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  • हत्यारा किसान, दयालु चोर और क्रांतिकारी शासक!

    Tribhuvan

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    चंपूद्वीप के गर्तखंड में एक किसान के खेत में कुछ लोग घुस आए। वे गन्ने तोड़ने लगे। सरसों उजाड़ने लगे और गाजरें नष्ट करने लगे। किसान ने ऐतराज किया तो वे नहीं माने। किसान ने आव देखा न ताव, हल्ला मचाना शुरू कर दिया। मारो-मारो-चोरों को मारो।

    किसान की आवाज़ सुनकर आसपास के किसान भाग-भागकर आने लगे। वे भी शोर मचाने लगे : चोर-चोर।

    चोर डरकर भागने लगे। खेत में काम कर रहे एक मजदूर ने एक भागते चोर को पकड़ने की कोशिश की। चोर ने मजदूर को गोली मार दी। मजदूर मर गया। पूरे इलाके में हल्ला हो गया।

    घटना होते ही पुलिस आई। दो-चार दिन जांच की और आख़िर किसान को असली हत्यारा बताकर पकड़ ले गई। पूरी फ़र्द तैयार की और किसान जांच रिपोर्ट में हत्यारे को उकसाने के आरोप का दोषी पाया गया; क्योंकि किसान के “चोर-चोर! भागो चोर-चोर!!! मारो चोरों को!!!” बोलने के बाद ही चोर ने मजदूर को मारा था और चालाक चोरों ने हल्ला मचाते किसान के विडियो अपने मोबाइल फ़ोन में बना लिए थे।

    अंतत: किसान हत्या का दोषी ठहराया गया और उसे चालानी गार्ड जेल ले जाने लगे तो वहां एक और ही दृश्य था, जिसने किसान की आंखों में पानी ला दिया।

    पुलिस, प्रशासन, विधायिका, कार्यपालिका आदि आदि ने देखा कि सारे चोर जार-जार रोए जा रहे थे। किसान इन रोते हुए चोरों को एकटक देख रहा था और हैरान हो रहा था।

    पुलिस, प्रशासन, विधायिका, कार्यपालिका आदि के प्रतिनिधियों ने चोरों के प्रति सहानुभूति जताई और पूछा : अरे, तुमने हत्या की और फिर भी तुम्हें साफ बचा लिया। अब क्यों रोए जा रहे हो? मीडिया तुम्हारी तारीफें लिख रहा है, किसान की आलोचना कर रहा है, अदालत ने तुम्हारे बारे में कुछ पूछा ही नहीं, क्योंकि पुलिस की फर्द में तुम्हारे बारे में जो कुछ था, सब हटा दिया गया था। यहां तक कि किसान को किसान ही नहीं माना गया क्योंकि जमीन उसके नाम ही नहीं चढ़ी थी, वह तो पुराने जमींदार के ही नाम कागजों में बोल रही थी। किसान ने जींस पहन रखी थी और उसने एक चश्मा लगा रखा था, जिसे हमने रेबेन का साबित कर दिया था। उसके यहां रोजड़ों को भगाने के लिए सूतली बम रखे थे, पुलिस के आईओ ने सूतली शब्द हटाकर उसे बम कर दिया था और किसान सिर्फ़ हत्या ही नहीं, देशद्रोह के आरोप में भी जेल में है। पूरी सरकार तुम्हारे साथ है। अब क्यों रो रहे हो?

    सारे चोर और ज़ाेर-ज़ोर से रोने लगे और एक साथ बोले : आप जैसे न्यायकारी, दयालु, राष्ट्रभक्त, परोपकारी, सहिष्णुकारी और मानवतावादी पुलिस अफसर, मींडियाकर्मी, न्यायाधीश और प्रशासनिक अधिकारी नहीं रहेंगे तो इस देश का क्या होगा!

    सारे चोर और ज़ोर-ज़ोर से रोने लगे। किसान प्रसन्न था कि इस देश का भविष्य स्वर्णिम है; भले न्यायपालिका, कार्यपालिका, विधायिका और मीडिया से करुणा और न्याय नदारद हो जाएं, कम से कम वह कुछ आंसुओं के रूप में चोरों के हृदय में तो अक्षुण्ण है!

    Credits: Tribhuvan’s Facebook Wall

  • सोशल इंजीनियरिंग के लिए इतिहास से छेड़छाड़

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    विभिन्न समुदायों को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करना और हिन्दू समुदाय में नीची जातियों का निम्न दर्जा बनाए  रखना, हिन्दू राष्ट्रवाद का प्रमुख एजेंडा है। इसी एजेंडे के तहत, मुस्लिम राजाओं को विदेशी आक्रांताओं के रूप में प्रस्तुत कर उनका दानवीकरण किया जाता रहा है। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने भारत के लोगों को जबरदस्ती मुसलमान बनाने का प्रयास किया और इसी के नतीजे में, जाति प्रथा अस्तित्व में आई। इसी एजेंडे का दूसरा हिस्सा है आर्यों का महिमामंडन और हिन्दू पौराणिक कथाओं की इतिहास के रूप में प्रस्तुति। हाल में ब्राह्मणवादी मूल्यों को बढ़ावा देना और दलितों व ओबीसी को राष्ट्रवादी खेमे में शामिल करना भी इस एजेंडे में शामिल हो गए हैं।

    पिछले साल ओणम (सितंबर 2016) पर भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने ट्वीट कर यह कहा था कि ओणम, विष्णु के पांचवे अवतार वामन के जन्म का समारोह है। इसी के साथ, आरएसएस के मुखपत्र ‘केसरी’ ने एक लेख छापा जिसमें कहा गया कि पुराणों और अन्य हिन्दू धर्मग्रंथों में कहीं यह नहीं कहा गया है कि महाबली को वामन ने पाताललोक में धकेल दिया था। यह भी कहा गया कि धर्मग्रंथों में कहीं ऐसा वर्णित नहीं है कि महाबली, हर वर्ष मलयाली चिंगम माह में धरती पर आते हैं।

    यह पटकथा, केरल में ओणम से जुड़ी कथा के एकदम विपरीत है। ओणम, फसल की कटाई का महोत्सव है और यह माना जाता है कि इस दौरान वहां के लोकप्रिय राजा महाबली अपनी प्रजा से मिलने आते हैं। केरल में ओणम सभी धर्मों के अनुयायियों का त्योहार बन गया है। भाजपा, इसे विष्णु के वामन अवतार से जोड़कर, उसे केवल ऊँची जातियों का त्योहार बनाना चाहती है।

    इतिहास को संघ परिवार द्वारा किस तरह तोड़ा-मरोड़ा जा रहा है, इसका एक उदाहरण है उत्तरप्रदेश के भाजपा कार्यालय, जिसकी हाल में नवीन साज-सज्जा की गई है, में टंगा एक तैलचित्र। एक नज़र देखने पर यह तैलचित्र राजपूत राजा महाराणा प्रताप का लगता है। परंतु असल में यह 11वीं सदी के एक राजा सुहैल देव का तैलचित्र है। महाराज सुहैल देव के बारे में बहुत कम लोगों ने सुना है। इन्हें पासी और भार, ये दोनों समुदाय अपना राजा मानते हैं। सुहैल देव, भाजपा के नायकों की सूची में शामिल कैसे हो गया? उत्तरप्रदेश के बहराईच में अमित शाह ने सुहैल देव की एक प्रतिमा का अनावरण किया और उस पर लिखी एक पुस्तक का विमोचन भी किया। सुहैल देव को एक ऐसा राष्ट्रीय नायक बताया जा रहा है जिसने स्वाधीनता के लिए संघर्ष किया। उसके नाम पर एक नई ट्रेन शुरू की गई है जिसका नाम ‘सुहैल देव एक्सप्रेस’ है।

    इसी महीने (जून 2017), उत्तरप्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने यह घोषणा की कि लखनऊ के अंबेडकर पार्क में छत्रपति शाहू, जोतिराव फुले, अंबेडकर, काशीराम व मायावती के साथ-साथ सुहैल देव की प्रतिमाएं भी स्थापित की जाएगी। इस पार्क का निर्माण मायावती सरकार ने करवाया था और सुहैल देव को छोड़कर, अन्य सभी प्रतिमाएं वहां पहले से ही लगी हुई हैं। अब इस पार्क में अन्य जातियों के नायकों की प्रतिमाएं भी लगाई जाएंगी। यह कहा जा सकता है कि प्रतिमाएं लगाने के मामले में मायावती ने एक तरह की अति कर दी थी परंतु इसमें कोई संदेह नहीं कि अंबेडकर पार्क, लोक स्मृति में दलित पहचान को एक सम्मानजनक स्थान देने का प्रयास था। हाल में किया गया निर्णय, इतिहास के उस संस्करण का प्रचार करने का प्रयास है, जो हिन्दू राष्ट्रवादियों को सुहाता है। सुहैल देव के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसने सालार महमूद (गाज़ी मियां) से मुकाबला किया था। गाज़ी मियां, महमूद गज़नी का भतीजा था, जो इस क्षेत्र में बसने आया था।

