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  • अव्यवस्थित सुनहरी भावनाओं को समेटती- मेरी प्रेम कविताएं

    अव्यवस्थित सुनहरी भावनाओं को समेटती- मेरी प्रेम कविताएं

    Mukesh Kumar Sinha[divider style=’right’]

    अव्यवस्थित
    सुनहरी भावनाओं को
    बेवजह समेटने की कोशिश भर हैं
    मेरी प्रेम कविताएं

    जिसकी शुरूआती पंक्तियां
    गुलाबी दबी मुस्कुराहटों के साथ
    चाहती हैं
    हो जाएं तुम्हें समर्पित

    पर स्वछंद हंसते डिंपल से जड़ी मुस्कान और
    तुम्हारे परफेक्ट आई क्यू के कॉकटेल में
    कहीं खोती हुई ये कविता
    प्रेम की चाहत को जज़्ब करती है
    जैसे जींस के पीछे के पॉकेट में बटुए को दबाये
    तुमसे कहना चाहती है
    ‘आज तो कॉफी का बिल तुम ही भरना’
    प्रेम भी तो अर्थव्यवस्था का मारा हुआ है आखिर
    पर कैफे कॉफी डे के कॉफी पर
    बना दिल
    पीता हूँ ऐसे, जैसे
    प्रेम को आत्मसात करा हूँ
    बूंद दर बूंद।

    सारी वैचारिक्ताएं शहीद हो जाती है
    जब तुम कॉफी हाउस में
    टेबल पर उचककर
    चाहती हो मेरे आँखों में झांकना
    लेकिन मेरी फिसलती नज़र
    मौन होकर भी पूछती है
    तुम्हारे टीशर्ट का साइज़ एक्सएल है न?
    बिना इतराये, ख़ार खाये
    कहती हो तुम, शोख मुस्कराहट के साथ
    ‘ओये! ऊपर देख।’

    मैं भी, तब
    इस ‘ओये’ पर चाहता हूँ
    हो जाऊं कुर्बान
    पर पढ़ा है, अब मजनूं मरते नहीं
    बेहोश भी कहाँ होते हैं
    बस एक तीक्ष्ण मुस्कुराहट भर
    रह गया है ये प्यार
    है न

    Mukesh Kumar Sinha

    वैसे
    मेरा तुम्हारे लिए आकर्षण
    तुम्हारा मेरे प्रति झुकाव
    हम दोनों के बीच
    पनपता रहस्यमयी अहसास
    जैसे जेम्स हेडली चेज़ का जासूसी उपान्यास
    अंतिम पन्ने से पता चलेगा
    प्रेम ही तो है,
    अनबिलिवेबल प्रेम!

    नहीं मेरे अहमक!
    वी आर ओनली फ्रेंड्स
    – तुम्हारे मादक होंठ काँपे थे

    कोई न,
    दोस्त तो हैं न!
    टचवुड!

  • तमाशा –अपूर्वा प्रताप सिंह

    तमाशा –अपूर्वा प्रताप सिंह

    Apoorva Pratap Singh

    खूँटे में एक औरत एड़ियों से बंधी पड़ी है। उसके पति ने पैर से उसका गला दबा रखा है और डंडे से पीट रहा है। वो दोनों हाथों से अपना गला छुड़ाने की असफल कोशिश कर रही है। जब-जब उसके शरीर पर डंडा पड़ता है , उसका शरीर ऐंठ जाता है। गला दबा है तो चीख नहीं पा रही। यही उसका प्रतिरोध है और यही उसकी प्रतिक्रिया।

    वहाँ वो अकेली नहीं है। खूँटे के किनारे लोग खाट लगाकर बैठे हैं। तमाशा चल रहा है। हर उम्र के लोग हैं। देख कर लगता है जैसे कोई एडल्ट्री का मामला है। छोटे-छोटे बच्चे पूरे उत्साह में हैं औरहाथ मे डंडियाँ लिए हुए हैं। औरत का पति पूरी ताकत से वार कर रहा है। जैसे ये उसकी मर्दानगी का इम्तिहान हो। ज़ाहिर करना चाहता है कि वो मजबूत और स्वस्थ है…. तेज ‘वार’ करता है वो।

    Apoorva Pratap Singh

    आस-पड़ोस की औरतें मार खा रही औरत को उलाहना दे रही हैं । बाकी लोग उसके पति को उत्साहित कर रहे हैं। अब उस आदमी ने कमर से बेल्ट निकाल ली है। औरत के मुँह पर लगातार बेल्ट मार रहा है। मारते-मारते थक चुका है पर स्वीकार नहीं करना चाहता कि वो ‘थकता’ भी है।

    इसके आगे नहीं देखा। मन नहीं हुआ। पर इतना जरूर समझ आया कि उस तमाशे में सभी अपनी-अपनी भूमिकाओं से बंधे थे। जितना कठिन उस औरत के लिए पिटाई से बच पाना था , उतना ही कठिन उसके पति के लिए उसको पीटने से बच पाना था। पिटती औरत को उलाहना देने वाली औरतें भी उसको उलाहना देने से नहीं बच सकती थीं।

