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  • सरकार द्वारा झुग्गीवासियो की अनदेखी दुःखद : लक्ष्य

    सरकार द्वारा झुग्गीवासियो की अनदेखी दुःखद : लक्ष्य

    दिनांक 22 जुलाई 2017 को लक्ष्य की महिला टीम ने  “लक्ष्य झुगी झुगी” अभियान के तहत   लखनऊ के जानकीपुरम के सेक्टर जी की झुगिओ का दौरा किया तथा वहां  के निवासियों से उनकी समस्याओं को सुना व् उनके साथ सामाजिक चर्चा की !

    लक्ष्य कमांडर सुषमा बाबू ने सामाजिक  चर्चा करते हुए सफाई पर जोर दिया उन्होंने कहा कि गंदगी ही बीमारियों की जड़ है अतं हमें साफ सफाई का जरूर ध्यान रखना चाहिए ! उन्होंने कहा की हमें अपना ध्यान स्वंय रखना होगा ! उन्होंने कहा कि शाशन व् प्रसाशन से  बहुत उम्मीद नहीं करनी चाहिए !  उन्होंने झुगीवासियो की दुर्दिशा पर दुःख प्रकट करते हुए कहा कि  आम जनता भी  इनकी अनदेखी करती है जबकि कि ये भी देश के नागरिक है हम सबको इन लोगो  के अधिकारों के लिए प्रयास करना चाहिए !

    लक्ष्य कमांडर रेखा आर्या ने प्रशासन दुवारा  झुगीवासियो की अनदेखी पर गहरी चिंता जताई ! उन्होंने सरकार से मांग करते हुये  कहा कि वो इन लोगो को मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराये अन्यथा लक्ष्य की टीम को मजबूरन सड़को पर उतरना पड़ेगा !  उन्होंने कहा कि आने वाले दिनों में  हमारा ” लक्ष्य झुगी झुगी” का  अभियान और तेजी के साथ आगे बढ़ेगा ! उन्होंने लोगो से इस अभियान में जुड़ने की अपील भी की !

    लक्ष्य कमांडर संघमित्रा गौतम ने बच्चो की शिक्षा पर जोर दिया ! उन्होंने नशे से बचने की सलाह भी दी ! उन्होंने कहा कि नशा ही सभी समस्याओं की जड़ है ! लक्ष्य कमांडर ने बहुजन समाज के उत्थान में बाबा साहेब डॉ भीम राव आंबेडकर के योगदान की भी चर्चा की ! लक्ष्य महिला कमांडरों ने उनको पूरा सहयोग देने का अश्वासन भी दिया !

     

  • कोरी राष्ट्रपति, घांची प्रधानमंत्री…हिन्दुत्ववादियों के सामाजिक न्याय का नया मॉडल और कांग्रेसी-कम्युनिस्टों-समाजवादियों से लेकर ब्राह्मणवादियों तक के समवेत रुदन का समय

    रामनाथ कोविंद देश के राष्ट्रपति हो गए हैं। वे अनुसूचित जाति से होने के कारण राष्ट्रपति बनाए गए हैं। जिस देश में ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य सर्वोच्च जातियां मानी जाती हों और इन जातियों के बड़ी तादाद में लोगों के भीतर जातिगत श्रेष्ठता का झूठा और अमानवीय अहंकार भरा हो, उस देश में यह एक अच्छी बात है। और सबसे अच्छी बात ये है कि जिस दल और जिस विचारधारा को आज तक अपनी नामसझी के कारण इन ऊंची जातियों के लोग समर्थन देते रहे हैैं, उनकी आंखें खुलने का भी यह समय है।

    राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ हो या भारतीय जनता पार्टी, भारतीय राजनीति और समाज के भीतर पैदा हुए छोटे-छोटे अदृश्य आंदोलनों ने कुछ एेसे मूल्य और मानदंड स्थापित कर दिए हैं, जो किसी भी धार्मिक और राजनीतिक कट्‌टरता को निचोड़ कर रख देते हैं।

    नरेंद्र मोदी को मैं वैचारिक रूप से पहले ही दिन से खारिज करता रहा हूं और वे मेरी पसंद के प्रधानमंत्री नहीं हैं। लेकिन मुझे मेरे देश का लोकतंत्र और लोकतांत्रिक समाज प्रिय है, इसलिए अच्छा लगता है कि पंडित जवाहरलाल नेहरू के बाद मोदी भारी जन समर्थन हासिल कर देश के प्रधानमंत्री बनने वाले पहले व्यक्ति हैं। पंडित नेहरू के बाद लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, मोरारजी देसाई, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी जैसे कई प्रधानमंत्री रहे, लेकिन इनमें से हरेक के साथ सहज और नैसर्गिक प्रधानमंत्रित्व का गुण नहीं जुड़ा था। शास्त्री बहुत कमज़ोर प्रधानमंत्री थे और बहुत मज़बूरी में बनाए गए थे। इंदिरा गांधी नेहरू की बेटी होने के कारण प्रधानमंत्री बनी थीं। माेरारजी जनता पार्टी की एक लाचार और अशक्त अभिव्यक्ति थे। वीपी सिंह बहुत शातिराना ढंग से प्रधानमंत्री बने। उन्होंने कांग्रेस की समस्त धूर्तताओं को मात दे दी थी। जिस सफाई से वे पूरे चुनाव अभियान में प्रधानमंत्री नहीं बनने का दावा करते रहे और स्वयं को फ़कीर बताते रहे, उसी सफाई से वे प्रधानमंत्री भी बन गए और चंद्रशेखर इसके विरोध में उतरे। वाजपेयी बहुत शालीन और बड़ी अाबादी की पसंद थे, लेकिन उनके साथ लोकबल नहीं था। यह लोक बल अगर कोई बटोर पाया तो वह नरेंद्र मोदी हैं। यह अलग बात है कि शासन करने की क़ाबिलियत और समाज या देश का सकारात्मक ट्रांस्फोरमेशन कम ही लोगों के बूते की बात होती है। यह तत्व हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री में नहीं दिखता है।