    प्रो. बद्रीनारायण (‘फेसिनेटिंग हिन्दुत्व’, सेज पब्लिकेशंस) के अनुसार, लोकप्रिय आख्यान यह है कि सुहैल देव ने अपने राज्य में मुसलमानों और दलितों पर घोर अत्याचार किए थे। उसके दुःखी प्रजाजनों की मांग पर सालार महमूद ने सुहैल देव के साथ युद्ध किया, जिसमें दोनों राजा मारे गए। गाज़ी मियां की दरगाह पर जियारत करने मुसलमानों के अलावा बड़ी संख्या में हिन्दू भी जाते हैं। ऐसा माना जाता है कि दरगाह पर ज़ियारत करने से रोगों से मुक्ति मिलती है। दरगाह की बगल में एक तालाब है, जिसके बारे में यह कहा जाता है कि उसमें नहाने से कुष्ठ रोगी ठीक हो जाते हैं।

    इसके विपरीत, आरएसएस और उसके संगी-साथियों द्वारा यह कथा प्रचारित की जा रही है कि गाज़ी मियां एक विदेशी आक्रांता थे और सुहैल देव ने हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए उससे युद्ध करते हुए वीरगति प्राप्त की। अगस्त 2016 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने अपने भाषण में सुहैल देव का ज़िक्र किया। उन्होंने सुहैल देव को एक ऐसा राजा बताया जो गोरक्षक था और जो गायों को अपनी सेना के सामने रखकर युद्ध में भी उनका इस्तेमाल करता था।

    जहां आम लोगों के ज़हन में गाज़ी मियां की छवि सकारात्मक है वहीं भाजपा, सिर्फ हिन्दू नायक बताकर अलग-अलग तरीकों से सुहैल देव का सम्मान करने की कोशिश कर रही है। सुहैल देव इस मामले में भाजपा की दोहरी रणनीति है। एक ओर वह उसे इस्लाम के विरूद्ध लड़ने वाला हिन्दू नायक बता रही है तो दूसरी ओर वह पासी-राजभर समुदायों का एक नया नायक पैदा करना चाहती है। भाजपा का लक्ष्य यह है कि दलितों की हर उपजाति के अलग-अलग नायक खड़े कर दिए जाएं – फिर चाहे उन्होंने दलितों की भलाई के कुछ किया हो या नहीं। इसका उद्देश्य दलित एकता को खंडित करना है और इससे भाजपा के नायकों में एक और राजा जुड़ जाएगा। हमें यह याद रखना चाहिए कि अंबेडकर पार्क में जिन व्यक्तियों की मूर्तियां लगी हैं, उनमें से कोई भी सामंत नहीं था और ना ही सामंती व्यवस्था का प्रतिपादक था। इन सभी ने दलित समुदाय को उसकी गुलामी से मुक्ति दिलाने के लिए अलग-अलग तरह से प्रयास किए। इन सभी ने दलितों की समानता की लड़ाई में भागीदारी की। राजाओं को तो केवल पहचान की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए सामने लाया जा रहा है।

    हिन्दू राष्ट्रवाद के लिए इतिहास बहुत महत्वपूर्ण है और इसलिए वह हिन्दू राजाओं का महिमामंडन करने के लिए कुछ भी करने को तैयार है। राज्यतंत्रों की शासन व्यवस्था का आज के युग में कोई भी समर्थन नहीं कर सकता। परंतु संप्रदायवादी राष्ट्रवादियों को सामंती काल के मूल्य प्रिय हैं और वे उन्हें पुनर्स्थापित करना चाहते हैं। केन्द्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह का यह कथन कि राणा प्रताप को ‘महान’ बताया जाना चाहिए, इसी रणनीति का भाग है। राजस्थान के शिक्षा मंत्री वासुदेव देवनानी ने अब यह दावा भी कर दिया है कि हल्दी घाटी की लड़ाई में अकबर नहीं बल्कि राणाप्रताप की विजय हुई थी। पहले तो संघ परिवार केवल इतिहास के तथ्यों के नई व्याख्या करता था। अब वह तथ्यों को ही बदल रहा है। एरिक हॉब्सबोन ने बिलकुल ठीक ही कहा था कि राष्ट्रवाद के लिए इतिहास वही है, जो कि नशाखोर के लिए अफीम।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

    Tribhuvan

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    देश में हिंसक और बेकाबू होते आंदोलनों को नियंत्रित करने में पुलिस के अफ़सर क्यों विफल हो रहे हैं? क्यों अपने ही लोगों पर अपने ही लोगों को गोलियां चलानी पड़ती हैं? ऐसा क्या है कि नारेबाजी या प्रदर्शन करते लोगों पर आम लोगों के वही बेटे अपने ही लोगों पर गोलियां दागने लगते हैं, जिनसे उन्हें बहुत उम्मीदें होती हैं? क्या पुलिस को वाकई ऐसा नहीं बनाया जा रहा है? और क्या इसके लिए सिर्फ़ आज की सरकारें ही दोषी हैं?

    हम अगर लोगों के उग्र आंदोलनों को टटोलें तो कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आते हैं। आज़ादी के अांदोलन में जलियांवाला बाग नरसंहार को याद करें तो हम आम तौर पर किसी जनरल ओ डायर को कोसते हैं। हक़कीत ये है कि ये काम जनरल ओ डायर ने नहीं, कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने किया था। यह ब्रिटिश सेना का अधिकारी था और उसे अस्थायी तौर पर अमृतसर में ब्रिगेडियर जनरल लगाया गया था। वह संकीर्ण राष्ट्रवादी ब्रिटिशर्स के लिए एक नायक था, लेकिन उदारवादी ब्रिटिश इतिहासकारों आैर तटस्थ प्रेक्षकों ने उसे खलनायक बताया और उसकी निंदा की। कुछ ने उसे भारत से ब्रिटिश शासन को उखाड़ फेंकने वाली घटना का प्रणेता भी घोषित किया, लेकिन अत्याचारों के प्रति सदा से सहिष्णु हम भारतीयों ने इस नृशंस कांड को भी बर्दाश्त किया और ब्रिटिश शासन को 28 साल तक बर्दाश्त किया। नहीं किया तो उस किशोर ने जिसे शहीदे आज़म भगतसिंह कहा जाता है।

    लेकिन प्रश्न ये है कि क्या गोली कर्नल रेगिनॉल्ड एेडवर्ड हैरी डायर ने चलाई थी? नहीं गोलियां हमारे ही लोगों ने हमारे ही लोगों पर चलाईं और 1500 नागरिकों को मौत के घाट उतार दिया। ये हमारी ही भारतीय सेना के लोग थे। ये 9वीं गुरखा बटालियन के फौजी थे और बंदूकों के साथ-साथ खुखरियों तक से लैस थे। उनके अलावा सिख, बलौच और दूसरी बटालियनों के फौजी थे। वह अंग़रेजी शासन शैली थी और यह समझ आता है कि उनके लिए ऐसा करना जरूरी था। लेकिन आजादी के बाद हमारे शासकों ने आज तक इस नीति को नहीं बदला है। वही प्रशासनकीय शैली है और वही पुलिसीय। ऐसी कितनी ही घटनाएं बताती हैं कि स्वतंत्र भारत में हमारे शासकों ने पुलिस को वही पुलिस रहने दिया है और लोगों के प्रति नीति को भी वैसा ही।

    न जाने यह कब समझ आएगा कि हमारे अपने ही लोगों पर अपने ही पुलिस अधिकारियों को गोलियां क्यों चलानी चाहिए? हमारे शासकों को चाहिए कि वे आंदोलनों के प्रबंधन में भी अपने अफ़सरों और पुलिस के जवानों को दक्ष बनाएं और इसके लिए विश्व भर से और अपने अनुभवों से सीखने की जरूरत है। आज हमारे जवानों की न केवल ऊर्जा व्यर्थ जाती है, बल्कि उन्हें वीवीआईपी सुरक्षा के नाम पर घंटों तपना पड़ता है। हम देखते हैं कि अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा और कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन त्रेदेऊ एक रेस्तरां में बैठकर गपशप कर सकते हैं, लेकिन हमारे यहां के नेताओं ने पिछले 70 साल में ऐसी संस्कृति बना दी है कि वे दुनिया के सबसे दुर्लभ नगीने हैं।

    यह समय की मांग है कि हम अपने किसानों को या आम नागरिकों को भी यह सिखाएं कि आंदोलन किए कैसे जाते हैं? आम नागरिकों में इस शिक्षा का प्रचार होना चाहिए और खासकर किसान संगठन चलाने वाले या अन्य संगठनकर्ताओं को यह प्रशिक्षण दिया जाना देशहित में है कि आंदोलन हिंसक न हों और वे एक लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से सरकारी तंत्र पर दबाव बनाने में सफल रहें। भारतीय राजनेताओं बहुत चालाक हैं और वे यह नहीं चाहते कि ऐसी कोई विधि विकसित हो, क्योंकि इससे उन्हें ही नुकसान होता है, लेकिन लोकहित में आम लोगों को ऐसी लोकनीति के लिए सरकारी तंत्र पर दबाव बनाना चाहिए और कहना चाहिए कि आप वैज्ञानिक और तकनीकी प्रतिभाओं के सहयोग से ऐसे गोले या कारट्रिज विकसित करें, जिससे किसी का नुकसान नहीं हो, लेकिन वे नियंत्रित भी रहें। लाेगों को अपनी आवाज़ मुखरता से उठाने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए और ऐसी संस्कृति विकसित हो कि आंदोलन से पहले ही वार्ताओं के रास्ते खुलें और आंदोलकारियों के नेताओं से बातचीत की जाए।

    सनद रहे कि गोलियां भी हमारी हैं और सीने भी। रक्त भी हमारा है और माटी भी हमारी!

