Tag: Vimal Kumar

  • जीवन मझदार

    जीवन मझदार

    एक भी नाव नहीं है मेरे पास
    लकड़ी की या कागज़ की
    और तुम कहते हो
    कि दो नावों पर सवार हूँ मैं

    देख ही रहे हो
    ३२ साल से एक नदी को
    पार नहीं कर पा रहा हूँ
    बीच धार में चिल्ला रहा हूँ
    मुझे बचा लो
    कोई आता भी नहीं बचाने अब किसी को

    कितनी नावों में कितनी बार
    बैठने की हसरत लिए
    मर नहीं जाऊंगा एक दिन

    वैसे अच्छा ही हुआ कोई नाव नहीं है
    क्या पता उसमे एक छेद होता
    और डूब जाता मैं
    या नाव ही उलट जाती .

    अब बहुत अँधेरा है पहले से अधिक
    बहुत तेज़ आंधी
    खून खून चारों तरफ दीवारों पर

    सच कहता हूँ
    अब दम घुटने लगा है
    आपस में ही उलझ गए हम
    एक दूसरे को दुश्मन मान बैठे हैं
    अब तो लगता है
    यह नाव भी अब नाव कहाँ है
    जब बुलेट ट्रेन चलने की बात हो रही है
    मुल्क में

    एक भी नाव नहीं है
    एक भी सायकिल नहीं
    नंगे पाव् ही चलना है
    रेत में
    फिर क्या कहना
    कि पाँव जल रहे हैं मेरे
    कृपया मेरे इस त्याग को दर्ज कर लिया जाये इतिहास में

  • चुनाव में हमें कोई – अपने जाल में फंसाता है

    Vimal Kumar

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    तुम शराब पीते हो
    और मैं उसे हाथ तक नहीं लगाता
    आओ हम इस बात पर
    एक दूसरे को नीचा दिखाएँ

    तुम गाय का दूध पीते हो
    और हम उबले अंडे खाते हैं
    आओ इस बात पर
    हम एक दूसरे को चाकू दिखाएँ

    तुम रोमियो हो
    इसलिए लफंगे हो
    मैं कृष्ण हूँ
    तो सच्चा प्रेमी हूँ

    आओ उस बात पर
    हम बात पर एक दूसरे को चिढाये

    तुम हमारी कौम के नहीं हो
    तो देशद्रोही हो
    मैं इस मुल्क का हूँ
    तो मैं देशभक्त हूँ
    आओ इस बात पर
    एक दूसरे के खिलाफ नफरत फैलाएं

    क्या अब इस मुल्क में
    सच बोलनेवाला कोई नहीं बचा है
    जो यह कहे
    तुम भी बेरोजगार हो
    और हम भी नौकरी के लिए भटक रहे हैं

    तुम भी परेशान हो
    हम भी परेशान हैं
    तुम भी इस देश की धड़कन हो
    हम भी इस देश की जान हैं.

    तुम भी अब केवल मतदाता हो
    हम भी केवल मतदाता हैं
    हर बार
    चुनाव में हमें कोई
    अपने जाल में फंसाता है.

     

  • शेर

    Vimal Kumar

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    शेर अगर तुम्हारे साथ बैठ कर
    नाश्ता करने लगे डाइनिंग टेबल पर
    तो यह मत समझना कि वह आदमी बन गया है

    शेर अगर तुम्हारे साथ
    पिक्चर हाल में बैठकर फिल्म देखने लगे
    तो यह मत समझना कि वह कोई दर्शक बन गया है .
    शेर अगर तुम्हे अपनी बाहों में ले ले
    फिर तुम्हे चूमने लगे तो यह मत समझ लेना कि वह तुम्हारा प्रेमी बन गया है शेर अगर किसी दिन तुम्हारा आंसू पोंछने लगे
    जेब से रुमाल निकाल कर
    तो यह मत समझना कि वह तुम्हारा वाकई हमदर्दबन गया है

    शेर अगर अपने गले में माला डाल ले
    शंख ध्वनि करने लगे मंदिर में
    बजाने लगे घड़ियाल
    तो यह मत समझना कि वह अब पुजारी बन गया है

    शेर अगर किसी दिन चुनाव जीतकर
    देश का
    प्रधानमंत्रीही बन जाये
    देने लगे लोकतंत्र की दुहाई
    तो यह मत समझना कि वह कोई महा पुरुष बन गया है

    शेर को खून का स्वाद लग चूका है
    वह कितना भी विनम्र और शालीन दिखे
    वह कोई दार्शनिक नहीं है एक दिन झपट्टा मार कर
    तुम्हे डकार ही जायेगा

     

  • एक दिन नदी में राख की तरह बह गया

    Vimal Kumar

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    एक दिन मैं और थोड़ा सा जी गया
    एक दिन थोडा सा बारिश में भीग गया

    एक दिन धूप निकल आयी मेरे आँगन में
    एक दिन मैं मरने से भी बच गया

    एक दिन मैं धुआं बन गया था
    एक दिन तो कुआँ बन गया था
    एक दिन में सुलगती रात था
    एक दिन मैं दहकती आग था
    एक दिन मैं जलने से बच गया

    एक दिन बर्फ की तरह पिघलने लगा
    एक दिन शाम की तरह ढलने लगा
    एक दिन तुम्हारा हाथ पकड़
    बच्चे की तरह चलने लगा
    एक दिन इतनी तेज़ आंधी आयी कि सब कुछ उड़ा ले गयी

    एक दिन मैं पते की तरह झरने से बच गया

    एक दिन मैं किसी की आवाज़ था
    एक दिन मैं बजता हुआकोई साज़ था
    एक दिन एक छिपा हुआ एक राज़ था
    कोई भेद खोले इस से पहले

    एक दिन आईने के सामने अपना सच उस से कह गया

    मरने की घड़ी थी मेरे सामने
    किस क़र्ज़ में डूबा था इस तरह
    एक दिन तुम्हे प्यार करते करते रह गया

    एक दिन तो खूब जलसा हुआ अपने घर में
    एक दिन एक किले की तरह ढह गया

    एक दिन बहुत उम्मीद थी जिन्दगी से
    एक दिन नदी में राख की तरह बह गया .