    मैं उस समय बड़ी प्रसन्नता का अनुभव करता हूं, जब ब्राह्मणवादी अहंकार के साथ जीने वाले मेरे मित्र अपने साथ के लोगों को तेली-तमोली और न जाने क्या-क्या कहकर गरियाते हैं और उनके घरों में जाने तक को पसंद नहीं करते; लेकिन अपनी फेसबुक पर सारा दिन घांची जाति के नरेंद्र मोदी की तसवीर लगाकर गर्व का अनुभव करते हैं। यही वह शिफ्ट है, जो भारतीय समाज में होना चाहिए था। यह शिफ्ट आना तो चाहिए था गतिशील और प्रगतिशील ताकतों के कारण, लेकिन यह बदलाव आ रहा है एक कूढ़मगज, दकियानूसी और प्रतिगामी सोच को लेकर चलने वाली राजनीतिक, धार्मिक और सामाजिक विचारधारा के कारण। आपको हीरा तो मिल रहा है, लेकिन वह कीचड़ में लिपटा हुआ है। दरअसल समाज को बदलाव चाहिए, बदलाव ला कौन ला रहा है, उसका चेहरा तलाशने की ज़रूरत नहीं है।

    भाजपा ने पृथकतावादी पीडीपी से समझौता किया है। उसके साथ सरकार चलाई है। यह ऐसी ही बात है, जैसे कोई पहले तो कुलवधू होने का दावा करे और फिर अचानक से कॉलगर्ल हो जाए। लेकिन नख़रे वही कुलवधू के! जो पार्टी चीन से अपनी मातृभूमि का एक-एक इंच वापस नहीं लेने तक संसद में प्रवेश नहीं करने के संकल्प ले और जब स्वयं के पास शासन आए और चीन आपके विमान को भी मार गए और धौंस भी दिखाए तब भी आप उसके राष्ट्रपति के लिए लाल कालीन बिछाएं, अपने परम पुरुष की प्रतिमाएं उसके यहां से बनवाएं और वह बुलाए तो आप राष्ट्रीय स्वाभिमान पर द्विराष्ट्रीय रिश्तों की परवाह करने लगें तो इससे अच्छा बदलाव और क्या होगा! लेकिन ज्यादा अच्छा ताे तब है जब आप देश की सड़कों पर विनम्र दिखाई दें।

    क्या यह हिन्दूवादी और ब्राह्मणवादी पार्टी के भीतर कम कमाल की बात है कि जो लोग अपने चौके-चूल्हे पर जिस जाति के नादान बच्चे तक के चढ़ जाने पर गंगाजल से स्नान करते हैं और गंगाजल से चौका-चूल्हा धोते हैं, उस सड़ी हुई सोच और अमानवीय विचारधारा के लोगों को अपने हृदय में बसाना पड़ता है। मुझे लगता है, यह बदलाव है और बड़ा बदलाव है, जिसे सामाजिक न्याय की राजनीति के दबाव से आना पड़ा है। आप यकीन मानिए, यह बदलाव अभी और विस्तार लेगा और ब्राह्मणवादी वर्चस्व को खत्म करके एक ऐसा हिन्दुत्व खड़ा करेगा, जिसमें 90 प्रतिशत पिछड़ी और दलित जातियों की भूमिका है। संघ आजकल इसी सोशल इंजीनियरिंग पर काम कर रहा है और इसीलिए जल्द से जल्द वह अपने प्रांतों की कमान इस वर्ग के लोगों को सौंप रहा है। यह अनचीन्हा आरक्षण है, जिसकी संघ के लोगों ने भी कभी कल्पना नहीं की होगी।

    यह इसलिए भी बड़ा बदलाव है, क्योंकि भारतीय राष्ट्रपति और भारतीय प्रधानमंत्री के दोनों पद आज ऐसी जातियों के दो लोगों के पास हैं, जो आम समाज में बेहद अप्रतिष्ठित और दीनहीन बनाकर रख दी गई हैं। अगर जातिगत प्रतीकों से सामाजिक बदलाव आता है तो भाजपा सामाजिक बदलाव का यह संदेश देने में सफल रही है। कांग्रेस के पास दलित मीराकुमार पहले भी थी और ज़हीन-शहीन प्रतिभावान गोपाल गांधी भी कब से थे, लेकिन कांग्रेस को इनकी याद कभी नहीं आई। उसने विवशता में ये नाम ऐसे समय चुने, जब हार तय थी।

    दरअसल जाति आधारित सामाजिक न्याय का जो सिद्धांत कांग्रेसी, कम्युनिस्ट और समाजवादी लेकर आए थे, वह एकदम झूठा साबित हुआ और यह थियरी लोगों को न्याय नहीं दिला पाई। न लोकतंत्र बलशाली हुआ और न बंधुता ही कायम हुई। समता और स्वतंत्रता का तो प्रश्न ही नहीं है, इस मोहिनी सिद्धांत ने गरीब को गरीब नहीं समझा और उसकी जाति पूछना जरूरी समझा।

