Category: आपके आलेख

  • “इन्तजार”

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    1.

    सह लूँगा
    तुम्हारी हर आलोचना
    गालियाँ भी ….
    आखिर इनके बीच जल कर ही तो
    फिनिक्स की तरह,
    जन्म लूँगा ….. !!
    इन्तजार करना बस !! 

    2.

    ज़िन्दगी की चक्की में
    खुद को इतना पीस दिया
    कि, ‘सच’, कुछ खोते चले गए
    बस कर रहा अब इन्तजार
    पिसने के बाद पाने का….

    3.

    मेरी राख पर
    जब पनपेगा गुलाब
    तब ‘सिर्फ तुम’ समझ लेना
    प्रेम के फूल !!
    इन्तजार करूँगा सिंचित होने का

    .

  • शिवरात्रि का बोध उत्सव

    त्रिभुवन

    [themify_hr color=”red”]

     

    मित्रो, फ़ेसबुक पर बहुत तीखी बहसें की हैं। टिप्पणियां की हैं। आपको बहुत बार बुरा भी लगा होगा। किसी ने गाली दी, किसी ने सलाह दी और किसी ने नेकनीयती से लिखने को कहा। किसी ने कहा कि मैं तटस्थ होकर रहूं और किसी हितचिंतक ने परामर्श दिया कि मुझे निष्पक्षता से काम लेना चाहिए।

    मैथ्स का छात्र रहा हूं। इसलिए माना कि से ही काम चलाता हूं। माना कि आप ऐसे हैं, माना कि आप वैसे हैं। लेकिन मैथ्स ने यह भी सिखाया है कि इति सिद्धम या क्यूईडी तभी होता है जब हम दो या तीन फार्मूलों से उस माना कि को सिद्ध कर लें। बीज गणित हो या अंकगणित या त्रिकोणमिति।

    बहुत बार मैंने लिखा भी है कि मेरी वह मान्यता है, जो आप सबसे विचार करने के बाद बनेगी। अभी जो लिख रहा हूं या कह रहा हूं, वह मेरी मान्यता नहीं है। यानी सब तर्क-वितर्क और तथ्य जान लेने के बाद हम जो फ़ैसला करते हैं, वही मान्य होना चाहिए। सिद्धांत भी यही है। विज्ञान भी यही सिखाता है।

    हमें लॉ की क्लास में त्यागी जी कई बार एक जज का किस्सा सुनाते थे। एक महिला बोली : जज साहब, जब मेरी खिलाफ पार्टी के वकील साहब बोले तो आपने कहा, यू आर राइट, जब मेरा वकील बोला तो आपने कहा, यू आर राइट। ये भला कोई कोई न्याय की बात हुई जजसाहब? जज बोले : यू आर आल्सो राइट!

    फ़ेसबुक पर इतनी लंबी बहस और इतनी तीखी प्रतिक्रियाओं के बाद मुझे लगता है कि मंथन एक निष्कर्ष पर पहुंचा है। और वह निष्कर्ष यह है कि हमें ऐसे नए विकल्प तलाशने बंद करने चाहिए, जो जड़तावाद या यथास्थितिवाद को बढ़ाते हों। हमें अपने प्रतिपक्षी की राय को सुननाचाहिए। चाहे वह कितनी भी कड़वी हो। लेकिन हमें अपनी पार्टियों और उनके आचरण में सुधार की मांग करनी चाहिए।

    यह देश और समाज तब बढ़िया बनेगा, जब एक बेहतर बीजेपी, एक बेहतर कांग्रेस, एक बेहतर कम्युनिस्ट पार्टी, एक बेहतर समाजवादी पार्टी, एक बेहतर बसपा, बेहतर तृणमूल हमारे देश में होगी। आप अपनी नीति के अनुसार चलें, लेकिन ईमानदारी बरतें। पारदर्शिता रखें। सब आपस में एक मर्यादित भाषा में बहस करें। खुलकर बोलें और एक दूसरे से प्रेम रखें।

    यह देश बेहतर और ताकतवर तब बनेगा, जब हम अपने अतीत की गलतियों से सीखेंगे और अपने देश की मौजूदा प्रतिभाओं का, कलाकारों का, साहित्यकारों का, इतिहासकारों का सम्मान करेंगे। यह परंपरा देश में बहुत पुरानी है। कोई आपके विचार का नहीं है, इसलिए आप उसे सांप्रदायिक या देशद्रोही घोषित कर दें, यह संकीर्णता आपका नहीं, इस देश का नुकसान करती है।

    हमारा देश, हमारी दुनिया और हमारी धरती माता इस समय भयावने खतरों से जूझ रही है। ग्लोबल वार्मिंग के खतरे का अजगर जीभें लपलपा रहा है। यह मानव समुदाय के लिए एक बड़ा खतरा है। जनसंख्या अपार ढंग से बढ़ रही है। यह जल्द ही 9.5 बिलियन होने जा रही है और हमारी धरती माता सिर्फ़ और सिर्फ़ आठ बिलियन जनसंख्या को वहन करने की ही क्षमता रखती है।

    कृषि का संकट एक नया खतरा हो गया है। किसान डूबता जा रहा है। पर्यावरणीय, मानवीय और सरकारी फैसलों ने कृषि को ऐसे विकराल दौर में ला दिया है, जहां अन्न उत्पादन गिरने वाला है और जनसंख्या बढ़ने वाली है। पिज्जा और बर्गर संस्कृति की गोद में अनचाहे ही हमें पटका जा रहा है। खेती का एरिया सिमटता जा रहा है।

    जल संकट एक और विकराल समस्या बनने जा रही है। पीने का जो पानी कभी पवित्र था और जिस शीतल जल के लिए हमारे बड़े-बुजुर्ग प्याऊ खोला करते थे, उस महान् संस्कृति को कार्पाेरेट कल्चर काल कवलित कर गई है और दूषित पानी सड़े हुए प्लास्टिक की दूषित बोतलों में बिक रहा है। यह मानव स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन गया है। जिस पानी के कारण आपको सबसे ज्यादा बीमारियां होने का डर फैलाया गया, उसका बोतलबंद विकल्प अब हमारे शहरों में अस्पतालों का एक जंगल खड़ा हो चुका है।

    और सबसे बड़ा और पांचवां खतरा यह है कि ऐसी बीमारियां दस्तक दे रही हैं, जिन पर इनसान जीवन भर की कमाई खर्च कर देता है, लेकिन फिर भी स्वस्थ नहीं हो पाता। हमारे विश्वविद्यालय विवादों में लाकर हमारे आत्मसंस्कारों की संस्कृति को विनाश की तरफ धकेला जा रहा है। विकल्प ये है कि हम अपनी महान् रवायतों को और संस्थानों को नष्ट नहीं होने दें, बल्कि उनमें कुछ खराबी है तो उसे दुरुस्त करके और बेहतर बनाएं।

