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  • प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    प्यार पर हमला समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखने की साजिश

    Vidya Bhushan Rawat

    कल अंकित सक्सेना के पिता को टी वी पर देखा जहा एंकर महाशय उनको प्रणाम कर रहे थे लेकिन गुस्सा हो गए के केजरीवाल ने मुसलमानों को तो मौत पर अधिक पैसा दिया और हिन्दुओ के नहीं. सर्व प्रथम बात ये के अंकित को मार डाला गया और ये एक अपराध है और कानून के अनुसार अपराधियों के साथ जो होना चाहिए वो होने चाहिए. पुलिस ईमानदारी से काम करे और चार्ज शीट दाखिल करे ताकि न्याय हो सके.

    अंकित सक्सेना की मौत पर साप्रदायिक राजनीती की कोशिशे हो रही है और एंगल निकालने की कोशिशे भी जारी है. अभी तक नहीं मिल पाया है लेकिन बना दिया जाएगा क्योंकि चैनल इसी लिए है के अगर संप्रदायीकरण का मटेरियल नहीं मिल रहा तो उसे तैयार कर दिया जाना चाहिए.

    कुछ दिनों पूर्व मुझसे ये पुछा गया गया था के अंकित सक्सेना के पिता ने बहुत संयम से काम लिया है और उसकी सराहना की जानी चाहिए. मैं तो ये कहता हो को ऐसे मौके पर मीडिया को माँ बाप के मुंह में माइक लगाने के बजाये निष्पक्ष रिपोर्टिंग करनी चाहिए. हमें ये पता होना चाहिए के जिस किसी के घर में कोई असामयिक मौत होगी तो उसके घर वाले बहुत बिरले ही होंगे जो इमोशनल न हो और इन हालातो में वे अगर कुछ कह भी दे तो बहुत आश्चयर्य नहीं होना चाहिए.

    Vidya Bhushan Rawat

    अंतर जातीय या अंतर्धार्मिक रिश्तो में बहुत आवश्यक है के कुछ बाते समझी जाए. हम इन्हें लोकतान्त्रिक रिश्ते भी कह सकते है और ये तभी कामयाब हो पाएंगे जब हम एक दूसरे के ऊपर अपनी धार्मिक और भाषाई श्रेष्ठता न लादे. ये रिश्ते इसलिए मज़बूत होते है क्योंकि आप धर्म और जाति की सीमाओं को लांघकर इसे बनाते है इसलिए आप ये नए विचार की नीव रख रहे है जो संगठित धर्मो और जातियों से निकलकर बनता है जहा इंसान की श्रेष्ठता होती है, उसकी आज़ादी का सम्मान है और थोडा जगह विचारभिन्नता के लिए भी बची रहती है. कोई भी प्रेम सम्बन्ध तब तक नहीं चल सकता जब तक उसमे स्वतंत्रता को गुंजाइश न हो और कोई भी सम्बन्ध अनंत काल तक चलता रहे इसकी सम्भावना भी नहीं होती इसलिए संबंधो के बन्ने और बिगड़ने में जो कडुवाहट आती है उसका कारण यही है के हम कही लुटा हुआ महसूस करते है. कोई कहता है प्यार में डूब जाना चाहिए, लेकिन मुझे लगता है किसी को डूबने की जरुरत नहीं. अपने होश हवाश में रहिये और एक दूसरे की स्वयत्तता का सम्मान करेंगे तो अलग होने में कोई कडुवाहट नहीं होगी.

    जो लोग इसे लव् जिहाद का नाम दे रहे है वही लोग खाप पंचायतो के जातिगत फैसलों को संस्कृति और परंपरा के नाम पर सही ठहराते है. हकीकत ये है के प्रेम करना हमारे समाज में अपराध है और इसलिए प्रेम के अभाव में हमारा समाज हिंसक बन चूका है. ये हिंसा क्रूरता और बर्बरता में बदल चुकी है क्योंकि ये प्यार नहीं, ये प्यार में औरत को एक वस्तू समझ रहा है और जिस समाज की महिला प्यार में दूसरी और जाती है वह अपने को लुटा हुआ महसूस करता है. इसलिए अंकित के प्यार में उसकी प्रेमिका के माँ बाप की उनकी इज्जत खतरे में दिखाई दी. हम सब जानते है के प्रेम विवाह कितने मुश्किल है खासकर जब लड़का और लड़की दोनों का आर्थिक रुतबा बहुत बड़ा नहीं होता और वे दो स्वतंत्र व्यक्ति नहीं बन पाते और उनको अपने परिवार की मदद की लगातार जरुरत होती है. दो सफल व्यक्ति अपने समाज से दूर रहकर अपने रस्ते पर चल सकते है लेकिन जहाँ व्यक्ति समाज के रीति रिवाजो के अनुसार चलेंगे तो वे तो प्यार के रस्ते में रोड़ा अटकाएंगे ही.

    भारत में शादी की पवित्रता का सिद्धांत जाति से जुड़ा हुआ है और प्रेम विवाह जाति की सर्वोच्चता और शुद्धता के सिद्धांतो में सबसे बड़ी बाधा है. जैसे जैसे लोग जाति धर्म के बन्धनों से ऊपर उठकर निकलेंगे तो इनके नाम पर चलने वाली घृणा और नफ़रत की दुकानों के बंद होने की संभावनाए भी बढ़ जाएँगी. देश के युवा की उर्जा समाज निर्माण में लगनी चाहिए न के जाति धर्म की अँधेरी दीवारों को मज़बूत करने में. शायद धर्म के धंधेबाजो को इस बात का पता है के प्रेम की ताकत के अच्छे से अच्छे तानाशाह और राजा महाराजा भी हार गए.

    अंकित के दोस्तों ने एक विडियो बनाया और कहा के प्रेम किसी सेस भी हो सकता है. प्रेम कोई योजना बनाकर नहीं होता. योजना से तो दंगे करवाए जाते है या किसी की जासूसी करवाई जाति है और प्रेमी जोड़ो का क़त्ल और वो सब वो लोग करते है जिनकी जिंदगी से प्रेम गायब है. जिनकी जिंदगी में प्रेम है वो तो बस प्रेम की गंगा बहाते रहेंगे. अंकित की दोस्त शह्जादी ने लगातार ये बात कही के उसके माँ बाप गुनाहगार है. प्यार करने वालो को मजबूती से अपने विचारों पर खडा होना होगा क्योंकि प्यार भी एक विचारधारा है वैसे ही जैसे घृणा और नफरत भी एक नकारात्मक विचार है जो जातीय और धार्मिक सर्वोच्चता के अहंकार से पनपती है. इसलिए प्यार के विचार की जीत के लिए हमें कौशल्या जैसी प्रेमिकाओं की और देखना होगा जिसने जातिगत अहंकार के विरुद्ध अपनी जंग जारी रखी है और अपने पति शंकर के हत्यारों को जेल के सीखचों तक पंहुचाने के लिए अपने जद्दो जहद जारी रखी है. कौशल्या का मामला भी भी अंकित जैसा है वो तथाकथित ऊँची जाति से आती थी जिसका शंकर से प्रेम हो गया जो दलित था और ये बात कौशल्या के माँ बाप को पसंद नहीं थी और एक दिन कोयम्बतूर के बिजी चौराहे में शंकर की बेरहमी से हत्या कर दी गयी बिलकुल उसी तरह जैसे हम अंकित की हत्या देख रहे हैं. सड़क चलते लोग अपने काम में लगे रहे, कोइ विडियो बनाता रहा और कोई चुप देखता रहा लेकिन भीड़ निर्दोष को बचा नहीं पायी. शहजादी को कौशल्या से सीखना होगा और हत्यारों को जेल तक पहुचना होगा, अपने लिए न्याय की लड़ाई लडनी होगी और घृणा फ़ैलाने वाली मानसिकता से लड़ना होगा.

    भारत के भविष्य के लिए जरुरी है के जातियों का समूल विनाश नो क्योंकि ये देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा है. ये जातीय फर्जी गौरवो के सिद्धांत पर चल रही है. अभी इलाहाबाद में दलित छात्र दिलीप सरोज की नृशंश हत्या केवल इसलिए कर दी गयी के उसका पैर किसी दबंग सवर्ण से टकरा गया. जाति के आधार पर भारत में विभाजन साफ़ दिखाई दे रहा है और पचासों उपग्रह अंतरिक्ष में भेजकर या बड़ी बड़ी फौजे बनाकर और हथियार बेचकर भी देश कभी मज़बूत नहीं बन सकता जब तक जाति के किले बचे रहेंगे. रोहित वेमुला से लेकर दिलीप सरोज तक सैंकड़ो छात्रो और युवाओं की बलि चढ़ चुकी है केवल इसलिए क्योंकि आपको अपनी जातीय सर्वोच्चता बनाये रखनी है. देश के बहुजन समाज को अशक्त करके कभी देश आगे नहीं बढ़ सकता. हिंसा हमारे समाज का एक नया नॉर्म बन चुकी है जो किसी भी समाज को मंदबुद्धि बनाएगी और हिंसा का प्रतिकार केवल हिंसा से करने को उत्प्रेरित करेगी.

