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  • लगता था तुम सभ्य हो गये हो –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

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    लगता था तुम्हारे पुराण
    अतीत ही में कहीं छूट से गये हैं
    लगता था तुम सभ्य हो गये हो
    अपने जहरीले धर्म से आगे बढ़ गये हो

    लेकिन हम सब गलत थे

    न तुम बदले
    न तुम्हारे पुराण बदले
    न पुराण बुद्धि बदली
    न तुम्हारा धर्म ही बदला

    लगता था मुगलों, तुर्कों, ब्रिटिशों ने
    तुम्हे सभ्य बना दिया है
    कि छोड़ दी हैं तुमने वे जहरीली तरकीबें
    अपनों से अपनों को ही लडाते रहने की
    कि सीख ली है तुमने भाषा
    सभ्यता विकास और लोकतंत्र की
    कि बढ़ चले हो तुम उस नये उजास की ओर
    जिसे अर्जित करने की तुम्हारी कोई योग्यता तो नहीं थी
    लेकिन तुम्हे दिया जरुर गया था

    आज इस सबको झुठला दिया तुमने

    तुमने सिद्ध कर दिया
    कि तुम सनातन ही हो

    तुम्हारा रोग
    तुम्हारी जड़ता
    तुम्हारी मूर्खता
    और तुम्हारा शोषण

    सच में सनातन है

  • सोच

    Dhiraj Kumar

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    अनिश्चितता इस कदर व्याप्त हो कि
    ठीक ठीक कुछ भी कहना
    ठीक नही हो तो
    संभावना या प्रायिकता
    इस बात कि सबसे ज्यादा होती है कि
    किसी ज्ञात बिन्दु पर
    या किसी ज्ञात समय पर
    यदि वो ‘हाँ’ है तो
    तक्षण दुसरे बिन्दु या समय पर
    वो ‘ ना’ हो जाता है

    ऐसा ही कुछ कुछ
    यादों मे बसा हुआ
    ‘ सोच ‘ के साथ होता है
    यादों के किसी ज्ञात-अज्ञात पड़ाव पर
    सोच जब ठोस होता है तब
    इसके तरल होने की
    संभावना एकदम से खत्म हो जाती है
    ठीक उल्टा यह कि
    जब सोच बहता हुआ होता है
    तब इसके ठोस होने कोई कारण
    नही होता है

     

  • ह्यूमर

    Shayak Alok

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    एक दृश्य यह है कि डेविड लेटरमैन एक छत से नीचे झाँक रहे हैं और कहते हैं कि अमेरिका में जेनरेटर तब चलता है जब बिजली के तार पर कोई पेड़ गिर गया हो. वे फिर यह भी कहते हैं भारत में इतने डीजल जेनरेटर हैं कि पूरे ऑस्ट्रेलिया को बिजली की आपूर्ति की जा सकती है. सौर ऊर्जा की विशिष्टता बताने के लिए वे कहते हैं कि देखो, मैं इसे छू सकता हूँ और कोई खतरा नहीं है. मैं अपना सर इसके नीचे रख सकता हूँ.

    डेविड लेटरमैन नेशनल जियोग्राफिक के डाक्यूमेंट्री सीरिज ‘इयर्स ऑफ़ लिविंग डेंजरसली’ के लिए तब भारत में थे और जलवायु परिवर्तन व ऊर्जा के उपयोग पर भारत की दशा दिशा का आकलन कर रहे थे. प्रसिद्ध पूर्व टीवी होस्ट और कॉमेडियन डेविड लेटरमैन ने इस क्रम में प्रधानमंत्री मोदी का इंटरव्यू भी लिया था और इंटरव्यू के बाद कहा कि मैं उम्मीद कर रहा था कि वे आज रात मुझे यहीं रुक जाने को कहेंगे.

    डोनाल्ड ट्रम्प के दावेदारी के तुरंत बाद डेविड ने एक मंच से यह टिप्पणी की – ‘’मैं सेवानिवृत हुआ …मुझे कोई अफ़सोस नहीं है, मैं खुश था. मैं कुछ वास्तविक दोस्त बनाऊंगा. मैं आत्मतुष्ट था. संतुष्ट था. तृप्त था, और फिर कुछ दिन पहले डोनाल्ड ट्रम्प ने यह कह दिया है कि वे राष्ट्रपति पद के लिए खड़े हो रहे हैं. मुझसे जीवन की सबसे बड़ी भूल हो गई है.’’

    इसी हफ्ते डेविड को ‘मार्क ट्वेन प्राइज़ फॉर अमेरिकन ह्यूमर’ दिया गया है.

    अमेरिकन ह्यूमर

    प्रत्येक देश में हास-परिहास की अपनी भाषिक संस्कृति होती है जो अभिव्यक्ति के तरीके पर निर्भर होती है और यही उसे विशिष्ट बनाती है. अमेरिकी ह्यूमर के पितामह माने जाते प्रसिद्ध लेखक मार्क ट्वेन ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘’अमेरिकी हास-परिहास फ्रेंच, जर्मन, स्कॉच या अंग्रेज हास-परिहास से बिल्कुल अलग है. और यह अंतर अभिव्यक्ति के तरीके का अंतर है. भले इसकी उत्पत्ति अंग्रेज ह्यूमर से हुई है लेकिन अमेरकी ह्यूमर अनूठा है. सिद्धांततः जब कोई अंग्रेज लिखता है या कहानी सुनाता है तो हास्य बिंदु पर जोर देता है और विस्मयादी का प्रयोग करता है. कहानी कहने वाला अमेरिकी ऐसा नहीं करता. वह ह्यूमर से होने वाले प्रभाव से प्रकटतः बेपरवाह बना रहता है.

    भारतीय परंपरा में हास-परिहास के दो अद्वितीय लोकचर्चित किरदार हुए. तेनाली राम और बीरबल. तेनाली राम राजा कृष्णदेव राय के दरबार के अष्टदिग्गजों में से एक थे और प्रसिद्ध कवि थे. लोक में उन्हें ‘विकट कवि’ के रूप में प्रतिष्ठा हासिल है जिसका ढीला ढाला अर्थ विदूषक या मसखरा है. राजा बीरबल अकबर के दरबार में थे और अपनी हाजिरजवाबी के लिए लोकचर्चित हुए. एक प्रकार से कह सकते हैं कि भारतीय परंपरा का ह्यूमर भाषाई सौष्ठव या अभिव्यक्ति के तरीके के बजाय सहज बुद्धि के त्वरित प्रयोग व वाकपटुता से अधिक प्रेरणा लेता रहा. यूँ भी भारतीय अभिव्यक्ति परंपरा में हाव-भाव अभिनय, बोलने या चुप रहने के तरीके और भाषा के इस्तेमाल के बजाय कहे गए ‘कंटेंट’ पर अधिक जोर रहता है.

    एक कथा है कि नेहरु सीढियां उतरते लडखडा गए तो राष्ट्रकवि दिनकर ने उन्हें संभाला. नेहरु ने शुक्रिया कहा कि आपने संभाल लिया. दिनकर ने जवाब में कहा कि राजनीति जब भी लड़खड़ाएगी तब साहित्य उसे सहारा देगा. यह भारतीय ह्यूमर का एक क्लासिक उदाहरण है. एक और कथा में नेहरु संसद में देश को हौसला दे रहे थे कि चीन द्वारा हड़प ली गई भूमि में यूँ भी कुछ नहीं उगता. इस पर महावीर त्यागी ने तुरंत जवाब दिया कि आपके सर पर भी कुछ नहीं उगता तो क्या इसे किसी और को सौंप दिया जाए.

    हास-परिहास में फोर्मेट की भी अपनी विशेष भूमिका व योगदान है. यह फोर्मेट भी कई स्तरों पर निर्मित होता है और फोर्मेट के भीतर कई दूसरे फोर्मेट देखे जा सकते हैं. परदे की कॉमेडी, साहित्यिक व्यंग्य, हास्य कविताएं, राजनीतिक कटाक्ष और रोजमर्रा के आम जीवन में प्रासंगिक लोककहावतों के साथ दर्शाया जाता हास-परिहास मूल में अलग अलग प्रवृतियों व प्रभाव को प्रकट करता रहा है. इनके बीच का अंतर निश्चय ही किसी बौद्धिक अवलंब के बिना पर देखा जा सकता है. एक ही फिल्म में कॉमेडियन, हीरो-हीरोइन और विलेन द्वारा प्रस्तुत हास-परिहास में एक साफ़ अंतर दीखता है. एक ही साहित्यिक व्यंग्य में लेखक के सवाल और किसी किरदार के जवाब से दो अलग तरह का ह्यूमर-इफेक्ट पैदा होता है.

    मेरे हिसाब से भारतीय ह्यूमर का प्रतिनिधित्व एडिटोरियल पन्ने पर लिखने वाले हमारे कुछ स्तंभकार कर पाते हैं. कुछ प्रतिनिधित्व वरुण ग्रोवर एवं अन्य कुछ स्टैंडअप कॉमेडियन कर पाते हैं वरना यह ‘’आर्ट’’ हम कुछ तो जरुर खो रहे हैं.

    भारतीय ह्यूमर का सबसे अधिक संक्रमण इन दिनों राजनीति व न्यूज़ मीडिया में देखने को मिल रहा है. वे जैसे किसी कुंठा से उत्पन्न होते हैं और किसी मनोविनोद के बजाय एक कड़वाहट छोड़ने पर समाप्त हो जाते हैं. संसद में कई बार किसी सदस्य के वक्तव्य में उत्कृष्ट ह्यूमर नजर आ जाता है लेकिन हमारे प्रधानमंत्री और हमारे सबसे बड़े प्रधानमंत्री उम्मीदवार ज्यादातर बार हल्के चुटकुले या चुभते कटाक्ष पर ही अपनी प्रतिभा समाप्त कर लेते हैं और बौद्धिक चर्या का मनोविनोद प्रस्तुत नहीं कर पाते.

