कश्मीर 2016 : जुनून के पीछे भी झाकें

प्रो० राम पुनियानी


उरी में भारतीय सेना के 18 जवानों के मारे जाने की घटना के जवाब में भारत द्वारा नियंत्रण रेखा के पार जो सैनिक कार्यवाही की गई, उसकी वाहवाही के शोर में कश्मीर के लोगों की व्यथा छुप सी गई है। भारत और पाकिस्तान के बीच जितनी भी झड़पें हुई हैं, उनके केंद्र में कश्मीर रहा है। भारत का कहना है कि कश्मीर उसका अविभाज्य हिस्सा है और धरती की कोई ताकत कश्मीर को उससे छीन नहीं सकती। दूसरी ओर, पाकिस्तान, कश्मीर के भारत में विलय के औचित्य पर प्रश्न खड़ा करता है। पाकिस्तान का कहना है कि चूंकि कश्मीर मुस्लिम बहुल इलाका है इसलिए उसे पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए।

आतंकी हमलावरों द्वारा उरी में 18 भारतीय सैनिकों को मार दिए जाने के बाद से यह मुद्दा अखबारों की सुर्खियों में आ गया। दरअसल, घटनाक्रम की शुरूआत हिजबुल मुजाहिदीन के कमांडर बुरहान वानी की सेना के साथ एक मुठभेड़ में मौत के साथ हुई। इस घटना पर दो तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आईं। जहां मीडिया ने इसे घाटी में सक्रिय अतिवादियों से मुकाबला करने में भारतीय सेना की बड़ी सफलता के रूप में प्रस्तुत किया, वहीं कश्मीर के लोगों का एक तबका इसके विरोध में सड़कों पर उतर आया। विरोध की अभिव्यक्ति का मुख्य तरीका पुलिस और सेना के जवानों पर पत्थरबाजी है। इसके बाद हुए घटनाक्रम में लगभग 80 लोग मारे गए और 9,000 से ज्यादा घायल हुए। इनमें से अधिकांश को पेलेट से चोटे लगीं, जिनका इस्तेमाल सुरक्षाबल करते हैं। कई अपनी आंखे खो बैठे हैं और अन्यों को शरीर के विभिन्न अंगों में गंभीर चोटें आईं। पुलिस और सेना के जवान भी घायल हुए। राज्य में कफ्र्यू लगा दिया गया और यह राज्य में अब तक का सबसे लंबा कर्फ्यू था।

सरकार द्वारा शांति स्थापना के लिए कई प्रयास किए गए। केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह कश्मीर गए और वहां के नेताओं से बातचीत की। भारत सरकार और गृहमंत्री का कहना है कि वे अलगाववादी नेताओं से बात नहीं करेंगे। जब एक सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल घाटी गया तब प्रतिनिधिमंडल के कुछ सदस्यों जैसे सीताराम येचुरी और डी राजा ने अलगाववादी नेता गिलानी से बातचीत करने की कोशिश की परंतु उन्होंने उनसे मिलने से इंकार कर दिया।

लगभग दो माह बाद कर्फ्यू उठा लिया गया परंतु स्थिति अब भी तनावपूर्ण बनी हुई है। उरी में आतंकी हमले के बाद पूरा फोकस आतंकवाद के मुद्दे पर हो गया है। जहां तक कश्मीर के हालात का सवाल है, सरकार का कहना है कि गड़बड़ी फैलाने वाले घाटी की आबादी का पांच प्रतिशत से ज्यादा नहीं हैं और उन्हें पाकिस्तान भड़का रहा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि घाटी में जो हालात हैं, उसके लिए पाकिस्तान भी कुछ हद तक ज़िम्मेदार है। हमारे पड़ोसी देश के नेता इस मुद्दे पर अपनी राजनैतिक रोटियां सेंक रहे हैं। परंतु यह भी सच है कि कश्मीरी लोगों में लंबे समय से गहरा आक्रोश और असंतोष व्याप्त है और पिछले कुछ वर्षों में यह अपने चरम पर पहुंच गया है। वहां के युवा गुस्से में हैं। उनके मन में अलगाव का भाव है। कश्मीर के लोग दोहरी मार झेल रहे हैं। एक ओर आतंकी, घाटी में शांति का वातावरण नहीं बने रहने दे रहे हैं तो दूसरी ओर सशस्त्र बलों द्वारा लोगों के नागरिक अधिकारों का उल्लंघन किया जा रहा है। राज्य में लागू सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण केंद्रीय अर्धसैनिक बलों और सेना के कर्मी मनमानी करने के लिए स्वतंत्र हैं और कई मामलों में निर्दोष नागरिकों को जबरन परेशान किया जा रहा है।