    इस तमाशे की स्क्रिप्ट तैयार होने में हज़ारों साल लगे हैं।

  • लेबेन्स्रॉम – “रहने और विकास के लिए जगह”

    लेबेन्स्रॉम – “रहने और विकास के लिए जगह”


    Skand Shukla

    बन्दर : “तुझे अब डरने की ज़रूरत नहीं उससे। उन्होंने उसे मार डाला !”
    बन्दरिया : “किसने ? किसे ?”
    बन्दर : “वह तेंदुआ जो इस पेड़ पर अक्सर आता था। इंसानों ने।”
    बन्दरिया : “पर क्यों ?” 
    बन्दर : “वह मानवों के शहर लखनऊ में घुस गया था।”
    बन्दर :”मूरख कहीं का ! उसे वहाँ जाने की क्या ज़रूरत थी !”
    बन्दर : “समस्या तो यही है। हममें से कोई कहीं नहीं जाता। केवल इंसान जाता है।”
    बन्दरिया :”मतलब ?”
    बन्दर : “हिटलर का नाम सुना है तूने ?”
    बन्दरिया : “नहीं। कोई जानवर है ?”
    बन्दर : “जानवर कहकर जानवरों को गाली न दे तू। वह एक इंसान था। इन्हीं की बिरादरी का।”
    बन्दरिया : “उसने क्या किया।”
    बन्दर : “उसने लोग मारे। साथी इंसान।”
    बन्दरिया : “पर क्यों ? इंसान तो इंसान नहीं खाते !”
    बन्दर : “इंसान भूख के लिए ज़्यादातर काम नहीं करता। उसे ताक़त चाहिए होती है।”
    बन्दरिया : “कैसी ताक़त है यह जो मारने से मिलती है !”
    बन्दर : “गुरूर की ताक़त।”
    बन्दरिया : “तो क्या आदमियों को मारकर हिटलर बहुत बड़ा और मोटा हो गया ताक़त के साथ ?”
    बन्दर : “नहीं। उतना ही रहा। उसे लेकिन लगा … “
    बन्दरिया ( खिन्नता की हँसी हँसते हुए ) : “उसे लगा … उसे लगा ! इंसान को लगता बहुत है !”
    बन्दर : “और होता कुछ नहीं।”
    बन्दरिया : ” तू मुझे उस इंसान हिटलर की कहानी बता। आगे ?”
    बन्दर : “उसे लेबेन्स्रॉम चाहिए था। लेबेन्स्रॉम जानती है ?”
    बन्दरिया ‘न’ कहते हुए गरदन हिलाती है। 
    बन्दर : “रहने और विकास के लिए जगह।”
    बन्दरिया : “इंसानों के पास अब भी जगह की कमी है ? पूरी धरती कब्ज़ा लेने के बाद भी ?”
    बन्दर : “उन्हें लगता है। उनमें से कुछ को लगता है। उनमें से कुछ को लगता रहेगा।”
    बन्दरिया : “तो उस आदमी हिटलर से हमारे इस तेंदुए का क्या ताल्लुक़ ?”
    बन्दर : “क्योंकि हर आदमी में एक हिटलर होता है। जो कभी भी जाग सकता है अपने लेबेन्स्रॉम की माँग लिए।”
    बन्दरिया : “जब साथ के इंसान उसने नहीं छोड़े , तो हम जैसे जानवरों की क्या बिसात।”
    बन्दर : “जीवन में किसी की बिसात छोटी नहीं होती। समय-समय का फेर है।”
    बन्दरिया :”कहना क्या चाहता है तू ?”
    बन्दर : “देखती जा। इंसानों का यह कुनबा अचानक जाएगा इस दुनिया से।”
    बन्दरिया : “अरे, पर उसके पहले संसार में न कोई तेंदुआ बचेगा और न कोई बन्दर। अपने लेबेन्स … लेबेन्स्रॉम के लिए ये हिटलर सबका हक़ छीन लेंगे।सबको मार देंगे।”
    बन्दर : “उनको उनके हिस्से की ज़मीन हमेशा कम पड़ेगी।”
    बन्दरिया बन्दर को दोनों हाथों से स्पर्श करती है। 
    बन्दर : “वे किसी के लिए धरती नहीं छोड़ेंगे।”
    बन्दरिया उसे धीरे से हिलाने लगती है। 
    बन्दर : “तेंदुआ कहीं नहीं गया था। इंसान उसके इलाक़े में आये थे।”
    बन्दरिया उसे ज़ोर से झकझोरती है। 
    बन्दर : ” वह इंसान बनने की कोशिश के साथ लेबेन्स्रॉम तलाशने निकला था ! भूल गया कि इंसानों-सा कमीना कोई हो नहीं सकता ! उतनी नीचता दुनिया के किसी जानवर के पास नहीं !”
    बन्दरिया ज़ोर से उसे बदहवासों-सी नोचने-खगोटने लगती है। 
    बन्दर : “हम सब मारे जाएँगे ! मारे जाएँगे ! लेकिन आख़िर में कोई हिटलर भी नहीं रहेगा ! कोई नहीं ! कोई नहीं !” 
    ( कहते हुए बन्दर पेड़ से नीचे गिर जाता है। उसका पेड़ छूट गया है। तेंदुए-सी ग़लती की शुरुआत उसने भी अन्ततः कर दी है। )

