Vijendra Diwach
गरीब आदमी की गरीबी भी उसका मजाक उङाती,
उसकी रूखी सूखी रोटी भी कहती है मुझे खा के दिखा,
मन कहता है रोटी तु रूखी सूखी है तेरे को कैसे खाऊंगा,
आमाश्य कहता है आने दे मै भूखे पेट में तो पत्थर भी पचा लूंगा।
गरीब रूखा सुखा खाकर इसे ही संतुलित आहार मान लेते हैं,
बस अपने परिश्रम के बल पर जो मिल जाये उसे ही छप्पन भोग जान लेते हैं।
गरीब आदमी मेहनत करके भी फाकाकशी का जीवन जीता है,
ईमानदार हो के भी इस सभ्य कहे जाने वाले समाज में अजनबी बन के रहता है।
गरीब के नाते रिश्तेदार उससे दूर ही रहते हैं,
कभी बातचीत हो जाये या फिर कहीं मुलाकात,
बिना हाल चाल जाने ही अपनी पचासों समस्यायें सुनायेगें की ये कहीं हम से कुछ मदद ना मांग ले
और इस तरह उस गरीब से भी गरीब होने का नाटक कर पीछा छुटाते हैं।
सरकारें ये कैसा डवलपमेन्ट कर रही हैं,
मेट्रो ट्रेने तो चल रही हैं
लेकिन इन्हीं मेट्रो के पूलियों के नीचे इंसानी जिन्दगियां नरकीय जीवन जी रही है,
इंसान अपनों को ही भूलाकर कहां जा रहा है?
इक दिन सब को मरना है
फिर क्यों इस दुनिया में ये तेरा ये मेरा फैलाया जा रहा है।
इस चालू चपंडर दुनिया में झूठे,धोखेबाजों और बेइमानों का का बोलबाला बढता जा रहा है,
इस दुनिया में शरीफ होकर जीना धीरें धीरें मुश्किल होता जा रहा है।
Vijendra Diwach

Vijendra Diwach

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