    अभिव्यक्ति का एक अन्य संकट ‘रेस्पोंसिबिलिटी’ का है. मुझे डा. पुरुषोत्तम अग्रवाल की एक बात बेहद पसंद आई थी जो उन्होंने एक निजी संवाद में कही थी. उन्होंने कहा कि ‘सेन्स ऑफ़ ह्यूमर’ के साथ लेखक में या किसी भी प्रतिनिधि या व्यक्ति में ‘सेन्स ऑफ़ रेस्पोंसिबिलिटी’ भी अवश्य हो, तब असल आनंद है.

    चर्चित कवि श्री मंगलेश डबराल को किसी किरदार की तरह रखते हुए अब मैं कुछ उदाहरण दूंगा :-

    1. ह्यूमर : मंगलेश डबराल मुझसे तीन बार टकराए और तीनों बार एक ही तीन सवाल पूछे – कि मैं कैसा हूँ, कहाँ रहता हूँ, और क्या करता हूँ. तीनों बार उन्होंने मंच से मोबाइल, टॉर्च और पहाड़ तीन कविताएं सुनाई.
    2. व्यंग्य : वे पहाड़ से कुछ कविताएं लिए आए थे, दिल्ली में बात नहीं बनी, इन दिनों वे फिर कविताओं के लिए पहाड़ की ओर ताक रहे हैं.
    3. कटाक्ष : डबराल कैंप के कवियों में (कवयित्रियों में भी) बची रहे थोड़ी सी लज्जा.
    4. फूहड़ता : वे थोड़े लंप (हिंदी और अंग्रेजी इनिशियल) किस्म के व्यक्ति हैं.
    5. हास्य : वे श्री प्रभात रंजन से हिंदी में नाराज हुए और श्री वीरेन्द्र यादव से अंग्रेजी में उनकी शिकायत करने लगे.

     

  • क्या हम मुसलमान हैं ??

    Saleem Sabri

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    आधे-अधूरे पांच फर्ज़ (कलमा, नमाज़, रोज़ा, ज़कात, हज)पूरे कर हम मुसलमान होने का दावा करते है .. अधिकतर तो वो भी नहीं करते । लेकिन क्या हम अपने आचरण से मुसलमान है ?? शायद नहीं .. ?? लेकिन मुस्लिम के यहाँ जन्म लेने से या मुस्लिम नाम रख लेने भर से हम मुसलमान हो जाते और फिर इस्लाम जैसे महान धर्म के प्रतिनिधी भी अब पूरी दुनिया के लिए जैसा आचरण मुसलमान करते है वो ही इस्लाम है । —

    लेकिन क्या हम इस्लाम के अनुसार आचरण कर रहे है ? क्या हमारे समाजिक जीवन में हमारा व्यवहार इस्लाम की शिक्षाओ के अनुरूप है .. ?? कुछ अपवादों को छोड़कर शायद 1-2% भी नहीं । आइए देखते है इस्लाम मुसलमानों से क्या तव्वको रखता है ।

    इस्लाम के अनुसार मुसलमानो का व्यवहार :

    • अपने माँ-बाप के साथ अच्छा बर्ताव करो (कुरान,4.36)
    • अपने बच्चों को शिष्ट रहन-सहन और अच्छी शिक्षा प्रदान करो (पैगम्बर स० अ०)
    • सगे सम्बंधियों के साथ अच्छा बर्ताव करो (कुरान,4:36)
    • वह मुसलमान नहीं जिसका पेट भरा हो और पड़ोसी भूखा हो (पैगम्बर स० अ०)
    • पड़ोसी के घर से ऊंचा अपना घर न बनाओ ( पैगम्बर स० अ०)
    • गरीबों को खाना खिलाओ (कुरान )
    • मज़दूर को उसकी मज़दूरी उसका पसीना सूखने से पहले दे दो (पैगम्बर स० अ०)
    • अनाथों और निर्धनों के साथ दयालुता का व्यवहार करो (कुरान 4:36)
    • संसार की सभी रचनाओं पर दया करो (कुरान 21:107)
    • छायादार वृक्ष को न काटो (पैगम्बर स० अ०)
    • एक पौधा लगाना दान है (हदीस )
    • प्राकृतिक संसाधनों और धन की फिज़ूलखर्ची न करो (कुरान 7:31)
    • लोगों के मानवाधिकार का हनन माफ नहीं किया जाएगा (पैगम्बर स० अ०)
    • मुस्कुराकर मिलना भी दान है (पैगम्बर स० अ०)
    • अत्याचारी को अत्याचार से रोक दो (पैगम्बर स० अ०)
    • दयालु और विनर्म बनो (पैगम्बर स० अ०)
    • जब नापकर दो तो, नाप पूरी रखो । (कुरान 17:35)
    • जब बात कहो, तो इंसाफ की कहो , चाहे मामला नातेदार का क्यों न हो (कुरान 6:152)
    • अमानत में खयानत न करो (कुरान 4:58)
    • लोगों से भली बात करो (कुरान 2:83)
    • दूसरों की कमियों को उजागर न करो (पैगम्बर स० अ०)
    • सफाई आधा ईमान है (पैगम्बर स० अ०)
    • कमज़ोरो के मित्र बनो और ज़ालिम शासकों और उनके तरीकों का विरोध करो (कुरान 4:75)
    • गोद से कब्र तक ज्ञान प्राप्त करते रहो (पैगम्बर स० अ०)
    • अंहकार से बचो (कुरान 49:12)
    • झूठे पर अल्लाह की फटकार है (24:7)
    • अपनी गलती या गुनाह को किसी निर्दोष पर न थोपो (कुरान 4:112)
    • कंजूसी और जमाखोरी न करो (कुरान 3:180,9:34)
    • ब्याज लेना और देना अवैध है (कुरान 2:275,278-279)
    • मदिरा और जुआ शैतान के काम है (कुरान 5:90)
    • निर्धनता के भय से अपनी संतानों की हत्या (गर्भपात) न करो (कुरान 17:31)

    और भी हज़ारों समाजिक व्यवहार और आचरण से सम्बन्धित शिक्षाएं है ,, लेकिन अफसोस सभी मुस्लिम तंजीमें और खुद हम भी फरायज़े से आगे सोचते ही नहीं है और दुनिया के सामने इस्लाम की बिगड़ी हुई छवि रख रहे है । हम गैर-मुस्लिमों की साज़िशों को तो ढूंढ लेते है , लेकिन कभी ईमानदारी से अपने अन्दर झांकते नहीं है । यादि हम 10% भी अमल कर ले तो शायद अपना और इस्लाम का कुछ भला कर पायें ।

    अल्लाह हम सबको हिदायत दे और अमल करने की तौफीक दे। आमीन।

  • ‘एज इट इज़’ देखने का अभाव

    Shayak Alok

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    मैं शोर और विशेषज्ञों के विश्लेषणों पर बहुत ज्यादा यकीन नहीं कर पाता. भारतीय सन्दर्भ में नीति विषयों पर तो इन विशेषज्ञों के अटकलों, अनुमानों और सुझावों को मैंने कभी भी काम लायक नहीं पाया है. मुझे उनके विचार बेहद किताबी लगते रहे हैं. चीजों को ‘एज इट इज़’ देखने के बेहद जरुरी मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण का उनमें अभाव दीखता है. वे हमेशा कुछ विशेष ढूंढ लाते हैं और विशेष सलाह देने लगते हैं.

    यह कहानी मोदी के दंभपूर्ण हुंकार से शुरू हुई कि वे पाकिस्तान को अलग थलग कर देंगे. मुझे तब भी यह बात हास्यास्पद लगी थी. अब इन दिनों भारतीय चिंताकार भारत के ही अलग थलग पड़ते जाने पर लेख लिख रहे. मुझे यह बात भी हास्यास्पद लग रही है.

    गधे की अपनी उपयोगिता होती है और घोड़े की अपनी.

    पहले पाकिस्तान पर ही आते हैं. पाकिस्तान एक लगभग फेल्ड स्टेट की स्थिति में है. उसकी यह स्थिति ही उसे दक्षिण एशिया में सबसे अधिक प्रासंगिक बना देती है. पाकिस्तान अमेरिका या चीन के जैसे काम आ सकता था/है, वैसा कोई अन्य देश नहीं आ सकता. अमेरिका के पाकिस्तान से कुछ दूर होते ही रूस ने भी इसलिए अपनी रूचि दर्शा दी है. भारत संप्रभुता का प्रश्न उठा बेल्ट एंड रोड समिट को स्कीप करता है, और पाकिस्तान संप्रभुता को ही दाँव पर लगा सीपेक को बी एंड आर का फ्लैगशिप बनाने में योगदान करता है.

    भारत की शक्ति उसका आर्थिक आकार और उसका बाज़ार है. विश्व की रूचि भारत में इस कारण है. इस रूचि का परित्याग विश्व किसी भी कारण क्यों करेगा. चीन-भारत आर्थिक संबंध के वॉल्यूम को ही देख लें और उसका चीन की ओर झुकाव देख लें तो भारत ऐसा घोड़ा नहीं है जिसपर दाँव खेलने से चीन कभी भी पीछे हट जाएगा. रूस पर भी यही गणित लागू होता है. अमेरिका की भारत में बढ़ी रूचि का स्ट्रेटजिक गणित है और इसपर जाहिर ही हमारे चिंताकार फिलहाल चिंतित नहीं होंगे.

