Category: आपके आलेख

  • निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

    निजता की बहस पर एक सार्वजनिक सवाल

    हर साल बाढ़ से बेघर हुए
    लाखों लोग
    राहत शिविरों में पैदा होते बच्चे 
    हेलिकॉप्टर से फेंके गए खाने के पैकेट
    को धक्का मुक्की कर लूटने को अभिशप्त
    बच्चे जवान और बूढ़े
    ज़िला अस्पताल के गलियारों में
    अधमरे सोए कातर निगाहों से टहलते कुत्तों को देखते
    मरीज़ और उनके अस्वस्थ परिचारक
    भावी इतिहास हमारा है
    जैसे नारों से दूर बहुत दूर
    अनिश्चित वर्तमान में डूबे हुए
    पूरी तरह सार्वजनिक है उनकी निजता
    और उनका स्वाभिमान दुख व दर्द
    उनके लिए निजता पर
    महान अदालत का महान निर्णय
    कुछ नहीं बस
    एक मध्यवर्गीय परिकल्पना है
    खाए-अघाए प्राणियों की आख़िरी कल्पना है
    जिसपर अपने घर के दरवाज़े बंद कर
    महफ़ूज़ होकर सोने वाले
    खुलकर सार्वजनिक बहस करते हैं
     

    Kumar Vikram
     
  • भारत और जापान का सभ्यता बोध –Sanjay Jothe

    भारत और जापान का सभ्यता बोध –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    जापानी टेक्नोलॉजी और अर्थव्यवस्था की बात अक्सर ही की जाती है। जो सवर्ण द्विज हिन्दू जापान यूरोप अमेरिका आदि आते जाते हैं वे बड़ी होशियारी से वहां के समाज और सभ्यता की विशेषताओं को छिपाते हुए वहां की तकनीक विज्ञान मौसम भोजन आदि की बातें करते पाए जाते हैं. बहुत हुआ तो वे वहां के सेक्स संबंधी खुलेपन और शराब पीने के व्यवहार या परिवार के टूटने और बड़ों और बच्चों में पैदा हुए जेनेरेशन गैप की बात करते हैं. लेकिन वे पूरी सावधानी बरतते हैं कि अमेरिका यूरोप जापान आदि विकसित और सभ्य देशों की सामाजिक संस्कृति वहां के मानवता बोध, सभ्यता बोध आदि का कोई उल्लेख न हो. उन्हें पता है की अगर वे ऐसी बातें करेंगे तो अपने खुद के समाज, देश और धर्म की जहालत की पोल खुल जायेगी.

    अगर भारतीय जनता सभ्य देशों के सामाजिक व्यवहार और अनुशासन सहित वहां की मानव गरिमा के बारे में सुनेगी तो एक बार जरुर पूछेगी की जिस देशों को भौतिकवादी कहकर गाली दी जाती है उनकी सभ्यता इतनी विक्सित है तो धर्मप्राण कहलाने वाले भारत में क्या समस्या है? यहाँ छुआछूत भेदभाव जातीय हिंसा और इतनी अनैतिकता भ्रष्टाचार आदि क्यों है?

    हमारी मित्र “सम्यक संकल्प” ने अपने जापान दौरे के अनुभव को विस्तार से लिखा है. मैं हूबहू उनका लेखन यहाँ दे रहा हूँ. आप देख सकते हैं की जो समाज विज्ञान तकनीक या आर्थिक आयाम में सशक्त हुए हैं उनकी सभ्यता और सामाजिकता बोध, नैतिकता बोध ने भी काफी विकास किया है. वे समाज पहले सभ्य बने हैं उसके बाद तकनीकी या आर्थिक रूप से मजबूत हुए हैं. भारतीय धर्म-धूर्त और सवर्ण द्विज पाखंडी हमेशा ये समझाते हैं की भारत का धर्म और नैतिकता सबसे ऊँची है, उसे वहीं का वहीं बनाये रखते हुए इन्हें साइंस और टेक्नोलोजी का विकास करना है. ठीक यही तर्क पाकिस्तान, अफगानिस्तान सहित अन्य इस्लामिक मुल्कों में दिया गया है. नतीजा साफ़ है. ये मुल्क न तो विज्ञान तकनीक सीख पाए न ही इंसानियत सीख पाए. मोबाइल से लेकर मिसाइल तक और लोकतंत्र से लेकर प्रबंधन तक हर एक चीज यूरोप अमेरिका जापान जैसे सभ्य समाजों से उधार ले रहे हैं.

    नीचे जापानी समाज की एक ख़ास विशेषता पर हमारी मित्र “सम्यक संकल्प” ने विस्तार से लिखा है  जापानी समाज में गर्भवती स्त्री के संबंध में वहां का सभ्य समाज और सरकारी तन्त्र कैसे काम करता है इसे गौर से पढ़ें और सोचें कि भारत इस मुद्दे पर कहाँ ठहरता है. इसी से तुलना कीजिये कि भारत का धर्म, संस्कृति और सभ्यता बोध की क्या हालत है.

    “गर्भवती होते ही माता को इसकी सूचना अपनी नगरपालिका या वार्ड कार्यालय को देनी होती है और उसे माता और शिशु की देखभाल संबंधी निर्देश पुस्तिका दी जाती है। इसमें सरकार द्वारा दी जाने वाली सुविधाओं का विवरण होता है। इसमें गर्भवती महिला की प्रत्येक जाँच का विवरण भी अंकित किया जाता है।

    शिशु के जन्म के बाद के उसके पालन-पोषण के लिए अलग से अनुदानों का प्रावधान है। यदि परिवार में चार सदस्य हों और उनकी कुल वार्षिक आय 2396000 येन (लगभग १२ लाख रुपये) से कम हो तो शिशु के तीन वर्ष का होने तक, पहले और दूसरे शिशु के लिए 5 हजार येन प्रतिमाह और तीसरे बच्चे के लिए 10 हजार येन प्रतिमाह अनुदान दिया जाता है। यदि परिवार की आय इससे अधिक हो और माता या पिता में से कोई भी राज्य या व्यावसायिक प्रतिष्ठान का कर्मी हो और उसकी वार्षिक आय 4178000येन(बीस लाख रुपये) से कम हो तो उसे राज्य सरकार या प्रतिष्ठान द्वारा अलग से इतना ही पालनपोषण भत्ता अनुमन्य है।

    पिता की मृत्यु अथवा माता का विवाह-विच्छेद होने पर, बच्चे के लिए अठारह साल की अवस्था तक और विकलांगता की स्थिति में बीस वर्ष की अवस्था तक प्रतिमास पूर्ण भत्ता 41390 येन और आंशिक भत्ता 27690 येन अनुमन्य है। दूसरे बच्चे के लिए 5000 येन और तीसरे बच्चे के लिए 3000 प्रति येन अलग से दिया जाता है।

