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  • क्या कांग्रेस एक मुस्लिम पार्टी है, क्या वह हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा करती है?

    क्या कांग्रेस एक मुस्लिम पार्टी है, क्या वह हिन्दुओं के हितों की उपेक्षा करती है?

    Prof Ram Puniyani

    इन दिनों भाजपा और उसके संगी-साथियों द्वारा अनवरत प्रचार किया जा रहा है कि कांग्रेस हिन्दू-विरोधी पार्टी है। हर संभव मौके पर यह कहा जा रहा है कि कांग्रेस, हिन्दुओं को अपमानित करती आई है। मक्का मस्जिद मामले में अदालत द्वारा सभी आरोपियों को बरी कर देने के बाद, भाजपा प्रवक्ताओं ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोलते हुए कहा कि राहुल गांधी और कांग्रेस ने हिन्दू धर्म को बदनाम किया और उन्हें इसके लिए क्षमायाचना करनी चाहिए। इसी साल कर्नाटक में होने वाले चुनाव के सिलसिले में भाजपा ने राज्य में कांग्रेस की कथित ‘हिन्दू-विरोधी‘ नीतियों का भंडाफोड़ करने के लिए यात्रा निकालने की घोषणा की है। यह प्रचार इस हद तक बढ़ गया है कि पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी को हाल में कहना पड़ा कि कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी की तरह देखा जा रहा है।

    किसी विशिष्ट धार्मिक समुदाय के संदर्भ में किसी पार्टी की नीतियों को हम किस तरह देखें? भाजपा यह प्रचार करती आई है कि वह हिन्दुओं के हितों की रक्षक है। क्या यह सही है? पार्टी ने राममंदिर,पवित्र गाय, धारा 370, लव जिहाद आदि जैसे मुद्दे उठाए। क्या एक आम हिन्दू को इससे कोई लाभ हुआ? क्या इससे हिन्दू किसानों और श्रमिकों व दलितों की हालत सुधरी? क्या इससे हिन्दू महिलाओं पर होने वाले अत्याचारों में कमी आई? यह दावा कि इस तरह के भावनात्मक मुद्दों को उठाने से हिन्दुओं को लाभ होगा, पूरी तरह से खोखला है। उल्टे, इन मुद्दों ने समाज के साम्प्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण को बढ़ावा दिया,  समाज में नफरत का जहर घोला और हिंसा भड़काई। इस ध्रुवीकरण और हिंसा से मुसलमानों के साथ-साथ हिन्दुओं का भी नुकसान हुआ।

    कांग्रेस के हिन्दू-विरोधी होने के दावे में कितनी सच्चाई है? आईए, हम मक्का मस्जिद बम धमाकों का उदाहरण लें।

    इसी घटना से जुड़े मालेगांव बम धमाकों की शुरूआती जांच, आईपीएस अधिकारी हेमंत करकरे ने की थी, जो मुंबई पर 26/11 को हुए हमले में मारे गए। स्वामी असीमानंद, जो कि इस मामले में प्रमुख आरोपी थे, ने मजिस्ट्रेट के सामने इकबालिया बयान दिया था। यह बयान किसी दबाव में नहीं दिया गया था और कानून की निगाहों में पूरी तरह से वैध था। जांच में भी यह सामने आया था कि असीमानंद, साध्वी प्रज्ञा, लेफ्टिनेंट कर्नल पुरोहित आदि इन धमाकों के पीछे थे। भाजपा सरकार के पिछले चार वर्षों के कार्यकाल के दौरान, संबंधित एजेंसियों ने इस प्रकरण की पैरवी कुछ इस ढंग से की कि ये सब दोषमुक्त घोषित कर दिए गए और महाराष्ट्र एटीएस पर गलत जांच करने का आरोप जड़ दिया गया। जिस समय करकरे मालेगांव विस्फोटों की जांच कर रहे थे, उस समय वे इतने दबाव में थे कि उन्होंने अपने पूर्व वरिष्ठ अधिकारी जूलियो रिबेरो से यह सलाह मांगी थी कि वे इस दबाव का सामना कैसे करें। रिबेरो ने उन्हें यह सलाह दी थी कि वे दबाव को नजरअंदाज करते हुए ईमानदारी से अपना काम करते रहें।

    जहां कांग्रेस की हिन्दू-विरोधी छवि बनाने के लिए इस तरह के मुद्दों का इस्तेमाल किया गया, वहीं उसकी मुस्लिम-समर्थक छवि, पिछले कुछ दशकों में निर्मित हुई, विशेषकर, कांग्रेस सरकार द्वारा शाहबानो प्रकरण में उच्चतम न्यायालय केा निर्णय को पलटने से। यह निश्चित रूप से एक गलत कदम था। परंतु इस मामले में भी कांग्रेस ने केवल मुसलमानों के दकियानूसी और कट्टर तबके के आगे समर्पण किया था। इससे आम मुसलमानों को कोई लाभ नहीं हुआ। डॉ मनमोहन सिंह के इस वक्तव्य कि ‘‘मुसलमानों का राष्ट्रीय संसाधनों पर पहला दावा है‘‘ को भी बार-बार दुहराकर यह कहा जाता है कि कांग्रेस, मुसलमानों की पिट्ठू है। जो नहीं बताया जाता, वह यह है कि यह वक्तव्य सच्चर समिति की रपट के संदर्भ में दिया गया था। सच्चर समिति ने इस धारणा को चूर-चूर कर दिया था कि मुसलमानों का तुष्टिकरण किया जा रहा है। समिति इस निष्कर्ष पर पहुंची थी कि स्वाधीनता के बाद से मुसलमानों की आर्थिक स्थिति में भारी गिरावट आई है और साम्प्रदायिक हिंसा से सबसे ज्यादा नुकसान उन्हें ही हुआ है।  एकमात्र स्थान जहां मुसलमानों को आबादी में उनके प्रतिषत से ज्यादा प्रतिनिधित्व प्राप्त है, वह है जेल।

    हमारे देश ने अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के कारण बहुत कुछ भुगता। इस देश को धर्मनिरपेक्षता की राह पर आगे ले जाना कभी आसान नहीं रहा है। भारत मे जनजागरण के साथ भारतीय राष्ट्रवाद का उदय हुआ और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जन्मी, जो सभी धर्मों के भारतीयों की प्रतिनिधि थी। कांग्रेस के सन् 1887 के अधिवेशन की अध्यक्षता बदरुद्दीन तैय्यबजी ने की थी। कांग्रेस के अध्यक्षों में पारसी, ईसाई और हिन्दू शामिल थे। उस समय मुस्लिम साम्प्रदायिक तत्व (जैसे सर सैय्यद अहमद खान) कांग्रेस पर हिन्दू पार्टी होने का आरोप लगाते थे। दूसरी ओर, हिन्दू साम्प्रदायिक नेता (जैसे लाला लालचंद) कहते थे कि कांग्रेस, हिन्दुओं के हितों की कीमत पर मुसलमानों का तुष्टिकरण कर रही है। कांग्रेस को हमेशा हिन्दू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के साम्प्रदायिक तत्वों के हमले का शिकार होना पड़ा क्योंकि वह भारतीय राष्ट्रवाद की हामी थी। कुछ कमियों के साथ, मोटे तौर पर उसने धर्मनिरपेक्षता की नीति का पालन किया।

    मुस्लिम सम्प्रदायवादियों, जिनमें मुस्लिम लीग शामिल थी, के कांग्रेस पर हमलों का अंतिम नतीजा था पाकिस्तान का निर्माण। हिन्दू सम्प्रदायवादी संगठन जैसे हिन्दू महासभा और आरएसएस यह दावा कर रहे थे कि गांधीजी द्वारा मुसलमानों के तुष्टिकरण के कारण ही मुसलमान अपना सिर उठा सके और पाकिस्तान का गठन हुआ। इसी सोच के नतीजे में नाथूराम गोड़से ने महात्मा गांधी की हत्या की। नाथूराम गोड़से एक प्रशिक्षित आरएसएस प्रचारक था और सन् 1936 में हिन्दू महासभा की पुणे शाखा का सचिव नियुक्त किया गया था। अदालत में अपने बयान (‘मे इट प्लीज योर आनर‘) में उसने कहा था कि गांधी, पाकिस्तान के निर्माण के लिए जिम्मेदार थे, उन्होंने हिन्दुओं के हितों के साथ समझौता किया और मुसलमानों को सिर पर चढ़ाया।

    आज कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी बताकर उस पर जो हमले किए जा रहे हैं, वे उसी सिलसिले का हिस्सा हैं, जो हिन्दू सम्प्रदायवादियों ने शुरू किया था। हिन्दू महासभा-आरएसएस-गोड़से की सोच, पिछले कुछ दशकों में और मजबूत हुई है। इसमें भी कोई संदेह नहीं कि स्वाधीनता के बाद से मुसलमानों की आर्थिक-शैक्षणिक और सामाजिक स्थिति में गिरावट आई है और पिछले चार दशकों में इस गिरावट की गति और तेज हुई है। सत्ताधारी दल केवल भावनात्मक मुद्दे उठा रहा है जिनसे अन्य समुदायों के साथ-साथ हिन्दुओं का भी नुकसान हो रहा है।

    भारत में धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलना अधिकाधिक कठिन होता जा रहा है। गांधी को अपने धर्मनिरपेक्ष होने की कीमत अपनी जान देकर चुकानी पड़ी। उनके समर्पित शिष्य पंडित नेहरू को धर्मनिरपेक्षता की राह पर चलने के कारण आज बदनाम किया जा रहा है। मुस्लिम सम्प्रदायवादियों ने पाकिस्तान के निर्माण का जश्न मनाया था परंतु आज उस देश में न विकास है और ना ही शान्ति। नेहरू, कांग्रेस और गांधी के नेतृत्व में भारत कुछ हद तक देश में बंधुत्व की स्थापना करने में सफल रहा और प्रगति की राह पर आगे बढ़ा। कांग्रेस को मुस्लिम पार्टी और हिन्दू विरोधी बताने वाले लोग, वे साम्प्रदायिक तत्व हैं जिन्हें ऐसा करने में अपना लाभ दिखता है। अपनी सारी सीमाओं और कमियों के बावजूद, कांग्रेस धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों की रक्षा करने का प्रयास करती आई है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • क्या केवल अंबेडकर के चित्रों पर माल्यार्पण  उनका सम्मान करना है? –Prof Ram Puniyani

    क्या केवल अंबेडकर के चित्रों पर माल्यार्पण उनका सम्मान करना है? –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    गत 14 अप्रैल को पूरे देश में लगभग सभी राजनैतिक दलों और समूहों ने डॉ भीमराव अंबेडकर की 127वीं जयंती जोरशोर से मनाई। परन्तु इस मौके पर भाजपा का उत्साह तो देखते ही बनता था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अंबेडकर को श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि कांग्रेस, अंबेडकर की विरोधी थी और उसने उन्हें कभी वह सम्मान नहीं दिया, जिसके वे हकदार थे। उन्होंने यह भी कहा कि वर्तमान सरकार ने जितना सम्मान अंबेडकर को दिया है, वैसा किसी और सरकार ने नहीं किया।

    जहाँ तक अंबेडकर पर कब्जा करने के अभियान का सम्बन्ध है, भाजपा, कई स्तरों पर काम कर रही है। पहला, वह यह प्रचार कर रही है कि कांग्रेस, अंबेडकर के विरुद्ध थी और दूसरा, कि भाजपा उनके नाम पर भीम जैसे एप जारी कर और पार्टी  के नेता दलितों के साथ उनके घरों में भोजन कर उन्हें सम्मान दे रहे हैं। इन दिनों अंबेडकर को सम्मान देने की होड़ मची हुई है और इस मामले में भाजपा ने सभी को पीछे छोड़ दिया है। परन्तु क्या भाजपा की नीतियाँ सचमुच उन सिद्धांतों के अनुरूप हैं, जो अंबेडकर को प्रिय थे? सम्मान का क्या अर्थ है? क्या किसी महान व्यक्ति की प्रशंसा में गीत गाना उसका सम्मान है या उसके सामाजिक व राजनैतिक योगदान को मान्यता देना?

