पुनर्जन्म

 Nishant Rana मेरा पहला पुनर्जन्म था जब मैंने तोड़े थे बंधन बोल केमहीनों की चुप्पी के बाद रोया था पूरी जान से। उसके बाद मैं मरता रहा निरन्तर बिना किसी जन्म केमरता रहा किसी धर्म के नाम पर खुद को बांध करकभी जाति के नाम पर बांध कर। संस्कार, मूल्य जो मेरे नहीं थे वे भी मारते रहे मुझे निरन्तरमोक्ष, ईश्वर, प्रेम के नाम पर भी जिया मैंनेमरे हुए नामों को। मेरा दूसरा… Continue reading

धरती और इंसान

Nishant Rana[divider style=’right’] जला देना हर एक उस पेड़ को जो तुम्हारे कहने से मनचाहा फल न दे। भाप बना कर उड़ा देना हर वो नदी जो तुम्हारे कहने पर दिशा न बदले। भून देना हर एक उस पंछी को , पशु को  जो तुम्हारे तलुए न चाटे, जो दुम हिला के हाजिर न हो तुम्हारी एक आवाज पर। जहर घोल देना उस हर हवा में जो तुम कहो पूरब… Continue reading

किसानों की जमीन पूंजीपतियों द्वारा जबर्दस्ती छीनी जाती है या हम किसान को मजबूर कर देते है ऐसा करने पर

Nishant Rana[divider style=’right’] आए दिन हम सुनते रहते है की कोर्पोरेट किसानों की जमीन हथियाती जा रही है इसके आगे भी यह सुनते है कि  सरकार जोर जबर्दस्ती पूंजीपतियों को किसान की जमीनों पर कब्जा दिलवा रही है। इसके लिए हम दूर दराज के क्षेत्र, जंगलों आदि के बारे में की-बोर्ड पर बैठे तुक्के मारते रहते है क्योकि पुलिस फौजों के फोटो गाहे बगाहे हमारे सामने को निकलते रहते है… Continue reading

सामूहिक नेतृत्व बनाम गरियाने की आजादी

Nishant Rana हमें अपने खांचे इतने पसंद है कि जो हमारे खांचों में फिट बैठता है बस वहीं भगवान का दूसरा रूप है जो हमारे खांचों से अलग है उसे केवल इसलिए गालियां देंगे की हमारे खांचे वाला ऊपर दिखाई दे। आजादी के समय सबका योगदान था भगत सिंह, आजाद , गांधी , अम्बेडकर , नेहरू , सुभाषचंद्र आदि आदि। इन सभी को आज खेमे में बांट दिया गया है… Continue reading

किसान और अर्थव्यवस्था

वह भी समय ही था जब स्कूल-कॉलेज नहीं थे, बैंक नहीं थे, थे भी तो किसान की पहुंच से दूर थे।बिना स्कूल जाए लोग खेती किसानी करना सीखें, मौसम के हिसाब से फसलों का चुनाव करना सीखें, एक दूसरे की सहायता की, समूह बनाए जितना प्रकृति से लिया उसे बढ़ा कर ही लौटाया। बच्चों का रिश्ता प्रकृति, पशुओं से सहज रूप से अपने आप ही जुड़ता चला जाता। खेतीं किसानी… Continue reading

बूचड़खाने –

25-30  साल पहले तक तो किसानों के लिए पशु-पालन कोई मुश्किल काम न था , पशुओं के लिए बड़े चारागाह छोड़े जाते थे, उसी में तालाब भी खुदवाएं जाते थे। पशु चरते, तालाब कीचड़ आदि में आराम फरमाते। दुधारू पशु समय पर अपने खूंटे तक भी पहुँचना समझते थे। किसान ने बाजारों से दूरी बनाई हुई थी। आपसी ताल मेल और निर्भरता इतनी बेहतर थी की मशीनरी आदि की जरुरत… Continue reading

अपने लिए ही हिंसा के जाल बुनते हुए हम

आज जिस समाज में हम खड़े है हमारे चारों तरफ भय और हिंसा का माहौल है , किसी भी कीमत पर एक दूसरे को पीछे धकेल कर आगे बढ़ने ही होड़ मची है . हजारों सालों में हिंसा को इतना सूक्ष्म किया है की हमारा दैनिक जीवन जाने अंजाने  बिना किसी का भोग किये , शोषण किये आगे ही नहीं बढता और जब जब इस हिंसा में विस्फोट हुआ है… Continue reading

सामाजिक नेतृत्व और अवतार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में पांच पार्टियां मुख्य है कांग्रेस, भाजपा, सपा ,बसपा और लोकदल। पिछले कई सालों से सपा और बसपा ने ही प्रदेश की  राजनीति में मुख्य धमक रखी, पिछले लोकसभा चुनाव को देखते हुए भाजपा भी राजनैतिक सत्तात्मक लड़ाई में दोबारा दावेदारी ठोक चुकी। लोकदल व कांग्रेस प्रदेश की राजनीति में अस्तित्व बनाये रखने के लिए ही जूझते दिखे। खैर पोस्ट के विषय पर आते है –… Continue reading