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  • जेनयू जैसे संस्थान कैसे सामंती मानसिकता, अवतारवाद के आवरण में नेतृत्व के नाम पर समाज को पीछे धकेलते है।

    जेनयू जैसे संस्थान कैसे सामंती मानसिकता, अवतारवाद के आवरण में नेतृत्व के नाम पर समाज को पीछे धकेलते है।

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    जेएनयू विरोध के नाम पर मुख्यत: हमें जो सुनाई दिखाई पड़ता है वह यह है कि जेएनयू में लड़के लड़कियां सेक्स कर लेते है, कंडोम का प्रयोग किया जाता है, किसी खास राजनैतिक विचारधारा को ज्यादा सपोर्ट करते है, देश विरोधी गतिविधियां होती है आदि आदि बातों को आगे बढाते हुए करते है।
    ऐसा करने वाले अधिकतर लोग जो हमें दिखाई पड़ते है वह भी किसी राजनैतिक विचारधारा के पक्ष में झुके होने के कारण ऐसा कर रहे होते है व साथ के साथ अपनी कुंठित मानसिकता का प्रदर्शन कर रहे होते है। इस तरह एक विरोध वाले खुद निजी जीवन में धूर्त, व्यभिचारी, भृष्ट, महिलाओं, बच्चों का शोषण करने वाले व धार्मिक व जातिवादी मद में अंधे होते है। मैं कई ऐसे लोगों को जानता रहा हूँ जो रिश्तों के नाम पर खूब लड़कियों का शोषण करते रहे, जिम्मेदारियों के नाम पर भागते रहे, अबॉर्शन जैसी चीजें भी कराते रहे।
    इस तरह के तर्क इनके ही जैसी मानसिकता वालो को खूब संतुष्ट करते है।
    लेकिन
    इस तरह के तर्क जेएनयू का पक्ष लिए जाने का कारण भी बन जाते है। इन्हीं तर्कों के कारण कि देखिए लोग किस तरह से विरोध कर रहे है और अपना पक्ष विरोधी के विपरीत वाले पक्ष को चुन लेते है।
    अब मेरा सवाल ये है कि जेएनयू में क्या किसी बाहर देश के लोग आते है इसी देश समाज से आते है तो वह क्यों नहीं इसी तरह की मानसिकता वाले हो सकते। इससे भी बढ़ कर धूर्तता यदि चालाक हो जाए तो ऐसे विरोध को अपने पक्ष में क्यों नहीं भुना सकते?

    इस तरह के तर्क से पक्ष हो या विपक्ष वस्तुनिष्ठ तार्किकता तो गायब हो ही जाती है।

    आप जेएनयू के समर्थन कीजिये जो एक तरफ वाले गाली गलौज को हो हुड़दंग के साथ जत्थे के साथ हाजिर हो जाते है। आप विपक्ष लिखिए तो आपको सीधे उठा कर पहले वालो की कैटेगरी में रख दिया जाता है।
    बहुत लोग जेएनयू के विरोध में इसलिये भी बात नहीं रख पाते कि एक तो अपनी इमेज का खतरा उपर से एक पक्ष तो कम से कम आपके साथ चल ही रहा था उनकी नाराजगी क्यों झेलनी। लाइक वगैरह कम हुए तो क्रांति कम हो जानी।

    जेनयू का पक्ष लीजिए या विपक्ष लेकिन कई ऐसे पहलू है जिन पर बात ही नहीं की जाती है

    सबसे पहले बात करते है पुलिस द्वारा उत्पीड़न की। भारत में पुलिस के काम करने की शैली और चरित्र की बात की जाये तो दिल्ली पुलिस को बाकी राज्यों की पुलिस की अपेक्षा कम बर्बर, कम भ्रष्ट माना जाता है। मान लेते है कि ऐसा नहीं भी है केवल दिल्ली पुलिस अपने आप को प्रायोजित कर जाती है। बाकी राज्यों की पुलिस तो अपनी इमेज को प्रायोजित करने के लिए भी तैयार नहीं है। यदि पुलिस का व्यवहार सारी मीडिया के सामने इस प्रकार का है तो यही पुलिस का व्यवहार बाकी राज्यों में बाकी छात्रों के साथ किस प्रकार का होता होगा इसकी केवल कल्पना भर कर लीजिए। नौकरशाही का व्यवहार आपके राजनैतिक पक्ष को तो ध्यान में नहीं ही रखता है यह तो आप भी जानते ही होंगे। आम आदमी किसी भी राजनैतिक पक्ष का हो नौकरशाही उसके साथ कीड़े मकोड़े वाला ही व्यवहार करती है। हर राज्य में सालों से छात्र प्रशासनिक उत्पीड़न झेल रहे होते है कितनों को ही कई कई सालों तक जेल में सड़ा दिया जाता है, हाथ पैर तोड़ कर घर बैठा दिया जाता है। यदि आप बाकी जगह से तुलना करेंगे तो बाकी जगहों को देखते हुए आप यह भी कह सकते है कि यहाँ तो कुछ होता ही नहीं है। यह सुविधा भी केवल जेनयू को ही प्राप्त है कि हर छोटी बड़ी बात पर अटेन्शन लेते है उसका लाभ उठाते है।

    जेनयू को मैं एक सामंती चरित्र का संस्थान मानता हूँ बिल्कुल वैसे ही जैसे भारत में कुछ जातियों को सामंती अधिकार व लाभ प्राप्त है।
    जेनयू के लिए कोई विषय मुद्दा केवल और केवल तब बनता है जब बात जरा सी भी इस संस्थान को मिलने वाले लाभ या अधिकार पर आती है। इसी बात को ये सभी लोगों का मुद्दा बना देते है। यह बिल्कुल वैसा ही है कि जब तक शोषित वर्ग का शोषण हो रहा मारा पीटा जा रहा सही गलत जैसे भी एनकाउन्टर हो रहा तो ठीक लेकिन जैसे ही जाति विशेष या धर्म की बात आयेगी तो इस समस्या को सबकी समस्या बता कर मुद्दा बनाया जायेगा।

    जैसे कुछ जाति विशेष को मिली सुविधाओं के कारण भारत महान, विश्व गुरु का ढोल पीटा जाता है लेकिन भारतीय समाज को गर्त में ले जाने वाले लोग भी यहीं है वैसे ही जो सुविधाएं लाभ हर एक ब्लॉक स्तर पर होनी चाहिए थी, हर एक जगह के बच्चों को बराबर पढ़ने के अधिकार इतनी ही सुविधाएं होनी चाहिए थी वह कुछ संस्थानों तक समेट कर रख दी। इन बातों का पक्ष जेनयू कभी नहीं लेता, लेगा भी कैसे खुद के महान होने का, कंपटीशन की छंटनी से पैदा हुई विशिष्ठता का स्वाद फिर कैसे मिलेगा।

    चूंकि आज तक विशेष सुविधाएं व लाभ कुछ ही संस्थानों को मिलते रहे है तो अधिकतर कलेक्टर, सचिव आदि इन्हीं संस्थानों से निकल कर आते रहे है। एक बार भी इन लोगों ने इन पदों पर मिलने वाले लाभ, सामंती आधिकारों पर प्रश्न उठाया हो तो बताया जाए। सवाल उठा ही नहीं सकते क्योंकि अपने आप को मिले लाभ आधिकारों को यह खुद की महानता और मेरिट के आधार पर डीजर्व करना मानते आये है, जब पूरी ट्रेनिंग जातिव्यवस्था की तरह भ्रष्टता को दैवीय अधिकार मानने से रही है तो पूरा जीवन खुद को महान समझते हुए भ्रष्टता को अपना अधिकार मानते हुए क्यों न जियेंगे। चूंकि मुख्य पदों पर आजादी के बाद से ही इन्हीं संस्थानों से लोग आते रहे है तो नीति बनाने से ले कर नीतियाँ लागू करने वाले पदों पर रहे है तो क्यों न माना जाये कि देश की ऐसी तैसी करने में इन्हीं लोगों का मुख्य योगदान रहा है।