    मित्रो, ये ऐसे ख़तरे हैं और इतने भयावने हैं कि इनका हल किसी कम्युनिस्ट पार्टी, किसी कांग्रेस, किसी आरएसएस, किसी तृणमूल, किसी बसपा, किसी आम आदमी, किसी अभियान, किसी एनजीओ, किसी सरकार या किसी जाति, किसी धर्म या किसी संस्कृति के पास नहीं है। किसी इस्लाम, किसी हिन्दू, किसी बौद्ध, किसी क्रिश्चियनिटी या किसी ताओइज्म के पास नहीं है।

    हल है, लेकिन सब मिलकर करें और एक कॉमन मानव समुदाय के हित को लेकर चलें तो। मिलकर लड़ें तो।

    ये सब दल, सब संस्कृतियां, सब धर्म और सब राजनीतिक दल और उनसे ऊपर के बहुतेरे संगठन, एक कालखंड में लोगों ने उस काल की समस्याओं को लेकर तैयार किए थे। अगर इस्लाम हल होता तो आज दुनिया में सबसे ज्यादा मुसलिम ही मुसलिमों के आपसी संघर्ष में नहीं मारे जाते। ठीक ऐसा ही हिन्दुओं और ऐसा ही अन्य धर्मों के साथ हैं।

    मानव समुदाय को एक होकर ही आगे बढ़ना होगा। अब समय आ गया है कि हम जाति, नस्ल, धर्म और राष्ट्र के नाम पर लड़ना बंद करें। आज राष्ट्रीयतावाद भी एक नया खतरा बन गया है, क्योंकि जितनी भी समस्याएं हैं, उनकी विकरालता ऐसी है कि उनके सामने हमारे राष्ट्रों की क्षमता भी कमतर है। अब इस्लाम को हिंदुत्व के साथ अपनी सकारात्मकताआें के साथ कंधा मिलाकर चलना होगा और हिंदुत्व को इस्लाम के साथ। भारत को पाक के साथ और पाक को भारत के साथ।

    आपके समस्त विश्वास पवित्र और पावन हैं। आपके सब राष्ट्र महान हैं। आप उनका सम्मान करें, लेकिन धर्मों, जातियों, राष्ट्रीयताओं और सांस्कृतिक श्रेष्ठताओं के अहंकारों के विष को शिव की तरह पीकर अपने कंठ में स्थापित कर लें। नीलकंठ बनें। नीलकंठ की पूजा करनी है तो उसकी गगनचुंबी प्रतिमा नहीं बनाएं। धन का अश्लील प्रदर्शन नहीं करें। धर्म का कार्पोरेटाइजेशन नहीं करें। धर्म को धर्म रहने दें।उस धन को अशिक्षा, गरीबी, दु:ख, तकलीफ़, पिछड़ापन, गुरबत, भेदभाव, अत्याचार और जुल्मोसितम मिटाने के लिए खर्च करें। यही सच्चा शिवत्व है। बाबा लोग जो मूर्तियां बना रहे हैं, वह शिवत्व नहीं है। वह शिवत्व का अपमान है।


    फेसबुक वाल से साभार

  • इनकम, इनकमटैक्स और हमारा पोपट

    Amar Tripathi

    [themify_hr color=”red”]

    दुनिया में सिर्फ दो तरह के लोग बसते है :

    एक जो पैसे के लिए काम करते हैं।
    दूसरे जो अपने पैसे से काम लेते हैं।

    आप कारीगर हैं, किसान हैं, मिल या फैक्ट्री के मजदूर हैं, अध्यापक हैं, बुद्धिजीवी हैं, पेंटर हैं, कलाकार हैं, सरकारी,अर्ध सरकारी या निजी उपक्रम में कर्मचारी हैं, 

    तो जाहिर है आप पैसे के लिए काम कर रहे हैं। 

    यदि आप व्यापारी हैं या उद्योगपति हैं तो स्पष्ट है की आप अपने पैसे से काम ले रहे हैं।

    आप सभी अपनी आय के अनुसार सरकार को इनकमटैक्स भी देते हैं।

    अब सिर्फ ये समझना बाकी है कि इनकम टैक्स की व्यवस्था किस तरह उन लोगों के पक्ष में झुकी हुयी है कि जो अपने पैसे से काम लेते हैं

    और उनका पोपट कैसे बन गया जो पैसे के लिए काम करते हैं।

    अब थोड़ा इनकम टैक्स की पृष्ठभूमि में चलते हैं। 

    इनकमटैक्स ही नहीं किसी भी टैक्स की ईजाद राज्य द्वारा प्रत्यक्ष अपने खर्चे चलाने के लिए की गयी परन्तु ऐसा करते हुए इस बात का ध्यान रखा गया कि इसका बोझ उनके ऊपर न पड़े जो आर्थिक रूप से सक्षम नहीं हैं, इसीलिए टैक्स वसूली की जद में सामान्य रूप से धनिकों को ही रखने का प्रचलन रहा।

    प्राचीन रोम में केवल संपत्ति कर लिया जाता था जो कि संपत्ति (भूमि, भवन, पशुधन, गुलामो की संख्या, मूल्यवान वस्तुओं और नकदी) की कुल मूल्य का १ % वार्षिक होता था, लेकिन युद्ध के दिनों में बढ़ा कर ३% तक कर दिया जाता था। इसके अलावा दसवीं शताब्दी के चीन में ‘सिन’ साम्राज्य के ‘वैंग मैंग’ नामक सम्राट ने १०% वार्षिक तक का टैक्स लगाया लेकिन वह मात्र १३ साल चल पाया और उसके बाद आने वाले ‘हान’ साम्राज्य में फिर से पुरानी टैक्स दर लागू कर दी गयी। परन्तु इनकमटैक्स सबसे पहले लागू किया गया ११८८ के इंग्लॅण्ड में, तीसरे क्रूसेड के खर्चे पूरे करने के लिए, जब हर खासो-आम से उसकी चल संपत्ति और नकदी का १०% वसूला गया।

