Tag: Kumar Vikram

  • दुभाषिया

    दुभाषिया

    Kumar Vikram

    वो दो घरों में नहीं
    एक ही घर के
    दो कमरों में
    एक साथ रहता है
    या यूँ भी कह सकते हैं
    कि यदि माता व पिता
    दो अलग अलग भाषाएँ हैं
    तो बच्चा दुभाषिया है
    या दुभाषिया होना चाहिए
    वह सिरफ एक की भाषा नहीं बोल सकता
    अच्छा बच्चा अच्छा दुभाषिया ही होता है
    वो लफ़्ज़ों की जड़ता छोड़ सकता है
    वो बर्लिन की दीवार तोड़ सकता है
    हलांकि वो दोनों भाषाओं का ज्ञाता है
    इसीलिए दोनों जगह उपेक्षित है
    वो दोनों भाषा समझता है
    इसीलिए दोनों जगह समझा नहीं जाता है
    कुछ कुछ उन जासूसों की तरह
    जिनकी ज़रूरत शब्दों भावों के
    अंतहीन अन्धकारमय विकट गलियों से
    निकलने के लिए होती तो है
    पर जिनसे दोस्ती दिखाना ख़तरे से ख़ाली नहीं
    बल्कि उन्हें बीच चौराहे पर ‘दो-गला’ कह
    भाषा विद्रोही घोषित कर ही
    खुद को निज भाषा सेवी जताया जा सकता है

    Kumar Vikram

  • हत्या-बलात् का स्वर्ण युग  –Kumar Vikram

    हत्या-बलात् का स्वर्ण युग –Kumar Vikram

    Kumar Vikram

    ऐसा नहीं है कि उस स्वर्ण युग में
    पल प्रति पल सुबह-शाम दिन प्रति दिन
    हत्याएँ व बलात्कार ही होते रहते थे
    कई कई दिन यूँ ही बिना किसी घटना के भी निकल जाते थे  

    पर इस युग की सबसे बड़ी ख़ूबसूरती
    कोर्ट कचहरी घरों में टीवी अख़बारों में
    सड़क शासन प्रशासन लेखकों कवियों
    आकाश पताल में
    अच्छी हत्या व ब्लात् कैसे हो

    इसपर निरंतर बहस
    तर्क वितर्क लेख प्रतिलेख
    का संगीत हमारे सामने बजता रहना था
    नैतिकता और वाक् पटुता के नए आयाम बनाती हुई
    बिलकुल एक नई संस्कृति 

    जिससे कोर्ट पूछता है
    ‘इस हत्या को कैसे अंजाम दिया जाएगा?’
    और पूरी गंभीरता से उत्तर दिया जाता था

    ‘हमारे पास कई उपाय हैं
    ट्रक से कुचल कर या फिर गोलियाँ बरसाकर
    या फिर चाय में ज़हर देकर
    बस कुछ मोहलत मिल जाए
    बलात् के हमारे अपने मोडुल्य हैं
    पड़ोसियों के घरों से खींचकर लाई जाएँगी
    सात आठ नौ दस जितनी की भी ज़रूरत हो
    बस कुछ मोहलत मिल जाए’

    और सब को हत्या और बलात् के
    मुकर्रर दिन का रहता है इंतज़ार  
    पर ऐसा कुछ होता नहीं है
    बल्कि ऐसा ही आभास होता है 

    क्योंकि हत्या-बलात् के उस स्वर्ण युग की
    सबसे बड़ी उपलब्धि यही थी
    कि सब अच्छी हत्या-बलात् कैसे हो
    इसपर ही चिंतन-मनन हो

    Kumar Vikram

  • भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

    भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

    Kumar Vikram
    Editor, National Book Trust, NBT

    पहले भी हमारी उनपर कोई ख़ास आस्था नहीं थी
    बल्कि हम उनपर हँसा ही करते थे
    मानो समाज के उच्च आदर्शों के तार तार हो रहे लिबास पर
    अपनी असहायता को ढकने के लिए अपनी शर्मिंदगी छिपा रहे हों
    जब मीडिया सभाओं भाषणों अख़बारों
    स्कूली कक्षाओं के वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में
    हम उनसे अकसर टकराते रहते थे