    यदि बच्चा विकलांग हो, और परिवार की कुल आय 7410000 येन से कम हो तो अधिक विकलांगता की स्थिति में 50350 येन, और कम विकलांगता की स्थिति में 33530 येन प्रतिमास अनुदान अनुमन्य है। यदि परिपालक पिता न होकर अभिभावक हो और उसकी कुल वार्षिक आय 9041000 येन से कम हो और परिवार में 6 सदस्य हों तो उसे भी यह अनुदान अनुमन्य है।

    घर आकर नवजात शिशुओं की जाँच करने के लिए अलग से नर्सों की नियुक्ति की गयी है। प्रत्येक मुहल्ले में एक स्वयंसेवी शिशु आयुक्त नियुक्त है जो गर्भवती माताओं और शिशुओं के बारे में जानकारी लेता रहता है और उन्हें आवश्यक निर्देश देता है। यही नहीं जिनके माता पिता देर से घर लौटते हैं उनके लिए स्कूलों में अलग से मनोरंजन, क्रीड़ा और जलपान की व्यवस्था है।

    जापान में गर्भवती महिलाओं के लिए विशेष सुविधाएँ हैं। प्रत्येक महिला को प्रसव से पूर्व आवश्यक जाँच हेतु अस्पताल आने-जाने के लिए तीस हजार येन (१५ हजार रुपये) के कूपन, प्रसव में अस्पताल के परिव्यय के लिए 6लाख येन (तीन लाख रुपये ) तथा शिशु के जन्म के बाद उसके वस्त्रादि के लिए पुनः तीस हजार येन के कूपन दिये जाते हैं।

    यही नहीं, यदि माता-पिता अल्प-आय वर्ग चौबीस लाख येन ( बारह लाख रुपये) प्रति वर्ष से कम आय वर्ग के हों तो शिशु के वस्त्रादि के लिए प्रतिमास अलग से अनुदान दिया जाता है। जन्म के दो सप्ताह बाद शिशु के स्वास्थ्य की जाँच के लिए अस्पताल से एक नर्स घर आती है। दस वर्ष की अवस्था का होने तक सभी बच्चों की चिकित्सकीय जाँच और औषधियाँ की व्यवस्था सरकार द्वारा की जाती है। इसमें माता-पिता की राष्ट्रीयता पर विचार नहीं किया जाता।

    वस्तुतः जापान के संविधान के अनुच्छेद 25 में प्रत्येक नागरिक को रहन-सहन के न्यूनतम स्तर की गारंटी दी गयी है। इस अनुच्छेद के अधीन माता और शिशु के कल्याण के लिए अनेक प्राविधान किये गये हैं। इन प्राविधानों के मूल में जनसंख्या के अनवरत ह्रास को रोकने के साथ-साथ एक स्वस्थ समाज के निर्माण का संकल्प भी है। जापान के स्वास्थ्य मंत्रालय की सूचनाओं के अनुसार जापान में 1960 में बाल-मृत्यु दर 30.7 और जन्मना मृत शिशुओं की दर 17 प्रति हजार थी। यह 1994 में घट कर क्रमशः 4.2 और 2.3 प्रति हजार हो गयी। इसमें जापान सरकार की स्वास्थ्य-नीति के निम्नलिखित प्रावधानों का महत्वपूर्ण योगदान है।

    यदि कोई शिशु जन्म के समय 2.5 कि.ग्रा. से कम हो अथवा समय से पहले पैदा तो ऐसे बच्चों की नियमित जाँच के लिए बुलाने पर नर्स की सेवाएँ निःशुल्क उपलब्ध हैं। इसके अलावा माता और शिशु के लिए अलग से चिकित्सा भत्ता दिया जाता है। विकलांग अथवा क्षयग्रस्त बच्चों के लिए विशेष सुविधाएं और गर्भवती माताओं की चिकित्सकीय जांच आदि के लिए विशेष अनुदान दिया जाता है”

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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  • विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है –Sanjay Jothe

    विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    विज्ञान, तकनीक और इंजीनियरिंग मेडिसिन मैनेजमेंट आदि पर अधिक जोर देकर और ह्यूमेनिटीज, सोशल साइंस को कुचलकर असल मे वर्ण व्यवस्था को वापस लाया जा रहा है।

    वर्ण व्यवस्था को ज्ञान के कुप्रबंधन या ज्ञान की हत्या के अर्थ में देखिये। समाज की बुद्धि और चेतना को नियंत्रित करने वाला जो आयाम है वो धर्म, सँस्कृति, इतिहास, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि है।

    समाज विज्ञान विषयों की चेतना से युक्त या इससे वंचित समाज को जीते रहने के लिए जो तकनीकी या प्रबंधकीय ज्ञान चाहिए उतना वे कहीं से भी उधार ले आते हैं। इस तरह युध्द, सैन्य, व्यापार, टेक्नोलॉजी, चिकित्सा, प्रबंधन आदि को दूसरे देशों से आयात करने में किसी को कोई खतरा नहीं। इसमें कोई शर्म की बात भी नहीं है।

    यही भारत ने अपने ज्ञात इतिहास में किया है। क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र ने दैनिक जीवन की तकनीकी और प्रबंधन संबन्धी विशेषज्ञताओं को विकसित किया है या कहीं से उधार लिया है। लेकिन समाज को सभ्यता, सँस्कृति, नैतिकता और इंसानियत की तरफ आगे बढ़ाने के लिए जो सबसे जरूरी आयाम था उस पर अन्धविश्वासी और धर्म-धूर्त ब्राह्मणों ने कब्जा कर रखा है। उन्होंने इस ज्ञान को अपने स्वार्थ के कारण विकसित ही नहीं होने दिया. वैज्ञानिक चिन्तन, आलोचनात्मक चिंतन और भौतिकवादी इतिहास दृष्टि को उन्होंने बार बार कुचला और बर्बाद किया है।

    यहाँ तक कि भारत के निचले तीन वर्णों की तकनीकी या प्रबंधकीय कुशलता का स्वयं उन्हें या देश को कोई लाभ नहीं मिल सका है। व्यापक रूप से गरीबी, कायरता, आलस्य, बेरोजगारी और गुलामी हमेशा बनी रही है। भारत ज्ञात दो हजार साल में युद्ध, ज्ञान विज्ञान, सभ्यता, नैतिकता आदि के मुद्दों पर निरन्तर पिछड़ता और हारता ही रहा है।

    इसका एक ही कारण है। वो है “तकनीकी और प्रबंधकीय ज्ञान से कहीं ऊंचे और महत्वपूर्ण सामाजिक दार्शनिक ज्ञान पर ब्राह्मणों का कब्जा”।

