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  • ऐसा था वह “रणबांकुरा”

    ऐसा था वह “रणबांकुरा”

    Tribhuvan

    वह 65 साल का था, लेकिन आख़िरी के समय तक उसके चेहरे पर युवाओं जैसी ही आभा थी। वह भले पहले जैसा बलिष्ठ नहीं था, लेकिन किसी को कुछ ग़लत करते देखता तो अभी भी दृढ़ता से फ़टकार लगाने में कहां चूकता था। उसका रौबीला व्यक्तित्व कुछ अलग ही अंदाज़ का था। अफ़सर उससे थर-थर कांपते थे। वह आते तो मंत्री चैंबर छोड़कर निकलना ज़्यादा पसंद करते थे। और अगर सत्तारूढ़ दल से होने के बावजूद कुछ मंत्रियों या विधायकों को पता लग जाता कि “वह” भी इसी ट्रेन से जा रहा है तो वे यात्रा रद्द करना ज़्यादा उपयुक्त मानते थे।

    उसके एक कार्यकर्ता को किसी ने पीट दिया। वह भरे बाज़ार गया पीटने वाले नेता की दुकान पर और उसे फ़िल्मी अंदाज़ में जमकर पीटा। फिर कार में बिठाकर कोतवाली ले गया और सीआई से कहा : हम दोनों ने एक जैसा अपराध किया है। हम दोनों को गिरफ़्तार कर लो।

    Surendra Singh Rathore

    वह एक छोटी पार्टी का बहुत बड़ा नेता था। एक चुनाव में उसके किसी कार्यकर्ता को बड़ी पार्टी के नेताओं ने पंचायत समिति के कमरे में बंद कर दिया। वह अकेला था और सामने करीब ढाई हजार कार्यकर्ताओं के साथ उसके प्रतिद्वंद्वी ताल ठोक रहे थे। वह निडर होकर अकेला उनके बीच जाता है और सब ऐसे तितर-बितर हो जाते हैं जैसे आबादी में कोई युवा बघेरा आ गया हो। वह जाता है और अपने कार्यकर्ता को छुड़ाकर ये जा और वो जा। सब हत्प्रभ। उसकी निर्भीकता सम्मोहित करती थी। जैसे आप किसी फिल्म के दृश्य देख रहे हों। सिखों से उनका मा-जाए भाई का-सा रिश्ता हुआ करता था। दलित और मुस्लिम तो उन पर जान छिड़कते थे।

    प्रदेश की जेलों में गंगानगर के लोग काफ़ी हुआ करते थे। सरदार लोग भोलेपन में कुछ अपराध कर बैठते और फिर पुलिस और जेल के अफ़सरों की बन आती। बीकानेर के एक नामी जेलर साहब ने किसी सरदार को तंग करने में अति कर दी तो उसकी बहन इससे बोली : देख भाई तू कर कुछ भाई का। भाई अगले दिन ही बीकानेर पहुंचा और ऐसा किया कि ये जेलर की कुर्सी पर और जेलर मेज के नीचे।

    जिन दिनों वह सक्रिय था, उसमें ग़ज़ब की फुर्ती थी। वह सौम्य, शालीन और बनावटी किस्म का नेता नहीं था। जो भीतर था, वैसा ही बाहर था। छुपकर कभी कुछ नहीं किया। सब साहस के साथ। चौड़े-धाड़े। जो हूं, वह हूं। उसका रंग, उसकी चाल और उसके बोलने का अंदाज़ सबको दूर से ही मोहित कर लेता था। दोस्त सम्मोहित हाेते थे और दुश्मन चुपचाप किनारे करके दूसरी गली में चले जाते थे। वह हर समय किसी लोडेड एके फोर्टीसेवन जैसा रहता था। न डर, न चिंता और न कोई सावधानी।

    उसकी एक अलग ही छवि थी। अंदाज़ भी बहुत अलग था। बहुत बार खु़द अपने साधारण से घर के एक छोटे से कमरे में बैठा रहता और बाहर कई-कई दिन तक दो-ढाई सौ लोग इंतज़ार करते रहते। अचानक बाहर आता और दहाड़ता : क्यों भीड़ लगा रखी है! क्या हो गया!!! सामने करीब पौने सात फुट के एक पार्षद ने कहा : प्रधान जी, आपके दर्शन करने थे! वह बोला : कर लिये दर्शन!!! अब चलो घर अपने-अपने!!! और वह हुजूम निकलता तो दूसरा आ धमकता। फिर वही खेल और वही अंदाज़।

    हमारा औपचारिक परिचय कुछ महीने पहले हो चुका था और लेकिन जो पहली मुलाकात थी, वह बहुत यादगार थी। हाड़ कंपा देने वाली शीत की वह आधी रात थी। भारी बारिश हो रही थी। तेज झंझा चल रही थी। उस समय दरवाज़े पर थपकियां ज़ोर-ज़ोर से लगीं और त्रिभुवन-त्रिभुवन की आवाज़ गूंजने लगी। मैंने दरवाज़ा खोला तो सामने आते ही वह बोला : “कुकुरमुत्ता” दो। मैं हैरान। आप और ‘कुकुरमुत्ता’! और वह भी इस समय। जिस व्यक्ति की छवि को मैं उन दिनों एक खालिस गुंडे के रूप में प्रचारित पा रहा था, वह मुझसे कह रहा था : देखो “कुकुरमुत्ता’ निराला की रचना है और मैं भी प्रकृति की निराली रचना हूं। मैं भी निराला हूं।

    मैं पुरानी आबादी थर्ड ब्लॉक के अपने छोटे से कमरे की अलमारी से किताब ढूंढ़ रहा हूं और उस व्यक्ति के कद के लिहाज से मेरा कमरा बहुत छोटा था, क्योंकि उस व्यक्ति का किसी भी जगह खड़े होने का ही अर्थ था कि सौ-पचास लोग प्रधानजी-प्रधानजी कहकर उमड़ आएंगे।

    मैं अभी किताब ढूंढ़ ही रहा था कि उन्होंने याददाश्त के हिसाब से ही पढ़ना शुरू कर दिया :

    आया मौसिम, खिला फ़ारस का गुलाब,
    बाग पर उसका पड़ा था रोब-ओ-दाब;
    वहीं गन्दे में उगा देता हुआ बुत्ता
    पहाड़ी से उठे-सर ऐंठकर बोला कुकुरमुत्ता-
    “अबे, सुन बे, गुलाब,
    भूल मत जो पायी खुशबू, रंग-ओ-आब,
    खून चूसा खाद का तूने अशिष्ट,
    डाल पर इतरा रहा है केपीटलिस्ट!

    वह कहने लगा, मैं यह कविता कुछ जगहों से भूल गया था। मैं कुछ महीनों पहलेे आखिरी बार उससे मिला तो महान कवि केशव दास को उद्धृत करते हुए कहने लगा : केशव केसनि असि करी, बैरिहु जस न कराहिं। चंद्रवदन मृगलोचनी बाबा कहि कहि जाहिं! और जोर से हंस पड़े। उन्हें केशवदास की रसिकप्रिया और रामचंद्रिका के बहुतेरे हिस्से कंठस्थ थे।

    उसे तरह-तरह की कारों, शराबों और हथियारों का भी बहुत शौक था। वे एक बार फ़ीरोज़पुर के पास किसी गांव में मुझे ले गए और बोले : चलो, तुम्हें अपनी लाइब्रेरी दिखाता हूं। वहां एक आलीशान अलमारी में तीन चार सौ किताबें। एक से सुंदर एक और एक से बढ़कर एक। बोले : देखो। पढ़कर देखो। मैंने एक बहुत सुंदर पुस्तक निकाली, जिस पर मीन कैंफ और अडोल्फ़ हिटलर लिखा था। वह पुस्तक मेरे हाथ से फिसलते-फिसलते बची। दरअसल वह पुस्तक नहीं, पुस्तक की तरह दिखने वाली स्कॉच की एक बोतल थी।

    चुनावों में विरोधियों ने जैसे हमले उस पर किये, वैसा आम तौर पर नहीं होता। उसके विरोधी नेताओं ने उसे गुंडा और शराबी कहा तो उसने चुनाव की पूरी धारा ही मोड़ दी। सभाओं में कहना लगा : हां, मैं गुंडा हूं। और हर उस आदमी के लिए गुंडा हूं, जो इस शहर में गरीब लोगों के साथ बेइन्साफ़ी करेगा। जो मज़दूर का खून चूसेगा। जो बेईमानी करेगा। वह सभाओं में गरजता : माताओ-बहनो, मैं शराब पीता हूं, लेकिन मैं अपने विरोधी की तरह कभी किसी का खून नहीं पीता। मैंने ग़रीब और किसी मज़लूम की अस्मत नहीं लूटी। मैंने किभी किसी का शोषण नहीं किया। लेकिन हां, मैं गुंडा हूं और वह गांधीवादी है, जो खून पीता है…आप सबका। क्या तेवर थे उसके!