    ‘युद्ध किसी समस्या का समाधान नहीं
    टकराव का हल बातचीत से निकलना चाहिए’
    ‘आतंकवादी का कोई धर्म नहीं होता’
    ‘परिस्थितियां कैसी भी हो किसी भी नागरिक को
    क़ानून हाथ में लेने का अधिकार नहीं है’
    ‘ मेरे उनसे वैचारिक मतभेद ज़रूर थे
    पर उनकी मृत्यु मेरे अंदर एक ख़ालीपन छोड़ गई है’
    ‘पड़ोसी देशों के साथ हमारे राजनैतिक मतभेद भले ही हों
    हमें अपनी साझी सांस्कृतिक विरासत को नहीं भूलना चाहिए’
    ‘कर्म करो फल की चिंता न करो’ आदि 

    पर अब जब सारे मुखौटे टूट कर गिर गए हैं
    हम इन रटे रटाए शब्दों को सुनने को तरस गए हैं
    मानो मन में एक कसक सी रहती है
    कि पुराने जमाने के कुछ जुमले
    भ्रम स्वरूप ही जीवन में बचे रहने चाहिए
    ताकि मनुष्य की बची हुई मनुष्यता के बचने की
    संभावना थोड़ी बची रहे
    शायद कुछ वैसे ही
    जैसे टूटती खंडहरों को समाज बचाकर रखता है
    जहाँ स्कूली बच्चे पिकनिक के लिए ले जाए जाते हैं
    और रटी रटाई ऐतिहासिक जुमलों के सहारे
    गाइड उन्हें इतिहास बोध करवाता है

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    Kumar Vikram

  • ब्लू व्हेल

    ब्लू व्हेल

    Kumar Vikram

    ब्लू व्हेल किसी भी चिड़िया का नाम हो सकता है
    अंधभक्तों की टोली का सरताज किसी बाबा का नाम
    अथवा इतिहास को सर के बल खड़ा करने को आमादा लोगों को अपने वोटपाश में बाँधे किसी नेता का नाम

    ग़रीब किसानों के लिए वह हो सकता है
    बैंकों दलालों सरकारी नीतियों मानसून की
    रहस्यमय मिलीभगत का नाम
    जो स्वचालित वीडियो गेम की तरह
    उन्हें ऋण लेने को
    और अंतत: आत्महत्या के लिए उकसाते रहते हैं 

    शास्त्रों में तो जीवन की परिकल्पना ही
    शायद ब्लू व्हेल का ही दूसरा नाम है
    जहाँ अनेक तरह के पूर्व निर्धारित क़र्ज़
    मनुष्य को ग्लानि और कुंठा से भर देते हैं
    जिनसे बचकर निकलने के सारे दरवाज़े
    पहले से ही बंद कर दिए गए होते हैं

    और फिर अपने घातक मोहपाश में बँधे शमां परवानों पर 
    अनगिनत शेर नज़्म ग़ज़ल
    लिखने वालों को ब्लू व्हेल के बारे में नया क्या बताना
    कुछ पूछना है तो उनसे कुछ डर डर कर
    और कुछ हिचकिचाते हुए पूछो 

    जो अपना सर्वस्व
    बाढ़ दंगों भूकंप नरसंहार बीमारी युद्ध दुर्घटनाओं में
    गँवाकर कर भी
    नई सुबह के इंतज़ार में
    आकाश की ओर टकटकी लगाए बैठे हैं

    कि आख़िर किस आंतरिक साहस से वे
    ब्लू व्हेल की अवधारणा को ख़ारिज करते हैं
    या तुम्हारी ही तरह वे भी किसी दुशचक्र में ही फँसे हैं
    जिसे तुम्हारी रूमानियत मानने को मना करती है


    * ब्लू व्हेल एक समकालीन इन्टरनेट गेम है जिसके अदृश्य ‘एडमिन’ उसे खेलने वाले को एक तरह से मनोवैज्ञानिक रूप सेनियंत्रित कर आत्महत्या के लिए प्रेरित करते हैं। इस गेम के कारण पूरी दुनिया (और भारत) में कई युवा अपनी जान गँवाचुके हैं और कई जगहों पर इसपर प्रतिबंध लग चुका है।

    Kumar Vikram


  • निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

    निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

    हर साल बाढ़ से बेघर हुए
    लाखों लोग
    राहत शिविरों में पैदा होते बच्चे 
    हेलिकॉप्टर से फेंके गए खाने के पैकेट
    को धक्का मुक्की कर लूटने को अभिशप्त
    बच्चे जवान और बूढ़े
    ज़िला अस्पताल के गलियारों में
    अधमरे सोए कातर निगाहों से टहलते कुत्तों को देखते
    मरीज़ और उनके अस्वस्थ परिचारक
    भावी इतिहास हमारा है
    जैसे नारों से दूर बहुत दूर
    अनिश्चित वर्तमान में डूबे हुए
    पूरी तरह सार्वजनिक है उनकी निजता
    और उनका स्वाभिमान दुख व दर्द
    उनके लिए निजता पर
    महान अदालत का महान निर्णय
    कुछ नहीं बस
    एक मध्यवर्गीय परिकल्पना है
    खाए-अघाए प्राणियों की आख़िरी कल्पना है
    जिसपर अपने घर के दरवाज़े बंद कर
    महफ़ूज़ होकर सोने वाले
    खुलकर सार्वजनिक बहस करते हैं
     

