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समाजवादी पार्टी के नेता शिवपाल सिंह यादव के साथ सोशलिस्ट फैक्टर के संपादक फ्रैंक हुज़ूर की बेबाक बातचीत

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अपने संगठनात्मक कौशल से समाजवादी पार्टी की नीव को अटूट मजबूती देने वाले शिवपाल सिंह यादव (उम्र, 63) को 1996 में पहली बार जसवंत नगर की जानते ने अपना प्रतिनीधि चुनकर विधानसभा में भेजा। इसी जसवंत नगर विधानसभा से नेताजी ने अपने राजनैतिक सफ़र की शुरुवात की थी, फिर केंद्र की राजनीति में दस्तक देने के बाद प्रदेश की राजनीति को बतौर उत्तराधिकारी जसवंत नगर की सीट से शिवपाल के राजनैतिक सफ़र की शुरुआत करायी। जिस तरह से भारतीय राजनीति मुलायम सिंह यादव को नेताजी और अखिलेश यादव को भईयाजी के नाम से जानती है उसी तरह शिवपाल सिंह यादव को चाचाजी के नाम से जाना जाता है। देश के समाजवादियों के कतार में खांटी समाजवादी की पहचान को बनाये हुए जनहित के मुद्दों को लेकर कभी कलेक्ट्रेट तो कभी ब्लॉक पर सरकार के खिलाफ मोर्चा खोले रहते थे।

Shivpal Singh Yadav and Frank Huzur

फ़्रैंक हुज़ूर: मेरा पहला सवाल है कि सैफई, जिस गाँव में आपका जन्म हुआ है, आज भारत में जब भी समाजवाद की बात होती है तो उसे सैफई से भी जोड़ कर देखा जाता है।आपने नेता जी में पहली बार राजनीति को कब महसूस किया? और पहली बार आप में राजनीति करने की इच्छा कब जगी?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! पहले तो आपने सैफई का ज़िक्र किया तो सैफई एक छोटा सा गाँव है जो अब बड़ा हो गया है वहाँ बहुत सी सुविधायें हो गई हैं जैसे रोड़ की सुविधा हो गई, तहसील की सुविधा को गई अस्पताल की सुविधा हो गई है। लेकिन पहले तो एक छोटा सा गाँव ही था।

हम लोग वही पैदा हुए, वही पढ़ाई किये। प्राइमरी स्कूल में पढ़े हैं, उस समय प्राइमरी स्कूल में सिर्फ़ एक कमरा हुआ करता था, उसी एक कमरे में एक से लेकर पाँचवी क्लास तक की पढ़ाई होती थी।

वही से शुरूआती पढ़ाई लिखाई शुरू हुई थी फिर कक्षा पाँच पास करने के बाद छठी कक्षा में हमारा एडमिशन जैन इंटर कॉलेज करहैल में हुआ, जहाँ नेता जी लेक्चरर थे, तो छठी से लेकर बारहवाँ तक वही पढ़े, गाँव से स्कूल तक पैदल जाते थे तब तो साइकल भी नही थी।

हमारे गाँव के सभी बच्चे स्कूल तक पैदल ही जाते थे। नेता जी पढ़ाने के लिये साइकल से जाते थे। तब तो वैसा कोई रास्ता भी नही था स्कूल तक जाने के लिये, बारिश के समय पर तो हम लोग खेतों की मेड़ों से होकर जाते थे। वहाँ एक बम्मबा नहर था जिसमें पानी भरा रहता था तो स्कूल तक जाने में दिक़्क़तें होती थी।

नेताजी 1967 में जब पहला चुनाव लड़े थे तब हम बारह-तेरह साल के बच्चे थे तो ज़्यादा कुछ पता नही था। नेता जी पहला चुनाव जीत कर सदन में पँहुचे।

हम लोग बचपन में नेताजी के चुनाव प्रचार के लिए गाँव गाँव जाकर पोस्टर लगाते थे, उनके लिए नारे लगते थे….

फ़्रैंक हुज़ूर: जब पहला चुनाव नेताजी लड़े तो उनके चुनाव प्रचार में आपकी क्या भागीदारी थी?

शिवपाल सिंह यादव: हम लोग उस समय बच्चे ही थे तो क्या चुनाव प्रचार करते, जहाँ तक मुझे याद है कि सत्तर के बाद जब हम हाईस्कूल में पहुँच गये थे तो उसके बाद जो भी चुनाव आता था हम लोग नारे लगाते थे। जब भी किसी समाजवादी की गाड़ी आती थी तो हम नारे लगाते थे और किसी दूसरे पार्टी की गाड़ी आती थी तो उसका विरोध करते थे। गाँव गाँव पोस्टर लगाते थे। ये सारे काम आज भी चलते हैं, हम जब भी गाँव जाते हैं छोटे छोटे बच्चे नारे लगाने लगते हैं।

फ़्रैंक हुज़ूर: 1971 के उस दौर में पाकिस्तान और भारत के बीच युद्ध भी हुआ था, उस समय नौजवानों में, गाँव के लोगो में किस तरह का माहौल हुआ करता था? उस दौर की कोई बात जो आपके ज़ेहन में हो?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1971 में तो हमारे गाँव से कई लोग सेना में भर्ती हो गये थे। जब युद्ध हुआ तो हमारे सबसे बडे़ भाई रतन सिंह भी जाकर सेना में भर्ती हो गये थे। हमारे पड़ोस के रामशरण यादव भी सेना में भर्ती हो गये थे और नेता जी के जो बार्बर थे राममूर्ती वो भी भर्ती हो गये थे। एक ड्राइवर हुआ करते थे बेंचे वो भी भर्ती हो गये थे, तो उस समय जब भर्ती हो रही थी तो ये सब लोग जाकर सेना में शामिल हो गये थे। उस समय का इतना ही याद है। ये लोग छूट्टी लेकर गाँव आते थे।

फ़्रैंक हुज़ूर: जब ये लोग सेना से लौटकर गाँव आते थे तो क्या बताते थे?

