सोच

Dhiraj Kumar

अनिश्चितता इस कदर व्याप्त हो कि
ठीक ठीक कुछ भी कहना
ठीक नही हो तो
संभावना या प्रायिकता
इस बात कि सबसे ज्यादा होती है कि
किसी ज्ञात बिन्दु पर
या किसी ज्ञात समय पर
यदि वो ‘हाँ’ है तो
तक्षण दुसरे बिन्दु या समय पर
वो ‘ ना’ हो जाता है

ऐसा ही कुछ कुछ
यादों मे बसा हुआ
‘ सोच ‘ के साथ होता है
यादों के किसी ज्ञात-अज्ञात पड़ाव पर
सोच जब ठोस होता है तब
इसके तरल होने की
संभावना एकदम से खत्म हो जाती है
ठीक उल्टा यह कि
जब सोच बहता हुआ होता है
तब इसके ठोस होने कोई कारण
नही होता है