    साहित्य और इतिहास का वह बहुत अच्छ जानकार था। लेकिन उस जैसी निर्भीकता और साहसिकता मैंने कभी किसी में इस तरह लपलपाती नहीं देखी। पिछले दो-तीन दिन से उस पर आ रही प्रतिक्रियाएं देख रहा था कि ज़माना उसे किस तरह देखता है। बहुतेरे लोग उसकी प्रतिभा को ज़ाया होना मानते हैं और बहुतेरे लोग नाकाम। लेकिन उसने अपनी हर सांस को अपनी शर्त पर जीकर दिखाया। वह कभी न तो सत्ता के बल के आगे झुका और न किसी के बाहुबल के आगे। वह न न्यायबल के आगे समर्पित हुआ और न बुद्धिबल के आगे। यह सब उसने उस दौर में करके दिखाया, जब बड़े-बड़े राजनीतिक लोग छोटी-छोटी बातों के लिए शीर्षासन करने लगते हैं।

    करीब पांच साल उसने मुझे बुलाकर बताया था कि ब्लड कैंसर के बाद अब पता नहीं कब क्या हो जाए। पूरा शरीर भीतर से जर्जर हो गया है, लेकिन मैं किसी को क्या बताऊं। तुम भी मत बताना। उसके कारण निराश नागरिकों में उम्मीदें जगती थीं। टूटे हुए युवाओं में एक बलभाव तैरने लगता था। उसका अपना ही धर्म और अपनी अलग ही जाति थी। इतिहास में जिसे वीरता कहा जाता है, वह उसको जीता था। उसने गुंडापन भी किया और बहुत धमक के साथ किया, लेकिन सिंह-वृत्ति से। उसने प्रतिद्वंद्वियों पर हमले भी किए और खुले आम किए, लेकिन कभी किसी सताए हुए को नहीं सताया। कई लोगों को उनसे प्राण भिक्षा मांगते भी देखा। ताकतवरों को चुनौतियों देने का आनंद अगर किसी ने लिया तो उसी ने लिया। मैंने पूरे प्रदेश में ऐसा तो कोई नहीं देखा।

    उसके एक बहुत नज़दीकी प्रतिद्वंद्वी पर एक प्राणघातक हमला हुआ। आरोप उसी पर लगा। लेकिन वह हमला उसने नहीं, किसी और ने किया था। वह कहने लगा : ये मेरी मॉडस ऑपरेंडी है क्या? क्या मैं ऐसे घटिया हमले करता हूं।

    वह जिस तरह हथेली पर प्राण लिए फिरता था, उसकी क्या वज़ह थी? वह बोला : मैं नहीं बना। जैसे तुम्हें तुम्हारे पिता ने ऐसा बना दिया, वैसे ही मेरी मां ने मुझे ऐसा बना दिया। बचपन में जाड़ दर्द करती और मां शराब का फाहा दबा देती। मैं तो तभी से यह रस चूस रहा था। एक बार बड़े भाई को कक्षा में बिना कारण ही शिक्षिका ने पीट दिया। वह बिना कारण ही बार-बार ऐसा करती थी। मां तो पता चला तो भाई कहीं बाहर खेल रहा था और मैं हाथ लग गया। मां ने मेरी बाजू पकड़ी और बोली : देख भाई को मैडम ने बिना कारण मारा और तू देखता रहा! शर्म नहीं आती। कैसा राजपूत है रे। राजपूत क्या कभी अन्याय देखता है। और अगले दिन जाते ही मैंने मैडम के बाल खींच लिए, धूल डाल दी और बुरा हाल किया। अब जहां कहीं अन्याय होता है तो मुझे लगता है : मां कह रही है, कैसा राजपूत है रे तू। अन्याय देखता है?

    उसकी मां अनपढ़ थी, लेकिन हीरे गढ़ती थी। घर में जिस समय बेटी की शादी हुई तो वह आमंत्रित करने वालों के नाम और पते सिर्फ़ बोले जा रही थीं और लिखने वाला थके जा रहा था। पांच हजार से ज्यादा पते उन्हें कंठस्थ थे। इसलिए यह बेटा भी कभी किसी को चीज़ को किसी डायरी में नहीं लिखता था और जब मौका आता था तो सब अचानक याद आ जाता था।

    वह बहुत ही अलग अंदाज का बिंदास बंदा था और उसका जीवन किसी उपन्यास से कम में नहीं आ सकता। एक बार वह टाइटैनिक फिल्म दिखाने अपने कई दोस्तों और बच्चों को ले गया । रात को घर आने के बाद वाल्मीकि बस्ती में वाल्मीकि समाज के लोगों के बीच खूब ठुमके लगाए और गीत गाए। अंबेडकर जयंती पर लोग उसे सम्मान से बुलाते तो एससी ऑफिसर बहुत परेशान हाेते थे, क्योंकि वह उन्हें मंच से बहुत खरीखोटी सुनाता था। दलितों की बदहाली के लिए वह दलित अफसरों को बहुत खींचता था। लेकिन उनका साथ भी देता था।

    उसका गोरा रंग बहुत आभा बिखेरता था। एकदम चिकना और बिंदास। कॉलेजों के नए नए चुनाव हुए थे और वह गर्ल्स कॉलेज का चुनाव जीतने के बाद आई और पांव छूकर बोली : अंकल, आई लव यू! वह बोला : हट मरज्याणिए, तेरा बाप तो मेरा छोटा भाई है!

    दोस्तों और परिजनों की बेटियों के प्रति उसके मन में जितना सम्मान और गर्वभाव था, वह बहुत कम देखने में आता है। एक बार उसका एक कार्यकर्ता उसके पास पिटाई किए जाने की शिकायत लेकर आया तो उसने सामने वालों को बुलाया, जैसा कि उनके यहां दरबार लगा करता था। सामने वाले बुजुर्ग ने बताया कि यह मेरे बेटे का दोस्त है और इस नाते मेरी बेटी इसकी बहन हुई। तो इसने उसे गलत निगाह से क्यों देखा? उन्होंने कार्यकर्ता की तरफ देखा, तो वह बोला : अंकल, हम दोनों लव करते हैं! इतने में ही लड़का दूर फर्श पर जाकर गिरा। उसे उसने इतना झन्नाटेदार थप्पड़ लगाया और कहा : हरामजादे, दोस्त की बहन अपनी बहन होती है।

    वह बहुत छोटी उम्र में प्रधान बन गया था। एक बीडीओ ग्रामीण इलाके में महिलाओं के सेंटर चेक करने गया तो उसने किसी महिला से छेड़छाड़ कर ली। प्रधानजी के पास गांव वाले आए तो उन्होंने बीडीओ से पूछा : बीडीओ बोला, सर गलती हो गई। माफ कर दो। और पंचायत समिति पहुंचकर उन्होंने बीडीओ को कमरे में बंद किया और उसी की कुर्सी के हत्थे से जमकर सुताई  की और उसे पुलिस में लेकर गए कि इसकी एफआईआर दर्ज करो। इसे इसके प्रधान ने इसके दफ्तर में मारा!

    Tribhuvan

    पांच साल पहले वह बहुत बीमार थे। मैं मिलने गया तो मुझे मेरे मित्र गजराजसिंह जी ने एक दिलचस्प वाकया सुनाया। बोले : मैं 23 साल पहले की बात है। मैं यूथ हॉस्टल में बैठा था इनके पास। हम ठहाके लगा रहे थे। अचानक मुझे संदेश देने कोई और आया। मैंने सुना और मैं वापस आकर बैठा था तो मेरा चेहरा रुंआसा हो गया। साहब ने मुझे पूछा : अरे कौन क्या कह गया। अभी ठीक करता हूं। ऐसी राेनी सूरत क्यों बना ली? गजराज बोले : हुकुम बेटी हुई है मेरे। यह सुनकर वह बोले : अरे, खुश हो। लक्ष्मी आई है। और हां, भूल जा कि ये तेरी बेटी है। ये मेरी बेटी है। इसे मैं अपने घर ले जाऊंगा। बात आई-गई हो गई। 23 साल चले गए। एक दिन हुकुम अचानक घर पधारे और बोले : मेरी बेटी कहां है? घर ले जाना है। वह तब जयपुर के महारानी कॉलेज में फाइनल में ही थी। और हुकुम ने याद दिलाया कि देख तेरे साथ 23 साल पहले यूथ हॉस्टल में उस दिन वादा किया था कि यह मेरी बेटी है और इसे मैं अपने घर ले जाऊंगा। आैर आज समय आ गया है। आैर आज वह लक्ष्मी उस उसी के आंगन में है। बेटी का पिता तो भूल गया वह बात, लेकिन इस मरजीवड़े को यह सब याद रहा।

    ऐसा था वह इस युग का रणबांकुरा।

  • भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

    भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

    Kumar Vikram
    Editor, National Book Trust, NBT

    पहले भी हमारी उनपर कोई ख़ास आस्था नहीं थी
    बल्कि हम उनपर हँसा ही करते थे
    मानो समाज के उच्च आदर्शों के तार तार हो रहे लिबास पर
    अपनी असहायता को ढकने के लिए अपनी शर्मिंदगी छिपा रहे हों
    जब मीडिया सभाओं भाषणों अख़बारों
    स्कूली कक्षाओं के वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में
    हम उनसे अकसर टकराते रहते थे

    ‘युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं
    टकराव का हल बातचीत से निकलना चाहिए’
    ‘आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता’
    ‘परिस्थितियां कैसी भी हो किसी भी नागरिक को
    क़ानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है’
    ‘ मेरे उनसे वैचारिक मतभेद ज़रूर थे
    पर उनकी मृत्यु मेरे अंदर एक ख़ालीपन छोड़ गई है’
    ‘पड़ोसी देशों के साथ हमारे राजनैतिक मतभेद भले ही हों
    हमें अपनी साझी सांस्कृतिक विरासत को नहीं भूलना चाहिए’
    ‘कर्म करो फल की चिंता न करो’ आदि 

    पर अब जब सारे मुखौटे टूट कर गिर गए हैं
    हम इन रटे रटाए शब्दों को सुनने को तरस गए हैं
    मानो मन में एक कसक सी रहती है
    कि पुराने जमाने के कुछ जुमले
    भ्रम स्वरूप ही जीवन में बचे रहने चाहिए
    ताकि मनुष्य की बची हुई मनुष्यता के बचने की
    संभावना थोड़ी बची रहे
    शायद कुछ वैसे ही
    जैसे टूटती खंडहरों को समाज बचाकर रखता है
    जहाँ स्कूली बच्चे पिकनिक के लिए ले जाए जाते हैं
    और रटी रटाई ऐतिहासिक जुमलों के सहारे
    गाइड उन्हें इतिहास बोध करवाता है

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    Kumar Vikram

  • भीमा कोरेगांव: ऐतिहासिक नायकों की तलाश में दलित –Prof Ram Puniyani

    भीमा कोरेगांव: ऐतिहासिक नायकों की तलाश में दलित –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    महाराष्ट्र के कोरेगांव में एक जनवरी 2018 को उन दलित सिपाहियों, जो सन् 1818 में पेशवा के खिलाफ युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ते हुए मारे गए थे, को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए दलितों के खिलाफ अभूतपूर्व हिंसा हुई।  सन् 1927 में अंबेडकर ने कोरेगांव जाकर इन शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि दी थी। दलितों द्वारा हर साल भीमा कोरेगांव में इकट्ठा होकर मृत सैनिकों को श्रद्धांजलि देना,दलित पहचान को बुलंद करने के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है। इस साल यह समारोह बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया क्योंकि इस युद्ध के 200 साल पूरे हो रहे थे। विवाद एक दलित – गोविंद गायकवाड़ – जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसने संभाजी का अंतिम संस्कार किया था – की समाधि को अपवित्र किए जाने से शुरू हुआ। भगवा झंडाधारियों ने उन दलितों पर पत्थर फेंके जो भीमा कोरेगांव मे इकट्ठा हुए थे। शिवाजी प्रतिष्ठान और समस्त हिन्दू अगादी नामक हिन्दुत्व संगठन इस हिंसा के अगुआ थे।