    Skand Shukla

  • लोहार

    लोहार

    Vijendra Diwach[divider style=’right’]

    आज का जमाना मुझे कम ही जानता है कम ही पहचानता है,
    आज मेरे पास लोहे का सामान कम ही खरीदा जाता है,
    क्योंकि जमाना आधुनिक है और
    अब कांच तथा स्टील ही मन को भाता है।

    नहीं  मेरे कोई ठौर-ठिकाने,
    गाता हूँ महाराणा प्रताप के गाने,
    एक पल यहाँ ठहरना, फिर कहींओर जाना,
    ना मैने कभी खुद को जाना,
    पूर्वजों ने लोहा कूटा मैने भी लोहा कूटना जाना।

    बनाता हूँ लोहे का चिमटा और फूंकनी,
    आज भी चलाता हूँ,कूट कूट कर लोहे को ढूंकनी।

    मौसम आते हैं, मौसम जाते है,
    सर्दी मेँ झींगुरोँ से बचने की खुशी मनाते हैँ,
    लेकिन रजाई से तारे नजर आते हैँ।
    गर्मी मेँ खुशी मनाते हैँ कि खुले मेँ सब अकेले अकेले सोयेंगे ,
    अंधङ-आँधियाँ हमारे तिरपाल उङाते हैँ।
    फिर वही मेंढको की टर्र-टर्र,
    रात मेँ झींगरों वाले मौसम आते हैँ।

    बनाकर बङी सी रोटी
    और लाल-हरी मिर्ची खाकर सोने का नाटक कर जाते हैँ,
    धीरे-धीरे सो जाते हैँ।
    सबकुछ विज्ञान के अनुसार अनुकुल हो जाता है,
    हमारा शरीर एडीज जैसे मच्छरो को भी झेल जाता है।

    डार्विन का संघर्षता का सिध्दान्त हम पर लागू हो जाता है,
    कोई भूला-भटका ग्राहक हमारे पास आता है,
    कुछ लेता है तो पूरा कुटुम्ब प्रसन्न होता है,
    नहीँ तो वही पहले जैसा हाल होता है।

    त्यौहारोँ पर लोग घरो मे रंग-पोतन का काम करते हैँ,
    हम हमारा ठिकाना ही चेंज करते है।
    दीवाली आती है
    हमारी गाङी कही ओर जाती है।

    आज हमारे बच्चे सूंघनी से नशा करते हैँ,
    बेमौत हमसे दूर सो जाते हैँ,
    दुःख होता है रोते हैँ,
    फिर वही लोहा पीटते हैँ।

    हैँ, हमारे काम के कलाकार है,
    बस कद्रदान कोई नही,
    ऐसी अनोखी जिन्दगी जीते हैँ,
    किसी से कोई शिकवे-शिकायते नही करते है,
    गम पीते हैँ,अपनी तकदीर को खेल मानकर जीते है।

    Vijendra Diwach

    पता है शिक्षा के अभाव मेँ सारे ये झमेले है,
    इस भीङ मेँ हम अकेले है,
    कोई तो हमेँ समझाये,
    शिक्षा का महत्व बताये,
    फिर देखना हम समाज की मुख्यधारा से कैसे जुङते है,
    लोहे की तरह कडिया जोङकर समाज की अटूट बैल बनाते है।

    हम पर ध्यान दो,
    हमें प्यार दो,
    इंसान हो,इंसान को पहचान दो।
    छोङो जी अपने अपने काम पर ध्यान दो,
    कश्मीर जल रहा है, इंसानियत पर ध्यान दो।।

  • “पद़मावत” के बहाने राजस्थान के आत्मदर्प का उपहास उड़ाते हैं भंसाली — त्रिभुवन

    “पद़मावत” के बहाने राजस्थान के आत्मदर्प का उपहास उड़ाते हैं भंसाली — त्रिभुवन

    Tribhuvan

    संजय लीला भंसाली चाहे कितने भी बड़े फ़नकार क्यों न हों, लेकिन दिलों को जीत लेना इस क़दर आसान नहीं होता। फ़िल्मकारों के पास प्रचार की बहुतेरी चालाकियां हुआ करती हैं, लेकिन ये चीज़ें सदा ही जादू की तरह काम नहीं करतीं। प्रचार के लिए शुरू की गई विवादों की अदाकारी में भी सौ कर्ब के पहलू निकल आते हैं। भंसाली ने “पद्मावत” का निर्माण पूरा करके बड़ी ही अदाकारी के साथ फ़न्काराना रोने की कोशिश की थी, लेकिन राजस्थान के राजपूतों के विरोध के बाद उनके आँसू बह निकले।