    अगर धर्म, दर्शन, इतिहास, समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा आदि के ज्ञान पर किन्ही विशेष लोगों का कब्जा है तो वे आपकी तकनीकी, वैज्ञानिक, प्रबंधकीय, चिकित्सीय, गणितीय, सैन्य आदि सब तरह की क्षमताओं का इस्तेमाल अन्धविश्वास को बढाने में और दंगा फैलाने में करते रहेंगे।

    यही भारत का इतिहास रहा है। अभी भी आपकी आंखों के सामने यही दोहराया जा रहा है।

    क्षत्रिय की सैन्य कुशलता और वैश्य या शूद्र की प्रबंधकीय कुशलता आपस में मिलकर भी इस देश को भुखमरी और गुलामी से नहीं बचा सकी। क्योंकि देश, समाज को दिशा देने वाली सांस्कृतिक, दार्शनिक, वैचारिक बहस का नियंत्रण इनके हाथ मे नहीं बल्कि ब्राह्मणों के हाथ मे था। आज अभी अगर आप बहुजनों, दलितों, स्त्रियों, गरीबों, मजदूरों के हक में विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, सैन्य, चिकित्सा आदि का लाभ सुनिश्चित करना चाहते हैं तो आपको ह्यूमेनिटीज यानी सामाजिक विज्ञानों का नियंत्रण अपने हाथ मे लेना होगा।

    भारत के बहुजनों, दलितों, आदिवासियों, ओबीसी और स्त्रियों को सामाजिक विज्ञानों, दर्शन, भाषा, साहित्य आदि को अपने हक में मोड़ना सीखना होगा। इन विषयों पर अधिकार निर्मित करना होगा। जो कौम अपनी भाषा, इतिहास, दर्शन, साहित्य, समाज शास्त्र और सँस्कृति का विमर्श अपनी बुद्धि से आगे नहीं बढ़ा सकती वो विज्ञान, तकनीक, प्रबंधन, चिकित्सा आदि सीखकर भी भारत, पाकिस्तान, अफगानिस्तान की तरह गुलाम ही रहती है।

    भारत के बहुजनों को अपनी ऐतिहासिक पराजय और गुलामी को इस नजर से देखना चाहिए और ह्यूमेनिटीज या सामाजिक विज्ञान विषयों को गंभीरता से लेना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि बहुजन समाज से आने वाले लोग इन विषयों पर खूब लिखें, खूब पढ़ें और अपनी खुद की जरूरतों के हिसाब से नए नए विमर्श पैदा करें।

    विज्ञान या तकनीक खुद से कोई विमर्श पैदा नहीं करते बल्कि पहले से उपलब्ध सामाजिक राजनीतिक या दर्शनिक विमर्शों की सेवा करते हैं।

    जो सभ्य समाज आज विज्ञान, तकनीक प्रबंधन आदि के ज्ञान से लाभ उठा रहे हैं और एक सकारात्मक दिशा में आगे बढ़ पा रहे हैं उन देशों समाजों को गौर से देखिये. उन्होंने पहले अपने समाज विज्ञान, साहित्य, भाषा, इतिहास और दर्शन आदि के ज्ञान को दुरुस्त किया है. अपने समाज में मानविकी विषयों की बेहतर शोध और समझ को विकसित किया है इसीलिये वे विज्ञान तकनीक आदि को सही दिशा में इस्तेमाल कर पा रहे हैं।

    इसके विपरीत भारत पाकिस्तान अफगानिस्तान सीरिया आदि देशों में जहां अपने सामाजिक विज्ञान अपने साहित्य इतिहास दर्शन आदि की समझ के विकास को रोका गया है वहां के समाज विज्ञान तकनीक आदि को अपनी ही जनसंख्या के हित के लिए इस्तेमाल नहीं कर पा रहे हैं. इस “उधार ली गयी” विज्ञान और तकनीक से वे अपनी समस्याओं को बढा रहे हैं कम नहीं कर रहे हैं।

    इसका सीधा मतलब ये हुआ कि विज्ञान और तकनीक जिस तरह के मनोविज्ञान और सामाजिक, मानसिक प्रौढ़ता से पैदा होते हैं वैसा सामाजिक मनोविज्ञान और वैसी सामाजिक प्रौढ़ता पैदा किये बिना अगर किसी समाज को विज्ञान, तकनीक और प्रबन्धन आदि का ज्ञान उधार में मिल जाए तो वो उस ज्ञान से आत्मघात कर लेगा. यही भारत पाकिस्तान जैसे मुल्कों ने किया है।

    इस विषय में केन विल्बर्स नामक एक अमेरिकी दार्शनिक ने कहा है कि “तीसरी दुनिया के वे देश जिन्होंने अपनी जमीन पर सामाजिक मुक्ति की लड़ाई नहीं लड़ी है उन्हें अगर पश्चिमी टेक्नोलोजी सिखा दी जाए तो वे उसे सही दिशा में इस्तेमाल नहीं कर पाते हैं”. किसी विज्ञान या तकनीक को कैसे और किस दिशा में इस्तेमाल करना है ये बुद्धि सामाजिक विज्ञानों की दर्शन, साहित्य,इतिहास आदि की समझ से आती है. और ये समझ भारत पाकिस्तान जैसे गरीब मुल्कों में पैदा ही नहीं हो पा रही है।

    विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि आपके हित में काम करेंगे या आपके खिलाफ काम करेंगे, ये इस बात पर निर्भर करेगा कि मानविकी और समाज विज्ञान का नियंत्रण किसके हाथ मे है। अगर ये नियंत्रण बहुजनों के हाथ मे है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि भारत के पंचानवे प्रतिशत लोगों के हित में काम करेगा। अगर ये नियंत्रण भारत के बहुजनों के हाथ मे नहीं है तो विज्ञान, तकनीक, प्रबन्धन आदि की ये विशेषज्ञताएँ पांच प्रतिशत धर्मधूर्तों की सेवा करेंगी।

    भारत के बहुजन तय कर लें कि वे क्या चाहते हैं।

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    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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  • सामूहिक नेतृत्व बनाम गरियाने की आजादी

    सामूहिक नेतृत्व बनाम गरियाने की आजादी

    Nishant Rana


    हमें अपने खांचे इतने पसंद है कि जो हमारे खांचों में फिट बैठता है बस वहीं भगवान का दूसरा रूप है जो हमारे खांचों से अलग है उसे केवल इसलिए गालियां देंगे की हमारे खांचे वाला ऊपर दिखाई दे।
    आजादी के समय सबका योगदान था भगत सिंह, आजाद , गांधी , अम्बेडकर , नेहरू , सुभाषचंद्र आदि आदि। इन सभी को आज खेमे में बांट दिया गया है अलग अलग खेमों द्वारा गरियाया ही जाता है प्रेमचंद, टैगोर आदि को भी नहीं बख्शा जाता केवल इसलिए कि वह सब आपकी पसंद के हिसाब से काम क्यों नही कर रहे थे, भले ही हम खुद तमाम मकड़ जालों में फंसे हो , एक निश्चित पैटर्न में जीवन जी रहे हो, अपने ही स्वार्थ, सुरक्षा , सुविधाओं के लिए जीवन बिता रहे हो और वह सब इसलिए जब कभी कभार हमारा अंतर्मन हमें धिक्कारता है तो हम तुरन्त अपनी जिम्मेदारी किसी दूसरे पर डाल देना चाहते है, अपना पल्ला दूसरों पर झाड़ लेने से खुद को जिम्मेदार ठहराने वाली ऊर्जा से कुछ समय के लिए मुक्ति या शांति तो मिल ही जाती है।