    पुणे के शनिवारवाड़ा, जो पेशवाओं के राज का केन्द्र था, में एक सभा को संबोधित करते हुए दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने ‘आधुनिक पेशवाई‘ के खिलाफ संघर्ष शुरू करने का आव्हान किया। ‘आधुनिक पेशवाई‘ से उनका आशय भाजपा-आरएसएस की राजनीति से था। जिस सभा में उन्होंने भाषण दिया, वहां दलितों के साथ-साथ अन्य समुदायों के नेता भी उपस्थित थे। इस घटना पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं हुईं। कुछ लोग इसे मराठा विरूद्ध दलित संघर्ष बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि यह दलितों पर हिन्दुत्ववादी ताकतों का हमला है। एक ट्वीट में राहुल गांधी ने इस घटना के लिए भाजपा की फासीवादी व दलित-विरोधी मानसिकता को दोषी ठहराया।

    भीमा कोरेगांव युद्ध का इतिहास, समाज में व्याप्त कई मिथकों को तोड़ता है । इस युद्ध में एक ओर थे अंग्रेज, जो अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे, तो दूसरी ओर थे पेशवा, जो अपने राज को बचाना चाहते थे। अंग्रेजों ने अपनी सेना में बड़ी संख्या में दलितों को भर्ती किया था। इनमें महाराष्ट्र के महार, तमिलनाडू के पार्या और बंगाल के नामशूद्र शामिल थे। अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में इसलिए शामिल किया था क्योंकि वे अपने नियोक्ताओं के प्रति वफादार रहते थे और आसानी से उपलब्ध थे। पेशवा की सेना में अरब के भाड़े के सैनिक शामिल थे। इससे यह साफ है कि मध्यकालीन इतिहास को हिन्दू बनाम मुस्लिम संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाना कितना गलत है। जहां इब्राहिम खान गर्दी, शिवाजी की सेना में शामिल थे वहीं बाजीराव पेशवा की सेना में अरब सैनिक थे। दुर्भाग्यवश, आज हम अतीत को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देख रहे हैं और इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि युद्धों का उद्देश्य केवल और केवल संपत्ति और सत्ता हासिल करना था।

    बाद में अंग्रेजों ने दलितों और महारों को अपनी सेना में भर्ती करना बंद कर दिया क्योंकि उन्होंने पाया कि ऊँची जातियों के सिपाही अपने दलित अफसरों को सेल्युट करने और उनसे आदेश लेने के लिए तैयार नहीं थे। अंबेडकर का प्रयास यह था कि दलितों की ब्रिटिश सेना में भर्ती जारी रहे और इसी सिलसिले में उन्होंने यह सुझाव दिया कि सेना में अलग से महार रेजिमेंट बनाई जानी चाहिए। महार सिपाहियों के पक्ष में अंबेडकर इसलिए खड़े हुए क्योंकि वे चाहते थे कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में दलितों की मौजूदगी हो।

    क्या भीमा कोरेगांव युद्ध दलितों द्वारा पेशवाई को समाप्त करने का प्रयास था? यह सही है कि पेशवाओं का शासन घोर ब्राम्हणवादी था। शूद्रों को अपने गले में एक मटकी लटकाकर चलना पड़ता था और उनकी कमर में एक झाड़ू बंधी रहती थी ताकि वे जिस रास्ते पर चलें, उसे साफ करते जाएं। यह जातिगत भेदभाव और अत्याचार का चरम था। क्या अंग्रेज, बाजीराव के खिलाफ इसलिए लड़ रहे थे क्योंकि वे पेशवाओं के ब्राम्हणवाद का अंत करना चाहते थे? कतई नहीं। वे तो केवल अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार करने के इच्छुक थे ताकि उनका व्यापार और फले-फूले और उन्हें भारत को लूटने के और अवसर उपलब्ध हो सकें। इसी तरह, महार सिपाही, पेशवा के खिलाफ इसलिए लड़े क्योंकि वे अपने नियोक्ता अर्थात अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। यह सही है कि इसके कुछ समय बाद देश में समाज सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई और उसका कारण थी आधुनिक शिक्षा। अंग्रेजों ने देश में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था इसलिए लागू की ताकि प्रशासन के निचले पायदानों पर काम करने के लिए लोग उन्हें उपलब्ध हो सकें। समाज सुधार इस प्रक्रिया का अनायास प्रतिफल था। अंग्रेज़ भारत की सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए अपनी नीतियां नहीं बनाते थे। वैसे भी, उस दौर में जातिगत शोषण के प्रति उस तरह की सामाजिक जागृति नहीं थी जैसी कि बाद में जोतिबा फुले के प्रयासों से आई।

    यह कहना कि पेशवा राष्ट्रवादी थे और दलित, ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन कर रहे थे, बेबुनियाद है। राष्ट्रवाद की अवधारणा ही औपनिवेशिक शासनकाल में उभरी। ब्रिटिश शासन के कारण देश में जो सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन आए, उनके चलते दो तरह के राष्ट्रवाद उभरे। पहला था भारतीय राष्ट्रवाद, जो उद्योगपतियों, व्यापारियों, शिक्षित व्यक्तियों,  श्रमिकों और पददलित तबके के नए उभरते वर्गों की महत्वाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति था। दूसरे प्रकार का राष्ट्रवाद धर्म पर आधारित था – हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रवाद। इसके प्रणेता थे जमींदार और राजा-नवाब, जो समाज में प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति बढ़ते आकर्षण से भयातुर थे और धर्म के नाम पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते थे।

    पिछले कुछ वर्षों में देश में दलितों के बीच असंतोष बढ़ा है। इसको पीछे कई कारण हैं। रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या और ऊना में दलितों की निर्मम पिटाई इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। वर्तमान सरकार की नीतियां, दलितों को समाज के हाशिए पर धकेल रहीं हैं – फिर चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो या शिक्षा का क्षेत्र। कोरेगांव में भारी संख्या में दलितों का इकट्ठा होना इस बात का प्रतीक है कि वर्तमान स्थितियों से वे गहरे तक असंतुष्ट हैं। नए उभरे दलित संगठन समाज के अन्य दमित वर्गों के साथ गठजोड़ कर रहे हैं। भीमा कोरेगांव में हुई घटनाओं के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों, श्रमिकों और कई अन्य सामाजिक संगठनों ने दलितों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। दलित, अतीत के नायकों से प्रेरणा ग्रहण करने का प्रयास कर रहे हैं। हालिया घटनाक्रम से यह साफ है कि वे भारतीय प्रजातंत्र में अपना यथोचित स्थान पाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। उन पर हिन्दू दक्षिणपंथी समूहों का आक्रमण, दलितों की महत्वाकांक्षाओं को दबाने और कुचलने का प्रयास है।  

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    About Author

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • आचार्य कौटिल्य की विषकन्या

    आचार्य कौटिल्य की विषकन्या

    Rajeshwar Vashistha

    बहुत पुरानी कहानी है
    कहते हैं मेरे जनक थे आचार्य चाणक्य
    अर्थशास्त्र में उन्होंने मेरी संकल्पना की
    ताकि सुरक्षित रहे मौर्य साम्राज्य
    इतना कुटिल था उनका मस्तिष्क
    कि इतिहास उन्हें जानता है
    कौटिल्य के नाम से!

    John Lilith Painting -1887

    मुझे नहीं मालूम
    विवाह किया या नहीं
    उस कुरूप ब्राह्मण ने
    पर इतना कह सकती हूँ
    अवश्य ही मर गई होगी
    उसकी माता
    उसे जन्म देने के तुरंत बाद
    अन्यथा कोई
    इतना स्त्री द्वेषी क्यों होता?

    कहते हैं, लिखा है कल्किपुराण में
    चित्रग्रीव गंधर्व की पत्नी सुलोचना
    सप्रयोजन देखती थी
    जिस भी पुरुष की आँखों में
    तुरंत मर जाता था वह!

    चाणक्य के लिए असम्भव था
    ऐसी अनेक गंधर्व पत्नियों को
    धरती पर खोजना
    जो मोहिनी बन नाश कर दें शत्रुओं का!
    पर उन्हें शत्रुमर्दन के लिए
    आवश्यकता थी किसी ऐसे ही विकल्प की!

    विश्वास करें
    चाणक्य नहीं हो सकते थे किसी पुत्री के पिता
    अन्यथा क्यों यातनामय विषपान कराते
    सुंदर कन्याओं को
    विषकन्या बनाने के लिए!

    इतिहास मौन है इस प्रक्रिया पर
    जिसमें कितनी ही बालिकाएं मर गई होंगी
    विषकन्याएं बनने से पूर्व
    क्या हिसाब रखा होगा मौर्य साम्राज्य ने
    या राजा चंद्रगुप्त ने
    कि कितनी ही कत्ल कर दी गई होंगी
    ज़रा-सा संदेह होने पर
    बस कहानियाँ लिख दी गई
    शुकसप्तति में उन चरित्र हीन औरतों की
    जिन्हें आज भी चटकारे लेकर पढा जाता है!

    क्या विडम्बना है
    ब्रह्मास्त्र कलयुग में आते आते
    बदल गया एक स्त्री के शरीर में
    जिन्हें डर नहीं लगता था
    तीरों और तलवारों से
    वे मेरे साथ भोग कर
    चले जाते थे स्वर्गद्वार
    आश्चर्य है आज भी
    सबसे विनाशकारी बारूद ही
    भरा है स्त्री देह में!