शिवपाल सिंह यादव: वही सब बातें बताते थे कि चाइना से कैसे युद्ध लड़े, पाकिस्तान से कैसे युद्ध लडे़। सीमा पर की कहानियाँ सुनाते थे।

फ़्रैंक हुज़ूर: उन लोगो की बातें सुनकर कभी ऐसा लगा कि हमें भी सेना में जाना चाहिये? या फिर सियासत मे आने की वजह सिर्फ़ नेताजी बने?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब नेताजी चुनाव लड़ने लगे तो हम सब उनके लिये काम करते थे, उस समय पर्चियाँ काटी जाती थी। चुनाव के एक महीने पहले से पर्चियाँ काँटना शुरू कर देते थे। वोटर लिस्ट लेकर के हम लोग पर्चियाँ तैयार करते थे और चालिस-पचास लोग मिलकर के साइकल से गाँव गाँव प्रचार करने जाते थे, पोस्टर लगाते थे, नारे लगाते थे।

तो यही सब काम चलता था। ये तो हम लोगो ने 1972 में शुरू कर दिया था। 1974 में फिर से नेताजी विधायक बन गये थे और 1975 में एमरजेंसी लग गई थी। जब एमरजेंसी लगी तो हम के.के. डिग्री कॉलेज, इटावा में पढ़ते थे। जहाँ हम लोग रहते थे वहां कभी कभी नेताजी भी वही आ जाते थे। नेताजी जब भी लखनऊ से लौटते थे तो हम लोगो के पास इटावा में रूक जाते थे। हम लोग एक ही मकान में रहते थे।

जब एमरजेंसी लगी तो हम वही इटावा में थे, नेताजी भी थे। हमारे पास एक फ़िलिप्स का ट्रांजिस्टर था उस पर सुना था कि एमरजेंसी घोषित हो गई है। पुलिस घूमने लगी मोहल्ले में, तब तो शायद लोकदल हुआ करता था या जन संघ पार्टी हुआ करता था, इनके लोगो की गिरफ़्तारियाँ शुरू हो चुकी थी ट्रांजिस्टर पर हम लोग सुनते थे। तब तो हमें एमरजेंसी का मतलब भी नही पता था, हमारे पड़ोस में एक कांग्रेस के नेता थे रामाधिन शर्मा,उनका हमारे यहाँ उठना बैठना होता था तब हमने उनसे बात की, उनसे पूछा कि एमरजेंसी का मतलब क्या है? तब उन्होंने बताया कि एमरजेंसी लग चुकी है गिरफ़्तारियाँ शुरू है।

उस समय हमारे घर पर भी पुलिस आती थी। पुलिस वाले पुछते थे कि विधायक जी कहाँ हैं, उस समय नेताजी को विधायक जी कहा जाता था। तब तक तो हम लोगो को पता चल ही चुका था कि गिरफ़्तारियाँ शुरू हो चुकी है। उस समय नेताजी भर्तना की ओर किसी शादी में गये हुए थे, तो हम लोगो ने पुलिस को उसके उल्टी तरफ़ सिकोहाबाद की ओर बता दिया कि नेताजी उधर गये हैं। तो नेताजी जब रात में लौटे तो हम लोगो ने घर में बाहर से ताला लगा दिया और पुलिस आई तो उसको बता दिये कि घर पर कोई है हि नही, फिर सबेरे चार बजे नेता जी को मोटरसाइकिल से गाँव तक छोड़ आये।

उस समय एक नेता हुआ करते थे राम सेवक जो अभी भी हैं, वो किसी की मोटरसाइकिल लेकर आये और नेता जी को सुबह चार बजे गाँव छोड आये। तब उस समय नेता जी की गिरफ़्तारी नही हो पाई। उसके बाद नेता जी गाँव गाँव जाते रहे लोगो से मिलते रहे, एक महीने के बाद नेताजी की गिरफ्तारी हुई। नेता जी 18-19 महीने तक जेल में रहे।

जब नेताजी एमरजेंसी के समय जेल में बंद थे तो मैं हर रोज उनसे मिलने जेल में जाता था….

फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप नेताजी से मिलने जेल में जाते थे?

शिवपाल सिंह यादव: हाँ, एक दिन में दो बार तो अनिवार्य रूप से रोज मिलने जाते थे। नेताजी को जिस भी सामान की ज़रूरत पड़ती थी हम पहुँचा आते थे। उस समय के एक जेलर थे वाजपेयी जी जिनसे हमारी दोस्ती भी हो गई थी। जब कभी जेल में नेताजी से मुलाक़ात नही हो पाती थी तो जेलर साहब को ही सामान दे आया करते थे।

फ़्रैंक हुज़ूर: जब आप नेताजी से जेल में मुलाक़ात करके वापस गाँव, घर, परिवार के बीच लोटते थे तो लोग क्या पुछते थे?