    Padmaavat

    मैं कुछ दिन पहले अपनी दिल्ली यात्रा में “पद्मावत” देख चुका हूं। इस पर लिखने का काफ़ी मन था, लेकिन शनिवार की रात जब “चैंपियन” पर कमलेश ने कुछ चीज़ें छेड़ीं और साफ़ कहा कि इस तरह की फ़िल्में बननी ही क्यों चाहिए तो मुझसे रहा नहीं गया। मैंने साफ़ तौर पर कहा कि किसी भी फ़िल्म या कृति पर रोक लगाना बहुत ग़लत है, लेकिन “पद्मावत” देखने के बाद मुझे लगता है कि न तो आम लोग किसी चीज़ का विरोध करते समय विवेक का इस्तेमाल करते हैं और न ही हमारे स्वनाम धन्य संपादक लोग राजस्थान के राजपूत शासकों का बुरी तरह उपहास उड़ाने वाली फ़िल्म की तारीफ़ें करते समय इतिहास के तथ्यों को ही याद रखते हैं।

    “पद्मावत” फ़िल्म को लेकर जो बात एक सामान्य युवक कमलेश के विवेक पर प्रहार करती है, वह फ़िल्म देखकर सबसे पहले फ़तवा जारी करने वाले मौलानुमा संपादकों की बुद्धि से बहुत परे की बात है। कमलेश का तर्क है : यथार्थ जीवन में रणवीर और दीपिका प्रेमी-प्रेमिका हैं और जब भंसाली इन्हें फ़िल्म में अलाउद्दीन ख़िलज़ी और पद्मिनी की भूमिकाएं देता है तो इसके पीछे फ़िल्म के निर्देशक की काईयां बुद्धि का पता चलता है। वह शरारतन कहीं न कहीं यह दर्शाना चाहता है कि दोनों के बीच प्रेम का कोई अदृश्य रसायन बह रहा था।

    और संभवत: यही वह बात थी, जिससे भंसाली के गाल पर पड़े थप्पड़ के पीछे का गुस्सा अंकुरित हुआ था। कमलेश और दूसरे बहुतेरे लोगों का मानना है कि भंसाली ने पद्मिनी के माध्यम से क्षत्रियों की प्रतिष्ठा से छेड़छाड़ की कोशिश की है और यह नाक़ाबिले बर्दाश्त है।

    लेकिन फ़िल्म देखने के बाद मुझे बहुतेरा ऐसा आपत्तिजनक लगा, जो शायद फ़िल्म की तारीफ़ें करने वाले बुद्धिजीवियों की निगाह में सही रहा होगा। सबसे बड़ी बात तो यह है कि भंसाली ने अलाउद्दीन ख़िलजी के रूप में जो पात्र गढ़ा और जितनी मेहनत उसे संवारने और जीवंतता प्रदान करने में खर्च की, उसका एक प्रतिशत भी राजस्थान की वीरता की शान रहे रत्नसेन के पात्र पर खर्च नहीं की।

    Alauddin Khilji (Ranveer Singh)

    ख़िलजी वाक़ई बहादुर और दुस्साहसी था, लेकिन रत्नसिंह की कद-काठी और उसके हावभाव ऐसे तो नहीं ही रहे होंगे, जैसे शाहिद कपूर के दिखाए गए हैं। भंसाली ने रत्नसिंह के पात्र को बुरी तरह कमज़ोर दिखाने के लिए ही शाहिद कपूर का चयन किया है, जो रणवीरसिंह अभिनीत अलाउद्दीन ख़िलजी के सामने दो कौड़ी का भी नहीं लगता।

    ख़िलजी की कुश्ती का दृश्य बहुत ज़ोरदार ढंग से फ़िल्माया गया है और उसमें ख़िलजी की ताक़त को जीवंतता दी गई है। उसका डील-डौल और उसके शरीर सौष्ठव का प्रदर्शन क्या कमाल है। उसकी भूमिका को वीरता और क्रूरता के चाक पर शरीर और अभिनय की मिट्‌टी से गूंथा गया है।

    Ratnsen (Shahid Kapoor)

    अल्लाउदीन के मुकाबले रत्नसेन का पात्र बहुत कमजोर गढ़ा गया है। क्या आप कल्पना कर सकते हैं कि शौर्य और शक्ति की मिट्‌टी से बना रत्नसेन शाहिद कपूर जैसा रहा होगा, जो पद्मिनी की तलाश में सिंहल द्वीप चला गया? शूरवीरों की कद-काठी छोटी हो सकती है, लेकिन उनके ओज और तेज ऐसे तो नहीं हुआ करते। रत्नसेन को उनकी पत्नी जिस पद्मिनी को लाने के लिए ताना देती है, वह पद्मिनी किसी सुंदरी का नाम नहीं था, अपितु भारतीय कामशास्त्र की भाषा में सर्वाेत्तम मानी जाने वाली सुंदरी पद्मिनी थी। जैसे चित्रिणी, शंखिनी, हंसिनी आदि मानी जाती हैं। और शूरवीर तथा कामवेत्ता रत्नसिंह जब पद्मिनी की तलाश पूरी करके लौटता है तो क्या उसका संघर्ष कम रहा होगा?

