Category: आपके आलेख

  • राखी पर कुछ खुदरा नोट्स

    राखी पर कुछ खुदरा नोट्स

    Shayak Alok
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    विमर्श में बहन संबोधन लज्जास्पद है, अब। अब स्त्री कॉण्ट्रा-गर्ल है। एक सम्बन्ध विहीना। उसके पर्सोना को संबोधन संकटग्रस्त करता है। बहन शब्द, लाइफस्टाइल की कल्चर इंडस्ट्री ने, अपने तमाम उत्पाद के खिलाफ मानकर निषिद्ध कर दिया है। देह केंद्र में आने से, फिल्मों में पिछले 20 वर्षों में बहन पर कोई गाना नहीं आया। राखी पर रेडियो वालों को बड़ी किल्लत हो जाती है। वही गाने बजाने पड़ते है। भैया मेरे राखी के बंधन को निभाना…

    आदि, आदि। अभी, बहन भाई के से कंडोम शेयर नहीं करती। लेकिन, टेलिजेनिक माये, बेटी के पर्स में कंडोम का पैकेट रख कर प्रसन्न होती, बरामद होती है। हो सकता, कोई नया कहानीकार ,बप्रकात हो , और ऐसी कथास्थिति, बुनकर, कथा में नवोन्मेष कर दे।


    प्रभु जोशी

    शुक्रिया कि आजतक किसी संस्कृतिविद ने यह कांस्पीरेसी थ्योरी नहीं दी कि अरे यह रक्षाबंधन तो बाजार की साजिश के प्रथम उदाहरण में से एक है जहाँ उद्देश्य राखी और मिठाई बेचना है. तमाम अंग्रेजीदां उत्सवों, यथा- वैलेंटाइन, मदर्स, फ्रेंडशिप पर यही फ़ॉर्मूला लागू करते हमारा हिंदी मन संतुष्टि पाता रहा है. वे कहते रहे हैं कि अरे भाई, माँ के लिए और प्रेम के लिए एक दिन ! .. उन्हें तो हम सालों भर स्नेह सम्मान देते रहें. फिर बहन के लिए एक दिवसीय व्यवस्था क्यों ? गणेश, शिव, हनुमान के लिए एक विशेष दिन निर्धारित क्यों ?.. आशय यह कि किसी भी श्रेणी के कुतर्क को दूसरे कुतर्क से पानी पानी (डाईल्युट!) किया जा सकता है.
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    कर्णावती ने हुमायूं को राखी भेज मदद मांगी और हुमायूं ने सेना भेज दी. आसाराम नामक संत (कथित संत नहीं, संत मतलब व्यावहारिक तौर पर वही होता है जो आसाराम है और अन्य लोग हैं) ने कहा कि निर्भया ने फटाक दुपट्टे का कोर फाड़ा होता और अपने बलात्कारियों के हाथ पर बाँध भैया कह दिया होता तो बच जाती. अभी पिछले हफ्ते मैंने एक यूट्यूब विडियो देखा जहाँ संस्कृतिरक्षक एक प्रेमी युगल को पीट रहे थे और लड़की गुहार लगा रही थी कि भैया मत मारिए, मैं बीमार हूँ. और संस्कृतिरक्षक पूछता है कि बीमार हो मने, पीरियड चल रहा?

    और फिर फेसबुक है. इस कविता पर आपका आशीर्वाद चाहती हूँ भईया. मुझे बुझाता तो स और क नहीं है लेकिन सहमत दीदी.

    मैं बचपन में राखी को लेकर बेहद भावुक हो जाता था. आई मीन हिंदी फिल्मों के वे अद्भुत राखी दृश्य एंड यू ब्लडी डोंट हैव अ बहन मैन ! गुनाहे अजीम हुआ मुझसे. छठी कक्षा में मुझे अपनी एक सहपाठी से प्यार हो गया. प्यार मतलब पता नहीं क्या. उसकी उपस्थिति. और उसका वह स्नेह ! इसे बरक़रार रहना चाहिए था. सातवीं कक्षा में जूनियर स्कूल समाप्त होता और मैं उसे खो देता. मैं उसे नहीं खोना चाहता था. मैं सामाजिक आदर्शों के अनुकूल अपने संबंध की रक्षा चाहता था. मैंने उसे प्रपोज नहीं किया. मैंने कहा मुझे राखी दे दो. मैंने उसे एक चिट दी जिसपर लिख दिया – ‘फूलों का तारों का सबका कहना है/एक हजारों में मेरी बहना है’. वह मुस्कुराई, वह रोई, उसने राखी दी मुझे, लेकिन उसकी उपस्थिति ख़त्म हो गई उसी दिन. उसका वह स्नेह, वह सहजता, वह समाप्त. तीन साल बाद भी भूत ने मेरा पीछा नहीं छोड़ा था और मैंने कविता लिखी थी इसपर –

    *
    किताब के अनचाहे पेज में रखी
    मेरी याद की एकमात्र पहचान
    जला क्यों नहीं देती तुम
    जब उसे कर नहीं सकती स्वीकार

    मुझे आज भी वह दिन याद है जब मैंने वह अरमान भरा ख़त तुम्हें दिया था
    कितनी खुश थी तुम उन अनमोल ईहाओं पर विजय पाकर
    कभी चूमती स्निग्ध होठों से कभी अश्रुधारा बहाती उसपर
    मानो अश्क का परिचय करा रही हो

    दो पंक्तियों में सिमटा मेरा ख़त कितना भाता था तुम्हें
    कितनी मेहनत से चुराई थी मैंने दो पंक्तियाँ
    देव आनंद की आनंदमय पंक्तियां !

    मगर आज क्या हो गया है तुम्हें
    कहाँ खो गई तुम्हारी वह स्थायी जय जिसपर इठलाती इतराती थी तुम
    मैं समझ नहीं पाता हूँ
    लेकिन आज भी उन पंक्तियों को याद करता हूँ तो दोहराने की इच्छा होती है
    और तन्हाई में छत पर चढ़ प्रायः गुनगुना लेता हूँ
    ‘फूलों का तारों का सबका कहना है
    एक हजारों में मेरी बहना है’ …

    और फिर ऐसे ही एक दिन मैंने कहा कि मैं लौट जाना चाहता हूँ जहाँ से मैंने बात बदली थी. मैंने चिल्लाकर कहा खुद से कि प्यार करता हूँ तुमसे. तुम्हारी उपस्थिति और स्नेह के लिए सामाजिक आदर्शों का दबाव ओढ़ा था मैंने लिहाफ की तरह. मुझे माफ़ करो कि मैं प्यार ही करता हूँ तुमसे. लेकिन आदर्श और मान्यताएं यूँ आसानी से आपको नहीं छोड़ती. एक अपराधबोध में फंस गया और जलता रहा अगले दो वर्ष कि कैसे मनुष्य हो कि बात बदली तो उसपर टिके नहीं रहे और फिर वापस ! यह गुनाहे अजीम था मेरा. लेकिन पारो ने बचा लिया मुझे एक दिन. मैं बैठा था और पारो ने जैसे जोर से पुकारा – ‘’देव दाआआआआ….’’ दा दा दा दा. बंगाल के पास था मेरी मुक्ति का उपाय. वे अपनी लोकोक्ति में कहते थे कि ‘प्रेम का प्रथम डाक दादा को’ .. मुक्त हुआ तो मेरे मन ने विदा शब्द फूंक दिया पूरे प्रकरण व प्रयोजन को.

    अभी सोकर उठा कुछ देर पहले तो सुधा दी को याद किया. किसी राखी पर यह लिखा था उसके लिए.

