Category: आपके आलेख

  • भारत की कश्मीर नीतिः आगे का रास्ता

    Prof Ram Puniyani

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    कश्मीर घाटी में अशांति और हिंसा, जिसने बुरहान वानी की जुलाई 2016 में मुठभेड़ में हत्या के बाद से और गंभीर रूप ले लिया है, में कोई कमी आती नहीं दिख रही है। बल्कि हालात और खराब होते जा रहे हैं। अप्रैल 2017 में हुए उपचुनावों में बहुत कम मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। मतदान का प्रतिशत सात के आसपास था। इन उपचुनावों के दौरान हिंसा भी हुई जिसमें कई नागरिक और सुरक्षाकर्मी मारे गए। हम सबने देखा कि किस तरह एक कश्मीरी युवक को सेना की गाड़ी से बांध दिया गया ताकि पत्थरबाज, गाड़ी पर पत्थर न फेंके। यह घटना दिल दहला देने वाली थी।

    घाटी में पत्थरबाजी में कोई कमी नहीं आ रही है। पत्थर फेंकने वाले युवाओं को लोग अलग-अलग दृष्टिकोणों से देख रहे हैं। शेख अब्दुल्ला ने चुनाव की पूर्व संध्या पर कहा कि पत्थर फेंकने वाले अपने देश की खातिर ऐसा कर रहे हैं। उनके इस बयान की कटु निंदा हुई। कुछ लोगों ने इसे केवल एक चुनाव जुमला निरूपित किया।

    मीडिया के एक तबके का कहना है कि पत्थर फेंकने वाले पाकिस्तान समर्थक हैं और हमारे पड़ोसी देश के भड़काने पर ऐसा कर रहे हैं। यह भी कहा जा रहा है कि उन्हें ऐसा करने के लिए पैसा मिलता है। कश्मीर में पत्थरबाजी का इस्तेमाल विरोध प्रदर्शन के लिए लंबे समय से किया जाता रहा है परंतु हाल के कुछ महीनों में इस तरह की घटनाओं में जबरदस्त वृद्धि हुई है। युवा दो पाटों के बीच पिस रहे हैं। एक ओर हैं आतंकवादी और अतिवादी और दूसरी ओर, सुरक्षाबल। दोनों ही उन्हें डरा धमका रहे हैं और उनके खिलाफ हिंसा कर रहे हैं। यह साफ है कि जब भी दमनचक्र तेज़ होता है तब पत्थरबाजी की घटनाएं भी बढ़ जाती हैं। मकबूल भट्ट को 1984 में फांसी दिए जाने के बाद, अफज़ल गुरू को 2013 में मृत्युदंड दिए जाने के बाद और अब बुरहान वानी की मौत के बाद इस तरह की घटनाओं में इजाफा हुआ है।

    ये लड़के कौन हैं जो पत्थर फेंकते हैं? क्या वे पाकिस्तान से प्रेरित और उसके द्वारा प्रायोजित हैं? सुरक्षा बलों की कार्यवाहियों में घाटी में सैंकड़ों लोग मारे जा चुके हैं, हज़ारों घायल हुए हैं और कई अपनी दृष्टि गंवा बैठे हैं। मीडिया का एक हिस्सा चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा है कि पत्थरबाजी के पीछे पाकिस्तान है और वही पत्थरबाजों को धन दे रहा है। जो प्रश्न हमें अपने आप से पूछना चाहिए वह यह है कि क्या कोई भी युवा, किसी के भड़काने पर या धन के लिए अपनी जान दांव पर लगा देगा। क्या वह अपनी आंखें खो देने या गंभीर रूप से घायल होने का खतरा मोल लेगा? पत्थरबाजों में से अनेक किशोरवय के हैं और आईटी का अच्छा ज्ञान रखते हैं। परंतु वे घृणा से इतने लबरेज़ हैं कि वे अपनी जान और अपने भविष्य को दांव पर लगाने के लिए तैयार हैं। इससे यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि वे कितने अधिक कुंठित हैं।

    मीडिया के एक छोटे से तबके ने इस मुद्दे की गहराई में जाकर पत्थरबाजों से बातचीत की। उन्होंने जो कुछ कहा उससे कश्मीर घाटी में कानून और व्यवस्था की स्थिति के बारे में हमारी सोच को पूरी तरह से बदल देने की क्षमता है। इनमें से कई ऐसे परिवारों से हैं, जिन्हें अब जिंदगी से कोई उम्मीद बाकी नहीं है। उन्होंने शारीरिक प्रताड़ना झेली है, उन्हें हर तरह से अपमानित किया गया है और उनके साथ मारपीट आम है। उनके लिए पत्थर फेंकना एक तरह से कुंठाओं से मुक्त होने का प्रयास है। उनमें से कुछ निश्चित तौर पर पाकिस्तान समर्थक हो सकते हैं परंतु मूल मुद्दा यही है कि घाटी के युवाओं में गहन असंतोष और अलगाव का भाव घर कर गया है और इसका कारण है वह पीड़ा और यंत्रणा, जो उनके क्षेत्र में लंबे समय से सेना की मौजूदगी के कारण उन्हें झेलनी पड़ रही है। बुरहान वानी की हत्या के बाद, पीडीपी और नेशनल कान्फ्रेंस, दोनों को ही यह अहसास हो गया था कि वहां स्थितियां बिगड़ सकती हैं। राज्य की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, असंतुष्टों के साथ बातचीत करना चाहती थीं परंतु सरकार में उनकी गठबंधन साथी भाजपा ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया। महबूबा मुफ्ती का मानना है कि केवल बातचीत से ही समस्या का हल निकल सकता है। इसके विपरीत, भाजपा, गोलाबारूद और सेना की मदद से असंतोष को कुचल देना चाहती है।