    यह कहने में किसी को कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि जहाँ तक विश्वदृष्टि और विचारधारा का प्रश्न है, भाजपा और अंबेडकर में कोई समानता नहीं है। भाजपा दो जुबानों में बोलने में माहिर है। पार्टी के इस दावे में कोई दम नहीं है कि कांग्रेस ने अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया। हम सब जानते हैं कि जाति प्रथा की बेड़ियों को काटने के अंबेडकर के संघर्ष से प्रभावित होकर ही महात्मा गांधी ने अपना अछूत प्रथा विरोधी अभियान चलाया था। यह अंबेडकर को सम्मान देने का सही और असली तरीका था। यद्यपि, अंबेडकर कांग्रेस के सदस्य नहीं थे, परंतु फिर भी, उन्हें नेहरू केबिनेट में शामिल किया गया और कानून जैसा महत्वपूर्ण विभाग सौंपा गया। कांग्रेस ने अंबेडकर के सरोकारों को गंभीरता से लिया और उन्हें संविधानसभा की मसविदा समिति का अध्यक्ष नियुक्त किया गया। नेहरू और कांग्रेस, दोनों सामाजिक सुधार के हामी थे और नेहरू के कहने पर ही अंबेडकर ने हिन्दू कोड बिल तैयार किया था, जिसका भाजपा के पितृसंगठन आरएसएस ने जबरदस्त विरोध किया था।

    भाजपा का अंबेडकर के प्रति दृष्टिकोण क्या था? सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि भाजपा, 1980 में अस्तित्व में आई। उसके पहले उसका पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ (1952) और उसका पितृसंगठन आरएसएस (1925), राजनीति में सक्रिय था। इन तीनों ही संगठनो की मूल विचारधारा हिन्दू राष्ट्रवाद की थी। सभी नाजुक मोड़ों पर आरएसएस ने विचारधारा के स्तर पर अंबेडकर का विरोध किया। जब भारतीय संविधान का मसविदा संविधानसभा के समक्ष प्रस्तुत किया गया, उस समय आरएसएस के मुखपत्र ‘आर्गनाईजर‘ (30 नवंबर 1949) ने लिखा, ‘‘भारत के नए संविधान में सबसे बुरी बात यह है कि उसमें कुछ भी भारतीय नहीं है…उसमें भारत की प्राचीन संवैधानिक विधि का एक निशान तक नहीं है। ना ही उसमें प्राचीन भारतीय संस्थाओं, शब्दावली या भाषा के लिए कोई जगह है…उसमें प्राचीन भारत में हुए अनूठे संवैधानिक विकास की तनिक भी चर्चा नहीं है। मनु के नियम, स्पार्टा के लाईकरगस और फारस के सोलन के बहुत पहले लिखे गए थे। आज भी मनु के नियम, जिन्हें मनुस्मृति में प्रतिपादित किया गया है, पूरी दुनिया में प्रशंसा के पात्र हैं और भारत के हिन्दू, स्वतःस्फूर्त ढंग से उनका पालन करते हैं और उनके अनुरूप आचरण करते हैं। परंतु हमारे संवैधानिक पंडितों के लिए इस सबका कोई अर्थ ही नहीं है‘।

    इसी तरह जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया, उसके बाद इन संगठनों ने उन पर अत्यंत कटु हमला बोल दिया। आरएसएस मुखिया एमएस गोलवलकर ने इस बिल की कड़ी आलोचना की। अगस्त 1949 में दिए गए एक भाषण में उन्होंने कहा कि अंबेडकर जिन सुधारों की बात कर रहे हैं ‘‘उनमें कुछ भी भारतीय नहीं है। भारत में विवाह और तलाक आदि से जुड़े मसले, अमरीकी या ब्रिटिश माडल के आधार पर नहीं सुलझाए जा सकते। हिन्दू संस्कृति और विधि के अनुसार, विवाह एक संस्कार है, जिसे मृत्यु भी नहीं बदल सकती। विवाह एक समझौता नहीं है, जिसे किसी भी समय तोड़ा जा सकता है‘‘। उन्होंने आगे कहा, ‘‘यह सही है कि देश के कुछ हिस्सों में हिन्दू समाज की नीची जातियों में तलाक का रिवाज है परंतु इस आचरण को ऐसा आदर्श नहीं माना जा सकता, जिसका पालन सभी को करना चाहिए‘‘ (आर्गनाईजर, सितंबर 6, 1949)।

    भाजपा, एनडीए गठबंधन के सहारे सन् 1998 में सत्ता में आई। उस समय एनडीए सरकार की केबिनेट के एक महत्वपूर्ण सदस्य अरूण शौरी ने अंबेडकर की अत्यंत तीखी निंदा की थी।  वर्तमान सरकार के मंत्री यद्यपि अंबेडकर की मूर्तियों और चित्रों पर माला चढ़ाते नहीं थक रहे हैं परंतु एक केन्द्रीय मंत्री अनंतकृष्ण हेगड़े ने खुलेआम यह घोषणा की है कि भाजपा, संविधान को बदलना चाहती है। अंबेडकर, धर्मनिरपेक्षता और स्वतंत्रता के जबरदस्त पक्षधर थे परंतु उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का कहना है कि धर्मनिरपेक्षता स्वाधीन भारत का सबसे बड़ा झूठ है। भाजपा की रणनीति यही है कि वह एक ओर बाबासाहेब की शान में कसीदे काढ़ती रहे तो दूसरी ओर जाति और लैंगिक समानता के उनके सिद्धांतों को कमजोर करती रहे। बाबासाहेब के विचार क्या थे, यह इसी से स्पष्ट है कि उन्होंने उस मनुस्मृति का दहन किया था, जिस पर संघ परिवार घोर श्रद्धा रखता है।

    अंबेडकर, जाति के उन्मूलन के हामी थे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि जाति, सामाजिक न्याय की राह में एक बड़ा रोड़ा है। इसके विपरीत, आरएसएस,जातियों के बीच समरसता की बात करता है और यही कारण है कि उसने दलितों में काम करने के लिए सामाजिक समरसता मंच गठित किए हैं। जहां तक जाति के उन्मूलन का प्रश्न है, उस पर संघ परिवार मौन धारण किए हुए है।

    भाजपा की राजनीति के केन्द्र में हैं भगवान राम। अगर भाजपा सचमुच अंबेडकर का सम्मान करती होती तो क्या वह भगवान राम को अपनी राजनीति का मुख्य प्रतीक बनाती? भाजपा ने भगवान राम के नाम का प्रयोग कर आम हिन्दुओं को गोलबंद करने का हर संभव प्रयास किया। उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री ने अयोध्या में राम की एक विशाल प्रतिमा स्थापित करने की घोषणा की है। आजकल रामनवमी का त्यौहार बहुत उत्साह से मनाया जाने लगा है और इस दौरान हथियारबंद युवा जुलूस निकालते हैं। वे इस बात का विशेष ख्याल रखते हैं कि ये जुलूस मुसलमानों के इलाकों से जरूर गुजरें। अंबेडकर, राम के बारे में क्या सोचते थे? वे अपनी पुस्तक‘रिडल्स ऑफ़ हिन्दुइज्म‘ में राम की आलोचना करते हैं। वे कहते हैं कि राम ने शम्बूक को सिर्फ इसलिए मारा क्योंकि वह शुद्र होते हुए भी तपस्या कर रहा था। इसी तरह, राम ने पेड़ के पीछे छुपकर बाली की हत्या की। अंबेडकर, राम की सबसे कटु आलोचना इसलिए करते हैं क्योंकि उन्होंने अपनी गर्भवती पत्नी को घर से निकाल दिया और सालों तक उसकी कोई खोजखबर नहीं ली।

    अंबेडकर के चित्रों और उनकी मूर्तियों पर माल्यार्पण करके अंबेडकर को सम्मान नहीं दिया जा सकता। उन्हें सम्मान देने के लिए यह जरूरी है कि हम मनुस्मृति की उनकी आलोचना को स्वीकार करें, भारतीय संविधान के मूल्यों को सम्मान दें और समर्पित भाव से धर्मनिरपेक्षता और सामाजिक न्याय के लिए काम करें। भाजपा की नीतियों ने दलितों के विरूद्ध पूर्वाग्रह में वृद्धि की है और उनके खिलाफ हिंसा भी बढ़ी है। पिछले चार साल इसके गवाह हैं। गांधी, नेहरू और कांग्रेस, अंबेडकर से उनकी मत विभिन्नता के बावजूद अंबेडकर और उनके सरोकारों का सम्मान करते थे।  

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • नेहरु की विरासत की अवहेलना, भारतीय प्रजातंत्र को कमज़ोर करेगी –Prof Ram Puniyani

    नेहरु की विरासत की अवहेलना, भारतीय प्रजातंत्र को कमज़ोर करेगी –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    पिछले कुछ वर्षों से, सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) द्वारा भारत के प्रथम प्रधानमंत्री और आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरु की विरासत को नज़रंदाज़ और कमज़ोर करने के अनवरत और सघन प्रयास किये जा रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय आयोजनों में उनका नाम लेने से बचा जा रहा है और कई स्कूली पाठ्यपुस्तकों में से उन पर केन्द्रित अध्याय हटा दिए गए हैं। राष्ट्रीय अभिलेखागार की भारत छोड़ो आंदोलन पर केन्द्रित प्रदर्शनी में उनका नाम तक नहीं है। सत्ताधारी दल के प्रवक्ता,वर्तमान सरकार की असफलताओं के लिए नेहरू की नीतियों को दोषी ठहरा रहे हैं। सोशल मीडिया में उनके बारे में निहायत घटिया बातें कही जा रही हैं। यह बताया जा रहा है कि वे और उनके पुरखे अत्यंत विलासितापूर्ण जीवन जीते थे। ऐतिहासिक घटनाओं को तोड़-मरोड़कर, विभाजन और कश्मीर समस्या के लिए नेहरू को दोषी ठहराया जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने तो यहां तक कह दिया कि नेहरू ने सरदार पटेल के अंतिम संस्कार में हिस्सा नहीं लिया था।

