कोई भी देश-समाज अपनी उत्पादक शक्तियों की पहचान, आंकलन और सम्मान द्वारा ही विकास की सीढियां चढ़ता है. इस मामले में हमारे यहाँ एक गंभीर चूक हुई है. भारत में दो महत्वपूर्ण उत्पादक वर्ग इस से अछूते रह गए जो उनके हाशिये पर छूटे/ढकेले रहने का सम्भवतः बड़ा कारण है. इसका कुप्रभाव इन वर्गों के आत्मविश्वास, सम्मान और विकास की कमी के रूप में साफ़ दिखाई देता है.
यह दो वर्ग हैं :
१. घरेलू-महिलाएं.
२. कृषि क्षेत्र में मजदूर-किसान.
आय-व्यय-मुनाफे का आकलन अभी भारत में बहुत ही छोटे वर्ग विशेष तक सीमित है. मध्यम दर्जे और ऊपर के व्यवसायी व् नौकरीपेशा (दर्ज) लोग ही इस प्रक्रिया से गुज़रते हैं.वह भी लगभग मजबूरी में. बाकी बचे लोगों के लिए यह एक बहुत ही जटिल तकनीकी हौआ है और सुनते ही इस सरदर्द को येन-केन-प्रकारेण टालने की कोशिशें जोर मारने लगती हैं. छोटे व्यवसाइयों और उत्पादकों का एक बड़ा वर्ग इससे सुरक्षित दूरी बनाए रखता है. आय का टैक्स से जुड़ा होना भी एक अड़ंगा है. मुझे लगता है कि “इनकम टैक्स रिटर्न” से इतर इस छूटे हुए वर्ग के लिए यदि सिर्फ “इनकम-रिटर्न” की नयी प्रक्रिया सृजित की जा सके तो क्रांतिकारी बदलाव हो सकते हैं.
तकनीकि-क्रान्ति के युग में इस कल्पना को साकार कर पाना मुश्किल बिलकुल भी नहीं है. shop.viavisolutions.com एक गृहणी टोल-फ्री नम्बर पर फोन मिलाती है. उसके स्वागत के साथ कंप्यूटरिकृत सिस्टम द्वारा कुछ निश्चित सूचनाएं ली जाती हैं जिससे उसका प्रोफाइल तैयार होता है. इस प्रोफाइल में फिर विभिन्न प्रतिमानों के अनुसार उनके द्वारा किये जाने वाले दैनिक कार्य, घंटे आदि सूचनाएं दर्ज होती हैं और मिनटों में ही स्वतः उक्त व्यक्ति को स्वयं द्वारा किये गए श्रम का आंकलन उसकी अनुमानित कीमत के रूप में प्राप्त हो जाता है.
ऐसी ही व्यवस्था हर वर्ग के लिए भिन्न प्रतिमानों/ घटकों के आधार पर की जा सकती है ताकि व्यय और आय की स्पष्ट समझ विकसित हो सके. निश्चित ही यह प्रक्रिया घाटे को कम करने और आय को बढाने की दिशा में एकाउंटिंग के प्रति अनजान और उदासीन वर्ग के लिए एक कामयाब नुस्खा साबित हो सकती है.
सरकारों में यदि ईक्षा-शक्ति हो तो क्या ऐसा सम्भव नहीं है ?
क्या इस प्रक्रिया के लागू होने से उत्पादक-शक्तियों और देश-समाज के कदम तेज़ी से गुणात्मक बदलाव की तरफ नहीं बढ़ जायेंगे?
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