किसान संकट के बीज

Prem Singh

बुंदेल खण्ड में ग्रीन रेवलूशन, गाँव से बाहर शहरों में पढ़े नव शिक्षित वर्ग के साथ १९७५ के आस पास ही गाँव में प्रवेश कर पाया इसके पहले नहीं। वही शिक्षित वर्ग जिसे गाँव वालों ने बड़े हसरत और प्यार से बाहर पढ़ने के लिए भेजा था, लौट आने के बाद भी बड़ा सम्मान करते थे।(मेरे गाँव में सबसे पहले जो सज्जन इलाहबाद विस्वविद्यालय पढ़ने गए थे १९६५ में, पूरे गाँव ने टीका लगाकर, पैसे देकर ग़ाजे बाजे के साथ बस में बिठा कर विदाई की थी।जब वही व्यक्ति पुनः वापस आया जीवन भर उसे गाँव वालों ने भैया कह कर २०१५ उसके निधन तक सम्मान किया) इसी वर्ग ने गाँव के सारे मानक बदल डाले। सबसे पहले बड़ेपन या श्रेष्ठता का मानक बदला। हमारे गाँव में उसको उतना ही सम्मान मिलता था जो जितना आत्म निर्भर था और दूसरों के काम आता था। जैसे ही कुछ अतिरिक्त उत्पादन या आमदन होती तुरंत गाँव के सामूहिक उपयोग के लिए बर्तन, फ़र्श, तख़्त, जंगाल( पानी इकट्ठा करने का ताम्बे का बर्तन), कोपर, कठौती,अद्धा( प्रकाश फैलाने का यन्त्र, हारमोनियम, तबला आदि अनेकानेक वस्तुएँ लाते थे। और गाँव वाले पूरे अपने पन से उन्हें प्रयोग करते थे। यही बड़प्पन था।

जो वास्तव में विचारों और व्यवस्था,दोनो में बड़े थे वे सबके समान दिखने में ही बड़प्पन समझते थे। मैंने अपने गाँव में ऐसे भी बड़े देखे हैं जो बिवाह आदि सुख दुःख के अवसर पर बिना बुलाए पहुँचते थे और पूरी जानकारी लेते थे कमी होने पर अपने घर से पूरा करते थे।

मेरे नाना ख़ानदान में एक मान्यता थी की यदि कोई ईंट लगाएगा तो नास हो जायेगी। मैंने पूँछा ऐसा क्यों? बोले यदि हमने छत बना दी तो पड़ोस के घर नंगे हो जाएँगे। बहु बेटियों को तकलीफ़ होगी और छत बनाने की प्रतिस्पर्धा हो जाएगी।

अब इन डिग्री धारी नव शिक्षतो ने परिभाषा ही बदल दी। १९७५ के बाद दूसरों से बड़ा दिखना और अधिकारियों से पुलिस से नज़दीकी रखना बड़प्पन होने लगा। ट्रैक्टर, रासायनिक उर्वरक एव कीटनाशक प्रयोग करना,कई माले का पक्का मकान,मोटर सयकिल, गाड़ी, कूलर, टी वी ,डबल बेड, बेडरूम, सोफ़ा,मट्ठा भाने की मशीन, फ्रिज, चाय, काफ़ी, बिस्कुट, शक्कर रखना और टेरिकाट पहनना, क़र्ज़ लेना( बैंक से)बड़ा पन हो गया।

गाँव वालों ने तो यह सोच कर इन्हें बड़े बड़े शहरों में पढ़ाया था कि वापस आकर ये गाँव को सम्भालेंगे। लोगों में पुरक़ता और समृद्धि के नए सूत्र बतायेंगे। हुआ कुछ उलटा।
वर्तमान किसान संकट का बीज वही कहीं है।

Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

More posts