Category: आपके आलेख

  • शेर

    Vimal Kumar

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    शेर अगर तुम्हारे साथ बैठ कर
    नाश्ता करने लगे डाइनिंग टेबल पर
    तो यह मत समझना कि वह आदमी बन गया है

    शेर अगर तुम्हारे साथ
    पिक्चर हाल में बैठकर फिल्म देखने लगे
    तो यह मत समझना कि वह कोई दर्शक बन गया है .
    शेर अगर तुम्हे अपनी बाहों में ले ले
    फिर तुम्हे चूमने लगे तो यह मत समझ लेना कि वह तुम्हारा प्रेमी बन गया है शेर अगर किसी दिन तुम्हारा आंसू पोंछने लगे
    जेब से रुमाल निकाल कर
    तो यह मत समझना कि वह तुम्हारा वाकई हमदर्दबन गया है

    शेर अगर अपने गले में माला डाल ले
    शंख ध्वनि करने लगे मंदिर में
    बजाने लगे घड़ियाल
    तो यह मत समझना कि वह अब पुजारी बन गया है

    शेर अगर किसी दिन चुनाव जीतकर
    देश का
    प्रधानमंत्रीही बन जाये
    देने लगे लोकतंत्र की दुहाई
    तो यह मत समझना कि वह कोई महा पुरुष बन गया है

    शेर को खून का स्वाद लग चूका है
    वह कितना भी विनम्र और शालीन दिखे
    वह कोई दार्शनिक नहीं है एक दिन झपट्टा मार कर
    तुम्हे डकार ही जायेगा

     

  • क्या बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर भी चुरा लिए जायेंगे? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    एक महत्वपूर्ण कबीरपंथी सज्जन से मुलाक़ात का किस्सा सुनिए. एक गाँव में किसी काम से गया था, उसी सिलसिले में मालवा के दलितों के बीच फैले कबीरपंथ से परिचय हुआ. एक घर के बड़े से आँगन में कबीर पर गाने वाले और कबीर पर बोलने वाले एक सज्जन बैठे थे और आसपास बैठे गरीब दलित सुन रहे थे. मैं और मेरे एक मित्र कबीर की वाणी में सामाजिक क्रान्ति के सूत्र खोजने के मन से उन सज्जन से प्रश्न पूछ रहे थे. आसपास बैठे दलित गरीब चुपचाप सुन रहे थे. बात निकली तो लोगों ने शेयर किया कि सब पञ्च तत्व के बने हैं, सब एक ही परमात्मा की संतान हैं और सबमे एक ही खुदा का नूर है आत्मा परमात्मा की ही औलाद है और भेदभाव सब इंसान के बनाये हुए हैं, सबका खून लाल है, सबको मरकर वहीं जाना है… इत्यादि इत्यादि … फिर कुछ जागरूक लोगों ने बताया कि भाई जब तक ये प्रवचन चलता है तब तक सभी यह मानते हैं … उसके बाद आश्रम या सत्संग घर से निकलते ही दीवार के ठीक एक फुट दूर ही एकदूसरे के हाथ का छुआ खाना-पीना बंद हो जाता है और सब वापस कबीरपंथ या राधास्वामी या साहेब या सतनाम या बंदगी छोड़कर वर्णाश्रम के खोल में वापस लौट आते हैं.

    चर्चा के दौरान लोग आते जाते हुए प्रवचनकार सज्जन के पैर छूते रहे और कबीर की वाणी में आये गुरु गोविंग दोउ खड़े काके लागु पांय, मैं तो राम की लुगइया, रस गगन गुफा में अजर झरे, सुन्न महल, कुण्डलिनी और षड्चक्र और न जाने क्या क्या चल रहा था. लेकिन बार बार पूछने पर भी ये बात कोई नहीं करना चाहता कि आप लोगों के इलाके में हैण्ड पम्प क्यों नहीं है? आपके बच्चों को स्कूल में पढने क्यों नहीं दिया जाता? आपके युवाओं को रोजगार क्यों नहीं दिया जाता? आपके बर्तनों को कुवें से लात मारकर क्यों फेंक दिया जाता है? आपकी स्त्रीयों को आसान शिकार क्यों समझा जाता है? इन प्रश्नों पर कबीर की तरफ से उत्तर दिए गये हैं लेकिन वे उत्तर कबीरपंथ से गायब हैं. कबीरपंथियों ने जिस कबीर को रचा है वह सिर्फ आत्मा परमात्मा और मोक्ष की बात करता है. ठीक उसी तरह जैसे भारतीय ध्यानियों ने जिस बुद्ध को रचा है वह सिर्फ ध्यान समाधि और निर्वाण की बात करता है समाज की कोई बात नहीं करता.

    क्या इन कबीरपंथियों ने कबीर को गलत समझा है? या ये सिलेक्टिव ढंग से कबीर को जिस तरह से रख रहे हैं उसमे कोई गलती है? या क्या यह कहा जा सकता है कि कबीर ने खुद ही कुछ गलती की है? ये बड़े प्रश्न हैं जिनका उत्तर ढूंढना बड़ा मुश्किल है लेकिन एक सावधान नजर से देखें तो इनका उत्तर मिलता है. आइये उस उत्तर में प्रवेश करें.

    कबीर हो या बुद्ध हों, उनकी वाणी में कोई भी बात हो या कैसी भी समझाइश दी गयी हो, उसका अनुवाद या भावार्थ सीधे सीधे क्या जनता तक पहुँच रहा है? क्या उनके साहित्य में मिलावट करने वालों ने मिलावट के बाद उसकी व्याख्या का अधिकार दूसरों को दिया है? या यह एकाधिकार खुद ही अपने पास सुरक्षित रख लिया है? कबीर के बारे में दावे से कहा जा सकता है कि उनके काव्य को जिस तरह से अनुदित किया गया है और उनके चुने गये प्रतीकों और बिंबों में जिस तरह से वेदान्तिक अर्थ डाले गये हैं उससे कबीर अपने ही लोगों के लिए खतरनाक बना दिए गये हैं.

    अगर कबीरपंथी अपनी रविवारीय बठक में आत्मा परमात्मा और बंकनाल, सुन्न महल और राम की भक्ति जैसे मुद्दों पर चर्चा करते हैं तो वे शिक्षा, स्वास्थय, रोजगार और राजनीति पर कब बात करेंगे? अपने शोषण के मुद्दों पर या अपने जीवन के जरुरी मुद्दों पर कब बात करेंगे? हफ्ते भर जी तोड़ मेहनत करने के बाद एक दिन या एक शाम मिलती है जिसमे समाज के असल मुद्दों पर कोई सार्थक बात की जा सकती है. लेकिन उसमे भी आत्मा परमात्मा का भूत छाया रहता है. गाँव के युवा इन बातों को अव्वल तो सुनते ही नहीं या सुनते भी हैं तो वे भक्त बनकर बैठते हैं, हाथ जोड़कर गर्दन हिलाते हुए हुंकारा देते रहते हैं. कबीर के साथ भी समाज में बदलाव की कोई बात नहीं हो रही है. बल्कि समाज में बदलाव की बात को अध्यात्म के जहर में दबाया जा रहा है. यह एक चमत्कार है.

    यही बुद्ध के साथ हो रहा है. भारतीय पंडितों और बाबाओं ने जिस तरह से बुद्ध को “अनुभव” “ध्यान” और “निर्वाण” जैसी बातों में लपेटा है उससे बुद्ध की क्रान्ति लगभग खत्म सी हो गयी है. लोग भूल ही गये हैं कि बुद्ध ने जहर की त्रिमूर्ति – आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारकर एक नयी भौतिकवादी जीवन दृष्टि दी है जो परलोक को खत्म करके समतामूलक और वैज्ञानिक समाज को संभव बनाता है. स्वयं बुद्ध की परम्परा में घुसे वेदान्तियों ने जैसा महायान खड़ा किया उसने बुद्ध को और बौद्ध धर्म को इस देश से उखाड़ फेंका और फिर से परलोकी अन्धविश्वास का धर्म यहाँ फ़ैल गया. भारत के बाहर भी जो बौद्ध धर्म है वह महायानी अंधविश्वास और स्थानीय समझौतों की खिचडी से बना हुआ है. इस तरह के परलोक्वादी और समझौतावादी बौद्ध धर्म को अंबेडकर ने सिरे से खारिज किया है.