    किसी संस्थान कि गुणवत्ता का आधार यह तो बिल्कुल नहीं होता कि उस संस्थान के लोग नौकरियों पर व देश विदेश में कितना सेट होते रहे, मेरिट भी गुणवत्ता का आधार नहीं होता है यह नौकरशाही के व्यवहार से साफ साफ दिख ही जाता है और जब नौकरिया यहाँ के लोगों के लिए है तो यही के लोग नौकरियां करेंगे गुणवत्ता के आधार पर विदेश से तो लोग बुलाए नहीं जायेंगे। यहीं कारण है जिन सस्थानों को भारत में नंबर एक दो तीन बोला जाता है उनकी गिनती पूरी दुनिया में 500 तक नहीं होती है। यहाँ यह समझ लेना भी होगा कि किसी संस्था को अच्छे संस्था का दर्जा इस लिए नहीं मिल जाता है कि वह बड़ी बिल्डिंग के साथ खड़ा हुआ संस्थान है, भारत गिनती के संस्थानों में सुविधाएं है भारी फंड आदि की व्यवस्था है असल गुणवत्ता का मालूम ही तब पड़ता है जब हजारों कि संख्या में ऐसे संस्थान हो। छंटनी प्रतियोगिताओं के आधार पर कॉलेज में एडमिशन से लेकर नौकरियों तक में लोगो का लिया जाना कभी गुणवत्ता हो ही नहीं सकता। उल्टा सामंती मानसिकता विशिष्ठता को प्रयोजित ही करेगा।

    पूरी दुनिया में यूनिवर्सिटी की रैंकिंग वहां के छात्रों द्वारा शोध पत्रों की संख्या और गुणवत्ता पर आधारित होती है। यह वह डॉक्टरेट पेपर होते है जो कठोर समीक्षाओं के बाद अंतरराष्ट्रीय ख्याति के जर्नल में प्रकाशित होते है। इन सब में आप दूर दूर तक नहीं आते है बात करते है आप मेरिट की, विद्वता की, चिंतनशीलता की। नौकरी लगवा देने से एक संस्थान महान हो जाता है तो कुछ कहने को रह ही नहीं जाता है, भाषण बाजी करना चिंतन या काम करना होता है तब भी कहने को कुछ रह ही नहीं जाता है।
    यदि सोशल मीडिया की बयार में बह कर मान ही लिया जाये कि जेएनयू जैसे संस्थान से हर साल हजारों की संख्या में चिन्तनशील लोग निकलते ही रहते है तो देश छोड़ दीजिए, यहीं बता दीजिए दिल्ली के बगल में ही कूड़ा प्रबंधन के लिए कितना काम किया है, दिल्ली के बगल में ही विस्थापित मजदूरों की बस्तियां है वहां के बच्चों के लिए शिक्षा पर क्या काम किया है? यमुना की साफ सफाई जल प्रबंधन पर ही कुछ बता दिया जाये। अपने गांवों में जाकर क्या किया है यह ही बता दिया जाये।
    नौकरी लगाना, विदेशों में सैटल होने के अवसर तलाशना, समाधान या रचनात्मक विकास के बारे में जरा भी विचार न करते हुए विरोध के ढोंग को जीना ही क्या विद्वता और क्रांति होता है?

    गांव देहात का व्यक्ति यह नहीं देखता कि आप कितने बड़े लेख लिखते है कितना महान करुणामय लिखते बोलते है।
    वह यह भी नहीं देख पाता कि तमाम भोग सुविधाओं के पीछे आपका भी जीवन दयनीय परिस्थितियों व शोषण से भरा हुआ है। वह यह भी नहीं देख पाता कि आप उन लोगों के लिए काम करते है जो उसके शोषण के लिए सीधे जिम्मेदार है। वह यह भी नहीं देख पाता कि आपको दिया जाने वाला मोटा पैसा उससे ही धूर्तता से लेकर आपकी जेब में आपको सहलाने के लिए डाल दिया जाता है। वह देखता है आपके जीये जाने वाले जीवन को, आपके द्वारा प्रायोजित महान जीवन को और वह लग जाता है अपने जीवन बच्चों को इसी सब की तरफ धकेलने में।
    कोरी भावुकता, अहंकार, रोमांटिक क्रांति के पीछे लेखक, पत्रकार, समाजिक कार्यकर्ता आदि अपने समाज को गर्त में धकेलने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकते।
    आप यह मानने को तैयार ही नहीं है कि समाज से अलगाव आपने अपनी सामंती सोच और फूहड़ताओ के कारण अपने आप को अलग मानने की मानसिकता , सेलेब्रिटिज्म को जीने के लिए किया। बिना व्यवहारिक ज्ञान के, जीवन में उतारे बिना, समाज के साथ जुड़े बिना, बिना सुधारात्मक दिशा में काम किये एक दूसरे को पहनाए हुए विद्वता के तमगे निर्लज्जता से अधिक कुछ नहीं होते।
    और देश में माहौल बनाने को राजनैतिक पार्टियों को भुनाने को फिर जब इतना सब तैयार मिल ही रहा तो केवल अन्ना हजारे टेक्निक ही थोड़े न है। ऐसी जगहों से बे-सिर पैर तरीको से केवल विरोध दर्ज करवा लीजिए लोग खुद ब खुद इनके विपक्ष में हामी भर कर तैयार बैठ ही जाते है। ऐसे विरोध के लिए तो राजनैतिक पार्टियां क्षेत्रीय राजनैतिक पार्टियां, राष्ट्रीय स्तर पर नेता तक खड़े कर देती है/बना देती है/प्रयोजित कर देती है आप तो फिर भी एक शिक्षण संस्थान है।

    चलते-चलते :-

    देश में शिक्षा स्वास्थ्य एक दम मुफ्त होना चाहिए एक समाज अपने देश के व्यक्तियों के लिए, बच्चों के लिए कम से कम इतना संवेदनशील तो होना ही चाहिए, लेकिन चलिए साथ के साथ यह भी देख लेते है कि जब हम जेएनयू में शिक्षा की फीस बढ़ाए जाने का विरोध कर रहे होते है तो यह भी देखना बनता ही न देश में 12वी तक शिक्षा लगभग फ्री ही रही है, सरकारी अस्पतालों में इलाज बेहद कम रुपयों में उपलब्ध रहा ही तो इन सब कि आज जो हालत है, सर्विस का स्तर जो एक निम्न से निम्नतम स्तर पर जाने पर लगा हुआ है इसके जिम्मेदार क्या विदेशों में रहने वाले लोग है। इसके जिम्मेदार उनमें नौकरियां करने वाले लोग जितने है उससे कहीं ज्यादा हम है। हमारा बच्चा कम फीस में गरीब तबकों के बच्चों के साथ कैसे पढ़ सकता है? महंगी फीस नहीं देंगे, महंगे ट्यूशन नहीं लगवाएंगे, कोचिंग नहीं करवाएंगे तो जिम्मेदार माता पिता होने का एहसास कहां से होगा ?
    सामंतवादी मानसिकता बहुत बारीक चीज होती है। थोथी संवेदनशीलता दिखाने से यह ढक नहीं जाती है।
    यदि हमने अपने आपको सरकारी बेसिक शिक्षा के साथ अपने बच्चों को जोड़ा होता , सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों से खुद को जोड़ा होता तो क्या ये सब सुधारात्मक दिशा में नहीं बढ़ गए होते। यहां तक कि प्राइवेट स्कूल, अस्पताल भी मजबूर होते सरकार के अंतर्गत ही काम करने को। सरकारे भी उसी स्वभाव की होती जो इन क्षेत्रों के प्रति जिम्मेदारी से काम करती। पूरा ढांचा ही अलग स्वभाव का होता, जब हमारा स्वभाव ही सामंतवादी है, दोगला है तो सरकारों भी ऐसे ही होनी है बिल्कुल कोई अंतर होना ही नहीं है। इन बातों का लेफ्ट राइट मानसिकता से कोई मतलब ही नहीं है।
    इस तरह ढोंग को अपने जीवन में जीते हुए जब हम विरोध प्रदर्शन और समाज को गालियां दे रहे होते है तब हर तरह से समाज का नुकसान ही करते है चाहे यह जानबूझ कर किये जा रहे हो या अनजाने में। आप जेएनयू जैसे संस्थानों के पक्ष में लगातार खड़े रहते है मैं भी पूछता हूँ आपके ही दूर दराज के गांव देहात के लोग जिन्होंने इनके एडमिशन फॉर्म के बारे में भी नहीं सुन रखा होता उनकी क्या गलती कि वह इन संस्थानो से महंगी फीस भरे, शोषण झेले, कम सुविधाओं में रहे। आप क्यों नहीं इस बात का पक्ष लेते कि या तो हर जिले, ब्लॉक स्तर पर अच्छी यूनिवर्सिटी हो या सबको एक जैसा ट्रीटमेंट मिले।