    इस फ़िल्म को देखकर तो लगता है कि राजपूतों से ज़्यादा अगर किसी को विरोध करना चाहिए था तो ब्राह्मणों को करना चाहिए था। इसमें राघव चेतन ब्राह्मण को न केवल फ़िल्म में देशद्रोही और विश्वासघाती बताया गया है, बल्कि उसे निकृष्टतम व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है। राघव जैसा सुरीला और निष्णात बांसुरीवादक दिखाया गया है, अगर वह वाक़ई में संगीतज्ञ था तो द्रोही नहीं था और अगर द्राही था तो वह संगीतज्ञ नहीं हो सकता।

    पूरी दुनिया के इतिहासकार यह मानते हैं कि राजपूतों ने मानवीयता और अद्वितीय किस्म की निर्भीकता के कारण चालाक, निष्ठुर और अमानवीय आक्रमणकारियों से मात खाई। इसके अनुपम उदाहरण भी बिखरे पड़े हैं। लेकिन फ़िल्म में दिखाया गया है कि किस तरह अलाउद्दीन ख़िलजी रत्नसेन के महल में निर्भीकता से आता है।

    Padmaavat Ratnsen

    इतना ही नहीं, अलाउद्दीन ख़िलजी ने चित्तौड़गढ़ के दुर्ग के चारों तरफ घेरा डाल रखा है और भीतर रत्नसेन और पद्मिनी कभी होली खेलते हैं और कभी दीपावली मनाते हैं। क्या सामान्य सा विवेक रखने वाले शासक के साथ भी ऐसा संभव है कि वह चारों तरफ शत्रु से घिरा रहे और किले के भीतर नीर बनकर बांसुरी बजाता रहे? भंसाली ने बहुत ही चालाकी से राजपूत वीर को निहायत ही कायर और मूर्ख चित्रित करने की कोशिश की है और यह इतिहास के सच के हिसाब से भी बहुत आपत्तिजनक है। एक जगह तो रत्नसेन अचानक अलाउद्दीन की सेना पर ऐसे समय हमला करता है जब सब लोग सोए पड़े हैं और कोई जगाकर अलाउद्दीन को हमले की सूचना देता है। मेरा ख़याल है कि राजपूत शासकों के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा निकृष्ट शासक हो, जिसने कभी किसी सोए हुए शत्रु पर हमला किया हो।

    यह सही है कि अलाउद्दीन ख़िलजी के पात्र को इस फ़िल्म में बहुत क्रूर दिखाया गया है, लेकिन यह क्रूरता उसके प्रभाव में बढ़ोतरी पैदा करती है, न कि उसके पात्र को वीभत्स बनाती है।

    Aditi Rao and Deepika Padkone

    पद्मिनी के पात्र में दीपिका का अभिनय बहुत कमज़ोर और निष्प्राण रहा है। उसका पात्र और उसके संवाद भी बहुत बचकाने गढ़े गए हैं। इसके विपरीत ख़िलजी की पत्नी मेहरुनिसा की भूमिका में अदिति राव का क्या शानदार अभिनय है। जिम सर्भ तो क़माल हैं।

    दरअसल, यह फ़िल्म दिल्ली को केंद्र में रखकर गढ़ी गई है। दिल्ली अलाउद्दीन ख़िलजी और अलाउद्दीन ख़िलजी दिल्ली। दिल्ली सदा सदा से ही ज़ुल्मत की प्रतीक रही है, लेकिन दिल्ली के वासियों के लिए यह अत्याचार सदा ही सदाचार रहा है।

    मुझे लगता है कि रत्नसेन के बहाने भंसाली ने राजस्थान के आत्मदर्प को बहुत नीचा दिखाया है और ख़िलजी की शान में जमकर कसीदे पढ़े हैं। और यह बहुत आपत्तिजनक है। इसका बात का पता फ़िल्म देखकर ही लग सकता है और किसी भी फ़िल्म, पुस्तक और कलाकृति पर प्रतिबंध लगाना विवेक की अर्गलाएं बंद करने के समान है। ऐसा करना भंसाली की मानसिकता को आर्थिक फायदों से भर देना है। अगर विरोध इतना प्रखर नहीं होता तो यह फ़िल्म वाकई में बुरी तरह पिट जाती। लिहाजा, फ़िल्म का विरोध करने वाले तत्वों ने राजस्थान के दर्प का उपहास उड़ाने वाले भंसाली की परोक्ष रूप से जाने या अनजाने प्रचार में बहुत मदद की है।

    Tribhuvan

    Credits: Facebook profile of Tribhuvan

  • वेंटिलेटर पर देश के तकनीकी संस्थान व शिक्षा  — Anuj Agarwal

    वेंटिलेटर पर देश के तकनीकी संस्थान व शिक्षा  — Anuj Agarwal

    Anuj Agarwal

    यूं तो यह खबर उत्तर प्रदेश की है कि वहाँ के 32 इंजनियरिंग व मैनेजमेंट कॉलेज बंद हो रहे हैं, मगर कुछ ऐसी ही खबर देश के प्रत्येक राज्य में छप रही हैं। इस बर्ष एआईसीटीई से सम्बद्ध 10,300 कॉलेजो में से दस प्रतिशत यानि एक हज़ार से ज्यादा बंद हो रहे हैं। डायलॉग इंडिया ने अपने निजी संस्थानों के बार्षिक सर्वेक्षण : 2017 में यह खुलासा किया भी था कि अगले चार वर्षों में आधे से ज्यादा तकनीकी संस्थान बंद होने वाले हैं। सच्चाई यह है कि देश के लगभग 4000 तकनीकी शिक्षा संस्थान बंद होने के कगार पर है किंतू उनमें पढ़ रहे प्रथम , द्वितीय व तृतीय वर्ष के विद्यार्थियों का कोर्स बाकी है, इसलिए एकदम से बंद नहीं कर सकते। फिर सवाल सरकार की इज़्ज़त का है।

