न्यायपूर्ण-व्यवहार – रवि प्रकाश सिन्हा

Ravi-Praksh-Sinhaभारत में २८ राज्यों और ७ केंद्र शासित प्रदेशों में रहने वाले सभी १.२४८+ अरब लोगों सहित धरती में २०६ देशों में रहने वाले सभी ७.२५६+ अरब लोग यदि अपने सभी संपर्क/सम्बन्ध को “न्यायपूर्ण-व्यवहार” पूर्वक निर्वाह करने लग जाए तो क्या कोइ “अपराध” धरती में हो सकता है……….. विचार करें …………सादर ………. शुभकामना

०१-
सम्पूर्ण-समग्र अस्तित्व/सह-अस्तित्व/ब्रह्माण्ड की हर एक इकाई, प्रत्येक इकाई पर/में/से/के लिए प्रतिबिंबित/अनुबिम्बित/प्रत्यानुबिम्बित है।  सम्पूर्ण अस्तित्व के होने में हर एक इकाई की भागीदारी है, और किसी एक इकाई के होने में सम्पूर्ण अस्तित्व की भागीदारी है.

ब्रह्माण्ड का यह सह-अस्तित्व स्वरूप “स्वयं” में “प्रमाण” के रूप में होता है, और यही प्रमाण जीन में संगीतमयता-एकरूपता-एकसूत्रता-एकात्मता-तालमेल के रूप में “प्रमाणित” होता है.

०२-
माता-पिता-संतान, गुरू-शिष्य, भाई-बहन, मित्र आदि संबोधन, केवल सम्बन्ध निर्वाह “क्रिया” का नामकरण/संज्ञा ही है, किसी व्यक्ति-विशेष का नामकरण नहीं …….. ये “क्रिया” शास्वत (नित्य-निरंतर) है। अर्थात सम्बन्ध भी शास्वत (नित्य-निरंतर) ही है, अर्थात बने हुए ही हैं, उन्हें केवल जैसा है उसे वैसा ही जानना/समझना, स्वीकारना (मानना), पहचानना और निर्वाह करना है.

०३-
जिज्ञासा= सुख-शान्ति-संतोष-आनंद-परमानंद-चिदानंद-ब्रह्मानंद पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
=विचार, वचन, व्यवहार, कार्य में एकसूत्रता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
=अनुभव-प्रमाण-बोध-संकल्प-चिंतन-चित्रण(इक्षा)-तुलना-विश्लेषण-आस्वादन-चयन(निर्णय)-मेधस-शरीर-प्रकृति(भौतिक-रासायनिक)-अस्तित्व में संगीतमयता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
=स्वयं(मन)-शरीर-सम्बन्ध-परिवार-समाज-राष्ट्र-अन्तर्राष्ट्र-विश्व-प्रकृति-धरती-ब्रह्माण्ड-अस्तितिवा में एकात्मता पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
=शिक्षा-संसका, न्याय-सुरक्षा, स्वास्थ्य-संयम, उत्पादन-कार्य, विनिमय-कोष आयामों में तालमेल पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”।
=अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है वैसा ही जानना/समाझ्ना और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक “जीने” के लिए “ज्ञान की आशा”.

०४-
जहां “पार” लग जाए वह “परिवार”
जहां हम निश्चिन्त होकर विशवास पूर्वक (अभयता=भय मुक्त) रह सकें वह “परिवार”
जहां प्रतेक सम्बन्ध-परस्परता का निर्वाह “न्यायपूर्ण-व्यवहार” पूर्वक होता हो वह “परिवार”
परिवार = (सूक्ष्मतम/न्यूनतम स्वरूप) अनेक मनुष्यों द्वारा सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए “सहोदर (शरीर के आधार पर)” परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहयोगिता-सहभागिता-प्रयोजनीयता पूर्वक निर्वाह क्रिया का नामकरण/संज्ञा “परिवार”
परिवार का व्यापक/वास्तविक स्वरूप “सहोदर (शरीर के आधार पर)” से मुक्त “मानसिकता” के रूप में “अनन्यता” के स्वरूप में सम्पूर्ण विश्व मानव जाती “एक परिवार”

०५-
जो सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक प्रगति-उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध-संपर्क-परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहभागिता निर्वाह स्वयं-स्फूर्त शुभकामनाओं सहित करे सो मित्र (एकोदरवत्), अर्थात “सर्वतोमुखी-समाधान-समृद्धि पूर्वक प्रगति-उत्थान-उन्नत्ति-विकास-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध-संपर्क-परस्परता-पूरकता-उपयोगिता-सहभागिता निर्वाह स्वयं-स्फूर्त शुभकामनाओं सहित क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “मित्र” (एकोदरवत्).