    आज देश के युवाओं को देखना है के वे प्रेम की दुनिया को आगे बढ़ाना चाहते है या जातियों के दमघोटू ढांचे में कैद रहना चाहेगे. प्रेम में बहुत बड़ी ताकत है उन सारे पूर्वाग्रहों को तोड़ने की जिन्हें जाति की ढांचों ने बनाये है. आजदी के ७० वर्षो के बाद भी आज हम उन्ही पुराथान्पंथी जकडन में फंसे है तो कही न कही विचारात्मक द्वन्द है. जाति के नाम पर दूकान चलाने वालो और अपनी प्रभुत्व बनाये रखने वालो की साजिश को केवल युवा तभी तोड़ पायेंगे जब विवाह जैसी संस्था का लोकतान्त्रिककरण हो और वो तभी संभव होगा जब चाहत पर किसी का पहरा न हो. जिस दिन भारत में समाज का लोकतंत्रीकरण हो गया जैसा बाबा साहेब आंबेडकर कहते थे, उसी दिन भारत दुनिया का सबसे मज़बूत लोकतंत्र होगा और सबसे बड़ा देश भी. समाज में लोकतंत्र के अभाव में हम अपनी ही औलादों को इज्जत के नाम पर मारते रहेंगे और तमाशा देखते रहेंगे. अभी भी समय है, चेतने का, समाज के नव निर्माण का और देश को बचाने का. जातियों के जाल में जकड़ा देश कभी आगे नहीं बढ़ पायेगा और केवल घृणा और नफ़रत के ब्यापारियो के नियंत्रण में रहेगा. जातियों का उन्मूलन तभी हो पायेगा जब हमारे युवाओं को अपना साथी चुनने की स्वतंत्रता होगी नहीं तो उदंडता और जबरदस्ती ही हमारे समाज में जातीय सर्वोच्चता को बनाये रखेंगे और कानून का पालन करने वाले केवल देखते रहेंगे क्योंकि संविधान केवल बहस करने का एक दस्तावेज होगा, हमारे जीवन मूल्यों को निर्धारित करने का नहीं. ये अंतर्द्वंद अंतत उन ताकतों को मज़बूत बना रहा है जो चाहते ही नहीं के समाज लोकतान्त्रिक हो क्योंकि इस प्रक्रिया में उनकी बहुत से जातीय विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे लेकिन बदले में सबको जो मिलेगा वो अप्रतिम होगा, एक लोकतान्त्रिक समाज ही देश को मज़बूत और एकजुट रख पायेगा जिसके लिए हमें बड़ी तोपों और टैंको की जरुरत नहीं होगी.

  • संबंधों में उक्ताहट

    संबंधों में उक्ताहट

    Pratima Jaiswal[divider style=’right’]

    कड़ाके की ठंड में घर में एक ही छोटा-सा पलंग था. वो रात में बीच-बीच में उठकर देखता रहता था कि कहीं उसे पैर तो नहीं लग रहा है, कहीं उसकी चादर तो नीचे नहीं गिर गई है. वो खुद ये बातें जब बताती थी, तो लगता था कि कितना प्यार करता है इसका पति. लेकिन उस वक्त मुझे झटका लगा जब मैंने उसे किसी दूसरे लड़के के साथ मेट्रो स्टेशन पर दूसरे अंदाज में देखा. लड़के के जाने के बाद मैंने उससे धोखे की वजह पूछी तो बोली ‘मुझे उसके प्यार में पिता वाली फीलिंग आती है, फैंटेसी चाहिए मुझे, जो उसे देखकर नहीं आती.’

    ये बेतुकी बात सुनकर मैंने उसे कोई ज्ञान नहीं दिया और अपना रास्ता नापने में ही भलाई समझी. अपने आसपास कई बार ऐसी कहानियां देखती हूं जिन्हें देखकर लगता है कि समाज, परिवार तो प्रेम के दुश्मन बाद में हैं. पहले तो ये लोग प्रेम के सबसे बड़े दुश्मन हैं.

    एक और दोस्त है, जिन महाशय ने अपनी प्रेमिका को इसलिए छोड़ दिया क्योंकि वो मां की तरह उसका ख्याल रखती है. हमेशा उससे प्रेम के इजहार का कोई मौका नहीं छोड़ती. उनके मुताबिक वो वैसी अट्रैक्टिव लड़की नहीं है, जैसी उसे चाहिए थी. उसका मन और नजरें इसलिए काबू नहीं रह पाती. प्रेमिका वैसी हो, जिसके सामने आते ही सारी दुनिया को भूलकर उसके साथ दिन बिताने का मन करने लगे.

    उसकी बातें सुनकर ऐसा लगा जैसे किसी टीनएजर से बात कर रही हूं. जबकि उसकी उम्र 30 साल के आसपास है. कभी हमें लगता था कि मन का भटकाव और नायक-नायिका पूजा, फैंटेसी दुनिया एक उम्र का पड़ाव है. एक उम्र बाद प्रेम की गंभीरता समझ आने लगेगी.

    लेकिन मैंने तो ऐसे लोगों को भी देखा है जो सालों से पत्रकारिता कर रहे हैं और दुनिया भर को ज्ञान देते हैं, लेकिन खुद कई लड़कियों को एक-साथ शादी के भ्रम में रखे हुए हैं. शादी अपने प्रेम से नहीं बल्कि अपने भविष्य से करेंगे. जिसके साथ पैसों की तंगहाली वगैरह जैसी दिक्कतें नहीं आए. लाभ-हानि के बही खाते को खोलकर अपने लिए आदर्श प्रेम चुनते हैं. कोई प्रेम से इतना ऊब चुका है कि जीवनसाथी के प्रेम की न ही परवाह है न ही उसकी मौजूदगी का महत्व. https://karensingermd.com/ उन्हें बस अटेंशन चाहिए. उनके लिए किसी एक को छोड़कर सब महत्व रखते हैं. उन्हें कोई एक नहीं सब चाहिए.

    वहीं कुछ लोग ऐसे हैं, जो भूतकाल में जी रहे हैं, जबकि जीवन में नए प्यार को स्वीकार कर चुके हैं फिर भी उन प्रेम कहानियों में जी रहे हैं, जिसके किरदारों ने उन्हें कभी महत्व नहीं दिया. नया प्यार क्योंकि मिल चुका है इसलिए खोने का कोई डर नहीं है. कई जोड़े ऐसे भी हैं, जिनमें एक प्रेम में डूबा और तो दूसरा प्रेम से ऊबा हुआ है. जिंदगी में परेशानियां किसे नहीं आती लेकिन उनके लिए प्रेम भटकाव है और सारी परेशानियों का मूल प्रेम या उनका पार्टनर ही है. ऐसा कुछ वक्त बाद महसूस करने लगते हैं.

    Pratima Jaiswal

    कुछ प्रेम कहानियों में किसी तीसरे को एंट्री दे दी जाती है. कहने को दोस्त है खास है लेकिन हर पल किसी दूसरे का हक मारे बैठा है. दो के बीच में कोई तीसरा आ जाए, तो दो रह सकते हैं क्या? ऐसे लोग खुद अपना घर तोड़ते हैं. इतिहास के पन्ने पलट लीजिए.

    कुल मिलाकर समाज, परिवार से लड़ना तो बाद में है, पहले खुद साथ रहना और दोनों तरफ से प्रेम बनाए रखना किसी चुनौती से कम नहीं है. आधुनिकता का एक घाटा ये भी है कि लोग प्रेम से ऊबने लगे हैं. उसपर भी अगर किसी में प्रेम बचा भी है, तो साथी की बेरूखी, अनदेखापन उसे भी प्रेम से एक दिन ऊबा देगा. धीरे-धीरे सब खत्म हो जाएगा. प्रेम कहानियां और किरदार हर रोज थोड़ा-थोड़ा मर रहे हैं.

    इन सब बातों से अलग अगर आपके पास कोई ऐसा साथी, ऐसा प्यार है, जिसके लिए आप दुनिया में सबसे ज्यादा महत्व रखते हैं. आपको देखते ही सारी थकान, परेशानियां भूलकर चेहरे पर मुस्कुराहट आ  जाती है या आपको स्पेशल फील कराने या मुस्कुराने के मौके तलाशता रहता है, तो उसके महत्व को समझिए. जाने मत दीजिए संभालकर रखिए उसे. आप सच में खुशकिस्मत है. प्यार है तो प्रेम बना रहना चाहिए और अगर नहीं है तो किसी कहानी के किरदार मत बनिए, न कभी किसी के प्रेम का तिरस्कार कीजिए और न कभी खुद को तिरस्कृत होने दीजिए.