    अमेरिका चीन रूस को पाकिस्तान जो सुविधाएं व सेवाएं दे सकता है, वह क्या संप्रभु भारत कभी दे सकता है ? आसान गणित है.

    हाल यहाँ यह है कि हम यहाँ अपने ही टाटा को स्वदेशी प्लांट लगाने के लिए जमीन देने में मार मचा देते हैं जबकि पाकिस्तान अपनी हजारों एकड़ कृषिभूमियां चीन को खेती के प्रयोग के लिए सौंप रहा है.

    एज इट इज़. ऐसा ही है. नैसर्गिक बनते बदलते समीकरण. दक्षिण एशिया में भारत और पाकिस्तान अपनी इस विशिष्ट स्थिति का ही उपभोग करते रहेंगे. मोदी हुंकार से न पाकिस्तान अलग थलग पड़ेगा, न ही किसी बैकफायर से भारत अलग थलग पड़ेगा.

    भारतीय चिंताकार अधिक चिंतित इस बात पर भी दीखते हैं कि भारत के छह पड़ोसी बी एंड आर से चीन से भारी निवेश पाएंगे और भारत वंचित रहेगा. ये प्रायः इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी मद के निवेश हैं. प्रश्न है कि हम चीन से इसी शर्त और श्रेणी का निवेश लेने को कितने उद्यत हैं. जिनपिंग ने गुजरात में हमसे पिछली मुलाकात में जितने निवेश का वादा कर रखा, क्या उसे खींच लेगा ? रूठ जाएगा हमसे ? निवेश करना लाभ का व्यापार करना है, खैरात नही होता.

    अब आते हैं रणनीतिक मसले पर. वैश्विक महत्वाकांक्षा जी रहा चीन भारत के किसी भी अवरोध से यदि नाराज होता है तो उसके पास आजमाने को क्या विकल्प हैं ? हमारी दुखती रग पाकिस्तान को थोड़ा और सहला देना ? इस उस मंच पर हमारे प्रवेश को थोड़ा बाधित कर देना ? किन्तु चीन का यह रुख तो मोदी-जिनपिंग के अच्छे दिनों से ही जारी है. युद्ध ? चीन को युद्ध करना हो तो दलाई लामा का बहाना ही पर्याप्त है.

    मैं अभी एक चिंताकार को पढ़ रहा था एक्सप्रेस में. वे इतने भयभीत और उत्तेजित दिख रहे हैं कि अभी ही सरकार को पांच सौ प्रकार के नये प्रोजेक्ट शुरू करने की सलाह दे दी. मतलब कि वे तैयार बैठे थे कि एक जिनपिंग आएगा, जो स्ट्रिंग ऑफ़ पर्ल्स की रणनीति आजमाने के बाद जब सशंकित होगा कि उसकी मनोवृति पकड़ में आ रही है तो फिर ओबीओआर आजमाएगा, और इस दरम्यान भारत यूँही बस बैठा रहेगा, और फिर वे अपनी सलाह दे सकेंगे.

    अतीत में भी नाटो सिएटो फलना चिलना रूस अमेरिका में हमारे चिंताकारों ने यूँही वक्त जाया किया जबकि भारत ने अपनी आर्थिक/रणनीतिक राह उनके अटकलों अनुमानों सुझावों से परे जाकर पकड़ी और औसत से अधिक सफल भी रहा.

     

  • मेरे शहर के हिस्ट्रीशीटर

    Tribhuvan

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    उन दिनों एसपी हुआ करते थे बीजू जॉर्ज जोसेफ़। क्या हिम्मती बंदा था। खूब पढ़ाकू और खूब लड़ाकू। थानेदार थर-थर कांपते थे और बंदे को देखो तो हर समय पसीने से लथपथ। एसपी जैसा एसपी।

    मज़ाल कि कानून और व्यवस्था को कोई धता बता दे। थानेदार भले ढीले पड़ जाएं, सीआई चाहे कहीं छुप जाएं और डीवाईएसपी चाहे किसी कंदरा में ओझल हो जाएं, अपराधियों को खुद ही धर लेता था। कमज़ोर एसपीज के समय में जो कानून अपराधियों के सामने साए की तरह ज़मीन पर रेंगता है, उसमें अच्छे एसपी सूरमे सांप की सी जुंबिश और फुफकार भर देते हैं। बीजू ने उन दिनों यही किया था।

    एक क्राइम रिपोर्टर के रूप में मैं थाने में थानेदार के सामने था तो एक कॉल आई और थानेदार सावधान की मुद्रा में आ गया कुर्सी से कूदकर। पता चला, बीजू का फ़ोन है। मज़ा आया।

    बीजू के साथ मैंने कई पुस्तकें एक्सचेंज करके पढ़ीं। अरुंधति रॉय की “दॅ गॉड ऑव स्मॉल थिंग्स” उन्हीं दिनों आई थी और मुझे मिल नहीं रही थी। यह उपन्यास मैंने उन्हीं से लेकर पढ़ा। बीजू के आग्रह पर मैंने शायद उन्हें नीरद सी चौधरी की “दॅ ऑटोबायोग्रैफी ऑव अन अननॉन इंडियन” पढ़ने को दी थी। यह सिलसिला काफ़ी चला। लेकिन ज़ल्द ही उनका तबादला हो गया और वे चले गए। उनका कार्यकाल छोटा था, लेकिन बहुत यादगार।

    तो ख़ैर, शहर के एक बहुत नामी उद्योगपति की उनके अपने ही सगे भाई ने जेल से पैरोल पर आए एक ख़तरनाक अपराधी से दिन दहाड़े हत्या करवा दी थी। इस हत्याकांड से शहर में सनसनी फैल गई थी, लेकिन बीजू ने इसे कुछ घंटे बाद ही पंजाब बॉर्डर क्रॉस करते हुए धर दबोचा था।

    इस घटनाक्रम की रिपोर्टिंग बहुत रोमांचकारी रही। गर्भनाल के रिश्ते खून से आलूदा हो चुके थे। जिस समय अदालत से फैसला आया, मारे गए व्यक्ति की पत्नी हत्या के असली अभियुक्त को सज़ा दिलाने से पीछे हट गई और एक नेपाली नौकर के बयानों के अाधार पर अदालत ने अपराधियों को सख़्त सजा सुनाई। औरत का पतन देखो, पैसा मिल गया; पति के असली हत्यारे को बख्श दिया। शहर में चर्चा थी कि देवर और भाभी में भारी डील हुई है।

    इस घटनाक्रम ने मन उचाट कर दिया। क्या कोई सगा भाई पैसे के लालच में इतना नीचे गिर सकता है? क्या कोई पत्नी इतना पतित हो सकती है? लेकिन उस समय और भी शर्म आई, जब पता चला कि पूरे शहर ने उस शख्स को सिर पर बिठा लिया है, जिसने मर्डर करवाया था।

    खैर, हत्यारे की गिरफ्तारी की जिस समय खबरें की जा रही थीं, मेरे पास जेल से नंबरदार का फोन आया। वह बोला : एक बात करनी है आओ। मैं जेल पहुंचा। जेल में नंबरदार सबसे सीनियर और लीडर बंदे को कहते हैं। इसने कोई न कोई खतरनाक अपराध किया होता है।

    मैं गया तो वह बोला : यार, इससे मिलो। ये हैं करतारसिंह। मैं बोला : तो हुआ क्या?

    करतारसिंह बोला : वो सेठ के मर्डर में जिस संजय को पकड़ा है। पुलिस ने 302 की जगह 303 लगाई है। ये ग़लत है। रोंग है। बिलकुल रोंग। मैंने इस धारा के बारे में पहली बार उसी समय सुना था।

    दरअसल, आईपीसी की एक धारा है 303, जो ऐसे मर्डरर पर लगाई जाती है, जो पहले से आजीवन कारावास की सजा काट रहा हो। इसमें फांसी के अलावा और कोई सजा नहीं है।

    करतारसिंह, जिस पर कई लाेगों के मर्डर का आराेप था और जो एक ठेठ देसी किसान था, बोला : हू एवर बीइंड अंडर सेंटेंस ओफ इंप्रीजनमेंट फोर लाइफ, कमिट्स मर्डर, शैल बी पनिश्ड विद डैथ।

    वह बोला : ध्यान देणा भाई साब। शैल बी पनिश्ड विद डैथ। लेकन गल ये है कि मिट्‌ठूसिंह और भगवान बख्श सिंह के केसों में भाई साहब सुप्रीम कोर्ट ने एटीफोर से पहले ही आईपीसी के इस सेक्शन को स्ट्रक डाउन कर दिया था। इसे वोइड और अनकंस्टीट्यूशनल भी करार दिया था जी।

    अब पूरी कहानी समझ आई कि पुलिस ने जिस मर्डर मामले में ये सेक्शन लगाया है, उसमें तो कोर्ट ने भी पीसी रिमांड दिया है। मैंने कहा तो करतारसिंह बोला : देखो, अजकल, कनून दे बारे न जजां नूं पता, न पुलिस अफसरां नूं। कनून दा पता हुंदा तां अज्ज ऐने लोक बेकसूर ही जेलां विच नहीं सड़दे।

    मैंने कहा : यार तुमने तो खुद मर्डर किया है। तुम सजा काट रहो, सड़ नहीं रहे हो!

