सदफ़

Mohd Zahid

सदफ़ उस सुबह बहुत बेचैन थी , कुछ देर बाद ही उसका तलाक होने वाला था , उसकी सारी खुशियाँ ज़िंदगी भर "बाँझ" के उलहने में दब कर मर जाने वाली थी।

वह अपनी अम्मी के यहाँ कमरा बंद करके रात भर रोती रही , खुदकुशी का ख्याल आया पर इस्लाम में खुदकुशी "हराम" है , ज़िन्दगी के इस हालात में आकर सदफ़ के अंदर मौत का डर खत्म हो चुका था पर वह हराम मौत नहीं मरना चाहती थी।

चार साल की शादी , लड़के की माँ ने एक नज़र कहीं देखा और रिश्ता भेज दिया , सदफ़ की उम्र भी नहीं थी परन्तु एक शानदार रिश्ते के लालच में सदफ़ के माँ बाप ने सदफ़ को शादी के लिए मना लिया।

शादी के 2 साल बाद तक , सदफ़ की ज़िन्दगी में बहार ही बहार , गुलशन ही गुलशन पर सदफ़ की सास को सदफ़ अब खटकने लगी।

दो साल में कोई बच्चा नहीं हुआ और सदफ़ की सास के मुताबिक यह सदफ़ की कमी थी।

सदफ़ का शौहर "रेहान" , यूं तो सदफ़ को बहुत मानता परन्तु अपनी माँ के सामने उसकी आवाज़ नहीं निकलती। एक शानदार नौकरी छोड़ कर अरबों की खानदानी संपत्ती देखने "रेहान" घर आ गया और सदफ़ की मुसीबतें शुरू हो गयीं।

रोज़ बच्चे का ताना , दिन गुज़रता गया , हफ्ते और महीने गुज़रते गये , और सास की सदफ़ पर नफरतें बढ़ती गयीं , वजह वही कि चार साल बाद भी बच्चा नहीं हुआ।

सास के मानसिक उत्पीड़न से थकहार कर सदफ़ अपने माँ बाप के घर आ गयी और दो दिन बाद ही सास ने बेटे को सदफ़ को तलाक देकर दूसरी शादी का हुक्म सुना दिया।

"सदफ़ बाँझ है , तलाक देकर विदा करो , दूसरी शादी ही अब एक वाहिद उपाय है।

उस शाम "तलाक" की खबर से सदफ़ के घर कोहराम मच गया , बाप भाई भागे हुए सदफ़ के ससुराल गये परन्तु नतीज़ा वही ज़ीरो।

और अब वह सुबह सदफ़ के सामने थी।

तलाक हो गया , रेहान की चंद दिनों में धूमधाम से दूसरी शादी हो गयी और सदफ़ बाँझ बन कर समाज की नज़रों में घृणा की पात्र हो गयी।

कुछ वक्त गुज़रा , सदफ़ की खाला अपनी बहन की इस तकलीफ़ को देख ना सकीं , जो सदफ़ उनके हाथों पली बढ़ी वह सदफ़ आज टूट रही है बिखर रही है।

सदफ़ की ख़ाला ने अपने बेटे "अनवर" से अपनी ज़िन्दगी की एक वाहिद खुशी माँगी , अनवर ने सदफ़ से निकाह कर लिया।

वक्त फिर गुज़रता गया , सदफ़ को इस शादी से जुड़वा बच्चे हुए और दोनों बेटे। सदफ़ की ज़िन्दगी फिर खुशियों से भर गयी , शान शौकत वैसी नहीं पर खुशियाँ उससे कहीं अधिक।

2 साल बाद एक शादी में अचानक सदफ़ "रेहान" के सामने आ गयी , हड़बड़ाहट में उसकी नज़र रेहान की माँ पर पड़ी , दोनों अभी तक अकेले थे।

रेहान दूसरी शादी के तीन साल बाद भी बाप बनने के लिए तरस रहा है , सदफ़ उनसे किनारा करते हुए हाल में अपने बच्चों के साथ बैठी , वहाँ भी रेहान की माँ पहुंच गयी , वह बात करना चाहती थीं।

पर सदफ़ हमेशा खामोश थी , अब भी खामोश थी। पर दूसरी शादी के बावजूद रेहान के औलाद ना होने से वह मायूस थी।

मेरी बचपन की दोस्त वर्षों बाद आज मिली तो उसकी यह कहानी उसकी ही ज़ुबानी आज सुनी , उसके दिल में है कि वह अपनी एक औलाद "रेहान" को सौंप दे।

सोचा उसकी कहानी नाम बदलकर आप सब दोस्तों से शेयर कर लूं और सदफ़ के फैसले पर आपकी राय भी जान लूं फिर आपको सदफ़ का लिया फैसला बताउंगा।


Mohd Zahid


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