    आचार्य कौटिल्य
    स्त्री के शरीर में विष भरते हुए
    क्यों नहीं सोचा तुमने
    एक पुरुष के क्षुद्र स्वार्थ के लिए
    किसी दूसरे पुरुष की वासना को बेध कर
    तुम नहीं बदल पाओगे स्त्री की प्रकृति
    जन्म नहीं लेतीं विषकन्याएं
    उन्हें तुम बनाते हो!

    Rajeshwar Vashishth

    एक सवाल का बिना उत्तेजित हुए
    उत्तर दो आचार्य
    स्त्रियाँ तो आज भी अमृत बाँट कर
    जीवन वार देती हैं समाज पर
    क्या पुरुष की प्रकृति में
    विधाता ने विष भरा था?

  • माँ

    माँ

    Sarita Bharat

    माँ तुझमें अपना अक्स देखती हूँ  
    सम्पूर्ण एहसास के साथ 
    उतर जाती हूँ तुम्हारे भीतर, 
    अपनी पदचाप की रफ्तार पर सोचती हूँ 
    लोहे की कोख से लोहा जन्मा था बचपन में मरमरी सी देह पर तेल मालिश करती हाथों का स्पर्श महसूसती हूँ!

    Sarita Bharat

    तुम्हारे सीने के दूध की सुगंध आज भी मेरे नथुनों में भर जाती है!
    पालक का साग और बेसन की तरकारी का स्वाद 
    अपनी बनाई सब्जियों में खोजा करती हूँ!

    खुद में ढूंढती हूँ प्रतिबिम्ब तुम्हारा संघर्षों के पड़ाव पर फिर उठ खड़ी होती हूँ
    याद करती हूँ वो दिन माँ!

    जब समाज के झूठे तानों के आगे तनकर खड़ी हो जाती थी तुम
    चट्टान की मानिंद!
    हम बेटियों के लिये भिड़ जाती थी तुम भेड़ियों से!  
    समाज, परिवार और देश की चिंता में एक चिंता एक शब्द चलता रहता है अक्सर भीतर!

    माँ तुमारी धुंधली परछाई अक्सर कुछ करने से पहले कह जाती है!
    माँ, सृष्टि की रचनाकार!
    इस यथार्थ को शब्दों में संजोकर
    काश! रच सकती नया इतिहास!

    मानो शब्दों की खाली पोटलिया आकाश में टँगी है
    और मैं खड़ी सोच रही हूँ!
    कैसे दे पाउंगी माँ शब्द को सार! सिर्फ अपनी पथराई आँखों में देखती हूं अक्स तुम्हारा!
    और फिर संपूर्ण अहसास के साथ उतर जाती हूँ अपने भीतर!

    माँ हर पल प्रेरित होती हूँ
    जिंदगी के भीतर और बाहर के संघर्ष के लिए
    माँ यह सबकुछ तुम्हीं से तो सीखा है!

  • स्त्री यौनिकता को राष्ट्रवाद या आदर्श समाज की कल्पना से जोड़ने के कारक एवं प्रभाव –Sanjay Jothe

    स्त्री यौनिकता को राष्ट्रवाद या आदर्श समाज की कल्पना से जोड़ने के कारक एवं प्रभाव –Sanjay Jothe

    Sanjay Sharman Jothe[divider style=’right’]

    स्त्री यौनिकता पर सत्र था, मौक़ा था यूरोप, एशिया और अफ्रीका में परिवार व्यवस्था में आ रहे बदलाव पर एक कार्यशाला. यूरोप, खासकर सेन्ट्रल यूरोप में परिवार में बढ़ते आजादी के सेन्स और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता के बीच एक सीधा संबंध है – डेवेलपमेंट स्टडीज, मनोविज्ञान और सोशियोलोजी ने यह स्थापित कर दिया है. यह एक आधुनिक लेकिन स्थापित सच्चाई है. लेकिन क्या महिलाओं की ‘यौन आजादी’ को भी परिवार में आ रहे परिवर्तन के साथ रखकर देखा जा सकता है? जैसे स्त्री की आर्थिक आजादी का परिवार-व्यवस्था और समाज में में हो रहे बदलाव से संबंध है वैसे ही क्या स्त्री की यौन आजादी से इसका कोई संबंध बन सकता है?

    कुछ औपचारिक शेयरिंग्स और प्रेसेंटेशन के बाद असली मुद्दे लंच टाइम और काफी ब्रेक में निकले. अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया, अल्जीरिया, बंगलादेश, भारत और श्रीलंका के रिसर्च-स्कालर्स एकसाथ भोजन पर बैठे. अफगानिस्तान से आये मित्र अपना अनुभव बता रहे थे कि काबुल में उनके अध्ययन और अनुसंधान के दौरान उन्होंने दो महत्वपूर्ण बातें नोट कीं जो स्त्री यौनिकता के बारे में पुरुषों के ख्याल और उसके सामाजिक परिणाम से जुडती हैं.

    अफगान विद्वान् ने बताया कि एक अध्ययन के दौरान अफगान युवकों को पोर्न फिल्मे दिखाई गयीं और उसपर उनकी प्रतिक्रियाएं नोट की गईं. उन्होंने बताया कि आजकल के अफगान युवक ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि सेक्स के दौरान कोई स्त्री कैसे आनंदित हो रही है? उन युवकों में आपस में ये बड़ी चर्चा का विषय बन जाता है कि ये तो पुरुष के आनन्द का विषय है स्त्री को भी इसमें आनंद होता है क्या? अफगान विद्वान् ने कहा कि ये नया बदलाव है.

    सत्तर के दशक में कुछ ऐसे अध्ययन हुए हैं जिनमे तत्कालीन अफगान समाज के युवक सेक्स के दौरान स्त्रीयों के आनंदित होने को आश्चर्य से नहीं देखते थे बल्कि उसे सहज स्वीकार करते थे.

    इस बात पर पाकिस्तान, बुरुंडी, सीरिया, इथियोपिया से आये विद्वानों ने भी सहमती जताई कि ये बदलाव उनके समाज में भी जरुर हुआ है. अब के अफगान, पाक या सीरियाई युवकों में स्त्री की यौनिकता और यौन स्वतन्त्रता को लेकर जो विचार बदले हैं वे असल में इन समाजों के पतन की अचूक सूचना है. अब उनके समाज में स्त्री के मनोविज्ञान, उसकी भावनाओं, उसकी स्वतन्त्रता या उसके अस्तित्व मात्र पर पुरुषों के विचार बहुत नकारात्मक ढंग से बदल गये हैं.

    एक अन्य उदाहरण देते हुए अफगान मित्र ने बात और साफ़ की, आजकल अफगान समाज में एक चलन बढ़ रहा है, हालाँकि अभी भी सीमित है लेकिन धीरे-धीरे बढ़ रहा है. अफगान समाज में कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में अब भाई अपनी बहन की शादी में नहीं जाना चाहते. पिता या चाचा ताऊ या मामा इत्यादि बुजुर्ग लोगों को जाना अनिवार्य है लेकिन वे भी बेमन से उस समारोह में हिस्सा लेते हैं. इसका कारण बताते हुए उन्होंने एक गजब की बात बताई.

    बात ये है कि बहन की शादी में दुल्हे के साथ आये हुए युवक जिस तरह से नाचते गाते और अपनी मर्दानगी या अधिकार का प्रदर्शन करते हैं वो दुल्हन के भाई या पिता के लिए बहुत अपमानजनक होता है. दूल्हे के साथ आई पूरी टोली अपने आप को दुल्हा समझती है और उनकी नजरों से, हाथों के इशारे से, चेहरे के हाव भाव से वे बस सेक्स के इशारे और सेक्स से जुड़े मजाक करते रहते हैं, जैसे कि पूरी टोली किसी सामूहिक सुहागरात के लिए आयी हो. ये सब देखना कम से कम दुल्हन के भाई के लिए बहुत अपमानजनक होता है. इसलिए आजकल कुछ कबीलों में कुछ पिछड़े इलाकों में बहन की शादी में अफगान युवकों के नदारद हो जाने का चलन बढ़ रहा है.

    लेकिन मजे की बात ये है कि ये ही भाई, चाचा ताऊ और मामा लोग जब अपने परिवार या कबीले के पुरुष की शादी में जाते हैं तो वो सारी नंगाई करते हैं जिससे खुद उन्हें चिढ होती है. मतलब ये कि उनके बहन या बेटी की शादी में जो चीजें उन्हें शर्मिन्दा करती हैं वही चीजें उनके पुरुष दोस्त या पुरुष रिश्तेदार की शादी के दौरान मर्दानगी दिखाने का हथियार बन जाती हैं.

    अब गौर कीजिये इन तीन घटनाओं में सीधा संबंध है. पोर्न देखते हुए अफगान युवकों का स्त्री के आनंदित होने पर आश्चर्य व्यक्त करना और अपनी बहन के विवाह में गुलच्छर्रे उड़ा रही बरात के सामने खुद को अपमानित महसूस करना और इसी तरह की बारात में कभी खुद शामिल होकर नंगाई के नाच करने में आनंद लेना – ये मूल रूप से उनके समाज में स्त्री पुरुष संबंधों के पतन सहित स्वयं उस समाज के सभ्यतागत और नैतिक पतन का सबूत है.

    सत्तर के दशक में अफगान बाड़े में सोवियत-अमेरिकी सांडों की लड़ाई के पहले और धार्मिक आतंक के भूत के प्रवेश के पहले जो अफगान समाज था वो एकदम भिन्न था. तब स्त्रीयां स्कर्ट या जींस पहनकर विश्वविद्यालयों में पढ़ती थीं या स्मोक कर सकती थीं. तब लड़कियों के म्यूजिक बैण्ड भी हुआ करते थे. समाज में प्रेम संबंध और मित्रता बहुत आसान थी. आज के अफगानिस्तान में अब लड़का लड़की आपस में बात करना तो दूर एक दुसरे की तरफ देख भी नहीं सकते. पर्दा और बुर्का लगभग औरत की चमड़ी ही बन गये हैं, उन्हें हटाना मुश्किल है. स्त्रीयां खुद अपनी गुलामी के बारे में कोई विचार बना पाने में सक्षम नहीं रह गयी हैं.

