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सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम नहीं –Jayant Jigyasu

Jayant Jigyasu

राजनीति विज्ञान के कौन-कौन धुरंधर हैं जो राजद के साथ कम्युनिस्ट पार्टी का गठबंधन भी चाहते हैं, मगर मेरे मुंह से फूले-अंबेडकर-पेरियार- सावित्री-फ़ातिमा-लोहिया-लिमये-कर्पूरी-जगदेव-बीएनमंडल-लालू-शरद, आदि का नाम सुनकर उनके कानों में शीशे पिघलने जैसा अहसास होता है, मेरा कुछ लिखा देखकर उनकी आंखों को चुभता है। बिहार में वे छात्र राजद और एनएसयुआई के साथ पटना युनिवर्सिटी छोड़ कर बाक़ी सभी युनिवर्सिटी में चुनाव भी लड़ते हैं, मगर कुछ मंडन मिश्र और विदुषी भारती टाइप के लोग लालू-शरद को रातदिन कोसने से बाज भी नहीं आते।

दोहरापन मेरे चरित्र में नहीं, बल्कि उन ज्ञानियों-ध्यानियों के डीएनए में है जो रात के अंधेरे में मामले डील करते हैं, मेरे जैसे लोग दिन के उजाले में सियासत करते हैं। जो बोलते हैं, डंके की चोट पर करते हैं। मैं न तो संस्कृति के नाम पर किसी की चरणवंदना करने में यक़ीन करता हूँ, न शर्त रखकर राजनीति करता हूँ। न किसी कंफ्यूजन में हूँ, न किसी 'कंफ्यूज्ड' पार्टी में। जहाँ जिस संगठन में हूँ, पूरी समझदारी से, पूरी ईमानदारी से।

जिसको यह लगता है कि सामाजिक न्याय और कम्युनिज़म एक-दूसरे के विलोम हैं, उनकी समझदारी में कोई बड़ी भारी गड़बड़ी है। मेरे आगे किसी का पेंचपांच न चला है, न चलता है, न चलेगा। लुच्चई, गुंडई, चुगलई और थेथरई में एक्सपर्टिज़ हो सकती है तुम्हारी, पर करेज, कंविक्शन और इंटेग्रिटी कहां से ले आओगे?

मैंने दो साल पहले ही कहा था कि जिस दिन सीताराम येचुरी लालू प्रसाद से, डी राजा राहुल गांधी से और डीपी त्रिपाठी शरद यादव से बतियाना-मिलना छोड़ देंगे, उस दिन मुझे कोई कहे। और, तब भी सियासत में किसी से संवाद और मुलाक़ात का सिलसिला हम तो नहीं ख़त्म करने वाले। कम्युनिज़म कब से इतना संकुचित और कुंठित हो गया? जिसे कम्युनिज़म का क भी नहीं पता, वो भी जहाँ-तहां लेक्चर देने लगता है। ज़माना ही जम्हूरों और जुमलेबाज़ों का है।

कोई बहुत ज़्यादा दिन नहीं हुए, यही कोई डेढ़ दशक पहले सीताराम येचुरी लालू प्रसाद के साथ चुनाव प्रचार में मेरे गृहविधानसभा अलौली आए थे और अमेरिकी साज़िश व पूंजीवादी ख़तरे की ओर वहाँ की जनता का ध्यान आकृष्ट कर रहे थे। ढाई दशक पहले सूर्यनारायण सिंह के लिए लोकसभा चुनाव में और सत्यनारायण सिंह के लिए विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद वोट मांग रहे थे। जब वोट चाहिए, तो लालू प्रसाद-शरद यादव बहुत ठीक, जब अपनी जीत सुनिश्चित करनी हो तो गठबंधन की वकालत करो, लेकिन जब लालू प्रसाद बीमार पड़ें तो जयन्त उनके स्वस्थ होने की सद्कामना न व्यक्त करे। मगर, ज्ञानी-ध्यानी लोग अपना टिकट श्योर कराने के लिए उनकी परिक्रमा कर आए, जयन्त इसी दोहरी राजनीति और दोगली नीति की आरंभ से मुख़ालफ़त करता रहा है और आगे भी वह अपने उसूल पर अटल रहेगा।