    इसके बाद में १७९८ के दौरान ग्रेट ब्रिटेन में ब्रिस्टल के डीन के सुझाव पर प्रधानमंत्री विलियम पिट ने प्रति पौंड २ पेन्स (तब १२० पेन्स का एक पौंड होता था) का इनकम टैक्स लगाया जिसका मकसद फ़्रांसीसी क्रांति से उपजे युद्ध के लिए हथियार खरीदना था। यही पर पिट ने ही सर्वप्रथम बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों से टैक्स वसूलने के प्रथा शुरू की। उसके समय ६० पौंड (अबके लगभग ६००० पौंड) के ऊपर की आय वालों से २ शिलिंग प्रति पौंड की दर से टैक्स लिया गया जो लगभग १०% बैठता है। हालाँकि यह टैक्स १८०१ में ख़त्म किया गया, फिर १८०३ में हेनरी अड्डिंग्टन द्वारा शुरू किया गया जो १८१६ में फिर खत्म किया गया। 

    इनकम टैक्स की विधिवत शुरुआत १८४२ के इनकम टैक्स एक्ट से हो सकी जो कि बढ़ती हुयी आय पर बढ़ी दरों वाले हेनरी अड्डिंग्टन माडल पर ही आधारित थी। हालाँकि उस समय इसका विरोध भी हुआ लेकिन धीरे-धीरे १८६१ तक इनकम टैक्स वहां की टैक्स व्यवस्था का अंग बन गया। 

    अमेरिका में भी इसी दौरान सरकार ने इनकम टैक्स लागू किया जो कि १९१३ के संशोधन के बाद वहां भी स्थायी हो गया।

    इस छोटे से विवरण से यह तो स्पष्ट है ही कि राज्य द्वारा युध्द या दूसरे आकस्मिक खर्चों को पूरा करने के लिए लगाये गए इनकम टैक्स की अवधारणा ने अंततः स्थायी रूप ले लिया, लेकिन फिर भी मूल रूप से यह टैक्स धनिक वर्ग से ही वसूला जाता था, जिनमें वही लोग होते थे जो वहुधा अपने पैसों से काम लेते थे, न कि पैसों के लिया काम करते थे। अब देखिये कि इस व्यवस्था का पोपट कैसे बना —-

    लेकिन इसके पहले जरा उनकी भी पड़ताल कर ली जाये की जो अपने पैसे से काम लेते हैं। सन १६०० तक शुद्ध और मुक्त व्यावसायिक कंपनियां नहीं होती थीं। यूरोप के कुछ देशों ने अपनी अपनी संसद के चार्टर से चंद लुटेरी कंपनियां बना रखी थीं जिनका काम दूसरे मुल्कों में जाना, व्यापारिक समझौते या युद्ध के माध्यम से उनकी संपत्ति हड़पना ही होता था, ईस्ट इंडिया कंपनी भी उनमे एक थी जिसने प्लासी की लड़ाई के बाद से भारत पर अधिपत्य जमाया। उस समय भी कंपनियों में सरकार की कोई सीधी आर्थिक भागीदारी नहीं होती थी लेकिन परोक्ष रूप से उन पर सरकार का पूर्ण नियंत्रण रहता था।

    विस्तृत इतिहास में न जाते हुए केवल इतना बताना प्रासंगिक होगा कि धनिक वर्ग शुरू से राज्य सत्ता का सहयोगी तो रहा है लेकिन राज्य सदैव उसे नियंत्रण में भी रखता रहा है, जिससे एक तनावपूर्ण संतुलन सदैव बना रहता था …और इसी संतुलन की वजह से देशों की आतंरिक आर्थिक प्रगति भी संभव हो सकी। ग्लेडस्टोन के ज़माने में १८४४ में आये कानून के माध्यम से ही आधुनिक व्यापारिक प्रतिष्ठानो का गठन संवैधानिक रूप से संभव हुआ। अमरीका में भी यह प्रक्रिया सबसे पहले न्यू जर्सी में १८९६ में शुरू हुयी। इसके बाद हुए अनेक कानूनी परिवर्तनों के माध्यम से हिस्सेदारी के स्वरूप तय किये गए और कंपनियों को स्वतन्त्र वित्तीय इकाई के रूप में प्रतिष्ठा मिली ।

    इसके बाद लगभग आधे दशक तक कम्पनियाँ बनी, शेयर निर्धारण के तौर तरीके, उनके बाजार विकसित हुए और साथ ही विकसितहुए विविध मैन्युफैक्चरिंग उद्योग, जिसके बल पर चारों और तमाम नयी-नयी वस्तुओं के ढेर लग गए और हम अपने को अत्यंत प्रगतिशील समझने लगे । वस्तुतः हमारी प्रगतिशीलता विचारों से फिसल कर वस्तुओं में केंद्रित होने लगी थी । इसके बाद १९५० के दशक में सरकार पर कंपनियों पर से नियंत्रण कम करने के लिए दबाव की मुहीम शुरू हुयी, और सफल भी हुयी जिसकी चर्चा हम अर्थसत्ता-१ व २ में कर चुके हैं।

    यूरोप में औद्योगिक विकास के साथ ही गरीब-अमीर के बीच की खाई बढ़नी शुरू हो गयी थी और उसी के साथ विकसित हुयी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा, जिसमे राज्यसत्ता ने, टैक्स द्वारा प्राप्त धन को गरीबों और निर्बलों की स्थिति सुधारने में भी व्यय करने की योजना बनायी और इनकम टैक्स बढ़ती आय पर बढ़ती दर के हिसाब से ही लगाया, जो सर्वथा न्याय सांगत जान पड़ता था, और वास्तव में था भी।

    इसी के साथ उन लोगो ने —जो पैसे से काम लेते हैं, अपनी हैसियत के अनुसार, छोटी बड़ी कम्पनियाँ बनानी शुरू कर दीं। अत्यंत छोटी हैसियत की मालिकाना हक़ वाली कम्पनियाँ भी खूब बनी। साथ में आय को पारिभाषित करने का फार्मूला ऐसा विकसित हुआ जो कि ‘पैसे से काम लेने’ वालों के हक़ में था; और वही आज भी लागू है।

    फर्क यही से शुरू होता है—– किसी कंपनी की आय, उसे प्राप्त कुल व्यापारिक भुगतान में से सारे खर्चे काट कर बची हुयी राशि को माना जाता है, जब कि किसी व्यक्ति को उसके श्रम के बदले मिले हुए सकल भुगतान को। अब टैक्स का निर्धारण तो आय पर ही होना है।

    नतीजा—

    आज हर वेतन भोगी पैसे कमाता है, पहले टैक्स अदा करता है उसके बाद खर्च कर पाता है। 

    जब कि हर व्यवसायी पैसे कमाता है, पहले जी भर खर्च करता है,खर्च के वाउचर जमा करता है फिर बचे हुयी राशि पर टैक्स अदा करता है ।

    यानि की जो कर व्यवस्था सामान्य और निम्न वर्ग की स्थिति सुधारने के लिए बनायी गयी थी वह उन्ही की आय में कटौती का वायस बन रही है, जब कि व्यावसायिक वर्ग/धनिक वर्ग के जीवन यापन के स्तर पर इसका तनिक भी प्रभाव नहीं है।

    हो गया न हमारा पोपट !

