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  • माओ त्से-तुंग वाले मसले पर एक और उठापटक-बेबाक-लेख – जो गंभीर हैं, लोकतांत्रिक दृष्टि रखते हैं, उनको लेख खराब न लगेगा

    सामाजिक यायावर

    भारत में कस्बाई व शहरी लोग अंग्रेजी भाषा को पहली कक्षा से पढ़ना शुरू कर देते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में छठवीं कक्षा से अंग्रेजी शुरू होती थी। अब तो खैर हर गली नुक्कड़ में अंग्रेजी मीडियम व तथाकथित अंतर्राष्ट्रीय स्कूल खुल गए हैं। पहली कक्षा से बारहवीं तक अंग्रेजी भाषा-विषय के रूप में साथ चिपकी रहती है। स्नातक में भी अंग्रेजी भाषा को सामान्य विषय की तरह उत्तीर्ण करना पड़ता है। इंजीनियरी जैसी प्रोफेशनल डिग्रियों की पढ़ाई तक में अंग्रेजी एक विषय की भांति चिपकी रहती है, वह भी तब जबकि डिग्री की पढ़ाई लिखाई तो अंग्रेजी में ही होती है।

    अंग्रेजी हमारी सामान्य बोलचाल की भाषा में भी समाहित है। गावों के निरक्षर लोग भी अपनी भाषा में बिना जानकारी के अंग्रेजी के कई शब्दों का प्रयोग करते हैं। कुल मिलाकर मतलब यह कि अंग्रेजी हमारे सामाजिक जीवन में रचीबसी हुई है। जो अंग्रेजी बोलता है उसको संभ्रांत व योग्य मान लिया जाता है। अंग्रेजी में संभ्रांतता, योग्यता, क्षमता व शक्ति निहित मानी जाती है।

    इतना सब होने व बचपन से पढ़ाई पूरी करने तक मतलब लगातार कम से कम लगभग 15 वर्षों तक अंग्रेजी पढ़ने बोलने व लिखने के बावजूद गंभीर अंग्रेजी को पढ़ने समझने बोलने व लिखने में अच्छे-अच्छे पुरोधा पानी मांगते हैं, जबकि अंग्रेजी बहुत समृद्ध व परिष्कृत भाषा नहीं है। जो अंग्रेजी से स्नातक, परास्नातक किए होते हैं उनकी भी हालत कमोवेश ऐसी ही होती है। अपवादों की बात अलग है, अपवाद नियम बनाते भी नहीं हैं।

    आप माओवाद, माओ, साम्यवाद पर बात कीजिए। JNU के लोग मक्खियों की तरह भिनभिनाते हुए आ जाएंगें। उनमें से बहुतेरे तो फूहड़ तरीके से धमकाएंगे कि JNU के हैं इसलिए चीन, माओ, माओवाद, साम्यवाद को समझते हैं। भिनभिनाते हुए आपके साथ सड़कछाप, सड़ियल, सतही, बेशर्म व बेहूदा व्यवहार करेंगे, शाब्दिक गुंडई करेंगे।

    JNU छोड़िए जो JNU की कैंटीन में जाकर चाय पी लेता है, जो उसकी चहारदीवारी को छू लेता है या कभी उसकी बाहरी दीवारों में सटकर पेशाब भी कर आता है वह भी अपने को विचारक, चिंतक, विद्वान व सामाजिक मसलों का विशेषज्ञ मान लेता है।

    इसलिए JNU या JNU के जैसे ठेकेदारों से मेरा फिलहाल इतना ही कहना है कि गंभीर बात कीजिए। JNU एक बौद्धिक सामंतवादी संस्थान है। कोशिश कीजिए कि JNU-वादी सामंती सोच से बाहर आकर आदमी की तरह बात कीजिए, तहजीब व तमीज से बात करने का प्रयास कीजिए।

    JNU भारत को लोकतंत्र, अभिव्यक्ति का स्वातंत्र्य, मानवाधिकार आदि मूल्य सिखाता है, भारत के लोगों को जीवन जीना JNU सिखाता है, इस प्रकार की नीचता पूर्ण अहंकार से बाहर आकर अपनी बात रखिए।