मैं क्या बोलता हूँ, यही तो बोलता हूँ कि लालू प्रसाद और राबड़ी देवी ने 6 (5+1) विश्वविद्यालय खोले जितने आज़ादी के बाद के उनके पहले के सारे मुख्यमंत्रियों ने मिलकर भी नहीं खोले। इसमें क्या तथ्यात्मक ग़लती है, ग़लत बोल रहा हूँ तो कोई चुनौती देके दिखाए या दुरुस्त करे। अगर यह कहता हूँ कि लालू प्रसाद के साथ मीडिया चयनित प्रश्नाकुलता दिखाती है, तो इसमें क्या ग़लत है, कोई साबित करे। जब यह कहता हूँ कि यह न्यायपालिका का फ़ैसला नहीं, ब्रह्मपालिका का फ़रमान है, तो उसमें मेरे अछरकटूआ व विशुद्ध दलाली पर आश्रित 'कम्युनिस्ट' मित्रों को बुरा क्यों लगता है! मत भूलिए, कि जनसमर्थन नहीं बल्कि जनप्रबंधन व मीडियाप्रबंधन की सियासत की उम्र लंबी नहीं होती। एक जातिविशेष का होने के चलते बिन कहे, बिन मांगे जो लाभ कुछ लोगों को मिल जा रहा है और वो बिन नंगे हुए सफ़ेदपोश बने घूमते फिर रहे हैं; उस पर किसी के लब क्यूं नहीं हिलते। कुछ लोग मर्यादा में रहें, तो अच्छा रहेगा।

क्या यह सच नहीं है कि इसी युनिवर्सिटी के दो प्रेज़िडेंट कांग्रेस और एनसीपी में हैं? क्या यह झूठ है कि एक तीसरे प्रेज़िडेंट एक नेशनल पार्टी के प्रेज़िडेंट की स्पीच लिखते हैं? और, एक प्रेज़िडेंट कब, कहां, किस-किस से छुप-छुप के मिलने और वरदहस्त प्राप्त करने चले जाते हैं शुतुरमुर्गी चाल के साथ; यह किसी से छुपा है क्या!

हम जिस किसी से मिलते हैं, रोशनी में मिलते हैं, दुनिया के सामने मिलते हैं, छात्र हित, शिक्षक हित, कर्मचारी हित, शोधहित, शिक्षा हित, विश्वविद्यालय हित और मानवता हित में मिलते हैं। मुझे किसी के सर्टिफिकेट की ज़रूरत नहीं, और ऐरूगैरू-नत्थूखैरू से क्या! लेकिन, मेरे पास न तो सुब्ह-शाम ठकुरसुहाती करने का वक़्त है, न हाजरी लगाने का स्वभाव, न किसी का भाषण लिखने के दुर्दिन आए हैं। टीटीएम और फ्लैटरी करके न कभी कुछ चाहा है न किसी की कृपादृष्टि से यहाँ तक आया हूँ। जहाँ हूँ, वहाँ संघर्ष, प्रतिभा, जुनून और जज़्बे के चलते हूँ, किसी के रहमोकरम पर नहीं। न तो किसी ने खैरात में कुछ सौंपा है, न किसी ने मुझ पर कोई अहसान किया है। मैं निजी जीवन, समाज, संगठन या सियासत में जिस जगह खड़ा हूँ, वहाँ किसी का कृपापात्र बनकर नहीं हूँ। लेकिन, ऐसे कई कूपमंडूक, व्यभिचारी-दुराचारी-अत्याचारी लोग हैं इसी समाज में, जिन पर चंद लोगों की नज़रे-इनायत न हो तो वुजूद मिट जाए। जिनके निजी और सार्वजनिक जीवन में दोहरे आचरण, झूठ-फरेब और मनुवादी मानसिकता की कार्यसंस्कृति की कोई इंतहा ही नहीं।

दीवारो-दर को सारे ही घर को बुरा लगा
पत्ता हरा हुआ तो शजर को बुरा लगा। (नवाज़)

Jayant Jigyasu

Studied in,

Indian Institute of Mass Communications, IIMC, Delhi

JNU, Delhi

St. Stephen's College, Delhi

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