    ऐसा इन संस्थानों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा व रोजगार न दिला पाने के कारण भी हो रहा है। (देश के निजी विश्विद्यालयों ने भी परिदृश्य बदला है और इनमें से 5 लाख सीटे के भागीदार वे भी हैं और 2 से 3 लाख रोजगार भी।) वहाँ भी दिए जाने वाले रोजगार के मुकाबले दुगनी सीटें उपलब्ध हैं। एआइसीटीई खुद मानती है कि उससे संबद्ध संस्थानों में 37 लाख सीटें है किंतू प्रवेश केवल 20 लाख ही हो पाते हैं। ये भी माल कमाने के लालच में बच्चो व माता पिता को बहला फुसला कर, सब्जबाग दिखलाकर। इसी कारण अयोग्य विद्यार्थी प्रवेश तो ले लेता है किंतू कुछ समय बात ही पढ़ाई छोड़ देता है। ऐसे विद्यार्थियों की संख्या 7 लाख प्रतिबर्ष है यानि कुल प्रवेश का 35 प्रतिशत।

    अंदाज़ा लगाइए कितने बड़े सुनियोजित धोखे व लूट होती हैं नयी पीढ़ी के साथ। जैसे तैसे जो 13 लाख लोग डिग्री ले भी पाते हैं उनमें से आधे यानि 6 से 7 लाख नोकरी लायक नहीं होते और बेरोजगार रह जाते हैं। जिन 6-7 लाख विद्यार्थियों को नोकरी मिलती भी है उनमें से 1 से 2 लाख ही जॉब सेटिस्फेक्शन महसूस कर पाते है और बाकि कुढ़ते जलते संघर्ष करते रहते हैं।

    यह सरकारों के नीतिकारों पर बड़ा प्रश्नचिन्ह है कि जब देश को 6 से 7 लाख ही इंजीनियरिंग व मैनेजमेंट पास लोग चाहिए तो 37 लाख सीटों का ढांचा जो लाखों करोड़ रुपये खर्चकर क्यों तैयार किया गया? फिर इतने संसाधनों व समय, धन व युवाओं की ऊर्जा क्यो बर्बाद की जा रही है? किसकी जबाबदेही है इस सुनियोजित सिंडिकेट की लूट व षड्यंत्र की?

    मजेदार बात यह है कि देश के हर नेता, नोकरशाह, उद्योगपति व व्यापारी की इन संस्थानों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष पत्ती यानी हिस्सेदारी है। कितनी हास्यास्पद बात है कि हमारे देश मे एक करोड़ लोग इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे हैं और देश का दो तिहाई हिस्सा आज भी अत्यधिक पिछड़ा है। बिना शिक्षा के भारतीयकरण के शोध, इन्नोवेशन, इंट्रप्रेनेरशिप, औधोगिकरण के अभाव के आयात आधारित अर्थव्यवस्था का यही हाल होना ही है। मोदी सरकार लाख मेक इन इंडिया का घंटा बजाती रहे।

    Anuj Agarwal

    Editor, Dialogue India
    General Secretary,
    MAULIK BHARAT

  • बिना ‘सेक्स’ सिर्फ ‘प्रेम’ महज ‘योगा’ है

    बिना ‘सेक्स’ सिर्फ ‘प्रेम’ महज ‘योगा’ है

    Ajay Yadav

    ज्यादा पुरानी नहीं, कुछ साल पहले की बात है। चाची की तबियत काफी बिगड़ गई थी, जब मैं हॉस्पिटल पहुँचा, कई डॉक्टर उन्हें घेरे हुए थे। वे अब कुछ बोल नहीं पा रही थीं। उन्होंने जब मुझे देखा तो लगा कि मेरी आँखों से वे अपने असहाय शरीर को निहार रही हैं। उनकी आंखें खत्म होती ज़िन्दगी की बेबशी कह रही थी। जब उनकी हथेलियों को मैंने अपने हाथ में लिया, उनके आंखों से आंसुओं की अशांत धारा बह निकली थी। उनकी हथेलियां खुरदुरी हो चुकी थी, हाथ-गाल और माथे में ठंढक तैरने लगी थी।

    बगल में चाचा खड़े थे। बीच-बीच में चाचा हंसते हुए बोल रहे थे- “क्या कह रही हैं?…कैसी हैं?”

