Category: आपके आलेख

  • घी गेहूँ नहीं रोज़गार चाहिए साहब

    डा० नीलम महेंद्र

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    भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और चुनाव किसी भी लोकतंत्र का महापर्व होते हैं ऐसा कहा जाता है। पता नहीं यह गर्व का विषय है या फिर विश्लेषण का कि हमारे देश में इन महापर्वों का आयोजन लगा ही रहता है । कभी लोकसभा  कभी विधानसभा तो कभी नगरपालिका के चुनाव। लेकिन अफसोस की बात है कि चुनाव अब नेताओं के लिए व्यापार बनते जा रहे हैं और राजनैतिक दलों के चुनावी मैनाफेस्टो व्यापारियों द्वारा अपने व्यापार के प्रोमोशन के लिए बाँटे जाने वाले पैम्पलेट ! और आज इन पैम्पलेट , माफ कीजिए चुनावी मैनिफेस्टो में  लैपटॉप स्मार्ट फोन जैसे इलेक्ट्रौनिक उपकरण  से  लेकर प्रेशर कुकर जैसे बुनियादी आवश्यकता की वस्तु बाँटने से शुरू होने वाली बात घी , गेहूँ और पेट्रोल  तक पंहुँच गई।

    कब तक हमारे नेता गरीबी की आग को पेट्रोल और घी से बुझाते रहेंगे? सबसे बड़ी बात यह कि यह मेनिफेस्टो उन पार्टीयों के हैं जो इस समय सत्ता में हैं। राजनैतिक दलों की निर्लज्जता और इस देश के वोटर की बेबसी दोनों ही दुखदायी हैं। क्यों कोई इन नेताओं से नहीं पूछता कि  इन पांच सालों या फिर स्वतंत्रता के बाद इतने सालों के शासन में तुमने क्या किया?

    उप्र की समाजवादी पार्टी हो या पंजाब का भाजपा अकाली दल गठबंधन दोनों को सत्ता में वापस आने के लिए या फिर अन्य पार्टियों को  राज्य के लोगों को आज इस प्रकार के प्रलोभन क्यों देने पड़ रहे हैं? लेकिन बात जब पंजाब में लोगों को घी बाँटने की हो तो मसला बेहद गंभीर हो जाता है क्योंकि पंजाब का तो नाम सुनते ही जहन में हरे भरे लहलहाते फसलों से भरे खेत उभरने लगते हैं और घरों के आँगन में बँधी गाय भैंसों के साथ खेलते खिलखिलाते बच्चे  दिखने से लगते हैं। फिर वो पंजाब जिसके घर घर में दूध दही की नदियाँ बहती थीं , वो पंजाब जो अपनी मेहमान नवाज़ी के लिए जाना जाता था जो अपने घर आने वाले मेहमान को दूध दही घी से ही पूछता था आज  उस पंजाब के वोटर को उन्हीं चीजों को सरकार द्वारा मुफ्त में देने की स्थिति क्यों और कैसे आ गई?

    सवाल तो बहुत हैं पर शायद जवाब किसी के पास भी नहीं। जब हमारा देश आजाद हुआ था तब भारत पर कोई कर्ज नहीं था तो आज इस देश के हर नागरिक पर औसतन 45000 से ज्यादा का कर्ज क्यों है? जब अंग्रेज हम पर शासन करते थे तो भारतीय रुपया डालर के बराबर था तो आज वह 68.08 रुपए के स्तर पर कैसे आ गया? हमारा देश कृषी प्रधान देश है तो स्वतंत्रता के इतने सालों बाद भी आजतक  किसानों को 24 घंटे बिजली एक चुनावी वादा भर क्यों है? चुनाव दर चुनाव पार्टी दर पार्टी वही वादे क्यों दोहराए जाते हैं? क्यों आज 70 सालों बाद भी पीने का स्वच्छ पानी,  गरीबी और बेरोजगारी जैसे बुनियादी जरूरतें ही मैनिफेस्टो का हिस्सा हैं? हमारा देश इन बुनियादी आवश्यकताओं से आगे क्यों नहीं जा पाया? और क्यों हमारी पार्टियाँ रोजगार के अवसर पैदा करके हमारे युवाओं को स्वावलंबी बनाने से अधिक मुफ्त चीजों के प्रलोभन देने में विश्वास करती हैं?

    यह वाकई में एक गंभीर मसला है कि जो वादे राजनैतिक पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो में करती हैं वे चुनावों में वोटरों को लुभाकर वोट बटोरने तक ही क्यों सीमित रहते हैं।चुनाव जीतने के बाद ये पार्टियाँ अपने मैनिफेस्टो को लागू करने के प्रति कभी भी गंभीर नहीं होती और यदि उनसे उनके मैनिफेस्टो में किए गए वादों के बारे में पूछा जाता है तो सत्ता के नशे में अपने ही वादों को  ‘चुनावी जुमले ‘ कह देती हैं। इस सब में समझने वाली बात यह है कि वे अपने मैनिफेस्टो को नहीं बल्कि अपने वोटर को हल्के में लेती हैं।

    आम आदमी तो लाचार है चुने तो चुने किसे आखिर में सभी तो एक से हैं। उसने तो अलग अलग पार्टी   को चुन कर भी देख लिया लेकिन सरकारें भले ही बदल गईं मुद्दे वही रहे। पार्टी और नेता दोनों  ही लगातार तरक्की करते गए लेकिन वो सालों से वहीं के वहीं खड़ा है। क्योंकि बात सत्ता धारियों द्वारा भ्रष्टाचार तक ही सीमित नहीं है बल्कि सत्ता पर काबिज होने के लिए दिखाए जाने वाले सपनों की है। मुद्दा वादों  को हकीकत में बदलने का सपना दिखाना नहीं उन्हें सपना ही रहने देना है।

    चुनाव आयोग द्वारा चुनाव से पहले आचार संहिता लागू कर दी जाती है। आज जब विभिन्न राजनैतिक दल इस प्रकार की घोषणा करके वोटरों को लुभाने की कोशिश करते हैं तो यह देश और लोकतंत्र दोनों के हित में है कि चुनाव आयोग यह सुनिश्चित करे कि पार्टियाँ अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा करें और जो पार्टी सत्ता में आने के बावजूद अपने चुनावी मेनिफेस्टो को पूरा नहीं कर पाए वह अगली बार चुनाव लड़ने के लिए अयोग्य घोषित कर दी जाए।

    जब तक इन राजनैतिक दलों की जवाबदेही अपने खुद के मेनीफेस्टो के प्रति तय नहीं की जाएगी हमारे नेता भारतीय राजनीति को किस स्तर तक ले जाएंगे इसकी कल्पना की जा सकती है। इस लिए चुनावी आचार संहिता में आज के परिप्रेक्ष्य में कुछ नए कानून जोड़ना अनिवार्य सा दिख रहा है।

  • अरे वो बसंत…

    Dr Mukesh Kumar “Mukul”

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    अरे वो बसंत…

    तू आते हो, इठलाते हो,
    ठण्ड की मार भगाते हो,
    वसुंधरा को सजाते हो,
    प्रेम का राग जगाते हो।
    अरे वो बसंत…

    पल में पतझर को रुखसत कर,
    चहुँ ओर हरियाली बिछाते हो,
    उत्सव और उल्लास भरकर,
    जीवन को सजाते हो,
    दूर भगाकर आलस तन-मन से,
    जज्बातो को जगाते हो,
    अरे वो बसंत…

    प्रेम-राग का तान छेड़कर,
    क्यूँ मन को हर्षाते हो?
    प्रियतमा की बाँहो सा,
    तुम स्नेह सब पर लुटाते हो,
    तन-मन प्रफ्फुलित कर प्रेम-रस में,
    फिर क्यूँ “मुकुल” को तड़पाते हो?
    अरे वो बसंत…

    .

  • गिरना

    धीरज


    गिरने की सीमा
    या तो सुनियोजित होती है
    या पूरी तरह अनियोजित
    तीसरा विकल्प तो
    उपरोक्त का निर्विकल्प
    ही होता है….

    जब गिरने की सीमा
    अनियोजित होता है
    बहुधा ताड़ से ही गिरते है
    और किसी मनचाहे खजूर पर
    आकर अटक ही जाते है
    जब सुनियोजित ढंग से
    गिरना शुरू करते है
    भारशून्यता के साथ गिरते है
    और तब धरती भी
    गिरते हुए को रोक नही पाती
    या यूं कहें..

