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गालियां अचानक इतनी मुकद्दस क्यों हो गई हैं बख़्तरबंद स्टूडियो से रणभेरी बजाने वालों के लिए? –Tribhuvan

Tribhuvan

मैंने सुना और पढ़ा है कि इस धरती पर संस्कृति का सूत्रपात उस व्यक्ति ने किया, जिसने सबसे पहली गाली दी।

लेकिन लगता है, गालियां अचानक और भी मुक़द्दस हो गई हैं। निहायत ही अक़ीदत से एक नेशनल टीवी चैनल इस पर इस तरह पढ़ी जा रही हैं कि पूरी व्यवस्था इस देश में एक ही बंदे के ख़िलाफ़ हो गई है। मैंने पत्रकारिता में आज तक यह नहीं देखा कि किसी व्यक्ति ने अपने ऊपर फेंकी जा रही गालियों को इस तरह किसी ने ख़बर बनाया हो। ऐसा एक बार अरुण शौरी साहब ने अवश्य किया था, जब चौधरी देवीलाल ने उन्हें फ़ोन पर बहन.. कहा था और शौरी साहब ने उसे इंडियन एक्सप्रेस ने वैसा का वैसा फ़्रंट पेज पर छापा भी था।

लेकिन क्या आजकल चल रही इस ख़बर और उस रुदन में कोई अंतर है, जो पिछले दिनों गुजरात चुनाव में सुनाई दिया था? जिसमें कई बार बहुत गुस्सैल और कई बार बहुत रोतली भाषा में कहा गया कि देखो मेरे देशवासियो, मुझे इन लोगों ने नीच कहा। मनूं नीच कह्यो! नीच कहा, वह तो समझ में आता है कि एक ऐसा शख्स था, जिसे नोटिस लिया जाना चाहिए, क्योंकि वह केंद्र में मंत्री रहा है। यह भी समझ में आता है कि देश का उपप्रधानमंत्री जब किसी के साथ लूज़ टॉक करे तो वह ख़बर बनती है।

और यहां जब सब लोग जानते हैं कि केंद्र सरकार के मंत्रियों के ट्विटर और फ़ेसबुक एकाउंट कुछ खास कि़स्म के लोग चलाते हैं। क्या किसी मंत्री या प्रधानमंत्री के पास वाक़ई इतना टाइम है कि वह इतने ट्वीट पढ़े या उनका जवाब दे? यह सब जानते हैं कि यह सब काम मंत्रियों के इर्दगिर्द के लोग करते हैं। और आजकल इन चीज़ों की बाढ़ आई हुई है।

अगर गालियां किसी व्यक्ति के इर्दगिर्द रोशनी या अंधेरे की दीवार खड़ी हो जाने का प्रमाण हैं तो मेरे ख़याल से इस आधार पर न तो कोई नरेंद्र मोदी को छू सकता आैर न ही राहुल गांधी को। गालियां खाने में तो राहुल गांधी हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भारी ही पड़ेंगे। ये ही क्यों, मीडिया की कई हस्तियां जितनी गालियां खाती हैं, उनका कोई हिसाब ही नहीं है। आप कई सुनाम पत्रकारों के ट्वीटर हैंडल देखेंगे तो परिचय में मिलेगा : प्रेस्टीट्यूट, पाकिस्तानी, देशद्रोही, आईएसआई एजेंट, पेड मीडिया आदि आदि। आप पत्रकार हैं और कुछ लिखेंगे तो लोग ऐसी प्रतिक्रियाएं भी देंगे। ऐसा कौन पत्रकार है, जो निर्भीकता से लिखता है और उसे गालियां नहीं पड़ती हों। आए दिन ऐसा लोगों के साथ होता है। आपको अगर गालियों से इतना ही भय लगता है तो आप ऐसे पेशे में हैं ही क्यों? और ऐसी स्टोरी करते ही क्यों है? अगर करते हैं तो दिलीप मंडल की तरह गालियों का आनंद लेना भी सीखें और उन्हें सार्वजनिक भी करते रहें। या फिर मेरी तरह डिलीट करके आनंद लेते रहें।

गाली दरअसल निराशा और हताशा की भाषा है और पराजित लोग इनका इस्तेमाल करते हैं। लेकिन अगर गाली पर आप परेशान होने लगे तो संभव है कि निराशा आपके भीतर भी गहरा रही है। गालियां बताती हैं कि गोली देने वाले के माता-पिता, उसके घर का आंगन, उसके गांव या शहर की संस्कृति और संस्कार कैसे हैं। मां-बहन करने वाले ऐसे कायर लोगों की ज़मात हमें अपने इर्दगिर्द कितना मिलती है। ये किस दल में नहीं हैं? किसी विचारधारा में नहीं है? या फिर किस धर्म में नहीं हैं? या कि किस देश में नहीं हैं? अब सब लोग मारवाड़ से तो हैं नहीं कि बोलेंगे, ऐंकर शाब थारे हिर माथे म्हारे जूतो बिराजै, जे थे म्हारे मोदी शाब ने फेर कीं कैयो तो! लेकिन ऐसी गाली पर आपको भी क्या मज़ा आएगा!