शिवपाल सिंह यादव: अरे! उस एमरजेंसी के समय तो हम लोग लड़के ही थे। जब हम लोग जेल के गेट तक पहुँचते थे तो पुलिस खदेड़ती थी, हम लोग भाग जाते थे। एमरजेंसी लगने के एक-दो महिने तक तो पुलिस का आतंक था। लेकिन हम लोगों को क्या ही फ़र्क़ पड़ता था, पुलिस खदेड़ती थी हम लोग भाग जाते थे। जेल के पास में ही स्टेशन था तो उधर की भाग जाते थे। और जब भी कभी नेताजी से मुलाक़ात होती तो नेताजी जो भी पत्र लिख कर देते थे उसे गाँव तक हम लोग पहुँचा आते थे। फिर हम लोग चुनाव की तैयारी भी करते थे, तो वहीं से हमारी राजनीति शुरू हो गई थी, एमरजेंसी के बाद।

फ़्रैंक हुज़ूर: एक नेता के रूप में आपने पहला भाषण कब दिया था?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! हम लोग तो अपना काम करते रहे, उस समय केवल हम लोगो का काम था कि नेताजी की मीटिंग बडे़ नेताओं से करायें जैसे जनेश्वर मिश्राजी थे, रामनारायण जी थे, अनंत जायसवाल जी थे।

ये सभी बडे़ समाजवादी नेता हुआ करते थे। इनकी जब मीटिंग होती थी तो हम लोग कराते थे। गाँव में छोटे छोटे पंचायत के स्तर पर इन नेताओं की मीटिंग कराते थे। फिर हम 1988 में ज़िला सहकारी बैंक के चेयरमैन हो गये। मुझे याद है कि हरदोई में नेताजी की एक मीटिंग होनी थी, वहाँ मैने अपना पहला भाषण दिया था। हमारे यहाँ समाजवादी पार्टी के जिले के महासचिव गया प्रसाद वर्मा जी थे जो तीन बार विधायक बने थे तो उनके साथ कई मीटिंग हमने अटेंड की फिर तो धिरे धिरे एक महराज सिंह हुआ करते थे पार्टी के अध्यक्ष, वो भी पाँच बार भर्तना से विधायक बने। कोऑपरेटिव मूवमेंट से इसकी शुरूआत हुई।

जब उत्तर प्रदेश को पहली बार कोई पिछड़ा मुख्यमंत्री मिला तो गाँव गाँव लोगो में बहुत उत्साह था…….

फ्रैंक हुज़ूर: उस दौर में कांग्रेस की जो राजनीति थी, जो भी उस पार्टी के मुख्यमंत्री पद के नेता बनते थे वो भी ज़्यादातर सवर्ण समाज के होते थे। जिस तरह से आज भाजपा पर सवर्णपरस्ती का आरोप लगता है वैसे ही उस समय कांग्रेस पर भी लगता था तो उस समय जब पहली बार रामनरेश यादव उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बनते हैं और वो उस समय पिछड़ो के प्रतिनिधित्व/अधिकार की बात करते हैं जिसके चलते गाली भी खाते हैं। क्या उस समय समाज में किसी तरह का विरोधाभास पैदा हुआ था? जिस तरह से मंडल कमीशन के बाद हुआ था।

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! एमरजेंसी के बाद जब सरकार बनी, सबकी मिली जुली जनता पार्टी बनी। सभी लोग कांग्रेस के विरोध में हो गये थे। और यहाँ मुख्यमंत्री रामनरेश यादव बने उनके बाद बनारसी दास भी मुख्यमंत्री बने। जब  रामनरेश यादव मुख्यमंत्री बने तो पिछड़ो में ख़ुशी का माहौल था। पहली बार जब कोई यादव मुख्यमंत्री बना तो गाँव गाँव लोगो में बहुत उत्साह था क्योंकि इसके पहले तो केवल सवर्ण ही मुख्यमंत्री बनते थे।

नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे……

फ़्रैंक हुज़ूर: जब नेताजी पहली बार कोऑपरेटिव मिनिस्टर बने थे तब लखनऊ से आपका जुड़ाव ज़्यादा हो गया रहा होगा?

शिवपाल सिंह यादव: उस समय भी हम पढाई ही कर रहे थे। एमरजेंसी के पहले ही हमने बी ए कर लिया था उसके बाद एम ए किया फिर 1978 में लखनऊ के क्रिश्चियन कॉलेज से ही बीपीएड किया तब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे। पहले नेताजी 16, गौतमपल्ली में रहते थे हम भी उनके साथ ही रहे और विक्रमादित्य में जब नेता जी रहे तब भी हम कुछ दिनों तक उनके साथ ही रहे। इसके बाद ही हम राजनीति में सक्रिय हो गये थे।

फ़्रैंक हुज़ूर: आप पर नेताजी की राजनीति का असर लगातार हो रहा था तो क्या आप कह सकते हैं कि नेताजी आपके राजनैतिक गुरू हैं?

शिवपाल सिंह यादव: हाँ, नेताजी के साथ ही हमेशा काम किया है और हमारे जिले के जो गया प्रसाद वर्मा जी थे, महराज सिंह जी थे इनके साथ भी काम किया है।

फ़्रैंक हुज़ूर: कहते हैं कि गोपाल कृष्ण गोखले, गांधी जी के भी गुरू थे, कुछ लोग कहते हैं कि वो जिन्ना के भी गुरू थे तो उसी तरह आपका राजनैतिक गुरू किसे कहा जाय?