    धरती रोकने से
    इंकार कर देती है
    भला भारहीन को
    क्या और क्यूं रोकना ?
    सुनियोजित या अनियोजित से परे
    उक्त के निर्विकल्प के तौर पर गिरने को
    निर्विवाद गिरना तो नही कह सकते
    पर ऐसा हो सकता है
    जब प्रेम या समर्पण या सेवा के
    उद्यमशीलता के शिखरों पर
    गिरने के क्रम मे
    पहुँच रहे होते हैं…

    और तब…
    धरती तो धरती
    आकाश भी
    गिरते हुए का
    दामन थाम ही लेता है…

     

  • आधे कार्यकाल की समाप्ति पर कहां खड़ी है मोदी सरकार?

    प्रो० राम पुनियानी
    Rtd, IIT Bombay

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    नवंबर 2016 में मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो गया। इस सरकार का आंकलन हम किस प्रकार करें? कुछ टिप्पणीकार यह मानते हैं कि मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें देश आशाभरी निगाहों से देख रहा है और जो साहसिक कदम उठाने की क्षमता और इच्छा रखते हैं। उन्हें देश को बदल डालने का जनादेश मिला है और वे उसे पूरा करेंगे। जहां कुछ लोगों की यह सोच है, वहीं देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, मोदी और उनकी सरकार को इस रूप में नहीं देखता। यह सरकार अच्छे दिन लाने और देश के सभी नागरिकों के बैंक खातों में 15-15 लाख रूपए जमा करने के वायदे पर सत्ता में आई थी। न तो अच्छे दिन आए और ना ही 15 लाख रूपए। उलटे, मंहगाई बेलगाम हो गई और ऊपर से सरकार ने नोटबंदी के जिन्न को बोतल से निकाल आमजनों को भारी मुसीबत में फंसा दिया। ऐसा बताया जाता है कि देश भर में कम से कम 100 लोग बैंकों के बाहर लाइनों में खड़े रहने के दौरान इस दुनिया से विदा हो गए। रोज़ खाने-कमाने वालों का भारी नुकसान हुआ। लाखों प्रवासी श्रमिक अपना रोज़गार खो जाने के कारण अपने-अपने घरों को वापस लौटने पर मजबूर हो गए।

    इस सरकार की एक विशेषता है हर प्रकार की शक्तियों का एक व्यक्ति के हाथों में केन्द्रीयकरण। और वह व्यक्ति कौन है, इसका अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के आसपास एक आभामंडल का निर्माण कर दिया गया है। कैबीनेट मात्र एक समिति बनकर रह गई है जो श्री मोदी के निर्णयों पर ठप्पा लगाती है। इसका एक उदाहरण है विमुद्रीकरण के निर्णय को कैबिनेट की स्वीकृति। देश की विदेश नीति में भारी बदलाव किए जाने का ज़ोरशोर से ढिंढोरा पीटा गया।  पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया और श्री मोदी, दर्जनों विदेश यात्राओं पर गए। आज ढाई साल बाद भारत के पाकिस्तान और नेपाल से रिश्ते पहले की तुलना में खराब हैं और दुनिया में भारत के सम्मान में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है।

    शक्तियों के केन्द्रीयकरण के साथ शुरू हुआ भाजपा और उसके साथी संघ परिवार के नेताओं के नफरत फैलाने वाले भाषणों का दौर। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों को खौफज़दा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। एक कैबीनेट मंत्री ने उन लोगों को हरामज़ादा बताया जो सरकार के साथ नहीं हैं। सरकार, विश्वविद्यालयों के कामकाज में हस्तक्षेप करने लगी। अयोग्य व्यक्तियों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों का मुखिया नियुक्त किया जाने लगा। इसका एक उदाहरण था गजेन्द्र चैहान की भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति। विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की गई जिनकी एकमात्र योग्यता संघ की विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। विश्वविद्यालयों में अभाविप की सक्रियता अचानक बढ़ गई और उसने सभी विश्वविद्यालयों, विशेषकर जेएनयू और हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, में प्रजातांत्रिक ढंग से चुने गए छात्रसंघों और अन्य संगठनों को दबाने का प्रयास शुरू कर दिया। जेएनयू में एक नकली सीडी के आधार पर कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया और रोहित वेम्युला को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया।

    संघ और उसके साथी संगठनों ने लव जिहाद और घर वापसी के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध अभियान छेड़ दिया। समाज को और विभाजित करने के लिए उन्होंने गोमांस और गाय को मुद्दा बनाया, जिसके नतीजे में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और गुजरात के ऊना में दलितों के साथ अमानवीय मारपीट की गई। अंधश्रद्धा के पैरोकार, केन्द्र में अपनी सरकार होने के कारण आश्वस्त थे कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। दाभोलकर की हत्या के बाद गोविंद पंसारे और एमएम कलबुर्गी की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। इन सब घटनाओं और देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कई प्रतिष्ठित कलाकारों, वैज्ञानिकों और अन्यों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए। शीर्ष स्तर पर एकाधिकारवादी व्यवहार और सामाजिक स्तर पर संघ परिवार के साथियों की कारगुज़ारियों के कारण स्थिति यहां तक बिगड़ गई कि एक समय भाजपा के साथी रहे अरूण शौरी ने वर्तमान स्थिति को ‘विकेन्द्रीकृत आपातकाल’ और ‘माफिया राज्य’ बताया।

    सरकार ने किसानों से उनकी ज़मीनें छीनने का प्रयास भी किया परंतु लोगो के कड़े विरोध के कारण यह सफल न हो सका। श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया और कुटीर व लघु उद्योगों के संरक्षण के लिए बनाए गए प्रावधान हटा दिए गए। बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति और उनकी ताकत में आशातीत वृद्धि हुई। बैंकों ने उद्योगपतियों के हज़ारों करोड़ रूपए के ऋण माफ कर दिए और विजय माल्या जैसे कुछ उद्योगपति, जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हज़ारों करोड़ रूपयों का ऋण था, विदेश भाग गए। कई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की गई परंतु ऐसा नहीं लगता कि इनसे आम लोगों, गरीब किसानों या श्रमिकों का सशक्तिकरण हुआ हो। विरोध और असहमति को कुचलने की अपनी नीति के अनुरूप, उन एनजीओ को सरकार ने परेशान करना शुरू कर दिया जो अल्पसंख्यक अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए काम कर रहे थे। उनके विदेशों से धन प्राप्त करने के अधिकार पर रोक लगा दी गई।

    अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारे प्रजातंत्र का एक प्रमुख हिस्सा रही है। परंतु आज हालात यह बन गए हैं कि जो भी सरकार के विरूद्ध कुछ कहता है, उसे देशद्रोही बता दिया जाता है। भारत माता की जय के नारों और सिनेमाघरों में जनगणमन बजाकर छद्म देशभक्ति को बढ़ाया दिया जा रहा है।

    मोदी की हिन्दुत्ववादी राजनीति के चलते, देश भर में अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ छुटपुट हिंसा में वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार मिटाने के लंबेचौड़े वायदे तो किए गए परंतु नोटबंदी ने भ्रष्टाचार के नए तरीकों का विकास करने में मदद की। देश का ज्यादातर काला धन या तो विदेशी बैंकों में जमा है या अचल संपत्ति व कीमती धातुओं के गहनों के रूप में है। जो थोड़ा-बहुत नगदी काला धन था, भी वह भी नोटबंदी से बाहर नहीं आ सका।

    शासक दल और उसके साथी संगठन जो भी कहें, आज आमजन दुःखी और परेशान हैं। कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता विश्वविद्यालयों के छात्रों के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं तो जिग्नेश मेवानी, दलितों के गुस्से को स्वर दे रहे हैं। ये प्रजातांत्रिक विरोध ही अब आशा की एकमात्र किरण हैं। यह भी संतोष का विषय है कि विभिन्न राजनैतिक दल, प्रजातंत्र को बचाने के लिए एक होने की कवायद कर रहे हैं। हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक व्यापक गठबंधन आकार लेगा। (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • डॉ निर्भय सिंह गौड़ एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी इच्छा शक्ति से एक खंडहर होते चिकित्सालय का कायाकल्प कर दिया

    डॉ निर्भय सिंह गौड़ एक ऐसा व्यक्तित्व जिसने अपनी इच्छा शक्ति से एक खंडहर होते चिकित्सालय का कायाकल्प कर दिया