    वह बोला : बताओ किसका किया?
    मैं बोला : अब तुम्हीं बता दो।
    करतार ने कहा : मेरे घर की एक लड़की को कोई बुरी नजर से देख रहा था। वह हद पार होने लगा तो समझाया। नहीं माना तो दो चार बार और समझाया। नहीं माना और अपनी हद से गुजरा तो उसकी गर्दन उतारकर मैंने उसके चबूतरे पर रख दी। …. की मैं गलत कीता? https://remotepilot101.com/ देख वीरा, मेरे दिल विच देख। मेरी बहन प्रसन्न है और मेरे दिल से इनसाफ़ की महक आ रही है।

    ……वह बोला : मैं कोई कमीना कातिल नहीं हूं!

    मैं अनुत्तरित था।


    फेसबुक वाल से साभार

  • अंग्रेज, जंबूद्वीप व शिक्षा

    Bimal

    [themify_hr color=”red”]

    अंग्रेज़ जब जम्बूद्वीप (भारतवर्ष) आये तो शिक्षा के नाम पर गुरुकुल कहलाने वाले संस्कृत विद्यालय या फिर मदरसे के नाम से जाने जाने वाले उर्दू- फ़ारसी शिक्षा केंद्र ही मौज़ूद थे। अल्पसंख्यक आबादी ही शिक्षा की अधिकारी हुआ करती थी और बहुसंख्यकों को बलपूर्वक इससे दूर रखा गया था। शिक्षा का मूल उद्देश्य धर्म के नाम पर सवालों का निषेध करना और मध्ययुगीन बर्बर व्यवस्था की जड़ों को जमाये रखना ही था।

    अंग्रेज़ों के लिए यह शिक्षा व्यवस्था वैसे ही किसी काम की न थी जैसे यहाँ की लचर सैन्य व्यवस्था। अंततः रेल, डाक आदि ज़रूरतों की तरह ही उन्होंने लार्ड मैकाले के सुझावों पर आधारित एक नई शिक्षा व्यवस्था की नींव डाली। स्वभाविक तौर पर इसका भागीदार भी वही वर्ग बन पाया जो पहले से ही शिक्षा का अधिकारी था। अंग्रेज़ों की ज़रूरत भी बेहद सीमित थी इसलिए वंचित वर्गों को हिस्सा बनाने की कोई मज़बूरी भी उनके सामने प्रस्तुत न हुई। शिक्षा का उद्देश्य प्रशासनिक पदों पर कब्जा जमा लेना ही बन गया। ज्ञान, विज्ञान, खोज, आविष्कार, प्रगतिशील समाज की रचना इसके लिए कभी कोई मुद्दा ही न बना। इस व्यवस्था में भी उसी वर्ग का प्रभुत्व कायम रहा जो स्वभाव से प्रतिक्रियावादी था और चरित्र में घनघोर नस्लवादी था। ब्रिटिश राज की समाप्ति के बाद इस शिक्षा व्यवस्था का विस्तार तो हुआ लेकिन एक आधुनिक चिंतनशील पीढ़ी तैयार करने के उद्देश्य से कभी भी इसमें गुणात्मक परिवर्तन की कोई पहल न ली गयी।

    आज भी शिक्षा के सम्भ्रांत केंद्रों में अल्पसंख्यक ब्राह्मण वर्ण का कब्जा बना हुआ है। इनका एकमात्र उद्देश्य नौकरियों के मलाईदार हिस्सों में वर्ण विशेष के लोगों का कब्जा बनाये रखना है।

    लोकतन्त्र और विकास के नाम पर सरकारी दायरे में गैर सम्भ्रांत शिक्षा केंद्रों का उद्देश्य भी उत्पादक वर्ग को महज साक्षर बना डालने तक ही सीमित है। बाज़ार की डिमांड इससे ज्यादा नहीं फिलहाल। इन शिक्षा केंद्रों के निति नियन्ता, संचालक और शिक्षक भी व्यापक तौर पर सवर्ण ही बने हुए हैं।

    गैर सवर्ण हिस्सेदारों की नियति भी अंततः ब्राह्मण संस्कृति का अनुपालन करते हुए उसके महिमामण्डन और प्रमोशन तक ही सीमित है।

     

  • बहुजन नेतृत्व अम्बेडकरवादी युवाओ की राजनैतिक आकांक्षाओं को समझें

    Vidya Bhushan Rawat

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    सहारनपुर के घटना के बाद दलितों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा क्योंकि प्रशासन बजाय प्रभावित लोगो को मदद करने के भीम सेना को एक अपराधिक समूह घोषित करने पर आमादा है. भीम सेना के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद को पुलिस तलाश कर रही है और ये सूचनाएं है के उनके ऊपर रास्ट्रीय सुरक्षा कानून लगाने के तैय्यारी चल रही है . घायल दलित परिवार अस्पताल में हैं और प्रदेश से लेकर केंद्र तक का एक भी मंत्री, सांसद  या विधायक लोगो की खोज खबर लेने नहीं गया. जिन लोगो का सब कुछ लुट गया उनके सुरक्षित घर वापसी और उनके जीवन को वापस पटरी पर लाने के लिए कोई योजना अथवा समाचार अभी तक तो नहीं सुनाई दिया है . इस सरकार और उसकी रणनीति को लेकर अगर अभी भी लोगो को गलतफहमिया हैं तो वो निकाल ले. मंचो से जय भीम के नारे और प्रधान सेवक के इमोशनल भाषण चाहे बाबा साहेब को लेकर हो या बुद्ध को लेकर हो उससे ज्यादा प्रभावित होने वाले लोगो को चाहिए के दलितों और पिछडो के प्रति सरकार के पिछले कुछ सालो के कार्यकाल बता सकते हैं के आखिर सरकार ने क्या क्या किया है . रोह्ति वेमुला से लेकर जे एन यू में छात्रवर्ती का प्रश्न हो या दलितों के लिए स्पेशल कॉम्पोनेन्ट प्लान की बात हो सभी न्यूनतम हो चुके हैं . अगर वेलफेयर योजनाओं को देखे तो सरकार की उनमे कोई दिलचस्पी नहीं है. बीफ बैन हो या अन्य कोई मामला, सभी किसानो और दलित पिछडो के विरुद्ध जाते हैं .

    हालाँकि प्रधान्सेवक बाबा साहेब आंबेडकर और बुद्ध का बहुत नाम ले रहे हैं पर उत्तर प्रदेश के प्रधान सेवक को अम्बेडकरवाद में बहुत दिलचस्पी हो ऐसा नज़र नहीं आता और ये उनकी कार्यशैली से पता चल जाता है . अभी मेरठ के एक दिवसीय दौरे पर एक दलित बस्ती में जाते समय वो बाबा साहेब आंबेडकर के प्रतिमा को माल्यार्पण नहीं किये जबकि लोग उनका इंतज़ार कर रहे थे.  ऐसी बाते भूल से नहीं होती अपितु उनके पीछे अपने वोट बैंक को एक सन्देश भी देना होता है के हम सबकी तरह नहीं है .

    योगी आदित्यनाथ के आने के बाद से उत्तर प्रदेश के राजपूत अति उत्साहित है . हो सकता है के बहुत सारे उन्हें महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान के बाद का सबसे मजबूत राजा मान रहे हो क्योंकि आज तक खुले तौर पर योगी आदित्यनाथ इस व्यस्था के पोषक दिखाई दे रहे हैं जो वर्णवादी है . उनके प्रसाशन पर राजपूतो के पकड़ दिखाई देती है और ये अनायास ही नहीं के वे लखनऊ में समाजवादी नेता चंद्रशेखर के जन्म दिवस अप्रेल १९ को एक कार्यक्रम में अतिथि बन कर गए और उनकी स्मृति में एक पुस्तक का विमोचन किया . मंच पर मुख्या अतिथियों में राजा भैया भी दिखाई दिए और ये कोई आश्चर्य की बात नहीं क्योंकि चंर्दाशेखर जी हालांकी खांटी समाजवादी थे लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गाँवो में उनकी ताकत उनकी जाति ही थी लोगो को उनके समाजवाद से कम और ठाकुर होने से ज्यादा मतलब था और क्षेत्र के तमाम स्वनामधन्य नेताओं से उनके संपर्क थे और उन्होंने उसे कभी छुपाया भी नहीं . मंडल कमीशन के लागु होने पर उसके विरोध में सबसे ज्यादा चंद्रशेखर ही थे और अंत तक उनका विरोध था . उनके क्षेत्र के दलित पिछडो को चंद्रशेखर जी की राजनीती में कोई भरोषा नहीं था लेकिन वह नेताओं के नेता थे और माननीय मुलायम सिंह जी ने भी उत्तर प्रदेश में चंद्रशेखर जी की स्मृति में एक दिन की छुट्टी की घोषणा की थी . अब सभी चंद्रशेखर जी के समाजवाद से कम और ठाकुरवाद से ज्यादा प्रभावित थे .

