Aparna Anekvarna
मरते हुए फल
फटते हैं
उगल देते हैं बीज
धरती धारण कर
सेती है
पुनर्जन्म तक
दोमुंहे केशाग्र
धर कर
चला देती हूँ कैंची
स्वस्थ हो उठते हैं
नक्षत्र
वहाँ मर चुके कबके
जीवित है आज भी
मगर रश्मि उनकी
आखरी पन्ना पढ़ने के बाद
बंद कर देती हूँ किताब
बंद कर लेती हूँ आँखें
खोल लेती हूँ फिर से किताब
कुनमुनाती हैं कवितायें भीतर
रह जाता है उनका लिखना
खो जाती हैं.. कहाँ हैं मिलतीं
फिर उसी रूप में
काल एक सर्प है
दुम लिए मुंह में अपनी
स्वयं को खा रहा है

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