    आईए, हम उद्योग, तकनीकी, कृषि, शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में नेहरू के योगदान पर नजर डालें और यह देखें कि आधुनिक भारत के निर्माण में उनका क्या योगदान था। नेहरू, अंतर्राष्ट्रीय मामलों से बहुत अच्छी तरह से वाकिफ थे। वे पूरी दुनिया में साम्राज्यवाद के विरूद्ध चल रहे संघर्षों के समर्थक थे और नस्लवाद के कड़े विरोधी थे। वे सभी देशों की समानता के पक्षधर थे। जहां तक भारत का प्रश्न है, गांधीजी के जादू से प्रभावित होकर वे स्वाधीनता संग्राम में कूद पड़े। कांग्रेस के अध्यक्ष बतौर उन्होंने भारत को पूर्ण स्वतंत्रता दिए जाने की मांग की। वे केवल खादी पहनते थे। स्वाधीनता संग्राम के दौरान उन्हें कई बार जेल जाना पड़ा और वे कुल मिलाकर 3,269 दिन जेल में रहे। वे एक जिज्ञासु पाठक और प्रतिभाशाली लेखक थे। उनकी आत्मकथा व उनके द्वारा लिखित ‘भारत एक खोज‘ और ‘पिता के पत्र, पुत्री के नाम‘अंतर्राष्ट्रीय साहित्य की अनमोल विरासत हैं। विभाजन का मुद्दा काफी उलझा हुआ था। अंग्रेज, इस देश को दो टुकड़ों में बांटने पर आमादा थे। वे ऐसा इसलिए कर सके क्योंकि सावरकर ने काफी पहले द्विराष्ट्र के सिद्धांत का प्रतिपादन कर दिया था और जिन्ना, अलग इस्लामिक देश की अपनी मांग पर अड़े हुए थे। कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में से पटेल वे पहले व्यक्ति थे जिन्हें यह अहसास हो गया था कि देश का विभाजन अपरिहार्य है। नेहरू को इस कड़वे सच को स्वीकार करने में कई और महीने लग गए। कश्मीर के मामले में पटेल ने जूनागढ़ में भाषण देते हुए कहा कि अगर पाकिस्तान हैदराबाद पर अपना दावा छोड़ दे तो भारत, कश्मीर को उसका हिस्सा बनने देगा। शेख अब्दुल्ला के जोर देने पर नेहरू ने कश्मीर के महाराजा के साथ विलय की संधि पर हस्ताक्षर करवाकर, भारतीय सेना को पाकिस्तानी कबाईलियों से मुकाबला करने कश्मीर भेजा।

    जहां तक प्रधानमंत्री पद का सवाल है, गांधीजी को देश ने यह अधिकार दिया था कि वे भारत के पहले प्रधानमंत्री को चुनें। गांधीजी को यह अहसास था कि नेहरू को वैश्विक मामलों की बेहतर समझ है और राजनैतिक दृष्टि से वे पटेल की तुलना में उनके अधिक योग्य उत्तराधिकारी सिद्ध होंगे। जहां तक लोकप्रियता का सवाल है, नेहरू, पटेल से कहीं आगे थे। एक बार एक आम सभा में उमड़ी भारी भीड़ के बारे में पत्रकारों द्वारा पूछे जाने पर पटेल ने कहा कि लोग जवाहर को देखने आए हैं,उन्हें नहीं।

    आज सार्वजनिक क्षेत्र को बढ़ावा देने की नेहरू की नीति की आलोचना की जा रही है। यह नीति नेहरू ने अकारण और केवल अपनी इच्छा से नहीं अपनाई थी। बांबे प्लान (1944) के तहत उद्योगपति, सरकार से आधारभूत उद्योगों की स्थापना के लिए सहायता की अपेक्षा कर रहे थे। सार्वजनिक क्षेत्र में स्थापित आधारभूत उद्योगों ने देश की औद्योगिक प्रगति की राह खोली। नोबेल पुरस्कार विजेता पाल कुर्गबेन ने कहा था कि भारत ने तीस साल में जो हासिल किया है, उसे हासिल करने में इंग्लैंड को 150 साल लग गए थे। यह इसलिए हो सका क्योंकि गणतंत्र के शुरुआती वर्षों में नेहरू ने देश को एक मजबूत नींव दी।

    शिक्षा और विज्ञान के क्षेत्रों में उनकी नीतियों के कारण ही आज हम दुनिया के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा कर पा रहे हैं और भारत एक बड़ी और मजबूत अर्थव्यवस्था के रूप में उभरा है। औद्योगीकरण के साथ-साथ, नेहरू ने शिक्षा और विज्ञान पर भी बहुत जोर दिया। आज अगर हम अपनी तुलना उन देशों से करें, जो हमारे साथ ही स्वतंत्र हुए थे, तो हमें पता चलेगा कि विज्ञान और तकनीकी के मामले में हम उनसे कहीं आगे हैं। नेहरू और अंबेडकर ने यह सुनिश्चित  किया कि राज्य के नीति निदेशक तत्वों के अधीन नागरिकों में वैज्ञानिक समझ का विकास करने की जिम्मेदारी राज्य को सौंपी जाए। नेहरू ने नीति निदेशक तत्वों के इस हिस्से को मूर्त स्वरूप देते हुए आईआईटी, इसरो, भाभा परमाणु अनुसंधान केन्द्र, सीएसआईआर इत्यादि जैसी संस्थाओं की नींव रखी। स्वास्थ्य के क्षेत्र में अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसी उत्कृष्ट संस्थाओं की स्थापना की गई।

    जब हम स्वाधीन हुए, उस समय देश की साक्षरता दर 14 प्रतिशत और औसत आयु 39 वर्ष थी। आज हम मीलों आगे निकल आए हैं, यद्यपि हमें और आगे जाना है।

    सामाजिक स्तर पर नेहरू बहुवाद के हामी थे और धर्मनिरपेक्षता को राज्य की मूल नीतियों का हिस्सा मानते थे।  अपनी इसी प्रतिबद्धता के चलते, विभाजन के बाद हुए कई दंगों में वे हिंसा पर नियंत्रण करने के लिए खुली जीप पर सवार हो खून की प्यासी भीड़ों के बीच गए। सन् 1961 के जबलपुर दंगों के बाद, उन्होंने राष्ट्रीय एकता परिषद का गठन किया। आज के शासकों के विपरीत, वे धार्मिक अल्पसंख्यकों का विश्वास जीत सके। उनके द्वारा स्थापित संस्थाओं जैसे योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को कमजोर या समाप्त किया जा रहा है। आज देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ रही है और कारपोरेट घरानों को लूट की पूरी छूट मिली हुई है।

    क्या उनमें कोई कमियां नहीं थीं? क्या उन्होंने कोई गलती नहीं की? ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। उनके हिस्से में असफलताएं और गलतियां भी थीं। उन्होने चीन पर अगाध विश्वास किया और भारत-चीन युद्ध में हम पराजित हुए। बड़े बांधों के संबंध में उनकी नीति में भी कमियां थीं। परंतु कुल मिलाकर उन्होंने न केवल भारत,बल्कि पूरी दुनिया पर अपनी गहरी और सकारात्मक छाप छोड़ी है।

    क्षुद्र सोच से ग्रस्त आज के शासक, नेहरू के योगदान को नजरअंदाज करना चाहते हैं। वे उसे कम कर बताने की कोशिश कर रहे हैं। नेहरू द्वारा स्थापित दो महत्वपूर्ण संस्थाओं योजना आयोग और राष्ट्रीय एकता परिषद को भंग कर दिया गया है। नेहरू आज विघटनकारी और संकीर्ण विचारधारा के निशाने पर हैं। उनके बारे में अगणित झूठ फैलाए जा रहे हैं। सबसे घृणास्पद यह है कि सुनियोजित तरीके से उनके व्यक्तिगत चरित्र, उनके परिवार और उनके योगदान को बदनाम किया जा रहा है। आज जो लोग सरकार में हैं, उनके विचारधारात्मक पूर्वजों ने कभी स्वाधीनता संग्राम में हिस्सा नहीं लिया। उनके पास अपना कहने को कोई नायक है ही नहीं। यही कारण है कि वे सरदार पटेल जैसे कांग्रेस नेताओं पर कब्जा जमाने की कोशिश कर रहे हैं। विचारधारा के स्तर पर वे नेहरू को अपनी राह में बड़ा रोड़ा पाते हैं। अगर नेहरू की विचारधारा इस देश में जिंदा रहेगी तो वे अपने संकीर्ण लक्ष्यों को कभी हासिल न कर सकेंगे। यही कारण है कि वे नेहरू पर कीचड़ उछाल रहे हैं।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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  • नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

    नाम में क्या रखा है? बहुत कुछ :: अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ पर जोर –Prof Ram Puniyani

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    इन दिनों कई दलित संगठन, उत्तरप्रदेश सरकार द्वारा उसके आधिकारिक अभिलेखों में भीमराव अंबेडकर के नाम में ‘रामजी‘ शब्द जोड़े जाने का विरोध कर रहे हैं। यह सही है कि संविधान सभा की मसविदा समिति के अध्यक्ष बतौर, अंबेडकर ने संविधान की प्रति पर अपने हस्ताक्षर, भीमराव रामजी अंबेडकर के रूप में किए थे। परंतु सामान्यतः, उनके नाम में रामजी शब्द शामिल नहीं किया जाता है। तकनीकी दृष्टि से उत्तरदेश सरकार के इस निर्णय को चुनौती नहीं दी जा सकती परंतु यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह निर्णय, अंबेडकर को अपना घोषित करने की हिन्दुत्ववादी राजनीति का हिस्सा है। भाजपा के लिए भगवान राम, तारणहार हैं। उनके नाम का इस्तेमाल कर भाजपा ने समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत किया – फिर चाहे वह राममंदिर का मुद्दा हो, रामसेतु का या रामनवमी की पूर्व संध्या पर जानबूझकर भड़काई गई हिंसा का। मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से हम भारत में दो विरोधाभासी प्रवृत्तियों का उभार देख रहे हैं। एक ओर दलितों के विरूद्ध अत्याचार बढ़ रहे हैं तो दूसरी ओर, अंबेडकर की जंयतियां जोर-शोर से मनाई जा रही हैं और हिन्दू राष्ट्रवादी अनवरत अंबेडकर का स्तुतिगान कर रहे हैं।

    इस सरकार के पिछले लगभग चार वर्षों के कार्यकाल में हमने दलितों के दमन के कई उदाहरण देखे। आईआईटी मद्रास में पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया, रोहित वेम्यूला की संस्थागत हत्या हुई और ऊना में दलितों पर घोर अत्याचार किए गए। मई 2017, जब योगी आदित्यनाथ उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री बन चुके थे, में सहारनपुर में हुई हिंसा में बड़ी संख्या में दलितों के घर जला दिए गए। दलित नेता चंद्रशेखर रावण, जमानत मिलने के बाद भी जेल में हैं क्योंकि उन पर आरोप है कि उन्होंने हिंसा भड़काई। दलितों के घरों को आग के हवाले करने की घटना, भाजपा सांसद के नेतृत्व में निकाले गए जुलूस के बाद हुई जिसमें  ‘‘यूपी में रहना है तो योगी-योगी कहना होगा‘‘ व ‘‘जय श्रीराम‘‘ के नारे लगाए जा रहे थे। महाराष्ट्र के भीमा कोरेगांव में दलितों के खिलाफ हिंसा भड़काई गई और जैसा कि दलित नेता प्रकाश अंबेडकर ने कहा है, हिंसा भड़काने वालों के मुख्य कर्ताधर्ता भिड़े गुरूजी को अभी तक गिरफ्तार नहीं किया गया है। भाजपा की केन्द्र सरकार में मंत्री व्ही के सिंह ने सन् 2016 में दलितों की तुलना कुत्तों से की थी और हाल में एक अन्य केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी ऐसा ही कहा। उत्तरप्रदेश के कुशीनगर में जब योगी आदित्यनाथ मुशहर जाति के लोगों से मिलने जा रहे थे, उसके पूर्व अधिकारियों ने दलितों को साबुन की बट्टियां और शेम्पू बांटे ताकि वे नहा-धोकर साफ-सुथरे लग सकें।