    बाकी आपका नजरिया है.

  • कैंसर पीड़ित महिला

    कैंसर पीड़ित महिला

    Vandana Dave

    (1)

    असहनीय पीङा थी 
    कहने से शरमाती थी
    बढ़ता रक्तस्राव 
    अश्रुओं में बह जाता था
    कर घर के उपचार
    काम में लग जाती थी
    बगल की गाँठ
    देखकर
    अनदेखा कर देती थी
    सीने पर लाल दानों को
    अलइयाँ कहती थी
    निप्पल से निकलते 
    पदार्थ को बच्चे का
    दूध समझती थी
    इस अनहोनी से वह 
    बिलकुल अंजानी सी थी
    एक दिन आखिर 
    डरते डरते उसने 
    बतलाया 
    लेकिन 
    देर बहुत हो चुकी थी
    मेहमान वो बस
    कुछ ही दिनों की थी

    (2)

    वस्त्रों से अपने को 
    ढँकना है
    छूपाना नहीं

    दर्द कहीं भी हो
    तोङ दो सहने 
    का सलीका 
    सबकुछ बतलाना है

    दिल की गाँठ
    बगल में आते 
    लगती नहीं है देर
    अपने को हरदम 
    टटोलना है

    खूबसूरती सिर्फ 
    चेहरे की नहीं 
    स्वच्छता हर अंगों की 
    जरूरी है

    ये चुप्पी, ये शरम, ये हया
    पल्लू के पीछे बढती
    गाँठों के लिए नहीं है
    झिझक तुम्हें तोङनी है
    अपने को बचाना है!!!

    श्रीमती वन्दना दवे
    पेटलावद (झाबुआ) मप्र में जन्म। ग्रामीण जीवन जिया इसलिए कुछ फकीराना अँदाज है जीने का व सोचने का। इन्दौर के कस्तूरबा ग्रामीण संस्थान से ग्रामीण विकास एवं विस्तार में एमए। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता संस्थान भोपाल से पत्रकारिता में स्नातक। वर्तमान में भोपाल में निवासरत।

    फेसबुक पर मुण्डेर पेज संचालित
    https://www.facebook.com/munderblog/

  • महावरी, सैनेटरी पैड से जुड़ी वर्जनाएं एवं हमारी नासमझी

    महावरी, सैनेटरी पैड से जुड़ी वर्जनाएं एवं हमारी नासमझी

    Apoorva Pratap Singh

    मेरा दोस्त है पारीक, उसने पिछले साल मुझे कहा था कि विडम्बना है कि सैनेटरी पैड की कम्पनी अपना नाम व्हिस्पर (फुसफुसाहट) रखती है ! मतलब टैबू मॉडर्निटी के संग संग चल रहा है । कुछ कुछ वैसी ही अक्षय की फिल्म है । अच्छी कोशिश है इससे इंकार नहीं ! खैर ! जब हम एड देखते हैं किसी sanitary पैड्स ब्रांड का उसमें कपड़े की कई प्रॉब्लम्स दिखाई जाती हैं और उनके प्रोडक्ट को बढ़िया दिखाया जाता है । जबकि इन सब ब्रांड्स की manufacturing यूनिट्स में कई स्टैंडर्ड्स का उल्लंघन किया होता है । एक नैपकिन में 80 प्रतिशत सामान प्रदूषित या संक्रमित होता है । उसकी खुशबू और सफा सफेदी देख कर हम उसे साफ़ मानते हैं । इन सबको हटा भी लें तो कुछ भी recyclable नही होता।

    भारत में माहवारी सम्बन्धी स्वच्छता की कमी है, उसे भरने हेतु सैनेट्री नैपकिन्स की पहुँच बढ़ाने की मुहिम चल रही है। पर असल में हम सब धरती को नुकसान पहुंचा रहे हैं । हर महीने अकेले हमारे देश में ही 60 लाख बिलियन से ऊपर माहवारी सम्बन्धी कचरा पैदा होता है जो कि सैनिटरी पैड्स और टैम्पून्स की देन है । सभी को देश के वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम का हाल मालूम है, यह इस्तेमाल किये हुए प्रोडक्ट्स बीमारियां बढाने में अभूतपूर्व योगदान देते हैं। इन कन्वेंशनल पैड्स के जन्मदाता अमेरिका और यूरोप इस प्रदूषण से बचने के लिए महिलाओं को कपड़े के पैड्स के लिए उत्साहित कर रहे हैं। जहां हम सैनिटरी नैपकिन रिवोल्यूशन की बात कर रहे हैं, वही वे इससे मुक्ति के लिये मुहीम चला रहे हैं क्योंकि उन्हें इसके हानिकारक परिणाम डरा रहे हैं।

    Apoorva Pratap Singh

    अभी बाजार मे Biodegredable पैड्स आ रहे हैं जो सस्ते हैं। रीयूजेबल भी हैं लेकिन इनकी सफाई अच्छे से सम्भव नहीं है क्योंकि ये कई परतों में सिले हुए होते हैं जिससे उनको धूप नही मिलती । इसीलिए सिर्फ एक बिना सिला सूती कपड़ा सबसे अच्छा ऑप्शन है, जिसके सारे फोल्ड्स को खोल कर में सुखाया जा सकता है या मेंस्ट्रुअल कप्स हैं। आप शायद कहेंगे कि यह आपकी दिनचर्या से मैच नही करता लेकिन अगर आप सोशल मीडिया इस्तेमाल कर रहे हैं तो अधिकतर बार सम्भव है कि आप के घर ऑफिस में टॉयलेट्स भी होंगे और जब ऐसा नही हो तो भी कई उपाय निकाले जा सकते हैं।

    मेरा यह सब लिखने का कारण है जो सबसे प्रमुख वो है पर्यावरण का दूषित होना और आँखे मूंद कर बाजार की हर बात को सही मान लेना. दूसरा यह सोचिये कि हम अपने दूसरे टैबूज़ में से निकल कर एक नए टैबू, (कपड़ा इस्तेमाल करने से परहेज या योनि में कप फिक्स करने में हिचकिचाहट ) में तो नहीं घुस रहे । जैसे WASH जो एक NGO है एक रेड हट नामक पहल कर रहा है जिसमें वो औरते रहेंगी जो माहवारी से हैं !!! यह उस पुराने नियम से अलग कैसे हुआ, क्या यह अब पितृसत्तात्मकता को मॉड तरीके से सहलाना नही होगा !!! क्या हमारी जरूरतें बाजार तय कर रहा है? क्या पैड्स इकोनॉमिकली गरीब तबका अफोर्ड कर पायेगा और अगर फ्री में मुहैया करा भी दें तब भी वो हानिकारक है।

    हमें खुद और दूसरों को, संग पढ़ने, काम करने वालियों को प्रेरित और जागरूक करना चाहिए ।

  • नेताजी : नारे जो झूठ साबित हो गए

    नेताजी : नारे जो झूठ साबित हो गए

    K Krishan Anand

    तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा
    ये पूरा नारा ही झूठ साबित हो गया। आजादी मिल तो गई, लेकिन वो खून के रास्ते नहीं मिली। इस नारे का एक भी शब्द आजादी मिलने का तरीके और रास्ते में नहीं जुड़ पाया। ये नारा और इसके पीछे के विचार को ही सच साबित करने का मौका, नेताजी सुभाष चंद्र बोस को नहीं मिल पाया। अगर मिल भी पाता तो शायद सही नहीं होता कि उनका ये नारा… उस वक्त के हालात में कारगर साबित नहीं हो रहा था, वो इस नारे को सच साबित करने की कोशिश भी करते तो कामयाब नहीं हो पाते। अब ये वक्त की और भाग्य का लेख था कि ऐसा नहीं हआ और सुभाष चंद्र बोस…  आजाद भारत में भी नेता जी सुभाष चंद्र बोस रह गए। ये अलग बाद है कि उन्हें इससे ज्यादा और राष्ट्रीय सम्मान के साथ जगह मिलनी चाहिए थी।

    K Krishan Anand

    आपको क्या लगता है, काग्रेस ने अंग्रेजों से लड़ाई लड़कर देश आजाद करवाया?
    दुनिया का इतिहास देखिए, किसी भी देश में ये मुमकिन नहीं हुआ है। गुलामी से छुटकारा मालिक की मर्जी से ही मुमकिन है। उनसे बातचीत करके, बतियाके। तभी एक गुलाम व्यवस्था, अपने पैरों पर खड़ा स्वतंत्र गणतंत्र बन सकता है।

