यह दुनिया ग़ज़ब है भाई

Tribhuvan

लालू यादव का भक्त कबीला इन दिनों नीतीशकुमार की क्या ग़ज़ब ख़बर ले रहा है। जैसे नीतीशकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भोज पर जाकर और सोनिया गांधी के भोज पर न जाकर मानो ऐसा कर दिया हो कि वे अभी गंगाजी जाने वाले थे, लेकिन अचानक से धर्म बदलकर मक्का चल दिए और हाज़ी हो गए। अरे दोस्तो, आपकी स्मृति को क्यों काठ मार गया। ये वही नीतीशकुमार हैं, जो कुछ समय पहले तक भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला रहे थे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इन्हें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने से पहले नरेंद्र मोदी से बेहतर संभावित प्रधानमंत्री घोषित किया था। लालू के साथ नीतीशकुमार हो तो वह घटिया और वही नीतीशकुमार अगर नरेंद्र मोदी या भाजपा के साथ चला जाए तो पापात्मा। क्या कमाल है!

मायावती और उनका भक्त-संप्रदाय आजकल भाजपा पर टूटकर पड़ रहा है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि दलितों की इस महान् उम्मीद ने ही उत्तरप्रदेश में सबसे पहले भाजपा से गठजोड़ करके भाजपा के हिन्दुत्वाद पर मुहर लगाई थी। यह वह समय था जब वामपंथी दलों और कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग करते हुए जनांदोलन खड़ा किया था। उस जनांदोलन के कई हरावल दस्ते के कई नेता आजकल नरेंद्र मोदी के यशोगान कर अपने आपको उपकृत समझ रहे हैं।

कुछ लोग हैं, जो एक इनसान को गोमांस रखने के नाम पर नृशंस ढंग से मारकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं, मानो इस देश में इनसानियत नाम की चीज़ ही नहीं रह गई है। कांग्रेस इस पर बढ़चढ़कर हल्ला मचाती है। लेकिन अचानक हम देखते हैं कि यही पार्टी एक निरीह और निरपराध मूक प्राणी, जो दुर्भाग्य से एक कारुणिक गाय है, सार्वजनिक रूप से काटकर अपने भीतर छुपी हिंसक नृशंसता को ला बाहर करती है।

हमारे लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र को दूषित करने पर आमादा राजनीतिक दलों, राजनीतिक लोगों और इस देश के राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों के मानस में एक विषैलापन भरता जा रहा है। छोटी-छोटी घटनाएं इसकी सबूत हैं।

लाल यादव को लोग एक बार फिर मौका देते हैं, लेकिन वह सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय आज भी पारिवारिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक ऐसा नेता है, जिसने स्वार्थाें के वशीभूत अपने साहसिक गुणों को तिरोहित करके अपने आपको लगभग डुबाे दिया है।

मायावती के पास दलितों का एक ऐतिहासिक बल आता है, लेकिन वह सत्ता के दंभ, धन एकत्र करने और महज सीटें जीतने के लिए एक धर्मविशेष के दिखावटी प्रेम का ऐसा मूर्ख प्रदर्शन करती हैं, दूसरे धर्म के चालाक कट्टर लोग उसे चौकड़ी भुला देते हैं।

कुछ दिन पहले एक प्रयोग हुआ आम आदमी पार्टी का। इस आम आदमी ने आम आदमी के नाम पर राजनीतिक शुचिता, व्यवहार गत ईमानदारी और सिद्धांतिप्रियता के पेट में जिस तरह छुरा घोंपा, वह तो शायद ही किसी ने किया हो।

ये मानसिकता प्रदर्शित करती है कि एक ही व्यक्ति को ये लोग एक ही समय में महान् लोकतांत्रिक घोषित कर सकते हैं और अगले ही पल उसे फासीवादी।

मेरी चिंता सिर्फ़ इतनी सी है कि हमारी नई पीढ़ी की नवांकुरित प्रतिभाओं के मानस पटल पर यह अविवेकीपन लाया जा रहा है।

मुझे लगता है, हमारी नई पीढ़ी को तटस्थ होकर चीज़ों का विश्लेषण कर सोच की एक नई राह बुननी चाहिए, ताकि हम एक सबल, सुसभ्य और सुलोकतांत्रिक समाज की ओर से बढ़ सकें। ऐसे समाज की तरफ जो विवेकशील मानवतावाद से भी आगे बढ़कर प्राणि-प्रकृति प्रियता को आत्मसात कर सके।

दरअसल, इस सबके लिए अगर कोई कुसूरवार है तो हम लोग हैं। हम अवाम। हम भारत के लोग। हम किसी के कांग्रेस के पीछे लगते हैं तो 70 साल लगे ही रहते हैं और अगर नरेंद्र मोदी हमें भाता है तो फिर ऐसा भाता है कि उसकी हिमालय जैसी भूल भी राई जितनी नहीं दिखती। हम पर कभी नेहरू का चश्मा चढ़ता है और कभी इंदिरा का। कभी हमें राजीव गांधी चमत्कृत करते हैं और कभी हमें वीपी सिंह जैसा कोई लगता ही नहीं।

हम भारत के लोग लोकतंत्र की नसों में जो विनाशकारी तेज़ाब डाल रहे हैं, वह तो दुनिया में कहीं दिखता। हमारे सैनिक मारे जाते हैं, हमारे नागरिक मारे जाते हैं और हमारे सपने मारे जाते हैं। हम हल्ला करते हैं, लेकिन हमारी नींद नहीं उड़ती। हम जैसे बोस्निया-हर्जेगोविना बनने को उतावले हैं। हमारे सत्ताधीश आयातुल्लाह खुमैनी बनकर हमें पाकिस्तान, ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान और सीरिया बनाने की राहें उलीकते हैं तो हमें दिखता नहीं। वह फिर इंदिरा गांधी हों या नरेंद्र मोदी! वह बंगाल को नारकीय हालात में बदलने वाला कम्युनिस्ट शासन हो या केरल के मतदाताओं को प्रसन्न करने के लिए सार्वजनिक रूप से गाय काटने वाली कांग्रेस। हम सब सेना होते हैं और हम सब पत्थर फेंकते हैं अपने ऊपर!

हम एक प्रहसन बनने को उतावले हैं। अपने घर को सपनों का घर और अपने देश को सपनों का देश बनाने के लिए जैसे हमें कोई सरोकार ही नहीं। हम अपनी महान् सांस्कृतिक थाती को तिरोहित होते कब तक देखते रहेंगे?

Credits: Tribhuvan’s Facebook wall