    उत्तर प्रदेश के राजनीती में बर्चस्व की राजनीती हावी है और नेताओं को दूसरीजाति पर भरोषा नहीं होता और वे अपनी अपनी जातियों के अधिकारियों को महत्वपूर्ण पदों पे पहुंचाते हैं . ये हकीकत सबको पता है और इसिलए हिंदुत्व भी ब्राह्मणवादी राजनीती है लेकिन अब योगी जी को भी बिरादरी की आवशयकता महसूस हो रही है . कल उत्तर प्रदेश के एक साथी कह रहे थे के योगी जी अच्चा काम कर रहे हैं लेकिन भाजपा के महत्वकांक्षी नेता उन्हें कुछ करने नहीं देंगे . हकीकत यह है के  छोटी छोटे निर्णयों के लेकर मीडिया ने लालू, अखिलेश और मायावती को तो घोर जातिवादी करार दे दिया जबकि दोनों की किचन कैबिनेट में भी ब्राह्मणों की अच्छी खासी भूमिका थी . इस वक़्त योगी और मोदी को मीडियाकर्मी उनके नेतृत्व के तौर पर नहीं अपितु  प्रशंशक के तौर पर देख रहा है अतः उनकी न तो आलोचना हो सकती है और न ही कोई सवाल उनसे किया जा सकता है . उनके भक्तो की जमात उनसे सवाल करने वाले लोगो से बदला लेने को तैयार है . मेरा सवाल यह है के इतने दिनों से उत्तर प्रदेश में गौ रक्षा के नाम पर मुसलमानों और दलितों का उत्पीडन हो रहा है लेकिन न तो प्रधान सेवक और न ही मुख्यमंत्री ने एक भी शब्द उनके बारे में कहा, तो क्या यह अच्छी बात है ? उन्होंने अपने लोगो से खुले तौर पर यह नहीं कहा के कानून हाथ में न लो . हम ये मानते हैं के संघ के जिन कार्यकर्ताओं की ट्रेनिंग शुरू से ही जाति और धर्म के संकीर्ण दायरे में हुई हो तो वो अचानक से नहीं बदलेंगे. उन्हें अभी भी नहीं लग रहा के सरकार में आने के बाद सत्तारूढ़ पार्टी को ज्यादा जिम्मेवार और समझदारी से बोलना होता है . लोग आपसे सवाल करेंगे और आपकी सरकार की उपलब्धिया मांगगे लेकिन उसके उत्तर में उन्हें गौसेवक, राष्ट्रवाद और अब सहारनपुर के दंगे ही दिखाई देंगे .

    सहारनपुर के दंगो के पीछे साफ़ तौर पर जिले की राजनीती में सवर्ण बर्चस्व कायम करना है . सहारनपुर में दलितों के आर्थिक सामाजिक राजनैतिक हालत उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाको से बेहतर हैं और इसलिए ये बसपा का गढ़ भी रहा है . उत्तर प्रदेश में भाजपा के लम्बी रणनीति के तहत हिन्दू मुसलमान की राजनीती में पिछडो और दलितों के नेतृत्व को पूर्णतया समाप्त करने की है. जातियों के बर्चस्व को कायम करने के लिए ही महाराणाप्रताप के जन्मदिन को मनाने की बात हुयी. लेकिन दिल में रहने वाली घृणा को देखिये के ठाकुर लोग बाबा साहेब आंबेडकर की मूर्ति की स्थापना चमार बस्ती में भी नहीं करने देना चाहते हैं . ये साफ़ नज़र आता है के वर्णवादी सवर्णों को अम्बेडकरवादी अस्मिता से बहुत परेशानी है क्योंकि वो व्यस्था को चुनौती दे रहे हैं .

    सहारनपुर घटनाक्रम से भीम आर्मी का बहुत जिक्र हो रहा है . बहुत से ऑनलाइन पोर्टल्स में आर्मी के संस्थापक चन्द्रशेकर आजाद और उसके अध्यक्ष के साक्षात्कार सुनाये गए हैं . चंद्रशेखर राजनैतिक तौर पर जागरूक व्यक्ति नज़र आते हैं और उन्होंने कोई ऐसी बात नहीं की है जो समाज विरोधी या संविधान विरोधी हो . हकीकत बात यह है भीम आर्मी ने लोगो को न केवल जागरुक किया है अपितु उन्हें स्वरोजगार और व्यवसाय की तरफ भी आकर्षित किया है . भीम आर्मी अभी तक दलितवर्ग में आत्मसम्मान जगाने हेतु और उनमे एकता लाने का कार्य कर रही है  लेकिन भीम आर्मी को समझना पड़ेगा के उनका इस्तेमाल बसपा की ताकत को समाप्त करने के लिये  भी किया जा सकता है इसलिए आवश्यकता इस बात की है के आन्दोलन अभी सामाजिक ही रहे और राजनीतिक प्रयोग करने का प्रयास न करे क्योंकि उत्तर प्रदेश में २०१९ तक बहुजन समाज को अपनी स्थापित पार्टियों में ही परिवर्तन लाकर मज़बूत करना होगा नहीं तो मनुवादी शक्तियों के ही हाथ मज़बूत होंगे .

    अभी तक बसपा की ओर से सहारनपुर हिंसा पर बहुत कुछ वक्तव्य नहीं आया है . भीम आर्मी से पार्टी ने पूर्णतया किनारा कर लिया है लेकिन वो ठीक नहीं है. बसपा मान्यवर कांशीराम द्वारा खड़ा किया गया आत्मसम्मान का आन्दोलन है और ये सब आसानी से नहीं होता. इसलिए जो लोग भीमसेना या कोई और लोगो को बसपा के विकल्प के तौर पर खड़ा करने की कोशिश करेंगे तो वो केवल वोट काटू की भूमिका में रहेंगे और कुछ नहीं कर पाएंगे . राजनीती के धरातल की हकीकत कुछ और होती है . बसपा प्रमुख सुश्री मायावती को चाहिए के वो भीम सेना या देश भर में हुए छात्रा आन्दोलन के नेताओं को एक मंच प्रदान करें . पिछले तीन वर्षो में हैदराबाद से लेकर जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय और अखलाक से लेकर पहलु खान तक की मौत ने, रोहित वेमुला से लेकर नजीब तक के लिए न्याय मांगते छात्र सडको पे हैं . विश्विद्यालयो की पढाई अब मुश्किल होती जा रही है और शिक्षा में हिंदुत्व का अजेंडा अब लागु हो चूका है जहा एक तरफ शिक्षा निजीकरण की और बढ़ रही है वही पाठ्यक्रम में मनुवादी विचारधारा घुसाई जा रही है . क्या बसपा या सपा जैसी पार्टिया युवाओं और छात्रो के ज्वलंत सवालो से मुंह चुरा सकती है . क्या ये अवसर नहीं के ये दोनों दल अपने अन्दर पूर्णतया पारदर्शिता लाये, युवा नेतृत्व विकसित करें और देश के युवा नेतृत्व चाहे भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आजाद हो जिग्नेश मेवानी या कोई और, सबको कार्यक्रमों के जरिये एक मंच पर लाये ताकि जो युवा बदलाव के लिए संघर्ष कर रहे है उन्हें एक राजनैतिक मंच मिल सके .

    बसपा राजनितिक मजबूरियों के तहत चाहे ब्राह्मणों के साथ ‘अन्याय’ की बात कहे लेकिन वो दलितों, अकलियतो पर हो रहे अत्याचारों पर अगर खुल कर सामने नहीं आती है और यदि ऐसे आन्दोलनों का समर्थन नहीं करती जो दलितों की अस्मिताओ की रक्षा और उनकी सामाजिक आन मान के लिए बनायी गयी हैं तो उसका अस्तित्व नहीं रहेगा. बसपा को अभी भी समाज का समर्थन प्राप्त है लेकिन एक बात बसपा नेतृत्व को समझनी पड़ेगी के लोगो की सहनशीलता जवाब दे रही है . बसपा की मजबूती दलित अस्मिता के लिए जरुरी है लेकिन इसके साथ ही बसपा के अन्दर नए युवा नेतृत्व को विकसित करना पड़ेगा . आज से २० साल बाद बसपा का नेतृत्व क्या होगा और कौन करेगा इसके लिए एक नहीं कई युवा खड़े करने पड़ेंगे .

    सहारनपुर का घटनाक्रम योगी आदित्यनाथ की राजनीती और उनके आड़ में ठाकुरशाही चलाने वालो के लिए मुश्किलें पैदा कर सकता है . संघ दलित और पिछडो के बीच के अंतर्द्वंद का लाभ लेता आया है . मुसलमानों को जबरन बीच में डालकर उसने सवर्ण नेत्रत्व को सबके उपर लाद दिया है . लेकिन जहाँ दलित पिछडो के अंतर्द्वंद हैं वही ब्राह्मण ठाकुरों के भी गंभीर अंतर्द्वंद हैं और उनकी एकता का एक ही बिंदु है वो दलित पिछड़ा विरोध की राजनीती लेकिन जब सत्ता के मलाई की बात आती है तो दोनों के अंतर्द्वंद आपस में टकरायेंगे और सुश्री मायावती ने ब्राह्मणों के साथ हो रहे ‘अन्याय’ को लेकर उस मुद्दे को खड़ा करने की कोशिश की है लेकिन वो अभी नहीं कामयाब होगी क्योंकि ब्राह्मण और ठाकुर या अन्य सवर्ण जातिया अभी हिंदुत्व को छोड़कर कही और जाने से रही क्योंकि मोदी और योगी युग स्वर्ण प्रभुत्वाद की एक नयी शुरुआत है और इसको वो आसानी से हाथ से जाने नहीं देंगे .

    फिलहाल सहारनपुर में दलितों को न्याय देने की बात अभी तक एक भी मंत्री ने नहीं की है . सारा प्रशाश्निक फोकस ऐसा लगता है, भीम सेना पर है  और घायल लोगो और उनके उजड़े घर बार कैसे बसेंगे इसके लिए कोई प्रयास नहीं किये जा रहे . दुखद बाद यह है कोई भी राजनैतिक दल अभी संघ की चालो को समझ नहीं पा रहे या उसकी काट नहीं ढूंढ पा रहे और ये उनकी सबसे बड़ी कमजोरी है . जरुरत है दलितों के साथ अन्याय को ख़त्म करने की और सरकार को दलित परिवारों पर हमला करने वाले लोगो को गिरफ्तार करने की और लोगो को समय पर मुवावजा दिलवाने की . सहारनपुर के दलितों को सुरक्षा और सम्मान चाहिए और जिन भी लोगो ने दलित बस्ती को जलाया या उनकी महिलाओं और पुरुषो पर अत्याचार किया उनके खिलाफ तुरंत कार्यवाही करे क्योंकि उसके अभाव में युवा इस क्षेत्र में शांति व्यवस्था कायम करना बहुत मुश्किल होगा .