    चलते चलते –

    हर व्यक्ति के जीवन के अलग अलग घटना क्रम है , अलग अलग परिस्थितियां है, हर व्यतित्व का विकास अलग है, अलग अलग काम करने के तरीके है ,  अलग अलग क्षेत्रों में रुचि व प्रतिभा है। जिस व्यक्ति की जैसी समझ और तासीर बनती जाती है उसी के हिसाब से जीवन जीता है जो जिसे उचित लगता है उसी समझ से सामाजिक योगदान भी करता है। कोई नेतृत्व अच्छा करता है , कोई लिखता अच्छा है, किसी का सामाजिक चिंतन बहुत गहरा है किसी का वैज्ञानिक पक्ष मजबूत है। हां हर जीवन के असर, संदेश बहुत सीमित से लेकर बहुत व्यापक हो सकते।
    कोई व्यक्ति भगवान भी नहीं है, समय जीवन भी निश्चित ही है जिसकी जैसी समझ थी उसने अपना जीवन होम करके देश समाज के लिए काम किया। हम कब देखेंगे कि समाज एक व्यक्ति नहीं बनाता यह मिलजुल कर बनता है। हम कब खांचों से मुक्त होकर वाकई अपनी जिम्मेदारी समझेंगे कब इन लोगों को अलग अलग गरियाने के बजाय इनके सामूहिक नेतृत्व से सीख लेंगे।

    स्वतंत्रता दिवस की शुभकामना के साथ बस इतना ही कि आजादी, लोकतंत्र कोई एक दिन या एक बार की विषय-वस्तु नहीं है। रोने की भी नहीं की है  यह प्रत्येक मनुष्य की जिमेदारी है की जितना हमारे पूर्वज हमारे लिए परिस्थितियां जितनी सुगम बना कर गए हम अगली पीढ़ियों को बेहतर लोकतांत्रिक मूल्य और समाज देकर जाए।

     

  • सरदार सरोवर का सार संक्षेप

    सरदार सरोवर का सार संक्षेप

    Vijay Manohar Tiwari

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    Medha Patkar

    मेधा पाटकर को आखिर क्या चाहिए? तीन दशकों से यह औरत सड़कों पर है। हरसूद में 1989 की रैली के समय पहली बार मेधा का नाम देश के स्तर पर सुना गया था। वे इंदिरा सागर बांध की डूब में आ रहे गांवों के मसले को लेकर हरसूद आई थीं। एक बड़ी रैली में देश भर के हजारों सामाजिक कार्यकर्ताओं समेत कई जानी-मानी हस्तियां यहां जुटी थीं। इनमें मेनका गांधी, बाबा आमटे, सुंदरलाल बहुगुणा और वीसी शुक्ला वगैरह भी थे। हरसूद को हर हाल में बचाने के संकल्प की याद में एक विजय स्तंभ वहां स्थापित किया गया था। वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह तब इंडिया टुडे में थे। दो पेज की उनकी स्टोरी का हेडलाइन था-हार न मानने वालों का हौसला!

    बाद में मेधा बेसहारा विस्थापितों की आवाज बन गईं। विकास की परियोजनाओं की चपेट में आकर बेदखल हो रहे लोगों ने उन्हें हर कहीं अपने बीच पाया। शहरों की गंदी बस्तियों में रहकर अपनी आजीविका कमा रही आबादी हो या गांव-पहाड़ों में खदानों और हाईवे के निर्माण से उखड़ने वाले गुमनाम लोग। मेधा ऐसी हर जगह पर पहुंची, जहां मानवीय विस्थापन सरकार के अमानवीय तौर-तरीकों का शिकार बना। तीस साल से नर्मदा बचाओ आंदोलन उनकी पहचान ही बन गया। नर्मदा घाटी में बन रहे बांधों की श्रृंखला ने थोक के भाव में गांव और आबादी बेदखल की। हरसूद जैसी बड़ी बस्ती समेत करीब ढाई सौ गांव इंदिरा सागर में समा गए। निसरपुर जैसे कस्बे के साथ करीब 190 गांव सरदार सरोवर की डूब में हैं। एक बांध मध्यप्रदेश में है। दूसरा गुजरात में। मगर पूरी डूब मध्यप्रदेश की है। ये हजारों करोड़ रुपए की लागत के पावर प्रोजेक्ट हैं, जिनसे पैदा होने वाली बिजली और जलाशयों का पानी बेतहाशा बढ़ती आबादी के लिए बेहद जरूरी है। इनमें सरकारों की पूरी ताकतें लगी हैं। पार्टियां कोई भी हों।

    मैं 2004 से इस मसले से लगातार जुड़ा हूं। हमने हरसूद को बहुत करीब से देखा। अब बड़वानी भी देख लिया। इस बीच मध्यप्रदेश में व्यवस्था परिवर्तन का नारा बुलंद करके सत्ता में आई बीजेपी की सरकारें ही रहीं। केंद्र में ज्यादा समय यूपीए का झुंड था, जिसे 2014 में नरेंद्र मोदी ने उलट दिया। एक राज्य के दो सौ-ढाई सौ गांवों का दो बार में दस साल के भीतर डूबना किसे कहते हैं? शायद ही किसी राज्य के हिस्से में ऐसी मुसीबत आई हो। बांध सरकार की जरूरत हैं, उससे ज्यादा जिद हैं। मगर इससे जुड़ा मानवीय विस्थापन का सवाल उनके लिए उतना ही मायने नहीं रखता। जबकि सबसे अधिक मानवीय संवेदना की दरकार रखने की जहां जरूरत थी, वहां सरकार की भ्रष्ट मशीनरी ने दोनों मौकों पर क्या किया?