    Rishi Raj

    कायाकल्प एक्सटर्नल अससेस्मेंट प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सकरार, ब्लॉक बंगरा जनपद झाँसी।
    यथा नाम तथा गुण


    कायाकल्प जैसा नाम में ही निहित है अगर देखा जाय तो सकरार प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ने कर दिखाया, जिस इकाई ने इंटरनल असेसमेंट में स्वयं ही 25% किया था मात्र 2 माह में पूरी कायाकल्प करते हुए जनपद की श्रेष्ठ इकाइयों को टक्कर देते हुए अपने को समकक्ष खड़ा कर दिखाया जिनके पास अच्छी और नयी बिल्डिंग, वित्त आदि तमाम व्यवस्थाये थी, उनको चुनौती दे दी। बताना न्यायोचित होगा विकासखंड की अन्य स्वास्थ्य इकाइयों पर स्वास्थ्य सेवाओं, विशेषज्ञ, स्टाफ , फंड आदि का प्रायः टोटा ही रहता है परंतु पुरे स्टाफ ने जो मेहनत की वो काबिले तारीफ है जो लोग साथ नहीं आये उनको छोड़ा जो साथ थे उनसे जोर लगाया।

    “डी पी एम साहब क्या हमारी इकाई कायाकल्प प्रतिस्पर्धा से बाहर नहीं हो सकती?? कुछ हो सके तो इसको बाहर करवा दीजिये हमारे लिए सरदर्द हो जायेगा सारे अधिकारी हमारे ऊपर ही चढ़ बैठेंगे” विकास खंड प्रभारी चिकित्साधिकारी आकर बोले। भरोसा दिलाया गया पूर्ण सहयोग का, पीयर असेसमेंट में स्टाफ को बैठाकर काउंसलिंग की गयी क्योंकि स्थितियों में कोई सुधार नहीं दिखाई दे रहा था। थोड़ी डाँट मुख्य चिकित्साधिकारी महोदय द्वारा दिलवाई गयी लेकिन अंदर ही अंदर हिम्मत जवाब दे रही थी।

    अकेले एक ही चेहरा दिखाई दे रहा था वो था सकरार के प्रभारी चिकित्साधिकारी को जो शायद 8 या 9 महीने बाद रिटायर हो जायेंगे, उनके संकल्प से विश्वास टूट नहीं रहा था उनको ललितपुर में काम करते देख चुका था, वो अकेले लगे थे। वो पत्नी से घर से हथौड़ी बैग में छुपा कर ले जाते थे कील ठोकने को। एक बार मालुम हुआ लड़की को लेने गए थे तो फोन करके बता दिया मैं रास्ते में उतर जाऊंगा क्योंकि असेसमेंट होने वाला है।

    मुझे ज्ञात हुआ मेरी ही ड्यूटी लगी है एक्सटर्नल असेसमेंट में तो मन नहीं था जाने का क्योंकि मैं नहीं चाहता था डॉ साहब का दिल टूट जाए, संभावनाएं जो दूर दूर तक नहीं दिखाई दे रही थी और एक्सटर्नल होने के नाते मैं पक्षपाती नहीं होना चाहता था। डीपीएमयू में एक और व्यक्ति था जो कहीं न कहीं अपने प्रयासों में लगा था डा० मनीष खरे जिला क्वालिटी परामर्शदाता झाँसी। वो सभी इकाइयों पर ध्यान दे रहे थे लेकिन डॉ साहब की मेहनत को देखते हुए अवकाश के दिनों में भी पूर्ण सहयोग और मार्गदर्शन दे रहे थे। 

    परिस्थितियां विकट और हो गयीं जब पता चला कि वार्षिक रोगी कल्याण समिति का फंड विगत वर्ष समय से सही जगह बुक ना करने से इस वर्ष प्राप्त ही नहीं हुआ ऐसे में विकास खंड प्रभारी चिकित्साधिकारी डा० विनीत कुमार और ब्लॉक कार्यक्रम प्रबंधक प्रवीण द्विवेदी भी डॉ साहब के साथ हो लिए ब्लॉक अधिकारी डॉ मनीष खरे को स्पष्ट कह देते थे सस्ता नहीं बढ़िया खरीदिए अब पीछे नहीं हटेंगे अब तो इज़्ज़त का सवाल है, प्रवीण दस्तावेज़ीकरण, बैठकें आदि प्रबंधकीय कार्य में ऑफिस के बाद समय देने लगे और डॉ साहब तो खैर थे ही। मुख्य चिकित्साधिकारी डा० विनोद यादव जी को भी मेहनत दिखाई दे रही थी उन्होंने भी महीने में 4 से 5 चक्कर बार बार लगाये, आसान नहीं होता जिले को देखने के साथ साथ एक इकाई पर ध्यान देना। यहाँ तक कि एक दिन पहले भी 2 चक्कर खुद लगाकर आये।

    असेसमेंट वाले दिन जब वहां पहुंचने वाले थे तो मण्डलीय परियोजना प्रबंधक श्री आनंद चौबे जी से कहा चूँकि मेरा ही जनपद है अतः आपको ही असेसमेंट करना है रिकॉर्ड वगेरह का अवलोकन मैं कर लूंगा अन्यथा पक्षपाती होने का संदेह है उन्होंने भी मूक सहमति दी। जब हुआ और जो देखा जो निकल कर आया वह अप्रत्याशित था सही मायने में “सीमित संसाधनों में वास्तविक कायाकल्प”। हो सकता है बहुत कमियां हो लेकिन जो पहले था और जो अब पाया वो उन कमियों से बहुत ऊपर था।

    डॉ साहब जो रिटायरमेंट के करीब है उनसे सीखा कि सीखने और करने की कोई उम्र नहीं होती। आप जब खुद साधना (मेहनत) करते है तो ईश्वर आपको हाथ में लेता है रास्ते भी खुलते हैं लोग भी जुड़ते हैं। आत्म संतुष्टि से बढ़कर कोई परिणाम नहीं होता। आज दशरथ मांझी को हर कोई जानता है परिणाम आने के बाद, ऐसे ही कई दशरथ स्वास्थ्य विभाग में भी है जो अपने ही तरीके से प्रयासों में लगे है जो दशरथ मांझी बन जातेे है जिनको हम जान लेते है कुछ अनछुए ही रह जाते हैं

    Rishi Raj

    District Program Manager,
    National Health Mission
    Uttar Pradesh

  • सत्य, सत्याग्रह, शूद्र, दलित और भारतीय नैतिकता –Sanjay Jothe

    संजय जोठे ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतरराष्ट्रीय विकास में परास्नातक हैं, वर्तमान में TISS मुम्बई से पीएचडी कर रहे हैं। फोर्ड फाउंडेशन इंटरनेशनल फेलो हैं और लीड इंडिया फेलो हैं।  मध्यप्रदेेश के भोपाल में निवास करते हैं।  सामाजिक विकास के मुद्दों सहित पर पिछले 14 वर्षों से विभिन्न संस्थाओं के साथ कार्यरत है। ज्योतिबा फुले पर इनकी एक किताब प्रकाशित हो चुकी है और एक अन्य किताब प्रकाशनाधीन है। विभिन्न पत्र पत्रिकाओं और ब्लॉग्स में भारतीय अध्यात्म और समाज सेवा/कार्य सहित सांस्कृतिक विमर्श के  मुद्दों पर शोध आधारित लेखन में संलग्न हैं।


    सामाजिक राजनीतिक आन्दोलनों में एक लंबे समय से “आत्मपीड़क सत्याग्रह” प्रचलन में बने हुए हैं. ऐसे भूख हड़ताल, उपोषण, आमरण अनशन जैसे तरीकों से समाज के एक बड़े वर्ग को झकझोरने में सफलता भी मिलती आई है. ये तकनीकें और “टूल” सफल भी रहे हैं और उनकी सफलताओं से जन्मी असफलताओं को हमने खूब भोगा भी है. पूना पैक्ट की प्रष्ठभूमि में किया गया आमरण अनशन, या भारत की आजादी की रात फैले दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक दंगे को शांत करने के लिए किया गया अनशन हो या पूर्वी पश्चिमी पाकिस्तान की तरफ बलात भेजे जा रहे अल्पसंख्यकों की चिंता से उभरा अनशन की धमकी हो, गांधी जी ने अनेकों अवसरों पर अनशन और उपोषण को एक नैतिक उपाय या उपकरण की तरह इस्तेमाल किया है और उनके सदपरिणामों और दुष्परिणामों ने मिलकर ही उस समाज की रचना की है जिसमे बैठकर हम इन पंक्तियों को लिख या पढ़ रहे हैं.