    वैसे भी संघ का अजेंडा दलित बहुत समाज और अन्य विपक्ष  को नेतृत्वविहीन कर देने का है . बसपा में विघटन का प्रयास किया गया है और अब नसीमुद्दीन सिद्दीकी मीडिया को रोज ‘ब्रेक न्यूज़’ देंगे जैसे कपिल मिश्र दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल के लिए और कांग्रेस के कई नेता अब सोनिया और राहुल के खिलाफ बोल रहे हैं वैसे ही मुलायम सिंह को लगातार खबरों में रखा जायेगा ताकि अखिलेश यादव भी लाइन पे रहे . लालू यादव को पहले ही फंसाने की पूरी तैय्यारी है . मतलब यह के विपक्ष में खुले तौर पर फूट डालने का अजेंडा है और इसे समझने की जरुरत है .

    इस बात को भी समझना पड़ेगा के मुख्य धारा की राजनीती ने अभी तक जनता के ज्वलंत प्रश्नों पर गहरी चुप्पी साधे हुई है . चाहे वो बस्तर में आदिवासियों के जंगल में अधिकार का मामला हो या कश्मीर में राजनैतिक पहल , झारखण्ड के आदिवासियों का संघर्ष हो या विश्विद्यालयो में छात्रो के संघर्ष सभी जगह स्वयंस्फूर्त आन्दोलन खड़े हैं और राजनैतिक दल कुछ कह नहीं पा रहे हैं . या तो पार्टियों में इन सवालो पे ज्यादा चर्चा नहीं है अथवा नेतृत्व इन प्रश्नों को सही नहीं मानते हैं . हकीकत यह के अम्बेडकरवादी युवा अब अन्याय सहने को तैयार नहीं है चाहे वो रोहित वेमुला हो या भीम सेना का प्रश्न, लोग नेताओं का इंतज़ार नहीं करेंगे और आन्दोलन होंगे . बहुजन राजनीती को चाहिए के वे इन युवाओं के सपनो और आकांक्षाओं को मज़बूत करे और उन्हें रजिनैतिक रूप दे अन्यथा आन्दोलन किसी प्रश्न से शुरू होते हैं और राजनैतिक भटकाव का शिकार हो जाते हैं जो अंततः उस आन्दोलन को नुक्सान करते हैं जिसकी मजबूती के लिए वे शुरुआत करते हैं . हमारे सामने बहुत उदाहरण हैं जब नेकनीयती से किये आन्दोलन भटकाव का शिकार हो जाते हैं क्योंकि वो राजनैतिक तिकड़मे नहीं जानते . आवश्यक है के बहुजन राजनीती इन आन्दोलनों से बात करे और भविष्य की और देखे ताकि बिखराव की स्थिति पैदा न हो . उत्तर प्रदेश के चुनाव परिणामो से लोगो में बहुत निराशा भी है लेकिन भीम सेना ने उनमे पुनः उर्जा का संचार किया है . जब बहुजन राजनीती इन प्रश्नों पर खामोश रहेगी तो लोग अपना रास्ता खुद तय कर लेंगे लेकिन वो स्थिति बहुत अच्छी नहीं होगी क्योंकि उस परिस्थिति का लाभ वो लोग लेंगे जिन्होंने योज्नाबद्ध तरीके से सहारनपुर के घटनाक्रम को अंजाम दिया . देश में युवाओं की बहुत बड़ी आबादी जिसके मन में मौजूदा नेतृत्व और उसके तौर तरीको के प्रति घहरी निराशा है क्योंकि वो उनकी भावनाओं और महत्वाकांक्षाओ को समझने में या तो नाकाम रहा है या जानबूझकर उनकी अनदेखी कर रहा है  जो लम्बे समय में राजनैतिक तौर पर नुक्सान्वर्धक हो सकता है. राजनैतिक तौर पर पार्टियों को समझना पड़ेगा के यदि प्रशाशन उत्पीडित समूहों को न्याय देने में अक्षम रहा और यदि हिंदुत्व की सेनाए लोगो को जहा तहां पीटती रही और प्रशाशन कोई कार्यवाही नहीं करेगा तो जवाब में लोग भी अन्याय का मुकाबला करने के लिए जातीय राजनीती और उसकी अक्षमता के फलस्वरूप जातीय सेनाओं पर भरोषा करना शुरू करते हैं जो अंततः लोकतंत्र के लिए खतरनाक है लेकिन अगर बिहार में रणवीर सेना दलितों का उत्पीडन नहीं करती तो जवाबी सेनाये नहीं बनती  इसलिए जरुरी है के प्रशाशन कानून का शाशन स्थापित करे और लोगो को न्याय मिले .

  • ‘कविता का जोखिम’

    Shayak Alok

    ‘कविता का जोखिम’ विषय पर हिंदी अकादमी, दिल्ली के मंच से दिया गया मेरा वक्तव्य – शायक

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    मैं भी लिखकर लाया हूँ. अभी रवीश कुमार पुरस्कार लेने गए थे तो कहा कि ‘उम्र हो गई है तो सोचा कुछ लिखकर लाते हैं.’ उसके बाद उन्होंने कविता की भाषा में कुछ भारी बातें कहीं. घड़ी की टिक टिक. आहट. ब्लाह ब्लाह. भाषण लिखकर ले जाना अच्छा ही होता है. इससे भटकने और दुनिया को भटकाने पर कुछ रोक लग सकती है.

    अभी आप में से कुछ लोग सोच रहे होंगे कि मैं रवीश कुमार पर व्यंग्य कर रहा रहा हूँ और कुछ लोग सोच रहे होंगे कि लगता है ये महाशय भी एनडीटीवी प्रकार के बुद्धिजीवी हैं. इस समय का सबसे बड़ा जोखिम यही है कि एक कवि भी अपना मुंह खोले तो उसे सामने लगी दो कतारों में से एक में खड़ा कर दिया जाता है. कविता का सबसे बड़ा जोखिम यह है कि ऐसी तय कतारों के बीच कविता अपनी सुसंगत जगह कैसे बनाए.

    कविता के जोखिम पर अकादमिक भाषा व परिभाषा में एक युवा कवि के पास निर्णयपूर्वक कुछ कह सकने की सुविधा बेहद कम है. मेरे पास संशय अधिक है कि साध्य क्या है और हमें कौन से टूल्स आजमाने हैं. इसलिए मैं आपका बेहद कम समय लूँगा और कुछ उलझी हुई बातें ही कहूँगा. सबसे पहले तो कविता की परिभाषा का ही संकट है जहाँ एक सुविज्ञ अध्येता एक परिभाषा गढ़ता है तो दूसरा उसपर दूसरे प्रकार की आपत्तियां लादता हुआ उपहास करने लगता है. आप नामवर सिंह, डा. नगेन्द्र और जगदीश गुप्त के नाम यहाँ रख लें. मैंने पढ़ा कि ‘जकड़ी जा रही सभ्यता में कला की स्वायत्तता का प्रश्न ही कला का जोखिम है.’ अगर स्वायत्तता की आधारभूमि को हम केंद्र में रख भी लें, कि यह कला या कविता का सबसे बड़ा जोखिम है, तो इस स्वायत्तता की परिधि का ठीक ठीक निर्धारण कठिन है. पहला संकट, कि बहस स्वायत्तता तक ही नहीं ठहरी हुई है.

    एक दूसरा विचार सापेक्षिक स्वायत्तता या स्वतंत्रता का है. इसमें भी सुधार व आदर्श की गुंजाइश की मांग रखते हुए स्वयत्तता अर्थात ऑटोनोमी, को अस्मिता अर्थात आइडेंटिटी से स्थानापन्न कर देने का प्रस्ताव है. अब अस्मिता को लेकर संकट यह है कि इसका सृजन मनुष्य अपनी आत्मचेतना के अंदर करता है, इसलिए वह सपनों व आकांक्षाओं में भटकती रहेगी. हेगेल ने अस्मिता के बारे में यह कह रखा है कि अस्मिता हमेशा दूसरों के विरुद्ध होती है. इससे एक दुष्चक्र का निर्माण होता है जहाँ दूसरे को नष्ट कर हम सम्पूर्ण बनना चाहते हैं लेकिन दूसरा नष्ट होता है तो उसके बिना हमारा ही अस्तित्व नष्ट हो जाता है. यह बात निर्मल वर्मा ने कही है. सापेक्ष स्वायत्तता का हिंदी विचार नामवर सिंह ने लोकप्रिय कराया है. बीच में अशोक वाजपेयी यह प्रस्ताव लेकर आए हैं कि कविता की स्वायत्तता का आग्रह उसे राजनीति या जनजीवन से विमुख करना नहीं है और इसलिए वे कविता के लिए राजनीति सी किसी सत्ता या समकक्षता की मांग रखते हैं. किन्तु यहीं फिर वे राजनीति को उपलब्ध प्रणाली, ढांचे या व्यवस्था पर कोई विचार नहीं करते और कविता के जोखिम के किसी प्रश्न से उलझते हुए सीधे ‘इधर के कवियों में बौद्धिक ठसपन और एंद्रियता के अभाव’ की शिकायत करने लगते हैं.