शिवपाल सिंह यादव: तब तो नेताजी को ही कहा जायेगा। नेताजी ने पढ़ाया भी है, मेरा विषय पॉलिटिकल साइंस भी था। पहला पीरियड नेताजी का ही लगता था वही पढ़ाते थे। तो नेताजी पढ़ाई लिखाई में भी गुरू रहे, पॉलिटिक्स में भी गुरू रहे और परिवार के गार्जियन भी रहे।

अखिलेश (टीपू) हमारे साथ ही रहते थे…..

फ़्रैंक हुज़ूर: उसी समय में अखिलेश जी का जन्म होता है और नेताजी पिता भी बन जाते हैं, तो उस दिन के बारे में कुछ बतायेंगे?

शिवपाल सिंह यादव: हाँ, उस समय तो मैं गाँव में ही था, जिस दिन इनका जन्म हुआ 1972 में लोगो ने ख़ुशी ज़ाहिर की थी। जिसको हम लोग बड़ी माँ बोलते थे, जो प्रोफ़ेसर की माँ थी उन्होंने सबसे पहले आकर हमें बताया सुबह सुबह जब अखिलेश जी का जन्म हुआ। फिर ख़ुशी का माहौल था।

फ़्रैंक हुज़ूर: अखिलेश जी ने अपना ज़्यादातर समय आपके परिवार के साथ बिताया, मिलेट्री स्कूल से लेकर हर जगह आप गार्जियन के रूप में मौजूद रहे। क्या आपने उस समय कभी ऐसा महसूस किया कि ये लड़का आगे चलकर राजनीति में जायेगा?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! शुरूआत में जब नेताजी कोऑपरेटिव मिनिस्टर थे तब ये बहुत थे चार साल के रहे होंगे। तब मेरे साथ ही गाँव से लखनऊ आकर के पंद्रहदिन तक रहे थे, तक तक उनका एडमिशन नही हुआ था। उसके बाद ही उनका एडमिशन इटावा सेंट मैरी में कराया गया था। सेंट मैरी स्कूल सेचौथी क्लास पास करने के बाद ही मिलिट्री स्कूल, धौलपुर में एडमिशन कराने मैं ही ले गया था।

फ़्रैंक हुज़ूर: अखिलेश के साथ कुछ ऐसी बातें या कोई यादगार पल जो आप साझा करना चाहें?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब हमारे साथ ही रहे तो यादगारे तो बहुत सी हैं, अब जो चाहे लिख लेना।

फ़्रैंक हुज़ूर: बचपन में अखिलेश जी का व्यवहार कैसा था? जैसे सीधे थे, शरारती थे या शर्मीले थे?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! शर्मीले तो नही थे। खेल कुद में ज़्यादा मन लगता था।

फ़्रैंक हुज़ूर: किस खेल में इनका ज़्यादा मन लगता था? कौन सा खेल खेलते थे?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! मोहल्ले में जहाँ हम लोग रहते थे किराये के मकान में, तो मोहल्ले के लड़के इकट्ठे हो जाते थे उनके साथ खेलते थे और जब बडे़ हुए तोक्रिकेट, फ़ुटबॉल ज़्यादा खेलते थे। फ़ुटबॉल में उनका ज़्यादा मन लगता था।

बाबरी विध्वंस के समय मैं इटावा में था फिर भी मुझपर मुक़दमे किये गये, मैं 6 महीने तक अंडरग्राउंड था.....

फ़्रैंक हुज़ूर: अब लौटते हैं आपकी राजनीति पर, 1988 में आप ज़िला कोऑपरेटिव बैंक के चेयरमैन बने और 1989 में नेता जी मुख्यमंत्री बन गये। नेता जी ने 1987 से 89 तक पूरे प्रदेश में क्रांति रथ लेकर चले तो उसके बारे में कुछ बताइये?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1989 में केंद्र में दोबारा सरकार बन गई थी लेकिन सरकार बनने के बाद ज़्यादा दिन तक सरकार नही चल पाई थी। बाबरी मस्जिद प्रकरण के वजह से सब लोग अलग हो गये थे। इसे लेकर पहले केंद्र सरकार में झगड़ा हुआ फिर उसके बाद नेताजी ने इस्तिफा दिया था फिर चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने फिर उन्होंने भी इस्तिफा दिया उसके बाद नेताजी ने यहाँ से इस्तिफा दिया फिर चुनाव के मैदान में गये उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने।

उसी दौर में कारसेवा निकली, कार सेवा में अधिकारियों ने गोली चलाई और मुझ पर भी उस केस में एफ़आइआर हुआ। जब पहली बार कल्याण सिंह मुख्यमंत्री बने तो उस सरकार में मुझपर बहुत से झूठे मुक़दमे हुए जिसके चलते 6 महिने तक मैं अंडरग्राउंड भी रहा फिर कोर्ट से स्टे आर्डर लिया। कार सेवकों पर जो भी लाठी चार्ज हुआ ,गोलियाँ चली वो अधिकारियों ने किया था उस समय तो मौक़े पर हम थे ही नही फिर भी फ़र्ज़ी मुक़दमे मुझपर कराये गये।

फ़्रैंक हुज़ूर: कारसेवकों पर गोलियाँ चली, संविधान को, सामाजिक न्याय को और इस देश की धर्मनिर्पेक्ष राजनीति को बचाने के लिये नेताजी ने बहादुरी से क़दम उठाया, जिसका स्वागत देश की धर्मनिर्पेक्ष व सामाजिक न्याय पसंद आवाम ने किया और दूसरे तरफ़ भाजपा के लोगो ने मुल्ला मुलायम जैसे नारों को उछाला उसका ख़ूब प्रचार प्रसार किया गया। उस समय आपका कहाँ खड़े थे? आप क्या सोच रहे थे?

