दुभाषिया

Kumar Vikram वो दो घरों में नहींएक ही घर के दो कमरों में एक साथ रहता है या यूँ भी कह सकते हैं कि यदि माता व पिता दो अलग अलग भाषाएँ हैं तो बच्चा दुभाषिया है या दुभाषिया होना चाहिए वह सिरफ एक की भाषा नहीं बोल सकता अच्छा बच्चा अच्छा दुभाषिया ही होता हैवो लफ़्ज़ों की जड़ता छोड़ सकता हैवो बर्लिन की दीवार तोड़ सकता हैहलांकि वो दोनों… Continue reading

भूले बिसरे औपचारिक शब्द –Kumar Vikram

Kumar VikramEditor, National Book Trust, NBT पहले भी हमारी उनपर कोई ख़ास आस्था नहीं थी बल्कि हम उनपर हँसा ही करते थे मानो समाज के उच्च आदर्शों के तार तार हो रहे लिबास पर अपनी असहायता को ढकने के लिए अपनी शर्मिंदगी छिपा रहे हों जब मीडिया सभाओं भाषणों अख़बारों स्कूली कक्षाओं के वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हम उनसे अकसर टकराते रहते थे ‘युद्ध किसी समस्या का समाधान नहींटकराव का हल… Continue reading

निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

हर साल बाढ़ से बेघर हुए लाखों लोग राहत शिविरों में पैदा होते बच्चे  हेलिकॉप्टर से फेंके गए खाने के पैकेट को धक्का मुक्की कर लूटने को अभिशप्त बच्चे जवान और बूढ़े ज़िला अस्पताल के गलियारों में अधमरे सोए कातर निगाहों से टहलते कुत्तों को देखते मरीज़ और उनके अस्वस्थ परिचारक भावी इतिहास हमारा है जैसे नारों से दूर बहुत दूर अनिश्चित वर्तमान में डूबे हुए पूरी तरह सार्वजनिक है… Continue reading

अंत की शुरूआत

[themify_hr color=”red”] अंत में उसने कहा था कि अंत में सब ठीक हो जाएगा अंतत: सबक़ा भला होगा मैंने सोचा था अंत अंत में ही आएगा मुझे यह इल्म नहीं था कि अंत दरअसल एक रोज़ाना ख़बर थी और अंत अंत में नहीं बल्कि हर पल आने वाले अंत की एक बानगी दिखाता जाएगा शायद मेरी ही तरह उसे भी यह अंदाज़ा नहीं था कि वह जिस अंत की बात… Continue reading

एक कविता के दो ड्राफ्ट्स, और दो ड्राफ्ट्स से बनी एक कविता

कुमार विक्रम ड्राफ्ट १ मैं प्रार्थना करता हूँ मेरे शहर का सबसे अमीर आदमी और भी अमीर हो जाये मैं चाहता हूँ मेरे शहर का सबसे बड़ा गैंगस्टर और भी बड़ा गैंगस्टर हो जाए मेरी दिली ख्वाईश है शहर की सबसे नामी तवायफ और भी नामी हो जाए मेरी तमन्ना है मेरे शहर का सबसे बड़ा दलाल और भी बड़ा दलाल बन जाए मैं उस दिन को देखने के लिए… Continue reading