    वास्तविक क्रांति आपके जीवन के भीतर से उपजती है, यह आपकी जीवन शैली जीवन व्यवस्था को बदल कर रख देती है इस क्रांति का सामना करने के लिए वास्तविक ऊर्जा और हिम्मत की जरूरत पड़ती है, जब हम क्रांति को अपने जीवन में नहीं उतार पाते तब क्रांति के रोमांस से ही अपना मनोरंजन करके खुद के कुछ होने का एहसास कराया जाता है। बिना अपवाद भारत के अधिकतर आंदोलन इसी तरह की प्रयोजित रोमांटिक क्रांति के चरित्र के ही होते है इसीलिए देश समाज वहीं रहता है नेता, लेखक, पत्रकार, ब्यूरोकेट अपने अपने खांचों में जिस व्यवस्था से लड़ने का दिखावा करते है उसी को मजबूत करते हुए सफलता की सीढ़िया चढ़ते चले जाते है और समाज और ज्यादा गर्त में इसी तरह के व्यक्तित्वों का निर्माण करता हुआ बढ़ता चला जाता है। 

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • मानसिक बलात्कार

    मानसिक बलात्कार

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    बच्चें को पैदा होने के दिन से भारतीय समाज में बच्चों के साथ उनकी इच्छा के विरुद्ध कार्य करना शुरू कर देता है जाता है।
    जब बच्चे के किसी कार्य से माता-पिता शिक्षक आदि को यदि जरा भी तकलीफ या जरा भी जिम्मेदारी बढ़ी महसूस होती है केवल तब ही बच्चे से पूर्ण व्यक्ति होने के अंदाज में डांटा फटकारा जाता है। अन्यथा हर एक स्थिति में बच्चों की आधिकारिक स्थिति व समझ को कुत्ते बिल्लियों से भी परे ही माना जाता है। कुल मिलाकर किसी भी क्षण बच्चे को पूर्ण मनुष्य माना ही नहीं जाता है।

    उसमें भी यदि बच्चा लड़की हो, या शोषित वर्ग से आता हो तब तो उनका अस्तित्व होना न होना एक बराबर है।

    बच्चे की सारी जिज्ञासाएं रोक कर जब आप उसे अध कच्ची नींद से उठा कर ऐसे स्कूल में भेज रहे होते है जहां उसे पूरे दिन बैठा रहना है, ऐसी चीजे सीखनी समझनी है जिनकी तरफ बढ़ना उसकी स्व रुचि से नहीं हुआ है तब आप अपने बच्चे को मानसिक पंगु बना रहे होते है।
    बच्चे को जब आप स्वत: खोजना, समझना , सीखना जिज्ञासाओं के साथ बढ़ने का माहैल उपलब्ध न करा कर, नौकरी आदि के लिए बाजारू शिक्षा में धकेल रहे होते है जहां उसे अपने साथ वाले बच्चों के साथ मैत्री भाव, सहयोगात्मक भाव न रख कर उनसे निरंतर प्रतियोगिता करनी है, जिसमें चाहे सभी कितनी ही अच्छी दौड़ लगा ले लेकिन रेस में जैसा कि होता है आगे रहना कुछ एक को ही है।
    बच्चे के जीवन का समय कीमती समय जब हम इस तरह के दवाब, पीड़ाओं बेमतलब की जबरदस्ती करवाने वाली मेहनत से गुजरवाते है तब हम उनके साथ मानसिक बलात्कार कर रहे होते है, अपनी हिंसा गुणात्मक रूप से बच्चों के ब्रेन में बलात्कारी ढंग से भर रहे होते है।

    जब हम लड़के और लड़की के पालन पोषण – उनके खाने पीने, कपड़े पहनने, काम करने, अधिकारों में अंतर कर रहे होते है उसी पल से हम लड़की केवल भोग्या है, लड़के को भोग करना है जैसी मानसिकता तैयार कर देते है।
    हमारे यहां बच्चों को पालन करने में ऐसा स्पेस ही नहीं छोड़ा जाता जहां बच्चों के ब्रेन के साथ जबरदस्त रूप से छेड़ छाड़ न की जाती है, मानो की धरती पर जीवन इसी सब कार्य के लिए हुआ हो, आने वाली पीढ़ियों का जीवन नष्ट या नरकमय बनाने में योगदान नहीं दिया तो जीवन व्यर्थ चला जाना है। हमारा जीवन जीने का कोई तरीका ट्रेनिंग ऐसी है ही नहीं बच्चों में बाकी मनुष्यों से अलगाव न पैदा करती हो, प्रेम पनपने की चिन्दी भर जगह की भी भ्रूण हत्या न कर देती हो।
    जब हम बच्चों में जातीय गर्व भर रहे होते है उसी पल हम उन्हें दूसरों से अलग कर रहे होते है, उनके अंदर द्वेष भर रहे होते है, दूसरे लोगों को दोयम मानने की मानसिकता भर रहे होते है।

    बच्चियों को बचपन से ही चूड़ी, चुन्नी, सिंदूर, पायल, बिछवा, कपड़ो के ढंग के साथ असुरक्षात्मक मानसिकता से बांध दिया जाता है। हमारे मानसिक बलात्कार इतने बारीक और चालाकी पूर्ण होते है कि केवल एक दरवाजा इस तरीके से खुला छोड़ा जाता है जिसमें व्यक्ति बचाव में भागता तो है लेकिन उसके लिए बिछाया हुआ एक अन्य जाल ही होता है जिसमें वह स्वतंत्रता के भ्रम में गुलामी वाला जीवन ही जीता है, स्वयं उसे महानता के रूप में प्रयोजित करता है।
    महिलाएं को पूरा जीवन इस तरह कंडीशन किया जाता है कि उसे अपने आपको इन्ही में सुरक्षित महसूस करने का विकल्प केवल छोड़ दिया जाता है।
    मतलब बचपन से लेकर अब तक केवल शोषण ही शोषण दोयम दर्जा और यहां आकर कुछ अलग है का भ्रम। शोषण करने के, बलात्कार करने के ऐसे तरीके जिसमें शोषित को पता ही न चले कि उसके साथ कुछ गलत भी हो रहा है, इतने गजब अमानवीय धूर्ततापूर्वक तरीके शायद ही किसी समाज में देखने को मिलते हो।

    बाकी छोड़िए हमने तो शादी के नाम पर शारीरक बलात्कार, वेश्या वृति के लिए एक सस्था ही तैयार कर कर दी है, आप इसके नियमों के तहत वह सब कीजिए जो करना है उल्टा सम्मान आपको दिया जायेगा।