शिवपाल सिंह यादव: हम तो पार्टी का काम करने लगे थे। इटावा और उसके आसपास के इलाक़ों में पार्टी का काम कर रहे थे। 1991-92 में जब बाबरी मस्जिद पर हमला किया तो भाजपा की सरकार चली गई उसके बाद 1993 में जब फिर से चुनाव हुआ तो नेताजी मुख्यमंत्री बने, कांशीराम से समझौता होने के बाद सरकार बनी थी। फिर वो सरकार 18 महिने चली कांशीराम ने समर्थन वापस ले लिया था तो सरकार गिर गई उसके बाद कुछ समय के लिये मायावती मुख्यमंत्री बनी फिर कल्याण सिंह कुछ दिन के लिये मुख्यमंत्री बने।

नेताजी ने बाबरी मस्जिद को बचाने के लिये सारा पुलिस फ़ोर्स लगा दिया था……

फ़्रैंक हुज़ूर: बाबरी विध्वंस के दिन आप नेताजी के साथ बैठे होंगे तो उस घटना को लेकर क्या बात हो रही थी?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उस समय जब बाबरी मस्जिद टूटी तो मैं इटावा में था। नेताजी के समय में जब कारसेवकों ने बाबरी मस्जिद पर हमला किया तब मैं लखनऊ में था। नेताजी ने तब भी बचा लिया था, पूरी पुलिस फ़ोर्स बाबरी मस्जिद को बचाने के लिये लगाई थी। उसके बाद जब 1992 में मस्जिद गिराई गई तब मैं इटावा में था प्रदेश के लोग सहमे दिखाई दे रहे था, बाबरी विध्वंस के खिलाफ पूरे देश में आंदोलन शुरू हो गया था और भाजपा वाले बाबरी विध्वंस के समर्थन नारे लगा रहे थे। उस समय पूरे प्रदेश में हमारी पार्टी के लोगो ने भाजपा के खिलाफ ज़िलाधिकारियों को ज्ञापन दिया था और हम लोगो ने भाजपा का विरोध किया। उस समय सड़कों पर समाजवादी पार्टी के लोगों का भाजपा के लोगो से बहुत जगह तकरार भी हुआ, मुक़दमे भी लिखे गये।

जैसे नेताजी ने बाबरी मस्जिद को बचाया था वैसे ही कांग्रेस भी चाहती तो बचा लेती....

फ़्रैंक हुज़ूर: बाबरी मस्जिद पर जब हमला हुआ तब केंद्र में कांग्रेस की सरकार थी, नरसिम्हा राव तात्कालिक प्रधानमंत्री थे। आपको क्या लगता है कि बाबरी मस्जिद गिराने में कांग्रेस की भी मिली भगत थी?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उस समय बचाया जा सकता था, वो प्रधानमंत्री थे। अगर चुप नही बैठे होते तो बचाया जा सकता था, जब संविधान की धज्जियाँ उड़ रही थी तब अगर चुप नही बैठते तो बचाया जा सकता था, देश के प्रधानमंत्री थे। जिस तरह से 1990 में नेताजी ने बचाया था उस तरह से बचाया जा सकता था।

फ़्रैंक हुज़ूर: क्या कांग्रेस ने मंडल-कमंडल की राजनीति में कमंडल की राजनीति को हवा दी और देश में भाजपा की राजनीति को बढ़ने का मौक़ा दिया?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! चुप रहना ही एक तरह का समर्थन ही था, जब संविधान की धज्जियाँ उड़ रही थी कोर्ट में मामला पहुँच चुका था तो फिर प्रधानमंत्री को रक्षा करना चाहिये था।

“जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी”

फ़्रैंक हुज़ूर: उसी दौर में मंडल आयोग लागू हुआ था। उस समय मंडल, कमंडल की राजनीति जैसे मुहावरे गढ़े जा रहे थे जिसमें मंडल की राजनीति नेता जी की राजनीति का मुख्य केंद्र था। समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में भी मंडल कमीशन को शामिल किया गया था। आज सबसे ज़्यादा हमले दलित-पिछड़ो के अधिकारो पर हो रहे हैं, इसे आप कैसे देखते हैं?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! आरक्षण के मामले में जैसे इस समय पिछड़ो की संख्या 54 प्रतिशत से ज़्यादा हो गई है और पिछड़ो को अभी भी 27 प्रतिशत ही आरक्षण मिल रहा है। हमारी माँग है कि हर वर्ग, जाति को उसके जनसंख्या के हिसाब से आरक्षण दो। पिछड़े हैं, अति पिछड़े हैं दलित हैं अति दलित हैं सबकी गिनती करके उनका हक दे दो। “जिसकी जितनी संख्या भारी उसकी उतनी हिस्सेदारी”

फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप लोग “संख्या के हिसाब से भागीदारी” के आंदोलन को तेज करने जा रहे हैं?

