भारतीय शूद्रों की विरासत की चोरी और आधुनिक देशभक्त –Sanjay Jothe

Sanjay Jothe

संजय जोठे, लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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भारत के अतीत की जो उपलब्धियां हैं उन पर गर्व करने और उसपर दावा करने वाले लोग बचकाने तर्क देते हैं। कहते हैं क़ुतुब मीनार के पास खड़ा लौह स्तंभ, शून्य का आविष्कार, सुश्रुत द्वारा सर्जरी, सूर्य चन्द्र ग्रहण की गणना, आयुर्वेद आध्यात्म आदि आज के वैदिक, औपनिषदिक परंपरा ने भारत में तब पैदा किया था जब शेष मनुष्यता जंगल में गुफाओं मे रहती थी।

यह बात ठीक है कि भारत ने यह सब सबसे पहले पैदा किया। लेकिन जिन लोगों ने पैदा किया वे आज के वेदान्तियों, सनातनियों के पूर्वज नहीं थे। वैदिक या औपनिषदिक ब्राह्मणी परम्पराओ ने तो उस ज्ञान को नष्ट करने का दुनिया का सबसे बड़ा षड्यंत्र किया है। आज उन्ही षड्यंत्रकारों की संतानें भारत के लोकायतों, श्रमणों, शूद्रों, तांत्रिकों, जनजातियों और भौतिकवादियों द्वारा पैदा किये ज्ञान पर अपना दावा कर रहे हैं। ये बड़ा मजाक है।

उपनिषदों में प्राचीन भारतीय भौतिकवादियों और परलोकवादी पोंगा पंडितों के संघर्ष का विस्तार से उल्लेख है। विशेष रूप से उद्दालक और याज्ञवल्क्य का उल्लेख है। उद्दालक एकदम भौतिकवादी और कार्य कारण के तर्क का पालन करते हुए जगत को समझना चाहते है और याज्ञवल्क्य ब्रह्म और आत्मा की हवा हवाई धारणा से समाज को नियंत्रित करना चाहते हैं।

कालांतर में तर्क हारता है और राजनीति और षड्यंत्र जीतता है। उद्दालक की परंपरा चल नहीं पाती और याज्ञवल्क्य के मानस पुत्र देश को परलोकवादी आत्मा, पुनर्जन्म और ब्रह्म में घसीट ले जाते हैं। भारत के इतिहास की गहरी रिसर्च यह बताती है कि यही वह बिंदु था जब भारत के पतन की शुरुआत हुई थी। आत्मा परमात्मा और पुनर्जन्म की जहरीली त्रिमूर्ति ने भारत के मन पर तब से जो कब्जा किया है वह आज तक बना हुआ है।

ये त्रिमूर्ति भारत का सबसे जहरीला सिद्धांत है जो धर्म और कर्मकांड का रोजगार करने वालों ने तर्कनिष्ठ वैज्ञानिकों, शिल्पकारों और भौतिकवादियों को नीचा दिखाने के लिए विकसित किया है। भाववादी अध्यात्म या धर्म जाहिर तौर पर दुनिया भर में मनुष्यता के खिलाफ सबसे बड़े षड्यंत्र रहे हैं। भारत में इसमें पुनर्जन्म का जो तड़का लगाया गया है वह इतना कारगर षड्यंत्र रहा है कि आज तक उससे भारत की जनता आजाद नहीं हो पाई है।

इन सिद्धांतो से भारत के असली नायकों का काम छुपाया गया है। भारत के शिल्पी, कारीगर, लोहार, चमार, कुम्हार, जुलाहों आदि ने जिस वैज्ञानिक ज्ञान को विक्सित किया था वह ठोस भौतिकवादी और कार्यकारण सिद्धांत पर खड़ा ज्ञान था। आप अनुमान कीजिये, एक चर्मकार जब चमड़ा पकाता है, गलाता है, साफ़ करता है या ठीक अनुपात में काटकर उसकी सिलाई करता है तक वह रसायन, जीव विज्ञान, ज्यामिति और मौसम विज्ञान की विशेषज्ञता का उपयोग कर रहा है। यह शुद्धतम तकनीक है, विज्ञान है जो ठोस परीक्षणों और आकलनों पर आधारित है। इस ज्ञान से वह चर्मकार, लोहार, कुम्हार या किसान अपने उत्पाद बनाता है और समाज को देकर समाज को असल में जिंदा रहने और तरक्की करने में मदद करता है।

अब एक भाववादी, परलोकवादी पंडित क्या करता है? वह सिर्फ काल्पनिक और हवा हवाई गप्प सुनाकर कर्मकांड कराता है। कथाएं सुनाता है श्राद्ध कराता है। जिन बातों का जिंदगी से कोई संबन्ध नहीं उनमें समाज को उलझाये रखता है। उलटे सीधे स्वर्ग नर्क पुनर्जन्म और मोक्ष आदि में लटकाए रखकर अपनी दक्षिणा और रोजगार के लालच में पूरे समाज को मंदबुद्धि, भाग्यवादी और कायर बनाकर रखता है। यह पंडित असल में वैज्ञानिक कार्यकारण नियमों के पालन द्वारा समाज की सेवा नहीं करता बल्कि विशुद्ध मनोवैज्ञानिक षड्यंत्र रचकर समाज के कर्मठ लोगों का शोषण करता है।