    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall.

  • अरे पहले ढंग से इंसान तो बनो

    Ruman Hashmi

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    ना मुसलमान खतरे में है,
    ना हिन्दू खतरे में है
    धर्म और मज़हब से बँटता
    इंसान खतरे में है।।

    ना राम खतरे में है,
    ना रहमान खतरे में है
    सियासत की भेट चढ़ता
    भाईचारा खतरे में है।।

    ना कुरआन खतरे में है,
    ना गीता खतरे में है
    नफरत की दलीलों से
    इन किताबो का ज्ञान खतरे में है।।

    ना मस्जिद खतरे में है,
    ना मंदिर खतरे में है
    सत्ता के लालची हाथो,
    इन दीवारो की बुनियाद खतरे में है।।

    ना ईद खतरे में है,
    ना दिवाली खतरे में है
    गैर मुल्कों की नज़र लगी है,
    हमारा सदभाव खतरे में है।।

    धर्म और मज़हब का चश्मा
    उतार कर देखो दोस्तों
    अब तो हमारा
    भारत खतरे में है |

    एक बनो, नेक बनो
    ना हिन्दू बनो ना मुसलमान बनो,
    अरे पहले ढंग से इंसान तो बनो।।

     

  • जय जवान – जय किसान :: सत्ता की दुकान

    Tribhuvan

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    आप किसानों को पुलिस की गोलियों से मरवा दो। आप जवानों को आतंकवादियों की गोलियों से मरने को मजबूर कर दो। आप जय जवान और जय किसान के नारे लगाते रहो।

    आप साठ हजार और सत्तर हजार करोड़ रुपए के युद्धक विमान खरीदते रहो और जवानों को यों ही मरने उनके हालात पर छोड़ दो! आप अमेरिका और फ्रांस की हथियार कंपनियों को लाखों करोड़ रुपए लुटवाते रहो, लेकिन न इस देश के जवानों की चिंता करो और न किसानों की। आप किसानों को मूर्ख बनाते रहो, वोट लेते रहो और अपनी सरकारें स्थापित करते रहो।

    आप 15 अगस्त 1947 से ऐसा का ऐसा कर रहे हो। आपकी सत्ता की दुकान वही की वही रहती है और हर पांच, दस या पंद्रह साल में एक बार उस दुकान का बोर्ड बदलते हो। सत्ता की आपकी यह दुकान किसी राज्य में किसी के नाम से चलती है और किसी राज्य में किसी से। आप कभी किसी निरीह गाय पर दांव खेल जाते हो और कभी किसी बकरी को बादाम खिलाकर अपने सत्ता प्रतिष्ठान की दुंदुभियां बजाते रहते हो।

    किसान अपना हक मांगे तो अापकी पुलिस उसे कानून और व्यवस्था के नाम पर गोलियों से ऐसे भून देती है जैसे जनरल डायर ने हमारे ही लोगों को भून दिया था। जवान अगर अपने खाने में खराबी को लेकर ठेकेदार की शिकायत भर कर दे तो अाप बदनामी से डरकर उसकी नौकरी छीन लेते हो। आप तो आप हैं। आप और आपके चमचों के अलावा इस देश में सबके सब देशद्रोही हो जाते हो। अाप सत्ता में इतने अंधे हो जाते हो कि आप अपने ही लोगों को पार्टी द्रोही बताकर उन्हें राम की तरह बनवास जैसी हालत में फेंक देते हो, क्योंकि आपकी सत्तावादी राजनीति की आत्माओं में मंथराएं विराजती हैं।

    आप कभी कांग्रेस, कभी जनता दल, कभी कम्युनिस्ट पार्टी, कभी माले और कभी बसपा, कभी सपा, कभी अकाली, कभी आम आदमी और कभी अनाद्रमुक, द्रमुक और कभी आप शिवसेना हो जाते हो। आप कभी यह तो कभी वह का रूप धारण कर लेते हो। आप गिरगिट की तरह रंग बदलते हो और गिरगिट आपके सामने लज्जित हो जाता है। आप जब सत्ता से बाहर होते हो तो आप अपने पास अमृत कुंड रखने का दम भरत हो और जैसे ही आप सत्तासीन होते हो तो आप अपने सोने के घड़ों को विष से भर लेते हो। प्रभु, आप का यह कौनसा रूप है? आप सफेद, हरे, लाल, नीले, आसमानी और न जाने कैसे-कैसे हो जाते हो। आप तिरंगे होते हैं तो आपकी आत्मा का कालापन साफ दिखता है, लेकिन आप जब केसरिया होने की कोशिश करते हैं तो आपका हृदय केसर की क्यारियां खिलाने वाले लोगों को देखकर डरप उठता है।

    आप राजस्थान के घड़साना में किसानों को गोलियों से भून देते हो। आप आंदोलन कर रहे 70 गुर्जरों को एक साथ गोलियों से धराशायी कर देते हो। आप कर्नाटक, महाराष्ट्र, पश्चिम बंगाल, बिहार, उत्तरप्रदेश, तमिलनाडु, केरल और उड़ीसा में आंदोलनकारियों के रक्त से स्नान करते हो। आप लोकतांत्रिक युग में हो और आदिम युग का सा विकल्प लेकर प्रस्तुत होते हो। आप चुनावों में ऐसे प्रस्तुत होते हैं, मानो आप ही भगवान राम और श्रीकृष्ण के अवतार हैं, लेकिन जैसे ही सत्ता में आप आते हो और लोग आंदोलन करते हैं तो आपका भी स्वरूप वही पुरानी सरकार सा विकराल नजर आता है और आपकी सरकार नरमुंड धारण करने को उत्कंठित किसी काली का स्वरूप नजर आती है, लेकिन लोकतांत्रिक युग के प्रभुओ, सुनो कि काली दुष्टों का दमन करके उनके नरमुुंड पहनती थी कि न कि अपनी ही प्रजा के। वह प्रजा को सताने वालों को दंडित करती थी, लेकिन आपकी माया अनूठी है मेरे प्रभु। आप तो सताए हुओं के नरमुंडों की माला पहनते हो।

    अाप कैसे राजनेता हैं? आख़िर इस देश के राजनेता किस दिन ऐसी नीतियां बनाएंगे कि न इस देश के जवानों का रक्त बहे और न किसान का। कब हमारे राजनेता ऐसे देश का निर्माण करेंगे कि सीमा पर हमारे जवान के युद्ध आभूषण देखकर शत्रु निगाहें नीची कर ले और किसान सीना तानकर चले। कब कश्मीर में शांति लौटेगी और कब सरहद पर हम रक्तस्नान बंद करेंगे? भगवान् महावीर और बाबा नानक के इस देश में कब कोई देश के नागरिकों से प्रेम करने वाला अपना सा शासक आएगा? https://geembi.com कब कोई भगवान बुद्ध की शिक्षा लेकर इस देश के आम नागरिक के साथ उसके आंसू पौंछने और उसके क्लेश मिटाने आएगा? कब कोई भगवान राम की इस मर्यादा को इस देश में स्थापित करेगा कि किसी के मन को पीड़ा पहुंचाकर सत्ता प्राप्त करना मैं अपनी ठोकर के बराबर मानता हूं और कब इस देश में ऐसे राजसी लोग होंगे, जो सत्तासीन होने वाले भरत के साथ नहीं, वनगमन को जाते राम का साथ गहेंगे।

    आखिर क्यों हमारे देश का किसान दो रुपए किलो टमाटर और ढाई रुपए किलो प्याज बेचने को मजबूर है? नोटबंदी के दिनों में किसानों ने मुफ़्त में अपनी मटर, गोभी, आलू और अन्य फसलें मुफ्त तक कटवा डालीं। क्या किसी व्यापारी ने कभी ऐसा किया है? क्या देश में कभी ऐसे हालात बन हैं कि कारोबारियों ने घाटा खाकर चीजें बेची हों। आखिर किसान को ही आत्महत्या करने के लिए क्यों मजबूर किया जाता है? क्यों ऐसा है कि चुनाव जीतने के लिए यूपी के किसानों के कर्ज माफ कर दिए जाते हैं और शेष देश के किसान तड़पकर रह जाते हैं? आप क्यों ऐसी चालें चलते हैं कि एक जगह जो चीज ठीक है, वही दूसरी जगह एकदम गलत हो जाती है। आपके लिए राजस्थान, मध्यप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों का किसान उसी कर्जमुक्ति का पात्र क्यों नहीं बनता जो आप उत्तरप्रदेश में सहज ही बना देते हैं।

    आखिर कब वह समय आएगा जब इस देश को भगवान राम जैसा कोई शासक मिलेगा, जो अगर झूठे ही किसी की शिकायत सुन ले तो अपनी प्राण प्रिया को निकाल बाहर करे या सत्ता को ठोकर मार कर चल दे। बन-बन भटकता फिरे और सबसे कमजोर लोगों में ऐसी ताकत भर दे कि वे उफनते समुद्र पर पुल बना दें और राक्षसी सत्ता का सर्वनाश कर दें। न कि वे अपने ही भाई बंधुओं सहनागरिकों और सह शासकों को झूठे बदनाम करके अपनी मैली आत्माओं को सबसे सुवासित घोषित करने के शासकीय आदेश जारी कर दें। यह कब तक होता रहेगा?