    अब इसमें बढ़ती मुद्रा स्फीति के अनुपात में टैक्स स्लैब का न बढाया जाना और कोढ़ में खाज का काम करता है।


    Credits: http://arthsattaa.blogspot.com.au/2016/12/blog-post.html

  • गधा पचीसी

    Vimal Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    मैं एक गधा हूँ
    चाहूँ तो कुछ भी बन सकता हूँ
    चुनाव में खड़ा भी हो सकता हूँ
    किसी योग्य उम्मीदवार को हरा कर
    जीत भी सकता हूँ

    फिर मंत्री भी बन सकता हूँ

    फिर एक दिन
    इस मुल्क का प्रधानमंत्री भी
    मैं एक गधाहूँ
    अपने मालिक का बहुत वफादार हूँ
    इसलिए तो नहीं किसी बातसे शर्मशार हूँ
    फिर क्या कुछ भी बनसकता हूँ

    अगर कुछ लिखने आता हो
    तो अखबार में
    आता हो कुछ बोलने उटपटांग
    तो टी वी का पत्रकार
    भी बन सकताहूँ

    तेल मालिश की कला में अगर हूँ
    निपुण
    तो सम्पादक भी बन सकता हूँ

    मैं एक गधा हूँ
    इसलिए हाँ में हाँ मिलाने की कला अच्छी तरह जानता हूँ
    हुक्म तामिल करने आता हो
    अगर १८० फीटका तिरंगा लहरादूँ
    तो किसी विश्विद्यालय का कुलपति भी बन सकता हूँ .

    मैं एक गधा हूँ
    लेकिन जन्म से नहीं
    बल्कि डिग्री से
    इसलिए कुछभी बन सकता हूँ
    किसी अकेडमी का अध्यक्ष
    फिर क्या पुरस्कार भी झटक सकता हूँ

    बहुत सरे गधे हैं
    इस मुल्क में
    उनमे एक मैं भीहूँ
    गधों के मेले में हूँ
    खड़ा
    बिकने के इंतज़ार में

    ढेन्चू ढेन्चू कर सकता हूँ मैं
    किसी के प्यार में

    मैं एक गधा हूँ
    इसलिए आप यह न कहें
    यार इस उम्र मे
    आखिर
    तुम भी क्या करते हो
    इसतरह
    गदह पचीसी


    फेसबुक वाल से साभार

  • सामाजिक सुरक्षा अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिले

    आज दिनांक 23 फ़रवरी 2017 को बिहार चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स पटना के सभागार में असंगठित क्षेत्र कामगार संगठन के द्वारा सामाजिक सुरक्षा अधिकार अभियान  के तहत राज्य अस्तर पर विमर्श सभा का आयोजन किया गया इस मौके पर मनानिये दुलाल चाँद गोस्वामी पूर्व शर्म संसाधन मंत्री, श्री विद्यानंद विकल पूर्व अध्यक्ष अनुसुचित जाति योग, श्री बिन्देश्री सिंह राष्ट्रीय शरीक सघ के अध्यक्ष, श्री दुनु राय साझा मंच दिल्ली अवम असंगाथिक छेत्र कामगार संगठन के 28 जिलो के पर्तिनिध, सौरभ कुमार एक्शन एड रुपेश कुमार भोजक का अधिकार अभियान बिहार, कपिलेश्वर राम अध्यक्ष दलित अधिकार मंच, राकेश सचिव बिहार विकलांग अधिकार मच, आश्र्फी सदा अध्यक्ष मुसहर विकास मच, महफूज़ आलम अध्यक्ष जन अधिकार पार्टी पटना विश्वविध्यालय रंजम कुमार निदान संस्था, राकेश त्रिपाठी सदस्य नासवी अवम अनन्य जन संगठन के पर्तिनिधि इस विमर्श सभा में शामिल हुए।

    कार्यकर्म के शुरवात में संगठन के राज्य संयोजक विजय कान्त ने बिहार के असंगाथिक क्षेत्र के कामगारों की समस्यावो वो मुद्दों पर विचार प्रकट करते हुए असंगठि कामगारों के हक़ में नागरिक मांग पत्र के 18 सूत्री मानगो को पढ़ कर सदन में प्रस्तावित किया. संगठन के रन निति व वैचारिक सलाहकार पंकज श्वेताभ ने बिहार में असंगाथिक क्षेत्र कामगार सामाजिक सुरक्षा अधिनियम 2008 की समीक्षा प्रस्तुत करते हुए कहा की असंगठित कामगारों के हक़ में बने इस अधिनियम को बिहार सरकार लागु करने में अनदेखी कर रही है, उक्त अधिनियम के मुताबिक राज्य नियमावली का निर्माण नहीं हुआ, बिहार राज्य अस्तर पर सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का गठन नही हुआ, असंगठित कामगारों का निंधन व यूनिक नंबर युक्त स्मार्ट कार्ड को अब तक निष्पादन कार्य सरकारी अस्तर से नही किया गया, बिहार के प्रतेक जिला स्तर पर अबतक श्रीमिक सुचना संसाधन केंद्र की स्थापना भी नही हुआ. इन संदर्भो में उन्होंने नागरिक मांग पत्र का हवाला देते हुए कहा की देश के 94% व बिहार में 96% असंगठित क्षेत्र के दायरे में कामगारों के हक़ में संवैधानिक संसोधन कर सामाजिक सुरक्षा अधिकार को मौलिक अधिकार  के अंतर्गत सम्मान पूर्ण जीवन जीने का अधिकार के रूप में मान्यता दिलाने, असंगठित कामगारों के हित में राष्ट्रीय व राज्य सरकारों के वित्तय बजट का 10% हिस्सा का प्रावधान होना चाहिए, न्यूनतम मजदूरी के सिधांत का समीक्षा बर्तमान के महंगाई दर को ध्यान में रखते हुए नयी निति बननी चाहिए ताकि श्रमिको को उनका श्रम का उचित व सम्मान पूर्ण मूल्य प्राप्त हो, विशाल असंगठित संगार तबके के हित के लिए नोटी व योजना तथा राज्य व राष्ट्र की अर्थव्यस्था को मजबूत करने हेतु राज्य स्तर पे श्रमिक आयोग का भी गठबं करना आवश्यक है साथ ही वृधा, विधवा, विकलांग पेंशन योजना के तहत लाभुको को कम से कम पांच हज़ार रुपया या न्यूनतम मजदूरी का पचास फीसदी मासिक दर के हिसाब से मिलने का प्रावधान होना चाहिए ताकि वे सभी सम्मानपूर्ण जीवन जीने का अधिकार को सही मायने में जनहित में दिखे. इन तमाम मुद्दों को ध्यान में रखते हुए सभागार में उपस्थित विभिन्न जन्संगाथानो अवम ट्रेड यूनियन के प्रतिनिधियों से अपील किया की पुरे प्रदेश में सभी असंगठित कामगारों को न्याय दिलाने के लिए सामाजिक सुरक्षा अधिकार अभियान को जन व्यापी अभियान बनाने हेतु आगामी समय में अपनी एकजुटता दिखाए. इस अवसर पर उपस्थित एटक के उप महासचिव गजनफर नवाब में सभी को उत्साहित करते हुए संगठन के द्वारा प्रस्तावित पंग पत्र को जायज बताते हुए बिहार में एक बड़ी जन अन्दोलन का आगाज़ को अंजाम देने की अपील की. इस मौके पे उपस्थित दुलाल चंद गोस्वामी एवं विद्यानंद विकल ने संगठन के दुवारा मांग पत्र को समर्थन करते हुए कहा की यह जन आन्दोलन बिहार से शुरू होकर राष्ट्रीय स्तर पर एक महासम्मेलन का आयोजन भी हो ताकि किन्द्रिय सरकार इन प्रस्तावों के आलोक में असंगठित कामगारों के हित में नये सिरे से एक विशेष निति, अधिनियम 2008 का संसोधन हो तथा सामाजिक सुरक्षा अधिकार को संवैधानिक संसोधन के उपरांत मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता मिले. इस कार्यकर्म के आयोजन में संगठन के अजय कुमार, अभिषेक कुमार, सुनील बासु, नीलम,आदि ने मुख्य भूमिका निभाई।