    ऐसे समय में हमें घाटी में शांति स्थापना के पूर्व के प्रयासों को याद करना चाहिए। यूपीए-2 ने वार्ताकारों के एक दल को कश्मीर भेजकर समस्या का अध्ययन करने और उसका हल सुझाने की ज़िम्मेदारी सौंपी थी। इस दल में कई प्रतिष्ठित नागरिक शामिल थे। दल ने सुझाव दिया था कि कश्मीर विधानसभा की स्वायत्तता बहाल की जाए, जिसका प्रावधान कश्मीर की विलय की संधि में था। दल ने यह सुझाव भी दिया था कि असंतुष्टों के साथ बातचीत के रास्ते खोले जाएं, सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को रद्द किया जाए और पाकिस्तान के साथ चर्चा हो।

    आज ज़रूरत इस बात की है कि हम विलय की संधि की शर्तों को याद करें और वार्ताकारों की सिफारिशों को गंभीरता से लें। कश्मीर के भारत में विलय के 70 साल बाद भी हमें यह याद रखना चाहिए कि भारतीय राष्ट्र निर्माताओं का कभी यह इरादा नहीं था कि कश्मीर का भारत में जबरदस्ती विलय करवाया जाए या वहां व्याप्त असंतोष को सेना के बूटों तले कुचला जाए। भारत के तत्कालीन उपप्रधानमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 30 अक्टूबर, 1948 को बंबई में एक आमसभा को संबोधित करते हुए कहा थाः ‘‘कुछ लोग यह मानते हैं कि हर मुस्लिम-बहुल इलाके को पाकिस्तान का हिस्सा होना चाहिए। वे यह पूछते हैं कि हमने कश्मीर को भारत का भाग बनाने का निर्णय क्यों लिया है? इस प्रश्न का उत्तर बहुत आसान है। हम कश्मीर में इसलिए हैं क्योंकि कश्मीर के लोग ऐसा चाहते हैं। जिस क्षण हमें यह एहसास होगा कि कश्मीर के लोग यह नहीं चाहते कि हम वहां रहें, उसके बाद हम एक मिनट भी वहां नहीं रहेंगे…हम कश्मीरीयों को दगा नहीं देंगे’’ (द हिन्दुस्तान टाईम्स, 31 अक्टूबर, 1948)।

    कश्मीर में स्थिति अत्यंत गंभीर है और केन्द्र सरकार के मनमानीपूर्ण व्यवहार के कारण दिन प्रतिदिन और गंभीर होती जा रही है। अगर हम स्वर्ग जैसी इस भूमि पर शांति चाहते हैं तो हमें महबूबा मुफ्ती और शेख अब्दुल्ला जैसे व्यक्तियों के विचारों का भी सम्मान करना होगा। स्थायी शांति तभी स्थापित हो सकती है जब हम लोगों के दिलों को जीतें। अति-राष्ट्रवादी फार्मूलों से काम नहीं चलेगा।

    (अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

  • भारतीय शास्त्रीय कलाएं और सामाजिक सरोकार –Sanjay Jothe

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    भारतीय कलाकारों, खिलाड़ियों, गायकों नृत्यकारों के वक्तव्य बहुत निराश करते हैं। उनके वक्तव्यों में आम भारतीय मजदूर या किसान या गरीब के सामाजिक सरोकार एकदम से गायब हैं। उन्होंने कला को व्यक्तिगत मोक्ष या अलौकिक आनन्द की जिन शब्दावलियों में गूंथा है उसमें फसकर कला और कलात्मक अभव्यक्तियाँ भी इस लोक की वास्तविकताओं के लिए न सिर्फ असमर्थ हो गए हैं बल्कि उसके दुश्मन भी बन गए हैं। हालांकि अभी कुछ वर्षों से पश्चिमी प्रभाव में एक भिन्न किस्म की कला उभर रही है वह एक नई घटना है, उससे कुछ उम्मीद जाग रही है।

    भारत का उदाहरण लें तो साफ नजर आता है कि कला, भाषा, संगीत काव्य आदि सृजन के वाहक होने के साथ ही शोषक परम्पराओं और धर्म के भी वाहक बन जाते हैं। खासकर भारत मे संगीत और साहित्य ने जो दिशा पकड़ी है उसका मूल्यांकन आप समाज की सेहत के संदर्भ में करेंगे तो आपको चौंकानेवाले नतीजे मिलेंगे। 1935 के पहले तक का नख शिख वर्णन और भक्ति सहित नायिका विमर्श वाले साहित्य को दखिये और आज तक के शास्त्रीय संगीत और नर्तन को दखिये – ये सब शोषक धर्म और संस्कृति के कथानकों, मिथकों, गीतों का ही मंचन, गायन और महिमामंडन करते आये हैं।

    नृत्य की प्रमुख शास्त्रीय शैलियो को देखिये वे किसी न किसी मिथक या अवतार की लीला से आरंभ होकर उस अवतार या मिथक से जुड़े सामाजिक मनोविज्ञान को सुरक्षित रखने का काम करती आई है। अधिकांश शास्त्रीय गायक अपनी गायकी जिन काव्य प्रतीकों और छंदों में बांधते हैं वे काव्य अंश सामंती दास्यभाव की भक्ति के गुणगान से या परलोकी वैराग्य और काल्पनिक ईश्वर के महिमामंडन से भरी होती है।

    यह सब सीधे तरीके से ब्राह्मणी वेदांत और ब्राह्मणवादी हिन्दू धर्म की वर्णाश्रमवादी सामाजिक संरचना को बनाये रखने का एक सूक्ष्म हथियार बन जाता है। एक खास किस्म का कल्पनालोक इन शास्त्रीय कलाओं से जन्म लेता है और स्वयं को हर पीढ़ी में आगे सौंपता जाता है। इसी से प्रेरणा लेकर हमारा फिल्मी और टेलीविजन का संगीत और नृत्य विकसित/पतित होता है। इस ढंग ढोल में जन्मे संगीत नृत्य खेल साहित्य आदि में समाज के वास्तविक सरोकारों को कोइ स्थान नहीं मिलता है। यही भारतीय कला की हकीकत रही है।

    हमारे साहित्य, संगीत, खेल और फ़िल्म सहित मीडिया की किसी भी विधा के चैम्पियनों को उठाकर देख लीजिए। उनकी कला न उनके हृदय में सामाजिक सरोकारों को पैदा कर पा रही है न उनसे प्रभावित लोगों में किसी सामाजिक शुभ को प्रेरित कर रही है।