आप खुद सोचिये, कर्मकांड या श्राद्ध, कथा आदि के आचारशास्त्र में कौनसा विज्ञानं छूपा है? दाएं हाथ के अंगूठे से जलधार छोड़नी है या   सात परिक्रमा करनी है या पूर्व की तरफ काले तिल फेंकने हैं या दस ब्राह्मणों को भोज कराना है जैसे कामों का क्या कोई वैज्ञानिक या तार्किक अर्थ है? लेकिन वहीँ जब एक लोहार लोहा बनाता, गलाता, पीटता है तो उसमें विज्ञान और तकनीक का प्रयोग करता है। भारत के सभी शूद्र जो कि कारीगर, शिल्पी या उत्पादक रहे हैं उन्होंने असल में विज्ञानं और तकनीक को जन्म दिया है।

अब मजा ये है कि इन लोगों को और इनके ज्ञान को अछूत बनाया गया है। इन्हें नीच और गन्दा कहकर इन्हें समाज की निचली पायदान पर धकेला गया है। और आत्मा परमात्मा पुनर्जन्म का जहर पिलाकर रोजगार चलाने वालो ने स्वयं को सबसे ऊपर रखा। इस प्रकार भारत में अन्धविश्वास फैलाने वालों ने भौतिकवाद के वैज्ञानिक नियमों पर खड़े तकनीकी और वैज्ञानिक ज्ञान को अछूत बनाकर नष्ट कर दिया। और जब तकनीकी ज्ञान बदनाम हो गया तो शिल्पकार गरीब होते गए उनमे आविष्कार करने की या सुधार करने की प्रेरणा मरने लगी। इस तरह विज्ञानं नष्ट हुआ। दूसरी तरफ पठन पाठन का अधिकार भी सिर्फ ब्राह्मणों तक सीमित कर दिया गया, वे बिना कुछ किये मालदार और ताकतवर बनते गये। न सिर्फ शूद्रों पर बल्कि क्षत्रियों और वैश्यों पर भी उन्होंने अंधविश्वास फैला दिया। व्यापार का मुहूर्त, युद्ध का मुहूर्त, दिशा ज्ञान, वास्तु, सामुद्रिक, प्रेत विद्या आदि में समाज के शासक वर्ग को खुद राजगुरु बनकर उलझा लिया। अब मजा ये कि जब तुर्क, अफगान, मुग़ल आदि ने आक्रमण किये तो ये ब्राह्मणी ज्ञान कुछ काम न आया। भारत में धातु, रसायन, शिल्प, भौतिकी, गणित आदि की रिसर्च बन्द होने के कारण भारत सबसे हारता रहा। जो देवता पहाड़ उठाकर उड़ जाते थे वे काम न आये। लेकिन शूद्रों की बनाई धातु की तलवार या हल ही काम आये। लेकिन इस सबसे भी कोई शिक्षा नही ली गयी। आजादी के बाद फिर से ब्राह्मणी धर्म और परलोक में फंसाया गया है।

यह भारत को बर्बाद करने का सबसे लंबा, संगठित और कारगर षड्यंत्र रहा है। जिन परलोकवादी और कर्मकांडी लोगों ने ये खेल रचा वे भारत के असली दुश्मन और राष्ट्रशत्रु हैं।

अब एक नया खेल शुरू हुआ है। जिन लोगों और परम्पराओं ने भारत को पतन के गर्त में पहुँचाया उसी परम्परा के झंडाबरदार अब भारत के शूद्रों के ज्ञान पर दावा कर रहे हैं। शून्य का ज्ञान बौद्धों का था, धातुविज्ञान का या शल्य चिकित्सा का ज्ञान भी शूद्रों और जनजातियों का था जिन्हें अछूत और नीच समझा गया। लेकिन आज जब भारत यूरोप के सामने लाचार खड़ा है तो भारत के पोंगा पंडित एक बार फिर शूद्रों, काश्तकारों और गरीबों की विरासत पर दावा करने को खड़े हो गए हैं। जैसे इनके पूर्वजों ने शिव, बुद्ध आदि महापुरुष चुराए थे, उसी तरह आजकल के स्वदेशी इंडोलॉजिस्ट उन शूद्रों के ज्ञान को भारत का प्राचीन ज्ञान बताकर श्रेय लूटने की तैयारी कर रहे हैं।

निश्चित ही यह भारत का प्राचीन ज्ञान है लेकिन ये किन्ही दूसरी संस्कृतियों का ज्ञान था। यह भौतिकवादी संस्कृतियों या परम्पराओं का ज्ञान था। आज के वैदिक या उपनिषदिक परम्परा से या इनके पूर्वजों से उनका कोई रिश्ता नहीं था। रिश्ता था भी तो वो विरोध या लड़ाई का रिश्ता था। लेकिन आज हालत बदल रही है। कर्मकांडीय मूर्खता से देश को बर्बाद करने वाले लोग अब शूद्रों, शिल्पियों, किसानों आदि के ज्ञान को वैदिक भारत के ज्ञान की तरह प्रोजेक्ट करके झूठा इतिहास लिखने की तैयारी में हैं।

इस खेल को ठीक से समझिये और भारत के इतिहास का ठीक से अध्ययन कीजिये। आप समझ सकेंगे कि जिन लोगों ने भारत को बर्बाद किया वे आज भी षड्यंत्र बुन रहे हैं और जिस ज्ञान को उनके पूर्वजों ने नीच घोषित किया था उसी ज्ञान पर आज दावा करने को खड़े हो रहे हैं। इन लोगों में कोई शिष्टाचार या कॉमन सेन्स या सामान्य नैतिकता तक नहीं है। ये परजीवी रहे हैं खुद कुछ पैदा नहीं करते सिर्फ दूसरों की विरासत को अपने खाते में दिखाने वाले पुराण और झूठ लिखते हैं। इनके षड्यंत्र को ठीक से देखिये।

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