    सुधा दी 

    मुझे खूब याद है जब मैं छोटा था-एकदम हाफ टिकट -तब राखी वाले दिन राखी बँधवाने के लिए खूब रोता था। स्मृति मुझे नर्सरी से कम से कम पाँचवी कक्षा तक ले जाती है जब तक मेरी माँ ने ही मुझे राखी बांधी और मैं दो रोज़ वह राखी बांधे इतराता घूमता रहता था। फिर सुधा दी आई एक बार…

    सुधा दी से अजब पारिवारिक रिश्ता था हमारा-पिता की तरफ के रिश्ते से वह मेरी बुआ लगती थी जबकि माँ की तरफ के रिश्ते से मेरी मौसेरी बहन। तो सुधा दी मुझे और मेरे पिता को साथ साथ राखी बांधती रही-बरसों बरस। पाँच फुट ऊंची वह गौरवर्णा आत्मीयता और मानसिक ऊर्जा की अप्रतिम प्रतिमूर्ति थी। याद नहीं आता कि हमारे पूरे खानदान मे कहीं किसी के घर छठी-शादी-श्राद्ध हो और वहाँ हमारी सुधा दी केंद्रीय भूमिका मे ना हो। सुधा दी को तो हमारे कुल देवता के वे गीत भी याद थे जो उनके पीछे की दो पीढ़ियों की मेरी परदादियो-परनानियों को भी याद ना थे। पिछले साल राखी पर आई तो माँ से अपनी दोनों बहुओं की शिकायत तो लगाई ही,माँ से मेरे ब्याह के बाबत तहक़ीक़ात भी की। जाते जाते कह गईं- “ब्याह कर लो भाय-फिर हम भी गीत-किस्सा गाते अवसान ग्रहण कर लेंगे”।

    दो हजार ग्यारह के दिसंबर माह मे मैं अपने तीन माह लंबे दिल्ली प्रवास पर था जब खबर मिली कि सुधा दी की दोनों किडनियाँ फ़ेल हो गयी हैं। महंगे इलाज मे अक्षम सुधा दी का परिवार उनके जाने के दिन गिनता रहा-दम साधे पूरी ज़िंदगी सीधी खड़ी रही सुधा दी बिस्तर पर पड़ी अपनी बची हुई साँसों को सोच समझ कर खर्च करती हुई जी चुकी ज़िंदगी का हिसाब करती रही। बीते बरस जेठ माह मे चली गयी सुधा दी । सावन की पूर्णमासी तक खुद को रोके रखने का साहस नहीं जुटा पायी होगी मेरी सुधा दी।

    कुमकुमिया (कुमकुम) और कंचनिया (कंचन) [ दोनों मेरी ममेरी बहने हैं-एक मेरे से तीन साल बड़ी है और दूसरी चार साल छोटी] पिछले साल मुझे राखी बांधने मेरे घर आई थीं । छोटी कंचनिया को उसकी ससुराल मेरी माँ ने बुलावा भेजा- “सुधिया ही बांधती थी- गई बेचारी – आ जाओ तुम ही और तीनों भाई को राखी बांध जाओ”। कुमकुमिया खुद आई । कुमकुमिया बड़ी है ना – जानती होगी कि राखी पर अपनी सुधा दी को ढूँढेंगे हम। मैं जानता हूँ इस साल भी जब कुमकुमिया मुझे राखी बांधेगी तो उसमे मुझे अपनी सुधा दी भी दिखेगी। और कुमकुमिया ज़रूर आँखें बड़ी करेगी और अपने हाथ का बनाया ‘पेडा’ मेरे मुंह मे ठुँसती हुई कहेगी- “ब्याह कर लो भाय”। ‘’

    और राखी पर बंदिनी को याद करता रहा हूँ इधर कुछ वर्षों से. अबके बरस भेजो भैया को बाबुल !

    और एक राखी पर यह लिखा मैंने. संयोग से बारिश आज भी है और उस रोज़ भी थी —

    न .. यूँ नहीं होनी चाहिए थी बारिश .. अभी नीचे गया गली में तो देखा वे जगह जगह सर छुपाती खड़ी हैं .. उनके बढ़िया परिधान खराब होंगे .. उन्हें अपने भाईयों को राखी बाँधने जाना था .. बच्चे गलियों में दौड़ नहीं लगा पा रहे .. उनकी माँओं ने मना कर रखा है कि कपड़े व तबियत खराब होंगे..

    मैं मेरा बचपन याद कर रहा हूँ .. नानीघर जाते थे हम .. गौरा गाँव .. नेशनल हायवे पर दो घंटे का सफ़र .. फिर एक लोकपरिया रस्ता जो नीचे उतरता था .. आगे देवी का मंदिर जहाँ पहुँचते माँ नोस्टालजिक होने लगती थी .. मंदिरों से बाहर निकलते स्त्री पुरुष जो माँ को देखते कहते थे – ‘ऐल्हो दाय राखी पे?’ .. फिर कई आंगनों को फर्लांगते अपने आँगन तक पहुंचना .. हर आँगन के चेहरे पर उतरती मुस्कुराहटें .. रस्ते में एक डोभा जो जलकुम्भियों से भरा था जिसमें भूत रहते थे .. हमारे आँगन से सटे आँगन से हम गुजरते तो चौकी वाली चाची (उन्हें नानी नहीं कहा कभी) हर बरस की भाँती बिल्कुल उसी जगह उसी कपड़े में बैठी हुई नजर आतीं .. बिना ब्लाउज के उजली साड़ी पहनी हुई .. एकदम सफ़ेद उनके बाल .. माँ को देखते हूं हूं की आवाज़ निकालतीं और फिर उनकी बहु दरवाजे की ओर झाँकती .. ‘दाय लौट्भो त हियों अयहियो’ .. चौकी वाली चाची और उनकी बहु दुनिया की दो सबसे सुन्दर स्त्रियाँ थीं .. फिर हम अपने आँगन पहुँचते .. जहाँ दुनिया की तीन अन्य सबसे सुन्दर स्त्रियाँ (मेरी तीनों मामी.. बड़ी को माँ पैतलिया वाली भौजी पुकारती हैं तो हम भी ऐसे ही बोलते रहे.. हम बच्चे उन्हें दीदी भी बोलते हैं, मंझली जिसे सब मंझली ही बोलते हैं और छोटी, बारो वाली या रजनी बहु .. रजनीकांत सिंह की पत्नी होने की वजह से रजनी बहु) माँ का स्वागत करतीं .. बच्चों में खूब जोश भर जाता फुआ को देखते .. कुछ बच्चे मेरे शहरी कपड़े छूकर देखते .. फिर पूरे दिन राखी बाँधने और खाने पीने का सिलसिला चलता .. मेरी तीन ममेरी बहनें होतीं वहां .. बड़ी वाली का नाम भूल रहा हूँ अभी .. उसका विवाह दुलारपुर गाँव में हुआ था .. उसकी सास और उसके पिता (मेरे मंझले मामू) बचपन के सहपाठी थे .. दो छोटी .. कुमकुमिया और कंचनिया .. और मेरी एक मौसेरी बहन .. सबकी सुधिया ..मेरी सुधा दी .. (जो नहीं रही अब .. पिछले दो साल राखी पर खूब याद किया था उसे) .. एक चीज जो खूब याद आती है तब की .. उनकी मिठाईयां गाँव के दूकान की बनी होती थी और मैं बमुश्किल निगल पाता था उन्हें .. घरों में बना पेड़ा भी होता था जिनमें चीनी ज्यादा होती थी और वे पिघले हुए दीखते थे .. पड़ोस की एक लड़की जो मेरी हमउम्र थी वह भी मुझे राखी बाँधने आती थी .. मुझे वह बेहद अच्छी लगती थी .. पर उसने दो लगातार साल मुझे राखी बाँधी .. मुझे बुरा लगता था ..