    हमारे देश में जिस समय जातिवादी और धर्मांधतावादी ताकतें मज़बूत हो रही हैं, उस समय अगर सवर्णवाद और ब्राह्मणवाद पर कोई तीखा प्रहार हो रहा है तो वह इसी हिन्दुत्व की राजनीति से होता दिख रहा है।

    हिन्दुत्ववाद के ध्वजवाहकों को तो नहीं, लेकिन उसके चुनीदा रणनीतिकारों को अब यह समझ आ गया है कि वे अपना धार्मिक राज्य ब्राह्मणों, क्षत्रियों और वैश्यों के बलबूते पर नहीं कर सकते। इसलिए इन जातियों को नींव में दबाकर अब दलित-पिछड़ा वर्ग, जिसकी भारतीय समाज में तादाद 90 प्रतिशत है, उन्हें अग्रणी रखकर ही हिन्दू भारत बनाना संभव है। लेकिन आप सदियों पुरानी इस कहावत को याद रखें कि लोहा लाेहे काे काटता है और ज़हर ही ज़हर को मारता है। इसलिए जो लोग ज़हर उलीच रहे हैं, उसे कंठ में धारण करने वाला कोई शिव तो हमारे आसपास नहीं है, लेकिन इतना तय है कि यह विष जातिवादी और ब्राह्मणवादी सोच के अंगों को तो नीला करके खत्म कर ही देगा।

    कोरी जाति के रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति और घांची जाति के नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बन जाने का साफ़ सा अर्थ यह है कि हिन्दुत्ववादी राजनीति के रणनीतिकारों ने भारी शिफ्ट किया है और अब वे जिस राह पर चल पड़े हैं, उसमें कम्युनिस्टों, समाजवादियों और कांग्रेसी लोगों के लिए संभावनाएं बहुत क्षीण पड़ गई हैं। वे अगर कोई क्रांतिकारी फार्मूला या रणनीति लेकर आगे नहीं बढ़ पाए तो इस राजनीतिक युद्ध में उनका पराभव सौ प्रतिशत तय है। राजनीतिक लोगों को यह समझ आ चुका है, लेकिन उनके आसपास मंडरा रहे मीडियाई और विश्वविद्यालयीय बुद्धिजीविता के भ्रम को पाले बैठे लोगों को यह समझ नहीं आया है और वे अपने आकाओं से ज़्यादा हल्ला करते हैं। गवाह चुस्त हैं और मुद्दई सुस्त हैं।

    और आप जल्द ही आने वाले चुनावों में बहुत स्पष्टता से देखेंगे कि हिन्दुत्ववादी राजनीति के रणनीतिकार आने वाले समय में ब्राह्मणवाद के अवशेषों को किस तरह धू-धू कर जलाते हैं। जो लोग अब तक आरक्षण की सरकारी नीतियों से परेशान थे और सुबह-शाम उस नीति को गरियाकर भाजपा-आरएसएस का दामन थाम रहे थे, उनके रुदन के दिन बहुत निकट है। हिन्दुत्ववादी राष्ट्रवाद भले अभी मुस्लिमों को डरा रहा हो, लेकिन आप देखेंगे कि संघ और भाजपा के ये कोविंद जैसे सजावटी दीए कुछ दिन बाद ब्राह्मणवादियों और सवर्णवादियों को भी डराने लगेंगे; क्योंकि इनके साथ ही अब इन पदों से सदा के लिए कथित ऊंची जातियों के नेताओं की छुट्टी होने वाली है।

    यह अलग बात है कि ट्रांस्नेशनलिज़्म, कॉमन मार्केटिज़्म, कांपीटीटिव डेमाक्रेटिक इकोनॉमी और नई टेक्नाेलॉजिकल इंस्पीरेशंस के दबाव किसी भी देश में कट्टरतावादियों, रूढिवादियों और प्रतिगामी शक्तियों को कामयाब नहीं होने देंगे। एक तरह से एक बार अंधेरा गहराएगा और उसमें से एक नई दुनिया का साफ़ और सुंदर चेहरा दिखाई देगा।

  • एक चुटकी मुस्कान

    एक चुटकी मुस्कान

    Mukesh Kumar Sinha

    होंठ के कोने से चिहुंकी थी हलकी सी मुस्कराहट
    आखिर दूर सामने जो वो चहकी,
    नजरें मिली, भर गयी उम्मीदें
    हाँ, उम्मीदें अंतस से लाती है हंसी !!

    माँ के आँचल में दबा, था अस्तव्यस्त
    छुटकू सा बालक, स्तनपान करता
    तभी आँचल के कोने से दिख गए पापा
    मुस्काया, होंठ छूटे और फिर खिलखिलाया
    आखिर जन्मदाता ही देते हैं पहली हंसी
    भरते हैं जीवन में किलकारियाँ !!

    हंसी, खिलखिलाहट, हो हो हो …….हां हा हा
    जीने के लिए है लाइफ लाइन
    इसलिए तो मुस्कुराते फोटो के लिए
    कहते हैं चीज या पनीर, और
    क्लिक पर मुस्कुरा जाता है चेहरा …… !!
    ताकि गंभीर भी कहलायें
    हंसमुख व फोटोजनिक !!

    कभी दर्द से कराहो या हो
    शोक संतृप्त दृश्य, हो सब गमगीन
    और, लगे कोई बच्चा खिलखिलाने
    फिर देखना, कैसे छूटेगा फव्वारा
    खिलखिलाहटों का, दर्द की झील से निकल कर !!

    अन्दर से आ रही हो हंसी, और खिलखिलाओ
    समझ में आती है बात
    पर कभी रोते रोते
    कुछ ऐसे जगाओ खयालात
    ताकि हंस पड़े जज्बात !!
    तब खुद से कहोगे क्या बात क्या बात!!