    लेकिन अब सवाल ये है कि क्या अंबेडकर को भी कबीर और बुद्ध की तरह खत्म कर दिया जाएगा? जिस तरह कबीर और बुद्ध की धारा को परलोक और मोक्ष की चादर में लपेटकर खत्म किया गया है, क्या उसी तरह अंबेडकर को खत्म करना संभव है? मेरा उत्तर है कि अंबेडकर को पचाना और उन्हें नष्ट करना असंभव है.
    बुद्ध और कबीर का साहित्य नष्ट कर दिया गया, उनके नाम पर झूठे सूत्र और साखियाँ लिखकर उनके मूल सन्देश को समाप्त कर दिया गया है. ब्रिटिश खोजियों और राहुल सांस्कृत्यायन की खोज के पहले लोग बुद्ध को और उनके साहित्य को जानते भी नहीं थे. https://www.whisperingcreekdentistry.com/ हजारों साल तक बुद्ध और उनका साहित्य लुप्त रहा, जो मिला है उसमे भी वेदांती मिलावट है. इस मिलावट का महिमामंडन करने के लिए ओशो रजनीश और अन्य वेदांती बाबाओं ने बुद्ध को प्रच्छन्न वेदांती बनाकर पेश किया है.

    लेकिन अंबेडकर का पूरा नहीं तो लगभग अधिकाँश साहित्य हमारे पास है. उनकी जीवनी और उनका कर्तृत्व हमारे पास सुरक्षित है. उनके द्वारा महायान और हीनयान दोनों को अस्वीकार करते हुए “नवयान” की रचना करना और हिन्दू धर्म को त्यागने का निर्णय हमारे पास है. उनकी बाईस प्रतिज्ञाएँ हमारे पास हैं. अब हमें कोई डर नहीं कि अंबेडकर की वाणी में या उनके लेकहं में मिलावट की जा सके. डर सिर्फ इस बात का है कि हमारे ही लोग उन्हें पढ़ना समझना बंद करके उनकी पूजा न करने लगें. अंबेडकर के दुश्मन यही चाहते हैं कि हम अंबेडकर को पढ़ना छोड़ दें और उन्हें पूजना शुरू कर दें. अगर यह होता है तो अंबेडकर भी हमसे छीन लिए जायेंगे.

    अगर हम बुद्ध और कबीर की तरह अंबेडकर को खोने नहीं देना चाहते हो हमें अंबेडकर को घर घर तक उनके मूल साहित्य और विश्लेषण के साथ पहुंचाना होगा. उनकी लिखी बाईस प्रतिज्ञाओं को सबसे पहले लोगों को समझाना होगा. कम से कम भारत के गरीबों को समझाना होगा कि अंबेडकर ने ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गौरी गणेश, राम कृष्ण, आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म और इश्वर सहित आत्मा तक को नकारा है और इनसे तथा पूजा पाठ और भक्ति आदि से दूर रहने की सलाह दी है.

    हमारे युवाओं को इस बात पर ध्यान देना चाहिए, आज हम उसी दौर में जी रहे हैं जिस तरह के दौर में अतीत में बुद्ध और कबीर को षड्यंत्रकारियों ने खत्म किया था. इस षड्यंत्र में हम अंबेडकर को नहीं फंसने देंगे, आइए यह संकल्प लें और अंबेडकर को खुद समझते हुए दूसरों को भी समझाएं.

     

  • एक दिन नदी में राख की तरह बह गया

    Vimal Kumar

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    एक दिन मैं और थोड़ा सा जी गया
    एक दिन थोडा सा बारिश में भीग गया

    एक दिन धूप निकल आयी मेरे आँगन में
    एक दिन मैं मरने से भी बच गया

    एक दिन मैं धुआं बन गया था
    एक दिन तो कुआँ बन गया था
    एक दिन में सुलगती रात था
    एक दिन मैं दहकती आग था
    एक दिन मैं जलने से बच गया

    एक दिन बर्फ की तरह पिघलने लगा
    एक दिन शाम की तरह ढलने लगा
    एक दिन तुम्हारा हाथ पकड़
    बच्चे की तरह चलने लगा
    एक दिन इतनी तेज़ आंधी आयी कि सब कुछ उड़ा ले गयी

    एक दिन मैं पते की तरह झरने से बच गया

    एक दिन मैं किसी की आवाज़ था
    एक दिन मैं बजता हुआकोई साज़ था
    एक दिन एक छिपा हुआ एक राज़ था
    कोई भेद खोले इस से पहले

    एक दिन आईने के सामने अपना सच उस से कह गया

    मरने की घड़ी थी मेरे सामने
    किस क़र्ज़ में डूबा था इस तरह
    एक दिन तुम्हे प्यार करते करते रह गया

    एक दिन तो खूब जलसा हुआ अपने घर में
    एक दिन एक किले की तरह ढह गया

    एक दिन बहुत उम्मीद थी जिन्दगी से
    एक दिन नदी में राख की तरह बह गया .

     

  • प्रेम

    Mukesh Kumar Sinha

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    1.
    मुट्ठी भर अक्षर
    लो उढ़ेल दिए पन्नो पर

    टूटी फूटी ही सही, समझ लेना
    लिखी गयी प्रेम कविता
    सिर्फ तुम्हारे लिए !!

    2.
    प्रेम
    वो निर्मल जल
    जो सुखी नदी की रेत को हटाते ही
    एकदम से जमा हो
    कल-कल शीतल निर्मल !

    प्रेमसिक्त मन गर्मी में भी
    रखता है चाहत रेत हटाने की !

    3.
    मेरे हथेली में
    है कटी फटी रेखाए
    जीवन, भाग्य और प्रेम की
    पर है एक खुशियों का द्वीप
    ठीक बाएं कोने पर

    तभी, उम्मीदें जवां हैं

    4.
    मेरी राख पर
    जब भी पनपेगा गुलाब
    तब ‘सिर्फ तुम’ समझ लेना
    प्रेम के फूल !!

    इन्तजार करूँगा सिंचित होने का
    तुमने कहा तो था
    सुर्ख गुलाब की पंखुड़ियों तोड़ना भाता है तुम्हे !

    5.
    प्रेमसिक्त संवेदनाओं को
    घेर दिया मैंने चीन की दीवार से

    पर कहाँ मानता दिल
    वो तो पीसा की मीनार सा
    झुक ही जाता है तुम्हारे प्रति
    ठीक पंद्रह डिग्री के कोण पर ..

    चलो ताजमहल के सामने वाली बेंच पर
    खिंचवायें एक युगल तस्वीर !

    6.
    प्रेमसिक्त ललछौं भोर से
    डूबते गुलाबी सूरज तक का
    बीता हुआ समय
    पाँव भारी कर गया उन्मुक्त जवां दिलों को

    कोई नहीं,
    अब रिश्ता उम्मीद से है !