    यह काम बहुत बेहतर ढंग से बहुत आसानी से हो सकता था। 2004 में इंदिरा सागर बांध के कारण जो हालात सामने आए थे, बेशक उसके लिए बहुत हद तक दिग्विजयसिंह जिम्मेदार थे, जिन्होंने दस साल सत्ता में रहकर भी वहां कुछ खास नहीं किया और जब बांध अपनी पूरी ऊंचाई पर बनकर खड़ा हुआ तब होश फाख्ता हुए नई मुख्यमंत्री उमा भारती के। मगर वे ज्यादा समय सत्ता में नहीं रहीं। थोड़े समय बाबूलाल गौर मुख्यमंत्री रहे और फिर एकछत्र राज करने के लिए तकदीर ने शिवराजसिंह चौहान का दरवाजा खटखटाया। उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी पर 12 साल पूरे हुए। यह एक युग की अवधि है।

    आज जो कुछ भी सरदार सरोवर बांध के डूब क्षेत्र में मचा है, उसके लिए बिल क्लिंटन, सद्दाम हुसैन या मुअम्मर गद्दाफी जिम्मेदार नहीं हो सकते। जब सरदार सरोवर के विस्थापितों को मुआवजे बट रहे थे, तब इंदिरा सागर के विस्थापन-पुनर्वास की नाकामी का स्वाद बखूबी चखा जा चुका था। पूरी सरकारी मशीनरी की क्षमता और कारनामे उजागर हो चुके थे। एक सबक सीखने के लिए 13 साल कम नहीं होते, बशर्ते मन में वाकई व्यवस्था परिवर्तन की गहरी चाह हो। चुनाव जीतना और बात है, मगर ऐसी कोई चाहत मध्यप्रदेश सरकार में कभी किसी मुद्दे पर दिखाई नहीं दी। वर्ना शिवराजसिंह चौहान चाहते तो सरदार सरोवर के विस्थापन और पुनर्वास को इसी 36 सौ करोड़ रुपए में दुनिया का सर्वश्रेष्ठ मॉडल बना सकते थे। उन्हें पूरा काम अपने हाथ में रखना ही था। लगातार उन 88 स्थानों की मॉनीटरिंग करनी थी, जहां उनके अफसरों ने पुनर्वास के नाम पर 15 सौ करोड़ रुपए फूंके। जिस 900 करोड़ के स्पेशल पैकेज का तोहफा देने के बावजूद इस समय विस्थापितों की गालियां मिल रही हैं, यह रकम भी वहीं के विकास पर लगा देनी थी।

    सत्ता में आकर अपनों को कमाने के हजार मौके हैं। सिर्फ एक काम ईमानदारी से देश-दुनिया, राजनीतिक नेतृत्व और सरकारों के लिए नजीर बन जाए, इस सोच के साथ शिवराज अपने किसी भरोसेमंद बिल्डकॉन को ही यह जिम्मा दे देते कि निसरपुर समेत बाकी 88 स्थानों पर शानदार सुविधाओं से लैस टाउनशिप पूरी प्लानिंग से बनाई जाएं। बेहतर सड़कों के नेटवर्क से जुड़ी रिहाइशें, उनके कारोबारी कॉम्पलैक्स, बिजली, पानी, स्कूल, अस्पताल और संचार के साधन प्रदेश में सबसे उम्दा देते। नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण (एनवीडीए) का मुख्यालय आखिरी विस्थापित परिवार के अपने गांव में रहने तक धार और बड़वानी से ही काम करता, भोपाल में नहीं। ग्राउंड पर हर महीने एक रिव्यू सीएम की काफी होती। एक निजी एजेंसी अलग से हरेक हरकत की मॉनीटरिंग करती। एक टाइमलाइन तय होती। फर्जी रजिस्ट्री जैसे कारनामे करने वालों को हमेशा के लिए नौकरी से निकालती तो एक पैसा भी दलाली या रिश्वत में खाने के पहले बाकी लोग हजार बार सोचते।

    प्रदेश के मुखिया की ऐसी सक्रिय और विजनरी पहल उनका कद कई गुना बढ़ा देती। इस पूरे काम में नर्मदा बचाओ आंदोलन से मेधा पाटकर और उनकी टीम को भी जोड़ती। सुप्रीम कोर्ट में चीफ जस्टिस खेहर ने मेधा से कहा कि आप बताइए आप विस्थापितों के लिए क्या चाहती हैं, हम उससे ज्यादा के आदेश देने को तैयार हैं। यही अमृत वचन शिवराजसिंह चौहान दस साल पहले बोल देते तो बांध पर 17 मीटर के गेट लगने के पहले यह झमेला खड़ा नहीं होता। गांव के लोग खुशी-खुशी अपने नए घरों में शिफ्ट हो गए होते। पहले से शानदार व्यवस्थित और सुविधा संपन्न घरों को कौन ठुकराता, जहां अगले ही दिन से उनके पास करने को काम-धंधे होते, बच्चों को पहले से अच्छे स्कूल, अस्पताल मिलते?

    तब शिवराज सरकार प्रधानमंंत्री नरेंद्र मोदी को बुलाकर विकास का पर्व बड़वानी में मनाती। मैं दावे से कह रहा हूं कि यह संभव हो सकता था। अगर आंदोलन ही नर्मदा बचाओ का पैदाइशी मकसद है तो सरदार सरोवर के गांव ही मेधा और उनकी टीम को बाहर का रास्ता बता देते। कौन पहले से अच्छे घरों और पहले से अच्छे कारोबारी हालात में जाकर रहना नहीं चाहेगा। सिर्फ विजन चाहिए था। सख्ती चाहिए थी। अफसरशाही उसकी जगह पर होनी थी। ऐसा होता तो सरकार को बेशकीमती 13 साल गंवाने और 36 सौ करोड़ रुपए खर्च के बाद ऐसी लानतें न मिलतीं। यह हमारे राजनीतिक और प्रशासनिक नेतृत्व की आपराधिक भूल है, जिसका खामियाजा सरदार सराेवर के 193 गांवों के करीब 40 हजार परिवार इस वक्त भुगत रहे हैं!

    12 दिन के धरने के दौरान भी सरकार ने अपने कारिंदों पर ही भरोसा किया। मुख्यमंत्री एसपी-कलेक्टर को मेधा को मनाने के लिए भेजते रहे। फिर कोई भय्यूजी महाराज प्रकट हुए। मेरा मेधा को कोई समर्थन नहीं है। न किसी किस्म के विरोध में कोई रुचि है। मेधा और उनकी टीम पर यह तोहमतें लगती रही हैं कि वे विदेशों से आए पैसे के बूते पर हमारे विकास के प्रोजेक्ट के खिलाफ माहौल बनाती हैं। अगर ऐसा है तो भी क्या दिक्कत थी। अभी कश्मीर में विदेशी फंड की दम पर आतंक फैलाने वाले कई दगाबाज गिलानी-फिलानी अंदर हुए हैं। सरकार के पास अगर ऐसे कोई सबूत थे तो मेधा पाटकर की जगह चिखल्दा गांव के धरने पर नहीं, तिहाड़ में होनी चाहिए थी। सिरदर्द पैदा करने के लिए उन्हें क्यों खुला छोड़ा हुआ है?