    राजनीतिक दलों का यह रवैया कब बदलेगा कि वे खुद तो सुरक्षित होते रहें और इस देश के जवान और किसान को बेहाल मरने के लिए छोड़ दें। कभी वह अपने ही नागरिकों को यह बना दे या वह बना दे और खुद एक कड़े सुरक्षा घेरे में सदा मौज करे? सिर्फ बातों ही बातों का कारोबार करके आप कब तक यह खतरनाक खेल खेलते रहेंगे? कब तक ऐसा होगा कि किसान सिसकेगा और नेता हंसेगा? कब तक ऐसा होगा कि जब प्रदूषण फैलाने वाले कंप्यूटर अौर गैजेट्स अाएंगे तो आप उनका स्वागत करते हुए धन्य होंगे और किसान के लिए कोई बेहतरीन बीज आएगा तो आप जीएम का नाम लेकर किसानों को डरा देंगे और पेस्टीसाइड लॉबी ठटाकर आपकी मूर्खता पर हंसती रहेगी! आखिर कब तक? आखिर कब तक आप लोगों के साथ ऐसा करेंगे? आप कब तक भारतीय नागरिक को उसके धर्म और उसकी जाति में बांटकर भारत माता के हृदय की वाहिनियों में विष भरते रहेंगे? आप तक भारत माता के पुत्रों में किसान और पुलिस का फर्क करके उनके दमन की राहें प्रशस्त करेंगे? क्या सत्ता में प्रजा का कोई स्थान नहीं है? प्रिय शासको, यह हम एक लोकतांत्रिक व्यवस्था में हैं और आपका यह फर्ज है कि आप आज किसानों के साथ वही न्याय करो, जिसकी आप विपक्ष में रहकर मांग करते रहे हैं और विपक्ष तो आज कहीं प्रश्न करने को भी प्रस्तुत नहीं है, इसलिए उसके लिए कहा भी क्या जाए!

    हे मेरे शासकीय राजनेता, तू 15 अगस्त 1947 से जो अपने ही नागरिकों के रक्त से स्नान कर रहा है, वह कब तक करेगा और कब तक इसे राष्ट्रप्रेम घोषित करता रहेगा?

    त्रिभुवन की फेसबुक वाल से

     

     

  • मोदी सरकार के तीन साल

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

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    इस 26 मई को मोदी सरकार के तीन साल पूरे हो गए। इस अवसर पर विभिन्न शहरों में ‘मोदी फैस्ट’ के अंतर्गत धूमधाम से बड़े-बड़े समारोह आयोजित किए गए। इन समारोहों से यह संदेश देने का प्रयास किया गया कि मोदी सरकार के कार्यकाल में देश समृद्धि की राह पर तेज़ी से अग्रसर हुआ है और कई उल्लेखनीय सफलताएं हासिल हुई हैं। मोदी को उनके प्रशंसक, ‘गरीबों का मसीहा’ बताते हैं। कई टीवी चैनलों और टिप्पणीकारों ने उनकी शान में कसीदे काढ़ने में कोई कसर बाकी नहीं रखी है।

    असल में पिछले तीन सालों में क्या हुआ है?

    एक चीज़ जो बहुत स्पष्ट है, वह यह है कि मोदी सरकार में सत्ता का प्रधानमंत्री के हाथों में केन्द्रीयकरण हुआ है। मोदी के सामने वरिष्ठ से वरिष्ठ मंत्री की भी कुछ कहने तक की हिम्मत नहीं होती और ऐसा लगता है कि कैबिनेट की बजाए इस देश पर केवल एक व्यक्ति शासन कर रहा है। यह तो सभी को स्वीकार करना होगा कि यह सरकार अपनी छवि का निर्माण करने में बहुत माहिर है। नोटबंदी जैसे देश को बर्बाद कर देने वाले कदम को भी सरकार ने ऐसे प्रस्तुत किया मानो उससे देश का बहुत भला हुआ हो। जहां लोगों का एक बड़ा हिस्सा सरकार द्वारा बिछाए गए विकास के दावों के मायाजाल में फंसा हुआ है, वहीं ज़मीनी स्तर पर हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं। न तो महंगाई कम हुई है, न रोज़गार बढ़ा है और ना ही आम आदमी की स्थिति में कोई सुधार आया है। स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता में गिरावट आई है और किसानों की आत्महत्या की घटनाएं बढ़ी हैं। तमिलनाडु के किसानों द्वारा दिल्ली में किए गए जबरदस्त विरोध प्रदर्शन को सरकार के पिछलग्गू मीडिया ने अपेक्षित महत्व नहीं दिया। यही हाल देश के अन्य हिस्सों में हुए विरोध प्रदर्शनों का भी हुआ।

    विदेशों में जमा काला धन वापस लाकर हर भारतीय के बैंक खाते में 15 लाख रूपए जमा करने का भाजपा का वायदा, सरकार के साथ-साथ जनता भी भूल चली है। पहले राम मंदिर के मुद्दे का इस्तेमाल समाज को धार्मिक आधार पर ध्रुवीकृत करने के लिए किया गया और अब पवित्र गाय को राजनीति की बिसात का मोहरा बना दिया गया है। गाय के नाम पर कई लोगों की पीट-पीटकर हत्या की जा चुकी है और मुसलमानों के एक बड़े तबके की आर्थिक रीढ़ तोड़ दी गई है। सरकार जिस तरह से गोरक्षा के मामले में आक्रामक रूख अपना रही है, उसके चलते, गोरक्षक गुंडों की हिम्मत बढ़ गई है और वे खुलेआम मवेशियों के व्यापारियों और अन्यों के साथ गुंडागर्दी कर रहे हैं। सरकारी तंत्र, अपराधियों को सज़ा दिलवाने की बजाए, पीड़ितों को ही परेशान कर रहा है।

    सामाजिक स्तर पर पहचान के मुद्दे छाए हुए हैं। पिछली यूपीए सरकार भी अपनी सफलताओं का बखान करती थी परंतु कम से कम यह बखान लोगों के भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार संबंधी अधिकारों पर केन्द्रित था। अब तो चारों ओर झूठी वाहवाही और बड़ी-बड़ी डींगे हांकने का माहौल है। पाकिस्तान के मुद्दे पर सरकार जब चाहे तब आंखे तरेरती रहती है। सीमा पर रोज़ भारतीय सैनिक मारे जा रहे हैं परंतु आत्ममुग्ध सरकार, सर्जिकल स्ट्राईक का ढिंढोरा पीट रही है। कश्मीर के संबंध में सरकार की नीति का नतीजा यह हुआ है कि लड़कों के अलावा अब लड़कियां भी सड़कों पर निकलकर पत्थर फेंक रही हैं। कश्मीर के लोगों की वास्तविक समस्याओं की ओर कोई ध्यान नहीं दे रहा है। उनसे संवाद स्थापित करने में सरकार की विफलता के कारण, घाटी में हालात खराब होते जा रहे हैं।

    हिन्दुत्ववादी देश पर छा गए हैं। शिक्षा के क्षेत्र का लगभग भगवाकरण हो गया है। विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर गंभीर हमले हुए हैं। ‘पारंपरिक ज्ञान’ को वैज्ञानिक सिद्धांतों पर तवज्ज़ो दी जा रही है और पौराणिक कथाओं को इतिहास बताया जा रहा है। यहां भी अतीत का महिमामंडन करने के लिए केवल ब्राह्मणवादी प्रतीकों जैसे गीता, संस्कृत और कर्मकांड को बढ़ावा दिया जा रहा है।

    दिखावटी देशभक्ति का बोलबाला हो गया है। पूर्व केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री ने यह प्रस्तावित किया था कि हर विश्वविद्यालय के प्रांगण में एक बहुत ऊँचा खंबा गाड़ कर उस पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जाए। हर सिनेमा हॉल में फिल्म के प्रदर्शन के पहले राष्ट्रगान बजाया जाना अनिवार्य कर दिया गया है। एक अन्य स्वनियुक्त देशभक्त ने यह प्रस्तावित किया है कि हर विश्वविद्यालय में ‘देशभक्ति की दीवार’ हो, जिस पर सभी 21 परमवीर चक्र विजेताओं के चित्र उकेरे जाएं। समाज के सभी वर्गों का देश की उन्नति में योगदान होता है परंतु प्रचार ऐसा किया जा रहा है, मानो केवल सेना ही देश की सबसे बड़ी सेवा कर रही हो। जो किसान खेतों में काम कर रहे हैं और जो मज़दूर कारखानों में खट रहे हैं, क्या उनकी सेवाओं का कोई महत्व ही नहीं है? लाल बहादुर शास्त्री ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा दिया था। यह सरकार केवल जय जवान का उद्घोष कर रही है और किसान को विस्मृत कर दिया गया है।