    हां, ये ठीक है कि एक व्यक्तिगत अर्थ में, एक व्यक्ति की सृजन प्रेरणाओं को ऊर्जा और आकार देने में ये विधाएं ठीक ढंग से काम करती आई हैं लेकिन इसका सामाजिक या सामूहिक शुभ से कोई अनिवार्य संबन्ध नहीं बनता। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारी कलाएं और उनकी अभिव्यक्तियाँ ठोस और जमीनी सरोकारों से एक खास किस्म की तटस्थता सायास बनाकर चलती हैं।

    यहां यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि लोक कलाओं और जनजातीय कलाओं में यह समस्या नहीं है। लेकिन चूंकि उनका विकास अब अवरुद्ध सा हो गया है और उनके अपने वाहक अब “सभ्य” होने लगे हैं, सो उनमे पुरानी लोक कलाओं को सहेजने या विकसित करने की प्रवृत्ति क्षीण हो रही है। एक पॉप्युलर कल्चर और उसका आभामण्डल उनपर हावी हो रहा है। अब वे भी चलताऊ किस्म के न्यूज चैनल्स की शैली में परोसीे गई कला, गीत, संगीत, मंचीय काव्य, शायरी और जगरातों कथा पंडालों से प्रभावित हो रहे हैं।

    कुल मिलाकर एक सामान्य स्थिति यह है कि अब लोक कलाओं का नाम लेने वाले समूह और समुदाय ही नहीं बल्कि व्यक्ति और संस्थाएं भी सिकुड़ रही हैं। ऐसे में फिल्म या टेलीविजन पर सवार कला ही सामान्य जनसमुदाय के लिए एक बड़ी खुराक का निर्माण करती है। इसका सीधा अर्थ यह हुआ कि हमारा आम भारतीय कलाओं की बहुत निकृष्ट और व्यक्तिगत मोक्ष के अर्थ वाले संस्करणों से कला की प्रेरणा लेता है। यह एकांत में तनाव मुक्ति का या किसी तरह के मनोलोक में खो जाने का उपाय भर होता है। इसका समाज की सामूहिकता पर क्या प्रभाव होता है यह एक अन्य भयानक तथ्य है।

    अब कलाकारों और आम जन को लोक कला सहित लोक और लोकतंत्र से ही कोई सरोकार नहीं रह गया है। ऐसे  में कला खेल संगीत नृत्य आदि लोकतंत्र के खिलाफ खड़ी हुई फासीवादी शक्तियों का गुणगान करने लगे हैं। हमारा बोलीवूड, क्रिकेट, टेलीविजन और शास्त्रीय संगीत अब अपनी सांस्कृतिक समझ और राजनीतिक रुझान की घोषणा कर रहा है।

    उदारीकरण के बाद राजनीति, धर्म और व्यापार की त्रिमूर्ति ने जिस नये और सर्वयव्यापी ईश्वर को रचा है अब उस ईश्वर के गुणगान में भारतीय  शास्त्रीय संगीत, नृत्य, खेल आदि कलाएं भी दोहरी हुई जा रही है। पहले देवी देवताओं और सामंतों की स्तुति होती थी अब थोड़े बदले ढंग से बाजार और राजनेता की स्तुति हो रही है। ये स्तुति प्रत्यक्ष नजर नहीं आएगी लेकिन प्रचलित राजनीति और राजनीतिक आका जिन मिथकों और महाकाव्यों से अपने विषबुझे तीर हासिल करते हैं उन्ही प्रतीकों को अपने गायन नर्तन में जिंदा रखकर असल मे ये कलाएं और कलाकार एक खास राजनीति की ही सेवा करते आये हैं।

    आश्चर्य नहीं कि कलाकार हद दर्जे के अंधविश्वासी, कर्मकांडी, ज्योतिष वास्तु आदि के गुलाम और परलोकवादी होते हैं। इनकी संगीत और काव्य की प्रशंसा सुनें तो साफ नजर आएगा कि ये संगीत या काव्य की प्रशंसा उसके आलौकिक या समयातीत होने की उपमा देते हुए करते हैं। किसी अव्यक्त अज्ञात या अज्ञेय के नजदीक जाने के उपकरण की तरह इन्हें वह संगीत नृत्य या काव्य उपयोगी नजर आता है। ऐसे में संगीत, नृत्य और काव्य स्वयं में एक काल्पनिक ईश्वर के प्रचारतंत्र के दलाल बन जाते हैं।

    इस भूमिका के बाद आप भारतीय कलाकारों,संगीतकारों, खिलाड़ियों और कुछ हद तक साहित्यकारों के समाज विरोधी वक्तव्यों को दखिये, आप देख सकेंगे कि भारतीय कला और कलाकार असल मे प्रतिक्रांति के प्राचीन उपकरण रहे हैं जिनमे शहरी मध्यम वर्ग की असुरक्षाओ और नव उदारीकरण के कीटाणुओं ने नई धार और नया जहर भर दिया है।

  • जरूरी हो गया है

    Dhiraj Kumar

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    वो एक है
    अरे नही ! वो दो है
    नही नही वो अनेक है
    नही रे वो कण कण मे है

    वो एकमात्र है
    नही वो तो अंतिम है
    वो अनंत है,अपरंपार है
    वो सच्चा सत्य है
    नही वो सच्चा शिव है
    नही वो तो सच्चा सुन्दर है

    वो ऐसा है ,वो वैसा है
    वो फलाना है ,वो ढिमकाना है
    उसने यह किया,उसने वो किया
    वो यह करता है,वो वह करता है
    वो यह यह करेगा ,वो वह करेगा

    पर’ वो’ को बनाने वाले
    या उसका उत्पादन करने वाले को
    यह बखूबी पता होता है कि
    जिस झूठ की फैक्टरी से
    ‘ वो’ नामक झूठ का उत्पादन कर
    ‘ वो ‘बेचने का धंधा वो करता है
    जल्द ही लोग उब जाते है..
    तभी तो वो ‘वो’ को नये फलेवर या पैकेज मे
    बेचने का नया जुगाड़ तलाश कर ही लेता है
    यानि बोतल नया,शराब वही’ वो ‘

    ‘वो’ को बनाने वाले या….
    बनाकर धंधा करने वाले
    अब तक तो “येन केन प्रकरेण ‘
    सफल माने जा सकते है..
    जीतते रहे है…
    पर अब मामला संजीदा हो चला है….