    निश्चित ही साधन शुद्धि की बात करने वाले गांधीजी का आग्रह जिसे वे “सत्याग्रह” कहते रहे थे, एक शक्तिशाली रचना थी जिसमे समाज की “प्रचलित नैतिकता” को सम्मोहित करने और झकझोर देने की बड़ी ताकत थी. एक “अधनंगे हिन्दू संत” की छवि गढ़ने में उन्होंने जो सचेतन निवेश किया था जिसकी सफलता ने उन्हें एक ख़ास उंचाई तक पहुँचाया था, उस उंचाई पर साधन की शुद्धता की बहस में साध्य की शुद्धता की बहस को एकदम से विमर्ष से गायब कर देने में सफल हो सके थे. हालाँकि डॉ. अंबेडकर जैसे लोगों ने साध्य की शुद्धता पर साधन, साध्य और शुद्धता जैसे शब्दों की महिमा को अस्वीकार करते हुए बड़े तार्किक प्रहार किये थे लेकिन उन प्रहारों का असर उतना नहीं हुआ जितना होना चाहिए था. ये असर हो भी नहीं सकता था, और ये विवशता आज भी जस की तस बनी हुई है. या कहें कि ये विवशता अब कहीं अधिक बढ़ गयी है, आज धर्मप्रेम, राष्ट्रप्रेम, राष्ट्रभक्ति और राष्ट्रवाद की परिभाषाएं जिस अर्थ में बदली हैं और ‘गांधी के रामराज्य’ पर ‘रामराज्यवादियों का गांधी’ जिस तरह हावी हो चुका है उस हालत में अब साधन या साध्य शुद्धि की बहस में अब गांधी खुद भी आ जाएँ तो वे भी निराश होकर लौट जायेंगे.

    सत्याग्रह का यह सत्य और ये साधन शुद्धि क्या है? आइये इसमें प्रवेश करते हैं. गांधीजी जिस ढंग की नैतिकता और शुचिता को समाज मनोविज्ञान के बदलाव के एक उपकरण की तरह इस्तेमाल करते हैं वह एक ख़ास तरह की प्रष्ठभूमि से आती है. असल में वे शुद्ध साधन से शुद्ध साध्य तक नहीं पहुँच रहे हैं बल्कि शुद्ध साध्य की अपनी विशिष्ट कल्पना से किसी शुद्ध साधन को ‘बेक प्रोजेक्शन’ की तरह निर्मित कर रहे हैं. सरल भाषा में कहें तो वे पहले एक अहिंसक, नैतिक, धर्मप्राण, हिन्दू अर्थ के रामराज्य की कल्पना करते हैं और उसे साकार करने के लिए जो भी करणीय है उसे “शुद्ध साधन” की तरह प्रचारित और प्रयोग करने लगते हैं. ऐसे प्रयासों को वे धर्म, अहिंसा मोक्ष और नैतिकता की इबारत में ऐसे बांधते हैं कि साधन शुद्धि ही एकमात्र बहस बन जाती है. और बहुत सावधानी से साध्य की शुद्धि की कोई बहस उभरने ही नहीं दी जाती. वे साध्य को बिना शर्त शुद्ध और सर्वहितकारी मानकर ही चलते हैं. इसमें सर्व और हित की उनकी अपनी विशिष्ट परिभाषाएं भी शामिल हैं जिनके निर्माण और संशोधनों का अधिकार उन्ही के पास सुरक्षित होता है. विनोबा या कन्हैयालाल मुंशी जैसे पट्टशिष्य तक उस परिभाषा में कोई बदलाव नहीं कर सकते.

    सर्वोदय की कल्पना उन्होंने जिस विचार के साथ जोड़ी वह भी जानने योग्य है. रस्किन बांड से गांधी जी खासे प्रभावित थे, उन्ही की एक पुस्तक का गांधीजी ने गुजराती में 'सर्वोदय' के नाम से अनुवाद किया था. उनके लिए सर्वोदय का अर्थ था सबका उदय, या कहें सबका विकास, अब इस सर्वोदय को वे जिस रूप में पेश करते हैं उस अर्थ में सर्वोदय भारत का पुराना आदर्श है रहा है जिसमे भारत के उपनिषदों और धर्मशास्त्रों के पवित्र वाक्य “सर्वे भवन्तु सुखिनः” 'सर्व खल्विदं ब्रह्म', 'वसुधैव कुटुंबकम', अथवा 'सोऽहम्‌' और 'तत्त्वमसि' आदि शामिल हैं. हालाँकि हम देख चुके हैं कि इस देश में जिस दौर में इन महावाक्यों की महिमा अपने शिखर पर थी उसी दौर में मानवता के खिलाफ सबसे बड़े षड्यंत्र इसी देश में इन्ही महावाक्यों को जपने वाले लोगों ने रचे थे. सर्वं खल्विदं ब्रह्मम हो या सर्वे भवन्तु सुखिनः हो उसमे इस्तेमाल किया गया यह शब्द “सर्व” असल में कुछ ख़ास “टर्म्स एक कंडीशंस” के साथ ‘अप्लाय’ होता था. इस सर्व में शूद्र और अतिशूद्रों सहित स्वयं सवर्ण द्विजों की स्त्रीयां भी शामिल न थीं. ऐसे महावाक्यों के सर्जकों के दौर में समाज में भी इन नैतिक मूल्यों का जनमानस में कोई प्रभाव नहीं हुआ था, छुआछूत, स्त्री दमन, शिक्षा से वंचित करना आदि धर्माग्यायें मजे से चलती रही. ऐसे में आज हम यह कल्पना करें कि वे ही पुराने नैतिक मूल्य हमारे समाज में यूरोपीय अर्थ के लोकतंत्र, समाजवाद और ‘सर्वोदय’ को आज संभव बना सकते हैं तो शायद हम गलत उम्मीद कर रहे हैं.

    अब हमारे लिए यह जानना भी जरूरी है कि ऐसे साध्य और उससे जन्मे ये साधन आते कहाँ से हैं? ये एक ख़ास तरह के धर्मदर्शन और तात्विक मान्यता से आते हैं जो व्यक्ति, व्यक्तित्व, समाज, धर्म, जीवन और जीवन के आत्यंतिक लक्ष्यों सहित इन लक्ष्यों के सन्दर्भ में व्यक्तियों के करणीय को एक विशेष रंग में रंगता है. इन रंगों को उभारने वाले सारे साधन “शुद्ध” हैं और इन रंगों को चनौती देने वाले या इनसे “तार्किक कंट्रास्ट” पैदा करने वाले साधन “अशुद्ध” हैं. उदाहरण के लिए किसी भी समाज की प्रचलित नैतिकता में एक संत या परोपकारी व्यक्ति का भूख से मर जाना पूरे समाज के लिए एक भारी बदनामी और चिंता का विषय बन जाता है. वहीं एक अज्ञात व्यक्ति का भूख से मर जाना किसी को दुखी नहीं करता या एक अपराधी, राष्ट्रद्रोही, या धर्मनिन्द्क सिद्ध कर दिए गये व्यक्ति को भूखों मार देना पूरे समाज को खुश भी कर सकता है.

    सत्याग्रह के सत्य की अगर बात करें तो वह भी बड़ा खतरनाक है. भारतीय वैदिक धारणा या उपनिषदिक धारणा में सत्य एक ऐसा फिक्स्ड पॉइंट है जिसके बारे में सैधांतिक रूप से (कथनी में) यह बात फैलाई गयी है कि इस “एक” सत्य की तरफ अनंत रास्ते जा सकते हैं और जिसकी अनंत व्याख्याएं हो सकती हैं. असल में यह एक परमात्मा की धारणा का ही विस्तार है. लेकिन व्यवहार में (करनी) में देखें तो इस तथाकथित सत्य तक पहुँचने के लिए अनंत मार्ग नहीं हैं मार्ग एक ही है और उस पर चलने वाले चुनिन्दा लोग भी विशेष परमिट लेकर ही चलते आये हैं. उस मार्ग में नास्तिक, अनीश्वरवादी, वेदविरोधी या विधर्मी को चलने का कोई अधिकार नहीं है. हाँ ये अलग बात है कि इन श्रेणियों से आने वाले बुद्ध, महावीर, गोरख और कबीर जैसे लोगों ने वैदिक, औपनिषदिक या हिन्दू परिभाषाओं कि चिंता न करते हुए इतनी महिमा प्रदर्शित की कि बाद के वैदिकों हिन्दुओं ने इन व्यक्तियों को भी अपनी सनातन षड्यंत्रकारी “सर्वसमावेशी” खोल में निगल लिया. इस तरह ऊपर ऊपर दिखता है कि ये सर्वसमावेशी खोल सबको सत्यान्वेषण की एक सी सुविधा या अनुमति देती है लेकिन हकीकत में ये होता नहीं है.