    आर्ट या आर्टफॉर्म के जोखिम को फिर आइडियोलॉजी के रु ब रु देखा गया है. चेतना के परिप्रेक्ष्य में आइडियोलॉजी को एकमात्र चुनौती कला से ही मिलती है क्योंकि वह स्वतंत्र स्थिति की आकांक्षा रखती है, लेकिन ऐसा करने पर फिर कला ही संदिग्ध हो उठती है क्योंकि उससे आइडियोलॉजी की कथित पवित्रता भंग होती है.

    इसी प्रकार कविता के जोखिम को हम फिर प्रासंगिकता और उपादेयता से समझने का प्रयास करते हैं. कला की प्रासंगिकता बढ़ी है क्योंकि आधुनिक युग में मनुष्य की स्वतंत्रता गहन संकट में है, लेकिन विरोधाभास यह है कि कला ने अपनी स्वतंत्रता का स्वैच्छिक परित्याग कर खुद को किसी फ्रेम में जकड़ लेना स्वीकार कर लिया है. आइडियोलॉजी एक फैशन की तरह भी कविता पर हावी हुआ है कि चलन में यही है तो यही लिखते हैं. निर्मल वर्मा आह भरते हुए कहते हैं कि जिनके पास शब्द हैं उनके पास सत्य नहीं और जिनके पास अपने असहनीय अनुभवों का सत्य है, शब्दों पर उनका अधिकार नहीं.

    कविता के जोखिम से जुड़े विषयों पर गोएटे, फाकनर, हेगेल, मार्क्स, कैसिरर, फ्रायड, विटगेन्सटाईन आदि के हवाले से बहुत सी बातें कही जा सकती हैं लेकिन मुझे संशय है कि फिर भी कविता के जोखिम के इस प्रश्न को अंतिम-अनंतिम तरीके से सुलझाया जा सकता हो.

    बातें हैं बातों का क्या !

    यह ऐसा है कि एक मछली की कहानी में कई मछलियाँ उसे तैरने का पाठ देती रहीं. अथाह जल में नहीं जाना, उथाह तल पर नहीं आना. हरे रंग से डरना. लाल पर भरोसा मत करना. मैंने एक दिन श्री प्रभु जोशी से पूछा कि आखिर में उस मछली का क्या बन पड़ा ? उन्होंने कहा कि एक नए विमर्श में उसपर खोज जारी है, अभी वह मछली ही नहीं मिल रही.

    कुछ दिन पूर्व विश्व कविता दिवस पर मैंने चिली के प्रसिद्ध कवि निकानोर पर्रा की एक कविता का अनुवाद किया जो नवोदित कवियों को संबोधित है.

    जैसे तुम्हारा मन हो वैसे लिखो
    किसी भी शैली में जो तुम्हें पसंद हो

    बहुत खून बह चुका इस पुल के नीचे
    महज इस भ्रम के नाम पर
    कि केवल एक ही रास्ता है जो सही है

    कविता में सबकुछ स्वीकृत है

    बेशक लेकिन लिखो तो केवल एक शर्त पर
    कि खाली पन्ने को भरोगे तो बेहतर से भरोगे.

    मेरे लिए कविता अपने बोध और अनुभूति से की गई संवाद की एक क्रिया है क्योंकि मैं खुद को सबसे पहले एक इकाई मनुष्य और एक नागरिक के रूप में देखता हूँ. मेरे सामने कविता का सबसे बड़ा जोखिम मेरे खुद के बचे रहने का जोखिम है क्योंकि समय का इतिहास लगातार एक संक्रमण से गुजरता हुआ जब मेरे समय तक पहुंचा है तब राजनीतिक, सामाजिक और वैचारिक रूप से पूरा विश्व एक बिसुबियस क्रेटर पर बैठा नजर आता है. इस प्रकार प्रत्येक इकाई मनुष्य, और नागरिक के ऐतिहासिक संवाद की जिम्मेवारी बढ़ गई है.
    हम एक दृश्य जगत में जीते हैं तो हमारी प्रकट चुनौतियाँ सर्वप्रथम इस दृश्य जगत की चुनौतियाँ ही हैं और हमें हमारे हथियारों या उपस्करों के साथ इसका तात्कालिक मुकाबला करना है.

    मैं कविता के जोखिम के प्रश्न को कविता के अंदर का प्रश्न नहीं रखना चाहता. मैं इसे चेतना-अवचेतना के गुह्य कक्षों से नहीं गुजारना चाहता. न ही मैं इसे महान पवित्रता के किसी अखंड दरवाजे की तरह समय के तोप के आगे निरीह छोड़ देने के पक्ष में हूँ. मैं कविता और साहित्य को संवाद और संदेश के माध्यम के रूप में देखना चाहता हूँ जो दृश्य जगत की समस्याओं से सीधे वार्तालाप में सक्षम हो. मैं सिनेमा की तरह इस माध्यम के विस्तार के पक्ष में हूँ.

    अगर कविता का सबसे बड़ा जोखिम अपने लिए स्वायत्तता की तलाश ही है तो हमें इसके लिए एक स्थूल व्यवस्था का निर्माण करना होगा. हमें उस व्यवस्था के संचालन के लिए ईमानदार स्थितियों की रचना करनी होगी. हमें लेखक संगठनों की भूमिकाओं का विस्तार करना होगा. अकादमी-विश्वविद्यालयों-संस्थानों और संगठनों के बीच एक संवादपरक व सहयोगपरक समन्वय की राह जाना होगा.

    पिछले वर्ष मैंने श्री उदय प्रकाश को एक चिट्ठी लिखी और उनसे आग्रह किया कि पुरस्कार कोई कृपा नहीं हो बल्कि एक युवा प्रतिनिधि संवाद स्वर चुनने की इच्छा हो जो हमारे साथ या हमारे समानांतर हांक लगा सके.

    युवाओं के लिए उपलब्ध, चिन्हित होने के जो भी मौके हैं, वहां मैंने लोकतांत्रिक और सुगढ़ प्रक्रिया की अपेक्षा रखी. मैंने कहा कि साहित्य में नोबेल का उदाहरण हमारे सामने है तो हम इस प्रकार से चयन क्यों नहीं कर सकते कि इस दस को हमने अंतिम रूप से चुना और यह एक पुरस्कृत हुआ. मैंने अपेक्षा रखी कि भारत भूषण का पुरस्कारदाता अपनी प्रस्तावना लिखे तो उसमें जिक्र करे कि पिछले वर्ष उसने किन किन युवा कवियों की कौन कौन सी कविताएं पढ़ अपने अंतिम निर्णय को चुना. मैंने यह प्रस्ताव दिया कि उसके लिए खुद चुन सकना कठिन हो तो वह कविताएं आमंत्रित ही कर ले. बेढब व्यवस्था की सवारी करती कविता दूसरी सत्ताओं से आदर्श की मांग कैसे कर सकती है?

    प्रतिनिधित्व का महत्व है. आवक पीढ़ी को चिन्हित करने का भी. कविता का जोखिम नई प्रतिनिधि पीढ़ी को तैयार करना है. हम इसे कविभरोसे नहीं छोड़ सकते कि वह जो पाए अपनी खुद की गोटियाँ फिट कर पाए. आपकी इच्छा है कि कविता राजनीति सरीखी कोई स्वायत्त सत्ता हो और आपका योगदान यह कि आप शोरशराबे के साथ एक बेकार का मजमा जुटाते है, कोई ढांचा बनाने की कोशिश नहीं करते.

    दो वर्ष पहले अशरफ फ़याद का मामला सामने आया. अशरफ फ़याद फिलिस्तीनी मूल के युवा कवि हैं और सऊदी अरब में रहते हैं. सऊदी सरकार ने ईशनिंदा के आरोप में उन्हें बंदी बना लिया और फांसी की सज़ा सुना दी. पूरी दुनिया में इस सजा पर लेखकों के प्रोटेस्ट सामने आ रहे थे. लेकिन दिल्ली हमारी चुप थी. हिंदी में सबसे पहले इस विषय को केरल से कवयित्री रति सक्सेना ने उठाया. मैंने फ़याद की अंग्रेजी अनुवादक मोना करीम से संपर्क किया और पहली बार अशरफ की दस क्रांतिकारी कविताओं को हिंदी में लेकर आया. और हिंदी की प्रतिक्रिया ऐसी कि फेसबुक पर घूम घूमकर कवयित्री से दिवाली विशेषांक के लिए कविताएं मांगने वाला हमारा बड़ा कवि-संपादक इस संवाद के प्रकाशन में कोई रूचि नहीं रखता !

    निराशा होती है. बहुत बहुत निराशा होती है. बहुत निराशा होती है कि 2014 के विकल्पहीन वैचारिक विप्लव काल के बाद जहाँ कविता की आक्रामकता हमारा प्रतिनिधित्व करती, वहां आप हमपर अर्थविहीन बिंबों और कविता की खिलंदड़ी को थोप देते हैं. हम हिंदी के लोग बचपन से नीरो को कोसते बड़े होते हैं कि रोम जल रहा था तब वह बाँसुरी बजा रहा था, लेकिन जब हमारे घर आग लगी तब हम खुद बाँसुरी सुनने में लग पड़े. तो मैं बेहद जोर देकर कहता हूँ कि कविता का जोखिम कवियों और कविताओं की इस आंतरिक दुनिया के धैल बेईमान बोध और समीकरण को ध्वस्त करना है.