    आपके व्यवहार से ही JNU का स्तर साबित होता है। पिछले लगभग दो दशकों में, अपवाद प्रतिशत लोगों को छोड़कर JNU के लोगों से बातचीत व चर्चाओं के बाद ही मैं JNU को एक रद्दी यूनिवर्सिटी मानने के नतीजे पर पहुंचा हूँ।

    समय समय पर JNU के ऊपर कई लेख लिखता रहा हूं। आपके अनुसार आपको शोध करने व रिफरेंसेस खोजने की क्षमता योग्यता व धैर्य तो है ही, मेरे इन लेखों की लिंक खोज सकते हैं, सामान्य आदमी हूं लिंक्स बहुत सरलता से मिल जाएंगीं। फेसबुक के कारण ये लेख मैंने बस यूं ही प्रथम दृष्टया ही लिखे थे। चाहेंगे तो गहराई से लिख कर भी आइना दिखा सकने की क्षमता व योग्यता रखता हूं। लेकिन यह सब ऊर्जा बर्बादी है।

    मान लीजिए यदि आप JNU के भी हैं और यदि आपने JNU में चीनी भाषा पढ़ी है, माओ से संबंधित साहित्य भी पढ़ा है तब भी आप अपनी बात सहजता से ही रखिए। ऐसा क्यों कह रहा हूं, यह समझने के लिए आपको आगे की पूरी पोस्ट ध्यान से पढ़ना पड़ेगा।

    पहली बात तो यह है कि चीनी भाषा वर्तमान युग की भाषाओं की सबसे क्लिष्ट, समृद्ध व परिष्कृत भाषाओं में से है। वास्तव में यदि ध्यान से देखा जाए तो चीनी भाषा जैसी कोई भाषा है भी नहीं। चीन में कई भाषाएं हैं लेकिन चीनी भाषा जैसी कोई भाषा नहीं है।  फिर भी आपके JNU-सामंती-बौद्धिक अहंकार की तुष्टि के लिए मान लेते हैं कि चीन की भाषा एक ही है, उसका नाम चीनी-भाषा ही है और आपने JNU से स्नातक/परास्नातक में चीनी भाषा पढ़ी है। आपकी सहूलियत के लिए वह सब भी जो “नहीं है”, उसको “है” ऐसा मान भी लेते हैं तब भी …..

    जब बचपन से पहली कक्षा से हर साल प्रमुख विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ते हुए, स्नातक परास्नातक में, कम्पटीशन की तैयारी करते हुए, इंजीनियरी आदि जैसे कोर्सेस की किताबें अंग्रेजी में पढ़ते हुए, अंग्रेजी फिल्में देखते हुए, अंग्रेजी अखबारों को पढ़ते हुए, सड़क में चलते हुए अंग्रेजी के होर्डिंग्स को देखते हुए, अंग्रेजी जैसी भाषा को ठीक से समझ नहीं पाते तो चीनी भाषा जैसी क्लिष्ट, समृद्ध व परिमार्जित भाषा के विद्वान आप महज दो चार वर्षों में ककहरा टाइप सीखते हुए कैसे हो सकते हैं। फिर चीन में कई प्रमुख भाषाएं हैं जो एक दूसरे से भिन्न हैं।

    भाषा के संदर्भ में एक जरूरी बात और कहना चाहता हूं। जिस भाषा या जिन भाषाओं के संपर्क में बच्चा अपने पैदा होने के दिन से रहता है, वही भाषाएं जीवन भर उस बच्चे की मौलिक भाषाएं होती हैं, भाषाओं के नुक्ते समझ आते हैं, साहित्य समझ आता है।

    पहले हिंदी को ही ठीक से समझना सीख लीजिए, चीनी भाषा पर अपनी विद्वता व विशेषज्ञता की चर्चा फिर कभी कर लीजिएगा, अभी उचित अवसर नहीं है।

    अब JNU के माओ-भक्तों व गैर-JNU के माओ-भक्तों से जो यह मानते हैं कि उनने माओ के बारे में पढ़ा है उनके बारे में भी कुछ खरी-खरी दो टूक बात कर ली जाए। 