    वैसे हंसी होती है प्यार, न्यारी
    दिल दिमाग और स्वास्थ्य
    के लिए भरती है पिचकारी
    हंसी को हो वजह कुछ भी
    पर जब खिलखिलाएं खुद की
    बेवकूफियों और गलतियों पर
    वो हंसी, हो जाएँ खुद पर कुर्बान
    कहता है तब मन !!

    हंसो हंसो, बन जाओ लाफिंग बुद्धा
    ताकि कहलाओ स्वयंसिद्धा !!

    जिंदगी का जायका ही बदल देती है
    एक चुटकी मुस्कान !!

  • अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए

    Vidya Bhushan Rawat

    अनंत नाग में अमरनाथ तीर्थ यात्रा में आतंकवादी हमले की कड़ी निंदा की जानी चाहिए. ये भी हकीकत है के ऐसे हमले सीमा पार की शह के बिना पे नहीं हो सकते हैं लेकिन भारत सरकार की कश्मीर निति पूर्णतः असफल हो चुकी है. हम जानते है के इस वक़्त भक्त पत्रकार मामले को सांप्रदायिक रूप देने में व्यस्त होंगे और कई ने ट्वीट करना शुरू किया है के क्या #नोटइनमायनेम का कोई प्रदर्शन भी होगा . ये शर्मनाक है क्योंकि देश पर किसी भी संकट पर हम सभी लोग साथ होते हैं लेकिन अगर उस संकट का संप्रदायी करण करने की कोशिश होगी तो स्थिती बेहद गंभीर होगी .

    हम जानते है के आतंक की इस वारदात का देश के सभी लोग चाहे हिन्दू हो या मुसलमान, दलित हो या आदिवासी या अन्य कोई कड़े शब्दों में निंदा करते है . हम लोग आतंक के खिलाफ है लेकिन हर किस्म के . उस आतंक के भी जो गौरक्षा के नाम पर निरपराध लोगो को मार रहा है . आखिर आतंक की किसी भी घटना में मारने वाले लोग तो निरपराध ही होते हैं .

    हम जानते हैं के कश्मीर में भारत के जवान लड़ रहे है और अपने जान की क़ुरबानी भी दे रहे हैं . सवाल यह नहीं के फौज या जवान कार्य नहीं कर रहे . सवाल इस बात का है के इंटेलिजेंस रिपोर्ट्स के बावजूद ऐसी घटना घटती है तो किसे दोष दे. आतंकवादी तो चाहते हैं के निरपराध लोगो को मारकर कश्मीर और देश में अफरा तफरी का माहौल पैदा कर दे. लोगो को एक दुसरे के खिलाफ खड़ा कर दे. कश्मीर में भाजपा की गठबंधन सरकार है और इसके नेताओं ने अपनी पूरी मर्जी कश्मीर पर चलाई है. न केवल सरकार ने अपितु टी वी पर भडुआ भोम्पुओ की फौज भी माहौल को साम्प्रदायिक बनाने में जुटी है लेकिन सवाल इस बात का है के कश्मीर में जो राजनैतिक पहल होनी चाहिए थी वो क्यों नहीं हो रही . क्यों ये सरकार हर एक मसले का हल सेना के जरिये चाहती है. अगर सेना हल होती तो हर देश में समस्याओ का समाधान सेना के जरिये हो जाता. सेना देश की सुरक्षा के लिए है और सैनिक उसके लिए अपनी जान भी लगा देता है . आज सिक्किम में भी भारतीय जवान अपनी जान पे खेलकर हमारी सीमा को सुरक्षित कर रहे है लेकिन सवाल यह है के बात कब होगी . क्या युद्ध किसी बात का समाधान है ?

    हम राजनैतिक दलों और सरकार से अनुरोध करते हैं के कश्मीर के प्रश्न को गंभीरता से ले और उस पर सर्वदलीय बैठकर बुलाकर एक विशेष कमिटी का गठन करे . आतंकवादियों से कोई बात नहीं होनी चाहिए लेकिन कश्मीर के अन्दर जो लोग राजनैतिक समाधान चाहते हैं उनके साथ तो बात हो सकती है .

    सरकार का काम होना चाहिए के सभी से अनुरोध करे के जहाँ इस घटना पर उसे दुःख होना चाहिए और इस कृत्य को करने वाले लोगो के खिलाफ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए वही अपने चाहने वालो को देश के दुसरे हिस्से में आग उगलने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिश से बचना चाहिए. अपने चुनाव जीतने के चक्कर में देश को विभाजित न करे . घटना की कड़े शब्दों में निंदा होनी चाहिए लेकिन सरकार की कश्मीर निति पर सवाल भी पूछे जाने चाहिए .

  • लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    लड़के जो जीते है सिर्फ अपनो के लिए अपनों के सपने के साथ

    Mukesh Kumar Sinha

    लड़कियों से जुड़ी बहुत बातें होती है
    कविताओं में
    लेकिन नहीं दिखते,
    हमें दर्द या परेशानियों को जज़्ब करते
    कुछ लड़के
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए, अपनों के सपनों के साथ

    वो लड़के नहीं होते भागे हुए
    भगाए गए जरुर कहा जा सकता है उन्हें
    क्योंकि घर छोड़ने के अंतिम पलों तक
    वो सुबकते हैं,
    माँ का पल्लू पकड़ कर कह उठते हैं
    “नहीं जाना अम्मा
    जी तो रहे हैं, तुम्हारे छाँव में
    मत भेजो न, ऐसे परदेश
    जबरदस्ती!”