     

  • मेरी खुराक है गलत का विरोध

    Neelam Basant Nandini

    [themify_hr color=”red”]

    मेरी ख़ुराक है
    गलत का विरोध
    शक्ति है..
    मैंने खुद अर्जित की है

    बदले में मतलबी, घंमडी, आलसी
    और बुरी लडकी के खिताब पाए हैं..

    अभी भी पूरी शक्ति से विरोध नहीं कर पाती
    रिश्ते, मान-सम्मान
    आड़े आ जाता है
    अक्सर एक संस्कारी लडकी से
    पराजित हो जाती हूँ मैं..

    नौ गज लंबी ज़ुबान
    चपड़ चपड़ चलती है
    औरत जात को इतना नहीं बोलना चाहिए

    मेरी दूर की दीदी की आँख डैमेज कर दी
    उन लोगों ने
    इतना भी मुँह नहीं चलाना चाहिए था उनको
    तो क्या हुआ उनकी माँ को वैश्या बोल दिया तो….
    पति/सास से बराबर ज़ुबान नहीं लड़ानी चाहिए थी…

    पर कोई कीड़ा है
    मेरे अंदर.. मेरी दूर की दीदी और उन जैसी कइयों के अंदर.. https://remotepilot101.com
    चुप्प नहीं रह पाता
    बोलता है.. बहुत बोलता है
    जब तक खुद पर लगे आरोप खारिज़ नहीं कर देता..
    बोलता जाता है…

    ये बोलना या मुंह चलाना
    एक तरह से मजबूत पकड़/रस्सी है
    जो अवसाद के कुँए में नहीं गिरने देती
    जो न बोला तो धम्म से डिप्रेशन…!!

    बोल बोल के अपने हक में लड कर
    हल्की हो लेती हैं…
    हम बदजुबान लड़कियाँ
    इसीलिए टिकी रहती हैं

    .

  • कविता – “टचवुड”

    Mukesh Kumar Sinha

    अव्यवस्थित भावनाओं को
    बेवजह समेटने की कोशिश भर हैं
    मेरी प्रेम कविताएं

    जिसकी शुरूआती पंक्तियां
    गुलाबी दबी मुस्कुराहटों के साथ
    चाहती हैं
    हो जाएं तुम्हें समर्पित

    पर स्वछंद हंसते डिंपल से जड़ी मुस्कान और
    तुम्हारे परफेक्ट आई क्यू के कॉकटेल में
    कहीं खोती हुई ये कविता
    प्रेम की चाहत को जज़्ब करती है
    जैसे जींस के पीछे के पॉकेट में बटुए को दबाये
    तुमसे कहना चाहती है
    ‘आज तो कॉफी का बिल तुम ही भरना’
    प्रेम भी तो अर्थव्यवस्था का मारा हुआ है आखिर

    सारी वैचारिक्ताएं शहीद हो जाती है
    जब तुम कॉफी हाउस में
    टेबल पर उचककर
    चाहती हो मेरे आँखों में झांकना
    लेकिन मेरी फिसलती नज़र
    मौन होकर भी पूछती है
    तुम्हारे टीशर्ट का साइज़ एक्सएल है न?

    बिना इतराये, ख़ार खाये
    कहती हो तुम, शोख मुस्कराहट के साथ
    ‘ओये! ऊपर देख।’

    मैं भी, तब
    इस ‘ओये’ पर चाहता हूँ
    हो जाऊं कुर्बान
    पर पढ़ा है, अब मजनूं मरते नहीं

    मेरा तुम्हारे लिए आकर्षण
    तुम्हारा मेरे प्रति झुकाव
    हम दोनों के बीच
    पनपता रहस्यमयी अहसास
    जैसे जेम्स हेडली चेज़ का जासूसी उपान्यास
    अंतिम पन्ने से पता चलेगा
    प्रेम ही तो है,
    अनबिलिवेबल प्रेम!

    नहीं मेरे अहमक!
    वी आर ओनली फ्रेंड्स
    – तुम्हारे मादक होंठ काँपे थे
    कोई न,
    दोस्त तो हैं न!
    टचवुड!