    अब मूल मुद्दे पर आते हुए अगर हम देखें कि इस मुल्क में सत्य, नैतिकता और आग्रह की ये परिभाषाएं हैं तो “सत्याग्रह” का क्या अर्थ और परिणाम हो सकता है? सत्य की परिभाषा और लोकमानस में उसकी स्वीकृति एक ख़ास रंग में रंगी हुई है. एक आस्तिक धर्मभीरु और रुढ़िवादी अर्थ का सत्य ही हमारे लोकमानस में स्वीकृत है. आजकल इस धर्मभीरुता के गर्भ से जन्मा राष्ट्रवाद और देशप्रेम इस एक ख़ास किस्म की नैतिकता को आकार दे रहा है जिसमे न केवल राजनीतिक सामाजिक शुचिता की परिभाषाएं तेजी से बदल रही हैं बल्कि स्वयं नैतिकता कि परिभाषा भी अब बड़े अनैतिक अर्थों में होने लगी है.

    अब मूल रूप से प्रश्न ये है कि आजकल सामाजिक राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मुक्तिकामियों में जिस तरह से सत्याग्रह प्रचलित हो रहा है उसे किस नजर से देखा जाये? उसकी सफलता असफलता सहित उसकी व्यावहारिकता और अव्यावहारिकता को किस ढंग से देखा जाए? क्या ये कार्यकर्ता ये मानकर चल रहे हैं कि समाज इतना नैतिक है कि उनके भूखे रहने पर उसे तकलीफ होगी? क्या वे ये मानकर चल रहे हैं कि उन्होंने गांधी या विनोबा की तरह अधनंगे फकीर की छवि गढ़ने में पर्याप्त ‘निवेश’ कर लिया है? क्या वे ये मानकर चल रहे हैं कि जिस नैतिकता या सामूहिक शुभ को वे सम्मान देते हैं जनता भी उसे उसी तरह सम्मान दे पा रही है? और इन सबसे बड़ा प्रश्न ये कि ये साध्य, साधन, शुचिता आदि का ये सौंदर्यशास्त्र जिस सांस्कृतिक प्रष्ठभूमि में जन्मा है क्या वह संस्कृति और उसका अतीत आजकल के लोकतांत्रिक या समाजवादी आदर्शों के साथ कम्पेटिबल है?

    इन सभी प्रश्नों का एक ही उत्तर है – “नहीं”. न तो हमारे आज के मुक्तिकामियों ने अपनी धार्मिक अर्थ की फकीराना या शहीदाना छवि निर्माण के लिए पर्याप्त निवेश किया है (कई लोग तो करना भी नहीं चाहेंगे) न ही सामान्य जन मानस में एक पवित्र पुरुष या नैतिक पुरुष के रूप में अपनी छवि स्थापित की है और ना ही संस्कृति या नैतिकता की परिभाषाओं से आने वाले पारम्परिक करणीयों का उन्होंने पालन किया है. ऐसे में वे किस अधिकार से जनता को या सरकार को नैतिक बल से झुकाना चाहते हैं? ऐसी कौनसी नैतिकता उन्होंने इस जनता में या सरकार में देख ली है? इसका भी यही उत्तर है कि जनता की नैतिकता भी कंडीशंड की जा चुकी है. ऐसी जनता की नैतिकता से उम्मीद रखकर क्या अपनी जान भूखहडताल में दांव पर लगाना समझदारी है? हरगिज नहीं. न तो सरकारें इस योग्य हैं कि उनके आगे नैतिकता का या सत्य का आग्रह किया जा सके और न ही जनता इस योग्य रह गयी है कि उससे नैतिकता का कोई आग्रह किया जा सके. लेकिन यह जानते हुए भी हमारे मुक्तिकामी किस उम्मीद में भूख हड़ताल पर बैठ जाते हैं? निश्चित ही वे संविधान, विधि और कानून द्वारा बनाये गये नियमों से परिभाषित अधिकारों को हासिल करने की उम्मीद में “व्यवस्था” के सामने उम्मीद लगाए बैठे हैं. अब गौर कीजिये इस बिंदु पर वे समाज की नैतिकता से नहीं बल्कि “व्यवस्था के अनुशासन” से उम्मीद कर रहे हैं. इस क्रम में वे व्यवस्था को “अव्यवस्था फ़ैल जाने का भय” दिखाते हुए समाज की नैतिकता के सक्रिय होकर अचानक सड़कों पर उतर आने की झूठी उम्मीद कर रहे हैं. ठीक से देखा जाए तो बस इस दूसरी उम्मीद में ही सारी भूल हो रही है. पहली उम्मीद तक कोई खराबी नहीं है.

    सरल शब्दों में कहें तो गांधी या विनोबा की तरह पारम्परिक संत या फकीर या ब्रह्मचारी या अणुव्रती की तरह स्थापित हुए बिना आप इस देश की जनता की नैतिकता को न तो ललकार सकते हैं न ही उससे कोई उम्मीद कर सकते हैं. इसीलिये अंबेडकर ने कभी भारतीय समाज की नैतिकता को ललकारने का वैसा प्रयास नहीं किया जैसा गांधी करते रहे थे. अंबेडकर जानते थे कि इस धर्मभीरु समाज की पाखंडी नैतिकता ही असली समस्या है, जिस नैतिकता ने भारत को सडाया है उससे क्या आग्रह करना? या यूँ कहें कि जहर के कुवें से अपने लोगों के लिए ही पीने का पानी मांगना अंबेडकर कैसे स्वीकार करेंगे? इस सच्चाई को आज के सामाजिक क्रान्तिक्रारियों पर लागू करके देखिये. वे एक दोमुही और असमंजस की स्थिति में फंसे हैं. एक तरफ वे लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, संविधान आदि के आदर्शों की छाँव में बुनी गयी लेकिन धर्मभीरुओं/ धार्मिक षडयंत्रकारियों द्वारा चलाई जा रही व्यवस्था से कोई आग्रह कर रहे हैं और दूसरी तरफ इस “सत्याग्रह” के लिए उस जनता के आक्रोश से भी उम्मीद लगाए बैठे हैं जिसके लिए ‘सत्य’ ‘नैतिकता’ ‘शुचिता’ ‘आग्रह’ सहित इन सबके प्रति ‘अधिकार’ की परिभाषाएं क्रान्ति विरोधी और बदलाव विरोधी परिभाषाएं हैं. ऐसे में न तो ये व्यवस्था उनकी सुनेगी और न ये जनता उनकी मौत पर आंदोलित होगी. रोहित वेमुला की मौत पर भारत की आम जनता ने कितने आंसू बहाए ये बताने की जरूरत नहीं है. ये ऐसा ही है जैसे आप एक खूंखार धर्मगुरु के घर के सामने धरना देकर बैठ जाएँ और उसी धर्मगुरु के प्रवचनों पर कीर्तन करने वाली जनता से उम्मीद करें कि वो जनता आपकी भूख हड़ताल या गिरती सेहत से प्रभावित होकर अपने धर्मगुरु के खिलाफ सड़कों पर उतर आये. अगर आप ऐसी उम्मीद कर रहे हैं तो आप आत्महत्या कर रहे हैं. ये व्यर्थ की भावुकता भी है और रणनीतिक अपरिपक्वता भी है.