    और एक रोज़ यह घटना हुई तो यह लिखा –

    लीजिये .. मन गई राखी हमारी .. मेरे नीचे वाले फ्लोर पर कोई कोलेज छात्रा रहती है .. उससे झगड़ा हुआ था पिछले महिने मेरा पानी के लिए .. (सारा पानी केजरीवाल ने बहा दिया अपने 49 दिनों के स्टंट में तो पानी के लिए युद्ध तो होना ही है ) .. तो आई अभी और पूछा कि राखी बाँधी आपने .. मैंने झूठ मूठ कह दिया कि हाँ .. फिर उसने कहा कि मैंने मंदिर में हनुमान जी को बाँधा पर अच्छा नहीं लग रहा .. आपको बाँध दूँ .. मैंने हाँ कह दिया और वह बाँध गई है .. हालांकि मैंने बदले में उसे कुछ नहीं दिया .. मैं नहीं चाहता कि बाद में मैं यह सोचूं कि उसने राखी इसलिए बाँधी कि मैं उसे सौ दो सौ रुपये दूँ ( आखिर दुनिया में कुछ भी हो सकता है !) .. अभी देखूंगा एक दो महिने उसका व्यवहार .. उसने भाई की तरह ट्रीट करना जारी रखा तो उसे एक कुरती खरीद दूंगा .. एक इयरिंग भी खरीद दूंगा .. अच्छा लगा .. थोड़ा अजीब किन्तु आत्मीय ..

     

  • अब तक आपने आईने से धूल साफ क्यों नहीं की है?

    Apoorva Pratap Singh

    मैंने उनको बचपन से देखा । उनकी और मेरी उम्र में बड़ा फासला होते हुए भी उन्होंने उनके दिल में आई हर बात पहले मुझे बताई ।
    जब वो नवी में थी तब से उनको शादी करनी थी, फिर बारहवी करते हुए भी उनको शादी करनी थी । जिन जिन से उनकी बात चल सकती थी उनके बारे में भी बताती थी मुझे ।
    मैंने उनको तब भी देखा जब जून की दोपहर में लहंगा पहन के घूंघट मार के वो और उनकी सहेली एक दूसरे की फोटो खींचते ।

    उनके घर में लड़का लड़की कोई भेद नहीं था । वो, वो सब करती थी जो उनका जी चाहता, मेकअप- शॉपिंग । घर वालों के समझाने के बावजूद उनसे पढाई नही होती ।

    कभी उनके पिता जी ने खुद चल के आये रिश्ते को नकार दिया था तो वो झगड़ा कर बैठी और बहुत रोई थी । पिता ने एक बडे कोर्स जिसमें एडमिशन ही लाखों में होता है, जॉइन करवाया तो उसमें दन्न से पहले सेमेस्टर में फेल हो गईं ।

    वो अपनी शादी में कैसा फर्नीचर लेंगी, कौन सी गाड़ी लेंगी सब खुद उन्होंने लड़का तय होने से पहले से सोचा हुआ था ।
    उनके पास सारा प्लान था कि कैसे उनकी हजारों की पचिया को सास को न देना पड़े और कैसे वो पचिया को सस्ती साड़ी से रीप्लेस कर सास को देंगी ।

    मतलब यह कि वो हर तरीके से प्रवीणा-सुशीला थीं । 22 की होते होते उन्होंने आखिरकार शादी कर ली । हनीमून गईं, सास को नाक चने चबवा दिए, ऐसी कम ही जगह हैं जहां उन्होंने पति के ऊपर सवार होकर भ्रमण नहीं किया । बच्चे हो गए । 4-5 जन्मदिन मन गए ।

    पिछले साल से अचानक उन्होंने फिर रोना शुरू कर दिया, मायके आके । उनके अनुसार, उन्होंने जीवन में अपने पेरेंट्स और समाज की वजह से कुछ नहीं कर पाया । घर वालों ने उन्हें ‘गाइड’ नहीं किया । उनकी सम्भावनाओं को तिलांजलि दे दी ! तब से उनका बाजा चालू है । उनके पेरेंट्स उनका फोन आता देख घबरा जाते हैं ।

    सबसे बड़ा काम होता है खुद के निर्णयों की जिम्मेदारी लेना।

    लड़कियां ही नहीं लड़के भी आपके जितने ही नालायक होते हैं पर बस वो लड़के होते हैं तो उनको यह शादी कर के दूसरे की कमाई खर्च करने और उन्ही पर ठीकरा फोड़ने की सहूलियत नही मिलती, इस कारण उनको कुछ भी छोटा मोटा करना पड़ जाता है ।

    आपको ऐसी सहूलियत प्राप्त है इसलिए आप अपने कीमती साल बिना सोचे, आत्मावलोकन किये गुजार देती हैं फिर अचानक से किसी दिन होश आता है और आगे की और आशावान न हो के पीछे अटकी रहती हैं ।

    आपको अटकना है अटकते रहो पर दूसरों को क्यों कोसना !!
    बीती ताहि बिसारि दे , आगे की सुधि ले

    वैसे प्रश्न यह भी है कि अब तक आपने आईने से धूल साफ क्यों नहीं की है ?

  • प्रारम्भ-अंत प्रारम्भ-अंत…

    प्रारम्भ-अंत प्रारम्भ-अंत…

    Aparna Anekvarna

    मरते हुए फल
    फटते हैं
    उगल देते हैं बीज
    धरती धारण कर
    सेती है
    पुनर्जन्म तक

    दोमुंहे केशाग्र
    धर कर
    चला देती हूँ कैंची
    स्वस्थ हो उठते हैं

    नक्षत्र
    वहाँ मर चुके कबके
    जीवित है आज भी
    मगर रश्मि उनकी

    आखरी पन्ना पढ़ने के बाद
    बंद कर देती हूँ किताब
    बंद कर लेती हूँ आँखें
    खोल लेती हूँ फिर से किताब

    कुनमुनाती हैं कवितायें भीतर
    रह जाता है उनका लिखना
    खो जाती हैं.. कहाँ हैं मिलतीं
    फिर उसी रूप में

    काल एक सर्प है
    दुम लिए मुंह में अपनी
    स्वयं को खा रहा है

  • प्रारम्भ-अंत-प्रारम्भ-अंत…

    मरते हुए फल
    फटते हैं
    उगल देते हैं बीज
    धरती धारण कर
    सेती है
    पुनर्जन्म तक

    दोमुंहे केशाग्र
    धर कर
    चला देती हूँ कैंची
    स्वस्थ हो उठते हैं

    नक्षत्र
    वहाँ मर चुके कबके
    जीवित है आज भी
    मगर रश्मि उनकी

    आखरी पन्ना पढ़ने के बाद
    बंद कर देती हूँ किताब
    बंद कर लेती हूँ आँखें
    खोल लेती हूँ फिर से किताब

    कुनमुनाती हैं कवितायें भीतर
    रह जाता है उनका लिखना
    खो जाती हैं.. कहाँ हैं मिलतीं
    फिर उसी रूप में

    काल एक सर्प है
    दुम लिए मुंह में अपनी
    स्वयं को खा रहा है

  • शब्द नही, एक पूरा देश है

    शब्द नही, एक पूरा देश है

    शब्द, शब्द की तरह नही आये

    वह आये थोड़ा सकुचाते हुए
    और, मैंने पूछा कैसे हैं आप!