    पर, फिर भी
    विस्थापन के अवश्यम्भावी दौर में
    रूमानियत को दगा देते हुए
    घर से निकलते हुए निहारते हैं दूर तलक
    मैया को, ओसरा को
    रिक्शे से जाते हुए
    गर्दन अंत तक टेढ़ी कर
    जैसे विदा होते समय करती है बेटियां
    जैसे सीमा पर जा रहा हो सैनिक
    समेटे रहते हैं कुछ चिट्ठियाँ
    जिसमे ‘महबूबा इन मेकिंग’ ने भेजी थी कुछ फ़िल्मी शायरी

    वो लड़के
    घर छोड़ते ही, ट्रेन के डब्बे में बैठने के बाद
    लेते हैं ज़ोर की सांस
    और फिर भीतर तक अपने को समझा पाते हैं
    अब उन्हें ख़ुद रखना होगा अपना ध्यान
    फिर अपने बर्थ के नीचे बेडिंग सरका कर
    थम्स अप की बोतल में भरे पानी की लेते हैं घूँट
    पांच रूपये में चाय का एक कप खरीद कर
    सुड़कते हैं ऐसे, जैसे हो चुके हों व्यस्क
    करते हैं राजनीति पर बात,
    खेल की दुनिया से इतर

    कल तक,
    हर बॉल पर बेवजह ‘हाऊ इज देट’ चिल्लाते रहने वाले
    ये छोकरे घर से बाहर निकलते ही
    चाहते हैं, उनके समझ का लोहा माने दुनिया
    पर मासूमियत की धरोहर ऐसी कि घंटे भर में
    डब्बे के बाथरूम में जाकर फफक पड़ते हैं
    बुदबुदाते हैं, एक लड़की का नाम
    मारते हैं मुक्का दरवाज़े पर

    ये अकेले लड़के
    मैया-बाबा से दूर,
    रात को सोते हैं बल्व ऑन करके
    रूम मेट से बनाते है बहाना
    लेट नाइट रीडिंग का
    सोते वक्त, बन्द पलकों में नहीं देखना चाहते
    वो खास सपना
    जो अम्मा-बाबा ने पकड़ाई थी पोटली में बांध के

    आखिर करें भी तो क्या ये लड़के
    महानगर की सड़कें
    हर दिन करने लगती है गुस्ताखियाँ
    बता देती है औकात, घर से बहुत दूर भटकते लड़के का सच
    जो राजपथ के घास पर चित लेटे देख रहें हैं
    डूबते सूरज की लालिमा

    मेहनत और बचपन की किताबी बौद्धिकता छांटते हुए
    साथ ही बेल्ट से दबाये अपने अहमियत की बुशर्ट
    स को श कहते हुए देते हैं परिचय
    करते हैं नाकाम कोशिश दुनिया जीतने की
    पर हर दिन कहता है इंटरव्यूअर
    ‘आई विल कॉल यु लेटर’
    या हमने सेलेक्ट कर लिया किसी ओर को

    हर नए दिन में
    पानी की किल्लत को झेलते हुए
    शर्ट बनियान धोते हुए, भींगे हाथों से
    पोछ लेते हैं आंसुओं का नमक
    क्योंकि घर में तो बादशाहत थी
    फेंक देते थे शर्ट आलना पर

    ये लड़के
    मोबाइल पर बाबा को चहकते हुए बताते हैं
    सड़कों की लंबाई
    मेट्रों की सफाई
    प्रधानमंत्री का स्वच्छता अभियान,
    कनाट प्लेस के लहराते झंडे की करते हैं बखान
    पर नहीं बता पाते कि पापा नहीं मिल पाई
    अब तक नौकरी
    या अम्मा, ऑमलेट बनाते हुए जल गई कोहनी

    खैर, दिन बदलता है
    आखिर दिख जाता है दम
    मिलती है नौकरी, होते हैं पर्स में पैसे
    जो फिर भी होते हैं बाबा के सपने से बेहद कम
    हाँ नहीं मिलता वो प्यार और दुलार
    जो बरसता था उनपर
    पर ये जिद्दी लड़के
    घर से ताज़िंदगी दूर रहकर भी
    घर-गांव-चौक-डगर को जीते हैं हर पल

    हाँ सच
    ऐसे ही तो होते हैं लड़के
    लड़कपन को तह कर तहों में दबा कर
    पुरुषार्थ के लिए तैयार यकबयक
    अचानक बड़े हो जाने की करते हैं कोशिश
    और इन कोशिशों के बीच अकेलेपन में सुबक उठते हैं

    मानों न
    कुछ लड़के भी होते हैं
    जो घर से दूर, बहुत दूर
    जीते हैं सिर्फ अपनों के लिए अपनों के सपनों के साथ।

  • दंगो में ऐसा ही होता है

    Hafeez Kidwai

    दूर एक हाथ कटा पड़ा था। उस हाथ का जिस्म अलग एक खम्भे से टेक लगाए पड़ा था। शायद औरत थी। करीब से देखा तो फुसफुसा रही थी और करीब गया तो फुसफुसाहट समझ आने लगी। एक हाथ से हाथ जोड़ते हुए वह कह रही है “मेरी बेटी से एक एक करके बलात्कार करो,एक साथ करोगे मर जाएगी। वह मर जाएगी,ए आदमियों इधर मुझपर आ जाओ, उसपर एक साथ मत टूटो, वह मर जाएगी।”