    ऐसे में क्या किया जा सकता है? क्या उपाय है? www.caasimada.net इसका एक ही उत्तर है कि जिस समाज की अनैतिकता ने इस व्यवस्था को जन्म दिया है या संविधान और कानून को ठीक ढंग से अमल में आने से रोका है उस नैतिकता से उम्मीद छोड़ दीजिये. व्यवस्था से शिकायत है तो ‘शिकायत निवारण की जो विधिसम्मत व्यवस्था’ है उसे अमल में लाइए. जनांदोलन और जनजागरण के लिए सड़कों पर “ज़िंदा” उतरिये, “लाश की तरह” आप एक ही बार शोभायात्रा निकाल सकते हैं. इससे काम आसान नहीं बल्कि मुश्किल होता है. ऐसे भावुक शहीदों का वही जहरीली नैतिकता कैसा दुरूपयोग करती है ये हम भगत सिंह और विवेकानन्द के जीवन से सीख सकते हैं. शहीद या विक्टिम बनने के अपने फायदे हैं लेकिन वे फायदे एक नैतिक समाज में एक सभ्य समाज में ही संभव हैं. भारत जैसे अनैतिक और असभ्य समाज में सिर्फ उन्ही लोगों का सत्याग्रह सफल हो सकता है जिनका सत्य धर्मान्ध व्यवस्था के सत्य की परछाई की तरह जन्मा हो. लेकिन अगर आप पश्चिमी मूल्यों से प्रेरित समाजवादी, लोकतांत्रिक, सेक्युलर और सहज मानवीय नैतिकता से भरी व्यवस्था के लिए संघर्षरत हैं तो आपको धर्मान्धों, गांधीवादियों, सर्वोदयवादियों और राष्ट्रवादियों के ढंग के सत्याग्रह और आत्मपीडन से बचना चाहिए.

  • एक कविता के दो ड्राफ्ट्स, और दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

    कुमार विक्रम


    ड्राफ्ट १

    मैं प्रार्थना करता हूँ
    मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
    और भी अमीर हो जाये

    मैं चाहता हूँ
    मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
    और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए

    मेरी दिली ख्वाईश है
    शहर की सबसे नामी तवायफ
    और भी नामी हो जाए

    मेरी तमन्ना है
    मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
    और भी बड़ा दलाल बन जाए

    मैं उस दिन को देखने के लिए मरा जा रहा हूँ
    जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
    और भी बड़ा शोषक बन जाएगा

    जबसे मुझे यह इल्म हुआ है
    कि जब मेरे शहर के सबसे बड़े
    अमीर, गैंगस्टर, तवायफ, दलाल और शोषक
    हो जाएंगे पहले से भी
    और अधिक नीच, कमीने
    घिनौने, सस्ते और दरिंदे
    तब मेरा शहर और शहर के बाशिंदे
    अन्य सभी शहरों पर
    और उनके शहरियों पर
    चला पाएंगे डंडे।

    ड्राफ्ट २

    मैं प्रार्थना करता हूँ
    मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
    और भी अमीर हो जाये
    ताकि इस शहर की गरीबी जाए

    मैं चाहता हूँ
    मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
    और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए
    ताकि शहर सुसंकृत हो जाए

    मेरी दिली ख्वाइश है
    शहर की सबसे नामी तवायफ
    और भी नामी हो जाए
    ताकि शहर की महिलाएं सभ्य रह पाएं

    मेरी तमन्ना है
    मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
    और भी बड़ा दलाल बन जाए
    ताकि शहर से हेरा-फेरी ख़त्म हो जाए

    मैं उस दिन के लिए मरा जा रहा हूँ
    जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
    और भी बड़ा शोषक बन जाए
    ताकि शोषितों को मुक्ति मिल जाए

    फिलहाल मैं कब्र में आराम फरमा रहा हूँ
    और जीने की फरमाइशें कर रहा हूँ.

    दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

    मेरे शहर का अमीर और भी अमीर हुआ जा रहा है
    और मैं उससे आती अमीरियत की खुशबु सूंघने को बेताब हुआ जा रहा हूँ

    मेरे शहर का गैंगस्टर खून की रंगीन होली खेल रहा है
    और मैं उसमे रंगने को मरा जा रहा हूँ

    मेरे शहर की तवायफ के साक्षात्कार मुख्यपृष्ठों पर आ रहे हैं
    और मैं उसके संग फोटो खिंचवाने को भीड़ में लथ-पथ हुआ जा रहा हूँ

    मेरे शहर का दलाल शहर बेचने की कवायद कर रहा है
    और मैं उसके साथ बिकने को बेचैन हो रहा हूँ

    मेरे शहर का शोषक खून चूसने के नए तरकीबें ईज़ाद कर रहा है
    और मैं दौर दौर कर अपने खून की बोतलें उस तक पहुंचा रहा हूँ

    मैं फिलहाल जीने की फरमाइशें पूरी कर रहा हूँ
    और समयाभाव में साथ साथ अपनी कब्र भी खोद रहा हूँ


    credits : http://epaper.jansatta.com/c/3447521 

  • खिड़की से झांकते ये वृक्ष, क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं? –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    खिड़की से झांकते ये वृक्ष
    क्या कहीं बिछुड़ गए मीत हैं?

    उनकी ऊँचाइयों पे इठलाती
    अनगिनत कोपलों पर रचा आश्वासन
    एक दमकती हुई हरियाली लिए
    इन बेनूर सी आँखों में
    अकारण ही चमकने लगता है

    उनकी टहनियों पर झूमती
    पगली सी गिलहरियों का नृत्य
    उनकी अठखेलियों का ज्वार लिए
    इन जड़ हो चुके पैरों में
    अकारण ही मचलने लगता है

    उन पर पात-पात फुदकती
    बैचेन सी गौरैया का गीत
    अपने अंतर की वीणा लिए
    इन बद्ध हो चुके कानों में
    अकारण ही गूंजने लगता है

    क्या हर टहनी, हर पात और गौरैया में
    मेरे ही प्राणों के स्पंदन नहीं छिपे हैं?
    क्या मुझमे उनकी जिजीविषा
    और उनमे मेरे स्वप्न नहीं छिपे हैं?

    मेरी इन धमनियों में तड़पता उनका जीवन
    और उनकी ऊंचाइयों में आकाश छूते मेरे स्वप्न
    क्या सहोदर सहयात्री नहीं हैं?

    एक से उद्गम से चले
    एक से गन्तव्य की तरफ
    एक ही पाथेय लिए

    फिर हर बार हर मोड़ पर मैं
    उनमे खुद को और खुद में उनको खोजता हूँ
    उन्ही के गीतों और नृत्यों से ताल मिलाते हुए
    हर गीत में अपनी ही आवाज खोजते हुए
    हर नृत्य में अपनी ही छवि गढ़ते हुए

    और अंत मेंअपने ही नवांकुरों का स्वप्न लिए
    उनकी जड़ों में लिपटी मिट्टी तक लौटता हूँ

    उनमे विश्राम पाकर
    सारे गीत, नृत्य और स्वप्न
    उन्हें सौंप जाता हूँ …

     

  • आधे कार्यकाल की समाप्ति पर कहां खड़ी है मोदी सरकार?

    प्रो० राम पुनियानी


    Narendra Modi

    नवंबर 2016 में मोदी सरकार का आधा कार्यकाल पूरा हो गया। इस सरकार का आंकलन हम किस प्रकार करें? कुछ टिप्पणीकार यह मानते हैं कि मोदी एक ऐसे नेता हैं जिन्हें देश आशाभरी निगाहों से देख रहा है और जो साहसिक कदम उठाने की क्षमता और इच्छा रखते हैं। उन्हें देश को बदल डालने का जनादेश मिला है और वे उसे पूरा करेंगे। जहां कुछ लोगों की यह सोच है, वहीं देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा, मोदी और उनकी सरकार को इस रूप में नहीं देखता। यह सरकार अच्छे दिन लाने और देश के सभी नागरिकों के बैंक खातों में 15-15 लाख रूपए जमा करने के वायदे पर सत्ता में आई थी। न तो अच्छे दिन आए और ना ही 15 लाख रूपए। उलटे, मंहगाई बेलगाम हो गई और ऊपर से सरकार ने नोटबंदी के जिन्न को बोतल से निकाल आमजनों को भारी मुसीबत में फंसा दिया। ऐसा बताया जाता है कि देश भर में कम से कम 100 लोग बैंकों के बाहर लाइनों में खड़े रहने के दौरान इस दुनिया से विदा हो गए। रोज़ खाने-कमाने वालों का भारी नुकसान हुआ। लाखों प्रवासी श्रमिक अपना रोज़गार खो जाने के कारण अपने-अपने घरों को वापस लौटने पर मजबूर हो गए।