    कविता को एक बड़ा खतरा उसकी नष्ट होती जाती स्वीकार्यता से भी है. हमने अखबारों में कितनी ही भाग जाती लड़कियों की खबरें पढ़ी. लेकिन हम उन लड़कियों की संवेदना से तब गहरे जुड़े जब आलोक धन्वा ने भागी हुई लड़कियां लिखी. हमने हताशा में बैठे हुए किसी किरदार को उतनी गहराई से यूँ नहीं महसूसा जैसा विनोद कुमार शुक्ल के हाथ बढ़ाने के बाद महसूसा. कविताएं, ख़बरों और दृश्यों की संवेदनात्मक पुष्टि थी. वह असर खोता जा रहा. सोशल मीडिया के आगमन के बाद कविताएं भी रोजमर्रा के पोस्ट की तरह लिखी जा रहीं और हम कविताओं को रोजमर्रा की ख़बरों की तरह देखते हुए गुजर जा रहे. कविताएं जैसे सिंथेटिक उत्पाद भी बन गई हैं जहाँ प्रथम पुरुष के साथ दुनिया के तमाम इतर पीड़ा का रोज़ाना उत्पादन किया जा सकता है. ऐसी पीड़ा किसे झकझोरेगी जिसका कर्ता उस पीड़ा से दूरस्थ संबंध रखता है.

    मैं अपने युवा साथियों से भी संबोधित होना चाहूंगा कि वे एक दूसरे की कविता को किसी साझा उपलब्धि की तरह देखें और जो कविता, समय से खुले मुठभेड़ में रत हो, तुरंत आकर उसका कंधा थाम लें, ताकि वह लड़खड़ा जंग न हार जाए.

    कवि हूँ मैं, तो अंत में एक कविता से ही अपनी बात समाप्त करूँगा. यह कविता संवाद के जोखिम पर है जो मेरे चिरंतन संशय के साथ ही समाप्त हो जाती है. चिरंतन संशय ने नीत्शे को पागल कर दिया और टालस्टाय ने अपने अंतिम दिनों में पूछा कि – क्या कला का कोई अर्थ है?

    अंत में यही होगा बहुत से बहुत कि
    तुम उठा डाल दोगे मुझे पागलखाने में
    एक बयान जारी कर कहोगे कि नहीं था यह किसी के पक्ष में
    न लाल हरा न नीला केसरिया !
    कि इसने मुझे भी
    मेरे विरोधियों को भी गालियाँ बकी
    कि प्रेस वार्ता के बाद के शराब भोज में
    मुझे जानने वाला संपादक तुम्हारे कान में कहेगा-
    ‘ ठीक किया .. अजब पागल था ‘

    वे जो मुझे कनखियों से देखते हैं
    जो इस दौरान चुप थे, रहे थे ताक में
    मुस्कुराएंगे
    वे जो कविताएं लिखते हैं, मेरी कविताएं चबाएंगे.

    यह भी होगा कि
    पागलखाने की सलाखों से मैं हंसूंगा तुमपर
    कुछ और ही जोर से, और चिल्लाऊंगा
    और तुम्हें लिखेंग चिट्ठियाँ वे कुछ
    जो मेरी तरह शोक में थे ऐसे संक्रमित समय पक्ष के

    अंत में यह होगा कि तुम्हारे तमाम पक्षों के खिलाफ
    मेरे पक्ष की संख्या में इजाफा होगा
    या यह होगा कि इस मुल्क में
    पागलखानों की तादाद बढ़ानी होगी तुम्हें.

     

  • अखिलेश सिंह यादव को मुख्यमंत्री मोड से बाहर आ जाना चाहिए

     
    Akhilesh Yadav

    मैं अखिलेश सिंह यादव का प्रशंसक रहा हूं जबकि उनसे कभी आमने सामने नहीं मिला। उनसे या उनकी सरकार से या उनकी पार्टी से या उनके कार्यकर्ताओं से मैंने कभी एक रुपए का कोई लाभ नहीं लिया।

    किंतु इधर फेसबुक जैसे सोशल मीडिया में उनके समर्थकों व मीडिया में अखिलेश के बयानों से यूं लग रहा है कि अखिलेश अपने अंदर से अभी यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं कि वे अब मुख्यमंत्री नहीं रहे हैं। यह भी लगता है कि मान बैठे हैं कि वे अगली बार 2022 में यूपी में सरकार बनाने जा ही रहे हैं जैसे 2012 में बनाई थी। 2012 की परिस्थितियां भिन्न थीं लोग बसपा से लोग चिढ़े हुए थे, भाजपा कमजोर थी, सपा की सरकार बननी ही थी। अखिलेश यादव के प्रचार ने इसमें सहूलियत दी और सपा सरकार में ढंग से आ गई।

    2012 में सपा की लड़ाई बसपा व मायावती जैसे नान-प्रोफेशनल्स से थी, ट्रांसफर-पोस्टिंग में माल कमाने, जन्मदिन में महंगे उपहार लेने जैसे बहुत टटपुंजिया जैसे क्रियापलापों से लोग ऊब चुके थे। ऊपर से इनके पास दूसरी पंक्ति लीडरशिप नहीं, ठोस जमीनी संगठन नहीं, लोगों से संवाद का नेटवर्क नहीं। ऐसी परिस्थितियों में साइकिल चला कर, रथ निकाल कर, प्रेस कान्फेरेंश करके चुनाव जीता सकता है।

    वर्तमान मुख्यमंत्री आदित्यनाथ योगी से गलतियां होगीं, पिछड़ा व दलित वर्ग सवर्णों की तानशाही व आक्रामकता से ऊबकर अखिलेश के साथ खड़ा होगा क्योंकि अखिलेश ही एकमात्र विकल्प हैं। इस धारणा के कारण मीडिया में बयानबाजी करते रहने के भरोसे ही 2022 की चुनावी बैतरणी पार करने की रणनीति पर काम करने की बजाय अखिलेश यादव को अगले पांच के लिए ठोस जमीनी क्रमागत सामाजिक योजनाओं का क्रियान्वयन करना चाहिए।

    2022 में अखिलेश यादव का मुकाबला भाजपा जैसी प्रोफेशनल व भारत की सबसे ताकतवर पार्टी से होगा जो चुनावी जीत के लिए कुछ भी करती है। संघ व भाजपा का व्यापक व मजबूत संगठन है। हर स्तर पर विभिन्न योग्यताओं व विभिन्न क्षमताओं के प्रतिबद्ध लोग हैं पार्टी व संगठनों में हैं। संघ व भाजपा से संबद्ध सैकड़ों संगठन हर स्तर पर हैं।

    जैसे अखिलेश यादव स्वयं को देश के प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं, वैसे ही आदित्यनाथ योगी भी प्रधानमंत्री बनने की दौड़ की महात्वाकांक्षा रखते हैं। भाजपा का विस्तार व नेटवर्क तो पूरे देश में है ही। समाजवादी पार्टी तो यूपी में ही सिकुड़ रही है। अखिलेश यादव को तो बहुत ही अधिक मेहनत, दूरदर्शिता व धैर्य की मूलभूत जरूरत है।

    सपा के कार्यकर्ताओं का मनोबल वैसे तो 2014 से ही टूटना शुरू हो चुका था, लेकिन 2017 के चुनावों में हार होने सत्ता न रहने के बाद मनोबल बहुत तेजी से टूट रहा है। धैर्य तो अभी से ही खतम हो रहा है जबकि सत्ता गए हुए दो महीने ही हुए हैं, पूरे पांच साल अभी बाकी हैं।

    पांच साल सत्ता में रहते हुए अखिलेश जी ने

    नौकरशाही को जवाबदेह बनाने का प्रयास नहीं किया,
    पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,
    पिछड़ों व दलितों की सामाजिक राजनैतिक व वैचारिक जागरूकता के लिए ठोस कार्य योजनाबद्ध तरीके से नहीं किया,
    शिक्षा की गुणवत्ता व्यवस्था बेहतर बनाने के लिए कार्य नहीं किए,
    पिछड़ों, दलितों व मुसलमानों के लिए आर्थिक विकास के लिए दूरदर्शी योजनाएं लेकर नहीं आए,
    सामाजिक न्याय के लिए गंभीर व दूरदर्शी प्रयास नहीं किए,  

    ……. सत्ता रूपी अवसर व संसाधन मिलने के बावजूद बहुत कुछ नहीं किया, जो किया ही जाना चाहिए था।

    मैं अखिलेश सिंह यादव जी को सुझाव देना चाहूंगा कि –

    पिछड़े, दलित व मुसलमानों के लिए जमीन पर उतर कर काम व संघर्ष कीजिए। बिना बिस्तर के सोइए। घर में रहने व खाने की बजाय, गरीब लोगों के घरों में जाकर रहिए, खाइए। लोगों का मतलब यादव नहीं है, यादव जाति के बाहर भी लोग हैं। जमीनी संगठन बनाइए जिसमें सभी जातियों व वर्गों से अच्छे व जमीनी लोगों को जोड़िए, उनसे विश्वसनीय संबंध बनाइए, उनको महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां दीजिए। विश्वास कीजिए यादव जाति के बाहर भी चिंतक होते हैं, विचारक होते हैं, सांगठनिक क्षमता के लोग होते हैं।

    अध्ययन कीजिए, वैचारिक स्वाध्याय कीजिए। समाजवाद व सामाजिक समता को गहराई से जानने समझने का प्रयास कीजिए। सामाजिक लीडरशिप क्या होती है, यह जानने समझने का प्रयास कीजिए।

    समाजवादी पार्टी मतलब “समाजवाद”, समाजवादी पार्टी का कार्यकर्ता मतलब “समाजवादी”, उसमें भी यादव हुआ और बड़ा वाला “समाजवादी” इत्यादि टाइप के मोडों से बाहर आइए।

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