    फेसवुक वाल से साभार

  • अपने लिए ही हिंसा के जाल बुनते हुए हम

    आज जिस समाज में हम खड़े है हमारे चारों तरफ भय और हिंसा का माहौल है , किसी भी कीमत पर एक दूसरे को पीछे धकेल कर आगे बढ़ने ही होड़ मची है . हजारों सालों में हिंसा को इतना सूक्ष्म किया है की हमारा दैनिक जीवन जाने अंजाने  बिना किसी का भोग किये , शोषण किये आगे ही नहीं बढता और जब जब इस हिंसा में विस्फोट हुआ है तब तब धरती से जीवन को खत्म करती चली गई. शुरुआत  से  देखते चले तो जीने के ढंग में वैदिक व्यवस्था को सर्वोत्तम मान लिया। वर्ण व्यवस्था ऐसी बनायीं की आज तक मानसिक विकास थमा हुआ। जात पात के नाम पर मनुष्य को मनुष्य न समझा गया , स्त्रियों और शूद्रों को केवल भोगने के लिए ही पैदा होना बता दिया। इतने कड़े नियम बना दिए गए चलना , खाना पीना साँस लेना ही दूभर हो गया।
    कुछ लोगों यहां से हटे तो जैनी हो गए मोक्ष के नाम पर शरीर को इतने कष्ट दिए की पूछो मत, अहिंसा के नाम पर इतने कट्टर हो गए की अपने शरीर के साथ की जा रही हिंसा ही न दिखी ।
    एक व्यक्ति ने आगे आकर जीवन को समझने के लिए तब के सारे तरीकेे अपनाये जब शरीर को कष्ट देकर , तपस्या कर के, भूखा रह कर भी कुछ न हुआ तब जो सामने है उसे देखते हुए, मनोवैज्ञानिक पहलुओं को समझते हुए बुद्ध ने सभी प्रपंचो की पोल पट्टी खोली। जीवन को समझने समझाने की कोशिश की लेकिन हमने उसका भी क्या किया बुद्ध के बाद उस पर भी झंडा लगा कर धर्म बना दिया। आज सबका जमाल घोटा चल रहा है, वर्तमान दिखता नहीं इतिहास में घुस कर किसी भविष्य के लिये मार काट मचाये पड़े है किसी को ब्राह्मणवादी व्यवस्था लागू करनी है , कोई संगठन हिंदुत्व की रक्षा के लिए लड़ रहा है , किसी को साम्यवाद चाहिए , कुछ को भौतिकवाद चाहिए भले ही इन सब के लिए वर्तमान में कितनी भी हत्याएँ करनी पड़े , भृष्ट होना पड़े, खुद को कष्ट देना पड़े। अपना विकास हुआ नहीं पहले देश सुधार के तरीके दिमाग में भर लिए जाते है भले ही उस कल्पना के परिणाम कितने भी भयानक हो , ऐसे सुधार अंत आते आते में व्यक्तिगत कुंठाओं को तृप्त करने में ही योगदान देते है।
    विकास के नाम पर हमनें किस दिन अपना भला किया है, अलग अलग नामों के साथ क्या सब एक जैसे ही नहीं है!
    पूर्वजों ने अपने समय के हिसाब से जो ठीक लगा किया जो सुरक्षा , सत्ता , जीवन को समझने के लिए जो रास्ता दिखा अपना लिया, लेकिन हम किस हिसाब से अपने को विकसित बोलते है जैसे माहौल में पैदा हो गए, जैसा सुनते आये वहीं हमारा अंतिम सत्य हो गया भले ही वह कितना वीभत्स हो , वास्तविकता से कितना भी दूर हो बिना जांचे परखे ही अपना लेना उस पर तर्क वितर्क करते रहने ही विकसित होना होता है क्या भले ही पाँच हजार साल पुरानी जाति प्रथा पर ही गर्व क्यों न कर रहे हो । वास्तविकता यहीं है की वाह्य रूप से हम कितना भी आगे निकल आए हो मानसिक रूप से अपवाद व्यक्तित्वों को छोड़ कर हम दो कदम सही से न चले है। आज भौतिक सुखों को इकठ्ठा करने राह पकड़ रखी है लेकिन उम्र निकल जाती है सुख कमाते कमाते लेकिन वो दिन नहीं आता जिस दिन फुर्सत से उन सुखों का भी भोग कर ले , देख ले की इतना सब चाहिए भी था की नहीं, चाहिए भी था तो किस कीमत पर कभी सोचा की रोज एक जैसा जीवन जीने के लिए, धार्मिक, भौतिक उन्मादों में कितनी झीलों, तालाबों, नदियों की हत्या कर दी, कितने जंगल मिटा दिए , कितने जानवर मिटा दिए, युद्धों में कितने इंसान बलि चढ़ चुके। कल्पना कीजिए की खुद के ही जीवन का घेरा कितना सीमित कर चुके। कल्पना कीजिए उस कल की जिसमें ‘सीमेंट के एक घर’ जो कहीं रेगिस्तान में दुनिया की सारी सुविधाएँ लिए बिना पानी , भोजन व अन्य किसी भी प्राकृतिक संपदा के बिना खड़ा है।

  • जनसंख्या वृद्धि का सांप्रदायिकीकरण : जनसांख्यकीय आंकड़ों को समझने की ज़रूरत

    Dr Ram Puniyani
    Rtd Prof, IIT Bombay

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    सांप्रदायिक ताकतों द्वारा धर्मपरिवर्तन व जनसंख्या वृद्धि के संबंध में पूर्वाग्रहों और गलत धारणाओं का लंबे समय से समाज को बांटने के लिए प्रयोग किया जा रहा है। इसी कड़ी में केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजुजू ने एक ट्वीट कर कहा कि भारत में हिन्दू आबादी घट रही है क्योंकि हिन्दू धर्मपरिवर्तन नहीं करवाते और यह भी कि पड़ोसी देशों के विपरीत, भारत में अल्पसंख्यक समृद्ध और खुशहाल हैं। 

    लंबे समय से यह प्रचार किया जा रहा है कि देश की हिन्दू आबादी कम हो रही है और मुसलमानों की आबादी में बढ़ोत्तरी हो रही है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में हिन्दू, कुल आबादी का 79.8 प्रतिशत हैं जबकि मुसलमान, आबादी का 14.23 प्रतिशत हैं। जनगणना 2011 के धार्मिक समुदायवार आंकड़ों से पता चलता है कि 2001 से 2011 के बीच जहां देश की हिन्दू आबादी में 16.76 प्रतिशत की वृद्धि हुई वहीं मुसलमानों के मामले में यह आंकड़ा 24.6 प्रतिशत था। इसके पिछले दशक में हिन्दुओं और मुसलमानों, दोनों की आबादी में अपेक्षाकृत अधिक वृद्धि हुई थी। 2001-2011 की अवधि में हिन्दुओं की आबादी 19.92 प्रतिशत बढ़ी जबकि मुसलमानों की आबादी में 29.52 प्रतिशत की वृद्धि हुई। जनसांख्यकीय विशेषज्ञ कहते हैं कि दोनों समुदायों की जनसंख्या वृद्धि दर घट रही है और इन दरों के बीच का अंतर कम हो रहा है।