    जब अफगान और पाक विद्वानों ने भारत के पिछले कुछ सालों में घटी घटनाओं पर टिप्पणी की तो उन्होंने जोर देकर कहा कि बॉस भारत का समाज भी अफघानिस्तान सीरिया होने की तरफ बढ़ रहा है. जिस तरह से स्त्रीयों को पर्दा, नैतिकता, सच्चरित्रता आदि का पाठ पढाया जा रहा है और जिस तरह से स्त्री पुरुष संबंधों और स्त्रीयों की आजादी को नियंत्रित करने का प्रयास हो रहा है, ठीक वैसा ही अफगानिस्तान पाकिस्तान में धार्मिक आतंक के भूत के उभार के दौरान हुआ था.

    ख़ास तौर से जब स्त्री के चरित्र से जुड़े मुद्दे, स्त्री की यौनिकता के नियन्त्रण से जुडी रणनीति अगर आपके राष्ट्रवाद से या आदर्श  समाज की कल्पना से जुड़ने लगें तो समझ लीजिये कि आपका समाज एक गहरे खतरे की तरफ बढ़ रहा है. अगर ये अगले पांच दस सालों में नहीं रुका तो आपके समाज में अफगानिस्तान और सीरिया का जन्म होने वाला है.

  • पदार्थवादी मानसिकता से जूझता युवा एवं उसकी समस्याएं

    पदार्थवादी मानसिकता से जूझता युवा एवं उसकी समस्याएं

    Ramanand Sharma[divider style=’right’]

    आज की युगल जोड़ी एक बहुत बड़ी संक्रामक बीमारी से जूझ रही है , वह कुछ इस प्रकार है की आज के समय में नव युवक/युवती  स्वयं को तब तक अधूरा  समझते  है जब तक लड़का  किसी लड़की के साथ प्रेम  संबंध में नहीं आ जाता है या लड़की किसी लड़के के साथ प्रेम सम्बन्ध में नहीं आ जाती है , चलिए ठीक है कुछ लोगो ने कहा की जीवन में लड़की होंने से हम बहुत कुछ सीखते है, कई ऐसी बाते जो हम किसी से नहीं कह पाते है उससे कहकर मन हल्का कर लेते है , अर्थात आप के लिए वो एक कैफीन है जो आपको रिलैक्स होने में मदद करती है.

    मेरा विचार कुछ अलग है , मेरा मानना है व्यक्ति स्वयं में पूर्ण है, ये मीडिया और बॉलीवुड है जो नवयुवको के दिमाग  पर एक परत बना रहा है कि  लड़का तब तक अधूरा  है जब तक वह किसी लड़की के साथ नहीं है या लड़की किसी लड़के के साथ नहीं  है ।

    इससे भी भयावह स्थिति से आपको रुबरू कराता हूँ  मेरा मानना है भूत केवल भ्रम है जो खोखला होता है लेकिन कुछ बुद्धजीवियो ऐसे है जो कहते है भूत सत्य है वह आज भी भूत को सत्य मानकर वर्तमान में जी रहे है, ये वही लोग है जिनके बुद्धि में जीव पड़े होते है इनका मनना होता है की अगर मेरा एक हाथ टूट गया या मेरे साथ कुछ नकारात्मक घटना घटित हो गई तो मेरा मेरा जीवन यही खत्म हो जाता है और वर्तमान से भविष्य तक के सफ़र में स्वयं को कोसते रहते है, जबकि ये कर्लोय तकच्स जैसे लोगो को भूल जाते है जिनका दाया हाथ जिससे वो शूटिंग करते थे वो खराब हो जाता है लेकिन वह व्यक्ति हार नहीं मानता और तदन्तर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ता है और अपने बाये हाथ को शूटिंग हैण्ड बना लेता है और 2 बार अपने केवल एक हाथ के दम पर ओलिंपिक विजेता बनता है, व्यक्ति में अगर इच्छा हो कुछ कर गुजरने की तो वह नकारात्मक से नकारात्मक परिस्थिति में अच्छा कर गुजरता है ।

    आप को एक और मजेदार बात बताते है, आज कल क्या हो रहा है की युगल जोड़ी बनती है दोनों पक्षों में बहुत उर्जा रहती है, और उनके संबंधों में जीने की तो छोड़िये मरने के बाद अगले जन्म में साथ रहने के वादे हो जाते है, लड़की एवं लड़का एक दूसरे के साथ काफी वक्त बिताते है काफी बार दिन दिन भर साथ रहना, खाना, घूमना अर्थात दिन भर की अनेक क्रिया साथ होती है अवमूनन 24 घंटे में 8 घंटे एक दूसरे को देते है,  और साल छह महीने बाद सुनने में क्या आता है!!

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]दोनों पक्षों में कोई एक कहता है ,मै तुमको समझ नहीं पाई या पाया you deserve better!!  यह हम किस समाज की ओर बढ़ रहे है जहा रिश्तों की कोई अहमियत नहीं है एक पक्ष को आनंद नही आ रहा तो वह समाधान की ओर न बढ़कर यह कह देता है,  you deserve better!! अर्थात व्यक्ति, व्यक्ति के लिए वस्तु मात्र बन कर रह गया है, आजकल जब उन मित्रो को देखता हूँ जो इस बीमारी से जूझ रहे है तो मन में यही बात आती है की उन मैडम या सर से बोल दू if he or she deserve better तब वो तुम्हारे साथ दिन दिन भर चैट क्यों करता, अपनी क्लासेज क्यों मिस करता, रात में खाना खाने से पहले तुमसे क्यों पूछता, तुम्हारे साथ जीने मरने की कसमे क्यों खाता, तुम्हारे साथ अपने सुनहरे भविष्य के सपने क्यों देखता या देखती।। बहुत विचारणीय बिंदु है विचार कीजियेगा ।। यह घटना अधितर ग्रेजुएशन काल में घटित होती है जब लोग कॉलेज में होते है, जब वे अपने कैरियर को दिशा दे रहे होते है और इस बीमारी के वजह से विधार्थी अपने ग्रेजुएशन में अच्छा प्रदर्शन नही कर पाता है और जूलॉजी इंजीनियरिंग और विषय विशेष में पढने के बाद भी उसे उस विषय का ज्ञान नही रहता है और वह जनरल एग्जाम की तैयारी में लग जाता है। [/content_container]

    लोग 2000km से पढने आते है, माँ बाप मजदूरी करके दो रोटी कम खा के पैसा बचाते है और बच्चे को भेजते जिससे उसे कोई दिक्कत ना हो ,और विधार्थी देल्ही (शहर) की चकाचौक और बॉलीवुड की काल्पनिक दुनिया में उलझा रहता है और जब चेतता है तो कई ऐसे होते है जो बहुत कुछ अच्छा कर जाते है लेकिन अधिकांश लोगो के लिए समय जा चुका होता है ।।
    अगर हर विधार्थी यह सोचे की वह इतना दूर से क्यों आया है! और माँ बाप किस तरीके से पैसा भेज रहे है ! तो मुझे लगता है सभी सुपथ पर रहेंगे और बेहतर से बेहतर आयाम हम अपने राष्ट्र को दे सकेंगे।।
    नोट:- sucide रेट के बढ़ने में इस बीमारी का बहुत बड़ा योगदान रहा है, यह कथन एमिल दुर्खेइम साहब ने नही कहा है, इसे मै अपने अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ ।।

     

     

     

  • मोहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष : तुम मुझे यूं भुला न पाओगे  –Firdaus Khan

    मोहम्मद रफ़ी साहब की जयंती 24 दिसम्बर पर विशेष : तुम मुझे यूं भुला न पाओगे –Firdaus Khan

    Firdaus Khan

    बहुमुखी संगीत प्रतिभा के धनी मोहम्मद रफ़ी का जन्म 24 दिसम्बर, 1924 को पंजाब के अमृतसर ज़िले के गांव मजीठा में हुआ। संगीत प्रेमियों के लिए यह गांव किसी तीर्थ से कम नहीं है। मोहम्मद रफ़ी के चाहने वाले दुनिया भर में हैं। भले ही मोहम्मद रफ़ी साहब हमारे बीच में नहीं हैं, लेकिन उनकी आवाज़ रहती दुनिया तक क़ायम रहेगी। साची प्रकाशन द्वारा प्रकाशित विनोद विप्लव की किताब मोहम्मद रफ़ी की सुर यात्रा मेरी आवाज़ सुनो मोहम्मद रफ़ी साहब के जीवन और उनके गीतों पर केंद्रित है। लेखक का कहना है कि मोहम्मद रफ़ी के विविध आयामी गायन एवं व्यक्तित्व को किसी पुस्तक में समेटना मुश्किल ही नहीं, बल्कि असंभव है, फिर भी अगर संगीत प्रेमियों को इस पुस्तक को पढ़कर मोहम्मद रफ़ी के बारे में जानने की प्यास थोड़ी-सी भी बुझ जाए तो मैं अपनी मेहनत सफल समझूंगा। इस लिहाज़ से यह एक बेहतरीन किताब कही जा सकती है। 

    मोहम्मद ऱफी के पिता का नाम हाजी अली मोहम्मद और माता का नाम अल्लारखी था। उनके पिता ख़ानसामा थे। रफ़ी के बड़े भाई मोहम्मद दीन की हजामत की दुकान थी, जहां उनके बचपन का काफ़ी वक़्त गुज़रा। वह जब क़रीब सात साल के थे, तभी उनके बड़े भाई ने इकतारा बजाते और गीत गाते चल रहे एक फ़क़ीर के पीछे-पीछे उन्हें गाते देखा। यह बात जब उनके पिता तक पहुंची तो उन्हें काफ़ी डांट पड़ी। कहा जाता है कि उस फ़क़ीर ने रफ़ी को आशीर्वाद दिया था कि वह आगे चलकर ख़ूब नाम कमाएगा। एक दिन दुकान पर आए कुछ लोगों ने ऱफी को फ़क़ीर के गीत को गाते सुना। वह उस गीत को इस क़दर सधे हुए सुर में गा रहे थे कि वे लोग हैरान रह गए। ऱफी के बड़े भाई ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। 1935 में उनके पिता रोज़गार के सिलसिले में लाहौर आ गए। यहां उनके भाई ने उन्हें गायक उस्ताद उस्मान ख़ान अब्दुल वहीद ख़ान की शार्गिदी में सौंप दिया। बाद में रफ़ी ने पंडित जीवन लाल और उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां जैसे शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों से भी संगीत सीखा। 