शिवपाल सिंह यादव: हाँ, इस मुद्दे को लेकर हम अभी पिछड़ो की एक बैठक बुलायेंगे फिर निर्णय लेंगे।

फ़्रैंक हुज़ूर: नवउदार नीतियों के बाद सरकारी कम्पनियों का भी नीजिकरण हुआ जिसका ख़ामियाज़ा दलित-पिछड़ो को भुगतना पड़ा क्योंकि प्राइवेट सेक्टर में आरक्षण नीति को नहीं किया गया है। तो क्या आप प्राइवेट सेक्टर में भी प्रतिनिधित्व की बात करेंगे?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! प्राइवेट और सरकारी सभी में हिस्सेदारी मिलनी चाहिये जिसे लेकर हम लोग जल्द ही बैठक करेंगे और बड़ा सम्मेलन बुलायेंगे जिसमें हमारी यही माँग होगी।

फ़्रैंक हुज़ूर: क्या जब आपकी पार्टी सत्ता में वापस आयेगी तो आप लोग इस प्रतिनिधित्व के मुद्दे को लेकर कोई क़ानून बनायेंगे जिससे सरकारी और ग़ैर सरकारी संस्थानों में सबको आबादी के हिसाब से हक़ मिले?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! ये हमारे हाथ में तो नही है लेकिन ये हमारा मुद्दा है और हम अपने राष्ट्रीय नेतृत्व को इस मुद्दे पर राय देंगे कि सरकार इसे लेकर क़ानून बनाये।

फ़्रैंक हुज़ूर: आप अपने पहले चुनाव के बारे में कुछ बताईये?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! 1996 में जब नेताजी संसद में चले गये तो उसके बाद जसवंतनगर की सीट ख़ाली हो गई। उस समय मैने जसवंतनगर से पहला चुनाव लड़ा। पहली बार हम 13000 से जीते फिर जब दूसरा चुनाव हुआ तो वो चुनाव हम 52000 वोट से जीते इसी तरह तीसरा चुनाव लगभग 32000 से और चौथा चुनाव 81000 से जीते थे। इसमें दो बार हम मंत्री भी रहे। 2012 में मुझे मंत्री पद से बर्खास्त भी किया गया।

मुझे जिस भी मंत्रालय की जिम्मेदारी मिली उस विभाग में मैंने सबसे बेहतर काम किया। मुझपर एक भी आरोप नहीं है….

फ़्रैंक हुज़ूर: परिवार में हुए विवाद को लेकर कुछ कहना चाहते हैं?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! उसमें तो मुझे कुछ नही कहना है बस इतना कहना चाहूँगा कि 2012 में जब हम मंत्री बने जो भी हमें विभाग मिले मैने उसमें सबसे बेहतर काम किया। आजतक मुझपर कोई आरोप भी नही लगा है।

पीडब्ल्यूडी में इतनी चौड़ी चौड़ी सड़के बना दी जो कभी नही बन सकती थी। पचास कोऑपरेटिव बैंकों में से पच्चीस बैंकों बंद होने कगार पर थी, मैने सभी बैंक चला दिये। कोऑपरेटिव का चुनाव मैने पूरी निष्पक्षता से करा दिया था कही से एक भी शिकायत नही मिली थी।

राजस्व सहिंता राजस्व विभाग में 36 वर्षों से लागू नही हो पा रहा था मैने उसे लागू कराया जिससे किसानो को उनके दरवाज़े पर न्याय मिल जाय कही पर भी उसे भागना न पड़े। मैने बुंदेलखंड में कई बाँध बनाये थे वहाँ पारिछा में पानी पीने वाला बाँध भी बनाया था जिसका उद्घाटन अखिलेश ने किया।

नोटबंदी और जीएसटी ने छोटे व्यापार खत्म कर दिए, किसानो को आत्महत्या करने पर मजबूर कर दिया…..

फ़्रैंक हुज़ूर: उत्तर प्रदेश और बिहार में किसानो के आत्महत्या की परम्परा कभी नही रही लेकिन हाल के दिनों में यहाँ किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हो गये। अभी अखिलेश यादव ने महोबा का दौरा किया, वहाँ एक किसान ने आत्महत्या कर लिया था तो उस परिवार से मिलने गये थे। किसान बहुत ज़्यादा तनाव के दौर से गुज़र रहा है ऐसे में भारत सरकार इज़रायल के किसानी के मॉडल को यहाँ लागू करना चाहती है जोकि पूरे तरह मशीन पर आधारित है जबकी हमारे देश में अभी किसानो की स्थिति इतनी अच्छी नही है कि वो महँगे मशीनों को ख़रीद सके। किसानो की इस स्थिति पर क्या कहना चाहेंगे आप?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! जब मैं सिंचाई मंत्री था तो एक बार इज़रायल का दौरा किया था। इज़रायल मे तो बहुत ज़्यादा पानी की कमी है लेकिन हमारे यहाँ तो पानी की नही है। हमारे यहाँ मैनेजमेंट बहुत ख़राब है अगर हम बारिश के पानी को संग्रहित कर लेने में सफल हो जाएँ तो हमें कभी पानी की समस्या से नही जूझना पड़ेगा। हमारे यहाँ बारिश होती है तो बारिश का पानी नालों और नहरों के माध्यम से सीधा समुद्र में चला जाता है।