०६-
मित्र = केवल और केवल भाई/बहन इससे भिन्न कुछ भी नहीं ………. सहोदर (एक माता-पिता की संतान) नहीं होने की स्थिति को संबोधित करने के लिए “मित्र” संबोधन, मित्र की वास्तविकता केवल भाई/बहन के स्वरूप में ही है अर्थात, धरती में “मित्र” संबोधन से संबोधित सभी व्यक्ति मूलतः भाई/बहन ही हैं, इससे भिन्न कुछ भी नहीं …… विचार करें

०७-
जो समृद्धि प्रधान (समाधान सहित) पूर्वक उन्नत्ति-अभ्युदय-जागृति और उसकी निरंतरता की और स्थिति-गति के लिए सम्बन्ध निर्वाह करे सो बहन, अर्थात “समृद्धि प्रधान (समाधान सहित) पूर्वक उन्नत्ति-अभ्युदय-जागृति और उसकी निरंतरता की और स्थिति-गति के लिए सम्बन्ध निर्वाह क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “बहन”

०८-
जो समाधान प्रधान (समृद्धि सहित) पूर्वक प्रगति [प्रमाणित स्थिति-गति (मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था / परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था में भागीदारी)]-उत्थान-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध निर्वाह करे सो भाई, अर्थात “समाधान प्रधान (समृद्धि सहित) पूर्वक प्रगति [प्रमाणित स्थिति-गति (मानवत्व रूपी आचरण सहज व्यवस्था व समग्र व्यवस्था / परिवार मूलक स्वराज व्यवस्था में भागीदारी)]-उत्थान-अभ्युदय-जागृति के लिए सम्बन्ध निर्वाह क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “भाई”

०९-
जो जिज्ञासा (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझकर और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक जीने के लिए ज्ञान की आशा) पूर्वक प्रस्तुत होने अथवा जिज्ञाशा व्यक्त करे सो शिष्य, अर्थात “जिज्ञासा (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझकर और वैसा ही स्वीकृति पूर्वक जीने के लिए ज्ञान की आशा) पूर्वक प्रस्तुत होने अथवा जिज्ञाशा व्यक्त करने की क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “शिष्य”

१०-
जो प्रमाण (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझना और वैसा ही ही स्वीकृति पूर्वक जीना) पूर्वक जिज्ञाशा तृप्त/शांत करे सो गुरू, अर्थात “प्रमाण (अस्तित्व-सहअस्तित्व जैसा है उसे वैसा ही समझना और वैसा ही ही स्वीकृति पूर्वक जीना) पूर्वक जिज्ञाशा त्रिप्ती क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “गुरू”

११-
जो अनुकरण-अनुशरण-आज्ञापालन-अनुशासन-स्वानुशासन-अनुभावानुशासन पूर्वक अनुराग [अनुपम/अनुक्रम में राग (रसास्वादन संभावना)], पोषण-संरक्षण स्वीकार करे सो संतान, अर्थात “अनुकरण-अनुशरण-आज्ञापालन-अनुशासन-स्वानुशासन-अनुभावानुशासन पूर्वक अनुराग [अनुपम/अनुक्रम में राग (रसास्वादन संभावना)], पोषण-संरक्षण स्वीकार करने की क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “संतान”

१२-
जो संरक्षण करे सो पिता, अर्थात “संरक्षण क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “पिता”
जो पोषण करे सो माँ, अर्थात “पोषण क्रिया” का नामकरण/संज्ञा “माता”
अस्तित्व (समग्र-सम्पूर्ण), सह-अस्तित्व, ब्रह्माण्ड, धरती, प्रकृति, विश्व, अन्तर्राष्ट्र, राष्ट्र, समाज, परिवार, सम्बन्ध, व्यक्ति, शरीर, मन, अस्तित्व (स्वयं).

१३-
मनुष्य ने लिखी किताब……….प्रमाण कौन……..मनुष्य या किताब…
मनुष्य ने बनायी मशीन………प्रमाण कौन……..मनुष्य या मशीन….
मनुष्य ने बोले शब्द, वाक्य, आप्त-वचन…………प्रमाण कौन……….मनुष्य या शब्द, वाक्य, आप्त-वचन…..
प्रमाण अथवा महत्वपूर्ण और बड़ा कौन………..मनुष्य-स्वयं या उसके द्वारा लिखी, रची, बनायी, बोली गयी चीजें……..

१४-
संविधान की मूल उद्देशिका:- “न्याय”,

सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की पात्रता को पहचानना,
सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की क्षमता को पहचानना,
सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की योग्यता को पहचानना,
सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की अपेक्षा को निश्चित स्वरूप में पहचानना,
सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की अपेक्षा को निश्चित स्वरूप में स्वयं और एक-दूसरे की पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व को पहचानना,
सम्बन्ध/परस्परता में स्वयं और एक-दूसरे की पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व के अनुसार निर्वाह करना,
सम्बन्ध/परस्परता में पूरकता-कर्त्तव्य-दायित्व के निर्वाह से प्राप्त फल-परिणाम का परस्पर अपेक्षा एवं पूरकता के आधार पर मूल्यांकन करना,
सम्बन्ध/परस्परता में किये गए मूल्यांकन का निष्कर्ष परस्पर-अपेक्षा-पूरकता के अनुरूप होने के फलस्वरूप दोनों सम्बन्धियों का तृप्त होना अर्थात उभय-तृप्त होना.
सम्बन्ध/परस्परता में इस प्रकार से उभय-सुख होना, उत्सवित होना = न्याय.
सम्बन्ध/परस्परता में न्याय होना = व्यवहार.