    हर ट्रांसफर-पोस्टिंग में चार्ज हैंडओवर-टेकओवर होता है।
    ये एक व्यवस्था को दूसरे के हाथ सौंपने का तरीका है। अब मान लीजिए एक थानेदार अपनी बदली के बाद उत्तराधिकारी के आये बिना ही अपना बोरिया बिस्तर समेट चला जाए। अब जब नया थानेदार आएगा तो वो क्या करेगा, वो कर ही क्या लेगा। उसे हालात समझने में दो साल लगेंगे तबतक थाने के इलाके में गुंडों का राज चलेगा।

    व्यवस्था से उग्रता से लड़कर, दुश्मनी भरी खूनी संघर्ष करके, आजादी पाना दरअसल, स्वतंत्रता नहीं, स्थापित व्यवस्था पर कब्जा करना है, जिसे तख्तापटल कहते हैं। हमलावर और विजयेता यही करते हैं। तख्तापटल के तरीके से जब भी कोई सत्ता परिवर्तन हुआ है,  नतीजे में एक अराजक, शासनहीन व्यवस्था ही स्थापित हुई है। जिसका आखिरी नतीजा गणतंत्र नहीं, तानाशाही हुआ है। उग्र तानाशाही से शांत गणतंत्र तक यात्रा, एक बेहद तकलीफदेह और लंबी प्रक्रिया है।

    तो कांग्रेस ने अंग्रेजों से आजादी के पहले के कई दशकों तक मित्रतापूर्वक विरोध जताया, बातचीत की। उन्हें देश छोड़ जाने के लिए मनाया, सहमत किया और आखिरकार बाध्य किया। खुद नेता जी इस प्रक्रिया में कांग्रेस के साथ थे। किसी भी देश के लिए, अपनी सत्ता खुद संभालने का ये सबसे सहज और जरूरी तरीका है। हमें अंग्रेजों से केवल आजाद नहीं होना था, उसने शासनकरना भी सीखना था।

    परिवार में बंटवारा होता है। अच्छे परिवार में मालिकाना हक बातचीत से… साथ रहते, तय होता है और बदल जाता है।

    बुरे परिवारों में रातों-रात दो भाई आपस में बांट लेते हैं। परिवार का मुखिया जो कि बाबा होते हैं, वो अपने पटिदारों को जमीन, कर्ज, खेती, संपत्ति के बारे में कुछ नहीं बताते, बांट देते हैं। रातोरात हुई ऐसी बांट बाद परिवार पर मुसीबत टूट पड़ती है। बांटनेवाले सभी लोगों को (बाबा को छोड़) सबकुछ फिर से शुरू करना पड़ता है। उत्तराधिकार जब ऐसे हस्तानांतरित होता है तो भाई भाई एक दूसरे के खून के प्यासे हो जाते हैं, हत्याएं होती हैं।

    उत्तराधिकार के हस्तांतरण का सही तरीका है… उत्तराधिकारी को धीरे-धीरे सारी व्यवस्था समझा-बुझा, बतलाकर, सत्ता उसे सौंपकर कूच कर जाना।

    तो आजादी के लिए, आखिरी के दस साल अंग्रेजों से मित्रवत बातचीत की गई, उनसे कोई दुश्मनी नहीं थी।

    अब नेताजी सुभाष चंद्र बोस…
    वो सेना बनाके देश को आजादी दिलाना चाहते थे। अंग्रेजों पर चढ़ाई करके। इसके लिए वो दूसरे विश्वयुद्ध के ब्रिटेन के दुश्मन… जापान और जर्मनी के नेताओं से मिल चुके थे। वो अंग्रेजों के दुश्मनों से मिल रहे थे। मुश्किल बात थी कि हमें आजाद तो अंग्रेजों से होना था।

    अंग्रेजों से भारत को आजादी दिलानी थी। जो बातचीत से ही मुमकिन थी। कहीं बातचीत का ये रास्ता बंद हो जाता और अंग्रेज जाने से मना कर देते, तो आजादी कुछ और बरसों के लिए टल जाती। कम से कम उस पीढ़ी में तो वो नहीं ही मिलती।  

    अंग्रेजों से बातचीत चल रही थी।
    और नेता जी, उनके दुश्मनों से मिल रहे थे। बस यही दुविधा की स्थिति थी कांग्रेस के लोगों के लिए। वो अगर नेता जी के साथ साफ-साफ अपना रिश्ता रखते तो अंग्रेजों को ये धोखाधड़ी लगता कि हम स्वेच्छा से सबकुछ बढ़िया से सौंप कर जाना चाहते हैं और ये हमारे दुश्मनों से मिल रहे हैं…. जाओ नहीं करते हम आजाद!

    इससे ऐसा नहीं होता कि हम आजाद नहीं हो पाते, आजादी आते-आते कुछ और दिनों से टल जाती। अंग्रेजों को फिर से मनाना पड़ता, बातचीत की पूरी प्रक्रिया फिर से दोहरानी पड़ती। इसे खेल बिगड़ जाना कहते हैं।

    हम अंग्रेजों से उनका भारत जीतना नहीं चाहते थे। उनको अपने भारत से भगाना चाहते थे। जब कोई समान, जगह आप लूटेंगे… तो उसका राजनैतिक और विधिक कानूनी हस्तांनांतरण नहीं करेंगे उसपर जबरन कब्जा करेंगे तो लूट के बाद उस पर दावेदारी के लिए मारकाट मच जाएगी और सब तहस नहस हो जाएगा। जो ताकतवर होगा उसका अधिकार होगा। लेकिन ये जनता का नहीं… विजेयता का शासन होगा। आजादी के बात विभाजन यही बात थी… देश की लूट। लेकिन अगर वो समझौतापूर्ण और विधिवत नहीं होकर, युद्ध से होती तो देश की केवल विभाजन का दंश ही नहीं झेलना पड़ता। अंग्रेजों पर विजय की कीमत देश की बर्बादी होती। हम खुद ही इसे नेस्तनाबूत कर देते कि हमको स्वशासन का अनुभव ही नहीं था।

    हम अपनी ही इंसानी फितरत पर गौर करें तो…
    तो अगर किसी सरकारी दफ्तर में या कोई व्यक्ति आपसे काम करवाना चाहता हो। काम आपके कब्जे में है, आप उसका काम कर देने के लिए तैयार भी हैं। इसी बीच वो आदमी किसी बड़े अधिकारी, जिससे आपकी बनती नहीं, उस अधिकारी की सिफारिश लेकर आ जाए। या वो आपके दुश्मन से मिलकर आप पर दवाब डालने की कोशिश करे, ब्लैकमेल करने का प्रयास करे तो क्या करेंगे आप? उससे डर कर उसका काम फौरन कर देंगे या खींजकर उसका काम करने से मना कर देंगे और कहेंगे कि अब जब होता तब होगा तुम्हारा काम?

    विचार कीजिएगा… ईमानदारी से…. इंसान की सामंतवादी सोच ऐसे ही काम करती है। दबाव और ब्लैकमेलिंग से वो खीज उठता है और जो काम वो करनेवाला होता भी होता है, उसमें भी अड़ंगा लगा देता है। हमारी भ्रष्ट व्यवस्था में ये बात खूब होती है। रिश्वतखोरी की हर कोशिश में हम इस बात का ध्यान रखते हैं का काम बिगड़े नहीं।

    तो कांग्रेस बात कर रही थी और नेता जी अंग्रेजों के दूसरे विश्वयुद्ध के दुश्मनों से मिल रहे थे।

    ऐसे में नेताजी का रुख कांग्रेस के लिए मुसीबत खड़ी कर रहा था। सो उसने नेता जी से अपनी दूरी बना ली. नरम-दल, गरम-दल याद तो होगा ही। अब दिक्कत ये हो गई आजादी के बाद भी ब्रिटेन के साथ कांग्रेस की नरमी बनी रही। जो स्वभाविक भी था। अच्छा मकान मालिक, अपने पुराने किरायेदारों से भी रिश्ता बढ़िया बनाए रखता है। बुरा मकान मालिक… मौजूदा किरायदार से भी टंटा किए रहता है।

    अब आजादी के बाद भी कांग्रेस, अंग्रेजों से जुड़ी रही, मजबूरी सत्ता से संचालन में मदद की होगी। मजबूरी जो भी हो, लेकिन उसे आजादी के बाद उसे नेता जी को नकारना नही चाहिए था। यही उसने मूर्खता की।

    नेता जी का तरीका चाहे जो भी हो, वो लड़ना इस देश के लिए ही चाह रहे थे। उनका तरीका उस समय के लिहाज से उचित भले ना हो, लेकिन उनकी मंशा एकदम दुरुस्त और सही थी। तो कांग्रेस को… आजादी के बाद नेता जी को जोड़ लेना चाहिए था। लेकिन उसने जापान और जर्मनी से उनके रिश्ते और ब्रिटेन से अपने रिश्ते को ही अहम मान-समझ लिया। ये बात सही नहीं हुई।

    भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और उनके सहयोगियों के साथ भी, ऐसा ही किया गया। ये सही नहीं था। आजाद देश को एक आजाद देश की तरह व्यवहार करना चाहिए। देश से ये भारी चूक हुई।

    रामेश्वरम में सेतु बनाने में श्री राम ने गिलहरी के योगदान का भी आदर किया, भले ही वो प्रभावकारी नहीं था। पर श्रीराम ने उस छोटी गिलहरी की कोशिश का मजाक उड़ानेवाले और उसे खारिज करनेवाले वानरों को डपटा था।

    उस वक्त नेता जी ने ऐसा क्यों किया? कांग्रेसियों ने ऐसा क्यों किया?
    इसकी सफाई समझाने उनमें से कोई भी यहां नहीं है। तो हम उनकी विवशताओं, और विचार का केवल अंदाजा ही लगा सकते है।

    This article is originally published at the blog of K Krishan Anand.