    किसी ‘वैज्ञानिक’ ने एक प्रश्न पूछ लिया है कि
    ‘ वो’ बनाने वालों जरा बताओ कि..
    ‘ बिग बैंग’ के पहले तुम्हारा ‘ वो ‘ कहां था
    या वो कर क्या रहा था ?

    मामला दिलचस्प है और रहेगा…
    ‘ वो ‘ के उत्पादन कर्ता सच और झूठ के बीच के
    खेल के माहिर परन्तु शातिर खिलाड़ी रहे है..

    हम …
    दर्शक दीर्घा मे बैठे ठाले
    फेयर प्ले की उम्मीद नही कर सकते
    क्योंकि इतिहास जानते हुए
    हम अनजान नही रह सकते…

    पता होना चाहिए कि…
    ‘वो ‘ बनाने वालों के द्वारा फेंकी गयी
    रोटी के टुकड़ों पर पलने वाले
    कथित निर्णायकों ने
    ‘ गाड पार्टिकल’ नामक सीटी
    खेल शूरू होने से पहले ही
    बजानी शूरू कर दी है….

    हमेशा की तरह
    खेल खतरनाक है….
    जिंदगी की हार को
    खेल भावना से स्वीकार करने की
    परंपरा को छोड़ना जरूरी हो गया है…

  • अल्लां हूं अंकबर अल्लां आ आ आआआआआआआअ ..

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    यूट्यूब पर मैंने कोई विडियो देखी थी कभी जिसमें दुबई के किसी मॉल में कोई एकदम छोटी सी लड़की यूँ ठिठक गई है और मासूम पैरों से जैसे किसी आवाज़ का पीछा कर रही है. वह अज़ान की आवाज़ थी जो पास की किसी मस्ज़िद से आ रही थी. वह वाकई एक सुंदर सुरीली आवाज़ थी. हालांकि उस विडियो का शीर्षक कुछ इस प्रकार का रख दिया गया था – अज़ान की आवाज़ से ईसाई बच्ची सरप्राइइज्ड. सुंदर गायन सा ही अज़ान सऊदी अरब के शाही मस्ज़िद से सुनने को मिलता है. मैं एकबार हौज़ख़ास में प्रत्यूष के कमरे पर बैठा था, तब भी इतनी ही सुंदर आवाज़ सुनी थी और प्रत्यूष से इसका ज़िक्र किया था.

    लेकिन ऐसा हमेशा नहीं होता. हमारे आसपास की मसाज़िद के बेसुरे मुअज़्ज़िन सच में ऐसी टेर लगाते हैं कि पहली इच्छा यही होती है कि ख़ुदा अभी इस मस्ज़िद पर आंधी-तूफ़ान-बिजली के रूप में अपनी करम बरसा इस व्यक्ति की आवाज़ को कंठ में ही दबोच ले. अलसुबह की अज़ान तो और भी अप्रिय लग सकती है.

    अल्लां हूं अंकबर अल्लां आ आ आआआआआआआअ ..

    बेगूसराय में हमारे मोहल्ले की अज़ान सुन एकाध बार मैंने विचार किया कि अज़ान के लिए मुअज़्ज़िन का चुनाव करने में शायद वे इस बात पर विचार करते हैं कि कौन अपनी नाक सबसे अधिक हुनर से दबाकर आवाज़ निकाल सकता है या किसकी आवाज़ अल्लाह ने ऐसी ही बनाकर ज़ुल्म करने को धरती पर भेजा है.

    खैर यह तो एक बात हुई.

    दूसरी बात यह हुई कि मुझे एक ऐसी लड़की से इश्क़ हुआ जो दिन में फ़ोन ही नहीं कर पाती थी. वह देर रात की फुसफुसाहट में मुझे फ़ोन करती और उसकी आधी बातें मुझे सुनाई ही नहीं पड़ती. मुझे व्हिस्प्रिंग वाला संवाद सिर्फ तब पसंद है जब हम दैहिक क्षणों में इतने क़रीब हों कि आवाज़ थोड़ी भी तेज़ हो तो देह की लय टूटती हो. उसने सामान्य आवाज़ का जो अवसर तलाशा वह शाम का समय होता था जब उसकी माँ और बहनें रसोई में व्यस्त हो और वह छत पर आकर मुझसे बात करे. लेकिन अन्याय हुआ यहाँ. मैं उससे रूमानी बातें करने की कोशिश करता और कोई द्वारपालों को कह रहा होता कि भाई कन्हैया से कह दो कि हम मिलने आए हैं. उसने मुझे बताया और मैंने सुना कि प्रतिदिन 7-9 और 5-7, चार घंटे यूँही कोई चिल्लाकर द्वारपालों से बात कर रहा होता या राम बनकर श्याम बनकर प्रभु जी से (प्रभु जोशी नहीं, ईश्वर) आने की विनती कर रही होती. न प्रभु जी कभी आए, न उनकी रोज़ की चिल्लपों बंद हुई, न मेरा इश्क़ परवान चढ़ा. मैं गंभीरता से सोचता हूँ तो उस लड़की से मेरे ब्रेक अप का सबसे बड़ा कारण उसके पड़ोस के मंदिर की कथित धार्मिकता ही रही.

    मैं मुखर्जी नगर इलाक़े में रहता था तो मैंने गौर किया कि हमारे प्रीलिम और मेन्स एग्जाम के तुरंत पहले अचानक से माता रानी के जगरातों की बाढ़ आ जाती थी. भारी चिढ़ में मैं यह सोचकर संतोष करता कि संभवतः हमें एग्जाम पास कराने के लिए यह मोहल्ले वालों का सामूहिक धार्मिक सहयोग है. हालांकि, माता रानी का गणित अधिक तेज़ निकलता रहा. हम फेल होते रहे और उनके ‘यूपीएससी एसपायरेंट’ किरायेदारों की संख्या बढ़ती रही और वे और मोटे होते रहे.