     

  • मेरी कितनी दुनियाएँ हैं

    Rajneesh

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    मेरी कितनी दुनियाएँ हैं
    मैं कितनी ज़िंदगियाँ जीता हूँ एक साथ
    और कितने किरदारों में ख़ुद को समेटने की कोशिश करता हूँ
    मैं नहीं जानता
    ठीक-ठीक तो नहीं जानता
    या जानना नहीं चाहता
    पर कुछ के बारे में निश्चित तौर पर बता सकता हूँ

    कमरे के अन्दर और बाहर अलग हूँ मैं
    और यह बात दुनिया के हर कमरे पर लागू होती है
    सड़क के इस पार और उस पार अलग-अलग हूँ
    दुनिया की हर सड़क पर…..
    किसी के पास से गुज़रते हुए-
    गुज़रने के पहले और गुजरने के बाद अलग अलग हूँ मैं

    प्यार करते हुए-
    प्यार किये जाने के पहले और प्यार किये जाने के बाद
    तुमसे मिलने के पहले और तुमसे बिछड़ने के बाद
    हारकर रोने से पहले और उसके बाद
    हर रोज़ सोने से पहले और उठने के बाद
    एक गीत सुनने के पहले और सुनने के बाद
    पैदा होने के तुरंत बाद के तुरंत पहले और मरने के ऐन पहले के ऐन बाद
    अलग-अलग हूँ मैं……
    अलबत्ता मेरी समूची ज़िंदगी –
    हर पहले और हर बाद के बीच फैली हुई है ….

    तुम्हारी बेईमानियों वादाखिलाफियों और क्रूरताओं के बाद
    मैं वो नहीं रहूँगा जो पहले था
    तुम्हारी धूर्ततायें षड्यंत्र और अनंत शोषण कुछ न कुछ ज़रूर बदल देंगे मुझे
    यह बदलाव तुम्हारे हक़ में नहीं होगा
    तुम्हारी सनातन खून चूसने की लालसा जो भी योजनायें बनाएगी
    जितने भी प्रपंच रचेगी जितनी भी यंत्रणाएं देगी
    वो सब मेरे लोगों में कुछ न कुछ बदलाव लायेगा
    और
    निश्चय ही यह बदलाव तुम्हारे हक में नहीं होगा….

  • भविष्य की दलित-बहुजन राजनीति: जाति से वर्ण और वर्ण से धर्म की राजनीति की ओर –Sanjay Jothe

     

    Sanjay Jothe

    संजय जोठे, लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम जितने बीजेपी के लिए महत्वपूर्ण हैं उससे कहीं अधिक दलित बहुजन राजनीति के लिए महत्वपूर्ण हैं. दलित बहुजन राजनीति के एक लंबे और संघर्षपूर्ण सफ़र का यह परिणाम दुखद है. लेकिन यह होना ही था. इस पराजय की प्रष्ठभूमि लंबे समय से निर्मित हो रही थी. ज्ञान, विज्ञान, शोध और नवाचारों के इस दौर में दलित नेताओं और नेत्रियों द्वारा बुद्धि की बात और बुद्धिजीवियों से दुश्मनी कर लेने का एक अनिवार्य परिणाम यही होना था. जिस तरह से सामाजिक आन्दोलन को और सामाजिक जागरण सहित सामाजिक संगठन के काम को कमजोर किया गया है उसका ऐसा परिणाम आना ही था. लेकिन यह एक महत्वपूर्ण शिक्षा है. अब हमें तय करना होगा की राजनीतिक आन्दोलन और सामाजिक आन्दोलन में किसे चुनें, या इन दोनों आयामों में किस आयाम पर कितना जोर दें और इनके बीच के गतिशील समीकरण को कैसे साधें और आगे बढ़ाएं.

    अगर गौर से देखा जाए तो प्रश्न ये है कि अंबेडकर के जातिनाश के आह्वान और कांशीराम के जाति पर गर्व करने के आह्वान में छुपे सामाजिक और राजनीतिक आवश्यकताओं के द्वंद्व को कैसे सुलझाएं? यह प्रश्न बहुत जटिल लगता है लेक,इन इसका उत्तर बहुत आसान है जिस पर लंबे समय तक कुछ हद तक अमल भी किया गया है. इन दोनों अंतर्दृष्टियों के दो स्पष्ट लक्ष्य रहे हैं. अंबेडकर एक समाजशास्त्री और मानवशास्त्री होने के नाते अपने ही भीतर ज़िंदा राजनीतिज्ञ को भी सलाह दे रहे हैं कि सामाजिक जागरण पहले करो और बाद में उस जागरण के प्रकाश में राजनीति का आभामंडल बुनो. दूसरी तरफ कांशीराम ने जाति पर गर्व करने की जो बात कही वह विशुद्ध राजनीतिक लाभ के प्रयोजन से की गयी थी. यह एक जमीनी राजनीति की एक मनोवैज्ञानिक जरूरत है. अगर लोगों में आत्मसम्मान नहीं होगा तो फिर वे संगठित भी नहीं होंगे और किसी सामान्य और साझे लक्ष्य के लिए काम भी नहीं करेंगे – यह सीधा सा गणित है. इसीलिए मान्यवर कांशीराम ने जो प्रस्तावना दी उसमे जाति पर गर्व करना प्रमुख बात रही. वहीं बाबा साहेब ने जाति पर गर्व करने की नहीं बल्कि जाति से घृणा करने की और उसके संपूर्ण नाश के लिए संगठित होने की सलाह दी. इन दो सलाहों का परिणाम हम देख चुके हैं. असल में अंबेडकर की सलाह को जमीन पर उतरने के लिए जो मार्ग चाहिए वो जातियों से होकर नहीं जाता, जा भी नहीं सकता. यह एक तार्किक बात है आइये इसे इसके विस्तार में समझें.

    जब अंबेडकर यह कहते हैं की जाति का नाश होना चाहिए, तब इस सलाह का व्यवहारिक रूप जो भी बनेगा वह जाति के नकार से ही शुरू करेगा. लक्ष्य या साध्य का कुछ अंश साधन में भी होगा ही अन्यथा साधन और साध्य के बीच कोई तार्किक संगती ही नहीं रह जायेगी. इसलिए अंबेडकर की प्रस्तावना में जाति पर गर्व करने की बात तो दूर रही बल्कि जाति एक सांगठनिक और रणनीतिक गणित का आधार भी नहीं बनाई जा सकती. वे जाती से बड़ी इकाई – वर्ण और धर्म से शुरू करते हैं. https://www.oldhouseonline.com/ जाति के राजनीतिक समीकरण और सामाजिक आन्दोलनों की आवश्यकता के मद्देनजर जातिगत समीकरण – इन दोनों को अंबेडकर की प्रस्तावना में अधिक मूल्य नहीं दिया गया है. मूल्य इस बात को दिया गया है कि कितनी खूबसूरती से जातियां अपनी रुढ़िवादी पहचानों से, अपनी मानसिक गुलामियों से और अपनी शैक्षणिक, व्यवसायगत और धार्मिक गुलामी से आजाद हों. अंबेडकर के अनुसार यही सबसे महत्वपूर्ण बात है. बाद में राजनीतिक आन्दोलन इसी बदलाव के गर्भ से अपने आप पैदा हो जायेंगे. अगर हम गौर से देखें तो यही दिशा बुद्ध, कबीर और ज्योतिबा फूले भी लेते हैं. अंबेडकर थोड़ा दुस्साहस करते हैं और आधुनिक समय में दलित राजनीति का एक रोडमेप देने का प्रयास भी करते हैं. उनकी तात्कालिक असफलता के बावजूद उनका सामाजिक और राजनीतिक तर्क लंबे समय के लिए प्रासंगिक है और इधर कुछ दशकों में सफल हुई तात्कालिक राजनितिक सफलताओं से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है.

    अंबेडकर जिस बात को केन्द्रीय मूल्य देते हैं वो समझने लायक है. उनके पूरे कैरियर में वे जिन विषयों पर काम कर रहे हैं वो गौर करने योग्य हैं. वे दलितों शूद्रों और स्त्रीयों के पतन का कारण धर्म और संस्कृति के मनोविज्ञान में खोजते हैं और इसी कारण वे तत्कालीन इंडोलोजी के चैम्पियंस को नकारने का दुस्साहस करते हुए आर्य आक्रमण और रेसियल डिफ़रेंस के सिद्धांतों को भी नकार देते हैं और शुद्धतम शोषण और विभाजन के समाज मनोवैज्ञानिक इतिहास पर फोकस करते हैं. संस्कृत और पाली भाषा के अध्ययन सहित वे भारतीय धर्मशास्त्रों के अध्ययन से इस शोषक धर्म की रणनीति और कुटिल चालों को खोज निकालते हैं और इन चालों के सामाजिक राजनीतिक अनुप्रयोगों (इम्प्लीकेशंस) की पूरी कार्यप्रणाली को हमारे सामने उजागर कर देते हैं.

