पावर का प्रेम आदमी आैर राजनीतिक दलों के नर्व सिस्टम पर सांघातिक प्रहार करता है

Tribhuvan

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पावर का प्रेम आदमी आैर राजनीतिक दलों के नर्व सिस्टम पर सांघातिक प्रहार करता है। वे पाॅलिटिक्स की डिग्निटी भूल जाते हैं। ऐसे लोगों की खाली खोपड़ी एमलेस एक्शन और हैफ्हैजर्ड टर्बुलेंस को आमंत्रित करने के अलावा कुछ नहीं कर सकती। लोकतंत्र की हत्यारी इंदिरा गांधी की प्रेतात्मा चुपके से सत्ताधीशों की आत्मा में कैसे आकर बैठ जाती है और उनकी सत्ता ऐषणाएं उनके के साथ किस सहजता से घुलमिल जाती हैं, यह पता ही नहीं चलता। सच ही है, स्पेस, प्लेस और मोशन पॉलिटिक्स के मेटाफर को बदलते देर नहीं लगाते।

ये कैसा चमत्कार है कि आपातकाल के खिलाफ़ लड़ने वाले साहसी लोग ही 1975 की भाषा बोलने लगते हैं। यह भूलकर कि उन दिनों वे जेलों में बैठे अभिव्यक्ति के स्वातंत्र्य पर ठीक वैसे ही विचार रखते थे, जैसे आजकल के गतिशील युवा रख रहे हैं। ये लाेग भूल जाते हैं कि राजनीति एक फैकल्टी है, लेकिन सत्ता को अपने शुद्ध विचारों से चलाना एक आर्ट।

कितना अचरज़ है, सत्ता का चरित्र नहीं बदलता, स्वतंत्र चैतन्यता रखने वाले लोग अपना चरित्र वस्त्रों की तरह बदलते हैं। कौन भूलेगा कांग्रेस के उस ऐतिहासिक अपराध को। इंदिरा गांधी के उस अलोकतांत्रिक क़दम को। कम्युनिस्टों के एक बड़े खेमे का इमरजेंसी के समर्थन में खड़े होने के पाप को। विनोबा भावे जैसे संत कहलाने वाले साधु स्वभाव व्यक्ति का आपातकाल को राष्ट्रीय पर्व कहने के विचलन को।

निष्कर्ष ये है कि पॉलिटिकल पार्टियों और उनसे जुड़े लोगों का प्राइमरी एम, आॅब्जेक्ट और पर्पज़ एक ही होते हैं। उनके कॉन्शसनेस में सदा एक ही बात रहती है कि चीज़ों को जितना ज़्यादा नियंत्रित कर सकते हो करो। ये एक ऑटोमेशन जैसा होता है। आप पावर में आए नहीं कि आपकी कॉन्शसनेस लुप्त होने लगती है और सत्ता की कॉन्शसनेस आपकी बुद्धि, चेतना और विवेक का हरण कर लेती है। वे समझते हैं कि वेल-कंट्रोल्ड सिस्टम ही उनका अल्टीमेट एम है।

आप कह सकते हैं, इंदिरा गांधी निष्कलंक थीं। उन्हें कलंकित और कलुषित किया उनके सत्ता प्रेम ने। सिस्टम को नियंत्रित करने की उनकी ऐषणा ने। वरना तो वे भी आपातकाल थोपकर वैसा राष्ट्रप्रेम ही तो जता रही थीं, जो आप प्रकट करते रहते हैं। वे वैसी ही तो देशभक्ति दिखा रही थीं, जैसी आप प्रकट करते रहते हैं।

फ़र्क बस इतना सा है कि उन दिनों उनकी बुद्धि वैसी थी, जैसी अाजकल आपकी है। और आजकल इंदिरा गांधी की संतानों की बुद्धि वैसी है, जैसी उन दिनों आपकी थी। लेकिन प्लीज़, सच कहूं तो इंदिरा जी की सच्ची संतान तो आप ही हैं! क्योंकि आप पर ही उनकी वह ओपरी छाया उतरने लगी है, जो इस देश के किसी सत्ताधीश के नहीं उतरनी चाहिए।

लेकिन सर आप भूल जाते हैं उस लाख टके की बात को कि सत्ता में भी हर फंक्शन का एक ऑर्गन होता है और हर ऑर्गन का एक फंक्शन। और सर ये ऑर्गन आप या इंदिरा गांधी नहीं, इस देश का हर नागरिक होता है, जो मतदाता न भी हो तो भी मदांध सत्ताधीशों को चौकड़ी भुलाते देर नहीं लगाता।

 


Credits: Facebook wall of Tribhuvan

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