  • अमन और मुहोब्बत का पैगाम देता ‘मिया बीवी और वाघा’

    अमन और मुहोब्बत का पैगाम देता ‘मिया बीवी और वाघा’

    Vidya Bhushan Rawat

    आज बहुत दिनों बाद लाइव परफॉरमेंस देखी. इंडिया हैबिटैट सेण्टर में दुबई से आई गूँज की प्रस्तुति मिया बीवी और वाघा ने हम सभी को एक आइना भी दिखाया जो आजकी मशीनी दुनिया में रिश्तो को मात्र पैसो से जोड़कर देखती है, जहाँ ‘सफलता’ के लिए हम सब जगह जाते हैं, सब प्राप्त करते है लेकिन प्यार से बातचीत के लिए समय नहीं है. आमना खैशगी और एहतेशाम शाहिद के प्यार में सरहदों की नकली दीवार टूट गयी लेकिन दोनों को सरहद के दोनों और जो दिखाई दिया उसका साधारण मतलब यही के अगर वाघा की लाइन न हो तो भारत और पाकिस्तान के लोगो की आदतों से लेकर रहन सहन खान पान के तौर तरीके एक जैसे है, लेकिन आज दोनों देशो में जो जंग का माहौल है वो ये ही दिखाने की कोशिश करता है के जैसे बॉर्डर के उस पार सभी आतंकवादी है, दुश्मन है और जंग चाहते है. मतलब ये के तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा कूट कूट कर पैदा की गयी नहीं दीवारों को ढहाना असंभव तो नहीं है लेकिन मुश्किल तो जरुर है हालाँकि दो मुल्क जिनका एक इतिहास रहा हो, उनके हुक्मरानों की लाखो कोशिशो के बावजूद भी ऐसा शायद नहीं हो पायेगा और लोगो को आखिरकार समझ आएगी लेकिन कब ?

    Vidya Bhushan Rawat

    मैं भी उन लोगो में शामिल हूँ जिन्होंने बहुत चिट्ठिया लिखी और उनका इंतज़ार भी किया. मैंने भी प्रेम किया और शायद उस दौर में हर दिन एक पत्र भी लिखा होगा और फिर इंतज़ार भी किया होगा. उनकी संख्या बहुत है. पत्रों में एक गर्माहट होती थी जो शायद रुखी सुखी इ मेल में नहीं होती. शायद ईमेल अब आपके अन्दर की भावनाओं को उतना नहीं निकाल पाती जितना खतो के लिखने में होता था. कारण साफ़ था, एक चिट्ठी में व्यक्ति अपना दिल उड़ेल देता था क्योंकि सूचनाओं के साधन कम थे , और इसमे डाकिये भी ख़ास रोल अदा करते थे. गाँवों में जहाँ पढने वाला न हो तो वो चिट्ठी पढ़कर सुनाते भी और गाँव में अन्य खबरों की भी खबर रखते थे. आज सूचना तंत्र के दौर में बड़ी क्रांति ने सूचनाओं के आदान प्रदान को तो मजबूती प्रदान कर दी लेकिन दिलो के रिश्ते शायद कही न कही सूख रहे है, भावनाए शायद व्यक्त नहीं हो पा रही है या हो सकता है के उनके लिए सबके पास समय न हो. इसकी खूबसूरत अभिव्यक्ति भी इस नाटक में हुई है.

    भारत और पाकिस्तान के रिश्तो में सरकारी तौर पर चाहे जो कुछ हो लेकिन आम लोगो के रिश्ते बने हुए है हालाँकि पिछले कुछ वर्षो में ये दूरिया बढ़ चुकी है और अमन के लिए काम करने वाले लोगो को ‘देशभक्त’ लोग देश के दुश्मन बता रहे है. आमना और एहतेशाम जिस दौर में अपने प्यार को एक मुकाम तक पहुचाने की कोशिश कर रहे थे उस वक़्त भी हालत बहुत अच्छे नहीं थे परन्तु ये कह सकते है के आज से बेहतर थे. ये वो दौर था जब हम पांच या छः साथियो ने जो कभी एक दुसरे को शायद ही मिले हों दक्षिण एशिया में शांति और भाई चारगी के लिए कुछ साथ करने का प्रयास किया जो हमारी सीमाओं में रहकर था क्योंकि सभी युवा थे और बिना किसी ‘खानदानी’ बैकग्राउंड के और वो इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि भारत पाकिस्तान के रिश्तो में इन खानदानी बैकग्राउंड के बहुत मायने है. वो ही सेकुलरिज्म की बात कर सकते है जो खानदानी है और सरहद के दोनों और मीडिया में जिन्हें खानदानी वारिश बैठे हो. मतलब ये नहीं के दोस्ती के हिमायती वे ही लोग नहीं है जिन्हें आप टीवी या अखबारों में पधते है या देखते है, उनके अलावा भी बहुत लोग है जो मुहब्बत का पैगाम देना जानते है और चाहते भी है.

    आमना और एहतेशाम ने अपने खतो के जरिये व्यवस्था, संकीर्णताओ पर कटाक्ष किया है और दिखाया के कैसे हमारे समाज में दूसरो के बारे में स्टीरियोटाइप किया जाता है. जब शादी के बाद वो भारत आये और बिहार गयी तो ऐसा लगा के पूरा गाँव उसको देखने आया के ‘पाकिस्तानी’ बहु कैसे है. और सब उसको ये कहते के बहुत तो तुम्हारे जैसे ही चाहिए लेकिन पाकिस्तानी नहीं. कराची में उनके यहाँ पे भी ऐसे ही हालात थे जो उसको कहते के पाकिस्तान में लडको की कमी हो गयी थी जो हिन्दुस्तानी से शादी कर रही हो. अपने ससुराल में आमना ने अपनी मम्मी को लिखे ख़त में कहा के ‘यहाँ तो सुबह शाम सब्जिया ही बनती रही है और मैं तो ‘बोटी’ खाने को तरस गयी हूँ.’

    आमना की दादी लखनऊ से थी और शायद विभाजन के बाद भी, वर्षो कराची में रहते हुए भी उनकी जुबान से लखनऊ शब्द कभी नहीं गया और घर के अपने ड्राईवर को भी वह चन्दन नाम से पुकारती और उसे कभी भूल नहीं पायी. एहतेशाम का अपनी मम्मी को लिखा पत्र बहुत मर्म था क्योंकि ये हम सबकी कहानी है. कैसे हम तरक्की के वास्ते घरो से दूर चले जाते है, हमारे माँ, हमारे लिए सब कुछ छोड़ देती हैं और जब हम इस लायक होते हैं के उन्हें कुछ ख़ुशी दे पायें तो वो हमें छोड़ कर चले जाते हैं.

    इस नाटक के अंत में वाघा का सांकेतिक इस्तेमाल किया गया है जो बहुत बेहतरीन है. वाघा भारत और पाकिस्तान को जोड़ने वाला भी है लेकिन दूर करने वाला भी है. वाघा की परेड अब असल में भारत पाकिस्तान का वन डे मैच बन चूका है. पाकिस्तान पैन्दाबाद और हिंदुस्तान जिंदाबाद के नारे अपने अपने और लगते रहते है. दोनों और के फौजी जोर जोर से बूट बजाते है. ये समझ नहीं आया के ये नाटक क्यों ? इस नाटक में क्या आनंद है ? क्या ये एक दुसरे को नीचा दिखाने के लिए है या एक दुसरे का मनोरंजन करने के लिए है ? मुझे तो नहीं लगता के वाघा से किसी का मनोरजन होता है ओर सरहद के दोनों और हम किस प्रकार के नागरिक पैदा करेंगे वो तो अब दिखाई दे रहा है.

    आज माँ बाप बच्चो को भी ये ‘मैच’ दिखाने ले जाते है. दरअसल, आज वाघा हर गाँव और कसबे में बन गया है. देशभक्ति के जरिये हम अब वाघा पैदा कर रहे हैं . कासगंज से लेकर और कोई जगह, ये देशभक्ति का नया संस्करण है जब देशभक्ति के नारे किसी को चिढाने के लिए बनेंगे. शान्ति और सौहार्द की बात करने वाले दोनों देशो में ‘देशभक्तों’ के निशाने पे होंगे.