    यह कई अर्थों में बुद्ध, कबीर और फूले के काम का ही विस्तार है. इसीलिये उन्होंने कबीर और फूले को बुद्ध के बाद अपना सबसे बड़ा गुरु घोषित किया था. अंबेडकर के पूरे कर्तृत्व को उनकी इस घोषणा के साथ देखिये. वे बुद्ध, कबीर और फूले के प्रवाह में स्वयं को रख रहे हैं. हालाँकि वे फूले की तरह आर्य आक्रमण सिद्धांत को नहीं मानते और इस मुद्दे पर तत्कालीन यूरोपीय विद्वान मैक्समूलर को भी नकारते हैं. लेकिन इसके बावजूद वे शोषण और विभाजन की जिस यांत्रिकी का पर्दाफाश करते हैं वह आर्य आक्रमण सिद्धांत द्वारा कल्पित शोषण से भी  घिनौना साबित होता है. सरल भाषा में कहें तो ज्योतिबा फूले जिस आर्य आक्रमण सिद्धांत को आधार बनाकर ब्राह्मणी शोषण को उजागर करना चाहते थे वह असल में एक विदेशी कौम द्वारा भारतीय मूलनिवासियों का शोषण नजर आता था. लेकिन अंबेडकर इसे नकारते हैं और एक ही देश के बाशिंदों के बीच में रचे गये आंतरिक षड्यंत्र की तरह इस ब्राह्मणवाद को उभार लाते हैं. इस तरह यह ब्राह्मणवाद पर एक कहीं अधिक बड़ी गाली बन जाती है कि ये लोग किसी अन्य कौम को नहीं बल्कि अपनी ही कौम को विभाजित करके छलते रहे हैं, दलते रहे हैं.

    इस स्थापना में अंबेडकर कहीं अधिक सफलता और बल से ब्राह्मणवादी नैतिकता की धुरी – उनके मानव धर्म शास्त्र और वर्ण व्यवस्था सहित इश्वर या ब्रह्म की धारणा – को ही कटघरे में खड़ा कर देते हैं और ब्राह्मणवाद की स्वघोषित नैतिकता के दंभ को चकनाचूर कर देते हैं. आर्य आक्रमण सिद्धांत में फिर भी एक द्वंद्व बना हुआ है कि ब्राह्मण विदेशी हैं इसलिए वे मूलनिवासियों का शोषण करते हैं. लेकिन अंबेडकर के अनुसार सभी भारतीय मूलनिवासी हैं और यह शोषण अपने ही भाइयों का शोषण है जो कि कहीं अधिक घिनौना और निंदनीय है. इस प्रकार अंबेडकर ब्राह्मणवादी धर्म के न्यायबोध और नीतिबोध को एकदम निशाने पर ले लेते हैं. आगे वे बुद्ध की और बौद्ध धर्म की जो खोज करते हैं वह इसी तर्क और अंतर्दृष्टि का स्वाभाविक विस्तार है. जो खोज वे फूले और कबीर के साथ शुरू करते हैं वो बुद्ध तक जाकर पूरी हो जाती है और इसी खोज के समानान्तर ब्राह्मणवादी धर्म का विकल्प भी उन्हें मिलता जाता है. या कहें कि वे ब्राह्मणवादी षड्यंत्र को नकारते-नकारते जहां पहुँचते हैं वहां उन्हें बुद्ध मिल जाते हैं. ये दोनों एक ही बातें हैं.

    अब जब अंबेडकर इस तरह से ब्राह्मणवादी धर्म के विकल्प तक अर्थात बौद्ध धर्म तक पहुँच जाते हैं तो उनकी इस धार्मिक सामाजिक प्रस्तावना के समानांतर राजनीतिक प्रस्तावना कैसी होनी चाहिए? अगर वे जातिनाश की यात्रा में जाति को नहीं बल्कि वर्ण और धर्म को अपना केन्द्रीय विमर्ष बना रहे हैं तो इसका क्या अर्थ है? इस प्रश्न पर गहराई से विचार करना होगा. छोटी-छोटी जातीय अस्मिताओं की बजाय वे एक धार्मिक दार्शनिक अस्मिता को वरीयता दे रहे हैं हमें इस बात को गहराई से नोट करना चाहिए. उनके अपने समय में समाज इस बात के लिए तैयार नहीं था लेकिन इसका यह अर्थ नहीं की उनका दिया गया समाधान गलत या अव्यावहारिक था. उनके अपने जीवन के सबसे परिपक्व निर्णय – बौद्ध धर्म के चुनाव – को उसकी राजनीतिक संभावनाओं के साथ रखकर देखना शेष है. अभी भी इसपर काम होना बाकी है कि एक श्रमण धर्म के रूप में बौद्ध धर्म के परितः कैसा सामाजिक और राजनीतिक आन्दोलन बुना जाए. असल में यह काम शुरू होने से पहले ही जातीय अस्मिता की राजनीति की तात्कालिक और अल्पजीवी सफलताओं के खुमार ने इसे खत्म कर दिया. लेकिन अब मौक़ा है कि यह विचार फिर से शुरू किया जाए. इसका क्या अर्थ हुआ?

    क्या इसका यह अर्थ हुआ कि सभी शुद्र और दलित जातियों को बौद्ध धर्म अपना लेना चाहिए? या कि पूर्ण धर्मांतरण होने तक सामाजिक राजनीतिक विकल्पों पर विराम लगा देना चाहिए? नहीं, न तो यह अपेक्षित है न ही संभव है. राजनीतिक प्रयासों की धारा जो एक दिशा, एक स्तर तक पहुँच गयी है वह पूरी तरह वापस लौट आये इसकी जरूरत नही है लेकिन इस बात की जरूरत अवश्य है कि वह अंबेडकर के मूल सिद्धांतों और स्थापनाओं की रौशनी में खुद को पुनर्परिभाषित करे.

    इसका सीधा अर्थ ये है कि जातिविहीन समाज की कल्पना करते हुए उन्होंने जिस धर्म को और जिस नैतिकता या आचारशास्त्र को चुना था उसका पूरी शक्ति से प्रचार करना जारी रखें और उसी दिशा में राजनीतिक संगठन का निर्माण करें. यही अंबेडकर की धार्मिक प्रस्तावना का स्वाभाविक सामाजिक-राजनीतिक विस्तार है. इसके विपरीत कांशीराम की राजनीतिक प्रस्तावना में जातीय गर्व की जो सलाह है वह लंबे समय में सामाजिक धार्मिक अर्थ में ही नहीं बल्कि स्वयं राजनीतिक अर्थ में भी हानिकारक है. जाति पर अगर गर्व करेंगे तो जाति मजबूत होगी, स्वाभाविक सी बात है जिस पर आप गर्व करेंगे उसे खुद अपने हाथों ख़त्म कैसे कर देंगे? दूसरा नुक्सान ये कि जाति पर गर्व करते हुए आप ब्राह्मणवादी विभाजक षड्यंत्र पर ही गर्व कर रहे हैं. जाटवों का जाटव होने पर गर्व और यादवों का यादव होने पर गर्व असल में ब्राह्मणवादी जहर को ही गहरा करता जाता है इसीलिये वे इकट्ठे होकर अपने साझे शत्रु का सामना नहीं करते बल्कि आपस में ही लड़ते रहते हैं. अभी उत्तर प्रदेश में जो हुआ उसे ठीक से देखें तो उसमे कांशीराम की प्रस्तावना की हार है और अंबेडकर की प्रस्तावना की जीत एकदम साफ़ नजर आती है.