    Mohammad Rafi

    मोहम्मद रफ़ी उस वक़्त के मशहूर गायक और अभिनेता कुंदन लाल सहगल के दीवाने से और उनके जैसा ही बनना चाहते थे। वह छोटे-मोटे जलसों में सहगल के गीत गाते थे। क़रीब 15 साल की उम्र में उनकी मुलाक़ात सहगल से हुई। हुआ यूं कि एक दिन लाहौर के एक समारोह में सहगल गाने वाले थे। रफ़ी भी अपने भाई के साथ वहां पहुंच गए। संयोग से माइक ख़राब हो गया और लोगों ने शोर मचाना शुरू कर दिया। व्यवस्थापक परेशान थे कि लोगों को कैसे ख़ामोश कराया जाए। उसी वक़्त रफ़ी के बड़े भाई व्यवस्थापक के पास गए और उनसे अनुरोध किया कि माइक ठीक होने तक रफ़ी को गाने का मौक़ा दिया जाए। मजबूरन व्यवस्थापक मान गए।

    रफ़ी ने गाना शुरू किया, लोग शांत हो गए। इतने में सहगल भी वहां पहुंच गए। उन्होंने रफ़ी को आशीर्वाद देते हुए कहा कि इसमें कोई शक नहीं कि एक दिन तुम्हारी आवाज़ दूर-दूर तक फैलेगी। बाद में रफ़ी को संगीतकार फ़िरोज़ निज़ामी के मार्गदर्शन में लाहौर रेडियो में गाने का मौक़ा मिला। उन्हें कामयाबी मिली और वह लाहौर फ़िल्म उद्योग में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगे। उस दौरान उनकी रिश्ते में बड़ी बहन लगने वाली बशीरन से उनकी शादी हो गई। उस वक़्त के मशहूर संगीतकार श्याम सुंदर और फ़िल्म निर्माता अभिनेता नासिर ख़ान से रफ़ी की मुलाक़ात हुई। उन्होंने उनके गाने सुने और उन्हें बंबई आने का न्यौता दिया। ऱफी के पिता संगीत को इस्लाम विरोधी मानते थे, इसलिए बड़ी मुश्किल से वह संगीत को पेशा बनाने पर राज़ी हुए। रफ़ी अपने भाई के साथ बंबई पहुंचे। अपने वादे के मुताबिक़ श्याम सुंदर ने रफ़ी को पंजाबी फ़िल्म गुलबलोच में ज़ीनत के साथ गाने का मौक़ा दिया। यह 1944 की बात है।

    इस तरह रफ़ी ने गुलबलोच के सोनियेनी, हीरिएनी तेरी याद ने बहुत सताया गीत के ज़रिये पार्श्वगायन के क्षेत्र में क़दम रखा। रफ़ी ने नौशाद साहब से भी मुलाक़ात की। नौशाद ने फ़िल्म शाहजहां के एक गीत में उन्हें सहगल के साथ गाने का मौक़ा दिया। रफ़ी को सिर्फ़ दो पंक्तियां गानी थीं-मेरे सपनों की रानी, रूही, रूही रूही। इसके बाद नौशाद ने 1946 में उनसे फ़िल्म अनमोल घड़ी का गीत तेरा खिलौना टूटा बालक, तेरा खिलौना टूटा रिकॉर्ड कराया। फिर 1947 में फ़िरोज़ निज़ामी ने रफ़ी को फ़िल्म जुगनूं का युगल गीत नूरजहां के साथ गाने का मौक़ा दिया। बोल थे- यहां बदला वफ़ा का बेवफ़ाई के सिवा क्या है। यह गीत बहुत लोकप्रिय हुआ। इसके बाद नौशाद ने रफ़ी से फ़िल्म मेला का एक गीत ये ज़िंदगी के मेले गवाया। इस फ़िल्म के बाक़ी गीत मुकेश से गवाये गए, लेकिन रफ़ी का गीत अमर हो गया। यह गीत हिंदी सिनेमा के बेहद लोकप्रिय गीतों में से एक है।

    इस बीच रफ़ी संगीतकारों की पहली जोड़ी हुस्नलाल-भगतराम के संपर्क में आए। इस जोड़ी ने अपनी शुरुआती फ़िल्मों प्यार की जीत, बड़ी बहन और मीना बाज़ार में रफ़ी की आवाज़ का भरपूर इस्तेमाल किया। इसके बाद तो नौशाद को भी फ़िल्म दिल्लगी में नायक की भूमिका निभा रहे श्याम कुमार के लिए रफ़ी की आवाज़ का ही इस्तेमाल करना पड़ा। इसके बाद फ़िल्म चांदनी रात में भी उन्होंने रफ़ी को मौक़ा दिया। बैजू बावरा संगीत इतिहास की सिरमौर फ़िल्म मानी जाती है। इस फ़िल्म ने रफ़ी को कामयाबी के आसमान तक पहुंचा दिया। इस फ़िल्म में प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक उस्ताद अमीर खां साहब और डी वी पलुस्कर ने भी गीत गाये थे। फ़िल्म के पोस्टरों में भी इन्हीं गायकों के नाम प्रचारित किए गए, लेकिन जब फिल्म प्रदर्शित हुई तो मोहम्मद रफ़ी के गाये गीत तू गंगा की मौज और ओ दुनिया के रखवाले हर तरफ़ गूंजने लगे। रफ़ी ने अपने समकालीन गायकों तलत महमूद, मुकेश और सहगल के रहते अपने लिए जगह बनाई।

    रफ़ी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने तक़रीबन 26 हज़ार गाने गाये, लेकिन उनके तक़रीबन पांच हज़ार गानों के प्रमाण मिलते हैं, जिनमें ग़ैर फ़िल्मी गीत भी शामिल हैं। देश विभाजन के बाद जब नूरजहां, फ़िरोज़ निज़ामी और निसार वाज्मी जैसी कई हस्तियां पाकिस्तान चली गईं, लेकिन वह हिंदुस्तान में ही रहे। इतना ही नहीं, उन्होंने सभी गायकों के मुक़ाबले सबसे ज़्यादा देशप्रेम के गीत गाये। रफ़ी ने जनवरी, 1948 में महात्मा गांधी की हत्या के एक माह बाद गांधी जी को श्रद्धांजलि देने के लिए हुस्नलाल भगतराम के संगीत निर्देशन में राजेंद्र कृष्ण रचित सुनो सुनो ऐ दुनिया वालों, बापू की ये अमर कहानी गीत गाया तो पंडित जवाहर लाल नेहरू की आंखों में आंसू आ गए थे।

    भारत-पाक युद्ध के वक़्त भी रफ़ी ने जोशीले गीत गाये। यह सब पाकिस्तानी सरकार को पसंद नहीं था। शायद इसलिए दुनिया भर में अपने कार्यक्रम करने वाले रफ़ी पाकिस्तान में शो पेश नहीं कर पाए। ऱफी किसी भी तरह के गीत गाने की योग्यता रखते थे। संगीतकार जानते थे कि आवाज़ को तीसरे सप्तक तक उठाने का काम केवल ऱफी ही कर सकते थे। मोहम्मद रफ़ी ने संगीत के उस शिखर को हासिल किया, जहां तक कोई दूसरा गायक नहीं पहुंच पाया। उनकी आवाज़ के आयामों की कोई सीमा नहीं थी। मद्धिम अष्टम स्वर वाले गीत हों या बुलंद आवाज़ वाले याहू शैली के गीत, वह हर तरह के गीत गाने में माहिर थे। उन्होंने भजन, ग़ज़ल, क़व्वाली, दशभक्ति गीत, दर्दभरे तराने, जोशीले गीत, हर उम्र, हर वर्ग और हर रुचि के लोगों को अपनी आवाज़ के जादू में बांधा। उनकी असीमित गायन क्षमता का आलम यह था कि उन्होंने रागिनी, बाग़ी, शहज़ादा और शरारत जैसी फ़िल्मों में अभिनेता-गायक किशोर कुमार पर फ़िल्माये गीत गाये। 

    वह 1955 से 1965 के दौरान अपने करियर के शिखर पर थे। यह वह व़क्त था, जिसे हिंदी फ़िल्म संगीत का स्वर्ण युग कहा जा सकता है। उनकी आवाज़ के जादू को शब्दों में बयां करना नामुमकिन है। उनकी आवाज़ में सुरों को महसूस किया जा सकता है। उन्होंने अपने 35 साल के फ़िल्म संगीत के करियर में नौशाद, सचिन देव बर्मन, सी रामचंद्र, रोशन, शंकर-जयकिशन, मदन मोहन, ओ पी नैयर, चित्रगुप्त, कल्याणजी-आनंदजी, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, सलिल चौधरी, रवींद्र जैन, इक़बाल क़ुरैशी, हुस्नलाल, श्याम सुंदर, फ़िरोज़ निज़ामी, हंसलाल, भगतराम, आदि नारायण राव, हंसराज बहल, ग़ुलाम हैदर, बाबुल, जी एस कोहली, वसंत देसाई, एस एन त्रिपाठी, सज्जाद हुसैन, सरदार मलिक, पंडित रविशंकर, उस्ताद अल्ला रखा, ए आर क़ुरैशी, लच्छीराम, दत्ताराम, एन दत्ता, सी अर्जुन, रामलाल, सपन जगमोहन, श्याम जी-घनश्यामजी, गणेश, सोनिक-ओमी, शंभू सेन, पांडुरंग दीक्षित, वनराज भाटिया, जुगलकिशोर-तलक, उषा खन्ना, बप्पी लाह़िडी, राम-लक्ष्मण, रवि, राहुल देव बर्मन और अनु मलिक जैसे संगीतकारों के साथ मिलकर संगीत का जादू बिखेरा। 

    रफ़ी साहब ने 31 जुलाई, 1980 को आख़िरी सांस ली। उन्हें दिल का दौरा पड़ा था। जिस रोज़ उन्हें जुहू के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया, उस दिन बारिश भी बहुत हो रही थी। उनके चाहने वालों ने उन्हें नम आंखों से विदाई दी। लग रहा था मानो रफ़ी साहब कह रहे हों-

    हां, तुम मुझे यूं भुला न पाओगे
    जब कभी भी सुनोगे गीते मेरे
    संग-संग तुम भी गुनगुनाओगे…

    About Author

    Firdaus Khan

    Firdaus Khan is known as the princess of the island of the words. She is a journalist, poetess and story writer. She knows many languages. She has worked for several years in Doordarshan Kendra and reputed newspapers of the country. 