    अभी दो दिन पहले ही पाकिस्तान के एक साथी ने बताया के उनके यहाँ भारत पाकिस्तान की शांति और सौहार्द की बात करने वालो को उठवा लिया जाने की सम्भावना रहती है. भारत में भी हम अब ‘तरक्की’ कर रहे है’, हमारे पास अब केवल पुलिस ही नहीं है, अब तो थर्ड डिग्री के लिए हमें एक लोकतान्त्रिक माहौल मिल चूका है. अर्नब गोस्वामी केवल एक व्यक्ति नहीं है, एक विचार बन चूका है जिसके थर्ड डिग्री ट्रीटमेंट ने पुलिस का काम आसान कर दिया है.

    इस नाटक की खूबसूरती इस बात में है के ये एक तिलिस्ल्मी कहानी नहीं है हकीकत है. इसके पात्रो ने इन बातो को देखा और झेला. उनकी संजीदगी है के ये ख़त हम सबके लिए सोचने समझने के लिए बहुत कुछ छोड़ते है. अपने देश से दूर रहकर जुबान को जिन्दा रखने की इस कोशिश का स्वागत होना चाहिए. मेरे लिए ये देखकर बहुत से यादे ताज़ा हो गयी क्योंकि वही दौर था जब हम लोग बहुत बाते करते और भारत पाकिस्तान के मौजूदा हालत पर कुछ नया करने की सोचते और यही से आमना मेरी छोटी बहिन बनी जिसके साथ मैंने शायद अपनी हर बात शेयर की हो. ये रिश्ता इतना मज़बूत हो गया के महसूस हो गया के दिल के रिश्ते खून के रिश्तो और सरहदों से बड़े होते है. पहली बात ये शो दुबई से बाहर आया और उर्दू के शहर दिल्ली में. हालाँकि आज के दौर में जब उर्दू को विभाजन की और मुसलमानों की जुबान कहकर आग बबूला होने वालो की तादाद बहुत ज्यादा है लेकिन हकीकत ये है के उर्दू अदब ने हिन्द को बेहद मिठास थी. कल्चर का कोई मज़हब नहीं अपितु ये हमारी जुबान, खान पान, रहन सहन होता है और अगर वाघा की लाइन को हटा दे तो क्या फर्क है दोनों मुल्को में.

    मैं जानता हूँ के शादी के वक्त दोनों को बहुत दिक्कत हुई लेकिन ये दिक्कत केवल इस बात से नहीं थी के भारत और पाकिस्तान का मसला था. शायद, इस हिस्से को उन्होंने छोड़ दिया के एक पठान लड़की बिहारी लड़के से कैसे शादी करेगी का जाति और वर्ग इस सवाल भी उनके परिवारों में था. इसलिए मैंने कहाँ, जहां दोनों जगह पर उर्दू की मिठास है वही सामंतशाही दोनों जगहों पर ज़िंदा है, शायद पाकिस्तान में हम से ज्यादा .मैंने कल लिखा था के हमारे मुल्को में साथ चलने और काम करने के बहुत उदाहरण है लेकिन हामारे एब भी एक जैसे ही हैं और उन सब को हम तभी ख़त्म कर पाएंगे जब इन सवालों पर लगातार गुफ्तुगू करें और बातचीत जारी रखे. बातो को दिल के अन्दर रख देने से केवल शक बढ़ता है जो दूरिया बढ़ता है. तरकी के वास्ते दिलो की सरहद को तोडना पड़ेगा और हर गली मुहल्ले में बन रहे वाघाओ को भी हटाना पड़ेगा, वो वाघा नहीं बाधा बन रहे है.

    मिया, बीवी और वाघा के ये शो जगह जगह होना चाहिए. दिल से की गयी एक बेहद खूबसूरत प्रस्तुति और इसके लिए पूरी टीम को बहुत बहुत शुभकामनायें. ये कह सकता हूँ के जहाँ मिया और बीवी के रोल में एहतेशाम और आमना ने अपनी भूमिकाओं के साथ पूरा न्याय किया वही वाघा के रोल में माजिद मुहोम्मद ने बहुत बेहतरीन भूमिका निभायी और सबको अंत तक कहानी से जोड़े रखा. पोस्टमैन के छोटे से रोल में फ़राज़ वकार ने बहुत प्रभावी भूमिका निभाई. एक बार फिर सभी को एक अच्छी प्रस्तुति के लिए बधाई और उम्मीद करते है के ये टीम नए नए आइडियाज लेकर आज के खुश्क माहौल में उम्मीद का परचम लहराएगी ताकि तैयार हो रहे वाघाओ को कम किया जा सके.


  • सबसे अश्लील और ‘अंतिम’ कविता

    सबसे अश्लील और ‘अंतिम’ कविता

    Ma Jivan Shaifaly[divider style=’right’]

    यह मेरे जीवन की
    सबसे अश्लील और ‘अंतिम’ कविता है
    जब मैं अपने स्थूल भगोष्ठों पर
    तुम्हारी चेतना के सूक्ष्म स्पर्श को
    अनुभव करते हुए
    ब्रह्माण्डीय प्रेम के
    चरम बिन्दु को छू रही हूँ
    जहाँ दो देहो के मिले बिना
    आत्म मिलन की संतुष्टि की गाथा
    लिखी जाएगी
    कामसूत्र के
    अदृश्य ताम्रपत्रों में
    और उकेरी जाएगी
    खजुराहो मंदिर के गर्भ गृह में
    जहाँ तक कभी उस मंदिर की दीवारों की कला
    भी नहीं पहुँच पाई

    Shaifaly Nayak

    क्योंकि अब हम कला की देहरी को भी
    पार कर चुके हैं
    भंग कर चुके हैं
    साहित्य की सीमा को भी
    अध्यात्म तो हमारी लापरवाही की फूंक भर है..
    क्योंकि मेरे कानों के पीछे
    तुम्हारी एक प्रेम भरी सांस की कल्पना में ही
    मेरी मुक्ति की पूरी गाथा लिखी जा चुकी है

     

  • अन्धविश्वास का राजनीतिक कुचक्र

    अन्धविश्वास का राजनीतिक कुचक्र

    Vidya Bhushan Rawat

    डार्विन के सिद्धांतो को माननीय मंत्री जी के ख़ारिज करने के बाद से मानो भूचाल आ गया है. देश के वैज्ञानिको ने कहा के सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए और मंत्री जी के वक्तव्य पर तरह तरह की प्रतिक्रियाये आ रही है लेकिन फिर एक बात कहना चाहता हूँ के क्या मंत्री ने जो कुछ कहा वो अचानक मुंह से निकली कोई बात थी या ये सब बड़ी सोची समझी रणनीति के तहत हो रहा है, इस पर चर्चा करने की जरुरत है. ये बिलकुल तैयार की गयी साजिश के तहत हो रहा है और इसलिए इस युद्ध में सबको उतरना चाहिए क्योंकि ये भारत के भविष्य का प्रश्न भी है क्योंकि संघ और उनके दस्ते भारत को मनुवाद के गर्त में धकेलना चाहते है. शायद जैसे जैसे सत्ता ब्राह्मणवाद के चंगुल से बाहर निकलने के प्रयास करेगी, वापस उस ‘स्वर्णिम’ अतीत की तरफ हमें धकेलने की कोशिश होगी जो किसी के लिए स्वर्णिम था और बहुसंख्य लोगो के लिए अतातातियो का हिंसक और भेद्जनित राज्य. ये केवल डार्विन का सिद्धांत नहीं है असल में इसको ख़ारिज करने की आड़ में मनुवाद को लादने के प्रयास भी है. मंत्री जी संघ के आदेश के बगैर कुछ बोल भी नहीं सकते और नागपुरी महंतो को ही खुश करने के लिए कह रहे थे. आज कल अपनी निष्ठां दिखाने का समय भी है इसलिए ऐसे पापड़ भी बेलने पड़ते है.

    मत भूलिए के आप उस दौर में हैं जहा भारत के युवाओं को भविष्य की तैय्यारी नहीं अपितु भूत के आगोश में समेटने की कोशिश है. तीन हज़ार साल पुराणी संस्कृति की बाते हो रही है और रोज रोज कोई न कोई महापुरुष या महिला हमें प्रवचन दिए जा रहे है. अब मुंबई में रिलायंस के बड़े अस्पताल के उद्घाटन अवसर पर ये भाषण किस ने दिया, ‘ महाभारत का कहना है कर्ण माँ की गोद से पैदा नहीं हुआ था. इसका मतलब ये है के उस समय जेनेटिक साइंस मौजूद था. हम गणेश जी की पूजा करते है कोई तो प्लास्टिक सर्जन होगा उस ज़माने में जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का शरीर रख कर प्लास्टिक सर्जरी का प्रारंभ किया होगा.’ मुझे बताने की जरुरत नहीं है के ये महान वक्तव्य किनका है ये अक्टूबर २०१४ में दिया गया और इसका प्रचार भी हुआ क्योंकि संघियों ने इस पर कहा के हमारे यहाँ तो सब कुछ मौजूद था. वैसे भी संघ की पाठशालाओ में आपको भारत की महान वैज्ञानिक उपलब्धियों के बारे में हमेशा से ही पढाया जाता है.