    मोदी-योगी मार्का राजनीति की मूल नीतियों और चुनाव में अपना हित साधने की उसकी आतुरता के कारण यह सब हो रहा है। सच यह है कि मोदी-योगी और अंबेडकर के मूल्यों में मूलभूत अंतर हैं। अंबेडकर, भारतीय राष्ट्रवाद के हामी थे। वे जाति का उन्मूलन करना चाहते थे और उनकी यह मान्यता थी कि जाति और अछूत प्रथा की जड़ें हिन्दू धर्मग्रंथों में हैं। इन मूल्यों को नकारने के लिए अंबेडकर ने मनुस्मृति का दहन किया था। उन्होंने भारतीय संविधान का निर्माण किया, जो स्वाधीनता संग्राम के वैश्विक मूल्यों पर आधारित था। भारतीय संविधान के आधार थे समानता, बंधुत्व, स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के मूल्य। दूसरी ओर थीं हिन्दू महासभा जैसी संस्थाएं, जिनकी नींव हिन्दू राजाओं और जमींदारों ने रखी थी और जो भारत को उसके ‘गौरवशाली अतीत‘ में वापस ले जाने की बात करती थीं – उस अतीत में जब वर्ण और जाति को ईश्वरीय समझा और माना जाता था। हिन्दुत्ववादी राजनीति का अंतिम लक्ष्य आर्य नस्ल और ब्राम्हणवादी संस्कृति वाले हिन्दू राष्ट्र का निर्माण है। आरएसएस इसी राजनीति का पैरोकार है।

    माधव सदाशिव गोलवलकर व अन्य हिन्दू चिंतकों ने अंबेडकर के विपरीत, हिन्दू धर्मग्रंथों को मान्यता दी। सावरकर का कहना था कि मनुस्मृति ही हिन्दू विधि है। गोलवलकर ने मनु को विश्व का महानतम विधि निर्माता निरूपित किया। उनका कहना था कि पुरूषसूक्त में कहा गया है कि सूर्य और चन्द्र ब्रम्हा की आंखें हैं और सृष्टि का निर्माण उनकी नाभि से हुआ। ब्रम्हा के सिर से ब्राम्हण उपजे, उनके हाथों से क्षत्रिय, उनकी जंघाओं से वेश्य और उनके पैरों से शूद्र। इसका अर्थ यह है कि वे लोग जिनका समाज इन चार स्तरों में विभाजित है, ही हिन्दू हैं।

    भारतीय संविधान के लागू होने के बाद, आरएसएस के मुखपत्र आर्गनाईजर ने अपने एक संपादकीय में संविधान की घोर निंदा की। आरएसएस, लंबे समय से कहता आ रहा है कि भारतीय संविधान में आमूलचूल परिवर्तन की जरूरत है। हाल में केन्द्रीय मंत्री अनंत कुमार हेगड़े ने भी यही बात कही। जब अंबेडकर ने संसद में हिन्दू कोड बिल प्रस्तुत किया था, तब उसका जबरदस्त विरोध हुआ था। दक्षिणपंथी ताकतों ने अंबेडकर की कड़ी निंदा की थी। परंतु अंबेडकर अपनी बात पर कायम रहे। उन्होंने कहा, ‘‘तुम्हें न केवल शास्त्रों को त्यागना चाहिए बल्कि उनकी सत्ता को भी नकारना चाहिए, जैसा कि बुद्ध और नानक ने किया था। तुम में यह साहस होना चाहिए कि तुम हिन्दुओं को यह बताओ कि उनमें जो गलत है वह उनका धर्म है – वह धर्म, जिसने जाति की पवित्रता की अवधारणा को जन्म दिया है‘‘।

    आज क्या हो रहा है? आज अप्रत्यक्ष रूप से जाति प्रथा को औचित्यपूर्ण ठहराया जा रहा है। भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद के अध्यक्ष वाई. सुदर्शन ने हाल में कहा था कि इतिहास में किसी ने जाति प्रथा के विरूद्ध कभी कोई शिकायत नहीं की और इस प्रथा ने हिंदू समाज को स्थायित्व प्रदान किया। एससी-एसटी अत्याचार निवारण अधिनियम को कमजोर करना और विश्वविद्यालयों में इन वर्गों व ओबीसी के लिए पदों में आरक्षण संबंधी नियमों में बदलाव, सामाजिक न्याय और अंबेडकर की विचारधारा पर सीधा हमला हैं।

    जैसे-जैसे हिन्दू राष्ट्रवाद की आवाज बुलंद होती जा रही है उसके समक्ष यह समस्या भी उत्पन्न हो रही है कि वह दलितों की सामाजिक न्याय पाने की महत्वाकांक्षा से कैसे निपटे। हिन्दू राष्ट्रवादी राजनीति, जाति और लैंगिक पदक्रम पर आधारित है। इस पदक्रम का समर्थन आरएसएस चिंतक व संघ परिवार के नेता करते आ रहे हैं। उनके सामने समस्या यह है कि वे इन वर्गों की महत्वाकांक्षाएं पूरी नहीं करना चाहते परंतु चुनावों में उनके वोट प्राप्त करना चाहते हैं। इसी कारण वे एक ओर दलितों के नायक बाबा साहब अंबेडकर को अपना सिद्ध करने का भरसक प्रयास कर रहे हैं तो दूसरी ओर, दलितों को अपने झंडे तले लाने की कोशिश में भी लगे हुए हैं। वे चाहते हैं कि दलित, भगवान राम और पवित्र गाय पर आधारित उनके एजेंडे को स्वीकार करें।

    यह एक अजीबोगरीब दौर है। एक ओर उन सिद्धांतों और मूल्यों की अवहेलना की जा रही है, जिनके लिए अंबेडकर ने जीवन भर संघर्ष किया तो दूसरी ओर उनकी अभ्यर्थना हो रही है। और अब तो अंबेडकर के नाम का उपयोग भी हिन्दुत्ववादी शक्तियां, राम की अपनी राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए करना चाहती हैं।   


    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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    Prof Ram Puniyani Rtd

    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत –Prof Ram Puniyani

    मुस्लिम समुदाय में सुधार: समग्र दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani, Rtd
    IIT Bombay

    हर्ष मंदर के लेख (द इंडियन एक्सप्रेस, मार्च 7, 2018) “सोनिया सेडली” और रामचंद्र गुहा के उसके प्रतिउत्तर में इसी समाचारपत्र में प्रकशित आलेख “लिबरल्स ओ” ने भारत में मुस्लिम समुदाय की स्थिति और उसमें सुधार की प्रक्रिया पर नए सिरे से एक बहस शुरू कर दी है।  यद्यपि इस प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले कई कारक हैं तथापि उन्हें मोटे तौर पर दो श्रेणियों में विभाजित किया जा सकता है – एक, समुदाय के अन्दर और दूसरा, समुदाय के बाहर – और इन दोनों के सकारात्मक और नकारात्मक दोनों प्रभाव परिलक्षित हो रहे हैं। इन दोनों के जटिल संयुक्त प्रभाव से ही समय के साथ किसी भी समुदाय में परिवर्तन आते हैं। जहाँ मंदर का फोकस मुस्लिम समुदाय पर पड़ने वाले बाहरी नकारात्मक प्रभावों पर है वहीं रामचंद्र गुहा, समुदाय के भीतर के कारकों पर ध्यान केन्द्रित कर रहे हैं। 

    पिछले कुछ दशकों में मुस्लिम समुदाय में आंतरिक तौर पर जो कुछ हो रहा है, उसे समझना इसलिए ज़रूरी है ताकि हम यह जान सकें कि हामिद दलवई और आरिफ मोहम्मद खान जैसे सुधारक क्यों कुछ विशेष नहीं कर सके। समुदाय में सुधार की प्रक्रिया, मुख्यतः उसमें व्याप्त असुरक्षा के भाव के कारण बाधित हो रही है। इस भाव के बढ़ने के दो कारण हैं – पहला, राष्ट्रीय स्तर पर सांप्रदायिक हिंसा, जिसके कारण इस समुदाय को जान-माल और रोज़गार का बहुत नुकसान हो रहा है। दूसरा, कई तरीकों से इस समुदाय को आर्थिक दृष्टि से हाशिए पर धकेला जा रहा है। इन दोनों कारणों से यह समुदाय दकियानूसी विचारों को गले लगा रहा है और रूढ़िवादी मौलानाओं का दबदबा बढ़ता जा रहा है।

    वैश्विक स्तर पर तेल के संसाधनों पर नियंत्रण की राजनीति के चलते, इस्लाम के नाम पर आतंकवाद का उदय हुआ और उससे उभरा वैश्विक स्तर पर इस्लाम के प्रति भय का भाव और मुसलमानों का दानवीकरण करने की प्रक्रिया। आज मुस्लिम पहचान को समाज के लिए एक खतरे की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। इन दोनों के कारण हमारे देश में भी कट्टरपंथी नेतृत्व का मुस्लिम समाज पर नियंत्रण और प्रभाव बढ़ा है। बहुत पहले, सन् 1992-93 की मुंबई हिंसा के बाद, मैंने अचानक पाया कि मेरे मार्गदर्शन में शोध कर रहे अध्येता, दिन में कई बार मस्जिद जाने लगे और मेरे एक साथी शिक्षक ने अपने उपनाम, जो पहले उनके धर्म को इंगित नहीं करता था की जगह ऐसे उपनाम का प्रयोग करना शुरू कर दिया जिससे यह साफ हो जाता था कि वे मुसलमान हैं। आईआईटी मुंबई के परिसर में निवास करते हुए मैंने देखा कि गुजरात के सन् 2002 के कत्लेआम के बाद केम्पस में मुस्लिम लड़कियां जो तब तक सलवार-कमीज या पेंट और शर्ट पहनती थीं, अचानक बुर्का ओढ़ने लगीं।

    मक्का मस्जिद, मालेगांव, समझौता एक्सप्रेस और अजमेर में हुए बम विस्फोटों के बाद, पुलिस ने तुरत-फुरत बड़ी संख्या में मुसलमान युवकों को हिरासत में ले लिया और अदालतों से बरी होने के पूर्व, उन्हें कई साल सीखचों के पीछे गुजारने पड़े। इससे भी सुधार की प्रक्रिया बाधित हुई। शिक्षा प्राप्त करने के लिए मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा हिस्सा बहुत आतुर था परन्तु बाटला हाउस मुठभेड़ और आजमगढ़ और भटकल जैसे स्थानों के दानवीकरण ने शिक्षा को उनकी प्राथमिकता नहीं बनने दिया।

    इस परेशानहाल समुदाय में सुधार की प्रक्रिया कैसे सफल हो सकती है? जैसा कि हर्ष मंदर ने लिखा है, इस समुदाय का संपूर्ण राजनैतिक हाशियाकरण हो चुका है। सांप्रदायिक दंगों के चलते वे अपने मोहल्लों में सिमट गए हैं। सन 1992-93 की हिंसा के बाद मुंबई के नज़दीक मुम्बरा अस्तित्व में आया तो 2002 के बाद, जुहापुरा। किसी डरे-सहमे और अपने में सिमटे समुदाय में किस हद तक सुधर लाया जा सकता है? कई विवेकशील और प्रबुद्ध मुसलमानों ने अपने समुदाय में शिक्षा को प्रोत्साहन देने के सघन प्रयास किए। अपनी एक अमरीका यात्रा के दौरान मुझे कई ऐसे मुसलमानों से मिलने का मौका मिला जो वहां अलग-अलग पेशों में थे। वे सब इस बारे में एकमत थे कि भारतीय मुसलमानों में शिक्षा को प्रोत्साहन दिए जाने के ज़रुरत है और वे इसके लिए भी तैयार थे कि वे भारत में इस समुदाय के लिए शिक्षण संस्थाओं की स्थापना में आर्थिक सहयोग उपलब्ध करवाएं और युवा मुसलमान लड़कों व लड़कियों के लिए वजीफों की व्यवस्था करें। इससे उन प्रयासों को मजबूती मिलेगी जो गुजरात में जेएस बंदूकवाला और देश भर में मुसलमानों की कई संस्थाएं कर रहीं हैं।