    देश में प्रजातंत्र सिकुड़ रहा है और बोलने की आज़ादी पर तीखे हमले हो रहे हैं। मीडिया का एक बड़ा तबका शासक दल के साथ हो लिया है और वह उन सब लोगों की आलोचना करता है, जो सरकार की नीतियों के विरोधी हैं। मीडिया ने प्रजातंत्र के चैथे स्तंभ और सरकार के प्रहरी होने की अपनी भूमिका को भुला दिया है। दाभोलकर, पंसारे और कलबुर्गी की हत्या के साथ देश में असहिष्णुता का जो वातावरण बनना शुरू हुआ था, वह और गहरा हुआ है। मुसलमानों के खिलाफ तो ज़हर उगला ही जा रहा है, दलित भी निशाने पर हैं।

    आज देश में जिस तरह का माहौल बन गया है, उसे देखकर यह अहसास होता है कि केवल प्रचार के ज़रिए क्या कुछ हासिल नहीं किया जा सकता। लोगों के मन में यह भ्रम पैदा कर दिया गया है कि मोदी सरकार देश का न भूतो न भविष्यति विकास कर रही है और आम लोगों का भला हो रहा है।

    परंतु हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि देश के कई हिस्सों में लोगों ने अपने विरोध, असंतोष और आक्रोष का जबरदस्त प्रदर्शन भी किया है। किसानों के एकजुट हो जाने के कारण, मजबूर होकर, सरकार को अपना भूसुधार विधेयक वापस लेना पड़ा। कन्हैया कुमार, रामजस कॉलेज, रोहत वेम्युला और ऊना के मुद्दों पर जिस तरह देश में वितृष्णा और आक्रोष की एक लहर दौड़ी, उससे यह साफ है कि सरकार की प्रतिगामी नीतियों को चुनौती देने वालों की संख्या कम नहीं है। जहां हिन्दुत्ववादी तत्वों का स्वर ऊँचा, और ऊँचा होता जा रहा है, वहीं देश भर में चल रहे कई अभियानों और आंदोलनों से यह आशा जागती है कि भारतीय संविधान के मूल्यों पर आधारित बहुवादी समाज के निर्माण के स्वप्न को हमें तिलांजलि देने की आवश्यकता नहीं है।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • यह दुनिया ग़ज़ब है भाई

    Tribhuvan

    [themify_hr color=”red”]

    लालू यादव का भक्त कबीला इन दिनों नीतीशकुमार की क्या ग़ज़ब ख़बर ले रहा है। जैसे नीतीशकुमार ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के भोज पर जाकर और सोनिया गांधी के भोज पर न जाकर मानो ऐसा कर दिया हो कि वे अभी गंगाजी जाने वाले थे, लेकिन अचानक से धर्म बदलकर मक्का चल दिए और हाज़ी हो गए। अरे दोस्तो, आपकी स्मृति को क्यों काठ मार गया। ये वही नीतीशकुमार हैं, जो कुछ समय पहले तक भाजपा के साथ गठबंधन सरकार चला रहे थे और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने इन्हें नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद का दावेदार होने से पहले नरेंद्र मोदी से बेहतर संभावित प्रधानमंत्री घोषित किया था। लालू के साथ नीतीशकुमार हो तो वह घटिया और वही नीतीशकुमार अगर नरेंद्र मोदी या भाजपा के साथ चला जाए तो पापात्मा। क्या कमाल है!

    मायावती और उनका भक्त-संप्रदाय आजकल भाजपा पर टूटकर पड़ रहा है। लेकिन वे यह भूल जाते हैं कि दलितों की इस महान् उम्मीद ने ही उत्तरप्रदेश में सबसे पहले भाजपा से गठजोड़ करके भाजपा के हिन्दुत्वाद पर मुहर लगाई थी। यह वह समय था जब वामपंथी दलों और कांग्रेस ने गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के इस्तीफे की मांग करते हुए जनांदोलन खड़ा किया था। उस जनांदोलन के कई हरावल दस्ते के कई नेता आजकल नरेंद्र मोदी के यशोगान कर अपने आपको उपकृत समझ रहे हैं।

    कुछ लोग हैं, जो एक इनसान को गोमांस रखने के नाम पर नृशंस ढंग से मारकर ऐसा दृश्य प्रस्तुत करते हैं, मानो इस देश में इनसानियत नाम की चीज़ ही नहीं रह गई है। कांग्रेस इस पर बढ़चढ़कर हल्ला मचाती है। लेकिन अचानक हम देखते हैं कि यही पार्टी एक निरीह और निरपराध मूक प्राणी, जो दुर्भाग्य से एक कारुणिक गाय है, सार्वजनिक रूप से काटकर अपने भीतर छुपी हिंसक नृशंसता को ला बाहर करती है।

    हमारे लोकतंत्र और हमारे राष्ट्र को दूषित करने पर आमादा राजनीतिक दलों, राजनीतिक लोगों और इस देश के राजनीतिक समझ रखने वाले लोगों के मानस में एक विषैलापन भरता जा रहा है। छोटी-छोटी घटनाएं इसकी सबूत हैं।

    लाल यादव को लोग एक बार फिर मौका देते हैं, लेकिन वह सामाजिक न्याय की लड़ाई लड़ने के बजाय आज भी पारिवारिक भ्रष्टाचार में डूबा हुआ एक ऐसा नेता है, जिसने स्वार्थाें के वशीभूत अपने साहसिक गुणों को तिरोहित करके अपने आपको लगभग डुबाे दिया है।

    मायावती के पास दलितों का एक ऐतिहासिक बल आता है, लेकिन वह सत्ता के दंभ, धन एकत्र करने और महज सीटें जीतने के लिए एक धर्मविशेष के दिखावटी प्रेम का ऐसा मूर्ख प्रदर्शन करती हैं, दूसरे धर्म के चालाक कट्टर लोग उसे चौकड़ी भुला देते हैं।

    कुछ दिन पहले एक प्रयोग हुआ आम आदमी पार्टी का। इस आम आदमी ने आम आदमी के नाम पर राजनीतिक शुचिता, व्यवहार गत ईमानदारी और सिद्धांतिप्रियता के पेट में जिस तरह छुरा घोंपा, वह तो शायद ही किसी ने किया हो।

    ये मानसिकता प्रदर्शित करती है कि एक ही व्यक्ति को ये लोग एक ही समय में महान् लोकतांत्रिक घोषित कर सकते हैं और अगले ही पल उसे फासीवादी।

    मेरी चिंता सिर्फ़ इतनी सी है कि हमारी नई पीढ़ी की नवांकुरित प्रतिभाओं के मानस पटल पर यह अविवेकीपन लाया जा रहा है।

    मुझे लगता है, हमारी नई पीढ़ी को तटस्थ होकर चीज़ों का विश्लेषण कर सोच की एक नई राह बुननी चाहिए, ताकि हम एक सबल, सुसभ्य और सुलोकतांत्रिक समाज की ओर से बढ़ सकें। ऐसे समाज की तरफ जो विवेकशील मानवतावाद से भी आगे बढ़कर प्राणि-प्रकृति प्रियता को आत्मसात कर सके।

    दरअसल, इस सबके लिए अगर कोई कुसूरवार है तो हम लोग हैं। हम अवाम। हम भारत के लोग। हम किसी के कांग्रेस के पीछे लगते हैं तो 70 साल लगे ही रहते हैं और अगर नरेंद्र मोदी हमें भाता है तो फिर ऐसा भाता है कि उसकी हिमालय जैसी भूल भी राई जितनी नहीं दिखती। हम पर कभी नेहरू का चश्मा चढ़ता है और कभी इंदिरा का। कभी हमें राजीव गांधी चमत्कृत करते हैं और कभी हमें वीपी सिंह जैसा कोई लगता ही नहीं।

    हम भारत के लोग लोकतंत्र की नसों में जो विनाशकारी तेज़ाब डाल रहे हैं, वह तो दुनिया में कहीं दिखता। हमारे सैनिक मारे जाते हैं, हमारे नागरिक मारे जाते हैं और हमारे सपने मारे जाते हैं। हम हल्ला करते हैं, लेकिन हमारी नींद नहीं उड़ती। हम जैसे बोस्निया-हर्जेगोविना बनने को उतावले हैं। हमारे सत्ताधीश आयातुल्लाह खुमैनी बनकर हमें पाकिस्तान, ईरान, इराक, अफ़गानिस्तान और सीरिया बनाने की राहें उलीकते हैं तो हमें दिखता नहीं। वह फिर इंदिरा गांधी हों या नरेंद्र मोदी! वह बंगाल को नारकीय हालात में बदलने वाला कम्युनिस्ट शासन हो या केरल के मतदाताओं को प्रसन्न करने के लिए सार्वजनिक रूप से गाय काटने वाली कांग्रेस। हम सब सेना होते हैं और हम सब पत्थर फेंकते हैं अपने ऊपर!

    हम एक प्रहसन बनने को उतावले हैं। अपने घर को सपनों का घर और अपने देश को सपनों का देश बनाने के लिए जैसे हमें कोई सरोकार ही नहीं। हम अपनी महान् सांस्कृतिक थाती को तिरोहित होते कब तक देखते रहेंगे?