    शब्द जो प्रत्यक्ष थे, स्वतः प्रमाणित थे
    आश्चर्य से भरे हुए, वह दुबारा आये तो अपने कपड़े उतारे हुए
    और, मैंने फिर पूछा मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ

    लौट गए शब्द इस बार आये, तो करुणा से भरे हुए थे
    दुख की छाया उनकी और बढ़ गयी थी जब मैंने उनसे पूछा नही

    सिर्फ बताया, मैं आपके लिए कर ही क्या सकता हूँ

    इस बार शब्द आये तो
    अपमान और गुस्से से जले हुए
    आधे गले मे फसे, और कुछ हिचकी के साथ बाहर निकले हुए
    उन्हें एक निशब्द और निर्विकार चेहरा मिला

    वह लौट गए!

    शब्द, जो शब्द की तरह नही आये थे
    चुभते रहे, एक चुप्पे मनुष्य के भीतर बहुत देर तक

    इस बार वह आये तो मैं कह दूँगा उनसे
    मैं करूँगा कुछ न कुछ आपके लिए

    पर शब्द नही आये, उनकी आहटे आती रही
    पदचाप बजते रहे कानो में

    कि एक सुबह मैंने देखा!

    एक देश को, ‘शब्द’ जिसकी पीठ पर शहरों-गाँवो और मुहल्ले के घरों की तरह उँग आये थे

    मैंने देखा, मेरे कपड़े हवा में उड़ गए हैं
    एकदम नग्न/लालभभुका चेहरा लिए हुए

    मैं किसी शब्द की तरह नही
    किसी उत्तराकुल प्रश्न की तरह!

    एक चुप्पे मनुष्य की ओर दौड़ जाना चाहता था

    उस धूर्त मनुष्य की ओर,
    जिसके बारे में माना जाता है कि उसका चेहरा बुद्ध से मिलता है

    जो अपनी कविता में एक ‘निर्दोष व्यक्ति’ है

  • हमारे दौर के बच्चे

    हमारे दौर के बच्चे

    हमारे दौर के बच्चों की पतंग कट गई है
    उनकी दौड़ कहीं गुम है आसमानों में
    वे ताक रहे हैं दुख के उस आसमान को, जिसने खा लिया है उनकी पतंग को
    और उगल दिया है मौसमी बमवर्षक विमानों की चहल-पहल को

    हर पेड़ ने उनके ‘लंगड़ो’ के जवाब में
    अपनी खाली जेबें दिखा दी है
    मकानों की छतों पर भी नही मिल रही उनकी पतंग
    कुओं में लगाई गई उनकी पुकार भी खाली हाथ लौटी है

    उनकी पतंगों की शिनाख्त में अब एक पूरी दुनिया लगी हुई है
    पर यह हमारे दौर बच्चे ही हैं जिन्हें पता है
    अब उनकी पतंग धरती पर नही गिरेगी

    हमारे दौर के बच्चे भूल रहे हैं
    बम से प्रदूषित हुई हवा के पेच कैसे काटते हैं

    अब लोरियां उनके सोने का नही, जागते रहने का आह्वान है.
    वे कभी आते थे निश्चल-कौतूहल के साम्राज्य से
    अब उनकी आंखों से एक वयस्क-भय झाँकता है

    हमारे दौर के बच्चे आश्चर्य में हैं
    वो इतनी जल्दी कैसे बड़े हो गए

    हमारे दौर के बच्चे पढ़ते हैं ‘पूरी दुनिया के मजदूरों एक हो’
    और बुदबुदाते हैं दबी सी आवाज में

    पूरी दुनिया के बच्चों एक हो!

  • भारत के स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग का नष्ट किया जाना –Sanjay Jothe

    भारत के स्कूलों-कॉलेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग का नष्ट किया जाना –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत की इंजीनियरिंग मेडिसिन और मेनेजमेंट की पढाई के बाद अब समाज विज्ञान दर्शन इतिहास और मानविकी की शिक्षा की भी बात कर लेते हैं.

    तुर्की और अफ्रीका का उदाहरण यहाँ महत्वपूर्ण है. जब प्रिंटिंग प्रेस का आविष्कार हुआ और तुर्की में प्रेस लगने के बाद किताबें छपकर समाज में फैलने लगीं तब तुर्की की राजसत्ता और धर्मसत्ता को खतरा पैदा हुआ कि इस तरह ज्ञान फैला तो उनकी गुलामी कौन करेगा? ये जनता अगर तर्क, ज्ञान और चेतना से भर गयी तो उनकी अपनी सदियों पुरानी परम्पराओं पर सवाल उठाने लगेगी. ऐसे कई गुणा भाग करते हुए तुर्की में प्रेस और किताबों के साथ ज्ञान का फैलाव भी बंद हो गया. नतीजा सामने है. पूरा मिडिल ईस्ट, अरब और शेष दुनिया का इस्लामिक जगत आज ज्ञान विज्ञान के मामले में सबसे फिसड्डी बना हुआ है.

    एक अन्य उदाहरण है जो कोलोनियल एरा में रिकार्ड किया गया. अफ्रीका में मिशनरियों ने एक अफ्रीकी कबीले में बच्चों की बीमारियों से मौत पर ध्यान दिया. वहां उन्होंने पाया कि अशिक्षा की वजह से बच्चे और माताएं साफ़ सफाई और अन्य स्वास्थ्यवर्धक आदतें नहीं सीख पाते और एक से दूसरी पीढी में नहीं पहुंचा पाते. इसके लिए उन्होंने उस कबीले की स्त्रीयों और बच्चों के लिए विशेष स्कूल खोने और उन्हें पढाना शुरू किया. थोड़े समय में कबीले के सरदार ने खतरा महसूस किया. हुआ ये कि पढने वाले बच्चे इन मुखिया जी से तर्क करने लगे और कुछ पारम्परिक कर्मकांडों अंधविश्वासों आदि पर स्पष्टीकरण मांगने लगे. मुखिया जी और उनके लठैत समझ गये कि ये शिक्षा अगर फ़ैल गयी तो उनकी राजनीति खत्म हो जायेगी. मुखिया जी अपने लठैतों के साथ गये और स्कूल बर्बाद कर डाले.

    ये तुर्की और अफ्रीका में जो हुआ वो ठीक हमारे सामने भारत में हो रहा है. कुछ अलग ढंग से हो रहा है इसलिए हम समझ नहीं पा रहे हैं. लेकिन इसके कारण और परिणाम वही होंगे जो इस्लामिक और अफ्रीकी जगत में हो चुके हैं. ठीक से देखें तो हम उन परिणामों को ही जी रहे हैं.

    अब भारत के स्कूलों में आइये. समाज विज्ञान, साहित्य और दर्शन सहित राजनीति और इतिहास को भारत में जिस तरीके से पढ़ाया जाता है वो एक हैरान करने वाला तथ्य है. कुछ चुनिन्दा विश्वविद्यालय या संस्थान छोड़ दिए जाएँ तो शेष जगहों पर इन विषयों को एकदम तथ्यों को घोटने की शैली में पढाया जाता है. स्कूल के बच्चों से कुछ पूछिये वे एकदम खड़े होकर एक सांस में कुछ उत्तर दोहराने के लिए प्रशिक्षित किये जाते हैं, जो बच्चा लगातार बोलते हुए किसी रते हुए उत्तर को नहीं दोहरा पाता उसे दुसरे लोग मूर्ख समझते हैं और वो बच्चा भी खुद को कमजोर समझता है. किन्ही स्कूलों में मैंने पढ़ाई करने या अभ्यास करने के स्था पर एक ख़ास शब्द का प्रचलन देखा है, शिक्षक बच्चों को कहते हैं “याद कर” पढाई कर या पढ़ नहीं बल्कि “याद कर” ये मैंने मध्यप्रदेश के मालवा के कुछ शहरों में अधिक देखा है. अन्य शहरों के मित्र अपनी बातें जोड़ सकते हैं.

