बदमाश डायरी — Gourang

Gourang

"कौन हो तुम?"
"वही तो खुद से पूछ रही हूँ।"
"मतलब?" 
"मतलब! क्या मतलब?" 
"क्या क्या मतलब? शक्ल से तो मेंटल नहीं लगते, कपड़े भी तो दुरस्त ही हैं।"
"चलो, यही सवाल मैं तुमसे करती हूँ, कौन हो तुम?" 
"मैं! मैं शरत हूँ।" 
"तो महज एक नाम हो बस?" 
"क्या नाम? पढ़ा लिखा हूँ, नौकरी करता हूँ, अच्छा कमाता हूँ, इसी शहर का हूँ, यार दोस्त हैं, मौज मस्ती करता हूँ। इसी से तो पहचान है।" 
"बस इतनी सी ही तो पहचान है। एक नाम, एक ठिकाना, कमाते हो। फिर एक अदद घर, बैंक बैलेन्स, समाजिकता, रुतबा, रसूख। ये ही तो?" 
"और क्या होना होता है?" 
"बताया न, वही खुद से पूछ रही हूँ। यह सब तो दूसरों के लिए है। खुद के लिए मैं क्या हूँ?"

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जैसा कि अक्सर होता है, खुद से बातें किए बिन मुझे नींद नहीं आती। डायरी हँसती है। दसियों बार मैंने खुद से पूछा, ये दस्तावेज़ किसलिए? किसके लिए? पर, जैसे होते हैं न कुछ बे सिर पैर की बातें, जिसके माने तब समझ नहीं आते, शायद बाद में आए। हँसती डायरी को देख मैं भी मुस्कुरा लेती हूँ, साली चिढ़ाती बहुत है। 
आज एक शरत नाम का लड़का मिल गया। मिल क्या गया, बस टकरा गया। अच्छा है, हैंडसम भी। मैं वर्कशॉप गई थी, शांतनुदा से मिलने। वही बुलाये थे अपने वर्कशॉप पर। जैसा कि अक्सर होता है, कुछ गपशप होती है, फिर संगीत पर चर्चा होती है, कुछ सुर ताल भी हो जाता है। पर वे तो मिले नहीं, ये मिल गया। मैं वायोलिन के तार को अनमने ढंग से छेड़ रही थी, बेसुरा। शायद यही उसे चुभा होगा, बड़ी कर्कश आवाज में पूछ लिया, 'कौन हो तुम?' मेरे मन का बाहर निकल आया। क्या पता क्यों, मैंने उससे शास्त्रार्थ कर लिया। 
मैं उकता रही थी। उसे वहीं वैसा ही छोड़ बाहर निकल आई।

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"आप तो बहुत अच्छा बंसी बजाते है!!" 
"अरे रहस्यमयी जी? आप कब आई?" 
"रहस्यमयी?" 
"और नहीं तो क्या? उस दिन आपका नाम भी जान न पाया। पर आपसे मिलकर मैं भी रात भर सोचता रहा, खुद के लिए कौन हूँ मैं?" 
"कुछ हल मिला?"
"कहाँ? ले दे के यही बंसी ही मिला। मन बोला, मुरलीधर का मुरली ही बोलेगा।" 
"वही। आपकी बंसी में जादू है।" 
"और आप बहुत सेंसिबल हैं। पता है न, एक सेंसिबल लड़की इस दुनिया में बहुत दुर्लभ है।" 
"ऐसा क्या?" 
"और नहीं तो क्या? अपने आस पास ही देखिये, कितनी लड़कियाँ खुद से यह सवाल करती हैं?" 
"शरत बाबू, अफसोस तो इसी का है। दुनिया यही सोचती है, चाहे वो कुछ भी करे, आखिर में उसे तो रोटियाँ ही सेकनी है।" 
"नहीं, नहीं। सारी दुनिया बदल रही है। कुछ भी अब आखिर में नहीं हैं। आगे भी बहुत कुछ है, एक बहुत ही सार्थक कंट्रिब्यूशन है। और हाँ, सिकता, वारा, गार्गी, लोपामुद्रा केवल चूल्हा-चपाती तो न करते थे, अन्यथा आज भी याद न किए जाते।"

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शांतनुदा भले आदमी हैं। गुणग्राही हैं, संगीत से अटूट प्रेम करते हैं, संगीत चाहने वालों से भी। अभी शरत बाबू से बात ही कर रही थी कि अंदर आए। मुझे देखते ही चहके, 'अरे इमन तुम उस दिन भाग क्यों गई? चलो, चलो आज और देर नहीं।' कहते ही मुझे वायोलिन पकड़ा दिया। शरत बाबू के आगे थोड़ी झिझक हो रही थी पर शांतनुदा के आग्रह को टालना मुश्किल ही था। मन फिर खुद ही तैयार हो गया। मैं लम्बाडा के धुन बजाने लगी। धीरे धीरे आँखें बंद हो गई। अंतरयात्रा में उतर गई। मेरे दिमाग में सिर्फ लम्बाडा के धुन ही थे। बाकी सब से तो मैं कट ही गई। 
आखिर में जब धुन समाप्त हुआ, मैंने आँखें खोली। आँखें खोलते ही शरत बाबू पर ही दृष्टि पड़ी। कितनी अनुराग भरी दृष्टि थी। मेरा दिल धडक गया। मैं नजर मिलाये न रह सकी। मुझे ठीक पता है, मेरे गाल अब भी गुलाबी हो रहे हैं। 
डायरी फिर हँस रही है। पूछ रही है, 'तुम' से 'आप' का सफर? इमन में मध्यम तो तीव्र होता है न! षड़ज भी अवरोह में ही लगता है। घूम के लगता है, आखिर लगता ही है। 
अब उसकी बंसी इमन ही बजाये तो फिर न कहना।

डायरी बड़ी बदमाश है। सब कुछ जान लेती है........

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