    वैसे पिछले तीन चार वर्षो में भारत की महानता का बखान करने की बीमारी लाइलाज हो चुकी है. अपनी संस्कृति और सभ्यता पर हम सभी को गर्व होना चाहिए और ये अभिप्राय भी नहीं होना चाहिए के हमारे पूर्वज सभी गधे थे लेकिन केवल आत्ममुग्धता में अपने भूत की सभी बातो को स्वर्णिम सोचना भी उतना ही बेवकूफी वाला है जितना के सबको ख़ारिज कर देना .

    Vidya Bhushan Rawat

    अब डार्विन के सिद्धांतो को तो अमेरिका में राष्ट्रपति ट्रम्प की पार्टी के नेताओं और चर्च ने पुर्णतः ख़ारिज कर दिया और टर्की में एंड्रोजन के आने के बाद वह के इस्लामिक कट्टरपंथी ‘चिंतको’ ने भी ख़ारिज कर दिया तो भारत के हिन्दू कट्टरपंथी क्यों कम हो. वो तो मुस्लिम और ईसाई बड़बोलो से कम्पटीशन कर रहे है . लेकिन जहा अमेरिका में लोग अपने जीवन में विज्ञानं के महत्व को जानते है और बीमार होने पर डाक्टर के ही पास जायेंगे हमारे देश के महान बाबा जो खुद थोडा सा बीमार होने पर अलोपथिक डाक्टर के पास जाते है वे अपने चेलो को संस्कृति के नाम पर झोला छाप डाक्टर की गोद में धकेलते है.

    खतरा ये नहीं के मोदी या उनके मंत्री क्या कह रहे है. सबसे बड़ा खतरा है के मीडिया क्या कह रहा है. वो राम, रावण,सीता, सुपर्न्खा के घर गुफाये ढूंढ रहा है. साहित्यकार हमारे प्राचीन वैज्ञानिक उपलब्धियों का महिमामंडन कर रहे है और माननीय न्यायमूर्ति लोग मोर के आंसुओ से मोरनी को गर्भवती करेंगे तो हमारे चिंतन का स्तर पता चल जाता है.

    वैसे मोदी जी ने जो प्लास्टिक सर्जरी की बात की वो तो वाकई में सच है. आखिर हमारे सभी देवी देवता तो साधारण मनुष्यों की तरह नहीं दीखते. विचार में चाहे वे बिलकुल साधारण हो लेकिन चाल ढाल रंग रूप में तो वे असाधारण ही है. आखिर अभी तो पसीने से गर्भवती होने के कही वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है लेकिन हमारे ग्रंथो में तो है. आदमी के सर पर हाथी का सर ही एकमात्र सर्जरी नहीं है. गाय के शरीर पर औरत का सर भी है. दस सर किसी के नहीं हो सकते है क्योंकि एक ही संभालना मुश्किल है तो दस कैसे संभलेंगे लेकिन हमारे यहाँ तो है. भारी भरकम देव भी पतले से चूहे को अपना वहां बनता है और उल्लू भी वाहन है. तो जो दुनिया में कही नहीं हो सकता वो भारत में हुआ है और आगे भी होता रहेगा . आखिर धर्म का इतना बड़ा फलता फूलता धंधा भला दुसरे किसी देश में मिलेगा. इस्लामिक मुल्ले आग उगलते है हेयर और जन्नत में हूरो के इन्तेजार में लोगो को धर्म के नाम पर आग उगलवाते है लेकिन हमारे बाबाओं ने तो अपने विशाल साम्राज्यों को ही ‘जन्नत’ बना दिया है. लोग लुटते है, पिटते है लेकिन फिर भी उनके साम्राज्यों पर असर नहीं. एक अगर किसी आरोप में बहुत मुश्किल से जेल भी जाता है तो दर्जनों नए पैदा हो रहे है और अब तो महिलाए भी इस ‘क्षेत्र’ में आगे आ रही है.

    भाइयो और बहिनों, डार्विन के सिद्धांतो को मंत्री महोदय के ख़ारिज करने से परेशान मत होइए क्योंकि आपके कहने से वे रुकने वाले नहीं. देश में मानववाद ख़त्म करके मनुवादी व्यवस्था लाने के लिए तो वो सब करना पड़ेगा जिससे आदमी के सोचने समझने की शक्ति ख़त्म हो जाए. आखिर जब इतनी बड़ी संख्या में सोचने वाले लोग हैं तो सवासौ करोड़ लोगो को सोचने की जरुरत क्या है. अगर वो सोचना शुरू कर देंगे तो बॉलीवुड, मीडिया, क्रिकेट सब का धंधा चौपट हो जाएगा. इसलिए सोचना नहीं है. सोचोगे तो फिल्म, क्रिकेट, बाबा, टीवी, अख़बार सबसे छुट्टी लेनी पड़ेगी और ये तो बहुत दुखदायी है न. माँ, बाप, दोस्त, किताबे, विचार सब छोड़ देना पर टीवी, सिनेमा, क्रिकेट न छोड़ना, कही ज्यादा सोच लेगे तो मानवीय सोच आ जायेगी. मनुवादी येही चाहते है के आप सोचे नहीं बस व्यस्त रहे और उनकी सूचनाओं के तंत्र पर चर्चाये करते रहे. वो फेंकते रहेंगे और हम हांकते रहेंगे. उनकी क्रियाओं पर प्रतिक्रियाये देते रहेंगे . ये ही सनातन है. आप उलझे रहो और जब बहुत उलझन बढ़ जाए तो अपने हाथ की रेखाओं को दिखवा लीजिये या कोई ताबीज पहन लीजिये. डार्विन वार्विन हमारे बाबाओं के आगे कहा है. वो अब बाबागिरी से आगे बढ़ चुके है अब तो खुली दादागिरी कर रहे है. टीवी उनका, न्यूज़ उनकी, सरकार उनकी, जमीन उनकी, आपका क्या..

    बहुत बड़ा संकट है और जब तक लोग समझेंगे नहीं हम इन बातो को केवल उतने तक ही सीमित करेंगे के एक मंत्री ने कुछ कह दिया. ये मंत्री जी ने न गलती में कुछ बोला और न ही अचानक. पूरा प्लान है आपको धर्म और अन्धविश्वास के जाल में फंसाने का ताके बुद्धा,आंबेडकर, फुले, पेरियार, भगत सिंह, राहुल संकृत्यायन आदि की जो परम्परा है उससे आपको भटका दे क्योंकि इन्होने तो सवाल किये और न केवल सवाल किये बल्कि अपना विकल्प भी दे दिया..मनुवादी चालबाजी यही है के आपकी समस्याओं का समाधान भी वो स्वयं ही देना चाहता है इसलिए वैज्ञानिक चिंतन और तर्कपूर्ण संस्कृति विकसित करने की जिम्मेवारी हमारी है ताकि हमारे भावी पीढ़ी संस्कृति के नाम पर जातिवादी कूपमंडूकता में न फंसी रहे. याद रहे धार्मिक अन्ध्विशास केवल मात्र अन्ध्विशास नहीं ये राजनीती और कूटनीति है जो लोगो को उनके साथ हुए अन्याय को भाग्य मानकर चुप रहने को मजबूर करती है, उनको व्यस्था से सवाल करने से रोकती है. हमें उम्मीद है भारत की महान तार्किक विरासत के वारिश हम लोग न केवल शिक्षा व्यवस्था अपितु सामाजिक और सार्वजानिक जीवन में अंधविश्वास के जरिये देश के वंचित तबको को और शोषित करने की चालो को समझेंगे और उनका जवाब केवल और केवल बुद्धा बाबा साहेब और अन्य लोगो की तार्किक विरासत पर चल कर और उसे आगे बढ़ाकर ही दिया जा सकता है.


  • छमिया

    छमिया

    Mukesh Kumar Sinha

    “छमिया” ही तो कहते हैं
    मोहल्ले से निकलने वाले
    सड़क पर, जो ढाबा है
    वहाँ पर चाय सुड़कते
    निठल्ले छोरे !
    जब भी वो निकलती है
    जाती है सड़क के पार
    बरतन माँजने
    केदार बाबू के घर !!

    Mukesh Kumar Sinha

    एक नवयुवती होने के नाते
    हिलती है उसकी कमर
    कभी कभी खिसकी होती है
    उसकी फटी हुई चोली
    दिख ही जाता है जिस्म
    जब होती है छोरों की नजर
    पर इसके अलावा
    कहाँ वो सोच पाते हैं
    भूखी है उसकी उदर !!