    She also edited several weekly newspapers and magazines. Her programs are broadcast from All India Radio and Doordarshan Kendra. She has also worked for All India Radio and News channels. She writes for various newspapers, magazines, books and news agencies of the country and abroad.

    She has been awarded many awards for excellent journalism, skillful editing and writing. She has also been participating in the Kavi Sammelan and Musashirs. She She has also studied Indian classical music.

    She was also an editor of the monthly Paigam-e-Madar-e-Vatan. Se is an editor in Star News Agency. There are also two news portal named ‘Star News Agency’ and ‘Star Web Media’. 

  • भारतीय राजनीति का मायालोक

    भारतीय राजनीति का मायालोक

    Sanjiv Kumar Sharma

    [content_container max_width=’500′ align=’center’]स्वीकारोक्ति (डिस्क्लेमर)

    लेखक को राजनीति का कोई जमीनी ज्ञान नहीं है, जो भी राजनैतिक समझ विकसित की है वह कमरे में बैठ कर किताबें पढ़ते, सूचना तकनीकी का इस्तेमाल करते और विचारते हुए की है|[/content_container]

    भारत की जनता मायालोक, जादू और तिलिस्म में हमेशा से दिलचस्पी रखती है| एक चमत्कारिक अंगूठी से सारी मुसीबतें दूर हो जाती हैं, एक सुपर फ़ूड एकदम स्वस्थ कर देता है और हठ योग की एक मुद्रा कैंसर ठीक कर देती है| घर को स्वच्छ व पवित्र करने के लिए भी कोई खास प्रयास करने की जरूरत नहीं है, बस किसी ख़ास नदी के पानी की पानी की कुछ बूँदें छिड़क दीजिए या उस घर में बैठ कर लीलावती-कलावती की ‘कथा’ सुन लीजिए, आपका घर फटाफट साफ़-सुथरा और पवित्र हो जाएगा| इसी मानसिकता के साथ यहाँ की जनता मतदान में भाग लेती है, किसी को वोट देती है और लोकतंत्र के इस कर्मकांड (रिचुअल) को करके अपने घर में बैठ कर जादू शुरू होने का इंतेजार करती है|

    मनों में कूट-कूट कर भरा जातिवाद, सामंतवादी (फ्यूडल) सोच, बिना किसी जवाबदेही (एकाउंटेबिलिटी) के ताकतवर नौकरशाही और उसके साथ राजनीतिज्ञों के करतब; इस सब के बीच लोकतंत्र इस तरह फंस गया है कि समझ नहीं आता कैसे निकालें! बेंगलुरु, दिल्ली वगैरह के जाम में फंसी बस तो फिर भी से तो देर सबेर निकल ही जाती है लेकिन ये जाम तो ऐसा हो गया कि छह दशकों में भी छंटने का नाम नहीं ले रहा| ऊपर से मजा ये कि भ्रष्टाचार, दुराचार का सारा इल्जाम अपनी पसंद-नापसंद के मुताबिक किसी खास राजनैतिक दल या पार्टी को देकर हम बरी हो जाते हैं|

    इसी जादू-तमाशे के बीच गुजरात चुनाव के परिणाम लोग ऐसे देख रहें है जैसे लोकसभा के चुनावों का परिणाम हो| भारत के एक और महत्वपूर्ण राज्य हिमाचल में चुनाव थे लेकिन जनता और मीडिया सब भूल कर गुजरात के चुनावों में इस तरह खोयी थी जैसे गुजरात के चुनावों पर भारत का भविष्य टिका हो और किसी विशेष पार्टी या दल के हारने-जीतने से सब कुछ तय होने वाला हो|

    यदि बहुत ज्यादा धूम-धड़ाका पैदा नहीं किया जाता और जरा नरमी और शांति से चुनावों में उतरा जाता तो भाजपा का छोटे अंतर से चुनाव जीतना भी मायने रखता है| 2002 से लेकर अभी तक, लगभग पन्द्रह सालों से लगातार सत्ता में रहने के बावजूद अभी भी वे सत्ता में बने रहते हैं और अगर हम चुनावी व्यवस्था में विश्वास रखते हैं तो यह उपलब्धि तो है ही| लेकिन शायद नम्रता के अभाव और बडबोलेपन के कारण छोटी जीत भी हार की तरह लगती है|

    भाजपा की जीत के बाद इस चुनाव में सबसे बड़ी उपलब्धि है कि हार्दिक पटेल, जिग्नेश, राहुल गाँधी जैसे नेताओं का सामने आना| इनमें से कौन लम्बी रेस का घोड़ा है, कौन भारतीय राजनीति के आसमान में चमकेगा कौन भुला दिया जाएगा यह कहना कठिन है लेकिन यदि भारत की जनता थोड़ी परिपक्वता दिखाए तो शायद कुछ नम्र नेता सामने आ सकते हैं और हमें कुछ शालीन राजनीति देखने को मिल सकती है|

    लेकिन असल समस्या कुछ और है| मनोरंजन की तलाश हमें कभी धर्म की गलियों में भटकाती है तो कभी सिनेमा और पोर्न के बीच में झुलाती है और यही तलाश जब राजनीति में भी मनोरंजन तलाशने लगती है तो फिर राजनैतिक सर्कस की शुरुआत होती है| एक ही किस्म के मनोरंजन से जब ऊब हो जाती है और फिर किसी नए मनोरंजन के तलाश में निकल पड़ती है| जब वर्तमान राजनीति और उसके नेताओं से जनता ऊबने लगेगी तो फिर किसी नए नेता की तलाश होगी और फिर से इतिहास को दोहराया जाएगा|

    किसी को एक चमत्कारिक नेता की तरह पेश किया जाएगा, जो गद्दी पर बैठेगा और पलक झपकते ही सभी समस्याएं उड़न छू हो जाएंगी| नारे गढ़े जाएंगे – फलानां! ढिकाना! फलानां आएगा, देश को बढ़ाएगा! देश का नेता कैसा हो, ढिकाना जैसा हो! और ऐसे ही असंख्य नारे भीड़ द्वारा दोहराएंगे जाएंगे| भांडों की जमात आगे आ जाएगी और सबको बताएगी कि बस सांस रोक बैठ जाइए देश बदलने वाला है, सूरत स्विट्ज़रलैंड हो जाएगा और दिल्ली नोर्वे! गंगा तो ऐसे बहेगी जैसे शिव की जटाओं से निकलते समय थी और रेल ऐसे चलेंगी कि जापान पता करने आएगा कि इतनी जल्दी भारत हमसे आगे कैसे निकल गया|

    प्रवक्ताओं की नयी फ़ौज तैयार की जाएगी, जिनके शब्दों में तलवार की धार होगी और तर्कों में डायनामाइट जैसी दम होगी, कैमरा चालू होते ही वे विरोधियों के छक्के छुड़ा देंगे और जमीन पर कुछ काम हो या न हो लेकिन चैनल के सामने सब कुछ चाक-चोबंद दिखाई देगा| सरकार सब जानती होगी कि देश का भला कैसे होगा, देश का विकास कैसे होगा, देश का पर्यावरण कैसे बचेगा, उसे किसी से पूछने, किसी से सलाह लेने, किसी से चर्चा करने की जरूरत नहीं होगी| वह खुद ही सब चीजें तय कर लेगी और खुद ही उनको लागू भी कर देगी|

    विपक्षी दल ईवीएम पर आरोप लगाएंगे और सरकार कहेगी कि ईवीएम अभेद्य है! धरती में छेद करके दूसरी और निकला जा सकता है, चन्द्रमा को रस्सी से बाँध कर नीचे खींचा जा सकता है लेकिन ईवीएम में कोई गड़बड़ी नहीं की जा सकती| यह पवित्र है और सभी सात्विक गुणों से भरपूर है, इसका पतन असम्भव है|

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    कुछ और नए नियम लाए जाएंगे, कुछ क़ानून रचे जाएंगे जिसमे जनता को अपनी जबरदस्त भागीदारी करनी होगी, कभी अपने पैसों के लिए भागना होगा तो कभी नए टैक्स के लिए मारा-मारी करनी होगी| ऐसा करने से जनता की सेहत खूब अच्छी होगी, उसकी देशभक्ति का भी लगे हाथों टेस्ट हो जाएगा लेकिन नौकरशाह और सरकारी अमला, बड़े कॉर्पोरेट और धन कुबेर ज्यों का त्यों अपना काम उतनी ही मेहनत, लगन और ईमानदारी से करते रहेंगे जैसे पहले करते थे और अभी भी करते हैं|

    नियमों का उल्लंघन करने पर सडकों के किनारे लगे कुछ और ठेले तोड़ दिए जाएंगे, बैंक में चोरी होने पर कुछ और गार्ड थानों में धुन दिए जाएंगे, कुछ और रेशमा, माला हारमोन का इंजेक्शन लगवाने को तैयार हो जाएंगी ताकि ग्राहक बच्ची के शरीर में औरत का मजा ले सकें, सड़कों से कुछ और लड़के उठा लिए जाएंगे ताकि कुछ लोग सेक्स के नए स्वाद को चख सकें, मामूली बीमारियों से कुछ लोग और दम तोड़ देंगे| ये महा यज्ञ है चलता रहेगा, जो बेसहारा है, जिसके पास न पैसे की शक्ति है न सत्ता कि उसे इस यज्ञ में आहुति बनना होगा ताकि लोकतंत्र का ये महायज्ञ चलता रहे|

    कुछ पुराने बाबा कुछ नए बाबाओं के साथ आपस में मिल कर ज्ञान बांटते रहेंगे और लोगों को तमाम तरह का भ्रष्टाचार और दुराचार करने के बाद अपराध बोध से बचने के नुस्खे सिखाते रहेंगे| तरह-तरह के मोटिवेशनल स्पीकर आते रहेंगे और हमारे भीतर के भिखारी को गुदगुदाते रहेंगे, सफलता कैसे हासिल करें, सफल बनो, जीतो दुनिया को, जो चाहो वही पाओ…|