    स्पष्टतः हमें यह ध्यान में रखना होगा कि आने वाले समय में मुस्लिम आबादी में वृद्धि की दर घटेगी और हिन्दू आबादी में वृद्धि दर के लगभग बराबर हो जाएगी। परंतु भविष्य में कभी भी मुसलमानों की आबादी, हिन्दुओं से अधिक होने की संभावना नहीं है। सन 2001 से लेकर 2011 के बीच हिन्दुओं की आबादी में 13.3 करोड़ की वृद्धि हुई, जो कि सन 2001 में मुसलमानों की कुल आबादी के लगभग बराबर थी। यह साफ है कि मुसलमानों की आबादी के हिन्दुओं से अधिक हो जाने के खतरे के संबंध में जो दुष्प्रचार किया जा रहा है, उसमें कोई दम नहीं है। 

    जनसांख्यकीय विशेषज्ञ कहते हैं कि अधिक प्रजनन दर, अक्सर शिक्षा के अभाव और स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी का नतीजा होती है। केरल के मुसलमानों की प्रजनन दर, उत्तर भारत के हिन्दू समुदायों से कहीं कम है और यहां तक कि केरल की कई हिन्दू जातियों से भी कम है। केरल के मुसलमानों की आर्थिक स्थिति, असम, पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश व महाराष्ट्र आदि के मुसलमानों से कहीं बेहतर है। यह तथ्य कि उच्च प्रजनन दर का संबंध शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं आदि से होता है, इससे भी स्पष्ट है कि दलितों (अनुसूचित जातियों) और आदिवासियों (अनुसूचित जनजातियों) की जनसंख्या वृद्धि दर भी अन्य समुदायों से अधिक है। सन 2011 की जनगणना के अनुसार, अनुसूचित जनजातियां, कुल आबादी का 8.6 प्रतिशत थीं। यह आंकड़ा सन 1951 में 6.23 प्रतिशत था। इसी तरह सन 1951 में अनुसूचित जातियों का आबादी में प्रतिशत 15 था जो कि सन 2011 में बढ़कर 16.6 प्रतिशत हो गया। अतः यह स्पष्ट है कि सांप्रदायिक तत्व जो दुष्प्रचार कर रहे हैं, उसमें तनिक भी सत्यता नहीं है और उसका यथार्थ से कोई लेनादेना नहीं है। यहां यह भी महत्वपूर्ण है कि प्रवीण तोगड़िया जैसे कुछ लोग यह मांग कर रहे हैं कि देश में दो से अधिक बच्चे पैदा करने पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए वहीं साक्षी महाराज और साध्वी प्राची जैसे कुछ नेता हिन्दुओं से यह अपील कर रहे हैं कि वे ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करें

    भाजपा अध्यक्ष ने लोगों से यह अपील की है कि वे ईसाईयों की बढ़ती आबादी के खतरे को समझने के लिए उत्तर पूर्व की ओर देखें। उत्तर पूर्व, मुख्यतः आदिवासी इलाका है और यहां सन 1931 से 1951 के बीच ईसाई आबादी के प्रतिशत में वृद्धि हुई थी। इसका कारण था शिक्षा का प्रसार। अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो हमें पता चलेगा कि देश में ईसाईयों का कुल आबादी में प्रतिशत पिछले कुछ दशकों से लगभग स्थिर बना हुआ है, बल्कि उसमें कमी आई है। सन 1971 में ईसाई, देश की आबादी का 2.60 प्रतिशत थे। यह आंकड़ा 1981 में 2.44, 1991 में 2.34, 2001 में 2.30 और 2011 में भी 2.30 था। इस तथ्य के बावजूद यह दुष्प्रचार जारी है कि ईसाई मिशनरियां, आदिवासी क्षेत्रों में जमकर धर्म परिवर्तन करवा रही हैं। सन 1991 में आरएसएस से जुड़े बजरंग दल के दारा सिंह द्वारा ईसाई मिशनरी ग्राहम स्टीवर्ट्स स्टेन्स को उसके दो नन्हे लड़कों के साथ ज़िन्दा जला दिए जाने के बाद से देश में ईसाई विरोधी हिंसा की शुरूआत हुई। वाधवा आयोग, जिसने पास्टर स्टेन्स की हत्या की जांच की, इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि वे धर्मपरिवर्तन नहीं करवा रहे थे और यह भी कि क्योनझार व मनोहरपुर इलाकों में, जहां वे काम कर रहे थे, ईसाईयों की आबादी के प्रतिशत में कोई वृद्धि नहीं हुई थी। ओडिसा के कंधमाल में स्वामी लक्ष्मणानंद की हत्या के बहाने ईसाई विरोधी हिंसा भड़काई गई। गुजरात में भी धर्मपरिवर्तन के मुद्दे पर ईसाईयों के खिलाफ हिंसा हुई। इसके साथ ही, ये आंकड़े भी हमारे सामने हैं कि ईसाईयों का कुल आबादी में प्रतिशत वही बना हुआ है। तो फिर आखिर धर्मपरिवर्तित ईसाई कहां छुपे हुए हैं। कुछ लोगों का कहना है कि धर्मपरिवर्तित ईसाई, अपने धर्म को उजागर नहीं करते और इसलिए ईसाई आबादी के संबंध में सही आंकड़े सामने नहीं आ पाते। यह केवल एक आरोप है जिसका कोई तार्किक आधार नहीं है। और अगर हम यह मान भी लें कि ऐसा हो रहा है, तो भी यह बड़े पैमाने पर नहीं हो रहा होगा। 

    धर्मपरिवर्तन हमेशा से हिन्दू राष्ट्रवादियों के एजेंडे पर रहा है। आज़ादी के आंदोलन के दौरान धर्मपरिवर्तन करवाने की दो अलगअलग मुहिम चल रही थीं। पहली थी तंज़ीम जो लोगों को मुसलमान बनाना चाहती थी और दूसरी थी शुद्धि जो विदेशीधर्मों के अनुयायी बन गए हिन्दुओं को फिर से अपने घर वापस लाना चाहती थी। यह कहा जाता था कि धर्मपरिवर्तन कर लेने से वे लोग अशुद्ध’  हो गए हैं और इसलिए उन्हें शुद्धिकी प्रक्रिया से गुज़ार कर हिन्दू बनाना ज़रूरी है। पिछले कई दशकों से आरएसएस, विहिप व वनवासी कल्याण आश्रम, घर वापसी अभियान चला रहे हैं जिसका उद्देश्य उन दलितों और आदिवासियों को फिर से हिन्दू धर्म के झंडे तले लाना है जो बल प्रयोग के कारण मुसलमान और लोभ लालच में फंसकर ईसाई बन गए हैं। यह घर वापसी अभियान आदिवासी व ग्रामीण इलाकों और शहरों की मलिन बस्तियों में चलाया जा रहा है। 