मैने तो इज़रायल में देखा है कि जितना भी नाले का गंदा पानी होता है उसको पहले साफ़ कर लेते हैं फिर तालाब बनाकर उसमें डाल देते हैं जो सिंचाई के काम आ जाता है। हमारे यहाँ तो नदियों में बहुत समस्या है जैसे गंगा नदी ही गंदी होती जा रही है, भाजपा सरकार ने तो सफ़ाई अभियान भी चलाया है जिसका बजट बीस हज़ार करोड़ रखा है, चार साल को गये कुछ नही हुआ अभी तक।

जब उमा भारती जल संसाधन मंत्री थी तब मैने उनसे कहा था कि हमें पाँच सौ करोड़ ही दे दो हम नदियों को साफ़ कर देंगे। अगर नदियाँ गहरी कर दि जाय, नाले के गंदे पानी को नदियों में डालने के बजाय बडे बडे तालाब बनाकर उसमें डाला जाय तो किसानो के लिये पानी की समस्या ही खत्म हो जायेगी। मैने मैनपुरी में दो और इटावा में तीन नदियों को गहरा किया है। पहले वहाँ एक भी फ़सल पैदा नही हो पाती थी अब तो दो फ़सल हो जाती है। अगर इस तरह से काम किया जाय तो समस्या खत्म हो जायेगी लेकिन इसके लिये सरकार को निर्णय लेना होगा। यहाँ तो सरकार निर्णय क्या ले रही है? नोटबंदी का निर्णय ले रही जिससे व्यापार खत्म हो गया। अब किसान आत्महत्या क्यों कर रहा है? पहले तो किसान को पानी नही दे पाती सरकार फिर खाद महँगा हो गया है जिसके चलते किसान क़र्ज़ में डूबा हुआ है। अगर किसी तरह किसान फ़सल पैदा कर भी देता है तो उसके लिये बजार में अच्छे दाम नही मिलते क्योंकि बिचौलियों की लूट मची हुआ है। किसानो को इस बार भी समर्थन मूल्य न मिल सका क्योंकि अधिकारी और दलाल पैसे लूट लिये। अब किसान के परिवार भी चलाना है अपने बेटे, बेटी की शादी भी करनी है तो यह सब कैसे करेगा किसान इस हालात में, बच्चे को अच्छे स्कूल में पढ़ाना भी है क्योंकि सरकारी स्कूल बर्बाद हो चुके हैं। यही सारी वजहें किसानो में तनाव का कारण है।।

फ़्रैंक हुज़ूर: क्या आप अगले लोकसभा में चुनाव लड़ेंगे?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी तो मैं विधायक हुँ, अभी मेरे पास चार साल का समय है लेकिन जो फ़ैसला या जो आदेश होगा करेंगे।

फ़्रैंक हुज़ूर: अगर राष्ट्रीय नेतृत्व आपको लोकसभा चुनाव लड़ने को कहते हैं तो आप चुनाव लड़ेंगे?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! वैसे तो मेरा मन नही है सांसद बनने का क्योंकि परिवार में बहुत से सांसद हैं तो हम विधानसभा ही पसंद करेंगे।

मेरा तो हमेशा प्रयास रहा है कि सब लोग एक साथ आयें….

फ़्रैंक हुज़ूर: बसपा सपा के गठबंधन को लेकर क्या कहना चाहेंगे? क्या कांग्रेस भी शामिल होगी इस गठबंधन में? सीटों के बँटवारा का आँकड़ा क्या होगा?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी सीटों के बँटवारे को लेकर हमने कोई विचार नही किया है। गठबंधन में तो सभी को शामिल होना चाहिये। मेरा तो हमेशा प्रयास रहा है कि सब लोग एक साथ आयें। जब हमारी सरकार थी तब भी हमने प्रयास किया था, लालू,नीतीश, देवेगौड़ा, शरद, ओम प्रकाश चौटाला, कमल मोरारका, अंसारी बंधु और जितने भी छोटे छोटे विभिन्न जातियों के दल थे उन सबसे हमारी बात हुई थी। मैं तो पहले से ही जोड़ने की बात कर रहा था अगर हम सबको जोड़ लिये होते तो आज हम सरकार में होते। लेकिन अच्छा है अगर भाजपा को हराना है तो सबको एक साथ रहना चाहिये।

फ़्रैंक हुज़ूर: इस चुनाव में कांग्रेस की भूमिका को कैसे देखते हैं? पिछले चुनाव में तो गठबंधन में थे?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! कांग्रेस से हमारी बात कभी नही हुआ न तब हुई थी न अब हो रही है बाकि पार्टी के जो ज़िम्मेदार लोग हैं वो बात कर रहे हैं वो करें। हमारी सहमती रहेगी।

फ़्रैंक हुज़ूर: राहुल गांधी और अखिलेश यादव के बीच कुछ वर्षों में जो नज़दीकियाँ बढ़ी हैं उसको आप कैसे देखते हैं?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! इस समय अगर भाजपा तो हराना है तो सब लोगो को एक साथ आना पड़ेगा। अब ये सब वो लोग समझे कि एक दूसरे से कैसे गठबंधन हो सीटों का बँटवारा कैसे हो, बाकि अगर शिर्ष नेतृत्व मुझसे सलाह लेना चाहेगा तो हम ज़रूर देंगे। अगर सलाह की ज़रूर नही होगी तो वो जो भी फ़ैसला लेंगे उसमें हमारी सहमती होगी।

फ़्रैंक हुज़ूर: फूलपुर व गोरखपुर चुनाव में बसपा के सहयोग से जीत मिली। क्या इस सपा बसपा गठबंधन को लेकर आपसे भी कुछ बात हुआ था?