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    क्या हम वाकई नहीं चाहते कि यह लोकतंत्र थोड़ी बहुत सांस ले? इसकी पक्षाघात (पैरालिसिस) से पीड़ित नस-नाड़ियों में कुछ जीवन का संचार हो? कब वो दिन आएगा जब सूखता जल, मरती नदी, जहरीली हवा, विषाक्त (टॉक्सिक) भोजन, दिमाग कुंद करती शिक्षा, भयंकर ट्रैफिक, तबाह होती हरियाली, कूड़ों के ढेर हमें बेचैन करेंगे और हम मतदान या वोटिंग का कर्मकांड करके जादू के इंतेजार में घर पर नहीं बैठ जाएंगे बल्कि अधिकारियों को खटखटाएंगे, नेताओं को हिलाएंगे, भाग-दौड़ करेंगे, कोशिश करेंगे और साबित करेगे कि हम मुर्दा और भांड नहीं हैं|

  • अभिनव प्रयास : उत्तरप्रदेश के झाँसी जिले के ब्लाक बामौर के एक वर्षीय बच्चे के चेहरे की सर्जरी

    आज हम एक ऐसे परिदृश्य को दर्शाना चाहते हें जो प्रकृति द्वारा संरचित चित्रण के मूल रूप को परिवर्तित करता है। यह ग्राम धनोरा के असहाय निर्धन परिवार में जन्मे 1 बर्षीय बालक की कहानी है जिसका जन्म रात्रि के ऐसे नक्षत्र में हुआ जो उस पूरे परिवार की दिशा और दशा को विगाड़ देता है। 

    दोनों वक्त के भरण पोषण के लिए एक वक्त का खाना पैदा करने वाले व किसी दिन आधा पेट भरकर सो जाने वाले व्यक्ति दुर्गा प्रसाद अपने बेटे हिमांशु को लेकर बहुत उत्साहित थे और जब हिमांशू ने जन्म लिया तो उसके माता पिता उसको देख कर आश्चर्यचकित रह गए और मन ही मन भगवान से कहने लगे की किस जन्म का पाप किया था। आने जाने वालों की बधाई में भी एक उपहास, कभी कटाक्ष कभी भय सा दिख रहा था क्योंकि हिमांशु का होठ जन्म से कटा होने के कारण उसकी शक्ल विकृत दिखाई दे रही थी कोई इसको कुछ कह रहा था कोई कुछ, लेकिन था तो दुर्गाप्रसाद और उसकी पत्नी का अंश ही। सो बस मन मसोस कर रह गए।

    बच्चा दो माह का हो गया और माता पिता उसको देख देखकर और भविष्य की सोचकर बहुत परेशान थे फिर एक दिन RBSK की टीम धनोरा आगनवाड़ी स्वास्थ्य परीक्षण करने पहुची टीम की डॉ स्वाति श्रीवास्तव और संगीता बच्चों का परीक्षण कर रहे थे टीम के दूसरे सदस्य डॉ गोविन्द श्रीवास्तव आगनवाड़ी और आशा से बात कर के पूछ रहे ऐसे कोई बच्चा जो जन्म जात बीमारी से ग्रसित हो, काफी समझाने के बाद आगनवाड़ी ने बताया एक बच्चा है ऐसी बीमारी का जो जन्म से कटे होंठ का है। बुलवाये जाने पर आगनवाड़ी दुर्गाप्रसाद को बुलाकर लाई और उसके साथ गांव के कई लोग आ गए।

    टीम ने हिमांशू के कटे होठ की सर्जरी के बारे में बताना शुरू किया तो कई लोग हाँ कह रहे थे की सरकार की योजना तो ठीक है तो कई लोग वहीँ उसको गुमराह कर रहे थे कि वो ठीक है अपने आप सही हो जायगा टीम सभी की जिज्ञासा शांत करने की कोशिश कर रही थी वहीँ दुर्गाप्रसाद विचलित हो रहा था एक तरफ बच्चे का भविष्य दिख रहा था दूसरी तरफ वह अपनी आर्थिक स्थिति के बारे में सोच रहा था बहुत सोचकर दुर्गाप्रसाद बोला हमारे बच्चे को कोई परेशानी तो नही होगी मैं बहुत गरीब आदमी हूँ टीम उसको पूरी सांत्वना और प्रक्रिया बताकर वापस आ गयी।

    वापस आकर डॉ गोविन्द ने फोन पर जिला कार्यक्रम प्रबंधक श्री ऋषिराज और DEIC डॉ रामबाबू को बच्चे के विषय में जानकारी दी, डॉ गोविन्द पूर्ण विश्वास में थे क्योंकि जनपदीय प्रबंधन ऐसे कुछ केस और सर्जरी के लिए प्रयास रत थे और भागदौड़ में लगे थे। डॉ रामबाबू ने चिकित्सक से वार्ता कर निर्धारित तिथि पर बच्चे को चेकअप के लिए मेडिकल कॉलेज लाने के लिए कहा। बामौर से मेडिकल कॉलेज की दूरी लगभग 100 km देखते हुए जिला कार्यक्रम प्रबंधक द्वारा RBSK वाहन से ही दुर्गाप्रसाद को लाने की सलाह दी गयी क्योंकि चेकअप आदि में समय को देखते हुए कहीं दुर्गाप्रसाद निराश न हो जाये।

    तय दिन पर सुबह 7 बजे ही दुर्गाप्रसाद बामौर स्वास्थ्य केंद्र पर आ गया था। मेडिकल कॉलेज झाँसी में डॉ को दिखाया और बार्ड में भर्ती करने को बोला हिमांशू को वार्ड में भर्ती कराया फिर अगले दिन उसकी जाँच टीम की सदस्यों डॉ स्वाति और डॉ नेहा दुबे ने भागदौड़ करके पूरी करवा दी। जाँच में बच्चे का हिमिग्लोबिन कम होने के कारण कुछ दिन के लिए रोक दिया डॉ ने सलाह दी हीमोग्लोबिन सामान्य आने पर ही आप्रेशन किया जगया कुछ दवा लेकर दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे हिमांशू को लेकर वापस गाँव आ गया।

    इस बीच टीम फोन पर ही फालोअप कर रही थी धीरे धीरे दुर्गाप्रसाद भी निराश होता जा रहा था उसको लग रहा था उसका काम कागज़ों तक ही सिमट कर रह गया। स्थिति को समझते हुए डॉ गोविन्द श्रीवास्तव सीधे फिर धनोरा गाँव पंहुचे तो बच्चे की माँ बोली आप ने साहब कहा था की उसका आप्रेशन हो जायगा लेकिन सिर्फ इतने दिन बस जांच करवाकर कुछ नहीं हुआ हम मेहनत मजदूरी वाले लोग रोज रोज कब तक चक्कर लगाते फिरे? फिर समझाया गया कि बच्चे में खून की कमी को देखते हुए अभी ऑपरेशन संभव नहीं है कुछ महीनो में सामान्य आने पर आपरेशन कर दिया जायगा बच्चे को अपने पास से ताकत की सीरप और अच्छी खिलाई पिलाई करने की सलाह देते हुए फिर से समझा बुझा कर डॉ गोविन्द वापस आ गए।

    फिर कुछ महीने बाद बच्चे बामौर अस्पताल बुलाया और उसका हीमोग्लोबिन जांच बामौर अस्पताल में ही करा लिया अब उसका हीमोग्लोबिन सामान्य था जिसकी सूचना डॉ रामबाबू को दी गयी। इतने लंबे समय को देखते हुए स्माइल ट्रेन लखनऊ में बात की गयी सहमति मिलते ही अगले ही दिन डॉ गोविन्द श्रीवास्तव को कानपूर स्माइल ट्रेन में उसका ओप्रेशन कराने को कहा गया लेकिन परिस्थिति विकट हो चुकी थी दुर्गाप्रसाद गाँव वालो के कटाक्ष सुन सुन कर पक चुका था जो उसको रोज ताने दे रहे थे क्यों हुआ कुछ सरकारी काम?

    टीम ने जैसे ही दुर्गाप्रसाद से चलने की बात कही वो बोला नही साहब एक बार गये थे खून कम था अबकी बार फिर डॉ मना कर दिया तो गांव वाले बहुत मज़ाक उड़ाएंगे। टीम के समझाने पर अंत में कानपूर स्माइल ट्रेन जाने को राजी हुआ।कानपुर स्माइल ट्रेन में डॉ को दिखाया और उसको भर्ती कराया और उसकी जाँच कराई सब सामान्य थी अगले दिन उसका ओप्रेशन था आखिरकार हिमांशु को ऑपरेशन के लिए OT में भेजा गया और कुछ घंटे बाद हिमांशू बार्ड में आ गया उसको देख कर उसकी माँ की आँखो में आँसू आ गए और दुर्गाप्रसाद के तो बोल ही नही निकल रहे थे वो तो बस पट्टी खोलकर अपने बच्चे का चेहरा जल्दी से जल्दी देखना चाह रहा था।

    जब दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे हिमांशू को लेकर गाँव धनोरा पहुच गया गांव के लोग हिमांशू को सब देखने आ गए। दुर्गाप्रसाद अपने बच्चे को लेकर बहुत खुश था सरकार की योजना और टीम की पहल की सराहना हो रही थी। अब कुछ महीने बीत जाने अब हिमांशू पहले जैसा नही रहा अब वो सामान्य बच्चों की तरह उसका होंठ हो चुका है हिमांशू की माँ कहती हैं साहब आप न होते हम तो अपने बच्चे का कुछ नही करवा पाते आप की वजह से हमारा बच्चा बाकी बच्चों की तरह दिखने लगा है। हमारी टीम काफी खुश है हमें अच्छा लग रहा है गाँव के लोगो ने सरकार द्वारा चल रही योजनाओ की सराहना कर रहे हैं।

    हम अपने को गर्वान्वित महसूस करते हैं हम ऐसे एक अभिनव प्रयास के अंग है जो बच्चों के जीवन में खुशियाँ देता है और उनके माँ बाप के चेहरे पर मुस्कान!

    About Author:

    डॉ गोविन्द श्रीवास्तव 
    फिजियोथिरेपिस्ट RBSK
    ब्लाक बामौर, झांसी