    बहिरकैफ़, ये सब पुरानी झेली हुई कहानियां हैं और इनपर बातें हम करते ही रहे हैं. अभी न जाने देश में कौन सी हवा चली है कि अचानक इन बातों को हमले के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है. अब ये बातें किसी राय या विचार सी नहीं लगतीं, बल्कि ऐसा लगता है कि समुदाय विशेष पर हमले के लिए ही इसे खुलकर प्रकट किया जा रहा.

    मैंने कहीं पढ़ा कि कुरआन में ही कहीं यह ज़िक्र है कि ‘तब बोलो यदि तुम्हारा बोलना तुम्हारे चुप रहने से अधिक बेहतर हो.’ सोनू तो सुरीले गायक हैं. वे चार ट्वीट से भी अपनी बात नहीं समझा सकने के बजाय एक ट्विट से ही यह व्यंग्य करते कि मेरे पास की मस्ज़िद मुझे मुअज़्ज़िन रख ले या अत्याचार बंद करे, तो वे ज्यादा असर करते. खैर.

     

  • टुकड़ा टुकड़ा प्रेयसी

    Shayak Alok

    [themify_hr color=”red”]

    अपनी पहली भूमिका में वह गुनगुनाती है बेतरह

    अपने होठों को पांच प्रकार से घुमाकर
    पांच तरह की अभिव्यक्ति देती है
    पांच सौ प्रकार के संकेत
    पहले घुमाव से आखिरी तक में मीलों गुजर लेती है
    अतीत के मेरे प्रेम-हादसों की भरी-पूरी ट्रेन
    और मैं बिजली के तारों पर के नीलकंठ गिनता रहता हूँ

    होठों की तीसरी अभिव्यक्ति में ‘ओ’ बनाकर चूमती है मुझे
    मैं महसूसता हूँ मेरे होठों को कांपते हुए
    मेरी पाँचों इन्द्रियाँ जम जाती हैं
    उसके होठों की पांचवीं अभिव्यक्ति में उसके गाल पर गड्ढा बनता है

    दूसरी भूमिका में करवट बदलती है प्रेयसी
    मैं उसके खाली कंधों पर तिल ढूंढने लगता हूँ

    तिल की तलाश का कारवां सुस्त क़दम गुजरता है
    उसके एक एक रोमकूप से प्यास पुकारती है मुझे
    मैं लिखने लगता हूँ चुम्बनों में देह की भूख की पीड़ा
    मेरी भूख बढती जाती है
    उसके पेट का वलय सिहरन में प्रतिध्वनित होता है

    कलपती है प्रेयसी ..
    ‘बस शरीर नहीं हूँ मैं’ का हुंकार भरती
    अपनी तीसरी भूमिका में प्रवेश करती है प्रेयसी ..

    उठाती है वह सदियों के सवाल
    जमा हिसाब मांगती पूछती है प्रेम का प्रयोजन
    बार बार लौट जाती अतीत में मुझे धकिया कर
    मन के दरवाजे की सांकल अन्दर से बंद कर लेती है

    मैं मेरे कान सांकल में दर्ज रुक गयी स्त्री पर लगाकर रखता हूँ
    मैं सूंघता रहता हूँ रुक के बहकते पदचापों को

    उसकी चौथी भूमिका में
    आसमान पर घिर आते हैं हरसिंगार
    चींटियाँ सीढ़ी लगा हरसिंगार के नीचे उतरने की बाट जोहती हैं
    प्यास के कूप फिर पानी से भर आते हैं
    एक एक चींटी सौ सौ बार पानी से मुंह जूठा करती निर्वाण पा लेती है

    इसी दृश्य में मैं हरसिंगार सा महकता रहता हूँ
    वह बदहवास खाली पैर
    मेरी नाभि के गोल गोल घुमती मुझे ढूंढती रहती है

    उसे देखा मैंने फिर लौट जाते उसकी पांचवीं भूमिका में
    बुदबुदाती है स्त्री बने रहने के जादू मंतर
    बालों को कसकर बाँध लेती है
    एक बाल्टी पानी छपाक फेंक रात का फर्श धो देती है
    मेरा भीगना भीग जाता है

    उसकी अंतिम भूमिका में एक नीलकंठ फड़फड़ाता है बेतरह.

     

  • राजसत्ता

    Tribhuvan

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    राजसत्ता एक ऐसा केंचुल है, जिसे ओढ़कर विषपायी सांप भी सम्मोहक दिखने लगता है।

    भूखे को रोटी मिल जाए और प्यासे को पानी तो यह देखना मुनासिब नहीं होता कि रोटी किसने दी और पानी किसने पिलाया।

    योगी आदित्यनाथ अगर उर्दू विश्वविद्यालय के लिए विशालकाय परिसर देते हैं, मुस्लिम युवतियों की सामूहिक शादी करवाते हैं और सरकार से उनका मेहर तय करवाते हैं तो उन्हें किसी को गले लगाने में क्या आपत्ति होगी? होनी भी क्यों चाहिए?