    ये लोग इस गलतफहमी में रहते हैं या अपनी कंडीशनिंग के कारण मूर्खता में विद्वता देखते हुए गलतफहमी प्लाँट करते रहते हैं कि दुनिया के लोकतांत्रिक देश (ये लोग इनको साम्राज्यवादी देश कहते हैं) माओ त्से-तुंग के विरोध में सूचनाएं प्लांट करते हैं।

    इन लोगों से मैं यही कहना चाहता हूं कि जनाब आपके भगवान माओ त्से-तुंग ने जैसा भी चीन बनाया है वह बहुत ही वीभत्स-कारपोरेट साम्राज्यवादी देश बनाया है। आपके माओ का चरित्र साम्राज्यवादी था, चीन देश को निहायत ही बर्बर चरित्र का कारपोरेट ही संचालित करता है। चीन का कारपोरेट साम्राज्यवादी देशों के कारपोरेट की तुलना में ज्यादे केंद्रित सत्ता रखता है।

    अपनी सोच, मानसिकता की कंडीशंडनिंग व एक्सपोजर के छोटे-छोटे कुंठित दड़बों से बाहर निकल कर दुनिया को उसकी मौलिकता के साथ बिना पूर्वाग्रहों व अनुमानों के देखने समझने का प्रयास कीजिए। चीन व माओ का यथार्थ समझ पाने की दृष्टि आनी शुरू हो जाएगी। लोकतंत्र बेहतर लगने लगेगा। लोकतंत्र को परिमार्जन की ओर ढाला जा सकता है, माओवाद को कतई नहीं। हिंसा व बर्बरता में परिमार्जन की कोई संभावना नहीं होती, हो ही नहीं सकती।

    जैसे भारत कागज में लोकतांत्रिक देश है लेकिन असल में लोकतांत्रिक देश नहीं है, भारत के लोग अभी लोकतांत्रिक मूल्यों का ककहरा भी नहीं समझते हैं। वैसे ही चीन कागज में साम्यवादी व्यवस्था के देश है लेकिन असल में वीभत्स व बर्बर कारपोरेट साम्राज्यवादी देश है। अब इस बात के लिए रिफरेंस मांगने की मूर्खता न कीजिएगा। क्योंकि यह समझने की बात है, महसूस करने की बात है, एक्सपोजर की बात है, दृष्टि की बात है।

    जो चीन सत्ता के लिए माओ के निर्देशन में अपने ही 7 करोड़ लोगों की हत्या कर सकता है। जो चीन 1989 में अपने ही छात्रों के शांतिप्रिय आंदोलन के खिलाफ कई लाख सैनिक उतार सकता है और चारों तरफ से घेर कर हजारों मासूम छात्रों की हत्याएं कर सकता है।

    वह चीन आपकी यूनिवर्सिटीज में साहित्य, दस्तावेजों व किताबें नहीं प्लांट नहीं करेगा। इसकी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं आप। इसलिए प्लांटेड किताबों व दस्तावेजों के दम पर कूदिए मत। वास्तव में जानने समझने महसूस व दृष्टि विकसित कर पाने के विभिन्न स्तरों पर स्वाध्याय कीजिए, तभी कुछ गंभीर चर्चा कर पाने लायक दृष्टि रख पाएंगे।

    जरूरी नहीं कि सभी लंपट ही हों, सभी खोखले ही हों, सभी सतही ही हों। दुनिया में गंभीर लोग भी हैं, दृष्टिवान लोग भी हैं, ऐसे लोग भी हैं जो सामाजिक मसलों को गहराई से भेद कर देख व समझ लेने की क्षमता व दृष्टि विकसित कर लिए होते हैं।