    हालाँकि इसका यह अर्थ नहीं है की कांशीराम ने सामाजिक जागरण के महत्व को समझा ही नहीं. उन्होंने इसे जरुर समझा और प्रयोग भी किया उन्होंने साइकिल यात्रा से और बामसेफ या डी एस फोर के माध्यम से सामाजिक जागरण की बात भी साधनी चाही थी लेकिन राजनितिक सफलता का महत्व उनके लिए सर्वोपरि था. एक अर्थ में यह ठीक भी था, अंबेडकर स्वयं राजनीतिक सत्ता को सब परिवर्तनों का चालक बताते थे लेकिन अब समय ने सिद्ध कर दिया है कि अंबेडकर अपना ‘लक्ष्य पाने में असफल हुए’ लेकिन अपने ‘मार्ग बनाने में पूरी तरह सफल हुए’. सरल शब्दों में कहें तो अंबेडकर ने धर्म और संस्कृति के विश्लेषण से जिस तरह से समाजमुक्ति का नक्शा बनाया वह तर्कसम्मत और व्यावहारिक रहा लेकिन उसकी राजनीतिक सफलता सीमित रही. दूसरी तरफ कांशीराम ने जिस राजनीति का मार्ग दिया वह तात्कालिक रूप से सफल रहा और अब आज एक बंद गली में आकर खत्म हो गया है. जब तक प्रष्ठभूमि में अंबेडकर की सामाजिक क्रान्ति के आह्वान की गूँज बनी हुई थी तब तक कांशीराम और मायावती की राजनीति को इंधन मिलता रहा. लेकिन जैसे ही मायावती की तथाकथित सोशल इंजीनियरिंग ने अंबेडकरी विश्लेषण में अनाधिकृत बदलाव करके राजनीतिक विवशता को सामाजिक स्तर पर उतारना चाहा वैसे ही ब्राह्मणवाद अपने ब्रह्मास्त्र के प्रयोग से इस नवीन रचना को भस्म करके स्वयं राजा बन बैठा. आज उत्तरप्रदेश की राजनीतिक जमीन पर यही भस्म बिखरी पड़ी है. अब हमें यह तय करना है कि हमारे दो परम सम्मानित नायकों और महापुरुषों की अंतर्दृष्टियों को हम किस तरह एकसाथ अपने काम में लें और कैसे उनमे वरीयता कैसे तय करें या संतुलन कैसे बनाएं? यह नहीं हो सकता कि हम दोनों में से एक का चुनाव करें, नहीं यह होना भी नहीं चाहिए. अंबेडकर और कांशीराम दोनों का महत्व हमारे लिए एकसमान है लेकिन हमें यह चुनाव तो करना ही पडेगा कि दूरगामी सफलता के लिए और शोषण मुक्त समाज के निर्माण के लिए हमें पहले किस पर कितना ध्यान देना है?

    व्यवहारिक रूप में इसका अर्थ यह है कि जब तक अंबेडकर के बताये अनुसार हम अपनी संस्कृति और अपना धर्म खोजकर स्थापित न कर दें तब तक गर्व करने योग्य हमारे पास कुछ है ही नहीं. यहाँ सवाल ये है कि किस पर गर्व करें? हमें ब्राह्मणवाद ने अपमानित करके हमारा जो नाम रखा है, जिन जातियों का नाम रखा है उस नाम और काम पर गर्व करें? क्यों करें? और इस गर्व से असल में ताकत किसको मिल रही है? क्या ये गर्वीली जातियां एक साथ इकट्ठे अपने सामूहिक अतीत या संभावित सामूहिक भविष्य पर गर्व कर पा रही हैं? अगर नहीं तो इस गर्व का हासिल क्या है? ये कठिन लेकिन जरुरी सवाल हैं जिस पर हमें बैठकर सोचना है.

    अब इसी के साथ अगर बीजेपी की सफलता पर विचार करें तो फिर से वही परिणाम मिलते हैं जिनकी तरफ अंबेडकर इशारा कर रहे हैं. बहुजन या दलित राजनीति की पराजय पर यह सलाह दी जा रही है कि यह अस्मिता की राजनीति की हार है. एक अर्थ में यह बात सही है और दुसरे अर्थ में बिलकुल गलत है. भारत में अस्मिता की राजनीति की जय पराजय को तय करने के पहले स्वयं अस्मिता की श्रेणी को ही तय करना जरुरी होता है. यहाँ “ग्रेडेड इन-इक्वालिटी” से भरे समाज में न समाधान इकट्ठा मिलता है न समस्या इकट्ठी मिलती है, सब कुछ श्रेणियों में बंटा हुआ है. अस्मिता की राजनीति की असफलता की बात इस अर्थ में सही है कि यह जातीय अस्मिता की राजनीति की असफलता है. लेकिन जो लोग सफल हुए हैं वे किस आधार पर सफल हुए हैं? यह प्रश्न ठीक से समझ लिया जाए तो हम अंबेडकर की जादुई समझ को देख सकेंगे और कांशीराम की असफलता का कारण भी देख सकेंगे. ठीक से देखें तो उत्तर प्रदेश में जातीय अस्मिता की छोटी राजनीति को वर्ण या धर्म की अस्मिता की बड़ी राजनीति ने पराजित किया है. यादव और जाटव का जातीय गर्व आपस में लड़कर हारा है लेकिन हिन्दू मुस्लिम का धार्मिक गर्व आपस में लड़कर हिन्दू गर्व जीता है. क्या यह साफ़ नजर नहीं आ रहा है? सीधा मतलब ये है कि छोटे विभाजन पर गर्व हार रहा है और बड़े विभाजन पर गर्व जीत रहा है. यही परिणाम हमें ब्राह्मणों और अन्य जातियों की लड़ाई में भी देखने को मिलता है. ब्राह्मण एक वर्ण के रूप में अकेली सैकड़ों जातियों से बलवान साबित होता है क्योंकि ब्राह्मण एक जाति नहीं वर्ण है जबकि यादव या जाटव अपने वर्ण को इकट्ठा न करते हुए स्वयं एक जाति के रूप में एक वर्ण से भिड़ने निकलता है और इसीलिये हारता है.

    यह बात गौर करने लायक है. वर्ण की लड़ाई, जाति की लड़ाई और धर्म की लड़ाई का अपना-अपना स्थान है. जाति पर गर्व करना सिर्फ जातीय लड़ाई तक सीमित कर देता है और वर्ण और धर्म के विकल्प पर ध्यान ही नहीं जाने देता. इसीलिये जातीय अस्मिता पर आवश्यकता से अधिक जोर देने पर वर्ण और धर्म की वृहत्तर और ताकतवर सच्चाइयों पर से हमारा ध्यान हट जाता है और इसका परिणाम ये होता है कि जातीय अस्मिता पर गर्व करने की सलाह उलटी पड जाति है. ये सलाह कैसे उलटी पड़ जाती है? आइये इसे भी समझते हैं.

    जब एक जाटव या चर्मकार या एक महार को उसकी जाति पर गर्व करना सिखाया जाता है तो वह भारत के समाज में अपनी जाति के अस्तित्व को सिर्फ एक जाति के रूप में ही देखता है, वर्ण और धर्म के बड़े और महत्वपूर्ण खेल को वो देखना भूल जाता है. अब वह सिर्फ जातिगत पहचान में अपनी बुद्धि लगाएगा. अब वह इस्लाम, इसाइयत या बौद्ध धर्म की श्रेष्ठताओं की तुलना में या नास्तिकता और विज्ञानवाद की तुलना में अपनी जातीय, वर्णगत और धार्मिक पहचान को देखना या उसका मूल्यांकन करना भूल जाता है. ऐसी तुलना करना भूलते ही वह धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक बदलाव की चेतना जागने की संभावना से भी दूर हो जाता है और अपनी छोटी सी जातीय पहचान में फंस जाता है. और चूँकि यह जातीय पहचान भी कोई बहुत गर्व करने लायक नहीं है बल्कि ब्राह्मणवादी धर्म के अंधविश्वासपूर्ण मिथकीय कथाओं के षड्यंत्र में ही लिपटी हुई है. ऐसे में जब जातीय अस्मिता अपने अतीत का निर्माण करने निकलती है तो उसे ब्राह्मणवादी और हिन्दू कथानकों में से ही अपने अतीत और अपनी महानता का निर्माण करना होता है. और यहीं पर आकर वह ब्राह्मणवादी षड्यंत्र में गहरे फंसता जाता है.