जाँचिये कि “न्याय” कोर्ट में हो सकता है क्या…….

१५-
कौन ज्यादा समझदार है या कम ना-समझ ……

पढ़ा-लिखा-उच्च डिग्रीधारी और ज्यादातर बीमार आदमी…..
अनपढ़-निरक्षर बिना डिग्री वाला और ज्यादातर स्वस्थ आदमी……..

१६-
वर्त्तमान की समीक्षा :—–

१. व्यापार-तंत्र = कृषी-बागवानी-पशुपालन-आपसी-लेन-देन सहित बेईमानी, धोखाधड़ी, भ्रष्टाचार, लूट, प्रकृति+मानव का शोषण, उत्पादन, उद्द्योग, विपणन, मुद्रा-विनिमय, …., …., ….-तंत्र, आदि के द्वारा “नियंत्रित”……

२. राज-तंत्र = सरकार-शासन-प्रशासन सहित भीड़, गिरोह, कबीला, मुखिया, राजा, प्रतिनिधि, बन्दूक-द्रोही-विद्रोही-आतंकवादी-पुलिश-सेना, संस्था, संगठन, एन०जी०ओ०, दल, लोक, प्रजा, जन, गण, साम्यवादी, समाजवादी, …., …., ….-तंत्र, आदि के द्वारा “नियंत्रित”……..

३. धर्म-तंत्र = व्यवस्था-अव्यवस्था सहित पूजा-पद्धति, भक्ति-उपासना, साधना, ध्यान-योग, आस्था, विचार, वाद, मत, पंथ, समुदाय, सम्प्रदाय, …., …., ….-तंत्र, आदि और इन सब के द्वारा “नियंत्रित”……..

४. शिक्षा-तंत्र = विद्यालय सहित प्रचार – कविता, कहानी, किताब, मीडिया/पत्रकारिता (प्रिंट, ऑडियो, विडिओ), इन्टरनेट (गूगल, फेसबुक, ट्विटर, सोशल-मीडिया, …., …., आदि), स्मार्टफोन, टोपी, ड्रेस, झंडा, पर्चा, बैनर, पोस्टर, होर्डिंग, टी-वी, सिनेमा, …., आदि, प्रदर्शन – नाटक, नौटंकी, नाच, हुड़दंग, हंगामा, धरना, अनशन, चर्चा, गोष्ठी, सभी व्यक्तिगत (शारीरिक+मानसिक)/पारिवारिक/सामाजिक/राष्ट्रीय/वैश्विक/प्राकृतिक -गतिविधियाँ एवं उत्सव, पर्व, त्यौहार, जयन्ती, मेला, रैली, आन्दोलन, ,…., …., ….-तंत्र, आदि इन चारों के द्वारा “नियंत्रित”

नीतियों, कानूनों और सरकारी आदेश-पत्र का मकडजाल:

जिससे टीचर्स की मानसिकता अथवा टीचर्स को मानसिक तौर पर “गुलाम” बनाया जा सके. जिससे मानसिक तौर पर अथवा “गुलाम” मानसिकता के अथवा “रोबोट” नागरिक बनाया जा सके, जो “स्वतन्त्र” रूप से कभी भी सोच ही न सकें और इसप्रकार के नीतियों, कानूनों और सरकारी आदेश-पत्र के मकडजाल के सही, अच्छे और सार्वभौम रूप से कल्याणकारी होने और उसके संवैधानिकता का मूल्यांकन नहीं कर सके, जिससे इन चारों तंत्रों को अपने कार्यक्रमों को संचालित करने में कोइ बाधा न आये और उनके जरूरत के अनुसार कार्य-शक्ति “मशीनीकृत-आदमी” मिल सके.

१. व्यापार-तंत्र को कामगार अर्थात सामान्य-मजदूर, कम-स्किल्ड-मजदूर, उच्च-शिक्षित/स्किल्ड-मजदूर और लाभ को अधिकतम कर सकने वाले विशेषज्ञ,

२. राज-तंत्र को कर्मचारी, नौकरशाह और लोक/प्रजा/जन/गण/मन को बल पूर्वक नियंत्रित कर सकने वाले विशेषज्ञ,

३. धर्म-तंत्र को अन्धानुकरण करने वाले अनुयायी, भक्त, कार्यकर्ता, सेवादार और सम्मोहित कर सकने वाले वाक्पटु विशेषज्ञ,

४. शिक्षा-तंत्र को टीचर्स जिनकी मानसिकता “गुलाम” जैसी हो और दूसरों के मानसिकता को “गुलाम” बनाने वाले विशेषज्ञ.

मिल सकें………….इसके समाधान हेतु शिक्षा के समग्र-सम्पूर्ण-सार्वभौम स्वरूप/प्रारूप के प्रस्ताव पर विचार करें ………….शुभकामना ………………

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रवि प्रकाश सिंन्हा
प्राथमिक शिक्षा परिषद में अध्यापक हैं

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