    चीन व माओ के ऊपर चीन के ही गंभीर चिंतक लोगों ने चीन के ऐतिहासिक दस्तावेजों को पढ़ने समझने, चीन के समाज को नजदीक से जानने समझने के बाद निष्पक्ष भाव से अच्छी किताबें लिखी हैं। यदि आपकी पहुंच, हैसियत व औकात है, इन किताबों का इंतजाम कर पाने की तो इनको पढ़िए। कुछ नहीं तो कम से कम चीन के दूसरे चेहरे का अंदाजा होगा। चीन के लोगों की वैचारिक विभिन्नता के बारे में पता चलेगा।

    जो चीन शांति प्रदर्शन को रोकने के लिए लाखों सैनिक उतार देता हो, जो चीन भविष्य में आंदोलनों की संभावनाएं के भ्रूण को भी खतम करने के लिए अपने ही हजारों मासूम युवा छात्रों को चारों तरफ से घेरकर गोलियों से भून कर हत्याएं करता हो।

    वह चीन स्वतंत्र किताबें व दस्तावेज लिखने की इजाजत देता होगा, इस बचकानी कल्पना को सच मानने वालों के वैचारिक स्तर पर चर्चा करना भी ऊर्जा बर्बादी है। JNU, माओवादी समर्थक, माओ-भक्त व साम्यवाद-माओवाद को एक ही मानने वाले चीन की प्रायोजित व प्लांटेड किताबों, साहित्य व दस्तावेजों के मायाजाल व कंडीशनिंग में सच कितना व किस स्तर का जानते समझते होगें, इसका अंदाजा लगाना बिलकुल मुश्किल नहीं।

    चलते-चलते :

    जो माओ व माओवाद का समर्थक/भक्त है, वह ढोंग चाहे जैसा करे तर्क चाहे जो दे लेकिन अपने वास्तविक चरित्र में निहायत ही हिंसक, बर्बर, फरेबी, झूठा व रक्तपिपाशु है।

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  • बस्तर, छत्तीसगढ़ पर आने वाली पुस्तक का प्रस्तावना अध्याय

    अभी इस विमर्श को छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद वहां के आदिवासी समाज के लिए प्रतिबद्ध, ईमानदार व कल्याणकारी है या नहीं, यह भी छोड़ देते हैं कि बस्तर का माओवाद बस्तर के आदिवासी समाज का प्रतिनिधित्व वास्तव में करता है या नहीं, सबसे बड़ा व महत्वपूर्ण तथ्य कि बस्तर का माओवादी, माओवाद को जानता समझता भी है या नहीं इस विमर्श को भी छोड़ देते हैं। मैं इस किताब में यह विमर्श विस्तार से करूंगा भी नहीं क्योंकि पूर्वाग्रहों से इस विमर्श के दूषित होने का खतरा है, भिन्न पूर्वाग्रहों के लोगों के दावे भिन्न होंगें। मैं इस किताब में बस्तर में चल रहे प्रयासों की तथ्यात्मक चर्चा करूंगा, पुस्तक को पढ़ने के पश्चात आप स्वयं ही बस्तर के माओवाद के संदर्भ में विमर्श कर सकने में सक्षम होंगें, ऐसी आशा मैं करता हूं।

    साम्यवादी विचारधारा को मानने वाले लोगों में यह विरोधाभास रहता है कि वे सत्ता के राजसी ढांचे को साम्यवादी ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति मानते हैं लेकिन सत्ता के साम्यवादी ढांचे को लोकतंत्रीय ढांचे में परिवर्तित होने को क्रांति नहीं मानते हैं, इसे क्रांति न मानने के लिए विभिन्न तर्क देते हैं जबकि यदि देखा जाए तो सत्ता के ढांचों में परिवर्तन की दोनों घटनाओं का चरित्र एक सा है तथा दोनों घटनाएं आम लोगों द्वारा घटित हुईं। यूं लगता है कि क्रांति को स्थापित करने के लिए क्रांति की परिभाषा को पूर्वाग्रह के अनुसार गढ़ लिया जाता है।