    इस सरकार की एक विशेषता है हर प्रकार की शक्तियों का एक व्यक्ति के हाथों में केन्द्रीयकरण। और वह व्यक्ति कौन है, इसका अंदाज़ा लगाना बहुत मुश्किल नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी के आसपास एक आभामंडल का निर्माण कर दिया गया है। कैबीनेट मात्र एक समिति बनकर रह गई है जो श्री मोदी के निर्णयों पर ठप्पा लगाती है। इसका एक उदाहरण है विमुद्रीकरण के निर्णय को कैबिनेट की स्वीकृति। देश की विदेश नीति में भारी बदलाव किए जाने का ज़ोरशोर से ढिंढोरा पीटा गया। पाकिस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाया गया और श्री मोदी, दर्जनों विदेश यात्राओं पर गए। आज ढाई साल बाद भारत के पाकिस्तान और नेपाल से रिश्ते पहले की तुलना में खराब हैं और दुनिया में भारत के सम्मान में कोई बढ़ोत्तरी नहीं हुई है।

    शक्तियों के केन्द्रीयकरण के साथ शुरू हुआ भाजपा और उसके साथी संघ परिवार के नेताओं के नफरत फैलाने वाले भाषणों का दौर। उन्होंने धार्मिक अल्पसंख्यकों को खौफज़दा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। एक कैबीनेट मंत्री ने उन लोगों को हरामज़ादा बताया जो सरकार के साथ नहीं हैं। सरकार, विश्वविद्यालयों के कामकाज में हस्तक्षेप करने लगी। अयोग्य व्यक्तियों को राष्ट्रीय महत्व के संस्थानों का मुखिया नियुक्त किया जाने लगा। इसका एक उदाहरण था गजेन्द्र चैहान की भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान के अध्यक्ष पद पर नियुक्ति। विभिन्न विश्वविद्यालयों के कुलपति पदों पर ऐसे व्यक्तियों की नियुक्ति की गई जिनकी एकमात्र योग्यता संघ की विचारधारा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता थी। विश्वविद्यालयों में अभाविप की सक्रियता अचानक बढ़ गई और उसने सभी विश्वविद्यालयों, विशेषकर जेएनयू और हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय, में प्रजातांत्रिक ढंग से चुने गए छात्रसंघों और अन्य संगठनों को दबाने का प्रयास शुरू कर दिया। जेएनयू में एक नकली सीडी के आधार पर कन्हैया कुमार और उनके साथियों पर देशद्रोह का मुकदमा लाद दिया गया और रोहित वेम्युला को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया गया।

    संघ और उसके साथी संगठनों ने लव जिहाद और घर वापसी के नाम पर धार्मिक अल्पसंख्यकों के विरूद्ध अभियान छेड़ दिया। समाज को और विभाजित करने के लिए उन्होंने गोमांस और गाय को मुद्दा बनाया, जिसके नतीजे में उत्तरप्रदेश के दादरी में मोहम्मद अखलाक की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और गुजरात के ऊना में दलितों के साथ अमानवीय मारपीट की गई। अंधश्रद्धा के पैरोकार, केन्द्र में अपनी सरकार होने के कारण आश्वस्त थे कि उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा। दाभोलकर की हत्या के बाद गोविंद पंसारे और एमएम कलबुर्गी की दिन-दहाड़े हत्या कर दी गई। इन सब घटनाओं और देश में बढ़ती असहिष्णुता के विरोध में कई प्रतिष्ठित कलाकारों, वैज्ञानिकों और अन्यों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए। शीर्ष स्तर पर एकाधिकारवादी व्यवहार और सामाजिक स्तर पर संघ परिवार के साथियों की कारगुज़ारियों के कारण स्थिति यहां तक बिगड़ गई कि एक समय भाजपा के साथी रहे अरूण शौरी ने वर्तमान स्थिति को ‘विकेन्द्रीकृत आपातकाल’ और ‘माफिया राज्य’ बताया।

    सरकार ने किसानों से उनकी ज़मीनें छीनने का प्रयास भी किया परंतु लोगो के कड़े विरोध के कारण यह सफल न हो सका। श्रम कानूनों में सुधार के नाम पर श्रमिकों को उनके अधिकारों से वंचित कर दिया गया और कुटीर व लघु उद्योगों के संरक्षण के लिए बनाए गए प्रावधान हटा दिए गए। बड़े उद्योगपतियों की संपत्ति और उनकी ताकत में आशातीत वृद्धि हुई। बैंकों ने उद्योगपतियों के हज़ारों करोड़ रूपए के ऋण माफ कर दिए और विजय माल्या जैसे कुछ उद्योगपति, जिन पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हज़ारों करोड़ रूपयों का ऋण था, विदेश भाग गए। कई लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा की गई परंतु ऐसा नहीं लगता कि इनसे आम लोगों, गरीब किसानों या श्रमिकों का सशक्तिकरण हुआ हो। विरोध और असहमति को कुचलने की अपनी नीति के अनुरूप, उन एनजीओ को सरकार ने परेशान करना शुरू कर दिया जो अल्पसंख्यक अधिकारों और पर्यावरण की रक्षा के लिए काम कर रहे थे। उनके विदेशों से धन प्राप्त करने के अधिकार पर रोक लगा दी गई।

    अभिव्यक्ति की आज़ादी हमारे प्रजातंत्र का एक प्रमुख हिस्सा रही है। परंतु आज हालात यह बन गए हैं कि जो भी सरकार के विरूद्ध कुछ कहता है, उसे देशद्रोही बता दिया जाता है। भारत माता की जय के नारों और सिनेमाघरों में जनगणमन बजाकर छद्म देशभक्ति को बढ़ाया दिया जा रहा है।

    मोदी की हिन्दुत्ववादी राजनीति के चलते, देश भर में अल्पसंख्यकों और दलितों के खिलाफ छुटपुट हिंसा में वृद्धि हुई है। भ्रष्टाचार मिटाने के लंबेचौड़े वायदे तो किए गए परंतु नोटबंदी ने भ्रष्टाचार के नए तरीकों का विकास करने में मदद की। देश का ज्यादातर काला धन या तो विदेशी बैंकों में जमा है या अचल संपत्ति व कीमती धातुओं के गहनों के रूप में है। जो थोड़ा-बहुत नगदी काला धन था, भी वह भी नोटबंदी से बाहर नहीं आ सका।

    शासक दल और उसके साथी संगठन जो भी कहें, आज आमजन दुःखी और परेशान हैं। कन्हैया कुमार जैसे युवा नेता विश्वविद्यालयों के छात्रों के विरोध का नेतृत्व कर रहे हैं तो जिग्नेश मेवानी, दलितों के गुस्से को स्वर दे रहे हैं। ये प्रजातांत्रिक विरोध ही अब आशा की एकमात्र किरण हैं। यह भी संतोष का विषय है कि विभिन्न राजनैतिक दल, प्रजातंत्र को बचाने के लिए एक होने की कवायद कर रहे हैं। हम ऐसी उम्मीद कर सकते हैं कि भविष्य में धर्मनिरपेक्ष ताकतों का एक व्यापक गठबंधन आकार लेगा।


    (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • भारतीय समाज में इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है –Sanjay Jothe

    संजय जोठे


    यूरोपीय और अमरीकी विश्वविद्यालयों (सभी नहीं) में और विशेष रूप से वहां के समाज में एक ख़ास प्रवृत्ति है। वहां छात्र छात्राएं गणित के साथ मनोविज्ञान या साहित्य भी पढ़ सकते हैं। आर्ट्स, साइंस, मेडिसिन, ह्यूमेनिटीज, मैनेजमेंट आदि के बीच कोई जाति व्यवस्था नहीं है। उनमें मेलजोल और "अंतर्जातीय विवाह" जैसे "अवैध" संबन्ध तेजी से बनते हैं। भारत के लिए ये 'अवैध' संबन्ध हैं जिनसे " नीच वर्ण संकर" जन्मते हैं। विभिन्न विषयों के मेलजोल को यूरोप में "इंटेरडीसीप्लिनरिटी" कहते हैं और इन से जन्मे वर्णसंकर को "इनोवेशन" कहते हैं। लेकिन भारत में ये सब पाप है। इसीलिये भारत सड़ रहा है।