    आदिवासी, मूलतः, प्रकृति पूजक होते हैं। आरएसएस का कहना है कि वे हिन्दू हैं। उन्हें हिन्दू बनाने के लिए वनवासी कल्याण आश्रम ने उत्तर पूर्व में स्कूलों और होस्टलों का एक जाल बिछा दिया है। यह साफ है कि इन सारे कार्यक्रमों का उद्देश्य राजनीतिक है और समाज की भलाई की बात केवल असली इरादों को ढंकने के लिए कही जा रही है। दरअसल, संघ परिवार धर्म को राष्ट्रवाद से जोड़ना चाहता है।

    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया

  • श्मशान और मंदिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है? –Sanjay Jothe

    संजय जोठे

    ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं। मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।

    सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।

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    अक्सर ही ग्रामीण विकास के मुद्दों पर काम करते हुए गाँवों में लोगों से बात करता हूँ या ग्रामीणों के साथ कोई प्रोजेक्ट की प्लानिंग करता हूँ तो दो बातें हमेशा चौंकाती हैं।

    पहली बात ये कि ग्रामीण सवर्ण लोग मूलभूत सुविधाओं जैसे सड़क, बिजली, तालाब, स्कूल आदि बनवाने की बजाय मंदिर, श्मशान, कथा, यज्ञ हवन भंडारे आदि में ज्यादा पैसा खर्च करते हैं। दुसरी बात ये कि जहाँ भी सार्वजनिक या सामाजिक संसाधन निर्मित करने की बात आती है वहां स्वर्ण हिन्दू एकदम से धर्मप्राण होकर विकास के खिलाफ हो जाते हैं और भूमिहीन दलित आदिवासी ओबीसी गरीब समुदाय चाहकर भी कुछ कर नहीं पाते।

    सीधे तौर पर आप देख सकते हैं कि ग्रामीण भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू समुदाय में सामाजिक सहयोग से सड़क बिजली पानी और रोजगार आदि को लेकर कोई बड़ा काम करने की इच्छा नहीं होती। हाँ व्यक्तिगत रूप से वे अपने परिवार जाति समूह आदि में इन मुद्दों पर खूब काम करते हैं और किसी दूसरे समुदाय को घुसने नहीं देते। लेकिन पूरे गाँव के लिए मूलभूत सुविधा की प्लानिंग के लिए उनमे एकदम से वर्णाश्रम धर्मबुद्धि जाग जाती है।

    ये सवर्ण लोग गांवों में विकास की प्लानिंग में मंदिर और श्मशान पर बहुत जोर देते हैं। हालाँकि गांव में मंदिरों की कोई कमी नहीं होती है। और श्मशान भी एक ही बार जाना है – वो भी मरकर। तो फिर मंदिर और श्मशान पर इतना जोर देने की जरूरत क्या है?

    जरूरत है, बहुत गहरी जरूरत है। असल में अगर गांव में सड़क, बिजली, शिक्षा, रोजगार या जीवन की अन्य सुविधाएं बढ़ती हैं तो इसका फायदा सवर्ण द्विज हिंदुओं को नहीं मिलेगा। वो इसलिए कि इनके पास तो ये सब सुविधाएं पहले से ही है। लेकिन इन सब सुविधाओं के बिना जीते आये भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासियों को इससे तुरन्त फायदा होगा। उनके बच्चे जल्दी ही शिक्षित, स्वस्थ और जागरूक हो सकेंगे। एक या दो पीढ़ी में ही ग्रामीण दबंगों को चुनौती मिलने लगेगी। बेगार, बलात्कार, शोषण बन्द हो जाएगा। राजनितिक समीकरण बदल जायेगा। और समझदार ग्रामीण सवर्ण ये कभी नहीं होने देंगे। इसलिए वे हर योजना हर प्लानिंग में घुसकर पूरे गाँव को मंदिर, श्मशान,धर्मशाला, भंडारा, कथा, प्रवचन, ध्यान, समाधी आदि में उलझाये रखते हैं।

    लेकिन मंदिर या श्मशान या अध्यात्म करते क्या हैं?

    असल में जाति को बनाये रखने का एक ही तरीका है। जीवन के लिए जो भी जरूरी है उसकी निंदा करो और मृत्यु और मृत्यु के बाद की बकवास की प्रशंसा करो। यही रहस्यवाद, ध्यान समाधी, धर्म, वेदांत, सूफी, भक्ति आदि का कुल जमा काम रहा है। वे परलोक जन्नत मोक्ष पुनर्जन्म, साल्वेशन, ईश्वर आदि की फफूंद उड़ाते रहेंगे और इस जिंदगी के मुद्दों पर, सड़क शिक्षा रोजगार तालाब आदि पर कोई काम नहीं होने देंगे।

    अब जैसे ही आप मंदिर, मस्जिद, चर्च या श्मशान जाते हैं वैसे ही इस जीवन से ज्यादा चिंता परलोक की होने लगती है। बस इसी मौके की तलाश में सारे पोंगा पंडित और मुल्ला पादरी आदि रहते हैं। आपमें ये परलोक का भय पैदा होते ही वे अपने शास्त्र, मिथक, कर्मकांड, रहस्यवाद और अध्यात्म लेकर घुस जाते हैं और आपको सड़क, शिक्षा रोजगार से हटाकर ध्यान, समाधी, श्राद्ध, रोज़ा, ज़कात, साल्वेशन, मोक्ष आदि में उलझा लेते हैं।

    भारत में इसी ढंग से जिंदगी की मूलभूत सुविधाओं को नकारकर परलोक की सुविधाओं पर फोकस बनाये रखा जाता है। फिर इस लोक में भूमिहीन गरीब दलित ओबीसी आदिवासी के बच्चे कुपोषित, अशिक्षित, बेरोजगार बने रहते हैं और वर्णाश्रम (असल में जाति) व्यवस्था बनी रहती है।

    इसलिए जाति व्यवस्था और इसके शोषण को बनाये रखने के लिए मंदिर और श्मशान बहुत बड़ी भूमिका निभाते आये हैं। ये ही भारत के दुर्भाग्य के स्त्रोत हैं।

    इसलिए जब कोई मंदिर या श्मशान की बात करे तो सावधान हो जाइये कि वे सज्जन असल में समाज को किस दिशा में ले जाना चाहते हैं।