    माओवाद के संदर्भ में मूलभूत महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि कैसे एक साधारण व्यक्ति जिसने किसी चीटी को नहीं मारा होता है वह दूसरे व्यक्तियों की नृशंस हत्याएं करने में गौरव का अनुभव करने लगता है, स्वयं को परिवर्तन के महान यज्ञ में आहुति डालने वाला समझने लगता है, कैसे क्रांति में योगदान करने के लिए किसी की भी निर्दोष व मासूम की भी हत्या करने के लिए स्वयं में महिमामंडित करते हुए गौरवांवित महसूस करते हुए स्वीकृति प्राप्त कर लेता है!! आगे की चर्चा ऐसा क्योंकर होता है, समझने में मदद करती है।

    सत्ता को अपरिहार्य मानना तथा सत्ता परिवर्तनों को जिस रूप में प्रस्तुत किया जाता है या जाता रहा है, इस अनुकूलता के अंतर्गत बेहतर व्यवस्था के निर्माण के लिए सत्ता के ढांचों में परिवर्तन ही एकमात्र रास्ता दृष्टिगत होता है, जिसे क्रांति का नाम दिया जाता है जिससे संबद्धित व्यक्ति स्वयं को क्रांतिकारी कहता है। व्यक्ति के विचार, सोच व मानसिकता की अनुकूलता यूं कर दी जाती है कि व्यक्ति यह मानने लगता है कि वर्तमान व्यवस्था नष्ट करने से बहुत अधिक अव्यवस्था होगी जिसका उपयोग वर्गविहीन सामाजिक व्यवस्था में किया जा सकता है। वर्तमान व्यवस्था को भी अव्यवस्था ही माना जाता है। वर्गविहीन आदर्श सामाजिक व्यवस्था के निर्माण व निर्माण प्रक्रिया में लोगों की हत्याएं होना व करना तो महान क्रांति के लिए आहुति मात्र ही हुईं।

    क्रांति का सबसे भयावह तथ्य यह है कि वर्तमान में जीवन जीने वाले मनुष्यों के जीवन का मूल्य, भविष्य के अजन्में मनुष्यों के जीवन मूल्य की तुलना में नगण्य है, कमतर है। इतना नगण्य है कि जीवित मनुष्य के जीवन की हत्या, भविष्य के काल्पनिक मनुष्य के आभासी बेहतर भविष्य के लिए करते हुए, गौरव महसूस किया जा सकता है।

    भविष्य अनिश्चित होता है। काल्पनिक भविष्य के लिए वर्तमान की बलि चढ़ाना प्रपंच, तर्क-छद्म व प्रवंचना से इतर कुछ भी नहीं। क्रांतिकारियों को भविष्य के प्रति इतना निश्चिंत-विश्वास कैसे हो सकता है, वर्तमान में हत्याएं करते हुए, भय स्थापित करते हुए, मनुष्य की स्वतंत्रता को बाधित करते हुए कैसे भविष्य में मानवीय व्यवस्था का दावा कर देते हैं? क्या हिंसा करना, हत्या करना, हथियार का प्रयोग करना, भय स्थापित करना इत्यादि से भविष्य को देख सकने व महसूस कर सकने की दृष्टा क्षमता विकसित होती है?

    माओवाद अच्छा हो सकता है, आदर्श हो सकता है, किंतु हिंसा आदर्श नहीं हो सकती, हिंसा अच्छा नहीं हो सकती, हिंसा अनुचित है, हिंसा अस्वीकार्य है, हिंसा प्रवंचना है, हिंसा आत्मछल है। अहिंसा उचित है, अच्छा है, इस तथ्य को कोई भी मनुष्य अस्वीकार्य नहीं कर सकता। माओवाद मनुष्य को मतवादी के रूप में बेसुध करके हिंसक बनाने व हिंसा करने में गौरवांवित महसूस करने की आत्म-प्रवंचना की ओर ढकेलता है। ऐसा मनुष्य बिना हिंसा के नहीं रह सकता, क्रांति के नाम पर ऐसा क्रांतिकारी मनुष्य हिंसा करता है, जो अनुचित है व अस्वीकार्य है।