    आज देश में दक्षिणपंथ का जोर बढ़ रहा है और चुनाव जीतने के लिए नेताओं को अपने हिन्दू होने का दंभ भरना आवश्यक हो गया है। इसके साथ ही, “जो लोग भारत में रह रहे हैं, वे सब हिन्दू हैं” (मोहन भगवत) जैसे दावे, मुसलमानों को आतंकित कर रहे हैं। इसी के चलते असगर अली इंजीनियर जैसे लोग, जिन्होंने इस्लाम का मानवतावादी चेहरा दुनिया के सामने रखने का प्रयास किया और समुदाय में सुधार की नींव रखी, उन्हें मुख्यधारा से बाहर कर दिया गया। मुस्लिम समुदाय आज एक दुविधा में फंसा हुआ है। उसका केवल राजनैतिक हाशियाकरण ही नहीं हुआ है बल्कि उसे घृणा का पात्र बना दिया गया है। इसके लिए इतिहास के साम्प्रदायिक संस्करण का उपयोग किया गया और यह दिखाने का प्रयास किया गया कि हिन्दू, मुस्लिम राजाओं के हाथ प्रताड़ित हुए थे।

    जहां तक हामिद दलवई या आरिफ मोहम्मद खान जैसे लोगों का सवाल है, उनके प्रयासों की सराहना करने में हम गुहा के साथ हैं परंतु हम सबको यह भी समझना होगा कि मुस्लिम समुदाय को एक कोने में ढकेला जा रहा है। आज भी देश के विभाजन और कश्मीर की समस्या के लिए उन्हें दोषी ठहराया जाता है। पिछले एक दषक में मेरे कई मुस्लिम मित्र, जिन्हे मैं कभी उनके धर्म की दृष्टि से देखता ही नहीं था, भी यह सवाल उठाने लगे हैं कि आज भारत में मुसलमान होने का क्या अर्थ है। मुसलमानों की उदारवादी परंपरा, जिसमें खान अब्दुल गफ्फार खान से लेकर जाकिर हुसैन, उस्ताद बिस्मिल्ला खान, साहिर लुधियानवी, कैफी आजमी और जावेद अख्तर जैसे लोग शामिल हैं, आज भी जिंदा है परंतु समस्या यह है कि उनके समुदाय में उनकी सीमित स्वीकार्यता है।

    आज भी ’मुस्लिम्स फॉर सेक्युलर डेमोक्रेसी’ और ’माडरेट मुस्लिमस’ जैसे संगठन, इस्लाम के मुल्ला संस्करण के विरूद्ध आवाज उठा रहे हैं। जिस सवाल पर हमें विचार करना चाहिए वह यह है कि सज्जनता, विवेक और तर्क की इन आवाजों को मुस्लिम समुदाय में तव्वजो क्यों नहीं मिल रही है। क्या कारण है कि यह समुदाय अब भी रूढ़िवाद की बेड़ियों में जकड़ा हुआ है। यह भी दिलचस्प है कि आज हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा के प्रभाव में आकर और वर्तमान सत्ताधारियों की सोच के चलते,बहुसंख्यक समुदाय भी आस्था और सच, मिथक और यथार्थ के बीच का भेद भुलाता जा रहा है। हम केवल उम्मीद कर सकते हैं कि हामिद दलवई जैसे लोग जो सुधार के प्रति प्रतिबद्ध थे और असगर अली इंजीनियर जैसे व्यक्तित्व जो इस्लाम का मानवतावादी चेहरा लोगों के सामने ला रहीं थीं, की आवाज सुनी और समझी जाएगी। यह भी आवश्यक है कि हिन्दू राष्ट्रवाद के बढ़ते कदमों को रोका जाए क्योंकि वही समाज में इस समुदाय के प्रति घृणा उत्पन्न कर रहा है और इसे हाशिए पर ढकेल रहा है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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  • भीमा कोरेगांव: ऐतिहासिक नायकों की तलाश में दलित –Prof Ram Puniyani

    भीमा कोरेगांव: ऐतिहासिक नायकों की तलाश में दलित –Prof Ram Puniyani

    Prof Ram Puniyani

    महाराष्ट्र के कोरेगांव में एक जनवरी 2018 को उन दलित सिपाहियों, जो सन् 1818 में पेशवा के खिलाफ युद्ध में अंग्रेजों की ओर से लड़ते हुए मारे गए थे, को श्रद्धांजलि देने के लिए इकट्ठा हुए दलितों के खिलाफ अभूतपूर्व हिंसा हुई।  सन् 1927 में अंबेडकर ने कोरेगांव जाकर इन शहीदों को अपनी श्रद्धांजलि दी थी। दलितों द्वारा हर साल भीमा कोरेगांव में इकट्ठा होकर मृत सैनिकों को श्रद्धांजलि देना,दलित पहचान को बुलंद करने के प्रतीक के रूप में देखा जाने लगा है। इस साल यह समारोह बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया क्योंकि इस युद्ध के 200 साल पूरे हो रहे थे। विवाद एक दलित – गोविंद गायकवाड़ – जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसने संभाजी का अंतिम संस्कार किया था – की समाधि को अपवित्र किए जाने से शुरू हुआ। भगवा झंडाधारियों ने उन दलितों पर पत्थर फेंके जो भीमा कोरेगांव मे इकट्ठा हुए थे। शिवाजी प्रतिष्ठान और समस्त हिन्दू अगादी नामक हिन्दुत्व संगठन इस हिंसा के अगुआ थे।

    पुणे के शनिवारवाड़ा, जो पेशवाओं के राज का केन्द्र था, में एक सभा को संबोधित करते हुए दलित नेता जिग्नेश मेवानी ने ‘आधुनिक पेशवाई‘ के खिलाफ संघर्ष शुरू करने का आव्हान किया। ‘आधुनिक पेशवाई‘ से उनका आशय भाजपा-आरएसएस की राजनीति से था। जिस सभा में उन्होंने भाषण दिया, वहां दलितों के साथ-साथ अन्य समुदायों के नेता भी उपस्थित थे। इस घटना पर विभिन्न प्रतिक्रियाएं हुईं। कुछ लोग इसे मराठा विरूद्ध दलित संघर्ष बता रहे हैं तो कुछ का कहना है कि यह दलितों पर हिन्दुत्ववादी ताकतों का हमला है। एक ट्वीट में राहुल गांधी ने इस घटना के लिए भाजपा की फासीवादी व दलित-विरोधी मानसिकता को दोषी ठहराया।

    भीमा कोरेगांव युद्ध का इतिहास, समाज में व्याप्त कई मिथकों को तोड़ता है । इस युद्ध में एक ओर थे अंग्रेज, जो अपने साम्राज्य का विस्तार करना चाहते थे, तो दूसरी ओर थे पेशवा, जो अपने राज को बचाना चाहते थे। अंग्रेजों ने अपनी सेना में बड़ी संख्या में दलितों को भर्ती किया था। इनमें महाराष्ट्र के महार, तमिलनाडू के पार्या और बंगाल के नामशूद्र शामिल थे। अंग्रेजों ने उन्हें अपनी सेना में इसलिए शामिल किया था क्योंकि वे अपने नियोक्ताओं के प्रति वफादार रहते थे और आसानी से उपलब्ध थे। पेशवा की सेना में अरब के भाड़े के सैनिक शामिल थे। इससे यह साफ है कि मध्यकालीन इतिहास को हिन्दू बनाम मुस्लिम संघर्ष के रूप में प्रस्तुत किया जाना कितना गलत है। जहां इब्राहिम खान गर्दी, शिवाजी की सेना में शामिल थे वहीं बाजीराव पेशवा की सेना में अरब सैनिक थे। दुर्भाग्यवश, आज हम अतीत को साम्प्रदायिकता के चश्मे से देख रहे हैं और इस बात को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं कि युद्धों का उद्देश्य केवल और केवल संपत्ति और सत्ता हासिल करना था।

    बाद में अंग्रेजों ने दलितों और महारों को अपनी सेना में भर्ती करना बंद कर दिया क्योंकि उन्होंने पाया कि ऊँची जातियों के सिपाही अपने दलित अफसरों को सेल्युट करने और उनसे आदेश लेने के लिए तैयार नहीं थे। अंबेडकर का प्रयास यह था कि दलितों की ब्रिटिश सेना में भर्ती जारी रहे और इसी सिलसिले में उन्होंने यह सुझाव दिया कि सेना में अलग से महार रेजिमेंट बनाई जानी चाहिए। महार सिपाहियों के पक्ष में अंबेडकर इसलिए खड़े हुए क्योंकि वे चाहते थे कि समाज के विभिन्न क्षेत्रों में दलितों की मौजूदगी हो।

    क्या भीमा कोरेगांव युद्ध दलितों द्वारा पेशवाई को समाप्त करने का प्रयास था? यह सही है कि पेशवाओं का शासन घोर ब्राम्हणवादी था। शूद्रों को अपने गले में एक मटकी लटकाकर चलना पड़ता था और उनकी कमर में एक झाड़ू बंधी रहती थी ताकि वे जिस रास्ते पर चलें, उसे साफ करते जाएं। यह जातिगत भेदभाव और अत्याचार का चरम था। क्या अंग्रेज, बाजीराव के खिलाफ इसलिए लड़ रहे थे क्योंकि वे पेशवाओं के ब्राम्हणवाद का अंत करना चाहते थे? कतई नहीं। वे तो केवल अपने साम्राज्य की सीमाओं का विस्तार करने के इच्छुक थे ताकि उनका व्यापार और फले-फूले और उन्हें भारत को लूटने के और अवसर उपलब्ध हो सकें। इसी तरह, महार सिपाही, पेशवा के खिलाफ इसलिए लड़े क्योंकि वे अपने नियोक्ता अर्थात अंग्रेजों के प्रति वफादार थे। यह सही है कि इसके कुछ समय बाद देश में समाज सुधार की प्रक्रिया शुरू हुई और उसका कारण थी आधुनिक शिक्षा। अंग्रेजों ने देश में आधुनिक शिक्षा व्यवस्था इसलिए लागू की ताकि प्रशासन के निचले पायदानों पर काम करने के लिए लोग उन्हें उपलब्ध हो सकें। समाज सुधार इस प्रक्रिया का अनायास प्रतिफल था। अंग्रेज़ भारत की सामाजिक व्यवस्था में परिवर्तन लाने के लिए अपनी नीतियां नहीं बनाते थे। वैसे भी, उस दौर में जातिगत शोषण के प्रति उस तरह की सामाजिक जागृति नहीं थी जैसी कि बाद में जोतिबा फुले के प्रयासों से आई।