    तथ्यों को घोटकर उन्हें दोहरा देने की कला को शिक्षा या पढ़ाई कहना एक अन्य अंधविश्वास है जो उन लोगों ने फैलाया है जो असल में शिक्षा को नष्ट करके इस समाज को अन्धविश्वासी बनाये रखते हुए इसका शोषण करना चाहते थे.

    कल्पना कीजिये छोटे छोटे बच्चे अगर न्यूटन के गुरुत्वाकर्षण के सिद्धांत को रट्टा मारकर घोटने दोहराने के बजाय उसे प्रयोगों द्वारा ठीक ढंग से समझ ले तो क्या ये बच्चा किसी उड़ने वाले देवता का भक्त बन सकता है? क्या वो परीक्षा के भय से ऐसे देवता को नारियल चढाने जाएगा? फिर ऐसे देवता के आधार पर रचे गये शास्त्रों और परम्पराओं की गुलामी करेगा? बिलकुल नहीं करेगा.

    अब एक अन्य कल्पना कीजिये, अगर कोई बच्चा कबीर या बुद्ध या चार्वाकों या मार्क्सवादियों की भौतिकवादी तर्क पद्धति के अनुरूप विचार करते हुए तर्क से अपने जीवन और समाज की समस्याओं को सुलझाना सीख ले तो क्या वो गुरुपूर्णिमा या गुरुभक्ति या धर्म के नाम पर अंधे दंगों में शामिल होगा? बिल्कुल नहीं होगा.

    ऐसे में जो सत्ता, जो जातियां, जो वर्ण इस देश में अपना आधिपत्य बनाये रखना चाहती हैं उन्हें उस अफ्रीकी कबीले के सरदार की तरह नजर आने लगता है कि इस शिक्षा को बर्बाद करने के लिए उन्हें क्या करना है. और मजे की बात ये है कि शिक्षा जगत पर पठन पाठन लेखन पर एक ही वर्ण का कब्जा है तो वे अपना निर्णय बड़ी आसानी से पूरे समाज और देश पर थोप सकते हैं. सो वो हजारों साल से ये कर पा रहे हैं. नतीजा आपके सामने है.

    साहित्य को देखिये 1935 तक मुंशी प्रेमचंद के उभार के ठीक पहले तक भक्ति कवितायें, राग रंग, और नायिका विमर्श चल रहा था. सभी ब्राह्मण साहित्यकार जो संपन्न घरों से आते थे और जिनके परिवारों या समुदाय में शोषण या दमन की पीड़ा अनुभव नहीं की गयी थी वे अगम्य अगोचर, भक्ति और भगवान् सहित राजाओं सामंतों की स्तुतियाँ और उनका मनगढ़ंत इतिहास लिखा करते थे. उस जमाने में किसानों, मजदूरों स्त्रीयों, दलितों शूद्रों के जीवन पर एक ढंग का दस्तावेज भी खोजना मुश्किल है. जब भारत में मार्क्सवादी साहित्य दृष्टि प्रविष्ट हुई तब भारत के गैर ब्राह्मण लेखकों ने आम जनता और गरीब मजदूर स्त्री को केंद्र में रखकर साहित्य की रचना की. उसके बाद भारत के साहित्य में एक नई चेतना निर्मित हुई जिसने आगे जाकर लोकतंत्र की चेतना समाजवाद की चेतना को सहारा दिया. लेकिन इसके ठीक पहले ब्राह्मण साहित्य में नख शिख वर्णन चल रहा था, स्त्री के नायिका के सौन्दर्य के चर्चे होते थे.

    क्या ये बात कुछ बताती है हमें? साहित्य से आम आदमी गरीब मजदूर और स्त्रीयों का गायब हो जाना क्या बताता है? सदियों तक साहित्य काव्य नाटक कथाएँ सब इसी तरह से निर्मित होती रही हैं जिनमे समाज के असली आदमी और उसके जमीनी जीवन का कोई उल्लेख तक न रहा. इसीलिये भारत में विदेशी यात्रियों और अग्रेज अधिकारियों के लिखे वृत्तांत इतने महत्वपूर्ण हो गये हैं. उनमे पहली बार भारत के “जन इतिहास” की आवाज सुनाई देती है. अगर वे न होते और उनका लेखन न होता तो अभी भी भारतीय पोंगा पंडित किसी न किसी तरह का “पुराण” ही लिख रहे होते. वे हमेशा की तरह जमीनी सवालों को अध्यात्म, रहस्यवाद और मिथकों की जलेबी बनाकर खत्म कर देते.

    यही उनकी पीढी दर पीढी विशेषज्ञता रही है. इसीलिये उन्होंने हजारों साल से शिक्षा और पठन पाठन को अपना विशेषाधिकार बनाया था ताकि उनके षड्यंत्रों को कोई समझ न सके.

    इसी मानसिकता को ध्यान में रखते हुए अब विज्ञान या साहित्य या समाज विज्ञान के विषयों की भारत में पढ़ाई को देखिये. यही वर्ग सब विश्वविद्यालयों कालेजों स्कूलों में अधिकार जमाये बैठा है. https://www.sunjournal.com/ buy generic alprazolam इस वर्ग को भारत के वैज्ञानिक या लोकतांत्रिक या धर्म की गुलामी से मुक्त हो जाने का सबसे बड़ा भय सता है. ये वर्ग (या वर्ण) नहीं चाहता कि भारत के बच्चे उस अफ्रीकी कबीले की तरह तर्क और विज्ञान से भरे सवाल उठाने लगें इसलिए वे शिक्षा के साथ साथ गुरुभक्ति और देवी देवताओं का चरणामृत आवश्यक रूप से बांटते हैं. गुरु पूर्णिमा गुरुशिष्य परम्परा इत्यादि का जोर शोर से प्रचार करना उनके लिए बहुत जरुरी है.

    अब इस विरोधाभास को देखिये. जो शिक्षक अपने घर में श्राद्ध कर रहा हो अदृश्य पितरों या देवी देवताओं के भय से आक्रान्त हो वो स्कूल में बच्चों को या विश्वविद्यालय में छात्रों को विज्ञान या समाज विज्ञान में तर्क और क्रिटिकल थिंकिंग सिखा पायेगा? किस मुंह से सिखाएगा? वो स्वयं अपने जातिगत वर्णगत संस्कार के कारण वैज्ञानिक बुद्धि को अभी तक पैदा नहीं कर पाया है वो बच्चों को क्या और क्यों सिखाएगा? इस बात पर गौर कीजिये. ये एकदम जमीनी सच्चाई है कोई आसमानी बात नहीं.

    अपने आसपास के लोगों से पूछिए पिछली पीढी में या उससे पहले की पीढी में शिक्षकों के नाम और सरनेम बताएं, वे किन जातियों और वर्णों से आ रहे हैं? उनके अपने व्यक्तिगत धार्मिक रुझान क्या हैं? आपको तुरंत समझ में आयेगा कि भारत के स्कूलों कालेजों में शिक्षा मात्र सहित समाज विज्ञान और भौतिक विज्ञान को समझ सकने वाली क्रिटिकल थिंकिंग को किन लोगों ने किस बुद्धि के साथ और क्यों नष्ट किया है.

  • सोलह आने सच

    सोलह आने सच

    Mukesh Kumar Sinha

    झूठ-मूठ में कहा था
    तुमसे करता हूँ प्यार
    और फिर उस प्यार के दरिया में
    डूबता चला गया
    ‘सच में’ !
    डूबते उतराते तब सोचने लगा
    किसने डुबोया
    कौन है ज़िम्मेदार?
    झूठ का चोगा पहनाने वाला गुनाहगार ?
    और वजह, इश्क़-मोहब्बत-प्यार ?