    Kumar Vikram
     
  • अंत की शुरूआत

    Kumar Vikram

    [themify_hr color=”red”]

    अंत में उसने कहा था
    कि अंत में सब ठीक हो जाएगा
    अंतत: सबक़ा भला होगा
    मैंने सोचा था
    अंत अंत में ही आएगा
    मुझे यह इल्म नहीं था
    कि अंत दरअसल
    एक रोज़ाना ख़बर थी
    और अंत अंत में नहीं
    बल्कि हर पल
    आने वाले अंत की
    एक बानगी दिखाता जाएगा
    शायद मेरी ही तरह
    उसे भी यह अंदाज़ा नहीं था
    कि वह जिस अंत की बात कर रहा था
    वह दरअसल अंत नहीं
    बल्कि अंत की सिर्फ़ शुरूआत थी।

     

  • एक कविता के दो ड्राफ्ट्स, और दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

    कुमार विक्रम


    ड्राफ्ट १

    मैं प्रार्थना करता हूँ
    मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
    और भी अमीर हो जाये

    मैं चाहता हूँ
    मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
    और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए

    मेरी दिली ख्वाईश है
    शहर की सबसे नामी तवायफ
    और भी नामी हो जाए

    मेरी तमन्ना है
    मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
    और भी बड़ा दलाल बन जाए

    मैं उस दिन को देखने के लिए मरा जा रहा हूँ
    जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
    और भी बड़ा शोषक बन जाएगा

    जबसे मुझे यह इल्म हुआ है
    कि जब मेरे शहर के सबसे बड़े
    अमीर, गैंगस्टर, तवायफ, दलाल और शोषक
    हो जाएंगे पहले से भी
    और अधिक नीच, कमीने
    घिनौने, सस्ते और दरिंदे
    तब मेरा शहर और शहर के बाशिंदे
    अन्य सभी शहरों पर
    और उनके शहरियों पर
    चला पाएंगे डंडे।

    ड्राफ्ट २

    मैं प्रार्थना करता हूँ
    मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी
    और भी अमीर हो जाये
    ताकि इस शहर की गरीबी जाए

    मैं चाहता हूँ
    मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर
    और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए
    ताकि शहर सुसंकृत हो जाए

    मेरी दिली ख्वाइश है
    शहर की सबसे नामी तवायफ
    और भी नामी हो जाए
    ताकि शहर की महिलाएं सभ्य रह पाएं

    मेरी तमन्ना है
    मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल
    और भी बड़ा दलाल बन जाए
    ताकि शहर से हेरा-फेरी ख़त्म हो जाए

    मैं उस दिन के लिए मरा जा रहा हूँ
    जब मेरे शहर का सबसे बड़ा शोषक
    और भी बड़ा शोषक बन जाए
    ताकि शोषितों को मुक्ति मिल जाए

    फिलहाल मैं कब्र में आराम फरमा रहा हूँ
    और जीने की फरमाइशें कर रहा हूँ.

    दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

    मेरे शहर का अमीर और भी अमीर हुआ जा रहा है
    और मैं उससे आती अमीरियत की खुशबु सूंघने को बेताब हुआ जा रहा हूँ

    मेरे शहर का गैंगस्टर खून की रंगीन होली खेल रहा है
    और मैं उसमे रंगने को मरा जा रहा हूँ

    मेरे शहर की तवायफ के साक्षात्कार मुख्यपृष्ठों पर आ रहे हैं
    और मैं उसके संग फोटो खिंचवाने को भीड़ में लथ-पथ हुआ जा रहा हूँ

    मेरे शहर का दलाल शहर बेचने की कवायद कर रहा है
    और मैं उसके साथ बिकने को बेचैन हो रहा हूँ

    मेरे शहर का शोषक खून चूसने के नए तरकीबें ईज़ाद कर रहा है
    और मैं दौर दौर कर अपने खून की बोतलें उस तक पहुंचा रहा हूँ

    मैं फिलहाल जीने की फरमाइशें पूरी कर रहा हूँ
    और समयाभाव में साथ साथ अपनी कब्र भी खोद रहा हूँ


    credits : http://epaper.jansatta.com/c/3447521