    नर्मदा बचाओ आंदाेलन आज का नहीं है। तीस साल से ज्यादा हो गए घाटी में इस आवाज को गंूजते। बड़े बांधों के औचित्य की बहस बहुत बड़ी है लेकिन एनबीए की आवाज विस्थापन के तौर-तरीकों को लेकर ही गूंजती रही। उन्होंने काश्मीरी नौजवानों की तरह भारत के माथे पर पत्थर नहीं बरसाए, वे नक्सलियों की तरह भी पेश नहीं आए। वे अदालतों में गए। आरटीआई के जरिए असलियतें उजागर कीं। खंडवा, बड़वानी, भोपाल और दिल्ली में धरने-रैली करते रहे। नारे लगाते रहे। ज्ञापन सौंपते रहे। याचिकाएं बढ़ाते रहे। शिकायतें करते रहे।

    सिंहस्थ के समय तूफान आया तो मुख्यमंत्री शिवराजसिंह चौहान बांधवगढ़ नेशनल पार्क में अपने परिवार को छोड़कर रात में उज्जैन पहुंचे और परेशानहाल श्रद्धालुओं को अपने हाथों से चाय पिलाई। उनकी रहमदिली और सहजता के कायल कई हैं। भोपाल में ज्यादा बारिश ने जीना हराम किया तो सुबह सीएम पार्षदों से आगे निचली बस्तियों में दौड़ते दिखे। दस साल में जब भी फसलें चौपट हुईं शिवराज का हेलीकॉप्टर अनगिनत खेतों में उतरा। ऐसे हर स्पॉट से अखबारों में एक हेडलाइन रोचक जुमला ही बन गया, शिवराज ने कहा-मैं हूं न! गांवों के चौकीदारों से लेकर शहरों में काम करने वाली बाइयों तक शायद ही कोई तबका बचा होगा, जिसकी गुहार अपने सरकारी बंगले में पंचायत बुलाकर न सुनी हो। प्रमोशन में आरक्षण के लिए इतने प्रतिबद्ध दिखे कि सुप्रीम कोर्ट में महंगे वकील खड़े कर दिए।

    सरदार सरोवर बांध के 40 हजार विस्थापित परिवार किस हाल में हैं, वहां अफसर क्या कर रहे हैं, पुनर्वास स्थल रहने लायक हैं या नहीं, लोग वहां क्यों नहीं जा रहे, उनके कारोबार डूब तो नहीं रहे, वे कमाएंगे क्या, उनके मन में क्या है, सरकार सब कुछ अच्छा ही कर रही है तो वे नाराज क्यों हैं, हाईकोर्ट-सुप्रीम कोर्ट के चक्कर क्यों लगा रहे हैं, यह पूछने न वे गए और न ही उनका कोई काबिल मंत्री। वहां मेधा पाटकर गईं। 12 दिन धरने के बाद एक शाम बंदूकों-लाठियों से लैस तीन हजार पुलिस वालों ने उन्हें जबरन उठा लिया। दो दिन इंदौर के बांबे हास्पिटल में रखकर उन्हें धार जेल भेज दिया गया। डेढ़ महीने पहले किसान आंदोलन ने सरकार के 13 सालों के किए कराए पर पानी फेर दिया था। अब विस्थापितों की सुर्खियां रही-सही कसर पूरा कर रही हैं। मामला हाथ से निकल चुका है।

    2004 में हरसूद के हाल पर लिखी मेरी किताब 2005 में छपकर आई थी। इसके दस साल बाद एक फेलोशिप के तहत मुझे इंदिरा सागर बांध के इलाके में फिर जाने का मौका मिला। करीब एक साल तक मैंने हरसूद समेत खंडवा, हरदा और देवास जिले के कई पुनर्वास स्थल देखे और उन परिवारों में वापस गया, जो 2004 में बेदखल हुए थे। बहुत संतुलित भाषा का प्रयोग करते हुए मैं कहना चाहूंगा कि सरकार में आने के पहले हमारे ज्यादातर नेताओं को पता ही नहीं है कि उन्हें जनता के लिए करना क्या है? पार्टियों में उनकी ऐसी कोई ट्रेनिंग नहीं है कि ऐसे विकट हालातों में वे किस विजन और नीयत से पेश आएं। वे पार्टी में छोटे-मोटे पदों से होकर पंच-पार्षद बनते हुए विधायक और सांसदों के टिकट तक पहुंचते हैं। फिर तमाम तीन-तिकड़में और तकदीर उन्हें एक शपथ तक ले आती है।

    हमने देखा है कि नेताओं की इस राजनीतिक यात्रा में सफेद झूठ के साथ खरा पैसा पानी की तरह बहता है, जिसे जुटाने के लिए एक के बाद दूसरे और बड़े पद जरूरी होते हैं। जितना बड़ा पद, उतना बड़ा झपट्‌टा। सरकार में आने या पद के पाने का एकसूत्रीय कार्यक्रम बेहिसाब दौलत कमाना भर है। इसलिए सरकार में आते ही ये नेता पहले से सत्ता का मजा ले रहे उन घाघ अफसरों के चंगुल में जा फंसते हैं, जो एक बड़ी परीक्षा पास करके 30-35 सालों के लिए सिस्टम की छाती पर सवार होते हैं। ऐसी अफसरशाही के सहारे मूर्ख और लालची नेताओं को सत्ता का अवसर जन्नत जैसे अहसास में ले जाता है, जहां पीड़ित जनता की कराह भी वे अफसरों के मुंह से मधुर गीत के रूप में सुनते हैं। बड़ा पद उनके लिए दूल्हे के रूप में घोड़ी की सवारी जैसा है, जिस पर वे अगले पांच साल तक सवार रहेंगे। भाषण देंगे। घोषणाएं करेंगे। शिलान्यास, उदघाटनों की शोभा बढ़ाएंगे। किसी ठोस नतीजे या बदलाव की उम्मीद बेकार है, क्योंकि ज्यादातर के पास वैसा विजन ही नहीं है। नीयत भी नहीं है।

    मेरे मध्यप्रदेश में यही व्यापमं की सीख है, यही शिक्षा, स्वास्थ्य, परिवहन के खस्ताहाल इन्फ्रास्ट्रक्चर की इबारत है, यही बेमौत मर रहे किसानों से मिला सबक है और यही अब सरदार सरोवर का सार संक्षेप है!