    ऐसी खतरनाक और असहाय दशा में वह इस षड्यंत्र को देख ही नहीं पाता. वो यह नहीं देख पाता कि जाति के इस दलदल को जाति से नहीं बल्कि वर्ण या धर्म के विमर्ष से खत्म करना होता है. हम कीचड में फंसे हुए कीचड पर ही गर्व करते रहेंगे तो उससे बाहर निकलने की योजना कैसे बना सकेंगे? यही वह केन्द्रीय समस्या है जिसमे फंसकर जाति पर गर्व की राजनीति ने आकर दम तोड़ दिया है. और इसका सबसे बड़ा फायदा उन लोगों को हुआ है जिन्होंने जातीय अस्मिता की बजाय वर्ण की अस्मिता की या धर्म की अस्मिता की राजनीति खेली है. ध्यान दीजिये ब्राह्मण एक जाति नहीं वर्ण है, वैश्य और क्षत्रिय एक जाति नहीं वर्ण है जबकि जाटव, यादव और महार, कोली, कुर्मी, कुम्हार, मुसहर, वाल्मीकि आदि सब जातियां हैं. इस सबका क्या अर्थ है?

    इसका इतना ही अर्थ है कि जातीय अस्मिता पर गर्व को क्या एक धार्मिक अस्मिता के या एक सांस्कृतिक अस्मिता के गर्व में बदला जा सकता है? अब समस्या यह भी है कि अधिकाँश लोगों को अपनी वर्णगत या धर्मगत या सांस्कृतिक अस्मिता की कोइ खबर ही नहीं है. सदियों से शिक्षा और मेलजोल से वंचित रखने का परिणाम है ये. ऐसे में किस पर गर्व करें या किस झंडे या शास्त्र या महापुरुष के इर्द गिर्द इकट्ठे हों? क्या सभी शूद्र इकट्ठा हो सकते हैं? क्या सभी शूद्र और दलित, आदिवासी इकट्ठा हो सकते हैं और शूद्र या चौथे वर्ण के रूप में अपनी पहचान को थोपने की तैयारी कर सकते हैं? थोड़ी देर के लिए मान लेते हैं कि ऐसा होने लगा. लेकिन फिर भी यह सवाल फिर उठेगा कि इस शूद्र वर्ण की अस्मिता जब अपने अतीत को खोजने निकलेगी तब फिर उसे ब्राह्मणी शास्त्रों की मिथकीय गप्प से ही गुजरना पडेगा. तब फिर से वही समस्या खड़ी होगी जो जाटव, यादव या महार के साथ अपने अतीत की खोज के समय पैदा होती है. क्या यह घनचक्कर नजर आता है?

    इसका यह अर्थ हुआ कि आप एक जातीय या वर्णगत पहचान से नहीं बल्कि एक भिन्न सांस्कृतिक और धार्मिक पहचान से ही इस फंदे से छूट सकते हैं. और यहीं अंबेडकर अपना अंतिम निर्णय सुनाते हुए बौद्ध धर्म में प्रवेश कर जाते हैं. यहाँ यह भी जानना जरुरी है कि एक अन्य धर्मनिरपेक्ष अस्मिता – ‘सर्वहारा’ भी हमारे लिए काम की नहीं है. सर्वहारा ठीक वही बात है जिसे आजकल ‘आर्थिक आधार पर आरक्षण’ देने वाले कहते फिरते हैं. इस विमर्श में “गरीब” के अर्थ में क्लास या वर्ग का एक इकाई बनते ही इस गरीब के नाम पर ‘एक गाँव में एक गरीब ब्राह्मण रहता था’ वाली कहानिया फिर ज़िंदा हो जायेंगी और इन कहानियों से चले आ रहे सवर्णों के हाथों में बीपीएल कार्ड प्रगट हो जायेंगे और सर्वहारा का वास्तविक भारतीय चेहरा – जो कि दलित आदिवासी और ओबीसी हैं – वे फिर से गरीब सवर्ण द्विजों की भीड़ में खो जायेंगा. इसीलिये लोहिया ने वर्ग संघर्ष को नकारते हुए वर्ण संघर्ष की बात की थी.

    अब इस विस्तार में जाने के बाद यह भी हम जानते हैं कि धार्मिक, सामाजिक और राजनीतिक बदलाव हमको एकसाथ ही चलाना पडेगा. हम पूरे भारतीय शूद्रों और दलितों के बौद्ध हो जाने तक सामाजिक राजनीतिक आन्दोलन को स्थगित नहीं रख सकते. यह न तो आवश्यक है न ही संभव है. तब क्या करें? यह बहुत महत्वपूर्ण सवाल है और इसका उत्तर ज़रा भी कठिन नहीं है. इसका उत्तर वही है जो अंबेडकर और कांशीराम दोनों ने प्रयोग करके दिखाया है लेकिन उसे हम बीच में अधूरा छोड़ चुके हैं. वह उत्तर यह है की बौद्ध धर्म के धीरे-धीरे प्रचार द्वारा हमारी सभी जातियों को अंधविश्वास से बाहर निकाला जाये और हमारे बच्चों, युवकों और स्त्रीयों को वैज्ञानिक, लोकतांत्रिक और समतामूलक विचारधारा की तरह बौद्ध धर्म की शिक्षा दी जाए. यहाँ नोट करते चलें की धर्मांतरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है. सारे दलित और शूद्र बौद्ध हैं ही. इसे सिर्फ फिर से जीना शुरू करना है और अपने घरों से अंधविश्वासपूर्ण पूजा पाठ शास्त्र, व्रत उपवास और त्योहारों को बाहर निकाल देना है. अपनी स्त्रीयों और बच्चों को बुद्ध और बौद्ध धर्म के बारे में अंबेडकर और ज्योतिबा फूले के बारे में शिक्षित करना है. यह एक धीमा लेकिन पक्का काम है. यह काम करते हुए हमें हिन्दू धर्म का अपमान नहीं करना है. उन्हें गाली देकर उनका महत्व नहीं बढ़ाना है, उन्हें उनके हाल पर छोड़कर चुपचाप अपने धर्म और संस्कृति को आगे बढ़ाना है. अगर हम यह काम करते हुए इसी नजरिये से जातीय राजनीति को वर्ण की राजनीति और वर्ण की राजनीति को धर्म की राजनीति तक उठा सकें तो हम न सिर्फ दलितों शूद्रों और आदिवासियों का बल्कि एक आम भारतीय का भी हित साध सकते हैं. अंततः धर्म की राजनीति भी फिर भारतीय और गैर भारतीय के द्वंद्व की राजनीति में प्रवेश करेगी. तब विशुद्ध भारतीय होना एकमात्र मूल्य रह जाएगा. यही मूल्य फिर एक स्वस्थ और मंगलमय राष्ट्रवाद का जनक होगा.

    हमारी राजनीति इस तरह क्रम में जाति से वर्ण और वर्ण से धर्म तक ऊपर उठ सके और राजनीतिक विकास के साथ ही सामाजिक धार्मिक विकास और बदलाव को भी सुनिश्चित करती चले इसकी बड़ी आवश्यकता है. उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणाम अब इस आवश्यकता को रेखांकित कर रहे हैं इसकी तरफ ध्यान देना जरुरी होता जा रहा है.

     

  • स्त्री हूँ – माय चॉइस !

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    स्त्री हूँ
    हाँ स्त्री ही हूँ
    कोई अजूबा नहीं हूँ, समझे न !

