बासी पुर्जे

Shayak Alok

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अपनी कविताओं के लिए अजूबे बिम्ब ढूंढती उस लड़की से मैंने एक दिन कहा कि देहराग में डूबा एक प्रेम-सना बिम्ब मेरी ओर भी भी उछाल दो तो उसने कहा कि मेरी जंघाओं के संधिस्थल पर तुम अपना मस्तक रखो और मैं तुम्हें जन्म दूंगी ..

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उसने कविताओं को एक क्षण को विराम कहा और मेरी आँखों में अपनी आँखें उतारते हुए पूछा- और तुम्हारे पास मेरी ओर उछालने को कौन सा बिम्ब है .. मैंने कहा, मैं तरबूज के लाल तिकोन टुकड़े से तुम्हारी नाभि के ग्यारह गोल चक्कर लगाऊंगा ..

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उसकी नाभि का वह मेरा ग्यारहवां चक्कर था जब उसने भूख की बात की .. फिर मैं अपनी कविता में आग और चुल्हा ले आया, वह ले आई अपनी कविता में स्वर्ण-चमकते गेहूं से भरा खेत ..

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भूख मिट गई थी जब वह अपनी कुछ पुरानी कविताएं निकाल लाई और उनके सारे बिम्बों पर नए शब्दों में पुनर्विचार करने लगी .. मैंने कहा कि लोकबिम्ब पर विचार करो तो पेट भरने के बाद बिस्तर को पीठ पर डाल आराम करना चाहिए.. वह मुस्कुराई .. कहा- और मेरी आत्मा की भूख का क्या ? .. मैं हँस पड़ा .. मैंने कहा कि यह कविता के बीच में तुम एक चलताऊ बिम्ब ले आई हो .. उसे तुरंत कोई दूसरा बिम्ब नहीं सूझा तो वह गुनगुनाने लगी – सूरज को धरती तरसे, धरती को चंद्रमा .. धरती को चंद्रमा ..

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पूर्णविराम से हम शुरू करेंगे अपना प्रेमालाप, तुम अपने दांतों से मेरी जीभ पर कोई निशान अंकित करना ..मैं अपनी चीख तुम्हारे कानो की दोनों बालियों पर टांग छोड़ दूंगा.. मेरी ऊँगली के पोर पर अटकी हवा जब तुम्हारे गर्दन पर से गुजरेगी, तुम गुनगुना पड़ना और तुम्हारे गले में घुटी रह गयी इस्स-इस्स-सिसकी मैं तुम्हारे अधरों तक खिंच लूँगा.. | … इसी एक ठहरे हुए पल मैं अपनी आँखों से तुम्हारी आँखों को कहूँगा कि इस प्रेमालाप में आये पहले लौटते अर्द्धविराम पर ही फिर जीभ तुम्हारी होगी .. और दांत मेरे …

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मेरी हथेली की दो समानांतर रेखाओं के बीच जहाँ तुम अपने अधर छोड़ गयी थी न वहीं एक त्रिभुज उग आया है… उस त्रिभुज की किसी तीसरी दीवार के किसी एक कोने में एक जो सुरंग खाली रह गयी थी न वहीं उसी मुहाने पर दीवार से अपनी पीठ सटा मैं बैठ गया हूँ…सुरंग में जब जब निर्वात बनता है मैं जोर से तुम्हारा नाम पुकार लेता हूँ और तुम्हारी खुशबू से सुरंग भर आती है…जिस दिन तुम भी जोर से पुकार लोगी मेरा नाम उस दिन तुम्हारी गंध मेरी हथेलियों से आने लगेगी …

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वह जो तुम्हारी पेंटिंग में बर्फ का पहाड़ था, पिघल गया है…पहाड़ के पीछे का ललमुँहा सूरज माथे पर बरस रहा है…तुम्हारी चिट्ठियों पर चीनी के दाने हैं, चीटियाँ सदियों तक यहीं जीने मरने के गीत गायेंगी .. रुमाल पर रखे तुम्हारे बासी लब पर पिछली रात फफूंद उग आये..और मैं.. मैं और मेरी उबासी अब तक खूंटी से टंगे हैं. लौट सको तो ठीक वरना गुजरती हवा के बैरंग से अपनी ज़रा गंध भेजना.

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