    Ajay Yadav

    अपनी पत्नी से बात करने का यही तरीका था चाचा के पास! अगर मैं या डॉक्टर यहां से चले जाते तो चाचा भी चले जाते। अपनी ‘पत्नी’ के साथ अकेले खड़ा होना ‘चोरी’ पकड़े जाने-सा था। अपनी पूरी ज़िंदगी उन्होंने ऐसे ही जिया और ज़िन्दगी का यह तरीका उन्हें भी विरासत में ही मिला था। जब पूरी दुनियाँ सो जाएं तो लोग छिपते-झिझकते अपनी बीवियों के पास जाते थे और घर जागने से पहले निकल आते थे। चाचा, मेरे पिता, उनके पिता, पिता के पिता…ऐसे ही आते-जाते रहे, जीवन चक्र चलता रहा… हमारे समाज में बीवियां लाश की तरह अंधेरे में लेटी रहीं, कभी ठीक से एक-दूसरे के चेहरे निहार नहीं पायीं, कभी चरम अवस्था में पुरुष के उपर चढ़ नहीं पायीं, ‘चरित्रहीन’ समझे जाने से बचती रहीं…

    ऐसी ही ‘बचती हुई’ स्त्री आज ‘मृत्यु शैया’ पर लेटी हुई थी, लेकिन उसके साथ पूरी ज़िंदगी गुजार दिया ‘मर्द’ आज भी बात करने से झिझक रहा था। बहाने से करीब आने की कोशिश कर रहा था। बेचैन था, खुद को महज अभिभावक दिखाने की कोशिश कर रहा था। मैंने डॉक्टरों को वहां से जाने को कहा और चाचा के पास चला गया!

    “चाचा…चाची के पास बैठकर हाल-चाल कर लेंगे तो चाची को कितना अच्छा लगेगा!”

    चाचा का हाथ पकड़कर चाची के पास बैठा दिया। चाची की हथेलियाँ चाचा के हाथ में थमा दी। मैं जानता था कि अगर ऐसा नहीं करूंगा तो चाचा बुत की तरह बैठे रहेंगे। और चाचा ने एक बार चाची का हाथ पकड़ा तो पकड़े ही रहे…घंटों! जब चाचा ने कहा- “लगता है छोड़कर चली गईं..” चाचा अनाथ मासूम बन गए थे!

    बाद में चाचा जी भी गुजर गए, लेकिन चाची के गुजर जाने बाद मेरे दोस्त से बन गए थे। कई बार साथ सिगरेट भी पी। आज मैं सोचता हूँ कि कैसे लोग थे वे! सेक्स को परंपरा की तरह जिया, बच्चे पैदा किया, वो भी खुलकर प्रेम के इजहार के बिना! सच पूछिए तो ऐसे लोग ‘हस्तमैथुन’ से ज्यादा ज़िन्दगी ज़ी नहीं पाए। ‘बिना प्रेम का सेक्स’!!!

    लेकिन आज के जीन्स-टाप्स पहने, खुद को आधुनिक कहते लड़के-लड़कियों की भी हालत उनसे बहुत अलग नहीं है। ऐसे ढेर सारे लड़के-लड़कियों को मैंने अपनी ज़िंदगी में देखा, जो प्रेम को सेक्स से अलग करके ज़िन्दगी जीते रहे। प्रेम को ‘पवित्र’ कहते रहे और सेक्स को ‘गंदा’ मानते रहे। हाथों में गुलाब थामे, वेलेंटाइन डे मनाते ये लोग ‘सेक्स’ को टैबू बना लिए। अरे, ‘बिना सेक्स सिर्फ प्रेम’ महज ‘योगा’ ही है, उससे ज्यादा कुछ नहीं, और ये योगी आज भी कॉलेज, रेस्टोरेंट्स, पार्क, मॉल में योग करते घूम रहे हैं।

    इन सबसे बहुत आधुनिक तो अपने ‘शिव’ हैं, जिन्हें ‘अर्धनारीश्वर’ कहा जाता है। अर्धनारीश्वर का मतलब उस ‘परममिलन’ से है, जिसमें आपका ही आधा व्यक्तित्व आपकी पत्नी/प्रेमिका का अहसास ग्रहण कर लेता है और आपकी पत्नी/प्रेमिका का व्यक्तित्व आपके अहसास को जीने लगता है। दोनों के भीतर जो रस और लीनता पैदा होती है, वही तो जीवन का चरम आनंद है, वही तो हमारे-आपके अस्तित्व का मूल है।

    और इसी सच का मूर्त रूप है ‘शिवलिंग’! अगर पुजारीवाद/पंडा-धंधावाद से मुक्त होकर सोचें तो ‘शिवलिंग’ से ज्यादा रियल कोई ‘प्रतिमा’ नहीं। पदार्थ और चेतना का सूत्र!!!

  • जब मै कहूँगा, प्रेम !

    जब मै कहूँगा, प्रेम !