    कल अगर कोई मौलवी साहब शिक्षा मंत्री बन जाएं और वे संस्कृत के विस्तार की बातें करें, मंदिरों को जगहें आवंटित करने में जुट जाएं और भारतीय पुरातन वैदिक ग्रंथों के प्रकाशन और संचयन की बातें करने लगें तो मेरा ख़याल है कि वैज्ञानिक टेंपरामेंट वाले शिक्षा मंत्री के बजाय आम लोग ही नहीं, कट्टर हिन्दू भी उसे ही ज़्यादा पसंद करेंगे। आख़िर कट्टरता-कट्टरता का भी तो एक बहनापा होता ही है। ठीक ऐसे ही, हिन्दू मताग्रह और मुसलिम मताग्रह के बीच भी एक गर्भनाल का रिश्ता है।

    कांग्रेस तो हाल के वर्षों में कम्युनिस्टीकृत हुई है, वरना यही राग और स्वर तो अाज़ादी से पहले उसके नेताओं के हुआ करते थे। वे ही लोग राम मंदिर का ताला खुलवाते थे और हिंदू परंपराओं को मानते थे। पंडित जवाहरलाल नेहरू को आज लोग कितना भी सेक्युलर कहें, लेकिन उनके समय ही सारनाथ से निकले चार शेरों वाली प्रतिमा को राष्ट्रीय प्रतीक चिह्न बनाया गया। उपनिषद के वाक्य सत्यमेव जयते को राष्ट्रीय भावना माना गया और किसी भी सरकारी भवन के शिलान्यास पर हिंदू पंडितों से पूजा करवाने की परंपरा डाली गई।

    भाजपा और आरएसएस तो नाहक बदनाम हो रहे हैं, दरअसल बहुसंख्यक कट्टरता के बीज तो बाबा गांधी और पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय ही बोए गए। गांधी बाबा ने हर कदम पर भगवद्गीता की बात की और उसे राष्ट्रीय ग्रंथ से ज्यादा महत्व दिया। वे हर जगह रामराज्य की बात ही किया करते थे। नेहरू का राजनीतिक टेंपरामेंट चाहे कुछ भी हो, लेकिन वे राजसत्ता हासिल होने की संभावनाओं के कारण बाबा गांधी से चिपके रहे और सदा उनके प्रिय बने रहे। लेकिन गांधी धार्मिक होकर भी धर्मप्राण और सेक्युलर रहे, लेकिन जिन्ना जैसा नेता गैरधार्मिक और इस्लाम के प्रति परम अज्ञानी होकर भी घोर सांप्रदायिक हो गया।

    हम भले आरएसएस या भाजपा को आज हिंदू पुनरुत्थानवाद के लिए जिम्मेदार बताएं, लेकिन सच तो यह है कि हिन्दू मताग्रह की शुरुआत बंकिमचंद्र, तिलक, अरविंद, मदनमोहन मालवीय, वीर सावरकर, महात्मा गांधी सरीखे आधुनिक सुधारकों ने की थी। बंकिमचंद्र ने हिंदू पौराणिक गाथाओं का गान किया। तिलक ने शिवाजी की विरासत और गणेश चतुर्थी पर्व का राजनीतिक उपयोग शुरु किया। अरविंद ने काली की चेतना को उग्र किया। बंकिम जी के उपन्यास में हिन्दू मठ के सदस्य मुसलमानों के खिलाफ जिस वंदेमातरम् का आह्वान करते हैं, उसी वंदेमातरम को कांग्रेस ने ही राष्ट्रगान बनवाया। आज कांग्रेस को भले आरएसएस भाजपा के गौप्रेम पर आपत्ति हो, लेकिन सच यही है कि स्वयं गांधीजी ने यंग इंडिया में लिखा : “इसमें यानी हिन्दू धर्म में गौपूजा मेरी राय में मानवतावाद के क्रमिक विकास के प्रति एक शानदार परिणाम है।” बाेये पेड़ बबूल को, आम कहां तो खाय वाली कहावत शायद इसी संदर्भ में बनी हो तो अचरज़ नहीं।

    कांग्रेस के नेताओं ने पहले तो रामराज्य, गीता, वंदेमातरम्, गौपूजा, वर्णाश्रम धर्म आदि के माध्यम से राजनीति में धर्म को घुसेड़ा और मजे से राज किया; लेकिन जब पार्टी इन चीज़ों का रस निकाल चुकी, चुनावों और राजसत्ता की कुल्हाड़ी के गोगड़ों में गन्ने की तरह बार-बार पेरकर और बार-बार दुहरा-तिहरा करके पूरी तरह निचोड़ चुकी और मुसलमानों को भी जमकर इस्तेमाल कर चुकी तो अब चुके हुए हिन्दुत्व के गन्ने के छिलकों से बेचारे आरएसएस वाले और भाजपा वाले अपनी धूनी कुछ साल तापना चाहते हैं तो कांग्रेस हायतौबा मचा रही है। कम्युनिस्टों, लौहियावादियों, जेएनयू वालों, तरह-तरह के गतिशीलों-प्रगतिशीलों ने कांग्रेस को कभी इन मुद्दों पर कुछ कहा हो तो बताओ, लेकिन बीजेपी के बाबा आदित्यनाथ का राजभोग और टीवी पर उनका कुछ कवरेज जैसे लाहौलविलाकुव्वत करवाए दे रहा है! देखिए, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का पतन हो गया है। कुछ है ही नहीं दिखाने के लिए। अरे क्या देश में एक बाबा ही रह गया है।

    सत्ता का लालच ऐसा ही होता है। वह इनसान की धुरी को पूरी तरह घुमा देता है। अब तक कांग्रेस को घुमाए रखा और अब वह योगियों को घुमा रहा है। आप स्वयं देख लें, कांग्रेस शासन के समय दुनिया के सबसे ताकतवर बाबाओं में एक बाबा रामदेव योग पर फोकस्ड थे और जैसे ही उनके मित्रों की सरकार आई, वे सामान बेचने लगे और वणिक् धर्म अपना लिया। आज तक जिस राजनीतिक दल की जो रेलगाड़ी चला करती थी, उसका नाम कांग्रेस था और सत्ता की मलाई खाने वाले कुर्सीलिप्सु उस ट्रेन पर सवार हो जाते थे। आजकल इस ट्रेन का नाम बदलकर भाजपा हो गया है और अब लोग कांग्रेस या अन्य दल छोड़कर इस पर सवार होने को उतावले हो रहे हैं। जिस तरह विमान में आम कुछ खास चीज़ें अपने साथ नहीं ले जा सकते, उसी तरह सत्ता के स्टेशन के भी कुछ रेस्ट्रिक्शनंस होते हैं। यहां भी आप छुरे, पाछने, तेजाब, उस्तरे, चाकूनुमा चीज़ें साथ नहीं रख सकते। अब जो योगिराज उत्तरप्रदेश की सत्ता संभाल रहा है, उसके कंठ में यह दम नहीं है कि वह गरज कर कह सके कि किसी एक मुसलमान ने किसी एक हिन्दू युवती से बलात्कार किया तो हम सौ मुसलिम युवतियों से बलात्कार करेंगे। अब इस तरह की गैरजिम्मेदाराना बातें करने का अर्थ वे जानते हैं। सत्ता को आप भले बाहर से सांप कहें या ज़हर, आप उसका पान करने के लिए लालायित रहते हैं और हर समझौता करने को करने को तैयार। सत्ता सुंदरी कहें या विष कन्या, उसके अंग-प्रत्यंग का सम्मोहन हर ब्रह्मचारी और संन्यासी के लंगोट ढीले कर देता है! यह बात रीतिकाल में कवियों ने अपने दाेहों में कही, लेकिन आज के योगिराज इसे साबित भी करके दिखा रहे हैं।