    यूरोपीय समाज में जीवन यापन के लिए जितना जरूरी है उतना सीखने के बाद भी उनकी सीखने की क्षमता पर विराम नहीं आता। वे बचपन से बुढ़ापे तक सीखते ही जाते है। 'स्वामी' विवेकानन्द जब यूरोप प्रवास पर थे तब उन्होंने एक बूढ़े जर्मन को चाइनीज भाषा सीखने की कोशिश करते पाया था, विवेकानन्द ने एक आम भारतीय की तरह पूछा कि इस कठिन भाषा को आप कितने वर्षों में सीखकर क्या लाभ ले सकेंगे? उस बूढ़े व्यक्ति ने विवेकानन्द को देखकर कहा था कि अगर तुम एक युवा होकर भी ऐसे सवाल पूछते हो तो मैं दावे से कह सकता हूँ कि तुम्हारा मुल्क और समाज अन्धकार में सड़ रहा होगा।

    उस व्यक्ति की बात कितनी सही है न? विवेकानन्द जैसे 'शरीर से युवा' भारतीय व्यक्ति भी मन से कितने बूढ़े हो सकते हैं, वे सच में भारत के सच्चे प्रतिनिधि थे। भारत की सारी समस्याएं उनके व्यक्तिगत रुझानों और मनोविज्ञान सहित उनके प्रश्न-उत्तरों में साफ़ झलकती हैं।

    खैर, तो यूरोपीय समाज में आजीविका से परे भी ज्ञान की खोज चलती है। लेकिन "धर्म अर्थ काम मोक्ष" की दिव्य युति का दावा करने वाला भारतीय समाज शिक्षा, पठन-पाठन और स्वस्थ बहसों पर हजारों साल से ताला लगाकर बैठा है। 'अर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन' सिर्फ समाज के एयरटाइट कम्पार्टमेंट्स में अलग अलग लेयर्स ने ही होते हैं और इन कम्पार्टमेंट्स और लेयर्स में आपस में कोई संवाद नहीं होता। इसीलिये एक गांव या राज्य के गुलाम बना लिए जाने पर भी "कलेक्टिव आर्ग्युमेंट" से किसी "एक" राजनितिक धार्मिक या सामरिक एकता का जन्म न हो सका और भारत दो हजार साल तक गुलाम रहा।

    भारतीय समाज के स्तरों में संवादहीनता आज भी इतनी भयानक है कि एक ही गाँव में एक हैंडपंप या तालाब के सूखने पर सभी ग्रामीणों को एक सा दुःख नहीं होता, कई लोग खुश भी हो सकते हैं। एक ही तालाब पर सबका एक सा अधिकार नहीं है तो एक सी चिंताएं भी क्योंकर होंगी भला? क्या ये सभ्य समाज के लक्षण हैं? क्या भारत सभ्य है?

    एक औसत भारतीय ज्ञान से और स्वाध्याय से या अपने सुरक्षित गढ़ से परे जाकर संवाद बनाने से इतना चिढ़ता क्यों है? आजीविका सुरक्षित कर लेने के बाद पड़ता लिखता क्यों नहीं? साइंस का छात्र दर्शन, साहित्य या इतिहास पढता क्यों नहीं?

    इसका गहरे से गहरा कारण है कि लंबे समय तक भारतीय मन परम्परागत आजीविका या पेशे से इतना अधिक बंधा हुआ है कि उस सुरक्षा से परे उसे कभी कुछ देखना ही जरूरी नहीं रहा है। वह परे का कुछ देख न सके इसके लिए धर्म और परम्परा ने भारी इंतेजाम किये हैं। आज पश्चिम के प्रभाव से स्थिति थोड़ी बदली है लेकिन भारत के धर्म और उससे जन्मे मनोविज्ञान का सातत्य बहुत अर्थो में अभी भी बना हुआ है। अतीत में एक कुम्हार, लोहार या किसान से यही अपेक्षा की गयी है कि वह अपने हुनर में पारंगत हो और भेषज, साहित्य, दर्शन, राजनीती, धर्म के आयामों में प्रवेश न करे। यही उम्मीद उनसे की गयी है जो धर्म दर्शन राजनीति आदि का "रोजगार" करते आये हैं।

    इस तरह इंसानों की ही नहीं बल्कि ज्ञान के विषयों की भी जाति व्यवस्था है और इनके बीच में अंतर्जातीय विवाह (इंटेरडीसीप्लिनरिटी) असंभव बना दी गयी है। इसी वजह से भारतीय धर्मशास्त्री भौतिक या प्राकृतिक विज्ञान से इतने बेखबर होते हैं कि वे पूजा पाठ से ग्रह नक्षत्रों की दिशा बदलने के दावों की बेवकूफी को देख ही नहीं पाते। यही बिमारी फिर पूरे समाज में फ़ैल जाती है। अब ये समाज सड़कर गुलाम हो जाये तो आश्चर्य कैसा?

    यूरोप या अमेरिका में ज्ञान के बढ़ने का राज़ क्या है?और भारत में ज्ञान, सभ्यता और संस्कृति के रसातल में पहुंचते जाने का राज़ क्या है? एक ही सूत्र है इसे समझने का, यूरोप में व्यक्तियों और ज्ञान के विषयों में संश्लेषण होता रहता है वहां विषयों और व्यक्तियों में अंतर्जातीय विवाह होते रहे हैं जो भारत में असंभव है। यूरोप में भूगोल पढ़ने वाला व्यक्ति दर्शन भी पढ़ सकता है। गणित या साहित्य के साथ मनोविज्ञान या संगीत भी पढ़ सकता है। लेकिन भारत में ये "शादी नहीं हो सकती" यहां साइंस ब्राह्मण है और आर्ट्स शुद्र है।

    अभी अमेरिका के MIT ने विज्ञान के छात्रों के प्रवेश के लिए यह अनिवार्य कर दिया है कि उनके पास मानविकी विषय के किसी प्रोफेसर का अनुशंसा पत्र होना आवश्यक है। मतलब कि क्वांटम मेकेनिक्स या इंजीनियरिंग के शोधार्थी को इतिहास, मनोविज्ञान, समाजशास्त्र, साहित्य आदि में से किसी एक विषय के विद्वान की तरफ से रिकमेंड किया जाना जरूरी है।

    कल्पना कीजिये कि भौतिकशास्त्र का जानकार यदि मनोविज्ञान भी समझता है तो उसकी खोज इंसानी समाज के लिए कितनी व्यवहारिक न होगी? वो जो मशीन या तकनीक बनायेगा उसमे इंसानी जरूरतों के उत्तर भी मिल सकेंगे। लेकिन भारतीय ज्ञान परम्परा की सुनें तो इस भौतिशास्त्री को इतिहास, समाजशास्त्र और मनोविज्ञान को छूना भी पाप है। वो इधर झांकेगा भी नहीं। इसीलिये भारत इनोवेशन नहीं करता सिर्फ यूरोपीय विज्ञानं का सबसे सस्ता भारतीय वर्जन बनाता है। ये खुद रॉकेट नहीं बना सकते लेकिन एक बार यूरोप में रॉकेट बन जाये तो ये सबसे सस्ता मंगल यान बनाकर खड़े हो जाएंगे और वेदों में से पुष्पक विमान लाकर बहस करने लगेंगे। लेकिन इससे इनकी मौलिक बिमारी का कोई इलाज नहीं होता, बल्कि वो बीमारी बढ़ती ही जाती है।

    इसीलिये अब "विश्वगुरु" को ईमानदारी से विश्व का शिष्य बनकर कुछ सीखना चाहिए। अब भारतीय बच्चों को समाज की ही नहीं बल्कि सिलेबस की और विषयों की जाति व्यवस्था को भी तोड़ना होगा।

    समाज में ही नहीं बल्कि ज्ञान विज्ञानं के विषयो में भी वर्णसंकर पैदा करने होंगे। विज्ञानं ने सिध्द कर दिया है कि वर्णसंकर अधिक प्रतिभाशाली और प्रबल होते हैं। लेकिन सनातनी भारतीय धर्म बुद्धि प्रतिभा की हत्यारी रही है। इस हत्यारी व्यवस्था को विराम लगाना होगा ताकि भारतीय विद्यार्थी भी सभ्य सुसंस्कृत होकर ज्ञान विज्ञान और खेल कूद की दुनिया में अपने को साबित कर सकें, ताकि सवा अरब का ये मुल्क दो चार नोबेल, ऑस्कर और ओलंपिक जीत सके और बार बार काल्पनिक सतयुग के बिल में घुसने की बजाय कलियुग में सम्मान से जीना सीख सके।