सोशल मीडिया ने एक बड़ा बदलाव किया है। हम अपनी हर बात सोशल मीडिया के माध्म से हर व्यक्ति तक पहुंचाना चाहते हैं, लेकिन उसकी बात लेना नहीं चाहते। यह कैसे संभव है?

हमारे सब बंद रोशनदान, खिड़कियां और दरवाज़े खुल गए हैं और गलियों का सारा कचरा घरों में उड़कर आ रहा है। पंडित जवाहरलाल नेहरू तो कब से गालियां खा रहे हैं। क्या महात्मा गांधी को गालियां नहीं पड़ रही हैं? सोशल मीडिया का तब तो काेेई अस्तित्व ही न था। इंदिरा गांधी से लेकर सोनिया गांधी तक महिला नेताओं को क्या नहीं गरियाया जाता? क्या वसुंधरा राजे, स्मृति ईरानी या अन्य महिलाएं उससे बच जाती हैं? क्या अमर्त्य सेन को गालियां नहीं दी गईं?

ऐसा कौन है, जिसे गाली नहीं दी जा रही है? आप मोदी की तारीफ़ कर दें, तत्काल आपको गालियां शुरू हो जाएंगी। जो व्यक्ति स्वयं गालियों से इतना परेशान हो रहा है, क्या वह स्वयं अपने प्रतिद्वंद्वी साथियों को गोदी मीडिया नहीं कहता? यह क्या है? क्या किसी हमपेशा पत्रकार को गोदी मीडिया कहना गाली नहीं है? आपको तो जो गालियां दे रहे हैं, वे सबके सब चवन्ने हैं, लेकिन आप तो चवन्ने नहीं, एक प्रतिष्ठित मीडिया के बहुत ही ज़हीन शहीन और ऐसे पत्रकार हैं, जो साहसिक पत्रकारिता के आयाम छूने की कोशिशें बहुत बार करते हैं, लेकिन नहीं कर पाते, क्योंकि आप आत्ममुग्धता का शिकार बन जाते हैं।

प्रश्न है कि क्या वर्चुअल संसार की गालियों और धमकियों को वह दर्जा मिलना चाहिए, जो वास्तव में गालियां और धमकियां होती हैं? अाप एक बार इस देश के सुदूर इलाकों में जाइए और देखिए कि माफ़िया, एसपी, थानेदार, सरपंच, विधायक या किसी क्षेत्रीय क्षत्रप के ख़िलाफ़ लिखना और वहीं रहना कितना जोख़िम का काम है? ये लोग ट्रेक्टर या जीप के पीछे बांधकर घसीटते हैं और तब कोई नेशनल चैनल एक शब्द भी नहीं बोलता।

जिन पत्रकारों को गालियां और धमकियां मिलती हैं, वे बख्तरबंद दफ्तरों से बख्तरबंद कारों और बख्तरबंद घरों में न तो रहते हैं और न चलते हैं। वे इस देश की सड़कों पर इस देश की गलियों में आम लोगों के बीच रहते हैं। वे मार खाते हैं। वे गोलियां खाते हैं। वे नौकरियों से निकाल दिए जाते हैं। उन पर कार, जीप या ट्रक चढ़ा दिए जाते हैं। लेकिन उनके लिए कहीं कोई ऐसा नहीं होता जो वर्चुअल गालियों और धमकियों को तो इतना गंभीरता से लें और असली धमकियों और गोलियों की चर्चा भी नहीं करें।

पत्रकारिता न तो विरोध की राजनीतिक भाषा है और न ही धर्म सुधार आंदोलन का हिस्सा। यह निहायत ही अक़ीदत से किया जाने वाला काम है। वह स्वयं तो सारा दिन आलीशान बख़्तरबंद स्टूडियो से देश भर के अख़बारों में कथित छोटे और लोकल पत्रकारों की दसियों बार की गई खबरों को नए सिरे से लच्छेदार भाषा की पैकेजिंग में परोसकर अपने आपकी पगड़ी पर मोरपंख लगा लेते हैं, लेकिन वे यह नहीं जानते कि उनके अपने ही साथी उसी दिल्ली में लू के थपेड़े खाते हुए चिड़ियाघर के पिंजरों से बंद बंगलों में बैठे नेताओं की बाइट या न्यूज बटोरने के लिए लू और शीतलहर में किसी तपस्वी से एक पांव पर खड़े पत्रकारिता करते हैं आैर अपने धर्म को निभाते हैं। न कोई आत्ममुग्धता और न किसी की गाली और गोली से परवाह। और जो बख्तरबंद महल की पत्रकारिता करता है वह जय हिन्द!

जैसे दिल्ली के वीवीआईपी बख्तरबंद नेता, वैसे ही दिल्ली के ये वीवीआईपी बख्तरबंद पत्रकार! नींव की ईंटों को कौन याद करता है, जब कंगूरों के शोर से देश में अनुगूंज पैदा करने की कोशिशें होने लगें।

Credits: Tribhuvan's Facebook

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