    Kashyap Kishor Mishra

    जब मै कहूँगा, प्रेम !
    वो लाड़ होगा माँ का |
    स्नेह की गुनगुन से फदकता
    बोरसी में औटाये दूध सा सौंधा|

    बहन का नेह होगा,
    सुबह बम्बे का नरम जल
    ओस से भीगा कमल
    मृदु और कोमल |

    होगा वह नदिया का जल
    उज्जवल छलछल निर्मल |

    सुबह की धूप होगा,
    जिसकी नरम सेंक, मोहक |

    प्रेम !
    माँ की मालिश है,
    है भईया का दुलार|

    नाजुक, सुलगते कंडे से निकाली
    घी टपकाई मुलायम लिट्टी के साथ
    हिंग-जीरा का दाल में, अलग से बघार|

    Kashyap Kishor Mishra

    किसी डगर पर सावधान करती,
    एक अनजान काका की गोहार है, प्रेम |
    तो कभी, साहून काकी का दिया
    घलुआ अचार है, प्रेम |
    प्रेम, मंदिर में रहती
    परित्यक्त जलपा दादी
    का वो आशीष है,
    जो वो गावँ के हर बच्चे को देती है,
    अपने नाती-पोते सोचती है|

    भरी दुपहरी में मनुआ का
    टीप कर तोड़ा मीठा आम
    बारहा मिलता रहा,
    प्रेम के नाम |

    प्रेम,
    दादी की मनुहार होगा
    डांट फटकार होगा |
    और फिर धीरे से
    दी गई, आखिरी चवन्नी होगा |

    यूँ ही प्रेम कहते समझते,
    आखीर में तुमतक आऊंगा
    तुमसे पूछूँगा, प्रेम?
    और तुम कहोगी,
    धत, पागल!
    प्रेम बस किया जाता है।

  • प्रेम – असहमति

    प्रेम – असहमति

    Mukesh Kumar Sinha

    असहमतियां
    नही होती
    हर समय
    सहमति का विपरीत

    असहमति
    कई बार
    बस ये जताने के लिए भी
    होती है
    कि समझ पाए अहमियत ।

    विरोध
    वक़्त बेवक्त
    किया जाता है
    सबसे अपनों का

    विरोध
    में छिपा होता है
    सुझाव
    कि समझा करो
    या, ऐसे तो समझोगे न !

    प्रेम
    में भी कई बार
    करना पड़ता है
    ‘न’ का सामना

    प्रेम
    का उत्सव सरीखा
    किस डे/ हग डे
    में असहमतियां
    झिझक भी हो सकती है
    जो, प्रेम का विरोध तो नहीं

    प्रेम
    में बहते हुए
    प्रोमिस डे के दिन कहना
    कि प्रोमिस करो
    प्रेम करते रहोगे न
    शायद उम्मीदों का गुलाब ही तो है

    Mukesh Kumar Sinha

    प्रेम
    कितना चॉकलेटी होता है न
    तभी तो
    चुप्पियां सहमति समझी जाती है
    फिर भी चिल्ल्ला कर
    जताना चाहते हैं प्रेम

    प्रेम सिक्त नजरें
    मौन हो कर भी
    बता देती है
    हवाओं में गुलाबी सुगंध है ।

    असहमति
    भी प्रेम ही है
    समझे न
    माय वेलेंटाइन !!

  • मासूम बूंदों की फुहार

    मासूम बूंदों की फुहार

    Mukesh Kumar Sinha

    खिलखिलाहट से परे
    रुआंसे व्यक्ति की शायद बन जाती है पहचान,
    उदासियों में जब ओस की बूंदों से
    छलक जाते हों आंसू
    तो एक ऊँगली पर लेकर उनको
    ये कहना, कितना उन्मत लगता है ना
    कि इस बूंद की कीमत तुम क्या जानो, लड़की!

    खिलखिलाते हुए जब भी तुमने कहा
    मेरी पहचान तुम से है बाबू
    मैंने बस उस समय तुम्हारे
    टूटे हुए दांतों के परे देखा
    दूर तक गुलाबी गुफाओं सा रास्ता
    ये सोचते हुए कि
    कहीं अन्दर धड़कता दिल भी तो होगा ना
    मेरे लिए

    खिलखिलाहट और मेरी खीज
    अन्योनाश्रय संबंधो में बंधा प्रेम ही तो था
    जिस वजह से
    झूलती चोटियों के साथ तुम्हारी मुस्कुराती, गाती आँखें
    और चौड़ा चमकता माथा
    चमकीली किरणों सा आसमान एक
    जो फैलकर
    बताता सूर्योदय के साथ
    कि पकी बालियों सी फसल बस कटने वाली है

    सुनो मेरी खीज से परे
    बस तुम खिलखिलाना
    सौगंध है तुम्हें
    ताकि बस तुम हो तो लगे ऐसा कि
    मेरे आसमान में भी उगती है धनक,
    कभी न कभी
    बारिश के बाद निकलती है एक टुकड़ा धूप
    और खिलती है फ़िज़ा
    मेरे लिए

                 Mukesh Kumar Sinha

    सुनो कि बार बार हूँ कह रहा
    खूब खिलखिलाती रहना
    महसूस करना
    मेरे साथ बह रही एक नदी
    मचलती, बिफरती, डूबती, उतराती
    जीवंत खिलखिलाती नदी
    बेशक मुझपर पड़ती रहे
    मासूम बूंदों की फुहार …

    समझे ना !!