    यह शब्द अगर किसी इंसान ने सुने होते तो उसके जिस्म की अकड़न शर्मिंदगी से खुद बखुद खत्म हो जाती। दूर उसकी आठ साल की बच्ची पड़ी थी। करीब जाकर देखने पर महसूस हुआ जो हमारे लिए आठ साल की बच्ची थी, वह अभी किसी वहशी झुँड के लिए औरत थी।

    कभी उस औरत को देखता तो कभी उस बच्ची को, तो कभी जले हुए घर देखता तो कभी बारिश की तरह बिखरे पड़े ख़ून को।लड़की के होंट वहशियों की गन्दगी से छुप गए थे।रुमाल को गीला करके मैं उसके मुँह को साफ़ करता की आँसू फिर टपक कर उसका मुँह गीला कर देते। मैं बार बार साफ़ करता, वह बार बार गन्दा हो जाता। उसके जिस्म से उठती दूसरे झुण्ड की बदबू दिमाग में इस तरह चढ़ी की कल दोपहर की पी चाय एक झटके में मुँह से निकल गई।

    किसी ने आकर मुझे उठाया,मैंने पलट कर सवालिया अंदाज़ में उसे देखा। उसने कहा दोस्त परेशान मत हो। दंगो में ऐसा ही होता है। भीड़ किसी को भी नही बख्शती। यह हमारा दुर्भाग्य है की हम इसमें फंस गए। दँगे हर एक को खत्म कर देते हैं।यही बहुत रहा की हम ज़िंदा बच तो गए।।।।।वह मुझ मुर्दे से बोले जा रहा था जैसे वह बोले जा रही थी। “मेरी बेटी से एक एक कर के बलात्कार करो, एक साथ मत करो, वह सह नही पाएगी, मर जाएगी”

     

  • किसान संकट के बीज

    किसान संकट के बीज

    Prem Singh

    बुंदेल खण्ड में ग्रीन रेवलूशन, गाँव से बाहर शहरों में पढ़े नव शिक्षित वर्ग के साथ १९७५ के आस पास ही गाँव में प्रवेश कर पाया इसके पहले नहीं। वही शिक्षित वर्ग जिसे गाँव वालों ने बड़े हसरत और प्यार से बाहर पढ़ने के लिए भेजा था, लौट आने के बाद भी बड़ा सम्मान करते थे।(मेरे गाँव में सबसे पहले जो सज्जन इलाहबाद विस्वविद्यालय पढ़ने गए थे १९६५ में, पूरे गाँव ने टीका लगाकर, पैसे देकर ग़ाजे बाजे के साथ बस में बिठा कर विदाई की थी।जब वही व्यक्ति पुनः वापस आया जीवन भर उसे गाँव वालों ने भैया कह कर २०१५ उसके निधन तक सम्मान किया) इसी वर्ग ने गाँव के सारे मानक बदल डाले। सबसे पहले बड़ेपन या श्रेष्ठता का मानक बदला। हमारे गाँव में उसको उतना ही सम्मान मिलता था जो जितना आत्म निर्भर था और दूसरों के काम आता था। जैसे ही कुछ अतिरिक्त उत्पादन या आमदन होती तुरंत गाँव के सामूहिक उपयोग के लिए बर्तन, फ़र्श, तख़्त, जंगाल( पानी इकट्ठा करने का ताम्बे का बर्तन), कोपर, कठौती,अद्धा( प्रकाश फैलाने का यन्त्र, हारमोनियम, तबला आदि अनेकानेक वस्तुएँ लाते थे। और गाँव वाले पूरे अपने पन से उन्हें प्रयोग करते थे। यही बड़प्पन था।

    जो वास्तव में विचारों और व्यवस्था,दोनो में बड़े थे वे सबके समान दिखने में ही बड़प्पन समझते थे। मैंने अपने गाँव में ऐसे भी बड़े देखे हैं जो बिवाह आदि सुख दुःख के अवसर पर बिना बुलाए पहुँचते थे और पूरी जानकारी लेते थे कमी होने पर अपने घर से पूरा करते थे।

    मेरे नाना ख़ानदान में एक मान्यता थी की यदि कोई ईंट लगाएगा तो नास हो जायेगी। मैंने पूँछा ऐसा क्यों? बोले यदि हमने छत बना दी तो पड़ोस के घर नंगे हो जाएँगे। बहु बेटियों को तकलीफ़ होगी और छत बनाने की प्रतिस्पर्धा हो जाएगी।

    अब इन डिग्री धारी नव शिक्षतो ने परिभाषा ही बदल दी। १९७५ के बाद दूसरों से बड़ा दिखना और अधिकारियों से पुलिस से नज़दीकी रखना बड़प्पन होने लगा। ट्रैक्टर, रासायनिक उर्वरक एव कीटनाशक प्रयोग करना,कई माले का पक्का मकान,मोटर सयकिल, गाड़ी, कूलर, टी वी ,डबल बेड, बेडरूम, सोफ़ा,मट्ठा भाने की मशीन, फ्रिज, चाय, काफ़ी, बिस्कुट, शक्कर रखना और टेरिकाट पहनना, क़र्ज़ लेना( बैंक से)बड़ा पन हो गया।

    गाँव वालों ने तो यह सोच कर इन्हें बड़े बड़े शहरों में पढ़ाया था कि वापस आकर ये गाँव को सम्भालेंगे। लोगों में पुरक़ता और समृद्धि के नए सूत्र बतायेंगे। हुआ कुछ उलटा।
    वर्तमान किसान संकट का बीज वही कहीं है।