    हर दिन आँख बन्द होने से पहले
    खुद ही बदलता हूँ पोशाक
    दिलो दिमाग पे छाए
    झूठ के पुलिंदे को उतार
    अपनी स्वाभाविक सोंधी सुगंध के साथ
    मैं, हाँ मैं ही तो होता हूँ
    अपने वास्तविक ‘औरा’ में
    सच के करीब
    सच से साक्षात्कार करते हुए
    खुद से सवाल-जवाब करते हुए

    आखिर क्यों झूठ है
    है छल-कपट, जंग है,
    आखिर क्यों है ऐसा हमारा संसार
    क्यों अपने कद को बढ़ाने की
    कोशिश करते हैं
    जिसके नहीं होते हक़दार
    चाहते हैं पा जाएँ वो सम्मान
    तर्क-कुतर्क के झंडे तले
    क्यों चाहते हैं कहलायें
    सर्वशक्तिमान

    मृगतृष्णा सा रचा हुआ है भ्रम
    झूठ का पहला अंकुरण
    कब कैसे क्यों
    इस धरती पर प्रस्फुटित हुआ होगा
    किसके मन के अन्दर से
    छितरा होगा इसका बीज
    जो किस उर्वर भूमि पर पला होगा
    झूठ की इस अजब गजब बुआई ने
    सच के फलक को
    बना दिया रेगिस्तान
    आज तो झूठ ही झूठ ने रच रखा है
    आडम्बर
    और बैठा है ससम्मान

    तभी तो
    झूठ के जंजाल में
    खुद को बाखुशी बाँध
    दी गयी झूठी तसल्ली की भँवर में
    डूबता चला गया मैं
    मात्र मैं, या सब, शायद अधिकांश
    इस झूठ के तह में छिपा है
    कुलबुलाते सच का मौन
    तभी तो
    ढिंढोरा पीट कर बताते हैं
    ‘सफ़ेद झूठ’
    झूठ झूठ चिल्ला कर
    उसको बनाते हैं
    सोलह आने सच

    अपने अपने नजरिये का सच !!

  • स्मृतियाँ

    स्मृतियाँ

    Mukesh Kumar Sinha

    थोडा बुझा सा मन और
    वैसा ही कुछ मौसम
    शून्य आसमान पर टिकी नजरें, और
    ठंडी हवा के झोंके के साथ

    जागी, उम्मीद बरसात की
    उम्मीद छमकते बूंदों की
    उम्मीद मन के जागने की !!

    होने लगी स्मृतियों की बरसात
    मन भी हो चुका बेपरवाह
    सुदूर कहीं ठंडी सिहरन वाली हवा

    सूखी-सूखी धूल धूसरित भूमि
    सौंधी खुश्बू बिखेरती पानी की बूंदे
    मन भी तो, होने लगा बेपरवाह
    टप-टप की म्यूजिक के बैकग्राउंड के साथ
    छिछला बरसाती पानी
    सूरज की उस पर पड़ती सीधी किरणें
    परावर्तित हो, दे रही
    सप्तरंगी चकमक फीलिंग !

    गोल गोल गड्ढों में जमा
    स्टील की थाली सा चमकता पानी
    चमकते जल
    और उसमे पल-पल
    बदलती तस्वीरें

    एकदम से आ ही गयी एक
    चंचल शोख मुस्कराहट
    क्योंकि
    एक थाली में था मैं निक्कर टीशर्ट में
    तो, दुसरे में जगमगा रही थी तुम
    रेनबो कलर वाले फ्रॉक में !!

    नकचढ़ी तुम, अकडू मैं
    मुस्कुराते मन ने कहा तुम्हे ‘धप्पा’
    और खेलने लगे आइस-पाइस
    तो कभी उसी पानी में मारा बॉल
    खेला ‘पिट्टो’

    ठंडा बरसाती पानी ने बरसा ही दिया मन
    खिलखिलाया आसमान
    सहेजी स्मृतियों के साथ…….!

    ओ बारिश की बूँदें
    फिर बरसना ………
    खोलूं खिड़की या दरवाजा ……

    करूँगा इन्तजार
    तुम्हारा और उस
    नकचढ़ी का भी ..!!

    आओगे न!
    ये बारिश की बूंदें और स्मृतियाँ !!

  • भारत की शिक्षा व्यवस्था और “वर्ण-माफिया” –Sanjay Jothe

    भारत की शिक्षा व्यवस्था और “वर्ण-माफिया” –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    भारत में आजादी के बाद इंजीनियरिंग, विज्ञान, मेडिसिन या मेनेजमेंट या दर्शन मानिविकी और समाज विज्ञान की पढाई करने वाले तबके पर और उसकी समाज या देश के प्रति नजरिये पर गौर करना जरुरी है. भारत के इस सुदीर्घ दुर्भाग्य और हालिया “गोबर और गौमूत्र” के विराट दलदल को समझने के लिए हमें इस पीढ़ी के मन को और “वर्ण माफिया” के काम करने के तरीके को समझना होगा.  

    एक बहुत जरूरी बात ये नोट करनी चाहिए कि आजादी के बाद पहली पीढ़ी के ये तकनीकी बाबू और सामाजिक विज्ञानी या साहित्यकार और दार्शनिक भी अधिकांश सवर्ण परिवारों से आये हैं जिन्हें समाज मे बदलाव की कोई जरूरत महसूस नहीं होती, उन्हें अपने परिवार, रिश्तेदारों या समुदाय के बाहर किसी के जीने मरने  या शोषण से कोई सहानुभूति नहीं होती इसलिए वे यथास्थितिवादी बनकर उभरे हैं उन्होंने विज्ञान, तकनीक, मैनेजमेंट और मेडिसिन सहित समाज विज्ञान और दर्शन और स्वयं तर्कशास्त्र आदि की पढ़ाई को इतना मेकेनिकल बना दिया है कि उसमे आलोचनात्मक विश्लेषण और क्रिटिकल थिंकिंग का कोई स्कोप ही नहीं रह गया है.

    फिर से गौर कीजिये, सवाल ये है कि भारत में इंजीनियरिंग मेडिसिन और विज्ञान पढने वालों के सामाजिक सरोकार कैसे कम से कमतर होते जा रहे हैं. क्यों ये लोग पैसा कूटने की मशीन बनकर अपने ही अन्धविश्वासी अनपढ़ और गरीब लोगों का शोषण करते हैं? क्यों इनमे सामान्य सी मनुष्यता और सामाजिक हितचिन्तना पैदा नहीं होती?

    स्कूल कालेज के शिक्षा जगत का उदाहरण लिया जा सकता है. उसके जरिये समझना आसान होगा, कालेज और विश्वविद्यालय स्तर पर इंजीनियरिंग और मेनेजमेंट से रिश्ता कम ही है आम जन का लेकिन स्कूल से हम अमूमन रोज ही टकराते हैं. शिक्षा का जैसा व्यवसायीकरण और अपराधीकरण हुआ है वह चौंकाने वाला है. 

    पाकिस्तान, अफगानिस्तान, मिडिल ईस्ट और अफ्रीका में या इटली में जिस तरह से कबीलाइ परिवारवाद और वंश आधारित माफिया चलता है उसी तरह भारत में “वर्ण माफिया” चलता है. इसे अकादमिक जगत में, न्यायपालिका में, प्रशासन में और राजनीति में काम करते हुए आसानी से देखा जा सकता है. अन्य देशों का माफिया स्वयं को अपराधी महसूस करता है उसमे एक ख़ास किस्म का आत्मग्लानि का भाव भी होता है कि वे गलत कर रहे हैं लेकिन भारत का “वर्ण माफिया” शास्त्र और धर्म के गर्भ से जन्मा है. उसमे किसी तरह का कोई अपराध भाव या आत्मग्लानि नहीं होती इसीलिये इस माफिया को समझ पाना और इसे उखाड़ फेंकना एक असंभव सा काम बन गया है. 

