…. और डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए :: अम्बेडकर व गांधी –Prasanna Prabhakar

Prasanna Prabhakar

गांधी जी की हत्या हो चुकी थी। उसके कुछ समयोपरांत बाबा साहब ने एक ब्राह्मण डॉ सविता कबीर से पुनर्विवाह किया। घटना उसी समय की है।

डॉ अम्बेडकर ने कर्नाट प्लेस, दिल्ली के खादी भण्डार के पास प्यारेलाल को खड़े देखा। वह कार से उतर गए और सीधा उनके पास पहुंचे। बोले - यदि बापू जीवित होते तो वह जरूर इस विवाह को अपना आशीर्वाद देते। कहते-कहते डॉ अम्बेडकर भावुक हो गए। हम उन्हें समझ नहीं सके- उन्होंने कहा।

गांधी जीवित होते तो अम्बेडकर को शायद ही 1952 में रिपब्लिकन पार्टी बनाने नौबत पड़ती। गांधी की हत्या के बाद सामाजिक सुधारों के लिए जमीन पर काम करनेवाला अम्बेडकर के सिवा कोई बड़ा नाम शेष नहीं था।

6 सितम्बर 1954, शायद अम्बेडकर ने महात्मा को इतनी बड़ी श्रद्धांजलि कभी न दी थी। राज्य सभा में बोलते हुए उन्होंने कहा - "हम सभी जानते हैं कि दलित उनके निकटतम और प्रियतम थे। " . (नमक पर कर लगाते हुए, उसे अनटचेबल सोसाइटी फण्ड में डालने की बात थी; संविधान सभा)

राजनैतिक लाभ हेतु अक्सर विरोधाभासों को हवा दी जाती है। ऐसे में बहुत कुछ छुप जाता है।

आज़ादी के बाद अम्बेडकर और गांधी, विरोधी नहीं (जैसा दिखाया जाता रहा है), बल्कि एक दूसरे के पूरक थे। असमय हत्या से भारतवर्ष ने बहुत कुछ खो दिया। अम्बेडकर भी कहाँ ज्यादा जी सके।

अम्बेडकर जी भी बदले और गांधी जी भी। अम्बेडकर ने यह बात इसलिए कही होगी क्योंकि गांधी जी का यह निर्णय था कि वह केवल उसी विवाह को आशीर्वाद देंगें जिसमें एक पक्ष हरिजन हो। स्वर्गीय नारायण देसाई जी के विवाह में इसलिए ही नहीं गए जबकि वह अनन्य सहयोगी श्री महादेव देसाई के पुत्र थे।

यह अलग बात है कि अपने चुने मार्गों से दोनों ही न डिगे। राजनीति भी पर्दा डालती है। वर्तमान लक्ष्य चुनिंदा बातों को ही उठाते हैं।

बाकी नफरत की बातों को हवा देने के लिए मटेरियल मिल ही जाता है।

4 साल पहले एक किताब पढ़ी थी- डॉ डी आर नागराज की द फ्लेमिंग फ़ीट (the flaming feet and other essays)। लेखक कर्नाटक के एक दलित समुदाय से ही सम्बद्ध थे। किताब गांधी-अम्बेडकर से शुरू होकर वर्तमान दलित राजनीति पर खत्म होती है।

किताब के केंद्र में एक घटना है। पूना पैक्ट के बाद गांधी जी को अनशन तोड़ना है। एक दलित लड़के के हाथ से पानी पीने के बाद प्रतीकात्मक रूप से इस समय का चयन किया गया। वह लड़का नहीं आता है। बाद में पत्र लिखकर क्षमा माँगतें हुए यह बताता है कि वह चाहते हुए भी अपने समुदाय की भावना के विरुद्ध नहीं जा सकता। 
डॉ नागराज भारत में दलित राजनीति का प्रारंभ यहीं से बताते हैं।

मुद्दा स्व शुद्धिकरण और आत्मसम्मान के मध्य अटक गया। जरूरी दोनों थे और हैं।

एक के आरोपों में यह था कि दूसरा केवल स्व शुद्धिकरण की बातें कर रहा है जबकि ऐसा नहीं था। तो दूसरे के अनुयायी केवल साथ खाकर और बैठकर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ लेते थे। ऐसे में अम्बेडकर का यह सोंचना सही ही था कि इससे दलित लीडरशिप उभरकर सामने नहीं आती। रिप्रजेंटेशन की बात करना अनायास ही नहीं था।

अम्बेडकर उस परंपरा से भी परिचित होंगे जो जाति व्यवस्था को आध्यात्मिक रूप से नकारती थी...योगी, साधु, नाथपंथी ..

मगर यह केवल आध्यात्मिक रूप से सिमटी रह गईं। राजनीति और समाज के दायरे में अधिक प्रभाव नहीं डाल सकी। एक विचार कहता है कि जाति का सुदृढ़ होना उपनिवेशवाद की देन है। यदि यह परंपरा इतनी ही प्रभावी होती तो इस दौरान इसका योगदान क्या रहा? निश्चित रूप से राजनीति हावी थी और राजनीति ही इसका इलाज ढूंढा गया।

इसलिए यह प्रयोग अभिनव था। अपने को अलग दिखाने की प्रवृति आई। गांधी समझ चुके थे इसलिए संदर्भित समुदाय के आर्थिक स्वालम्बन के लिए तत्पर हो गए। वह भी स्वतंत्रता समर के बीच। स्वराज और स्वतंत्रता , कुछ तो फर्क होगा।

नागराज आगे लिखते हैं कि दलित मूवमेंट का ओरिजिन दो ध्रुवों के मिलन में था। एक था ट्रान्सेंडैंटल आस्पेक्ट जो कास्ट ईगो से भिड़ता और दूसरा शिक्षा और जॉब में अवसर का मामला।

अम्बेडकर ने दूसरे को पकड़ा। सिर्फ दूसरे को। गांधी ने हालांकि दोनों पर कोशिश की। लेकिन उनका जोर जॉब को ही सम्माननीय बनाने पर था । उनकी शिक्षा पद्धति में तो सवर्णों के लिए भी यही संदेश रहा। बाद में दोनों एक दूसरे की ओर बढ़े।

नागराज कहते हैं कि दोनों में कोई भी पूर्ण नहीं हैं। एक दूसरे के पूरक अवश्य हैं। आगे लिखते भी हैं कि आज दलित मूवमेंट सिर्फ दूसरे पर अटक गया है और पहले को दूर ही करता जा रहा है। एक क्लोज्ड सिस्टम बनता जा रहा है जिसके भुक्तभोगी अंततः ये स्वयं होंगे।

आज वो अवश्य कहते कि पहलेवाले भी सिर्फ स्किल की एकविमीय बातें करते हैं।

किताब अच्छी है। वर्तमान दौर की कास्ट आधारित राजनीति पर एक अभिनव दृष्टि डालती है।

Prasanna Prabhakar

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