    फेसबुक वाल से साभार

     

  • लक्ष्य की महिला टीम ने लखनऊ के गावं गोपरामऊ में एक सांय कालीन कैडर कैम्प का आयोजन किया

    15 April,

    लक्ष्य की महिला कमांडरों ने बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर  की जयंती के अवसर पर गांव वासियों को बधाई दी तथा बाबा साहेब की शिक्षाओं पर चलने की सलाह दी !

    लक्ष्य की महिला कमांडर  रेखा आर्या ने बाबा साहेब डॉ बी आर आंबेडकर के योगदान को याद करते हुए उनके दुवारा बताये तीन मूलमंत्र शिक्षित बनो,संघठित रहो  व् संघर्ष करो को अपने  जीवन में अपनाने की अपील की ! उन्होंने शिक्षा पर जोर देते हुए कहा कि बाबा साहेब ने कहा था कि शिक्षा वो शेरनी का दूध है जो इसे पियेगा वो शेर की तरह दहाड़ेगा इसलिए हमें अपने बच्चो को शिक्षित अवश्य करना चाहिए, चाहे इसके लिए हमें कितने भी  कास्ट उठाने पड़े !

    लक्ष्य कमांडर संघमित्रा गौतम ने शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की बात कही ! उन्होंने कहा   कि बाबा साहेब ने कहा था की गुलाम को गुलामी का अहसाश करा दो तो वो गुलामी की सारी जंजीरे तोड़ देगा ! उन्होंने कहा कि इसलिए  लक्ष्य की टीम गावं गावं जाकर  लोगो को उनके अधिकारों के बारे में जागरूक कर रही है !

    लक्ष्य कमांडर सुषमा बाबू ने लोगो को  अन्धविश्वास से बचने की सलाह दी !  उन्होंने कहा की दलित समाज की दुर्गति का मुख्य कारण अन्धविश्वास ही है ! buy modafinil netherlands https://megacanabisdispensary.com/

    लक्ष्य के सलाहकार एम्. एल. आर्या ने लक्ष्य के कार्यो की विस्तार से चर्चा की ! गावं के  लोगो ने लक्ष्य की महिला कमांडरों के कार्यो की भूरि भूरि प्रशंशा की !

     

  • विजय दीवान व गांधी विचार

    Pushya Mitra

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    ये विजय दीवान हैं. महाराष्ट्र में रहते हैं, पिछले दिनों चंपारण सत्याग्रह शताब्दी समारोह में भाग लेने पटना आये हुए थे. यहां उनको सुनने का मौका मिला. इनका जन्म ब्राह्मण जाति में हुआ था, मगर जब इनकी समझ बूझ बढ़ी तो इन्होंने तय किया कि वे मरी हुई गाय की चमड़ी को उतारने का काम करेंगे. बीस साल से वे यह काम कर भी रहे हैं. वे ऐसे पहले व्यक्ति नहीं हैं, जो यह काम कर रहे हैं. उनसे पहले गोपाल राव आहुजकर नामक एक व्यक्ति ने सवर्ण होने के बावजूद यह काम करना शुरू किया था. दरअसल महाराष्ट्र में एक परंपरा रही है, गांधीवादियों की जो जन्मना सवर्ण होने के बावजूद कथित रूप से दलितों के लिये तय पेशे को अपनाते हैं और उसी के हिसाब से जीना पसंद करते हैं.

    Vijay Divan

    विजय दीवान ने कहा कि गांधी कहते थे, कोई भी काम बुरा नहीं. हां, कोई भी काम स्वेच्छा से करना चाहिये, किसी पर लादना नहीं चाहिये. उन्होंने खास तौर पर यह संदेश दिया था कि सवर्णों को उन पेशों को अपनाना चाहिये, जो उन्होंने दलितों पर लादे हैं. उनसे प्रेरित होकर बिनोवा भावे और कई अन्य लोगों ने दलित बस्तियों में रह कर उन पेशों को अपनाने की कोशिश की. कुछ लोग आज तक यह काम कर रहे हैं. यह उद्धरण मैं उन लोगों के लिए पेश कर रहा हूं, जो यह दावा करते हैं कि गांधी का दलित प्रेम दिखावा था. वे केवल औपचारिकता करते थे.

    एक मित्र ने आज कहा कि अगर गांधीवादी तरीके से ही चला जाता तो दलितों को अधिकार मिलने में हजारों साल लग जाते. यह बात हिंसावादी भी कहते हैं कि अहिंसा से थोड़े ही आजादी मिली है, अहिंसा पर आधारित रहते तो हजारों साल में भी आजादी नहीं मिलती. वह तो सुभाष चंद्र बोस थे, जिनसे डर कर अंगरेजों ने भारत को आजादी दे दी. मगर ऐसा कहने वाले गांधी के प्रयासों से अवगत नहीं हैं. और ज्यादातर लोग पूना पैक्ट को ही आधार बनाकर गांधी की आलोचना करते हैं.

