथ पैर जोड़ कर बुला लिया जाय रामनारायण पंडित को
और खूब जोर से कच्चे धागे से बंधवा दिया जाए उस नासपीटे जामुन को
जामुन जो बँसवारी का अकेला ऐसा पेड़ था जो बांस नहीं था.

लेकिन उसी रोज रात में घटी एक और घटना
‘न देखा न सुना’ – कहती है रामजपन की माई भी
बिशो सिंह के दरवाजे सत्तनारायण संपन्न करा के लौट रहे रामनारायण पंडित को
बँसवारी के आगे धर दबोचा गोबर ने
और ऐसा भूत मन्त्र मारा कि गूंगे हो गए बेचारे
बोलते हैं तो सिर्फ चक्की के घिर्र घिर्र की आवाज़ आती है.

कहते हैं कि गोबर के दोमुंहे पुराने घर थी ऐसी ही एक चक्की जो
उसके बाप ने अपने बाप के श्राद्ध में रामनारायण को गिरवी बेचा था.

खैर जामुन के भूत को बाँध दिया गया और गोबर से शांत रहने की प्रार्थना की गई.

गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा उसका भूत
हर शनिवार को खाता है बताशे
कभी भूख बढ़ने पर जन्मते ही खा जाता है मवेशियों के बच्चे
अपने साथी भूतों के भोज के लिए एक दिन जला डाला मुर्गों का दड़बा
चबाई हड्डियाँ डोभे में फेंक दी.

गोबर के भूत ने न्याय भी लाया है गाँव में
मुंह अँधेरे अब शौच जाने से नहीं डरती चंपा
हर महीने सरसतिया के जिस्म पर आने वाला भूत अब नहीं आता
गुनगुनाते हुए बड़े दालान से गुजर लेती है अठोतरी.

सुना है गोबर अन्य भूतों संग रोज रात को बँसवारी में करता है बैठकें
हंसने और जोर जोर से बतियाने की आवाज़ आती है.

टीवी पर जब से आई है गोबर की कहानी
सरकार फिक्रमंद है आम जान माल को लेकर
भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए
इसलिए सेना निपटेगी उनसे लोकसभा चुनाव के पहले पहल.

मजे में जी रहे जामुन के भूत को दूसरा जामुन ढूंढना होगा.

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