    This article is republished with the permission of the writer. The originally published article could be read at,
    http://apniaayten.blogspot.com.au/2017/08/blog-post_10.html

  • ये युवक, या इनके जैसे युवक भारत मे कोई साइंस या तकनीक पैदा कर सकते  हैं? –Sanjay Jothe

    ये युवक, या इनके जैसे युवक भारत मे कोई साइंस या तकनीक पैदा कर सकते हैं? –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कररहे हैं।

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    कल ट्रेन में सफर के दौरान चार युवा इंजीनियर्स से बात करने का मौका मिला। चारों एक दूसरे से परिचित होते हुए अपनी पढ़ाई, कमाई, अनुभव, कम्पनी आदि का बखान कर रहे थे। जाहिर हुआ कि चारों देश की सबसे अच्छी सॉफ्टवेयर कम्पनियों में कार्यरत हैं, दो पुणे में एकसाथ है दूसरे दो मुम्बई एकसाथ काम करते हैं। अगली कुछ छुट्टीयों में चारो दिल्ली की तरफ जा रहे थे।

    बातचीत करते हुए हमने साथ मे चाय ली, उन्होंने उत्सुकता से मुझसे पूछा कि आप क्या करते हैं? मैंने उत्तर दिया कि मैं सोशल रिसर्च का काम करता हूँ। वे अधिक अंदाजा नहीं लगा सके और पूछने लगे कि इसमें क्या काम होता है और इसको करने से क्या फायदा होता है?

    उनकी दुविधा समझते हुए मैंने प्रतिप्रश्न किया कि आप बताएं कि कम्प्यूटर साइंस में क्या काम होता है और उससे क्या फायदा होता है? उन्होंने बताया कि कम्प्यूटर साइंस सब तरह के यांत्रिकरण, ऑटोमेशन और गणनाओं का आधारभूत टूल बन गया है, हर विषय मे हर काम में हर तरह की खोज में कम्प्यूटर की भूमिका बढ़ गयी है।

    मैंने पूछा कि कम्प्यूटर साइंस की जानकारी से आप क्या क्या समझ या समझा सकते हैं? वे बोले कि हम बता सकते हैं कि किस तरह के काम के लिए कैसा सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर लगेगा, कैसे काम किया जा सकता है। अधिक एफिशियंसी के लिए किस नई तकनीक का कैसे उपयोग हो सकता है इत्यादि।

    मैने उन्ही के उत्तर को आधार बनाते हुए कहा कि ठीक इसी तरह समाज विज्ञान है उससे हम बता सकते हैं कि कोई समाज सभ्यता, विज्ञान और तकनीक पैदा कर सकेगा या नहीं, या कि कोई समाज आने वाले समय मे सभ्य और अमीर होगा या और अधिक बर्बर या गरीब होता जाएगा?

    मैंने एक उदाहरण देते हुए बात रखी कि एक तरह से ये माना जा सकता है सोशल साइंस किसी देश मे समाज की वास्तविकता, उसकी समस्याओं, संभावित समाधानों और बदलाव के तरीकों की रिसर्च करता है। जैसे आपके कम्प्यूटर साइंस का अपना विस्तार है वैसे ही समाज विज्ञान भी है। वे समाज विज्ञान शब्द सुनकर चौंके, उन्हें समझने में दिक्कत हो रही थी कि समाज का अध्ययन विज्ञान कैसे हो सकता है? सामाजिक नियम, भोजन, रहन सहन, सामाजिक संरचना, परम्परा, जाति, वर्ण, धर्म आदि का अध्ययन विज्ञान कैसे हो सकता है?

    विज्ञान शब्द को तकनीक के अर्थ में समझने की उनकी ट्रेनिंग के कारण वे सामाजिक “विज्ञान” को समझ नहीं पा रहे थे। इसीलिये उन्हें यह भी अजीब लग रहा था कि इस “विज्ञान” पर पढ़े लिखे से नजर आने वाले ये सज्जन क्या काम करते होंगे?

    उन्होंने सीधे से पूछ लिया कि कोई उदाहरण देकर समझाएं कि इस तरह की रिसर्च में होता क्या है? मैंने उन्हें उन्ही के विषय मे समझाने की कोशिश करते हुए कहा कि समाज विज्ञान आपको यह बताता है कि किस तरह का समाज सभ्य, वैज्ञानिक और विकसित होगा और किस तरह का समाज असभ्य, गरीब और अवैज्ञानिक होता जाएगा। जैसी मैंने उम्मीद की थी वे गरीबी, सभ्यता, सँस्कृति आदि की बजाय विज्ञान में रुचि लेने लगे और पूछने लगे कि समाज विज्ञान किसी देश के भौतिक विज्ञान और तकनीक के विकास पर क्या जानकारी देगा? या भविष्यवाणी कर सकता है?

    ये विषय उनके पसन्द का था सो वे उत्सुकता से सुनने लगे। मैंने कहा कि सभी समाज विज्ञान और तकनीक को पैदा नहीं कर सकते, कुछ समाज दुसरो से बेहतर विज्ञान और सभ्यता की समझ रखते हैं इसलिए वे सारा विज्ञान और तकनीक पैदा करते हैं और शेष अविकसित असभ्य और पिछड़े समाजो को तकनीक और विज्ञान बेचते हैं। इसपर वे पूछने लगे कि कौनसे समाज विकसित और वैज्ञानिक हैं और कौनसे पिछड़े हैं?

    मैंने उदाहरण दिया कि बहुत मोटे तौर पर यूरोपीय, अमरीकन समाज जो कि आस्तिकता और धर्म की गुलामी से आजाद हो रहे हैं, उनको तुलनात्मक रूप से विकसित और वैज्ञानिक रुझान का माना जा सकता है और अरब, अफ्रीका, एशिया के वे सभी समाज जो किसी काल्पनिक ईश्वर और स्वर्ग नरक को मानते हैं उन्हें पिछड़ा हुआ माना जा सकता है।

    ये सुनते ही उन्हें धक्का लगा, वे कहने लगे कि वैसे तो भारत मे हमारा समाज भी आस्तिक है, धार्मिक है, ईश्वर और स्वर्ग नरक को मानता है तो क्या भारत पिछड़ा और असभ्य है? मैंने कहा कि इस बात को दूसरे ढंग से समझने की कोशिश करते हैं, क्या आपको लगता है कि सभ्यता, विज्ञान, संपन्नता और तरक्की का आपस में सीधा संबन्ध है?