    जिस समाज में मानसिक बलात्कारों की एक पूरी श्रंखला बनी हुई हो वह समाज हर स्तर पर कुंठित व हिंसक न होगा तो क्या होगा। ऐसे समाज में शारीरिक बलात्कारी पैदा नहीं होंगे तो क्या होंगे।

    आप इस सब को समाज को कोसना कह सकते है लेकिन मैं इसे बीमारी का देखना या बीमारी को डाइअग्नोज़ करना कहता हूँ। अभी तो हम बीमारी को महान बीमारी, विश्व गुरु बीमारी, दुनिया की सबसे अनूठी बीमारी मानने में ही फले फूलें जा रहे है, मानसिक बीमारियों को पूजने में ही लगे हुए है। महाराज बीमारी को बीमारी मानिए तो सही इलाज अपने आप चल कर समाज में आ जायेगा।

    किसी भी बीमारी का इलाज बीमारी वाले भाग को सुन्न कर देना या पैन किलर ले लेना नहीं होता है। चूंकि हम मानिसक बीमार है, हर पल तरह तरह के बलात्कारों को अपने जीवन में झेलते और करते आते है। यदि हम यह सोचते है कि हम जोर से चिल्लाने से, कठोर दंड आदि मांगने से अपने आप को छिपा ले जाएंगे या बचा ले जाएंगे तो हम रह रह कर हम अपनी प्रताड़नाएं ही केवल प्रदर्शित कर रहे होते है।
    महिलाओं, बच्चों के मानसिक बलात्कार करने को हम महान सभ्यता के नाम पर गौरान्वित होते रहेंगे तब तक कड़े कानूनों, दंड फंड की मांग भी करते ही रहेंगे दोहरे चरित्र को छिपाने के यही सब उपाय होते है।

    हम वास्तव में इलाज चाहते है तो जड़े निरंतर खोदती रहनी होगी तब तक खोदते रहनी होगी जब तक सामाजिक बीमारियों का मूल नहीं पकड़ लेते। अब हम बीमारी के उस स्तर पर भी नहीं है जहां पेन किलर फौरी राहत दे देता हो, इलाज तो बहुत दूर की बात है।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • भारतीय समाज :- मान-सम्मान एवं स्वाभिमान

    भारतीय समाज :- मान-सम्मान एवं स्वाभिमान

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    भारतीय समाज को जाति व्यवस्था ने इतना दमित और प्रदूषित किया है कि यहां रहने वाला व्यक्ति स्त्री या पुरुष प्रेम स्वतंत्रता का कहकरा भी नहीं समझते। भारतीय समाज समाजिक संस्कारों में प्रेम और स्वतंत्रता जैसे भावों की निरंतरता में भ्रूण हत्या करता चलता है, चला आया है। जिस समाज में इन भावों का ही कोई स्थान नहीं होगा वहां का व्यक्ति न तो सम्मान के बारे में कुछ जान समझ सकता है, न स्वाभिमान के बारे में और न ही लोकतांत्रिक मूल्यों के बारे में।
    समझना छोड़िए वह इनकी कल्पना भी नहीं कर सकता है।
    भारतीय समाज केवल और केवल शोषक और शोषित आधारित व्यवस्था पर चलने वाला दमनपूर्वक चलने वाला समाज है।
    यहां मान सम्मान स्वाभिमान का अर्थ केवल इतना है कि जो जो आपके शोषण तले आते है वह आपसे बराबरी में बात न करे, बराबरी में न खायें पिये, आपके जैसा ओढ़ना खाना पीना रहना न हो। स्वाभिमान पूरे तैश के साथ बरकार रखने के लिए सारे जतन इसी व्यवस्था को बनाये रखने के है।
    यहीं स्वाभिमान अपने से ऊपरी व्यवस्था के व्यक्ति, संस्था पर तुरन्त गायब भी हो जाता है क्योंकि जो व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति का शोषण करता है उसे किसी भी सामाजिक व्यवस्था की कंडीशनिंग या अन्य कंडीशनिंग के कारण जायज ठहराता है चाहे वह अपने ही परिवार की स्त्री बच्चों तक सीमित हो वह अपने से ऊपरी व्यवस्था द्वारा किए गए शोषण को भी स्वीकार करेगा ही करेगा, स्वीकार न करने का कोई सवाल ही नहीं।
    जो समाज दमित हो स्वयं के प्रति एवं अपनो के प्रति ही क्रूर हो वहां अपने निजी स्वार्थों के लिए चापलूसी, धूर्तता ही काम करते है भले ही मान सम्मान अच्छे बर्ताव की पारिवारिक सम्बन्धों में भी कितनी ही परते ओढ़ ली जाये।

    चलते-चलते :-

    और बात ही क्या की हमारे समाज का मान-सम्मान स्वभिमान इतने ऊंचे दर्जे का है कि यह कभी बैंकों की लाइन में चुप-चाप लग जाता है। कभी KYC के नाम पर इज्जत बख़्शी जाती है कभी NRC के नाम पर। कभी अपनी ही मांगो के नाम पर लाठियां पड़ना।
    इसका सबसे ताजा उदाहरण है मोटर व्हीकल एक्ट के नाम पर गुंडागर्दी थोपना उससे भी बड़ी बात इसे स्वीकार कर लिया जाना। गिगयाने, मिमयाने की आदत तो हमें बचपन से ही डाल दी जाती है तो इस सब को भी स्वाभिमान से क्या ही जोड़ना।
    अब ऐसा तो है नहीं कि जो भी शासन प्रशासन है वह कहीं बाहर का हो और हम पर चीजें थोप रहा हो। अब तो हमारी ही बनाई हुई व्यवस्था है तंत्र है दूसरे को तो इसका दोष दिया ही नहीं जा सकता।

    यदि समाज के आपसी संबंध ठीक हो, समाज गुंडागर्दी, शोषण शोषक पर आधारित समाज न हो तो ऐसा शासन प्रशासन अस्तित्व में आ ही नहीं सकता जिस पर अनाप शनाप अधिकार हो, लोगों के साथ अनाप शनाप व्यवहार कर सके, गुंडागर्दी थोप सके।
    चूंकि हम अभिशप्त है शोषक बनने को इसलिए शोषित होने को भी अभिशप्त ही है।

    अपवादों की बात ही क्या की जाये, हममें धूर्तता इतने गहरे में बैठती है कि हर व्यक्ति अपने को अपवाद ही समझता है।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • बच्चे चाहिए हमें — Nishant Rana

    बच्चे चाहिए हमें — Nishant Rana

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    बच्चें हम पैदा करते है
    क्योंकि हमें करने होते है 
    समाज में अपना पुरुषत्व साबित करने को
    अपना स्त्रीत्व साबित करने को
    बच्चे चाहिए होते है हमें
    क्योकिं खोजते है अपनी मुक्ति
    पैदा हुए बच्चे से 
    दिखता है बहुत कोमल नाजुक सा मस्तिष्क जिसमें बींध सके अपने सपने
    निकाल सके अपनी खीज, गुस्सा , झुंझलाहटे
    एक तो ऐसा हो जिस पर समझे अपना पूर्ण अधिकार
    जिसको सुधारा जा सके मारा जा सके जो नहीं सीखता समझता 
    आपकी कहीं हर बात
    क्योंकि अपनी चेतना से भी रख देता है वह अपने पक्ष
    बच्चे चाहिए हमें
    ताकि कुछ मनोरंजन हो हमारा 
    उन पर कविता लिखने में
    उन्हें भीख मांगते देखने में
    उन्हें भूखे मरते देखने में 
    संवेदशीलता की चिपचिपाहट महसूस करने को
    मरें हुए बच्चों की लाशों को इधर उधर सकेरने में
    हम मार देते है निसंकोच बच्चियां
    यदि यह सब देना नहीं उनके हिस्से
    हमें चाहिए बच्चे कि वो बड़े हो
    और वो पैदा करे और बच्चें
    वहीं सब दोहराने को 
    जिसके लिए पैदा किया था उन्हें

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    An engineering graduate; devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • गुड टच बैड टच — Nishant Rana

    गुड टच बैड टच — Nishant Rana

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    भारतीय समाज हजारों सालों से यौनिक नैतिकता का पाठ पढ़ाता आया है। भारतीय समाज अलग अलग तरीकों से, धूर्तता से यौनिकता को सुरक्षित करता आया है.