    पूना पैक्ट पर आंबेडकर ने जो करुणा दिखायी वह अविस्मरणीय है और निश्चित तौर पर यह फैसला उन्हें काफी बड़ा साबित कर देता है. मगर हमें यह भी याद रखना चाहिये कि पूना पैक्ट के बाद आंबेडकर से किये वायदे को पूरा करने के लिए गांधी ने क्या-क्या किया और इसमें उन्हें किन-किन का सहयोग मिला. वे देश भर के मंदिरों में घूमे और दलितों को प्रवेश दिलाने की कोशिश करते रहे. मगर दुर्भाग्यवश उन्हें अपनी ही पार्टी के लोगों का समर्थन नहीं मिल पाया. वे इस काम को करने के प्रयास में बिल्कुल अकेले पड़ गये थे. आखिरकार उन्हें कांग्रेस से त्यागपत्र दे देना पड़ा.

    आज हम गांधी और आंबेडकर की तुलना करने लगते हैं, मगर हमें यह याद रखना चाहिये कि राष्ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों में सिर्फ गांधी ही थे जो आंबेडकर के विचारों से प्रभावित थे. उन्होंने ही बस इसे व्यवहार में अपनाया. बांकी लोगों के लिए गांधी का छुआछूत विरोधी अभियान एक मजाक था. गांधी ने दिल से चाहा था कि यह समाज बदले, लोग जाति प्रथा के कोढ़ से बाहर निकलें. मगर इसके लिए नेहरू, सुभाष, पटेल या राजेंद्र बाबू ने क्या किया यह कोई बता सकता है क्या… ?

    यह गांधी ही थे जिन्होंने आंबेडकर को संविधान की ड्राफ्टिंग कमिटी का अध्यक्ष बनवाया. वरना नेहरू और पटेल इसके पक्ष में नहीं थे. इन लोगों के लिए दलितवाद एक राजनीतिक मसला भर था. गांधी की हत्या के बाद इन लोगों ने जगजीवन राम को खड़ा किया ताकि वे आंबेडकर की काट बन सकें और आंबेडकर राष्ट्रीय राजनीति में अलग-थलग पड़ते गये.

    मैंने जब लिखा कि मैं गांधी को नायक मानता हूं तो कई लोगों ने इसे इस रूप में लिया कि मैं आंबेडकर को या उनके विचारों को खारिज कर रहा हूं. ऐसा कतई नहीं है, आंबेडकर के विचारों में वह उत्तेजना है जो आपके सोच को एक झटके में बदल देती है. निश्चित तौर पर जिन लोगों ने जातिगत भेदभाव का जहर पिया है, उन्हें आंबेडकर के विचारों से शांति और प्रेरणा मिलती होगी. हमलोग इस बात को उस तरह महसूस नहीं कर सकते. हम दलित नहीं हो सकते और न ही हमें यह ढोंग करना चाहिये कि हम दलितों का दर्द समझते हैं. हमारा काम इतना ही है कि हम खुद को बदलें और विरासत में हमें जो भेद-भाव की प्रवृत्ति मिली है उससे उबरें.

    जहां तक मेरे गांधी को नायक मानने की बात है, उसकी वजह सिर्फ इतनी है कि गांधी एक छतरी की तरह थे, जहां हर बेहतर विचार जगह पाता था और फूलने-फलने का अवसर भी. वे समाज को बदलना चाहते थे, मगर एक को दूसरे का दुश्मन बना कर नहीं. वे हर किसी को प्रेम से बदलना चाहते थे, चाहे वे अंगरेज ही क्यों न हों. इसी वजह से उनके आंदोलनों में कटुता कम पैदा हुई. मैं इसलिए उन्हें पसंद करता हूं और जातिगत भेदभाव को मिटाने को लेकर उनके जो प्रयास थे, तरीके थे, उनमें आस्था व्यक्त करता हूं. इसका मतलब यह नहीं कि मैं आंबेडकर से असहमत हूं. इसका अर्थ सिर्फ इतना है कि मैं दोनों से सहमत होते हुए दोनों में से गांधी को बेहतर विकल्प मानता हूं.


    फेसबुक वाल से साभार

  • आप सुन लें कि आज शाम मैं मनुष्यतर हुआ हूँ – आज वह प्रेम की शाम थी

    Aman Tripathi

    [themify_hr color=”red”]

    आज शाम का वक्त मैंने
    एक लड़की के साथ बिताया है
    उसको मैं बहन कहता हूँ
    पहले नहीं मिला था कभी उससे
    जानता भी नहीं था कुछ महीने पहले
    नहीं जानने को नहीं जानते हुए
    जानने को जानने के बीच का
    समय पाटते हुए मैंने
    आज शाम का वक्त एक लड़की के साथ बिताया है

    मैंने और उसने तमाम बातें की हैं
    वह इस शहर में पहली बार आयी थी
    मैं जो उससे थोड़ा पहले पहली बार इस शहर में आया था
    उसे यह शहर अपने शहर की तरह घुमा रहा था
    मैंने उसे शहर में नदी दिखायी और
    शहर का सबसे पुराना कॉफी हाउस दिखाया
    वह किसी भी और लड़की की तरह थी
    उससे मिलना किसी भी और लड़की की तरह था
    उसने भी किसी भी और लड़की की तरह
    मेरे न बोलने या कम बोलने का इलज़ाम लगाया
    जबकि मैं यह मानता हूँ कि मैं ठीक-ठाक बोलता हूँ

    आप कहेंगे ऐसा क्या है
    आप कहेंगे कोई किसी लड़की से मिलता है
    जिसे वह बहन या कुछ भी कहता है
    इसमें किसी की क्या रुचि हो सकती है

    मैं बस यह बताना चाहता हूँ आपसे
    आज शाम तमाम हत्याओं दुर्घटनाओं मौतों आत्महत्याओं निन्दाओं षड्यन्त्रों बलात्कारों बयानों और मज़ाकों और विदूषकों के बीच और अछूते रहते हुए
    मैंने अपना समय एक लड़की उसकी बातों और किताबों और नदी के साथ बिताया है
    आप सुन लें कि आज शाम मैं मनुष्यतर हुआ हूँ
    आज वह प्रेम की शाम थी.