     

  • मुझे अपनी देह से बाहर निकल जाने दो ..

    Vimal Kumar

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    कितनी बार कहा मैं एक देह नहीं हूँ
    सिर्फ एक स्त्री हूँ
    मुझे इस जंगल से बाहर निकल जाने दो .

    कितनी बार कहा चीखकर
    मैं कोई तितली नहीं हूँ
    तुम्हारे बगीचे में उडती हुई

    तुम्हारी नींद में कोई ख्वाब नहीं हूँ .
    मुझे इस ख्वाबसे बाहर निकल जाने दो

    नहीं हूँ कोई कटी पतंग
    जिसे लूटने के लिए तुम दौड़ते रहो..
    नहीं हूँ कोई नदी
    प्यास बुझाने तुम आते रहो बारबार
    मुझे इस नदी से बाहर निकल जाने दो
    मैं एक स्त्रीहूँ .

    कितनी बार कहा मैंने
    कोई अँ धेरी सुरंग नहीं हूँ
    नहीं हूँ कोई फूल
    न कोई खुशबू
    मुझे इस सुरंग से बाहर निकल जाने दो

    मैंने इतनी बार कहा तुमसे
    मैं सबसे प्रेम नहीं कर सकती
    नहीं सोसकती सबके साथ
    मैं एकस्त्री हूँ
    मैं वक्ष नहीं हूँ
    कोई योनि नहीं हूँ
    एक बच्चे की माँ हूँ

    तुम्हारे लिए कोई बिस्तर नहीं हूँ
    कोई तकिया नहीं हूँ
    मेरी देह ही मेरे लिए एक पिंजरा है
    मुझे आज इस पिंजरे से बाहर निकल जाने दो

  • देशभक्त

    Vimal Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    सुबह सुबह वे तुम्हारे मोहल्ले में
    एक तिरंगा लहराते आयेंगे
    फिर तुम्हारे घर को आग लगायेंगे
    क्या तब भी तुम उन्हें कहोगे
    — देशभक्त !

    एक दिन बीच सड़क पर
    घोंप देंगे पीछे से
    तुम्हारी पीठ में वे चाकू
    क्या तब भी तुम कहोगे उन्हें
    -देशभक्त!

    बहस होगी जब उनसे तुम्हारी
    किसी बात पर
    तुम्हारे बालों को खींच कर
    कर देंगें तुम्हे निर्बस्त्र
    भारत माता की जय कहते हुए
    क्या तब भी तुम कहोगे उन्हें
    -देशभक्त !

    खतरे में था तब भी यह देश
    जब एक भ्रष्ट्रचारी को बता रहे थे
    लोग परम धर्म निरपेक्ष
    लूटेरे को माफ़ किया जा रहा था
    क्योंकि वह समाजवादी था .

    भूखमरी और बेरोजगारी का
    चारों तरफ आलम था
    चुनाव में दिखाए जा रहे थे
    केवल सपने ..

    अपने ही देश के
    अब हम नागरिक नहीं थे
    हर बार छले गए मतदाता थे
    अपने अधिकारों से बंचित थे
    सच पहले भी कहते थे
    लेकिन देश द्रोही नहीं ..थे..

  • गधा पचीसी

    Vimal Kumar

    [themify_hr color=”red”]

    मैं एक गधा हूँ
    चाहूँ तो कुछ भी बन सकता हूँ
    चुनाव में खड़ा भी हो सकता हूँ
    किसी योग्य उम्मीदवार को हरा कर
    जीत भी सकता हूँ

    फिर मंत्री भी बन सकता हूँ

    फिर एक दिन
    इस मुल्क का प्रधानमंत्री भी
    मैं एक गधाहूँ
    अपने मालिक का बहुत वफादार हूँ
    इसलिए तो नहीं किसी बातसे शर्मशार हूँ
    फिर क्या कुछ भी बनसकता हूँ

    अगर कुछ लिखने आता हो
    तो अखबार में
    आता हो कुछ बोलने उटपटांग
    तो टी वी का पत्रकार
    भी बन सकताहूँ

    तेल मालिश की कला में अगर हूँ
    निपुण
    तो सम्पादक भी बन सकता हूँ

    मैं एक गधा हूँ
    इसलिए हाँ में हाँ मिलाने की कला अच्छी तरह जानता हूँ
    हुक्म तामिल करने आता हो
    अगर १८० फीटका तिरंगा लहरादूँ
    तो किसी विश्विद्यालय का कुलपति भी बन सकता हूँ .

    मैं एक गधा हूँ
    लेकिन जन्म से नहीं
    बल्कि डिग्री से
    इसलिए कुछभी बन सकता हूँ
    किसी अकेडमी का अध्यक्ष
    फिर क्या पुरस्कार भी झटक सकता हूँ

    बहुत सरे गधे हैं
    इस मुल्क में
    उनमे एक मैं भीहूँ
    गधों के मेले में हूँ
    खड़ा
    बिकने के इंतज़ार में

    ढेन्चू ढेन्चू कर सकता हूँ मैं
    किसी के प्यार में

    मैं एक गधा हूँ
    इसलिए आप यह न कहें
    यार इस उम्र मे
    आखिर
    तुम भी क्या करते हो
    इसतरह
    गदह पचीसी


    फेसबुक वाल से साभार