    Credits: Tribhuvan’s Facebook wall

  • जातिगत अत्याचारों से बचने के लिए दलित अपना रहे हैं बौद्ध धर्म और इस्लाम

    Prof Dr Ram Puniyani
    Rtd, IIT Bombay

    [themify_hr color=”red”]

    भारतीय समाज में जाति हमेशा से एक महत्वपूर्ण कारक रही है। अतीत से लेकर वर्तमान तक, राजनीति में जाति की भूमिका हमेशा से रही है। जाति व्यवस्था के उदय और उसके प्रचलन के बारे में कई अलग-अलग दावे और व्याख्याएं की जाती रही हैं। अंबेडकर का मानना था कि जाति की जड़ें, हिन्दू पवित्र ग्रंथों में हैं। परंतु हिन्दुत्व की विचारधारा के पैरोकारों का कहना है कि हिन्दू समाज में सभी जातियां समान थीं। मुस्लिम आक्रांता, हिन्दुओं को मुसलमान बनाना चाहते थे और जो लोग धर्मपरिवर्तन करने के लिए तैयार नहीं थे वे दूरदराज़ के स्थानों पर भाग गए और यहीं से जातिगत असमानता की शुरूआत हुई। यह व्याख्या घटनाओं की सही विवेचना नहीं है और ऊँची जातियों की सोच को प्रतिबिंबित करती है। जो लोग कहते हैं कि मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा ज़बरदस्ती धर्मपरिवर्तन करवाने की कोशिश के कारण जाति व्यवस्था जन्मी, उनके दावों का खंडन करने के लिए ‘मनुस्मृति’ पर्याप्त है, जो दूसरी सदी ईस्वी में रची गई थी और जिसमें जातिगत पदक्रम का विस्तार से वर्णन किया गया है। मनुस्मृति जब लिखी गई थी, तब इस्लाम दुनिया में था ही नहीं और ना ही मुस्लिम व्यापारी भारत के मलाबार तट पर पहुंचे थे। मुस्लिम शासकों के आक्रमण तो तब सदियों दूर थे।

    इस बेसिरपैर की व्याख्या के विपरीत, स्वामी विवेकानंद हमें बताते हैं कि दलितों द्वारा इस्लाम में धर्मपरिवर्तन, मुख्यतः जातिगत उत्पीड़न के चलते हुआ। औपनिवेशिक काल में भारत के अर्ध-आधुनिकीकरण की प्रक्रिया शुरू हुई परंतु इसके बाद भी जाति व्यवस्था बनी रही। आज, स्वाधीनता के 70 साल, और भारतीय संविधान, जो सभी नागरिकों को समानता का अधिकार देता है, के लागू होने के 67 साल बाद भी, जाति व्यवस्था जिंदा है। गोरखनाथ मठ के भगवाधारी आदित्यनाथ योगी के उत्तरप्रदेश का मुख्यमंत्री बनने के बाद एक बार फिर यह साबित हो गया है कि जातिप्रथा हमारे समाज में आज भी उतनी ही मज़बूत है जितनी पहले थी। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से उत्तरप्रदेश में दलितों पर अत्याचार की घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई है। सहारनपुर में हुई हिंसा इसका एक उदाहरण है।

    कुछ रपटों के अनुसार, पश्चिमी उत्तरप्रदेश के कुछ गांवों के 108 दलित परिवारों ने योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद से दलितों पर अत्याचार की घटनाएं बढ़ने पर अपना विरोध प्रदर्शन करने के लिए बौद्ध धर्म अंगीकार कर लिहै। सहारनुपर के कुछ गांवों में, ठाकुरों और दलितों के बीच हिंसक झड़पें हुईं। ठाकुरों ने अंबेडकर की मूर्ति नहीं लगने दी और दलितों ने राजपूत शासक राणाप्रताप की जयंती मनाने के लिए एक जुलूस को निकलने नहीं दिया क्योंकि उसके लिए विधिवत अनुमति नहीं ली गई थी। दलितों का कहना है कि आदित्यनाथ की सरकार, केवल ठाकुरों की सरकार है।

    सहारनपुर के निकट मुरादाबाद के लगभग 50 दलित परिवारों ने यह धमकी दी है कि अगर आदित्यनाथ, भगवा ब्रिगेड द्वारा दलितों पर किए जा रहे हमलों को नहीं रोकते तो वे हिन्दू धर्म त्याग देंगे। इस आशय की खबर ‘द टाईम्स ऑफ इंडिया’ के 22 मई, 2017 के अंक में छपी है। दलितों के हितों की रक्षा के लिए भीमसेना नाम का एक संगठन गठित हो गया है। सहारनपुर का प्रशासन कहता है कि भीमसेना, हिंसा कर रही है, जबकि दलितों का दावा है कि यह सेना उनकी रक्षक है। उनका यह भी आरोप है कि प्रशासन, ऊँची जातियों के पक्ष में झुका हुआ है और असली दोशियों को पकड़ने की बजाए, भीमसेना पर निशाना साध रहा है। हिन्दुओं के स्वनियुक्त रक्षकों के समूहों की संख्या में तेज़ी से वृद्धि हो रही है। इस पृष्ठभूमि में, भीमसेना को दलित, आशा की एक किरण के रूप में देख रहे हैं। उनका कहना है कि योगी सरकार के शासन में आने के बाद से आरएसएस और उसके अनुषांगिक संगठन अपना असली रंग दिखा रहे हैं और इसलिए उनके पास इसके सिवाए कोई विकल्प नहीं है कि वे ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म को त्याग दें। ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म ही संघ परिवार की हिन्दुत्व की विचारधारा का आधार है। अभी हाल (22 मई, 2017) में दिल्ली के जंतरमंतर पर बड़ी संख्या में दलित, उनके विरूद्ध किए जा रहे अत्याचारों का विरोध करने के लिए प्रदर्शन कर रहे हैं।

    दलितों के प्रश्न पर आरएसएस हमेशा से एक बड़ी दुविधा में फंसा रहा है। एक ओर वह उनके वोट चाहता है तो दूसरी ओर वह यह भी जानता है कि अगर उसने दलितों को समान दर्जा देने की बात कही, तो आरएसएस-हिन्दुत्व राजनीति के मूल समर्थक जो ऊँची जातियों के हैं, उससे दूर छिटक जाएंगे। इस समस्या से निपटने के लिए आरएसएस, सोशल इंजीनियरिंग व सांस्कृतिक अभियानों के ज़रिए दलितों को अपने साथ लेने का प्रयास कर रहा है। उसने सामाजिक समरसता मंचों की स्थापना की है और नीची जातियों के लोगों के साथ भोजन करने के कार्यक्रम शुरू किए हैं। एक दूसरे स्तर पर वह दलित नेताओं जैसे रामविलास पासवान, रामदास अठावले व उदित राज इत्यादि को सत्ता की लोलीपोप पकड़ाकर अपनी ओर आकर्षित कर रहा है। आरएसएस की कोशिश यह भी है कि इतिहास को तोड़-मरोड़ कर इस रूप में प्रस्तुत किया जाए कि दलित, मुसलमानों के हमलों से हिन्दुओं की रक्षा करने वाले लोग थे। इस तरह की सांस्कृतिक जोड़तोड़, हिन्दू राष्ट्रवाद के सिद्धांतों का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

    पिछले तीन वर्षों में दलितों के प्रति दुर्भाव और पूर्वाग्रह कई अलग-अलग तरीकों से प्रकट हुआ है। आईआईटी, मद्रास में अंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर प्रतिबंध लगाया गया। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के प्रशासन की दलित-विरोधी नीतियों के कारण, वहां के शोधार्थी रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या हुई। गुजरात के ऊना में पवित्र गाय की रक्षा के नाम पर दलितों को बर्बर ढंग से पीटा गया। दरअसल, हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीति, जाति व्यवस्था से दमित वर्गों के लक्ष्य से एकदम विपरीत दिशा की ओर ले जाने वाली है। हमें याद रखना चाहिए कि सामाजिक न्याय के महानतम पैरोकारों में से एक अंबेडकर ने मनुस्मृति को सार्वजनिक रूप से जलाया था। परंतु इसी मनुस्मृति का आरएसएस के चिंतकों जैसे एमएस गोलवलकर ने महिमामंडन किया। गोलवलकर जैसे लोगों ने तो भारतीय संविधान तक का इस आधार पर विरोध किया कि जब हमारे पास मनुस्मृति के रूप में पहले से ही एक ‘अद्भुत’ संविधान मौजूद है तो हमें नए संविधान की ज़रूरत ही क्या है? जहां अंबेडकर कहते थे कि गीता, मनुस्मृति का संक्षिप्त संस्करण है वहीं मोदी सरकार गीता का प्रचार-प्रसार करने में जुटी हुई है।

    हिन्दू राष्ट्रवाद, भारत के एक काल्पनिक इतिहास का निर्माण करना चाहता है, जिसमें हिन्दू धर्मग्रंथों के मूल्यों का बोलबाला था। वह वैदिक युग के मूल्यों को पुनर्जीवित करना चाहता है, जिनका एक प्रजातांत्रिक समाज में कोई स्थान नहीं हो सकता। हिन्दू धर्म की कई अन्य धाराएं भी हैं जिन्हें संयुक्त रूप से श्रमण परंपराएं कहा जाता है। ये परंपराएं ऊँचनीच को खारिज करती हैं। परंतु हिन्दू धर्म के ब्राह्मणवादी संस्करण ने इन परंपराओं को हाशिए पर ढकेल दिया है। पिछली लगभग एक सदी से ब्राह्मणवादी मूल ही हिन्दू राष्ट्रवाद का आधार बने हुए हैं। जंतरमंतर में चल रहा जबरदस्त विरोध प्रदर्शन इस बात की ओर संकेत करता है कि आरएसएस द्वारा हिन्दू धर्म के मूलतः समानता का धर्म होने की भ्रांति उत्पन्न करने का प्रयास सफल नहीं होगा। इससे हमें यह याद आता है कि अंबेडकर को अंततः धर्म द्वारा वैध ठहराई गई जाति व्यवस्था से बचने के लिए हिन्दू धर्म का ही त्याग करना पड़ा था। आज भी दलित यही करने में अपनी मुक्ति देखते हैं।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया) 