    क्या हुआ, मेरी मर्जी
    जब चाहूँ गिराऊं बिजलियाँ
    या फिर हो जाऊं मौन

    मेरी जिंदगी
    मेरी अपनी, स्वयं की
    जैसे मेरा खुद का तराशा हुआ
    पंच भुजिय प्रिज्म
    कौन सा रंग, कौन सा प्रकाश
    किस परावर्तन और किस अपवर्तन के साथ
    किस किस वेव लेंग्थ पर
    कहाँ कहाँ तक छितरे
    सब कुछ मेरी मर्जी !!

    मेरा चेहरा, मेरे लहराते बाल
    लगाऊं एंटी एजिंग क्रीम या ब्लीच कर दूं बाल
    या लगाऊं वही सफ़ेद पाउडर
    या ओढ़ लूं बुरका
    फिर, फिर क्या, मेरी मर्जी !

    मेरा जिस्म खुद का
    कितना ढकूँ, कितना उघाडू
    या कितना लोक लाज से छिप जाऊं
    या ढों लूँ कुछ सामाजिक मान्यताएं
    मेरी मर्जी
    तुम जानो, तुम्हारी नजरें
    तुम पहनों घोड़े के आँखों वाला चश्मा
    मैं तो बस इतराऊं, या वारी जाऊं
    मेरी मर्जी !

    है मेरे पास भी तुम्हारे जैसे ऑप्शन,
    ये, वो, या वो दूर वाला या सारे
    तुम्हे क्या !
    हो ऐसा ही मेरा नजरिया!
    हो मेरी चॉइस! माय चॉइस !!

    पर, यहीं आकर हो जाती हूँ अलग
    है एक जोड़ी अनुभूतियाँ
    फिर उससे जुडी जिम्मेदारियां
    बखूबी समझती हूँ

    और यही वजह, सहर्ष गले लगाया
    दिल दिमाग से अपनाया
    आफ्टर आल माय चॉइस टाइप्स फीलिंग
    है न मेरे पास भी !!
    —————
    माय चॉइस !

  • मुझे अपनी देह से बाहर निकल जाने दो ..

    Vimal Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    कितनी बार कहा मैं एक देह नहीं हूँ
    सिर्फ एक स्त्री हूँ
    मुझे इस जंगल से बाहर निकल जाने दो .

    कितनी बार कहा चीखकर
    मैं कोई तितली नहीं हूँ
    तुम्हारे बगीचे में उडती हुई

    तुम्हारी नींद में कोई ख्वाब नहीं हूँ .
    मुझे इस ख्वाबसे बाहर निकल जाने दो

    नहीं हूँ कोई कटी पतंग
    जिसे लूटने के लिए तुम दौड़ते रहो..
    नहीं हूँ कोई नदी
    प्यास बुझाने तुम आते रहो बारबार
    मुझे इस नदी से बाहर निकल जाने दो
    मैं एक स्त्रीहूँ .

    कितनी बार कहा मैंने
    कोई अँ धेरी सुरंग नहीं हूँ
    नहीं हूँ कोई फूल
    न कोई खुशबू
    मुझे इस सुरंग से बाहर निकल जाने दो

    मैंने इतनी बार कहा तुमसे
    मैं सबसे प्रेम नहीं कर सकती
    नहीं सोसकती सबके साथ
    मैं एकस्त्री हूँ
    मैं वक्ष नहीं हूँ
    कोई योनि नहीं हूँ
    एक बच्चे की माँ हूँ

    तुम्हारे लिए कोई बिस्तर नहीं हूँ
    कोई तकिया नहीं हूँ
    मेरी देह ही मेरे लिए एक पिंजरा है
    मुझे आज इस पिंजरे से बाहर निकल जाने दो

  • खुद की मौत !

    Mukesh Kumar Sinha

    [themify_hr color=”red”]

    सोने से कुछ देर पहले
    तकियें में चेहरा भींचे
    कुछ पलों के लिए रोकी थी साँसे
    महसूसना चाहता था
    खुद की मौत !
    आखिर आत्महत्या भी तो कुछ होती है न

    मरने के बाद होगा क्या
    नहीं समझ पाया
    पर, मरने से कुछ पल पहले कि
    यातना की रिहर्सल
    बता गयी, नहीं है क़ुव्वत मुझमे मरने की
    न चाहते हुए भी
    आई आवाज, अन्दर से, मत मारो !

    किसी दिन देखा था
    शांति व मोहब्बत के दूत
    सुर्ख सफेद फ़ाख्ते को
    कमरे में, चलते पंखे से टकरा कर
    थके-हारे टूटे डैने के साथ
    औंधे मुंह गिरते, बिस्तर पर
    दिल ने कहा – ऐसे ही चाहिए मौत !

    आह भरते मरने को अधीर फ़ाख्ते पर
    एक बिल्ले ने मारा था झपट्टा
    जैसे था, उसे इन्तजार एक मौत का
    पहुंच पाता फाख्ते के कंठ तक कुछ पानी की बूंदे
    बिल्ले के म्याऊं में थी आवाज
    ‘राम नाम सत्य है !’

    भोरे-भोरे
    निकला था सैर पर, कोई एक दिन
    एक सरपट दौड़ती मोटरकार ने
    रौंद दिया था एक आवारा कुत्ते को
    पल में, फटाक की आवाज़ के साथ
    सारी अंतड़ियाँ व पेट के अन्दर का मांस
    पड़े थे सड़क पर
    पर चिहुँकते हुए, दिल ने घबरा कर कहा
    नहीं मरना कुत्ते की मौत !

    चीटियाँ भी तो
    दब ही जाती हैं राहों में
    कहाँ रहता है ध्यान कि
    पैरों तले हुई हैं बहुत सी बिलखती मौत

    यानी है जिंदगी तो होगी मौत
    है मौत तो बहाने अनेक
    है मौत के अंदाज अलग अलग
    मरते हैं कमजोर लाचार
    पाते हैं वीरगति बलशाली

    बेशक कहूँ नहीं मरना है मुझे
    पर
    कुछ आँखे होंगी नम
    कभी न कभी, मेरे लिए भी ,
    शायद मेरे वजह से भी होगी
    छलकते पानी की सांद्रता उच्चतम स्तर पर !
    कुछ नमक तो मुझमे भी है ही न

    आखिर मौत के बाद का सन्नाटा
    क्यों दहाड़ें मारता प्रतीत होता है !!

  • अंबेडकरवादी आन्दोलन और ओशो का मायाजाल –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

    [themify_hr color=”red”]

    अंबेडकरवादी आन्दोलन को सबसे बड़ा ख़तरा किस बात से है? यह प्रश्न जितना जटिल है उतना ही जटिल इसका उत्तर भी है. अक्सर हम सोचते हैं कि आजकल काम कर रही राजनीतिक विचारधारों या राजनीतिक सांस्कृतिक संगठनों से ये खतरा है. यह बात कुछ दूर तक सही भी है लेकिन अंबेडकरवादी आन्दोलन को सबसे ज्यादा खतरा वेदांती अध्यात्म के सम्मोहन से है. भारत के गरीब और शोषित लोगों पर जो गुलामियाँ थोपी गईं हैं वे धर्म और अध्यात्म की चाशनी में लपेटकर थोपी गयी हैं ये जहर दार्शनिक सिद्धांतों में लपेटकर पिलाया गया है. और दुर्भाग्य से हमारे दलित और शोषित लोग ही खुद इस अध्यात्म के गुलाम हो रहे हैं. https://analystprep.com modafinil predaj online

    इस बात को मैं लंबे समय से नोट करता रहा हूँ कि किस तरह अंबेडकर और बुद्ध को मानने वालों में भी वेदान्त का जहर भरा हुआ है. कई मित्र हैं जो अंबेडकर और बुद्ध को प्रेम करते हैं लेकिन इसके बावजूद वे ओशो, जग्गी वासुदेव, श्री श्री, विवेकानन्द या अन्य वेदांती बाबाओं की गुलामी में लगे हुए हैं. ऐसे बाबाओं ने ही बुद्ध और अंबेडकर को और उनकी कौम को खत्म करने के षड्यंत्र रचे हैं. हमें इन बाबाओं से मुक्त होना होगा. इस सिलसिले में एक अनुभव आपसे साझा करना चाहूँगा.