    ऐसी क्रांतियां मात्र प्रतिक्रियाएं होती हैं, विपक्षी होने की प्रतिक्रियाएं, प्रतिक्रियाओं की प्रतिक्रियाएं। प्रतिक्रियाओं की शृंखला से इतर कुछ भी नहीं। प्रतिक्रियाओं, कल्पनाओं व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति वस्तुतः क्रांति हो ही नहीं सकती, इसे भले ही इसे कितना भी जोर लगाकर क्रांति का नाम दिया जाए।

    कल्पना व आभासी भविष्य पर आधारित क्रांति को कितना ही महिमामंडित किया जाए, कितना भी सुसंगत तर्क दे लिए जाएं, कितने भी ऐतिहासिक प्रमाणों से मेल खाती हो, समानता नहीं ला सकती है। इसको यूं समझने का प्रयास किया जाए कि कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से विश्व को बचाना चाहते हैं, कुछ लोग अपनी पद्धति व विचार से। बेहतर व आदर्श व्यवस्था बनाने के नाम पर एक दूसरे की परस्परता को खंडित करते हैं, एक दूसरे के अस्तित्व को जड़ सहित समाप्त करना चाहते हैं। जबकि वास्तव में इनमें से किसी को भी बेहतर समाज का निर्माण करने की अभिलाषा नहीं होती है वरन अपनी-अपनी कल्पना के अनुसार व्यवस्था को मनचाहा आकार देना चाहते हैं, ऐसा कर पाने के लिए हिंसा, शक्ति, सत्ता, प्रपंच, छल, छद्म इत्यादि का प्रयोग करते हैं। कल्पना विलगाव पैदा करती है, दूसरे समूह व व्यक्ति को निम्न स्तर का मानती है।

    यह क्रांति केवल सत्ता पर एक समूह के स्थान पर दूसरे समूह को स्थापित कर देती है। नया सत्ताधारी समूह विभिन्न सत्ताओं को अपने अधिकार में कर लेता है। फिर एक नया उच्च वर्ग बनता है जो विभिन्न प्रकार के विशेष अधिकारों से स्वयं को शक्तिशाली बनाता है। क्रांतियों के नाम पर विभिन्न स्तरों पर व तौर-तरीकों से इसी प्रक्रिया का दुहराव चलता रहता है। सत्ता-क्रांति कभी भी विषमता न तो कभी नष्ट करती है और न ही नष्ट करने की अभिलाषा व क्षमता ही रखती है। सत्ता-क्रांति महत्वपूर्ण बन पाने का वंचना तंतु है, संपूर्ण रूप से प्रतिक्रिया या प्रतिक्रिया की शृंखला पर आधारित। प्रतिक्रिया संघर्ष उत्पन्न करती है तात्पर्य कभी समाधानित न होने वाला वैमनस्य व हिंसा, परस्परता की हत्या। इस प्रकार की क्रांति सार्थक, मानवीय व समता वाली कैसी हो सकती है?

    मोटे तौर पर वर्तमान साम्यवाद पूंजीवाद के विरोध पर आधारित है। साम्यवाद में आर्थिक समता की कल्पना परोसी जाती है, कल्पना परोसना इसलिए कह रहा हूं क्योंकि गहराई से समझने पर साम्यवाद का चरित्र भी पूंजीवादी चरित्र का ही है। साम्यवाद का पूंजीवाद राजकीय होता है, राजकीय-पूंजीवाद। पूंजीवाद चाहे व्यक्ति का हो, व्यक्तियों के समूह का हो या राज्य का हो, कभी समतापूर्ण व कल्याणकारी नहीं हो सकता, संभव ही नहीं।

    साम्यवाद ही नहीं, अभी तक समाजवाद व पूंजीवाद में भी जो अंतर माना जाता है वह यह कि पूंजी की स्वछंदता व शक्ति व्यक्ति के पास न होकर राज्य व शासन के पास रहती है। इसका बेहतर समाज व व्यवस्था निर्माण से कोई रिश्ता नहीं होता क्योंकि राज्य अपने आपमें कोई जीवंत वस्तु नहीं होता जो स्वयं को स्वतः संचालित करता हो। राज्य को व्यक्तियों या व्यक्तियों के समूह द्वारा ही संचालित किया जाता है। इस प्रकार नाम परिवर्तन के बावजूद शक्ति व सत्ता कुछ व्यक्तियों या व्यक्ति-समूहों के हाथ में ही केंद्रित रहती है।