    हम यौन शुचिता के नाम पर स्त्री को इतना संस्कारित कर चुके है कभी जौहर के रूप में कभी सती प्रथा के नाम पर स्वयं को जलाती आई है। और यदि कोई शारीरिक पीड़ा के कारण ही सही इस संस्कार से बाहर आना चाहती रही उन्हें हम स्वयं ही आग में झोकते आये है।

    यौन शुचिता के नाम पर हमने विधवाओं को भयंकर उत्पीड़न की स्थिति में डाला, यह यौन नैतिकता का ही पाठ था जिसने उन्हें उस स्थिति को स्वीकार करना बनाया। ऐसी स्थिति में भी यदि कोई महिला अपनी शारीरिक जरूरतों के कारण किसी के साथ सम्बन्ध बनाती भी है तब भी वह जो नैतिकता उसके अंदर प्रतिष्ठित है के कारण अपने आप को पाप का भागीदार समझती है, अपनी स्थिति को ठीक समझती है।

    बाल विवाह के रूप में हमने यौन शुचिता के माध्यम से ही गुलामी व यौन शोषण थोपा।

    घर से बाहर निकलने न देने के नाम पर हमारी यहीं कुंठित मानसिकता को मान सम्मान के नाम पर जीना रहा। कपड़े जो शरीर को सर्दी गर्मी धूल मिट्टी शरीर को कुछ आराम सुरक्षा देने के लिए प्रयोग होने थे उन तक में हमने इतनी सेक्स, लैंगिक नैतिकता घुसेड़ दी कि अमूनन तो कोई स्त्री और कई पुरुष इससे बाहर ही नहीं आ पाते यह मानिये जीवन का शायद कोई हिस्सा हमने ऐसा छोड़ा जहां से मस्तिष्क के बच निकलने की कोई संभावना हो।

    हमने अपने ग्रंथों में पूजा पाठ तक में स्त्री को देवी बनाया, उसमें यौन नैतिकता की इतनी गुलामी अपराधबोध भरा की देवी प्रतिष्ठित बातों से अलग जरा भी कुछ कर रही है तो उससे बड़ी पापिन कोई नहीं है। 
    सामाजिक संस्कारों से अलग कोई स्त्री जरा भी जाये या फिर पुरुष की भी उसमें सहमती रही हो लेकिन जैसे ही वह भोग बंद हो या फिर आपको न मिल कर किसी और को मिल रहा हो तो देवी से तो पाप हुआ ही है आप कुल्टा, रण्डी, चरित्रहीन जैसे तमगे जब मनमर्जी किसी स्त्री पर थोप सकते हो.

    गुड टच और बैड टच भी ऊपर की गई चर्चाओं की तरह का ही शारीरिक दैवीयकरण है केवल रैपर अलग है.

    हम यौन शिक्षा पर कभी काम नहीं करेंगे, हम बच्चों के साथ कभी इतने मित्रवत नहीं हो पायेंगे कि वह अपनी परेशानियाँ भी हम से खुल कर कह सके लेकिन बच्चे के खुले मस्तिष्क को भय और यौन कुंठाओं के दलदल में जरुर ले जायेंगे. ऊपर से माता-पिता खासकर माताओं का यह तुर्रा कि हमें भी सिखाया गया है हम पर तो कोई फर्क नहीं. जबकि यहीं फर्क उनका जीवन निर्धारित कर चुका होता है खुद के जीवन को नरक बना चुका होता है. लेकिन उस बात को रुककर देखने, स्वीकार करने को तैयार हो तब न. यदि समाज बच्चों और स्त्रियों के लिए असुरक्षात्मक है, बालात्कारी मानसिकता का है तो गुड टच बैड टच से समाज सही दिशा में कैसे चला जायेगा? समाज में तो हत्याएं भी होती है, चोरी, भ्रष्टाचार और तमाम तरह के अपराध होते है बच्चों को इन सब के आधार पर फिर लड़ने मारने की ट्रेनिंग भी देनी चाहिए; चाकू ,पिस्तौल जैसे हथियार भी देने चाहिए, हर जगह कैमरे लगे रहने चाहिए. ऐसा ही बहुत कुछ होना चाहिए ऊपर जो सब बताया गया है इन तर्क के आधार पर तो फिर वैसा होना भी क्या गलत?

    समाज असुरक्षित है तो इसे असुरक्षित बनाया किसने है, क्यों बच्चों को इतनी नैतिकताओं में रखने के बावजूद समाज कुंठित है, आपराधिक है. यह बहुत ही गंभीर मसला है कि फिर जैसा समाज हमने बनाया उसी समाज के आपराधिक कारणों को आधार बना कर उन सब कारकों को और मजबूत करते रहें जो इस सब की वजह से ऐसे समाज का निर्माण करते हो जहां कोई भी एक दूसरे पर विश्वास न करता हो, भय के माहौल में जीते हो, अपराध बोध, असुरक्षा और यौन कुंठाओं को जीते हो.

    इन सबके पीछे केवल और केवल एक ही बात निकल कर सामने आती है कि पुरुष या माता-पिता की संपत्ति के रूप में स्त्री/बच्चों को प्रयोजित/प्रतिष्ठित किया जाता रहें. स्त्री अपने आप को भोग्या माने, उत्पाद माने, उसका हर एक क्रिया कलाप निर्णय पुरुष के नजरिये के आधार पर हो. हमारे यहाँ पुरूषों को यह बैठा कर नहीं सीखाया जाता है कि तुम्हें स्त्री को नियंत्रित करना है चाहें वह तुम्हारी बहन हो, माता हो, पत्नी हो या बेटी हो. जब हमारे ईश्वर, देवता भी स्त्रियों का शोषण करने के बाद, बालात्कार करने के बाद पूजनीय है, समाज और हमारें दैवीय ग्रन्थों में यौन शुचिता प्रतिष्ठित है, समाज में किसी भी प्रकार का खुलापन है ही नहीं, रत्ती भर भी जगह मस्तिष्क के विकास की छोड़ी ही नहीं जाती तब पुरुष को अलग से कुछ सिखाने की जरूरत ही नहीं रह जाती है, स्वत: ही भोगने वाली, नियंत्रित करने वाली सामंती मानसिकता अपने लिए जगह बनाती चली जाती है.

    चलते-चलते :-

    यौन शुचिता का जाल इतना गहरा हैं कि बहुत सी महिलाएं स्त्रीवाद के नाम पर पुरूषों से नफ़रत करती है और उनके जीवन जीने का आधार एक बार फिर से पुरुष का नजरिया ही हो जाता है.

    हमारे समाज में आपसी संबंधो में प्रेम, मैत्री, सहअस्तित्व, सहजता, स्वतन्त्रता, ज़िम्मेदारी के पनपने की इतनी बारीकी से भ्रूण हत्या की जाती है कि एक तरफ पुरुष स्त्री को केवल यौन रूप से लगातार भोगते रहने की मानसिकता से ऊपर नहीं उठ पाता है और स्त्री अपनी यौन शुचिता से ऊपर नहीं उठ पाती, अपने सम्बन्धों को खुल कर नहीं जी पाती. ऐसा ही समाज में स्त्री पुरुष संबंधो में ईमानदार न हो कर धूर्तता, दिखावे को बहुत बारीकी से प्रेम के नाम पर जीता है कुछ समय बाद एक दूसरे का सर फोड़ता है और इसी प्रकार के संबंधो की चकरघिन्नी चलाये रखता है. इस तरह की मानसिकता में ही किसी समाज में शादी के नाम पर चलने वाली वेश्यावृति, व्यापार, सत्ता लंबे समय तक टिके रह सकते है. एक स्वतंत्र, जिम्मेदार, सामूहिक रूप से अपने कर्तव्यों के निर्वहन करने वाले समाज/संबंधो के बनने का आधार कभी डर नहीं हो सकता. हम जितना अपने भोग के लिए डरेंगे उतना ही तंत्र मजबूत होगा, उतने ही हम झूठे मनोरंजन, नफ़रत में और डूबेंगे और अपने अधिकार, स्वतंत्रता, निर्वहन और भी अधिक मुश्किल हालातों में डालते रहेंगे.