    आजकल “छमिया”” भी
    जानबूझ कर
    मटका देती हैं आंखे
    साथ ही लहरा देती है
    वो रूखे बालों वाली चोटी
    जो छोरों के दिल में
    ला देती है कहर
    आखिर घूरती आँखों
    के जहर
    से, वो शायद हो गई
    है, बेअसर !!

    “छमिया” आखिर समझने
    लगी है
    मिटाने के लिए भूख
    भरने के लिए उदर
    जरूरी है ये सफर
    अंतहीन सफर !!!

    कुछ शब्द, कुछ दर्द और जिंदगी
     बस इतना ही है मुख़्तसर !

  • नारी तू न हुई नारायणी

    नारी तू न हुई नारायणी

    Dr. Anita Chauhan

    हम समाज से कुरीतियां एवं बुराइयां खत्म करने का उपदेश तो बहुत जोर-शोर से देते हैं लेकिन खुद हम भी उन्हीं बुराइयों का हिस्सा हैं कभी जानबूझकर तो भी अनजाने में। समाज की हर एक बुराई एक-दूसरे से जुड़ी है। जैसे कि दहेज मूल कारण है, भू्रण हत्या का जब किसी के पास एक-दो बेटियां हो जाती हैं तो वह यह सोच कर गर्भ में आई हुई एक और बेटी की हत्या कर देता है कि इससे ज्यादा बेटियों की शादीकरने की उसकी हैसियत नहीं है। यही भू्रण हत्या आगे चलकर स्त्री-पुरूष अनुपात में असमानता पैदा करती है। यही असमानता बलात्कार जैसी दुर्घटनाओं का कारण बनती है। उदाहरण हमारे सामने है। हरियाणा और केरल जहां केरल में महिला अनुपात पुरूषों के बराबर है वहां महिलाओं की स्थिति पारिवारिक, सामाजिक एवं आर्थिक हर क्षेत्र में बेहतर है जबकि हरियाणा जैसे विकसित राज्य में महिलाओं की स्थिति आज भी बद से बदतर बनी हुई है।

    Dr. Anita Chauhan

    ये सच है कि शिक्षा ने महिलाओं को आत्मनिर्भर एवं स्वावलम्बी बनाया है, लेकिन शिक्षित एवं कामकाजी महिलाओं को भी दहेज जैसी बुराइयों से गुजरना पड़ रहा है। हमारे समाज में सभी तरह के व्यवसायों से जुड़े हुए पुरूषों का दहेज ग्राफ तैयार है जैसे शिक्षक का मूल्य 15 लाख, पुलिस-आर्मी वाले का 10 लाख, प्राइवेट नौकरी में लड़का ठीक-ठाक कमा रहा है तो 10 लाख से 20 लाख तक लेकिन अगर इन्हीं पदों पर महिलाएं कार्यरत हैं तो यही दहेज उनके माता-पिता को क्यों नहीं मिलता?  इस मामले में देखा जाए तो लड़की के माता-पिता को दोहरा नुकसान उठाना पड़ता है उन्हें कमाऊँ एवं योग्य बेटी के लिए दहेज भी देना होता है और बेटी की कमाई में अधिकार भी नहीं मिलता वहीं दूसरी ओर बेटे के माता-पिता अपने निकम्मे बेटे के लिए उससे ज्यादा योग्य बहू पाकर भी दहेज की अपेक्षा करते हैं। ऐसा नहीं है कि दहेज लड़की के भरण-पोषण का एक मूल्य है, जो लड़की के माता-पिता वर-पक्ष को विवाह के समय देते हैं। दहेज की मांग तो उन लड़कियों के माता-पिता से भी की जाती है जो स्वयं अपने होने वाले वर से कई गुना योग्य एवं आर्थिक रूप से सबल होती है। जबकि लड़का जो कुछ भी कमाता है उसका कोई भी लाभ उसके ससुराल पक्ष को नहीं मिलता इसके विपरीत महिला की पूरी आमदनी उसके ससुराल वालों को ही होती है।

    तब भी यदि विवाह के समय वह दहेज (वर पक्ष के मुताबिक) नहीं ला पाती तो उसके रूप, गुण, संस्कार, योग्यता एवं जीवन भर लाखों रूपए कमाने के बावजूद भी समय-समय पर अपमान एवं पीड़ा का सामना करना पड़ता है और उसे वो आदर एवं स्थान नहीं दिया जाता जो दहेज लाने वाली बहू को मिलता है। दूसरी तरफ लड़की के माता-पिता भी उसे पुत्र के बराबर शिक्षा देने से इसीलिए हिचक जाते हैं कि जितना खर्च वो बेटी की शिक्षा-दीक्षा में करेंगे उतने में विवाह का व्यय निपट जाएगा। सोचिए महिलाओं को आत्म निर्भर बनाने की मुहिम दहेज कितनी बड़ी रूकावट है ?

    इस वक्त मुझे आज की  उभरती हुई कवियित्री कविता तिवारी की ये कविता याद आती हैं-

    जिम्मेदारियों का बोझ परिवार पे पड़ा तो
    आॅटो, रिक्शा ट्रेन को चलाने लगीं बेटियां
    साहस के साथ अंतरिक्ष तक भेद डाला
    सुना वायुयान भी उड़ाने लगीं बेटियां
    और कितने उदाहरण ढूंढकर लाऊँ
    हर क्षेत्र में शक्ति आजमाने लगी बेटियां
    वीर की शहादत पे अर्थी को कान्धा देने
    अब शमशान तक जाने लगी बेटियां
    कष्ट सहके भी धैर्य धरती हैं बेटियां
    प्रश्न ये ज्वलनशील सबके लिए है आज
     नित्य प्रति कोख में क्यों मरती हैं बेटियां

    महिलाओं की स्थिति परिवार एवं समाज में ही दोयम दर्जे की है। ये स्थिति तो साहब हर क्षेत्र में आपको देखने में आएगी। जहां एक ओर 70 प्रतिशत महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार वहीं हर महिला कहीं न कहीं हर रोज शारीरिक एवं मानसिक शोषण झेल रही है। अगर राजनीति में महिलाओं की हिस्सेदारी पर एक नजर डाली जाए तो वहां भी परिणाम कुछ ज्यादा सुखद नहीं हैं। बड़ी-बड़ी बातें करने वाले राजनीतिक दल आज भी महिलाओं को टिकट देने से हिचकिचाते हैं। आप उम्मीदवारों को आधी आबादी होने के बावजूद भी महिलाओं की स्थिति राजनीति में कुछ खास मकान नहीं रखती। जिताऊ महिला उम्मीदवारों में अधिकांश किसी न किसी राजनीतिक घराने से ताल्लुक रखती हैं। इन्हें तो बस इसलिए चुनाव लड़ाया जाता है ताकि परिवार के हिस्से में एक और सीट आ सके।

    उत्तर प्रदेश के तमाम गांवों में जहां महिला प्रधान हैं वहां कई लोग ऐसे मिल जाएंगे जो अपना परिचय प्रधानपति के तौर पर देते हैं। ये वो लोग हैं जो आरक्षण की वजह से खुद चुनाव नहीं लड़ सके, तो खानापूर्ती के लिए पत्नी के नाम पर परचा भरवा देते हैं। ये लोग अभी भी अपनी पत्नी को घर की चहार दीवारी में कैद किए हुए हैं। जिसको ये भी नहीं पता कि वास्तव में उसके पद का क्या औचित्य है वो सिर्फ एक स्टाम्प मात्र हैं। आज भी हम संसद सत्र पर नजर डालें तो महिलाओं की उपस्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है।

    मैं ये कतई नहीं कहती कि जिस तरह अब तक समाज में पुरूषवादी सोच हावी रही है अब आगे महिलाओं का सर्वोच्च वर्चस्व हो जाए। दरअसल जब तक एक का स्थान ऊपर और दूसरा द्वितीय पायदान पर रहेगा तब तक हम सुन्दर समाज एवं राष्ट्र की कल्पना नहीं कर सकते। हमारा परिवार, हमारा समाज एवं हमारी दुनियां सुन्दर, सबल एवं सफल कहलाएगी। जब स्त्री-पुरूष एक-दूसरे के पूरक बन हर क्षेत्र में कदम से कदम मिलाकर बिना किसी भेदभाव के आगे बढ़ेंगे। अब वक्त आ गया है कि हम अपने परिवार से ही इसकी शुरूआत करें जो स्थान परिवार में बेटे को प्राप्त है वही बहू एवं बेटी को भी दिया जाए। जब हमारी दृष्टि में समानता का भाव आ जाएगा समाज खुद व खुद सुन्दर एवं सामर्थ्यवान बन जाएगा।