    अभी ओशो के एक सन्यासी ने फोन किया। बुद्ध के विषय में बात कर रहे थे। चूँकि वे अंबेडकरवादी और बुद्ध के प्रेमी भी हैं इसलिए उन्होंने बुद्ध के विषय में मेरे विचार विस्तार से जानने चाहे। मैं हालाकि काफी कुछ लिख चुका हूँ फिर भी चूँकि वे अंबेडकरवादी हैं इसलिए मैं उनसे विस्तार से चर्चा करने को राजी हुआ।

    बात ले देकर इस मुद्दे पर आती है कि बुध्द ने ईश्वर को आत्मा को और पुनर्जन्म को क्यों नकारा। उन मित्र ने कहा कि ओशो के अनुसार बुद्ध ईश्वर आत्मा और पुनर्जन्म को जानते हुए भी ईश्वर को नकार रहे हैं। मैंने पूछा कि यह बात बुद्ध ने खुद कही है कि वे इन तीनों को जानकर भी नकार रहे हैं? इसपर वे कहने लगे कि पता नहीं लेकिन ओशो तो यही कहते हैं। अब ध्यान दीजिए, ओशो बुद्ध के बारे में बुद्ध से ज्यादा जानते हैं। यही वेदांती मायाजाल है। जैसे बाबा लोग वैज्ञानिकों से ज्यादा विज्ञान और क्वांटम फिजिक्स जानते हैं उसी तरह ओशो जैसे बाजीगर बुद्ध, महावीर कृष्ण मुहम्मद आदि के बारे में खुद उनसे ज्यादा जानते हैं।

    इन वेदान्तियों में इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी बात अपने बूते पर रखें, वे कृष्णमूर्ति या नीत्शे या रसेल या विट्गिस्टीन की तरह अपने दर्शन की जिम्मेदारी खुद नहीं लेते बल्कि विवेकानन्द, अरबिंदो, दयानन्द आदि की तरह सब कुछ वेद उपनिषद या बुद्ध महावीर कृष्ण आदि के मुंह से कहलवाते हैं। यही वेदांती बीमारी है। नया करने में इन्हें डर लगता है। इसीलिये भारत कुछ भी नया नहीं करता। कोई विज्ञानं, तकनीक, चिकित्सा प्रणाली, दर्शन,साहित्य, जीवन शैली, कपड़ा लत्ता, सिनेमा, मनोरंजन या कुछ भी खोजकर दिखा दीजिये जो आधुनिक जगत में भारत ने दुनिया को दी है। ये सिर्फ नकल करते हैं।

    ओशो इस देश के दुर्भाग्य को समझने की चाबी हैं। मौलिक करने का साहस इन्होंने दिखाया था लेकिन साठ के दशक के अंत में ही स्वयं को पुजवाने की और मठाधीश बनने की हवस ने इन्हें पक्का वेदांती बना दिया।

    बाद में इन्हें जो कुछ कहना था वो दूसरों के कंधे पर बंदूक रखकर कहा। और इसे वे स्वीकार भी करते हैं। उनके शिष्य इस बात के लिए उनकी तारीफ भी करते जाते हैं। उनमें इतनी भी चेतना नहीं कि इस बात के लिए वे ओशो की भर्त्सना करें कि अगर कहना ही था तो हिम्मत करके अपने नाम से कहते,दूसरों के मुंह में शब्द डालने की क्या जरूरत है? लेकिन वे ऐसा सोचेंगे ही नहीं। क्योंकि ये सब वेदांती लोग हैं, एक ही षड्यंत्र के हिस्से हैं।

    कृष्णमूर्ति इस संबन्ध में एकदम मौलिक हैं। बचपन से ही उन्हें बुद्ध का अवतार बनाकर खड़ा किया गया लेकिन उनकी ईमानदारी देखिये कि न सिर्फ उन्होंने अवतार होने से इंकार कर दिया बल्कि अपनी शिक्षाओं को भी किसी शास्त्र, परम्परा या आप्त पुरुष से नहीं जोड़ा। उनका जोर रहा कि मेरी बातों की जिम्मेदारी मेरी अपनी है किसी बुद्ध, कृष्ण, जीसस आदि की नहीं। इसीलिये अंतिम सांस तक ओशो कृष्णमूर्ति के खिलाफ बोलते रहे।

    कल्पना कीजिये अगर कृष्णमूर्ति की जगह ओशो को अवतार घोषित किया जाता तो वे कैसी बाजीगरी का जाल न फैला देते? उन्हें किसी ने बुद्ध अवतार घोषित नहीं किया तो खुद ही उन्होंने प्रचार किया कि बुद्ध मेरे शरीर में आने के लिए लालायित हो रहे हैं। अब ये मजेदार खेल है। उनके कुछ शिष्य अब इसी खेल को आगे बढ़ाते हुए अपने शरीर में शिव, नारद, नानक, कबीर गोरख, ओशो और न जाने किन किन को किराए से कमरा दे चुके हैं। इनमे इतनी हिम्मत नहीं कि अपनी बात अपने नाम से कहे। ये भी गोरख कबीर और नानक के मुंह से वेदांत बुलवा रहे हैं।

    खैर, उन मित्र को मैंने कहा कि आप अंबेडकरवादी हैं और बुद्ध को प्रेम करते हैं तो ये ओशो के मायाजाल में क्यों फस रहे हैं? अंबेडकर और बुद्ध दोनों ही आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म को नकारते हैं, तब आप क्यों कन्फ्यूज हैं? या तो बुद्ध और अंबेडकर को सीधे समझ लीजिए या ओशो के जाल में फसे रहिये।

    डेढ़ घण्टे की चर्चा के बाद भी उनके दिमाग से पुनर्जन्म, आत्मा और मोक्ष का भूत नहीं निकला।

    ये मैं इसलिए लिख रहा हूँ कि आप सब जान सकें कि बुद्ध या अंबेडकरी आंदोलन के खिलाफ सबसे बड़ा कोई हथियार है तो वो वेदांती अध्यात्म ही है। भारत में अब इन वेदान्तियों ने विपस्सना के नाम से भी इस वेदांती अध्यात्म को ही बुद्ध के नाम की आड़ में फैलाना शुरू कर दिया है। किसी भी बाबा योगी या गुरु के आश्रम में चले जाइए सब बुद्ध की व्याख्या कर रहे हैं और विपस्सना में तोड़ फोड़ करके उसमें अपनी बकवास मिला रहे हैं।

    ये गजब खेल है। इन्हें कृष्ण और राम या विष्णु या तुलसी की नई व्याख्या की फ़िक्र नहीं है। लेकिन बुद्ध और कबीर की बडी फ़िक्र रहती है। कारण साफ़ है। बुद्ध और कबीर से इन्हें डर लगता है अगर बुध्द, कबीर की आग पर इनकी व्याख्याओं का पानी बार बार न डाला गया तो ये आग पूरे वेदान्तिक भूसे को जला डालेगी। इसीलिये ये अपने वेदांती, वैष्णव चैम्पियन्स को सुरक्षित रखते हैं और दंगे में बुद्ध, कबीर को आगे कर देते हैं।

    ओशो इस खेल को बहुत होशियारी से करते रहे हैं। हम किसी और से उम्मीद न करें लेकिन अंबेडकरवादियों और बुद्ध के प्रेमियों से उम्मीद कर सकते हैं कि वे ओशो की बाजीगरी को समझें और उनसे सावधान रहें। बुद्ध को अंबेडकर की दृष्टि से समझें या सीधा समझने का प्रयास करे।