  • वाचालता इस युग की प्रमुख प्रवृति बन गई है

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    मुझे लगता है कि शासन व प्रशासन में बहुत कुछ अप्रत्यक्ष-नीतिक (कूटनीतिक) रखना उचित होता है. मैं इसे लोकशैली के एक वक्तव्य से पुष्टि देता रहा हूँ कि ‘मार कम बपराहट ज्यादा’ का प्रयोग लाभप्रद होता है. इसका आशय यह होता है कि साध्य को अधिक प्रकट बनाए रखना, न कि साधन प्रयोग पर एक दंभ बनाए रखना. मायावती की रैली से लौटते दलित-ईसाई-मजदूर युवक की हत्या मामले में उन्होंने यह हुनर आजमाया. buy zolpidem er 12.5 mg https://www.livermedic.com/ ambient online magazin उन्होंने न केवल अलसुबह परिवार को दबाव में ले मृतक का दाह-संस्कार कर दिया बल्कि उसी रात कई राजपूत युवकों को हिरासत में भी लिया. इससे संतुलनकारी स्थिति बनती है और प्रशासन के पास रचनात्मक स्पेस होता है कि वह बाकी कार्रवाई को नियंत्रण में अंजाम दे सके. अपने क़स्बाई पत्रकारिता दिनों में मैंने लोकल प्रशासन (एसपी-डीएम) को प्रायः इसी नीति से काम करते देखा है. शासन या प्रशासन को खुला पक्षकार नहीं बनना चाहिए. पक्षधरता सियासत का अवगुण है.

    मेजर गोगोई के मामले में बेहद आसानी से सेना के अंदर सेना प्रशासन द्वारा यह मैसेज कन्वे किया जा सकता था कि मेजर ने जो किया वह हालात के अनुसार एकदम सही था. यह मैसेज कन्वे करने की आवश्यकता भी नहीं थी यदि सेना जानती ही है कि विपरीत परिस्थितियों में वह प्रायः मनोनुकूल कार्रवाई उपाय अपनाती ही रही है. उत्तरपूर्व से कश्मीर तक सेना पर बलात्कार के आरोप लगते रहे हैं, आंतरिक कार्रवाइयों की बातें भी होती ही रहती हैं, लेकिन क्या पब्लिक डोमेन में ऐसी बातें प्रमुखता से आती हैं कि वास्तविक रूप से किसी सैन्य अधिकारी पर बलात्कार आरोप पर कोई कार्रवाई हुई. तो क्या नीति रही उनकी कि उन्होंने इसे अप्रत्यक्ष-नीतिक बनांये रखा है ताकि न तो सेना का कथित ‘मोरेल’ डाउन हो, न उन्हें पब्लिक आउटरेज से अकेले व सीधे मुक़ाबिल होने को विवश होना पड़े.

    किन्तु यूँ मेजर गोगोई को सम्मानित कर सेना प्रशासन पक्षकार बन गई. पहले से असंतुष्ट कश्मीर को एक और खराब मैसेज गया. यदि कश्मीरी भारतीय नागरिक ही हैं तो फिर प्रश्न तो बनता है कि संस्थागत पक्षधरता और नागरिक पक्षधरता के बीच सेना ने किसके प्रति पूर्वग्रह रखा. यह धैल किस्म का लोकतंत्र हुआ यदि सेना सैनिकों व नागरिकों में से सैनिकों को ही बस अपना समझे. यह ऐसा ही है कि एक बार किसी इजरायली मंत्री ने यह कह दिया था कि चयन यदि हमारे बच्चों की मौत और फ़लस्तीनी बच्चों की मौत में से एक का करना हो तो मैं फ़लस्तीनी बच्चों को चुनूँगा.

    सफल कूटनीति यह होनी थी कि मेजर गोगोई मामले पर सेना प्रशासन का बयान होता (या किसी बयान की आवश्यकता ही नहीं थी) कि मेजर गोगोई ने एक परिस्थिति में एक निर्णय लिया और उचित प्रतीत होता है, किन्तु इसके समानांतर नागरिक प्रशासन ( हमारी सरकार !) का यह बयान रहता कि सेना अधिकतम संयम बरते कि इस मामले की निष्पक्ष जांच करे. हुआ यह कि सेना ने मेजर को सम्मानित कर दिया और सरकार के लोग ‘जश्ननुमा’ बयान में लग गए.

    बीच का कोई रचनात्मक स्पेस मिला ही नहीं, बाँधा गया युवक स्टोन-पेल्टर भी नहीं साबित हुआ, कश्मीरियों का असंतोष इस घटना से बढ़ा होगा वह अलग.

    इस उत्सवधर्मी सरकार और ओवरकांफिडेंट सेना को इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि कश्मीर का अंतिम उपचार लोहे के जोर से नहीं बल्कि कश्मीरियों को विश्वास में लेकर ही होना है. हमने सत्तर साल से कश्मीर को सिर्फ लोह के दम से नहीं बचा रखा बल्कि संवादात्मक और संवेदनात्मक उपायों से भी बचा रखा है.

    किन्तु हम मोदी युग में हैं. सारे पाठ ही किसी और दिशा को प्रस्तावित हैं. भाषिक व व्यवहारपरक वाचालता इस युग की प्रमुख प्रवृति बन गई है.

     

  • ग्रामीण किसान-महिला बेहद परिश्रमी, उत्पादक व Entrepreneur (व्यवसायी) होती है

    Vivek Umrao Glendenning
    “SAMAJIK YAYAVAR/ Social Wayfarer”

    बेहद परिश्रमी :

    पूरे वर्ष सर्दी, गर्मी, बरसात कोई भी मौसम हो सुबह लगभग चार बजे उठना। गाय भैंस बकरी की देखभाल करना। देखभाल करने की प्रक्रिया में जानवरों को यहां से वहां बांधना ताकि रात भर में एक ही जगह खड़े या बैठे होने से शरीर की जड़ता टूटे ताकि दूध का संचार ठीक से हो पाए। भूसे को बड़ी-बड़ी टोकरियों में लादकर नांद तक पहुंचाना व जानवरों को देना या चारा मशीन को हाथ से चलाकर चारा काटकर जानवरों को देना।

    कुएं या हैंडपंप से ढेरों बाल्टी पानी खींच कर जानवरों के बैठने व रहने की जगह को साफ करना। अमूमन हैंडपंप बहुत कड़े होते हैं, दिन भर बहुत अधिक इस्तेमाल होता रहने से लुब्रीकेशन जल्द खत्म हो जाने के कारण तथा भूजल स्तर के उतार चढ़ाव के कारण हो जाता है।

    हाथों से जानवरों के थनों से दूध निकालना। देखने में यह प्रक्रिया भले ही आसान लगती हो लेकिन कभी दूध निकाल कर देखिए, मालूम पड़ेगा कि उंगलियों, हथेली व पंजो की कितनी तकनीक व मेहनत लगती है।

    घर के प्रयोग के लिए दूध निकाल कर, शेष दूध को गांव में डेयरी कलेक्शन केंद्र में जाकर दूध देने जाना। यह दूरी घर से काफी दूर भी हो सकती है, बाल्टी व दूध का वजन लाद कर दूरी तय करके डेयरी में दूध देने जाना।

    बच्चों के लिए नास्ता बनाना, स्कूल ले जाने के लिए भोजन बनाना, उनको स्कूल के लिए तैयार करना। घरवालों के लिए भोजन बनाना। बच्चों ने कुछ विशेष फरमाइश कर दी तो वह भी बनाना।

    भोजन बनाने का मतलब सौ-पचास-दो सौ रोटियां, चावल, दाल, सब्जी इत्यादि। यह सब चूल्हे में बनाना, धुआं झेलते हुए। फिर ढेर सारे बर्तनों को धोना।घर की अंदर बाहर बैठकी इत्यादि सभी स्थानों में सफाई करना। कभी कभार गोबर लीपना। कंडे पाथना। रसोई के इस्तेमाल के लिए कुएं या हैंडपंप से पानी भरना। परिवार के ढेरों कपड़े हाथ से धोना।

    दिन में कई बार समय-समय पर जानवरों की सेवा-टहल करना। उनको पानी पिलाना, यहां से वहां बांधना। चारा देना। शाम को फिर दूध निकालना। फिर से डेयरी में दूध देने जाना।

    खेतों पर जाना व खेतों पर काम करना। जानवरों के लिए चारा खेतों से काटना, लादना व ढोकर घर तक लाना। खेतों से घर की दूरी कई किलोमीटर भी हो सकती है।

    बच्चों के स्कूल से लौटने पर उनसे बातें भी करती है। उनको फिर से खिलाती है। खुद भले ही पढ़ी लिखी न हो लेकिन बच्चों को पढ़ने लिखने के लिए कहती है, इंतजाम करती है।