    अपवाद हर जगह है मनुष्य में सोच समझ जागने, किसी भी प्रकार की विकृत मानसिकता से निकलने की सम्भावना भी हर जगह है, यदि हम वास्तव में अपने बच्चों की सुरक्षा, स्वस्थ समाज के लिए प्रतिबद्ध है तब हमें अपने डर, नफ़रत से बाहर आना ही होगा, बहुत कुछ सामजिक रूप से झेलना ही होगा बशर्ते यह सब बिना ढोंग के हो, हम जो है उसे प्रतिष्ठित करने के बजाय उसे ईमानदारी से स्वीकार कर उसका अवलोकन करें, और कोई विकल्प है भी नहीं.
    बाकी यदि किसी को भी लिखा पढने में असुविधा या चोट लगी हो तो क्षमाप्रार्थी हूँ.

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    He is an engineer, social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance.  



  • पहचान — Nishant Rana

    पहचान — Nishant Rana

    Nishant Rana

    मैं खुद ही खुद का हौंसला हूँ
    मैं अकेला ही खुद के लिए खड़ा हूँ
    मैं शौक से लड़ा, मैं खौफ से लड़ा
    मैं भूत से लड़ा मैं भविष्य से लड़ा
    मैं दिन रात सुबहो शाम से लड़ा
    मैं जात धर्म ऊंचनीच भेदभाव से लड़ा
    भारी थी सबसे लड़ाई वो
    जब मैं अपने आप से लड़ा

    जरूरी नहीं इकरंगा हो अकेलापन
    बीतने दो पतझड़ मैं रंग हज़ार हूँ

    केवल न शौर्य की बात हो
    न केवल गर्व की बात हो
    प्रेम की भी बात हो
    सहजता की भी बात हो
    बीती जो लड़ाइयां
    यह न मेरी पहचान हो
    सुबह की लाली की बात हो
    दमकती शाम की धूल की बात हो
    पंछियों की बात हो, नदियों की बात हो
    न हो लड़ाइयां इसकी भी बात हो
    कैसे जिया जीवन
    संबंधों की बात हो।
    सब पहचान से परे
    नितांत अकेले मरने की बात हो

    Nishant Rana

  • EVM बनाम बैलेट पेपर : जनशक्ति लोकतंत्र को किससे कितना ख़तरा

    Nishant Rana

    जीत के बावजूद राहुल गांधी के EVM पर अपना स्टैंड पहले की तरह ही क्लियर करने वाले बयान का स्वागत किया जाना चाहिए।

    हम अपने अधिकार की बात में भी राजनैतिक पार्टियों के भोपू की तरह बजने लगे है! हम भारतीयों की आदत है पक्ष और विपक्ष चुनने की इस चक्कर में कई बार हम अपना पक्ष भूल जाते है। लोकतंत्र और चुनाव किसी भी देश में वहां की राजनैतिक पार्टियों की बपौती नहीं होते है। भारत में भी नहीं है।

    सत्ता के केंद्र में रहने वाले या फिर सत्ता प्राप्त करने वाले लोगों में कितने लोग है जो वास्तव में जनता के लिए सही नीतियां बनाने के लिए आते है। यह तो जन शक्ति है जो हर पांच साल में आपको सत्ता (शक्ति) से बेदखल कर सकती है यदि यह शक्ति जनता के पास न हो तो इन्हीं लोगों में से कितने लोग अपनी ओढ़ी हुई विनम्रता क्या नहीं छोड़ देंगे। शोषण करने में क्या कोई कोर कसर छोड़ेंगे !

    शक्ति के बदलाव की यह ताकत हमें बहुत ही कम समय के लिए कई वर्षों के बाद मिलती है हमारे वोट से, चुनावी प्रक्रिया से। चुनाव ही है जो हमें हमारा सहीं गलत चुनने की आजादी देता है।

    हमारा किसी पार्टी के पक्ष को समर्थन हमें कितना भी सुरक्षित महसूस करवाता हो, भले ही हमारा कितना भी मन करता हो कि चुनाव की जरूरत ही क्या है बस हमारा फलाना नेता ही सदा सदा के लिए बना रहे, लेकिन वास्तविकता यहीं है कि हमें हमारे इस भाव के मजबूत होने की शक्ति भी चुनने और चुने हुए को हटा देने के अधिकार से ही आती है, आप के पास शक्ति है इसलिए आपके भावों को तसल्ली देना या उन कामों को करना जिनके लिए आपने उन्हें चुना है उनकी मजबूरी है। यदि यह अधिकार न हो तो देव तुल्य नेता जी ठेंगा दिखाने में देर न लगायेंगे।

    भले ही हम अपने अपने पक्ष पर बहुत कट्टरता से जुड़े हो, पसन्द ना पंसद के आधार पर रोज एक दूसरे का सिर फोड़ते हो लेकिन यह अधिकार ही हमसे ले लिया जाए या फिर चुनाव होने का चुने जाने की प्रक्रिया में हमें केवल क्या दिखावे के लिए शामिल किया जाए !


    कांग्रेस जब सत्ता में थी बीजेपी ने EVM का खूब विरोध किया बाकायदा किताब तक लिखीं गई लेकिन सत्ता में मौजूद कांग्रेस के कान पर जूं तक न रेंगी। वहीं जब बीजेपी सत्ता में आई तो कांग्रेस ने हार EVM का रोना रोया, भाजपा ने अब EVM को पाक साफ कर दिया।
    अब ऐसा तो है नहीं कि दोनों ही झूठ बोल रहे हो, दोनों ही सत्ता का स्वाद चख चुके है सो EVM में क्या खेल हो सकता है को भी करीब से जानते होंगे तभी तो सत्ता प्राप्त होते ही EVM दोनों पार्टी के लिए सही हो जाती है और सत्ता जाते ही पहला शक EVM पर जाता है।

    लेकिन हम क्या अपनी शक्ति के लिए क्या केवल राजनैतिक पार्टियों के विरोध या सवाल करने तक ही सीमित है!