कश्मीर के हालात पर एमनेस्टी इंटरनेशनल की रपट बताती है कि घाटी में मानवाधिकारों का उल्लंघन कितना आम है। बैंगलोर में जारी इस रपट में कहा गया है कि 1990 से 2011 तक राज्य सरकार के अनुसार राज्य में 43,000 लोग मारे गए। उनमें से 21,323 ‘अतिवादी’ और 13,226 ‘नागरिक’ (अर्थात जो हिंसा में सीधे शामिल नहीं थे) थे। हथियारबंद समूहों द्वारा 5,369 सुरक्षाकर्मियों को मार डाला गया और इस अवधि में सुरक्षाबलों ने 3,642 ‘नागरिकों’को मौत के हवाले कर दिया।

सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम के कारण बिना किसी जांच या मुकदमे के आरोपियों की जान ली जा रही है और मानवाधिकार उल्लंघन की अन्य घटनाएं हो रही हैं। इस अधिनियम की धारा 7 के अनुसार नागरिक अदालतों में सुरक्षाबलों के किसी सदस्य पर मुकदमा चलाने के लिए केंद्रीय और राज्य शासन की अनुमति आवश्यक है। राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर सुरक्षाबलों की ज्यादतियों को नजरअंदाज किया जा रहा है। सेना के खिलाफ जम्मू और कश्मीर में जो शिकायतें की गईं, उनमें से 96 प्रतिशत को ‘झूठा और आधारहीन’  या ‘सैन्यबलों की छवि को खराब करने के इरादे से किया गया’ बताकर खारिज कर दिया गया। इन परिस्थितियों में कश्मीर में हर घटना पर बवाल खड़ा हो जाता है और युवा विरोध करने सड़कों पर उतर आते हैं। नागरिकों में राज्य के प्रति जो गहरा असंतोष व्याप्त है, वह बहुत दुःखद है। नागरिक इलाके व्यवहारिक रूप से सेना के कब्जे में हैं। कई वर्षों से घाटी में लगभग 6 लाख सैनिक तैनात हैं। वहां के लोगों को ऐसा लगता ही नहीं है कि वहां प्रजातंत्र है। जाहिर है इन परिस्थितियों में असंतोष और गहरा होता जा रहा है। इस पूरी समस्या के लिए केवल पाकिस्तान को ज़िम्मेदार ठहराना ठीक नहीं होगा, यद्यपि पाकिस्तान की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता।

आखिर रास्ता क्या है? यूपीए-2 सरकार ने वार्ताकारों की एक तीन सदस्यीय समिति नियुक्त की थी जिसने यह सिफारिश की थी कि कश्मीर की विधानसभा की स्वायत्तता पुनर्स्थापित की जाए और अतिवादियों व पाकिस्तान के साथ बातचीत की जाए। यह मांग भी लंबे समय से की जा रही है कि सशस्त्रबल विशेषाधिकार अधिनियम को समाप्त किया जाए और क्षेत्र में तैनात सैन्यबलों की संख्या घटाई जाए।

कश्मीर में शासन कर रही पीडीपी और भाजपा की गठबंधन सरकार, असंतुष्टों से बात करने तक को तैयार नहीं है। इससे घाटी में बेचैनी और असंतोष बढ़ रहा है। उरी और उससे पहले पठानकोठ पर हमले में पाकिस्तान की भूमिका ने वातावरण को और विषाक्त कर दिया है।

हम सब को याद है कि चुनाव अभियान के दौरान भाजपा यह घोषणा करते नहीं थकती थी कि मोदी के सरकार में आने के बाद आतंकवादियों की हमला करने की हिम्मत ही नहीं पड़ेगी। यह दावा खोखला सिद्ध हो चुका है।

आज आवश्यकता यह है कि पूरे क्षेत्र में शांति की स्थापना की जाए। कश्मीर के लोगों के घावों पर मलहम लगाई जानी चाहिए और उन्हें चैन से अपना जीवन गुज़रबसर करने का मौका मिलना चाहिए। कश्मीर के मुद्दे पर पाकिस्तान से बातचीत भी आवश्यक है। कश्मीर के साथ 1948 में विलय की जो संधि की गई थी, उसके स्वायत्तता संबंधी प्रावधानों का सम्मान किया जाना चाहिए। वार्ताकारों की समिति की रपट इस मुद्दे पर संतुलित रूख अपनाने की सिफारिश करती है। इस रपट पर गंभीरता से विचार होना चाहिए ताकि घाटी में शांति स्थापित हो सके।

 

 

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(मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

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