    ग्रामीण परिवेश में रिश्तों के बहुत मायने होते हैं। रिश्तेदारों से उनके रिश्ते के अनुसार जिम्मेदारी का निर्वाह व देखभाल भी करती है।

    रोजमर्रा के प्रयोग के लिए सब्जियों का उत्पादन भी कर लेती है। दूध का खोया बनाकर मिठाई का उत्पादन भी घर में घर लेती है।

    उत्पादक :

    ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन करती है, उत्पादन का प्रारंभिक प्रसंस्करण भी करती है। यदि दाल, अचार, पापड़ इत्यादि की बात की जाए तो संपूर्ण प्रसंस्करण भी करती है। यदि गन्ना की खेती करती है तो प्रसंस्करण करके गुड़ बना लेती है, सिरका भी बना लेती है। दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्कन व घी का उत्पादन करती है। आलू चिप्स का उत्पादन करती है।

    कृषि से जुड़ा अनेक काम करना जैसे खेतों की निराई गुड़ाई सिचाई, बीज डालना, खर पतवार हटाना, कीटनाशक डालना, खाद डालना, गोबर की खाद बनाना, फसल काटना, फसल ढोना, उत्पादन का भंडारण तथा भंडार का प्रबंधन।

    बाजार में बेचने के लिए खेतों में उगाई जाने वाली सब्जियों की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए उगाई गई सब्जियों की ही बात की जाए तो भी प्रति वर्ष दसियों हजार रुपए की सब्जी का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला बैठे-ठाले ही कर लेती है।

    डेयरी में बेचे जाने वाले दूध की बात न भी की जाए, केवल घरेलू प्रयोग के लिए दूध उत्पादन की ही बात की जाए तो भी प्रतिवर्ष दसियों हजार रुपए के दूध का उत्पादन ग्रामीण किसान-महिला कर लेती है।

    घरेलू प्रयोग के लिए छाछ, मक्खन व घी का प्रसंस्करण पद्धति से उत्पादन करती है। इन्हीं वस्तुओं का सालाना उत्पादन बीसियों हजार रुपए होता है।

    Entrepreneur (व्यवसायी) :

    ग्रामीण महिला-किसान जिन वस्तुओं का उत्पादन व प्रसंस्करण घरेलू व पारिवारिक प्रयोग के लिए करती है, जैसे आलू चिप्स, पापड़, अचार, आम-पापड़, दूध, खोया, मक्खन, छाछ, घी, सब्जी इत्यादि।केवल इन वस्तुओं इन जैसी अन्य वस्तुओं की ही यदि बाजार भाव से गणना की जाए तो यह कई लाख रुपए प्रति वर्ष का हिसाब-किताब बैठेगा।

    यदि खेती में उसके योगदान की गणना भी कर ली जाए बाजार भाव पर तो उसकी वार्षिक आय सरकारी प्राथमिक टीचर की तुलना पर पहुंच जाएगी।यहां ध्यान देने की बात यह है कि मैं उत्पादन व प्रसंस्करण की आय की बात कर रहा हूं। मैं घरेलू कार्यों में दी जाने वाली सेवाओं की बात नहीं कर रहा हूं। मैं खाना बनाने, देखभाल करने, कपड़े धोने, घर में झाड़ू पोछा लगाने जैसी सेवाओं की बाजार भाव की गणना करने की बात नहीं कर रहा हूं।

    मैं ग्रामीण किसान-महिला की उत्पादकता व इकोनोमी में सीधे योगदान की बात कर रहा हूं।

    दूध का उत्पादन (दूध खरीदना नहीं), उत्पादित किए दूध का प्रसंस्करण करके छाछ, मक्खन, घी, खोया इत्यादि बनाना।
    सब्जी उगाना (सब्जी बाजार से खरीद कर पकाना नहीं)।
    आलू उगाकर उसका चिप्स व पापड़ बनाना (आलू खरीद कर चिप्स बनाना नहीं)।

    ग्रामीण किसान-महिला उत्पादन में बाजार रिस्क लेती है। उत्पादन का भंडारण-प्रबंधन करती है। बहुत कुछ करती है, बहुत ही अधिक स्किल्ड होती है।

    अब सवाल यह है कि जो ग्रामीण किसान-महिला इतनी स्किल्ड है, इतनी परिश्रमी है, इतनी आय करती है, देश की इकोनॉमी व JDP में जबरदस्त व सीधा योगदान करती है। उसकी हमारे समाज में व हमारे मन के अंदर वास्तविक प्रतिष्ठा क्या है?

    प्रतिष्ठा का स्तर तो यह है कि जो महिलाएं शहरों या कस्बों में रहती हैं जिनके पति दस-बीस हजार महीना कमा लेते हैं, वे भी ग्रामीण किसान-महिला को निकृष्ट मानती है उपहास उड़ाती है। जबकि शहरी महिला का वास्तविक उत्पादन, इकोनॉमी व GDP में योगदान नहीं होता है। रिस्क क्या है नहीं जानती। दो-तीन कमरों के घर में झाड़ू पोछा करने को, मशीन से कपड़े धोने को, कुछ रोटियां पकाने खाना बनाने को बहुत बड़ा काम मानती है। अपने इन कामों की तुलना नौकरों के वेतन से करती है।

    दरअसल यह चरित्र जानबूझकर जिया जाने वाला भयंकर व बेईमान विरोधाभास है। 

    चलते – चलते :

    यदि हवाई नारेबाजी तथा वस्तुनिष्ठता-हीन-तर्क वाले शाब्दिक तामझाम वाले दर्शन को तर्कसंगत (रेशनल) न माना जाए तो दरअसल भारतीय समाज में परंपरा में ही हजारों वर्षों से परिश्रम को उपेक्षित, तिरस्कृत व अछूत माना गया है। यही कंडीशनिंग हमें गांव, ग्रामीण व किसान को मूर्ख, निठल्ला, उपेक्षित, निरीह, तिरस्कृत व असभ्य मानने की मूर्खतापूर्ण मानसिकता में रखे रहती है।

    इस मानसिकता की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगया जा सकता है कि भारत का शहरी समुदाय, गांव व ग्रामीणों को गाली मानता है तभी “गवांर” शब्द गाली के रूप में प्रयोग किया जाता है।

    किसान पुरुष को निठल्ला माना जाता है, किसान महिला को अजागरूक माना जाता है, किसानों की संतानों का मजाक उड़ाया जाता है, उनको दोयम स्तर का माना जाता है।

    भारतीय राष्ट्रीय मीडिया लगभग 98 प्रतिशत हिस्सा मेट्रो व बड़े शहरों की बात करते हुए प्रयोग करता है, शेष लगभग दो प्रतिशत में पूरा भारत, इस बचे हुए दो प्रतिशत के भी अधिकतर प्रतिशत में छोटे शहर ही रहते हैं।

    गांव व ग्रामीण का मानों कोई अस्तित्व ही नहीं, कीड़े-मकोड़े हैं। ग्रामीण को भी इंसान समझा जाए, वे भी प्रतिष्ठित हों, उनका आर्गनाइज्ड (organised) शोषण व तिरस्कार बंद हो, बहुत बड़ी प्राथमिकता है।

    दरअसल भारतीय समाज में स्किल व श्रम को हमेशा उपेक्षित किया गया है। स्किल व श्रम को कभी ठीक से न समझा गया, न ही परिभाषित किया गया।ग्रामीन किसान-महिला जो बहुत स्किल्ड है, उत्पादक है, Entrepreneur है, उसको जागरूक करने के लिए कुछ-कुछ हजार रुपल्ली वेतन पाने वाले NGO वेतनभोगी कर्मचारी रखे जाते हैं, आशा जैसी सरकारी कर्मचारी रखी जाती हैं, प्राइमरी स्कूल की शिक्षिकाएं रखी जाती हैं।

    इतना तो कामन सेंस होना ही चाहिए कि ककहरा व गिनती रटाना अधिक स्किल का काम है या ग्रामीण किसान-महिला के उत्पादन व प्रसंस्करण के काम। ककहरा, गिनती रटाने वाले प्राइमरी स्कूल टीचर का, एक NGO कर्मचारी का, आशा का देश की इकोनॉमी व GDP में वास्तविक उत्पादन योगदान है ही नहीं। फिर भी इनका अहंकार आसमान पर रहता है।

    ग्रामीण किसान-महिला जो इन सबसे बहुत अधिक स्किल्ड है, देश की इकोनॉमी व GDP में बहुत योगदान करती है, को निकृष्ट माना जाता है, इससे सीखने की बजाय, सिखाने जाया जाता है। ग्रामीण महिला-किसान को जागरूक बनाने के लिए अभियान चलते हैं, सेमिनार होते हैं। स्किल्ड बनाने के लिए योजनाएं बनती हैं। स्किल डेवेलपमेंट कार्यक्रम चलते हैं।दरअसल जब तक हम, हमारा समाज व हमारे देश का तंत्र इन सब चूतियापों से ऊपर उठकर श्रम व स्किल को ठीक से परिभाषित नहीं करेगा तब तक हमारा समाज व देश बेहूदगी, फूहड़ता व संघटित शोषण से बाहर नहीं निकल पाएगा।

    हमें स्किल, श्रम व इकोनॉमी को पुनर्परिभाषित करने की जरूरत है न कि तर्क-असंगतता, मूर्खता व शोषण के तामझाम व प्रपंचो को विस्तारित करते रहने की।