    EVM के पक्ष में कुछ और भी तर्क सुनने को मिलते है जिन्हें सुनकर लगता है कि यह लोग अभी जानते ही नहीं है कि भारत में वोटिंग में क्या क्या होता है या जानबूझकर आंख बंद रखना चाहते है, आइए देखते है ऐसे ही तर्कों के पीछे कितनी गहराई है या केवल एक सतही बातों को बहुत बड़ा करके पेश किया जा रहा है-

    वोट गिनने की सहूलियत को बार बार गिनाया जाता है

    पूरी चुनावी प्रक्रिया कई महीने चलती है क्या उतने दिन बिना परेशान हुए लोग काम करते है।
    पुलिस में सिपाही पूरा पूरा दिन भाग दौड़ वाली पब्लिक डीलिंग वाली ड्यूटी करते है। सेना के जवान और न जाने कितने विभागों के लोग दिन रात एक करके अपने अपने काम करते है। 
    यदि फिर भी लगता है कि वोट गिनना जिस भी विभाग के जिम्मे आता है बहुत भारी काम है तो इसके लिए अलग से वैकेंसी निकाली जाए। आप 1000 जगह निकालिए लाखों आवेदन न आए तब कहियेगा।
    और जब किसी भी देश के लिए चुनाव और चुनावी प्रक्रिया का एक दम निष्पक्षता से होना बहुत ही गंभीर मसला हो तो थोड़ी बहुत देर होने में भी क्या बुराई है।

    बैलेट पेपर पर बूथ कैप्चरिंग होती थी 

    जो समय के साथ बहुत हद तक सुधर चुकी थी लेकिन सबको पता है बूथ कैप्चरिंग, फर्जी वोटिंग EVM पर भी वैसे ही होती है। बैलेट पेपर में बदलाव में बहुत ही छोटे स्तर पर किसी विधानसभा क्षेत्र के भी एक आध जगह पर ही सम्भव था।
    EVM पर यह खतरा राष्ट्रीय स्तर पर सभी के सभी बूथ पर सम्भव है (यहां रिमोट कंट्रोल , ब्लूटूथ, हैकिंग जैसी टटपूंजिया चीज की बात नहीं हो रही)

    VVPAT से सुधार संभव है 

    VVPAT भी उन खतरों से सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं देता है जिनकी अभी तक बात होती आई है और यदि गिनती करके ही मिलान करना है तो बैलेट पेपर गिनने में ही क्या बुराई है?
    और यदि गिनती नहीं करनी है, केवल मतदाता को गोली देनी है तो जरूरी नहीं है प्रिंट होकर जो आया हो वहीं इनपुट में गया हो।

    EVM बहुत सुरक्षा में और कैमरों की निगरानी में रहती है
    बैलेट पेपर भी बहुत सुरक्षा और कैमरों की निगरानी में रखे जा सकते है।

    EVM की हैकिंग होने की संभावना बहुत कम है, लेकिन संभावना है। यह पूरी तरह विश्वसनीय नहीं है इस बात को सुप्रीम कोर्ट ने भी अपने निर्णय में माना है।

    टेक्नोलॉजी को नकारना, विज्ञान में पीछे जाना मूर्खता है और जब ऑनलाइन मनी ट्रांसक्शन और ATM में लोगों को भरोसा हो सकता है तो EVM को भी भरोसे मंद बनाया जा सकता है

    दोनों की तुलना नहीं की जा सकती। दोनों बिल्कुल अलग चीजे है।मनी ट्रांजेक्शन फ्रॉड पकड़ में आ जाता है क्योंकि  हमें पता होता है कि अकॉउंट में कितना रुपया है, ट्रांजेक्शन हिस्ट्री का रिकॉर्ड रहता है। जबकि EVM में जो भी  संख्या दर्ज हों रही है उसका पता नहीं चल सकता कि डिजिट किस तरह मूव कर रही है या अंको को किस तरह से मूव करने के लिए प्रोग्राम किया गया है। 
    बैलेट पेपर पर आपको पता है आपका ठप्पा कहीं लग गया तो लग गया। अब कोई पूरा बैलेट बॉक्स ही बदले तो अलग बात है। पूरा बैलेट बॉक्स बदला जा सकता है तो EVM भी बदली जा सकती है।
    लेकिन EVM आपको भरोसा नहीं दे सकती कि आपने जो बटन दबाया है वोट वहीं दर्ज हुआ हो।
    मत दर्ज करने से लेकर परिणाम तक के बीच का छिपाव ही इसका प्रयोग लोकतंत्र के लिए बड़ा खतरा बनता है.
    और EVM को इससे अधिक पारदर्शी बनाने का मतलब है मतदाता या चुनाव की गोपनीयता को भंग करना.
    EVM का प्रयोग न करने को विज्ञान में पीछे जाना ऐसे जता दिया जाता है जैसे केवल EVM के प्रयोग न करने के कारण सीधे पाषाण युग में पहुँच जायेंगे। विज्ञान में आगे बढ़ना है तो EVM भी क्यों सीधे मोबाइल आदि से ही मताधिकार का प्रयोग हो जाया करे इतने तामझाम की भी क्या जरूरत है !
    वोटों की गिनती के अलग EVM कोई नई सहूलियत नहीं देता है।
    और केवल गिनती की सहूलियत के लिए लोकतंत्र पर खतरे को नजरंदाज तो नहीं ही किया जा  सकता है.

    चलते-चलते :-

    असल सवाल तो EVM पर हमारा होना चाहिए। भाजपा को सौ साल तक हम चुने या कांग्रेस मुक्त भारत हम करे यह अधिकार जनता के पास हमेशा रहना चाहिए लेकिन जब एक चीज निष्पक्षता, स्पष्टता पर हमें शक है भले ही हमारी मूर्खता के कारण हमें शक है, हम नहीं हुए उतने डिजिटल की मशीन में घुस कर देखे कि कौन से प्रोग्राम चिप किस तरह से काम कर रहे है, एक एक वोट पर डिज़ाइन है या फिर सौ-हज़ार या फिर जो भी संख्या निर्धारित है की वोट संख्या के बाद हर तीसरे या पांचवे वोट पर प्रोग्राम किया हुआ है. चिप ही तो है किसी भी तरह से किसी भी संख्या के बाद से प्रोग्राम कि जा सकती है।
    हो सकता है इलेक्शन कमीशन के प्रमुख तक को न पता हो कहाँ क्या कैसे कब डिज़ाइन किया हुआ है, तब उस चीज को जबर्दश्ती हम पर थोपने का कारण क्या है !

    Nishant Rana


    Nishant Rana

  • गाँव बंद

    गाँव बंद

    Nishant Rana

    भारत में अधिकांश बंद राजनैतिक पार्टियों द्वारा दूसरी पार्टियों के विरोध में लगाए जाते रहे है या फिर व्यपारियों द्वारा अपने हित को साधने के लिए। व्यपारी वर्ग भले ही जीवन भर एक ही राजनैतिक पार्टी को वोट देता रहे लेकिन सरकारी नीतियों में अपने हितों में जरा भी चूक देखता है तो हड़ताल या बंद के द्वारा अपनी बात रखता है।

    उस भारत बंद का मतलब होता है केवल शहर बंद गांवों में इस तरह की बंद की खबरे भी पहुँच जाए तो वह बहुत है। गांवों में राजनैतिक पार्टियों या व्यपारियों के आह्वान पर बंद नहीं होते आए है।

    यहां व्यापारी वर्ग से मतलब उत्पादन करने वाले वर्ग से नहीं है। किसान-मजदूर वर्ग उत्पादन से सीधा जुड़ा है लेकिन इन्हें व्यापारी ही नहीं माना जाता रहा क्योंकि हमारे यहां किसान प्राकृतिक संसाधन, घर , सोंझ , पशु धन, खाने पीने के मामले में बहुत समर्द्ध हो सकता है लेकिन रुपए वाले बाजार में उसे लगातार कमजोर और लूटा ही गया है। और हमारे समाज के अनुसार व्यापारी वह होता है जो लोगों को मूर्ख बना सके, शोषण कर सके तिगड़म बाजी कर के रुपए बना सके।

    इस तरह के शोषण एवं लूट के लिए हमारे समाज बाकायदा प्रशासन वर्ग और पूंजीपति वर्ग का मिला जुला सिस्टम दिखाई पड़ता है। खास जाति वर्गों के लिए इस सिस्टम में एंट्री जल्दी है बाकी जातियों के लिए वह थोड़ी दुश्वर है। (फिलहाल लेख का विषय यह नहीं है।) सिस्टम के अंदर कोई भी हो अंततः वह उस तंत्र के हिसाब से ही कार्य करता है, जिसके लिए तंत्र बनाया गया है। इस बात को इस तरह से समझा जा सकता है कि फांसी लगाने वाला जल्लाद कितना भी अच्छे मन का व्यक्ति लेकिन उसे उस सिस्टम का हिस्सा रहना है तो उसे अपनी संवेदंशीलता लगातार खत्म करते हुए तंत्र के कहने पर बिना सोचे समझे तख्ते पर आए व्यक्ति को फांसी देनी ही देनी है।