    पूंजीवाद की ही तरह साम्यवाद का आधार भी आर्थिक ही है इसीलिए इसका मूल चरित्र भिन्न नहीं है। व्यक्ति के अंदर आर्थिक संपन्नता के लिए जो वासना रहती है, साम्यवाद की आर्थिक समता का आधार यही वासना है। साम्यवाद आधार प्रतिक्रिया है यही कारण रहा कि यह वर्ग विग्रह में लिप्त होकर एक ऐसा तंत्र बन गया जो मनुष्य का प्रयोग करता है तथा घृणा, द्वेष, हिंसा, हत्या आदि को आवश्यक व अनिवार्य मानने की कट्टरता रूपी आत्मछल को प्रवंचना के साथ कोरे आदर्श व गौरव के रूप में प्रतिष्ठित व पोषित करता है। पूंजीवाद व साम्यवाद में मूलभूत चारित्रिक अंतर नहीं।

    लोकतंत्र में मूलभूत आदर्श प्रबल होना चाहिए। राजकीय व शासकीय मानसिकता को लोकतंत्र का नाम देने तथा शास्त्रों में, दस्तावेजों में, भाषा में, तर्कों इत्यादि में लोकतंत्र-लोकतंत्र की रट लगाने से लोकतंत्र को झुठलाया ही जाता है। वास्तविक लोकतंत्र का मूलभूत आदर्श, लोकविश्वास के आधार पर नीतियों को स्थापित करते हुए राज्य-शासन को कम करते हुए शासन मुक्त समाज की स्थापना व मनुष्य का परिष्करण करने के वृहद अवसर उपलब्ध कराना है।

    विनाश को केवल और केवल वही लोकतंत्र रोक सकता है जो अहिंसा, सामाजिक समता व कल्याण को अपनी दीर्घकालिक नीति मानेगा, इसी के अनुरूप अपने आर्थिक, प्रशासनिक व राजनैतिक ढांचे बनाएगा। अभी तक की पद्धतियों में सबसे बेहतरीन पद्धति लोकतंत्र है। पुरानी क्रांतियों को व्यवस्थित या ऊटपटांग तरीकों से दोहराया जाना औचित्यहीन है। मूलभूत बात है मानवीय इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण शक्ति व रचना “अहिंसा” को जानने, समझने, स्वीकारने व प्रमाणिकता में जीने की। सत्य के आग्रह के साथ अहिंसा को समझना, स्वीकारना व प्रमाणिकता में जीना। मैं गांधी को मानवीय इतिहास के लिए इसीलिए अत्यधिक महत्वपूर्ण व दृष्टा व्यक्ति मानता हूं क्योंकि वे मानवीय लोकतंत्र के दृष्टा थे, उनकी अहिंसा सत्य के निकट थी व स्वअनुशाषित थी।

    मैं साम्यवाद, माओवाद पूंजीवाद, लोकतंत्र आदि विषयों पर गहरी व विस्तृत चर्चा इस पुस्तक में नहीं करना चाहता क्योंकि इस पुस्तक का मुख्य विषय बस्तर में कान्फ्लिक्ट रिजोलूशन के लिए रचनात्मक प्रयास हैं, पुस्तक अपने मूल विषय से भटक जाएगी। संक्षिप्त रूप से जितनी भी चर्चा इन विषयों पर प्रस्तावना अध्याय में हुई, आशा करता हूं कि उससे आपको यह महसूस हो रहा होगा कि मुझे साम्यवाद, माओवाद, क्रांति, परिवर्तन, पूंजीवाद आदि की समझ है, साथ ही यह पुस्तक रचनात्मक समाधान का प्रशस्तिगान करती हुई प्रतीत न हो, वरन् वस्तुस्थिति व रचनात्मक समाधान के प्रयासों को समझने में उपयोगी हो ताकि आप भी अपना योगदान सुनिश्चित करने की ओर मनन कर सकें, निर्णय ले सकें।