  • मनु, मन्दिर और दलित

    ज़िंदगी को देखने-समझने के नज़रिये और अपने अनुभव से गुने मायने ना चाहते हुए भी आपके व्यवहार को प्रभावित करतें ही हैं। शायद मैं अब तक भी इतनी परिपक्व नहीं हो पाई कि उन अनुभवों को किनारे रख निष्पक्ष भाव से व्यवहार कर पाऊँ। यदि जीवन उन अनुभवों के साथ जी रहें हैं तो हिम्मत या समझदारी ज़रूरी नहीं कि काम आ ही जाए। ऐसा ही एक कँपा देने वाला अनुभव मुझे उस दिन हुआ जब मनाली में टैक्सी वाले भैया ने घूमने के लिए पहली ही जगह टैक्सी रोकी……..मनु मंदिर के ठीक सामने।

    मैं टैक्सी का गेट खोल कर बाहर आई; मंदिर के नाम का बड़ा सा बोर्ड सामने था। पहले से फ़िक्स नहीं था कि घूमने कहाँ जायेंगे बस जो पहले आ जाए वहीं घूम लेंगे वाला सिस्टम था। अपने सामने मंदिर और मनु का नाम देख कर ही मैं सन्न रह गई….. ऐसे लगा मानो जैसे बर्फ सी जम गई हूँ, इतना जड़वत शायद पहले कभी महसूस नहीं किया था। मुझे इस से पहले वाक़ई नहीं पता था कि ओल्ड मनाली में मनु का मंदिर है, और मनाली नाम दरअसल मनु के सम्मान में रखा गया है। यानि मनुआलय से ही मनाली बना है। लोग कहतें हैं कि इस मंदिर में मनु के धरती पर पड़े पहले कदम की छाप है। जिस मनु के वज़ह से एक पूरा समुदाय पीढ़ियों से अमानवीय जीवन जीने के लिए अब तक भी मजबूर है, उसका मंदिर मेरी नज़रों के बिल्कुल सामने था।

    उस वक़्त एक ही पल में बहुजन समाज के लाखों लोगों के चेहरे एक साथ मेरे ज़ेहन में कौंध गए। मुझे दिखे मेरे बहुजन परिवार के लोग जो मनु और मनुवादियों की वजह से अब तक भी ना जाने कितने तरह के संघर्षों की चक्की में पीसते हुए, बद से भी बदत्तर जीवन जी रहे हैं। मैं वहीं खड़ी-खड़ी ऊपर जाती हुई सीढ़ियों और उस पर उतरते-चढ़ते लोगों को कुछ देर देखती रही। बहुत कोशिश की खुद को समझाने की, कि सीढ़ियों से कदम ऊपर बढाऊँ, देखकर आऊँ कि कैसे पूरे तंत्र के साथ दुनिया का सबसे बर्बर संस्थान ज़िंदा है। पर मैं नहीं हिम्मत कर पाई। जिस जगह पर मनु का टेम्पल हो, जिस जगह का नाम ही मनु के ऊपर हो,जहां के अधिकतर गाड़ियों और घरों पर जय बाबा मनु की लिखा हो…..वहाँ दलितों के क्या हालात होंगें अंदाज़ा लगाना मुश्किल नहीं होना चाहिए।

    मैंने वहीं से कदम वापस लिए और बराबर से ही नीचे की ओर डाउन टाऊन जाने का रास्ता पकड़ लिया। कुछ सीढ़ियाँ उतरने के बाद ही सड़क पर मुझे बलिराम जी मिले जो जूते-चप्पल ठीक करने का काम करतें हैं बारिश की वजह से भीगे हुए परेशान हो रहे थे। मैंने रोक कर उनसें बातें की, आखिर क्या हालात हैं वहाँ मुझे उनसें बेहतर कौन बताता। मैं उनके साथ हो ली, उनकी पत्नी-बच्चों और बगल में रह रहे दूसरे भाइयों से भी बात की। पता लगा कि वहाँ दलित पुरुषों को ‘डूम’ और महिलाओं को ‘डुमनी’ कहा जाता है, आज भी वो मंदिर में प्रवेश नहीं कर सकते, वे आज भी अछूत हैं, जातिवाद बहुत ही वीभत्स रूप में मौजूद है यहां। ये ना ही सामूहिक भोज में हिस्सा ले सकतें हैं, और ना ही इनके यहां कोई खाना खाता है, सबके खाने के बाद बचा खाना अलग से दिया जाता है उन्हें। उनके घर अलग से बसे हुए हैं पुरुष मजदूरी, पत्थर तोड़ने का काम, साफ-सफ़ाई, कचरा-पट्टी और सीवरों में काम करतें हैं, चमड़े का काम करतें हैं, महिलाएँ भी खेतों में काम करने जाती हैं, चारे और ऊन का काम करती हैं। पहाड़ के कठिन जीवन के बीच वहाँ के दलितों के जीवन की दुश्वारियाँ भी दुगनी हैं……..जब बर्फ़ पड़ने लगती है और कोई काम नहीं मिलता तो पुरूष चंडीगढ़ में काम करने चले जातें हैं। बच्चे स्कूल जाते हैं पर बाकी बच्चों से अलग बैठते हैं, उनसें स्कूल में काम करने भी कहा जाता है। बहुत कुछ था उनके पास बताने और मेरे जानने के लिए पर वो सब काम करने वाले लोग थे, कितनी देर मेरे पास बैठते। मैंने और भी लोगों से बात करने की कोशिश की पर समय कम था कि कुछ और जान पाती।