    इस माफिया को समझने के लिए एक प्रयोग कीजिये अपने किसी मित्र से पूछिए कि भारत में सफल या समृद्ध लोगों की कल्पना करते हुए उनके सरनेम या जातिनाम बताये. आपको आश्चर्य होगा कि आपको ये सभी सरनेम ‘सवर्ण द्विजों’ के ही मिलेंगे. ये सरनेम आपको न्यायपालिका, सरकार, व्यापार, शिक्षा और प्रशासन इत्यादि के सभी आयामों में दबदबा बनाये हुए नजर आयेंगे.

    इसका क्या मतलब हुआ?

    इसका ये मतलब हुआ कि समाज को ज़िंदा रहने, प्रगति करने, बदलाव करने या यहाँ तक कि सड़-सड़ कर मर जाने के लिए भी जितने जरुरी महकमे, विभाग, या आयाम हैं उन सब पर “वर्ण माफिया” बैठा हुआ है. आप अनाज मंडियों और व्यापार में झांककर देखिये आपको “वैश्य वर्ण माफिया” बैठा मिलेगा, उस माफिया से बचकर कोई दूसरी जाति या सरनेम वाला व्यक्ति या समूह व्यापार या उद्यमिता नहीं कर सकता. न्यायपालिका और शासन, सरकार सहित धर्म में देखिये वहां “ब्राह्मण वर्ण माफिया” जमा हुआ है. वे कभी भी भारत में अपने वर्ण के दबदबे को कम नहीं होने देना चाहते, उनका न्यायबोध शासन बोध या शासन-प्रशासन का तरीका असल में आत्मरक्षण और यथास्थिति के रक्षण को समर्पित होता है. इसी तरह शिक्षा जगत को देखिये वहां भी “सवर्ण माफिया” ही मिलेगा. 

    शिक्षा जगत को गौर से देखिये वहां कौन से सरनेम या जातिनाम वाले लोग विभागाध्यक्ष, प्रोफेसर, डीन, चांसलर या वाइस चांसलर हैं? निश्चित ही सब के सब निर्विवाद रूप से ‘सवर्ण द्विज हिन्दू’ हैं. अब आगे बढ़ते हुए ये देखिये कि शिक्षा, शिक्षण, प्रशिक्षण और ज्ञान विज्ञान, तकनीक सहित मानविकी, समाज विज्ञान आदि विषयों में भारत में रिसर्च और नवाचार क्यों इतना कमजोर और फटेहाल है? किन लोगो पर इसकी जिम्मेदारी डाली जानी चाहिए? दलितों आदिवासियों और उनके आरक्षण पर देश को कमजोर करने का आरोप लगता है लेकिन उनकी कुल जमा संख्या इन अकादमिक संस्थानों में दो प्रतिशत भी नहीं हैं.

    भारत में 90 से 95 प्रतिशत पद सभी अकादमिक संस्थानों, स्कूलों कालेजों विश्वविद्यालयों में सवर्ण द्विज हिन्दुओं द्वारा भरे हुए हैं. अगर भारत सामूहिक रूप से शिक्षा जगत में फिसड्डी बना हुआ है तो ये सवर्ण द्विज हिन्दुओं की सोची समझी साझिश है, ये कहना गलत होगा कि ये उनकी कमजोरी के कारण हुआ है. मैं ये कहना चाहुगा कि ये उनकी सफलता है वे जो चाहते हैं वैसा कर रहे हैं. वे भारत को कमजोर गुलाम अशिक्षित और पिछड़ा बनाये रखना चाहते हैं इसके लिए वे जानते हैं क्या करना है और कैसे करना है. ये काम वे हजारों साल से कर रहे हैं. वे बहुत कुशल और सफल लोग हैं उन्हें मूढ़ या कमजोर कहना स्वयं में मूढ़ता होगी.

    मैं इसे सोची समझी साजिश क्यों कह रहा हूँ? ये बहुत गहरी और जरुरी बात है आइये इसे सरल भाषा में समझते हैं. 

    शिक्षा का अर्थ सिर्फ अक्षर ज्ञान और कमाकर खाना सीखना नहीं होता है. शिक्षा का अर्थ होता है एक मनुष्य होने के नाते अपने विशिष्ठ व्यक्तित्व और अपने जमीर को पहचानते हुए अपने और अपने समाज के बारे में निर्णय लेकर उसपर अमल करने की ताकत हासिल करना. शिक्षा को इंसान बनने का या निर्णय लेने की ताकत हासिल करने का जरिया भी कहा जा सकता है. ऐसी शिक्षा का मतलब होगा कि व्यक्ति या समाज अपनी जिन्दगी, समाज की जिन्दगी और देश की जिन्दगी के बारे में तटस्थ और वैज्ञानिक ढंग से सोच सके और उसे बहतर बनाने के लिए जमीनी कदम उठा सके.

    अगर भारत की जनता में इस तरह की सोच पैदा होगी तो लोग सवाल उठाएंगे कि औरतों को बराबरी का हक क्यों नहीं है? क्यों उन्हें सैकड़ों साल तक शिक्षा,सम्मान और प्रेम से वंचित रखा गया? क्यों लाखों करोड़ों औरतों को उनके पतियों की लाशों पर ज़िंदा जलाया जाता रहा है? क्यों दलितों और स्त्रीयों को एकजैसा घृणित समझते हुए हजारों साल तक शिक्षा और राजनीतिक सामाजिक प्रतिनिधित्व और अधिकारों से वंचित रखा गया है? क्यों भारत की रक्षा का एकमुश्त ठेका क्षत्रियों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत दो हजार साल तक युद्धों में हारता रहा है और कम से कम एक हजार साल गुलाम रहा है? क्यों शिक्षा का एकमुश्त ठेका ब्राह्मणों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत अनपढ़ और अन्धविश्वासी बना हुआ है? क्यों व्यापार का एकमुश्त ठेका वैश्यों को देने के बावजूद (या शायद इसी कारण) भारत इतना गरीब और बेरोजगार क्यों बना हुआ है?

    भारत में अगर शिक्षा सच में ही फ़ैल जाए और दलितों, बहुजनों आदिवासियों की अधिकतम जनसंख्या तक पहुँच जाए तो फिर इतनी बड़ी संख्या पर हजारों साल से नियन्त्रण रखने वाले, इनका खून चूसने वाले धर्म और समाज व्यवस्था का क्या होगा? कौन फिर भगवान् से डरेगा? कौन जात पात को मानते हुए बिना शर्त बेगार या गुलामी करेगा? कौन फिर लोकतंत्र में एक बोतल एक नोट के बदले चुपचाप वोट देकर पांच साल के लिए सो जायेगा? कौन फिर मंदिर मस्जिद के नाम पर दंगा करेगा? कौन होगा जो नसबंदी या नोटबंदी पर सवाल न उठाएगा? फिर कौन आँख कान बंद करके भक्ति करेगा? ये वास्तविक प्रश्न हैं जो भारत में शिक्षा के लिए जिम्मेदार लोग शिक्षा के संबंध में कुछ भी नया करने से पहले अपने आपसे जरुर पूछते हैं.

    वे जब ये सवाल अपने आपसे पूछते हैं तो उन्हें उनकी “अंतरात्मा” से एक बड़ा भयानक उत्तर मिलता है. उन्हें उत्तर मिलता है कि वाकई अगर भारत की जनता शिक्षित हो गयी तो उनका “वर्ण माफिया” दस साल के भीतर मिट्टी में मिल जाएगा. इसीलिये वे अपने मुट्ठी भर लोगो को सत्ता बनाये रखने के लिए भारत की अस्सी प्रतिशत जनता को और स्वयं भारत को अज्ञान और अंधविश्वास के दलदल में फसाए रखते हैं. इसीलिये वे बहुत सोचे विचारे ढंग से स्कूलों कालेजों सहित पूरे शिक्षा तन्त्र को निकम्मा और बेकार बनाये रखते हैं.