    यह कहना कि पेशवा राष्ट्रवादी थे और दलित, ब्रिटिश सेना में भर्ती होकर साम्राज्यवादी शक्तियों का समर्थन कर रहे थे, बेबुनियाद है। राष्ट्रवाद की अवधारणा ही औपनिवेशिक शासनकाल में उभरी। ब्रिटिश शासन के कारण देश में जो सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन आए, उनके चलते दो तरह के राष्ट्रवाद उभरे। पहला था भारतीय राष्ट्रवाद, जो उद्योगपतियों, व्यापारियों, शिक्षित व्यक्तियों,  श्रमिकों और पददलित तबके के नए उभरते वर्गों की महत्वाकांक्षाओं की अभिव्यक्ति था। दूसरे प्रकार का राष्ट्रवाद धर्म पर आधारित था – हिन्दू राष्ट्रवाद और मुस्लिम राष्ट्रवाद। इसके प्रणेता थे जमींदार और राजा-नवाब, जो समाज में प्रजातांत्रिक मूल्यों के प्रति बढ़ते आकर्षण से भयातुर थे और धर्म के नाम पर अपना वर्चस्व बनाए रखना चाहते थे।

    पिछले कुछ वर्षों में देश में दलितों के बीच असंतोष बढ़ा है। इसको पीछे कई कारण हैं। रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या और ऊना में दलितों की निर्मम पिटाई इसके लिए कम जिम्मेदार नहीं हैं। वर्तमान सरकार की नीतियां, दलितों को समाज के हाशिए पर धकेल रहीं हैं – फिर चाहे वह आर्थिक क्षेत्र हो या शिक्षा का क्षेत्र। कोरेगांव में भारी संख्या में दलितों का इकट्ठा होना इस बात का प्रतीक है कि वर्तमान स्थितियों से वे गहरे तक असंतुष्ट हैं। नए उभरे दलित संगठन समाज के अन्य दमित वर्गों के साथ गठजोड़ कर रहे हैं। भीमा कोरेगांव में हुई घटनाओं के बाद धार्मिक अल्पसंख्यकों, श्रमिकों और कई अन्य सामाजिक संगठनों ने दलितों के साथ अपनी एकजुटता प्रदर्शित की। दलित, अतीत के नायकों से प्रेरणा ग्रहण करने का प्रयास कर रहे हैं। हालिया घटनाक्रम से यह साफ है कि वे भारतीय प्रजातंत्र में अपना यथोचित स्थान पाने के लिए दृढ़ संकल्पित हैं। उन पर हिन्दू दक्षिणपंथी समूहों का आक्रमण, दलितों की महत्वाकांक्षाओं को दबाने और कुचलने का प्रयास है।  

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

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    was teaching in IIT Mumbai till 2004 and now works for the preservation of democratic-secular values. He is associated with initiatives like the Centre for study of Society and SecularismAll India Secular Forum and has been part of various rights investigations and people’s tribunals which investigated the violation of rights of minorities. He is also the recipient of the Indira Gandhi National Integration Award 2006, the National Communal Harmony Award 2007 and the Mukundan C Menon Human Rights Ward 2015.

  • सोशल इंजीनियरिंग के लिए इतिहास से छेड़छाड़

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    विभिन्न समुदायों को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करना और हिन्दू समुदाय में नीची जातियों का निम्न दर्जा बनाए  रखना, हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रमुख एजेंडा है। इसी एजेंडे के तहत, मुस्लिम राजाओं को विदेशी आक्रांताओं के रूप में प्रस्तुत कर उनका दानवीकरण किया जाता रहा है। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने भारत के लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाने का प्रयास किया और इसी के नतीजे में, जाति प्रथा अस्तित्व में आई। इसी एजेंडे का दूसरा हिस्सा है आर्यों का महिमामंडन और हिन्दू पौराणिक कथाओं की इतिहास के रूप में प्रस्तुति। हाल में ब्राह्मणवादी मूल्यों को बढ़ावा देना और दलितों व ओबीसी को राष्ट्रवादी खेमे में शामिल करना भी इस एजेंडे में शामिल हो गए हैं।

    पिछले साल ओणम (सितंबर 2016) पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर यह कहा था कि ओणम, विष्णु के पांचवे अवतार वामन के जन्म का समारोह है। इसी के साथ, आरएसएस के मुखपत्र ‘केसरी’ ने एक लेख छापा जिसमें कहा गया कि पुराणों और अन्य हिन्दू धर्मग्रंथों में कहीं यह नहीं कहा गया है कि महाबली को वामन ने पाताललोक में धकेल दिया था। यह भी कहा गया कि धर्मग्रंथों में कहीं ऐसा वर्णित नहीं है कि महाबली, हर वर्ष मलयाली चिंगम माह में धरती पर आते हैं।

    यह पटकथा, केरल में ओणम से जुड़ी कथा के एकदम विपरीत है। ओणम, फसल की कटाई का महोत्सव है और यह माना जाता है कि इस दौरान वहां के लोकप्रिय राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। केरल में ओणम सभी धर्मों के अनुयायियों का त्योहार बन गया है। भाजपा, इसे विष्णु के वामन अवतार से जोड़कर, उसे केवल ऊँची जातियों का त्योहार बनाना चाहती है।

    इतिहास को संघ परिवार द्वारा किस तरह तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, इसका एक उदाहरण है उत्तरप्रदेश के भाजपा कार्यालय, जिसकी हाल में नवीन साज-सज्जा की गई है, में टंगा एक तैलचित्र। एक नज़र देखने पर यह तैलचित्र राजपूत राजा महाराणा प्रताप का लगता है। परंतु असल में यह 11वीं सदी के एक राजा सुहैल देव का तैलचित्र है। महाराज सुहैल देव के बारे में बहुत कम लोगों ने सुना है। इन्हें पासी और भार, ये दोनों समुदाय अपना राजा मानते हैं। सुहैल देव, भाजपा के नायकों की सूची में शामिल कैसे हो गया? उत्तरप्रदेश के बहराईच में अमित शाह ने सुहैल देव की एक प्रतिमा का अनावरण किया और उस पर लिखी एक पुस्तक का विमोचन भी किया। सुहैल देव को एक ऐसा राष्ट्रीय नायक बताया जा रहा है जिसने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। उसके नाम पर एक नई ट्रेन शुरू की गई है जिसका नाम ‘सुहैल देव एक्सप्रेस’ है।

    इसी महीने (जून 2017), उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह घोषणा की कि लखनऊ के अंबेडकर पार्क में छत्रपति शाहू, जोतिराव फुले, अंबेडकर, काशीराम व मायावती के साथ-साथ सुहैल देव की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएगी। इस पार्क का निर्माण मायावती सरकार ने करवाया था और सुहैल देव को छोड़कर, अन्य सभी प्रतिमाएं वहां पहले से ही लगी हुई हैं। अब इस पार्क में अन्य जातियों के नायकों की प्रतिमाएं भी लगाई जाएंगी। यह कहा जा सकता है कि प्रतिमाएं लगाने के मामले में मायावती ने एक तरह की अति कर दी थी परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि अंबेडकर पार्क, लोक स्मृति में दलित पहचान को एक सम्मानजनक स्थान देने का प्रयास था। हाल में किया गया निर्णय, इतिहास के उस संस्करण का प्रचार करने का प्रयास है, जो हिन्दू राष्ट्रवादियों को सुहाता है। सुहैल देव के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसने सालार महमूद (गाज़ी मियां) से मुकाबला किया था। गाज़ी मियां, महमूद गज़नी का भतीजा था, जो इस क्षेत्र में बसने आया था।

    प्रो. बद्रीनारायण (‘फेसिनेटिंग हिन्दुत्व’, सेज पब्लिकेशंस) के अनुसार, लोकप्रिय आख्यान यह है कि सुहैल देव ने अपने राज्य में मुसलमानों और दलितों पर घोर अत्याचार किए थे। उसके दुःखी प्रजाजनों की मांग पर सालार महमूद ने सुहैल देव के साथ युद्ध किया, जिसमें दोनों राजा मारे गए। गाज़ी मियां की दरगाह पर जियारत करने मुसलमानों के अलावा बड़ी संख्या में हिन्दू भी जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि दरगाह पर ज़ियारत करने से रोगों से मुक्ति मिलती है। दरगाह की बगल में एक तालाब है, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसमें नहाने से कुष्ठ रोगी ठीक हो जाते हैं।

    इसके विपरीत, आरएसएस और उसके संगी-साथियों द्वारा यह कथा प्रचारित की जा रही है कि गाज़ी मियां एक विदेशी आक्रांता थे और सुहैल देव ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उससे युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की। अगस्त 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में सुहैल देव का ज़िक्र किया। उन्होंने सुहैल देव को एक ऐसा राजा बताया जो गोरक्षक था और जो गायों को अपनी सेना के सामने रखकर युद्ध में भी उनका इस्तेमाल करता था।

    जहां आम लोगों के ज़हन में गाज़ी मियां की छवि सकारात्मक है वहीं भाजपा, सिर्फ हिन्दू नायक बताकर अलग-अलग तरीकों से सुहैल देव का सम्मान करने की कोशिश कर रही है। सुहैल देव इस मामले में भाजपा की दोहरी रणनीति है। एक ओर वह उसे इस्लाम के विरूद्ध लड़ने वाला हिन्दू नायक बता रही है तो दूसरी ओर वह पासी-राजभर समुदायों का एक नया नायक पैदा करना चाहती है। भाजपा का लक्ष्य यह है कि दलितों की हर उपजाति के अलग-अलग नायक खड़े कर दिए जाएं – फिर चाहे उन्होंने दलितों की भलाई के कुछ किया हो या नहीं। इसका उद्देश्य दलित एकता को खंडित करना है और इससे भाजपा के नायकों में एक और राजा जुड़ जाएगा। हमें यह याद रखना चाहिए कि अंबेडकर पार्क में जिन व्यक्तियों की मूर्तियां लगी हैं, उनमें से कोई भी सामंत नहीं था और ना ही सामंती व्यवस्था का प्रतिपादक था। इन सभी ने दलित समुदाय को उसकी गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए अलग-अलग तरह से प्रयास किए। इन सभी ने दलितों की समानता की लड़ाई में भागीदारी की। राजाओं को तो केवल पहचान की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए सामने लाया जा रहा है।

    हिन्दू राष्ट्रवाद के लिए इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए वह हिन्दू राजाओं का महिमामंडन करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। राज्यतंत्रों की शासन व्यवस्था का आज के युग में कोई भी समर्थन नहीं कर सकता। परंतु संप्रदायवादी राष्ट्रवादियों को सामंती काल के मूल्य प्रिय हैं और वे उन्हें पुनर्स्थापित करना चाहते हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का यह कथन कि राणा प्रताप को ‘महान’ बताया जाना चाहिए, इसी रणनीति का भाग है। राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने अब यह दावा भी कर दिया है कि हल्दी घाटी की लड़ाई में अकबर नहीं बल्कि राणाप्रताप की विजय हुई थी। पहले तो संघ परिवार केवल इतिहास के तथ्यों के नई व्याख्या करता था। अब वह तथ्यों को ही बदल रहा है। एरिक हॉब्सबोन ने बिलकुल ठीक ही कहा था कि राष्ट्रवाद के लिए इतिहास वही है, जो कि नशाखोर के लिए अफीम।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • मोदी सरकार के तीन साल

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    इस 26 मई को मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर विभिन्न शहरों में ‘मोदी फैस्ट’ के अंतर्गत धूमधाम से बड़े-बड़े समारोह आयोजित किए गए। इन समारोहों से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश समृद्धि की राह पर तेज़ी से अग्रसर हुआ है और कई उल्लेखनीय सफलताएं हासिल हुई हैं। मोदी को उनके प्रशंसक, ‘गरीबों का मसीहा’ बताते हैं। कई टीवी चैनलों और टिप्पणीकारों ने उनकी शान में कसीदे काढ़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है।

    असल में पिछले तीन सालों में क्या हुआ है?