    देवों की भूमि कहे जाने वाले हिमाचल में शूद्रों को प्रवेश आज भी नहीं मिलता है। 1966 में पंजाब राज्य से अलग हुए इस राज्य में स्वतंत्रता के 70 सालों के बाद भी रेडिकल हिंदू वैल्यूज फॉलो किए जातें हैं। सिक्ख साम्राज्य के समय सिक्ख दर्शन की स्थापना को लेकर डोगरा और पहाड़ी राजाओं से सिक्खों के कई युद्घ हुए। बाद में आगे चलकर जब गुरू गोविंद जी ने उन्हें एक साथ मिलकर मुगलों के विरुद्ध लड़ने को कहा तो उन्होंने सिर्फ़ इसलिए मना कर दिया था क्योंकि उनकी सेना में लोअर कास्ट के लोग भी सैनिक के रूप में सम्मिलित थे। सिक्ख साम्राज्य के रहते हुए पहाड़ी राजा टिपिकल हिंदूवाद या मनुवादी सिस्टम को लागू नहीं कर पाए थे, क्योंकि पुजारी सिक्खों से डरते थे। इसलिए जब उनका यह डर मिट गया तो उन्होंने मंदिरों के बाहर दीवारों पर लिखवाना शुरू किया-‘मंदिर में शूद्रों का प्रवेश वर्जित है’। इसे इस रूप में भी समझ सकतें हैं कि किसी समय में ज़रूर ही उनका प्रवेश प्रतिबन्धित नहीं रहा होगा, और वो समय सिक्ख साम्राज्य का ही था। स्वतंत्रता के बाद जब राज्य स्वायत्तता की स्थिति में आया तो हिंदूइज़्म को अपने वास्तविक रूप में लागू किया। इसलिए ही हिमाचल में दलितों को मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलता है। अब हिन्दूइज़्म को लागू करने वाले लोग कौन होंगे बताने की जरूरत है क्या? जहाँ कहा जाता हो कि मनु अपने जीवन चक्र में यहां सात बार मरा और सात बार ज़िंदा हुआ है, वहाँ बहुत से मनु ज़िंदा घूम रहे हैं।

    मनुस्मृति ज़िंदा रूप में देखनी हो तो देखिए हिमाचल में, तब भी मन ना भरे तो आगे बढ़ जाइए उत्तराखंड आपका इंतजार करेगा। जहाँ-जहाँ तीर्थधाम हैं वहाँ-वहाँ दलितों के लिए नारकीयता मौजूद है।

    पहाड़ सबके लिए खूबसूरत नहीं हैं, कुछ लोगों की चीखें उन पहाड़ों में ही दफ़्न रह जाती है।

  • मार डालो

    मार डालो
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    मुझे मार डालो मेरी मूर्खता के लिए

    मुझे मेरी जाति, मेरे धर्म, मेरे रवायत के लिए मार डालो
    मुझे मार डालो कि मैं यहीं पैदा हुआ यहीं मरूँगा
    और तुम हो घोड़ों पर आए दूधिया ईश्वरों की फ़ौज

    मुझे मार डालो कि तुम यहीं थे
    मैं आया था हांफता हुंकारता कालक्रम में देर से
    कि मेरी शहतीर पर जमा खून तुम्हारा है

    मुझे मार डालो कि अल्लाह है निगेहबां
    उस दुनिया में बाकियों के लिए जगह नहीं

    मुझे मेरी बौद्धिकता के लिए मार डालो

    मुझे मार डालो कि मेरी भूख इतनी बढ़ गई है
    कि किसी अगले क्षण तुम्हारा दूध का कटोरा झटकने
    मैं तुम्हें मार दूंगा

    मुझे मार डालो कि तुम सोचते हो मेरे साम्राज्य की ईंटें
    तुम्हारी अस्थियों पर खड़ी हैं
    कि मानते हो इस प्रासाद का रंग है तुम्हारे खून का रंग

    मुझे मार डालो इसलिए भी कि मैं तुम्हें मारता रहा हूँ
    साल पीढ़ी सदी तक
    इसलिए भी कि अनुमान है तुम्हें कि यह वक़्त तुम्हारा है

    मुझे मार डालो मेरे अलग लिंग के लिए
    इसलिए कि हमारे अंग एक प्राकृतिक खांचे में अब फिट नहीं बैठते
    कि मुझे अब ज्यादा चाहिए

    मुझे मार डालो एक तर्क पर कि सारे तर्क तुम्हारे हैं
    तंत्र तुम्हारा है कि
    अतार्किक तरीके से मार डालो मुझे
    मुझे मार डालो कि तुम्हें नहीं है इस तंत्र पर यकीन

    सब सबको मार डालो.

  • चाय या दोस्ती की मिठास

    ख़त्म हो चुके चाय के कप के
    तलों में बची कुछ बूँद चाय
    अब ऐसी ही मित्रता है
    कुछ बेहतरीन शख्सियतों की
    ‘मेरे लिए’
    कभी ये दोस्ती की चाय का कप
    था लबालब,
    गर्मजोशी ऐसी, जैसे भाप उगलता कप
    हर पल सुगंध ऐसे जैसे
    चाय के साथ इलायची की अलबेली सुगन्ध
    मित्रता में रिश्ते का छौंक व
    जिंदादिली से भरपूर मिठास
    हर सिप को जिया है !!
    खैर ! कप के चाय की अंतिम बून्द
    शायद सूख चुकी या सूखने वाली है
    पंखा भी तो पांच पर चल रहा !
    फिर भी
    दोस्ती जिंदाबाद के नारे के साथ
    ऐसे लिखते हुए भी
    उम्मीद कर रहा है
    फिर से एक और चाय का कप ।
    मौसम की आद्रता बचाये रखेगी
    चाय या दोस्ती की मिठास
    समझे न !
    उम्मीद ही अहमियत है ! https://karensingermd.com