    किसान और मजदूर यह सब नहीं करता वह बाजार को उत्पाद बेचते हुए भी हाथ जोड़ता है और खरीदते हुए भी शोषण ही करवाता है। चूंकि वह लगातार उत्पादन करता है। बाजार जाता है इसलिए उसके शोषण की गति कम दिखाई देती है जबकि व्यापारी वर्ग तेजी से फलता फूलता जाता है।

    दूसरी हड़ताल अधिकतर सरकारी कर्मचारियों द्वारा अपने वेतन-भत्ते, सुविधाओं आदि को बढाने के लिए की जाती है।

    सरकारी नौकरी हमारे यहां कैरियर का ही पर्याय हो चुकी है क्योंकि किसान-मजदूर लोगों की सेवा नीति निर्धारण के लिए, कामों के प्रबंधन के लिए रखा जाता है उनके पास अनन्तः कुछ नहीं बचता लेकिन जिन्हें उन्हीं के उत्पादों से निकली तनख्वाह पर रखा जाता है वह उसी किसान मजदूर वर्ग को गांव के आदमी को कीड़ा मकोड़ा समझते है। एक अदना सा कर्मचारी भी किसान को गरियाने एवं शोषण करने के अधिकार रखता है। तनख्वाह के मामले में भी वह कंपनी के मुख्य मालिक (किसान-मजदूर) वर्ग से तुलनात्मक रूप से कई गुना का अंतर है। सुविधाओं में कई गुना का अंतर है। जबकि जिनके लिए इन्हें मुख्यत: काम पर रखा जाता है वह सब लगातार उत्पादन एवं लाभ के मामले में माइनस की स्थिति है।

    चलते-चलते :

    इस तरह के कुतर्क लगातार दिए जाते है कि देश की अर्थव्यस्था पूंजीपतियों , व्यापारी वर्ग के टैक्स आदि से चलती है। तुर्रा यह है कि देश को यहीं चला रहे है।
    गांव बंद का समर्थन सबसे अधिक इन्ही कुतर्कों की वजह से है यदि देश की अर्थव्यस्था की इनके टैक्स से चल रही है तब इनका पूरा का पूरा व्यपार ही गांवों की लूट पर खड़ा है उसका क्या ! किसान मजदूर वर्ग भी अपनी सभी खरीद पर डायरेक्ट नहीं तो इनडायरेक्ट टैक्स चुकाता ही है। व्यपारी वर्ग अपने चुकाने वाले टैक्स को भी इन्हीं लोगों से अपने लाभ रूप में वसूलता है जबकि किसान को ऐसी कोई सुविधा नहीं है।
    लूटतंत्र में शामिल लोग मोटी चमड़ी के लोग है अपने पूर्वाग्रहों में मस्त रहते है। उनके लिए लोगों की जागरूकता का मतलब है कि जिन राजनैतिक पार्टियों को लाभ के लिए वह वोट देते है लोग भी जाग्रत हो कर उनकी इसी बात का अनुकरण करे एवं उन्ही नीतियों का समर्थन करे जिनसे केवल उन्हें लाभ पहुँचता हो। कभी वह इस पक्ष के बारे मे सोच ही नहीं सकते कि जो निर्माता है वह सबसे अधिक लाभ की स्थिति में होना चाहिए।
    गांव बंद इसलिए ही होने चाहिए ताकि यह स्थिति साफ हो कि आप गांवों की वजह से है न कि गांव आपके वजह से।
    शहरी चकाचौंध में मुंदी हुई आंखों को खोलने का और कोई रास्ता भी नहीं है। भूखें मरने की चिंता न कीजियेगा किसान आपको अपनी न्यूनतम संवेदनशीलता में भी भूखा नहीं मरने देगा।

    Nishant Rana

    Nishant Rana


  • पुनर्जन्म

    पुनर्जन्म

    Nishant Rana
    Director and Sub-Editor, 

    Ground Report India (Hindi)

    मेरा पहला पुनर्जन्म था 
    जब मैंने तोड़े थे बंधन बोल के
    महीनों की चुप्पी के बाद रोया 
    था पूरी जान से।

    उसके बाद मैं मरता रहा निरन्तर बिना किसी जन्म के
    मरता रहा किसी धर्म के नाम पर खुद को बांध कर
    कभी जाति के नाम पर बांध कर। 
    संस्कार, मूल्य जो मेरे नहीं थे वे भी मारते रहे मुझे निरन्तर
    मोक्ष, ईश्वर, प्रेम के नाम पर भी जिया मैंने
    मरे हुए नामों को।

    मेरा दूसरा पुनर्जन्म था
    जब मैंने देखा इन सब सड़ांध मार चुकी चीजों को अपने जीवन में।
    यह जन्म आसान न रहा वर्षों जमी हुई फंगस रेशे दर रेशे निकलनी थी
    डराते हुए
    स्व को पार करती हुई।

    खुद के खालीपन, भावुकता के छलावों का सामना कब आसान था,
    कौन चाहता है खुद को क्रूर कहलाना।
    मैंने फिर मृत्यु को जिया,
    जब मैंने चाहा खुद को वह बनते देखना जो मैं नहीं था
    और अपने उन सब व्यक्तित्व से लड़ना जो मैं था।

    मेरा तीसरा पुनर्जन्म था
    जब मैंने देखा कि केवल विचार पुनर्जन्म की सिद्धता नहीं है 
    न ही केवल कर्म। 
    समझ और कर्म दोनों संग-संग के साथी
    एक भ्रम है दूसरे के बिना 

    मैंने फिर मृत्यु को जिया
    जब मैंने मान लिया कि मेरा हर पुनर्जन्म झूठा था।

    मेरा चौथा पुनर्जन्म था
    जब मैंने देखा इस मृत्यु में छिपे सच को,
    इस पुनर्जन्म में महसूस हुए हर सांस पर होने वाले पुनर्जन्म।
    हर पल नए होते सूरज, धूप, धरती।
    नए जीवन में सृजित होते पानी, हवा, पत्ते।

    याद आया किसी बुद्ध ने कहा था कुछ भी अंतिम सत्य नहीं हैं
    इस पुनर्जन्म में जिया मैंने अपने बारम्बार शून्य होने को।

    Nishant Rana

    Nishant Rana

    Social thinker, writer and journalist. 

    Devoted to the perpetual process of learning and exploring through various ventures implementing his understanding on social, economical, educational, rural-journalism and local governance. 



  • धरती और इंसान

    धरती और इंसान

    Nishant Rana[divider style=’right’]

    जला देना हर एक उस पेड़ को
    जो तुम्हारे कहने से मनचाहा फल न दे।

    भाप बना कर उड़ा देना हर वो नदी
    जो तुम्हारे कहने पर दिशा न बदले।

    भून देना हर एक उस पंछी को , पशु को 
    जो तुम्हारे तलुए न चाटे,
    जो दुम हिला के हाजिर न हो तुम्हारी
    एक आवाज पर।

    जहर घोल देना उस हर हवा में जो तुम कहो
    पूरब और पच्छिम को चलें।

    कतरा कतरा कर देना किताब के
    हर उस पन्ने का
    जो हर्फ़ दर हर्फ़ वो न कहती हो
    जो तुम सुनना चाहों।

    तलवार, कट्टे , लाठी, छुरी
    सब हथियारों से लैस होकर चलते रहो।
    और मारते रहो हर एक उस आदमी को
    जो जरा सा भी असहमत हो तुमसे।

    तब तक मत रुकना जब तक धरती से
    आखिरी आदमी खत्म न हो जाए,
    हवस मिट न जाए अपनी हर बात
    सही साबित करने की।

    धरती को जरूरत भी नहीं इंसानों की।