    एक चीज़ जो बहुत स्पष्ट है, वह यह है कि मोदी सरकार में सत्ता का प्रधानमंत्री के हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ है। मोदी के सामने वरिष्ठ से वरिष्ठ मंत्री की भी कुछ कहने तक की हिम्मत नहीं होती और ऐसा लगता है कि कैबिनेट की बजाए इस देश पर केवल एक व्यक्ति शासन कर रहा है। यह तो सभी को स्वीकार करना होगा कि यह सरकार अपनी छवि का निर्माण करने में बहुत माहिर है। नोटबंदी जैसे देश को बर्बाद कर देने वाले कदम को भी सरकार ने ऐसे प्रस्तुत किया मानो उससे देश का बहुत भला हुआ हो। जहां लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा बिछाए गए विकास के दावों के मायाजाल में फंसा हुआ है, वहीं ज़मीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। न तो महंगाई कम हुई है, न रोज़गार बढ़ा है और ना ही आम आदमी की स्थिति में कोई सुधार आया है। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है और किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। तमिलनाडु के किसानों द्वारा दिल्ली में किए गए जबरदस्त विरोध प्रदर्शन को सरकार के पिछलग्गू मीडिया ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया। यही हाल देश के अन्य हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों का भी हुआ।

    विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रूपए जमा करने का भाजपा का वायदा, सरकार के साथ-साथ जनता भी भूल चली है। पहले राम मंदिर के मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया और अब पवित्र गाय को राजनीति की बिसात का मोहरा बना दिया गया है। गाय के नाम पर कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है और मुसलमानों के एक बड़े तबके की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी गई है। सरकार जिस तरह से गोरक्षा के मामले में आक्रामक रूख अपना रही है, उसके चलते, गोरक्षक गुंडों की हिम्मत बढ़ गई है और वे खुलेआम मवेशियों के व्यापारियों और अन्यों के साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं। सरकारी तंत्र, अपराधियों को सज़ा दिलवाने की बजाए, पीड़ितों को ही परेशान कर रहा है।

    सामाजिक स्तर पर पहचान के मुद्दे छाए हुए हैं। पिछली यूपीए सरकार भी अपनी सफलताओं का बखान करती थी परंतु कम से कम यह बखान लोगों के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार संबंधी अधिकारों पर केन्द्रित था। अब तो चारों ओर झूठी वाहवाही और बड़ी-बड़ी डींगे हांकने का माहौल है। पाकिस्तान के मुद्दे पर सरकार जब चाहे तब आंखे तरेरती रहती है। सीमा पर रोज़ भारतीय सैनिक मारे जा रहे हैं परंतु आत्ममुग्ध सरकार, सर्जिकल स्ट्राईक का ढिंढोरा पीट रही है। कश्मीर के संबंध में सरकार की नीति का नतीजा यह हुआ है कि लड़कों के अलावा अब लड़कियां भी सड़कों पर निकलकर पत्थर फेंक रही हैं। कश्मीर के लोगों की वास्तविक समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। उनसे संवाद स्थापित करने में सरकार की विफलता के कारण, घाटी में हालात खराब होते जा रहे हैं।

    हिन्दुत्ववादी देश पर छा गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र का लगभग भगवाकरण हो गया है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर गंभीर हमले हुए हैं। ‘पारंपरिक ज्ञान’ को वैज्ञानिक सिद्धांतों पर तवज्ज़ो दी जा रही है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया जा रहा है। यहां भी अतीत का महिमामंडन करने के लिए केवल ब्राह्मणवादी प्रतीकों जैसे गीता, संस्कृत और कर्मकांड को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    दिखावटी देशभक्ति का बोलबाला हो गया है। पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने यह प्रस्तावित किया था कि हर विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक बहुत ऊँचा खंबा गाड़ कर उस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाए। हर सिनेमा हॉल में फिल्म के प्रदर्शन के पहले राष्ट्रगान बजाया जाना अनिवार्य कर दिया गया है। एक अन्य स्वनियुक्त देशभक्त ने यह प्रस्तावित किया है कि हर विश्वविद्यालय में ‘देशभक्ति की दीवार’ हो, जिस पर सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र उकेरे जाएं। समाज के सभी वर्गों का देश की उन्नति में योगदान होता है परंतु प्रचार ऐसा किया जा रहा है, मानो केवल सेना ही देश की सबसे बड़ी सेवा कर रही हो। जो किसान खेतों में काम कर रहे हैं और जो मज़दूर कारखानों में खट रहे हैं, क्या उनकी सेवाओं का कोई महत्व ही नहीं है? लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। यह सरकार केवल जय जवान का उद्घोष कर रही है और किसान को विस्मृत कर दिया गया है।

    देश में प्रजातंत्र सिकुड़ रहा है और बोलने की आज़ादी पर तीखे हमले हो रहे हैं। मीडिया का एक बड़ा तबका शासक दल के साथ हो लिया है और वह उन सब लोगों की आलोचना करता है, जो सरकार की नीतियों के विरोधी हैं। मीडिया ने प्रजातंत्र के चैथे स्तंभ और सरकार के प्रहरी होने की अपनी भूमिका को भुला दिया है। दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या के साथ देश में असहिष्णुता का जो वातावरण बनना शुरू हुआ था, वह और गहरा हुआ है। मुसलमानों के खिलाफ तो ज़हर उगला ही जा रहा है, दलित भी निशाने पर हैं।

    आज देश में जिस तरह का माहौल बन गया है, उसे देखकर यह अहसास होता है कि केवल प्रचार के ज़रिए क्या कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। लोगों के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया गया है कि मोदी सरकार देश का न भूतो न भविष्यति विकास कर रही है और आम लोगों का भला हो रहा है।

    परंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई हिस्सों में लोगों ने अपने विरोध, असंतोष और आक्रोष का जबरदस्त प्रदर्शन भी किया है। किसानों के एकजुट हो जाने के कारण, मजबूर होकर, सरकार को अपना भूसुधार विधेयक वापस लेना पड़ा। कन्हैया कुमार, रामजस कॉलेज, रोहत वेम्युला और ऊना के मुद्दों पर जिस तरह देश में वितृष्णा और आक्रोष की एक लहर दौड़ी, उससे यह साफ है कि सरकार की प्रतिगामी नीतियों को चुनौती देने वालों की संख्या कम नहीं है। जहां हिन्दुत्ववादी तत्वों का स्वर ऊँचा, और ऊँचा होता जा रहा है, वहीं देश भर में चल रहे कई अभियानों और आंदोलनों से यह आशा जागती है कि भारतीय संविधान के मूल्यों पर आधारित बहुवादी समाज के निर्माण के स्वप्न को हमें तिलांजलि देने की आवश्यकता नहीं है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • जातिगत अत्याचारों से बचने के लिए दलित अपना रहे हैं बौद्ध धर्म और इस्लाम

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    भारतीय समाज में जाति हमेशा से एक महत्वपूर्ण कारक रही है। अतीत से लेकर वर्तमान तक, राजनीति में जाति की भूमिका हमेशा से रही है। जाति व्यवस्था के उदय और उसके प्रचलन के बारे में कई अलग-अलग दावे और व्याख्याएं की जाती रही हैं। अंबेडकर का मानना था कि जाति की जड़ें, हिन्दू पवित्र ग्रंथों में हैं। परंतु हिन्दुत्व की विचारधारा के पैरोकारों का कहना है कि हिन्दू समाज में सभी जातियां समान थीं। मुस्लिम आक्रांता, हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहते थे और जो लोग धर्मपरिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं थे वे दूरदराज़ के स्थानों पर भाग गए और यहीं से जातिगत असमानता की शुरूआत हुई। यह व्याख्या घटनाओं की सही विवेचना नहीं है और ऊँची जातियों की सोच को प्रतिबिंबित करती है। जो लोग कहते हैं कि मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा ज़बरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाने की कोशिश के कारण जाति व्यवस्था जन्मी, उनके दावों का खंडन करने के लिए ‘मनुस्मृति’ पर्याप्त है, जो दूसरी सदी ईस्वी में रची गई थी और जिसमें जातिगत पदक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है। मनुस्मृति जब लिखी गई थी, तब इस्लाम दुनिया में था ही नहीं और ना ही मुस्लिम व्यापारी भारत के मलाबार तट पर पहुंचे थे। मुस्लिम शासकों के आक्रमण तो तब सदियों दूर थे।

    इस बेसिरपैर की व्याख्या के विपरीत, स्वामी विवेकानंद हमें बताते हैं कि दलितों द्वारा इस्लाम में धर्मपरिवर्तन, मुख्यतः जातिगत उत्पीड़न के चलते हुआ। औपनिवेशिक काल में भारत के अर्ध-आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई परंतु इसके बाद भी जाति व्यवस्था बनी रही। आज, स्वाधीनता के 70 साल, और भारतीय संविधान, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, के लागू होने के 67 साल बाद भी, जाति व्यवस्था जिंदा है। गोरखनाथ मठ के भगवाधारी आदित्यनाथ योगी के उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार फिर यह साबित हो गया है कि जातिप्रथा हमारे समाज में आज भी उतनी ही मज़बूत है जितनी पहले थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तरप्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सहारनपुर में हुई हिंसा इसका एक उदाहरण है।

    कुछ रपटों के अनुसार, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ गांवों के 108 दलित परिवारों ने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ने पर अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिहै। सहारनुपर के कुछ गांवों में, ठाकुरों और दलितों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। ठाकुरों ने अंबेडकर की मूर्ति नहीं लगने दी और दलितों ने राजपूत शासक राणाप्रताप की जयंती मनाने के लिए एक जुलूस को निकलने नहीं दिया क्योंकि उसके लिए विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी। दलितों का कहना है कि आदित्यनाथ की सरकार, केवल ठाकुरों की सरकार है।

    सहारनपुर के निकट मुरादाबाद के लगभग 50 दलित परिवारों ने यह धमकी दी है कि अगर आदित्यनाथ, भगवा ब्रिगेड द्वारा दलितों पर किए जा रहे हमलों को नहीं रोकते तो वे हिन्दू धर्म त्याग देंगे। इस आशय की खबर ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ के 22 मई, 2017 के अंक में छपी है। दलितों के हितों की रक्षा के लिए भीमसेना नाम का एक संगठन गठित हो गया है। सहारनपुर का प्रशासन कहता है कि भीमसेना, हिंसा कर रही है, जबकि दलितों का दावा है कि यह सेना उनकी रक्षक है। उनका यह भी आरोप है कि प्रशासन, ऊँची जातियों के पक्ष में झुका हुआ है और असली दोशियों को पकड़ने की बजाए, भीमसेना पर निशाना साध रहा है। हिन्दुओं के स्वनियुक्त रक्षकों के समूहों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। इस पृष्ठभूमि में, भीमसेना को दलित, आशा की एक किरण के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि योगी सरकार के शासन में आने के बाद से आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन अपना असली रंग दिखा रहे हैं और इसलिए उनके पास इसके सिवाए कोई विकल्प नहीं है कि वे ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को त्याग दें। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म ही संघ परिवार की हिन्दुत्व की विचारधारा का आधार है। अभी हाल (22 मई, 2017) में दिल्ली के जंतरमंतर पर बड़ी संख्या में दलित, उनके विरूद्ध किए जा रहे अत्याचारों का विरोध करने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