    भारत के स्कूलों की कालेजों की व्यवस्था देखिये. वहां विज्ञान, समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा आदि किस ढंग से और क्यों पढाया जाता है. विज्ञान को तोता रटंत की तरह पढाने का असल कारण क्या है? समाज विज्ञान में लोकतांत्रिक चेतना और मानवाधिकार सहित समता और बंधुत्व की आदर्शों की बात को गायब करने का क्या कारण है? पहली कक्षा से बारहवी कक्षा तक अंबेडकर, फूले, पेरियार, अछूतानन्द, गोरख, कबीर और नानक को शिक्षा से गायब कर देने का क्या कारण है? इन सवालों के साथ फिर ये भी सोचिये कि जिस वर्ण के कर्मकांडी और अन्धविश्वासी लोगों का समाज और शिक्षा व्यवस्था पर कब्जा है उनका विज्ञान से या यूरोपीय वैज्ञानिक चेतना से या यहाँ गिनाये गये अंबेडकर कबीर जैसे नामों से क्या रिश्ता है? क्या वे सच में भारतीयों को विज्ञान या अंबेडकर पेरियार या कबीर सिखाने के हक में हैं? क्या बच्चों को सही अर्थ में विज्ञान सिखाने के बाद या कबीर पढ़ाने के बाद उन्हें अन्धविश्वासी देवी देवताओं गुरुओं आदि की भक्ति में झोंका जा सकता है? क्या वास्तव में विज्ञान सिखाने के बाद गुरुपूर्णिमा पर अंधविश्वास का चरणामृत उन्ही छात्रों को पिलाया जा सकता है? इन सबका एक ही उत्तर है – नहीं!

    अगर भारत में सही तरीके की शिक्षा फ़ैल जाए तो न तो सवर्ण द्विज माफिया को कोई छात्र/छात्रा चरण स्पर्श करेगा न पोंगा पंडित बाबाओं धर्मगुरुओं की गुलामी करेगा न ही इनके फैलाए दंगों में लड़ने के लिए तैयार होगा. अब सवाल ये है कि भारत की शिक्षा और समाज पर नियन्त्रण रखने वाले लोग क्या ये सब होने देना चाहते हैं? अगर वे ये होने देना चाहते हैं तो उन्हें पिछले सत्तर सालों में या उसके भी पहले ज्ञात दो हजार साल के इतिहास में किसने रोका था? बात एकदम साफ़ है कि ये वर्ण माफिया जान बूझकर समाज को शिक्षा से वंचित बनाता आया है ताकि इसका एकाधिकार इस देश पर बना रहे.  

    कल्पना कीजिये अगर सच में ही यूरोपीय ढंग की वैज्ञानिक शिक्षा भारत में फ़ैल गयी तो शिक्षा, न्यायपालिका, शासन-प्रशासन आदि में मलाई खा रहे इस “वर्ण माफिया” के पास भारत की एतिहासिक रूप से लंबी गुलामी, कमजोरी, कायरता और धर्मान्धता सहित वर्तमान में जारी करोड़ों-करोड़ों गरीबों के शोषण और दमन से जुड़े सवालों के क्या जवाब होंगे? किसानों की आत्महत्या या मजदूरों के पलायन के सवालों के इनके पास क्या उत्तर हैं? ये वे सबसे गंभीर सवाल हैं जो भारत के सवर्ण द्विज हिन्दू शासक हजारों साल से टालते रहे हैं. ये सवाल अगर दलितों, आदिवासियों, बहुजनों और स्त्रीयों के मन में आ गया तो वे इस वर्ण माफिया को उखाड़ फेकेंगे.

    इसका सीधा अर्थ ये निकलता है कि इस सवाल को उभरने से बचाने के लिए इस देश की शिक्षा व्यवस्था को लूला-लंगडा और अंधा-बहरा बनाये रखना जरुरी है. अभी वर्ण माफिया के “दैवीय आधिपत्य” को ही धर्म समझने वालों ने शिक्षा के साथ जो व्यवहार करना शुरू किया है उसे भी देखा जाना चाहिए. वे यूरोपीय ढंग की वैज्ञानिक और क्रिटिकल थिंकिंग पैदा करने वाली शिक्षा से भयानक ढंग से डरे हुए हैं. उन्हें पता है कि जैसे यूरोप में इस शिक्षा ने पुनर्जागरण लाकर धर्म और भगवान् को उखाड़ फेंका है उसी तरह उनके धर्म और भगवन को भी ये शिक्षा उखाड़ फेंकेगी इसीलिये भारत का वर्ण माफिया हजारों साल से शिक्षा को बर्बाद करने का संगठित षड्यंत्र चलाता आया है. 

    भारत की अस्सी प्रतिशत बहुजन आबादी को और कुल जनसंख्या की पचास प्रतिशत स्त्रीयों को शिक्षा से वंचित रखने वाले शास्त्र रचना कोई सामान्य बात नहीं है. ये “वर्ण माफिया” को बनाये रखने की धर्मसम्मत और शास्त्रसम्मत रणनीति रही है. ये आज भी जारी है. इसी राजनीती ने भारत को अनपढ़, विभाजित, कमजोर, डरपोक और गरीब बनाया है. 

    सोचिये अगर भारत के अस्सी प्रतिशत दलित और शूद्र शिक्षित हो सकते, शस्त्र और शास्त्र उठा सकते तो मुट्ठी भर मंगोल, शक, हूण, यूनानी या ब्रिटिश भारत को जीत सकते थे? भारत बार बार हारा क्योंकि अस्सी प्रतिशत जनता न किताब उठा सकती थी न तलवार उठा सकती थी. आज भी इन अस्सी प्रतिशत को दबाने और सताने में ही भारत की कुल जमा समझदारी और ताकत खर्च हो रही है इसीलिये भारत किसी भी क्षेत्र में अपने समकक्ष देशों या यूरोप अमेरिका से मुकाबला करने की स्थिति में नहीं है. 

    जिस घर में मुखिया अपने ही परिवार के शोषण और दमन में अपनी सारी ताकत खर्च किये दे रहा हो उसका पड़ोसियों से बार बार हार जाना एकदम स्वाभाविक सी बात है. भारत का सवर्ण माफिया अपने ही अस्सी प्रतिशत जनसंख्या के खिलाफ षड्यंत्र और अपराध करता रहता है इसलिए उन्हें दुनिया के अन्य सभ्य देशों के बराबर खड़े होने की तैयारी का समय ही नहीं मिलता. घर के भीतर घमासान मचा हुआ है, भारत के अंदर महाभारत और राष्ट्र के भीतर महाराष्ट्र का दबदबा बना हुआ है, ऐसे में पडौसियों से हारने और पिटने से कौन बच सकता है? यही भारत का कुल जमा इतिहास है.

    शिक्षा और नवजागरण को रोके रखने के लिए भारत का वर्ण माफिया बहुत बड़ी कीमत चुकाता आया है. भारत की गुलामी से बड़ी कीमत क्या हो सकती है? इसपर मजा देखिये कि जिन लोगों ने भारत को अशिक्षित कमजोर और विभाजित रखकर इसे गुलाम बनने और हारने पर मजबूर किया वे आज हमे राष्ट्रवाद सिखा रहे हैं. और शिक्षा सहित शिक्षा के पूरे तन्त्र को बर्बाद करने का सबसे बड़ा प्रयास भी आरंभ कर चुके हैं. ये सब हमारी आँखों के सामने हो रहा है.

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।