शिवपाल सिंह यादव: नही, हमारी कोई बात नही हुई थी। इधर बीच दो बार प्रोफ़ेसर साहब से बात हुई है। अब अगर राष्ट्रीय नेतृत्व कोई सलाह लेना चाहेगा तो ज़रूर देंगे।

फ़्रैंक हुज़ूर: लोहिया जी के ज़माने में जब समाजवाद का उदय हुआ तो उस समय ग़ैर कांग्रेसवाद के लिये लोग एकजुट हो रहे थे। उसी आधार पर नेताजी ने अखिलेश को कांग्रेस से गठबंधन न करने को कहा था और आज भाजपा के विरोध में ऐसी स्थिति बन गई है कि कांग्रेस को साथ लेकर चलना पड रहा है। इस पर क्या कहना चाहेंगे?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! आचार्य नरेंद्र देव, लोहिया और जय प्रकाश जी के समाजवादी आंदोलन की राह पर चलकर नेता जी ने राजनीति की है। एक समय था जब ग़ैर कांग्रेसवाद चला था तब ये सब मिले था फिर कांग्रेस को हटाया था और जो इस समय भाजपा के खिलाफ एकजुटता का माहौल चल रहा है वो इसलिये हो रहा क्योंकि भाजपा ने जनता से जो भी वादे किये थे उसे पूरा कर पाने में असफल रही, वो चाहे किसानो का सवाल हो या नौजवानों का, सबको पंद्रह लाख देने की बात कही थी, हर साल दो करोड़ नौकरियाँ देने का वादा किया था।

एक भी वादा न पूरा कर सकी भाजपा। सौ दिन के अंदर भ्रष्टाचार को खत्म करने की बात कही थी लेकिन हम तो देख रहे हैं कि भ्रष्टाचार पाँच गुना बढ़ गया। इस समय थाने में जो व्यक्ति केस लिखवाने जाता है उससे भी पैसा लेता है थानेदार और अगर अज्ञात के नाम से केस दर्ज हो जाता है तो पुलिस उस पूरे इलाक़े से पैसा वसूलता है। मेरी तो सरकार से माँग है कि इस चार साल के अंदर जितने भी अधिकारी हैं उन सबकी सम्पत्ति की जाँच करा लें।

नोटबंदी के समय का भ्रष्टाचार देखना हो तो बैंक कर्मचारियों के बैंक खाते चेक करा ले, इनकम टैक्स अधिकारियों के खाते चेक करा ले। अब जीएसटी को देख लीजिये जब जीएसटी लागू करना था तब बोला गया कि केवल एक टैक्स लगेगा लेकिन यहाँ तो हर चिज पर अलग अलग टैक्स लग रहा है।

छोटे व्यापारी रोज का सौ पाँच सौ कमाते हैं उनपर जिएसटी का नियम लगा दिया वो गरीब अब कहाँ से चार्टर एकाउंटेंट लायेगा? कहाँ से वक़ील लायेगा?

योगी जी ईमानदार हैं लेकिन उनके निचे के लोग भ्रष्ट हैं....

फ़्रैंक हुज़ूर: उत्तर प्रदेश के सरकार के कार्यशैली पर क्या कहना चाहेंगे?

शिवपाल सिंह यादव: केंद्र और प्रदेश दोनो के बारे में मैने सब कुछ तो बता हि दिया है, कोई व्यक्ति टिप्पणी मही करूँगा। हम ये तो जानते हैं कि योगी जी ख़ुद तो इमानदार हैं लेकिन निचे कितना भ्रष्टाचार है, उसपर तो अंकुश लगायें।

Shivpal Singh Yadav

पूरा प्रदेश जानता है कि अगर मुझे  मुख्यमंत्री बनना होता तो मैं 2003 में बन गया होता……

फ़्रैंक हुज़ूर: एक आखिरी सवाल। बहुत से लोग कहते हैं कि शिवपाल सिंह यादव के अंदर मुख्यमंत्री बनने की चाह है, आप इसको किस तरह से देखते हैं?

शिवपाल सिंह यादव: देखिये! अभी तक तो मेरे अंदर कभी भी मुख्यमंत्री बनने की इच्छा नही रही है। पूरा प्रदेश जानता है कि अगर मुझे  मुख्यमंत्री बनना होता तो मैं 2003 में बन गया होता।

उस समय हमारे 144 विधायक थे, चाहे कल्याण सिंह के विधायक हो या अजीत सिंह के विधायक हो सब हमारे साथ था बाकि जो 40 विधायक टूट कर आये थे वो भी हमारे साथ थे।

उस समय नेताजी दिल्ली थे और नेताजी मना भी कर रहे थे कि सरकार नही बनेगी क्यों बना रहे हो? तो हमें बनना होता तो उसी समय मुख्यमंत्री बन गये होते। अभी तक तो मेरे मन में कभी नही आया लेकिन मौक़ा आयेगा तो देखेंगे। मेरे नसीब में नही है तो नही है। हमने देखा है बहुत से लोगो की ज़िंदगी निकल जाती है काम करते करते लेकिन विधायक तक नही बन पाते और बहुत से ऐसे लोग हैं नसीब वाले जिन्होंने कोई काम नही किया है वो एमएलसी, विधायक, मंत्री तक बने बैठे हैं।

(इंटरव्यू का अनुवाद- रत्नेश यादव )

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