    दलितों के प्रश्न पर आरएसएस हमेशा से एक बड़ी दुविधा में फंसा रहा है। एक ओर वह उनके वोट चाहता है तो दूसरी ओर वह यह भी जानता है कि अगर उसने दलितों को समान दर्जा देने की बात कही, तो आरएसएस-हिन्दुत्व राजनीति के मूल समर्थक जो ऊँची जातियों के हैं, उससे दूर छिटक जाएंगे। इस समस्या से निपटने के लिए आरएसएस, सोशल इंजीनियरिंग व सांस्कृतिक अभियानों के ज़रिए दलितों को अपने साथ लेने का प्रयास कर रहा है। उसने सामाजिक समरसता मंचों की स्थापना की है और नीची जातियों के लोगों के साथ भोजन करने के कार्यक्रम शुरू किए हैं। एक दूसरे स्तर पर वह दलित नेताओं जैसे रामविलास पासवान, रामदास अठावले व उदित राज इत्यादि को सत्ता की लोलीपोप पकड़ाकर अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आरएसएस की कोशिश यह भी है कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि दलित, मुसलमानों के हमलों से हिन्दुओं की रक्षा करने वाले लोग थे। इस तरह की सांस्कृतिक जोड़तोड़, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    पिछले तीन वर्षों में दलितों के प्रति दुर्भाव और पूर्वाग्रह कई अलग-अलग तरीकों से प्रकट हुआ है। आईआईटी, मद्रास में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन की दलित-विरोधी नीतियों के कारण, वहां के शोधार्थी रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या हुई। गुजरात के ऊना में पवित्र गाय की रक्षा के नाम पर दलितों को बर्बर ढंग से पीटा गया। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति, जाति व्यवस्था से दमित वर्गों के लक्ष्य से एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाने वाली है। हमें याद रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय के महानतम पैरोकारों में से एक अंबेडकर ने मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाया था। परंतु इसी मनुस्मृति का आरएसएस के चिंतकों जैसे एमएस गोलवलकर ने महिमामंडन किया। गोलवलकर जैसे लोगों ने तो भारतीय संविधान तक का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास मनुस्मृति के रूप में पहले से ही एक ‘अद्भुत’ संविधान मौजूद है तो हमें नए संविधान की ज़रूरत ही क्या है? जहां अंबेडकर कहते थे कि गीता, मनुस्मृति का संक्षिप्त संस्करण है वहीं मोदी सरकार गीता का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है।

    हिन्दू राष्ट्रवाद, भारत के एक काल्पनिक इतिहास का निर्माण करना चाहता है, जिसमें हिन्दू धर्मग्रंथों के मूल्यों का बोलबाला था। वह वैदिक युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहता है, जिनका एक प्रजातांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता। हिन्दू धर्म की कई अन्य धाराएं भी हैं जिन्हें संयुक्त रूप से श्रमण परंपराएं कहा जाता है। ये परंपराएं ऊँचनीच को खारिज करती हैं। परंतु हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण ने इन परंपराओं को हाशिए पर ढकेल दिया है। पिछली लगभग एक सदी से ब्राह्मणवादी मूल ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार बने हुए हैं। जंतरमंतर में चल रहा जबरदस्त विरोध प्रदर्शन इस बात की ओर संकेत करता है कि आरएसएस द्वारा हिन्दू धर्म के मूलतः समानता का धर्म होने की भ्रांति उत्पन्न करने का प्रयास सफल नहीं होगा। इससे हमें यह याद आता है कि अंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जाति व्यवस्था से बचने के लिए हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था। आज भी दलित यही करने में अपनी मुक्ति देखते हैं।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • भारत की कश्मीर नीतिः आगे का रास्ता

    Prof Ram Puniyani

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    कश्मीर घाटी में अशांति और हिंसा, जिसने बुरहान वानी की जुलाई 2016 में मुठभेड़ में हत्या के बाद से और गंभीर रूप ले लिया है, में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। बल्कि हालात और खराब होते जा रहे हैं। अप्रैल 2017 में हुए उपचुनावों में बहुत कम मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदान का प्रतिशत सात के आसपास था। इन उपचुनावों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें कई नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए। हम सबने देखा कि किस तरह एक कश्मीरी युवक को सेना की गाड़ी से बांध दिया गया ताकि पत्थरबाज, गाड़ी पर पत्थर न फेंके। यह घटना दिल दहला देने वाली थी।

    घाटी में पत्थरबाजी में कोई कमी नहीं आ रही है। पत्थर फेंकने वाले युवाओं को लोग अलग-अलग दृष्टिकोणों से देख रहे हैं। शेख अब्दुल्ला ने चुनाव की पूर्व संध्या पर कहा कि पत्थर फेंकने वाले अपने देश की खातिर ऐसा कर रहे हैं। उनके इस बयान की कटु निंदा हुई। कुछ लोगों ने इसे केवल एक चुनाव जुमला निरूपित किया।

    मीडिया के एक तबके का कहना है कि पत्थर फेंकने वाले पाकिस्तान समर्थक हैं और हमारे पड़ोसी देश के भड़काने पर ऐसा कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है। कश्मीर में पत्थरबाजी का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है परंतु हाल के कुछ महीनों में इस तरह की घटनाओं में जबरदस्त वृद्धि हुई है। युवा दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। एक ओर हैं आतंकवादी और अतिवादी और दूसरी ओर, सुरक्षाबल। दोनों ही उन्हें डरा धमका रहे हैं और उनके खिलाफ हिंसा कर रहे हैं। यह साफ है कि जब भी दमनचक्र तेज़ होता है तब पत्थरबाजी की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। मकबूल भट्ट को 1984 में फांसी दिए जाने के बाद, अफज़ल गुरू को 2013 में मृत्युदंड दिए जाने के बाद और अब बुरहान वानी की मौत के बाद इस तरह की घटनाओं में इजाफा हुआ है।

    ये लड़के कौन हैं जो पत्थर फेंकते हैं? क्या वे पाकिस्तान से प्रेरित और उसके द्वारा प्रायोजित हैं? सुरक्षा बलों की कार्यवाहियों में घाटी में सैंकड़ों लोग मारे जा चुके हैं, हज़ारों घायल हुए हैं और कई अपनी दृष्टि गंवा बैठे हैं। मीडिया का एक हिस्सा चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि पत्थरबाजी के पीछे पाकिस्तान है और वही पत्थरबाजों को धन दे रहा है। जो प्रश्न हमें अपने आप से पूछना चाहिए वह यह है कि क्या कोई भी युवा, किसी के भड़काने पर या धन के लिए अपनी जान दांव पर लगा देगा। क्या वह अपनी आंखें खो देने या गंभीर रूप से घायल होने का खतरा मोल लेगा? पत्थरबाजों में से अनेक किशोरवय के हैं और आईटी का अच्छा ज्ञान रखते हैं। परंतु वे घृणा से इतने लबरेज़ हैं कि वे अपनी जान और अपने भविष्य को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वे कितने अधिक कुंठित हैं।

    मीडिया के एक छोटे से तबके ने इस मुद्दे की गहराई में जाकर पत्थरबाजों से बातचीत की। उन्होंने जो कुछ कहा उससे कश्मीर घाटी में कानून और व्यवस्था की स्थिति के बारे में हमारी सोच को पूरी तरह से बदल देने की क्षमता है। इनमें से कई ऐसे परिवारों से हैं, जिन्हें अब जिंदगी से कोई उम्मीद बाकी नहीं है। उन्होंने शारीरिक प्रताड़ना झेली है, उन्हें हर तरह से अपमानित किया गया है और उनके साथ मारपीट आम है। उनके लिए पत्थर फेंकना एक तरह से कुंठाओं से मुक्त होने का प्रयास है। उनमें से कुछ निश्चित तौर पर पाकिस्तान समर्थक हो सकते हैं परंतु मूल मुद्दा यही है कि घाटी के युवाओं में गहन असंतोष और अलगाव का भाव घर कर गया है और इसका कारण है वह पीड़ा और यंत्रणा, जो उनके क्षेत्र में लंबे समय से सेना की मौजूदगी के कारण उन्हें झेलनी पड़ रही है। बुरहान वानी की हत्या के बाद, पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस, दोनों को ही यह अहसास हो गया था कि वहां स्थितियां बिगड़ सकती हैं। राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, असंतुष्टों के साथ बातचीत करना चाहती थीं परंतु सरकार में उनकी गठबंधन साथी भाजपा ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। महबूबा मुफ्ती का मानना है कि केवल बातचीत से ही समस्या का हल निकल सकता है। इसके विपरीत, भाजपा, गोलाबारूद और सेना की मदद से असंतोष को कुचल देना चाहती है।

    ऐसे समय में हमें घाटी में शांति स्थापना के पूर्व के प्रयासों को याद करना चाहिए। यूपीए-2 ने वार्ताकारों के एक दल को कश्मीर भेजकर समस्या का अध्ययन करने और उसका हल सुझाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस दल में कई प्रतिष्ठित नागरिक शामिल थे। दल ने सुझाव दिया था कि कश्मीर विधानसभा की स्वायत्तता बहाल की जाए, जिसका प्रावधान कश्मीर की विलय की संधि में था। दल ने यह सुझाव भी दिया था कि असंतुष्टों के साथ बातचीत के रास्ते खोले जाएं, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को रद्द किया जाए और पाकिस्तान के साथ चर्चा हो।

    आज ज़रूरत इस बात की है कि हम विलय की संधि की शर्तों को याद करें और वार्ताकारों की सिफारिशों को गंभीरता से लें। कश्मीर के भारत में विलय के 70 साल बाद भी हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय राष्ट्र निर्माताओं का कभी यह इरादा नहीं था कि कश्मीर का भारत में जबरदस्ती विलय करवाया जाए या वहां व्याप्त असंतोष को सेना के बूटों तले कुचला जाए। भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 30 अक्टूबर, 1948 को बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए कहा थाः ‘‘कुछ लोग यह मानते हैं कि हर मुस्लिम-बहुल इलाके को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। वे यह पूछते हैं कि हमने कश्मीर को भारत का भाग बनाने का निर्णय क्यों लिया है? इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि कश्मीर के लोग ऐसा चाहते हैं। जिस क्षण हमें यह एहसास होगा कि कश्मीर के लोग यह नहीं चाहते कि हम वहां रहें, उसके बाद हम एक मिनट भी वहां नहीं रहेंगे…हम कश्मीरीयों को दगा नहीं देंगे’’ (द हिन्दुस्तान टाईम्स, 31 अक्टूबर, 1948)।

    कश्मीर में स्थिति अत्यंत गंभीर है और केन्द्र सरकार के मनमानीपूर्ण व्यवहार के कारण दिन प्रतिदिन और गंभीर होती जा रही है। अगर हम स्वर्ग जैसी इस भूमि पर शांति चाहते हैं तो हमें महबूबा मुफ्ती और शेख अब्दुल्ला जैसे व्यक्तियों के विचारों का भी सम्मान करना होगा। स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है जब हम लोगों के दिलों को जीतें। अति-राष्ट्रवादी फार्मूलों से काम नहीं चलेगा।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)