    थोड़े विचार के बाद वे मानने को राजी हो गए कि सभ्य समाज ही अपने परिश्रम और साहस से वैज्ञानिक और अमीर हो सकता है। असभ्य समाज अंधविश्वासी गरीब और पिछड़े रहने को बाध्य हैं। इस सभ्यता का सीधा सबन्ध लोकतंत्र और सुशासन और विकास से कैसे जुड़ता है इसे वे थोड़ा थोड़ा देख पा रहे थे लेकिन धर्म और आस्तिकता से इसका संबन्ध बिल्कुल नहीं जोड़ पा रहे थे।

    मैंने पूछा कि जिन व्यक्तियों ने विज्ञान में मौलिक खोजे की हैं उनमे से अधिकतर लोग किस रुझान के थे? क्या वे ईश्वर स्वर्ग नरक, देवी देवता, आत्मा, पुनर्जन्म और इनसे जुड़े किसी तरह के कर्मकांड में भरोसा रखते थे या नास्तिक थे? उन्होंने कहा कि ज्यादातर लोग नास्तिक ही थे, लेकिन इसका ये मतलब नहीं कि वैज्ञानिक होने में ईश्वर आत्मा या कर्मकांड से कोई रुकावट पैदा होती है। वे सभी इस बात का दावा कर रहे थे कि धार्मिक, पूजा पाठी और श्राद्ध तर्पण आदि करते हुए भी वैज्ञानिक हुआ जा सकता है।

    मैंने कहा अगर ऐसा है तो फिंर आप ऐसे श्राद्ध तर्पण कर्मकांड करने वाले चार पांच वैज्ञानिकों और उनकी मौलिक खोजों के नाम बताइये। एक ने उदाहरण दिया कि रामानुजन हुए हैं जिन्होंने गणित में नई खोजें कीं। वे शाकाहारी, मन्त्रपाठी और कर्मकांडी ब्राह्मण थे। रामानुजन के अलावा वे किसी और का नाम न बता सके।

    मैंने पूछा कि इस कर्मकांड, शाकाहार और धर्म ने रामानुजन को मदद की या इसी ने उनकी जान ले ली? वे चौंके, बोले इस धर्म ने उनकी जान कैसे ली? क्या मतलब है आपका? मैंने कहा कि रामानुजन छुआछूत मानते थे वे ईसाई मांसाहारी रसोइए के हाथ का खाना नहीं लेते थे, सर्द मौसम में भी शराब या ब्रांडी नहीं पीते थे, सिर्फ अपने हाथ का पका दाल चावल खाते थे और पवित्रता की सनक ऐसी थी कि लंदन की सर्दी में भी दिन में कई कई बार नहाकर पूजा पाठ करते थे। कुपोषण और निमोनिया से उनकी मौत हो गयी। अब बताइये धर्म ने उन्हें फायदा किया या नुकसान किया? क्या धर्म और पूजा अर्चना ने उन्हें विज्ञान को आगे बढाने योग्य बनाया या उनकी हत्या कर दी? उनकी तरह रोज कर्मकांड करने वाले कितने लोग गणितज्ञ बने?

    इस सवाल पे वे एकदूसरे का मुंह ताकने लगे। लेकिन फिर भी वे स्वीकारे नहीं कर रहे थे कि धर्म और विज्ञान में विरोध का संबन्ध है। उनमें से एक युवक जिसके हाथ मे ढेर सारी अंगूठियां थी और लाल पीले धागे बंधे थे वो बोला कि धार्मिक और पूजापाठी लोगों ने भी साइंस और तकनीक बनाई है। हमारे ऋषि मुनि अपनी तकनीक के बल पर एक से दूसरे स्थान पर पहुंच जाते थे। उनके पास भी एटॉमिक टेक्नोलॉजी थी। वे पशु पक्षियों से भी बात कर पाते थे।

    इस पर उस युवक का मित्र बोला कि उसने भी महाभारत में पढ़ा है कि मन्त्र की शक्ति से लोग हवा में भी उड़ सकते थे। फिर वे चारों बताने लगे कि साउंड वेव्स बहुत ताकतवर होती हैं शायद प्राचीन काल मे हमारे ऋषि मुनियों के पास कोई टेक्नोलॉजी थी जिसके जरिये वे एक जगह से दूसरी जगह पहुंच जाते थे, मन्त्र के जरिये ब्रह्मास्त्र जैसे एटॉमिक मिसाइल जैसा कोई बम छोड़ सकते थे।

    अब चौंकने की बारी मेरी थी। अब तक जो युवक (इनमे से दो IIT से पढ़े हुए हैं) क्लाउड टेक्नोलॉजी, नैनो टेक्नोलॉजी और क्वान्टम कम्प्यूटर की बात कर रहे थे वे एकदम से तंत्र मंत्र और महाभारत कालीन एटॉमिक मिसाइल तक पहुंच गए।

    मैंने कहा चलो मान लिया कि महाभारत के समय में क्वांटम टेलीपोर्टेशन और एटॉमिक टेक्नोलॉजी थी। अब ये बताइये कि ऐसी टेक्नॉलोजी उन्होंने किस तरह के मकानों प्रयोगशालाओं या विश्वविद्यालयो में बैठकर बनाई होगी? किस तरह की धातु या प्लास्टिक आदि का इस्तेमाल किया होगा? इतनी उन्नत टेक्नोलॉजी को बनाने या चलाने के लिए उन्नत धातुविज्ञान, रसायन, कम्युनिकेशन, ट्रांस्पोर्टेशन, सड़कें, कार, ट्रेन मोटर वाहन आदि चाहिए या नहीं? लेकिन आपके ऋषि मुनि तो लकड़ी की खड़ाऊ पहनकर बिना सिले कपडे लपेटकर पैदल या बैलगाड़ी या घोड़े के रथ पर यात्रा कर रहे हैं? तीर कमान, गदा, तलवार फरसा आदि लेकर घूम रहे हैं। कागज या लैपटॉप की बजाय केले के या ताड़ के पत्तों पर लिख रहे हैं। ये कैसे सँभव है?

    अब उनके जवाब सच मे चकरानेवाले थे। एक युवक बोला कि हो सकता है कि उन्होंने अपने ज्ञान से ये समझ लिया हो कि ट्रांसपोर्ट, मोटर कार मशीनें आदि पर्यावरण के लिए खतरनाक है इसलिए वे “ईको फ्रेंडली” तरीके से जीते रहे हों। इसीलिए शायद उन्होंने बायो-डिग्रेडेबल मकान, यूनिवर्सिटी, रथ, सड़कें, कपड़े, बर्तन, आदि बनाये हो जिनके सबूत आजकल की खुदाई या पुरातत्व को नहीं मिलते। हो सकता है कि वे सादा जीवन उच्च विचार वाले लोग हों और ज्यादा सुविधापूर्ण मकान, यन्त्र आदि न बनाये हो, वे सिर्फ कंद मूल खाते रहे हों, एनर्जी और पर्यावरण को बचाते रहे होंगे।

    मैंने उनकी आंखों में झांकते हुए पूछा कि क्या आपको हकीकत में ये लगता है कि ऋषि मुनियों के पास ऐसी टेक्नोलॉजी रही होगी जिसका आज कोई सबूत कोई निशान तक नही है? वे चारों पूरे आत्मविश्वास से बोले कि ये एकदम सँभव है उन्होंने कुछ डॉक्यूमेंट्रीज के नाम गिनाए जिसने पिरामिड की टेक्नॉलिजी, माया सभ्यता, द्वारिका, सुमेरियन सभ्यता जैसी प्राचीन विकसित सभ्यताओ और उनकी तकनीकी उन्नति की बात की गई थी।

    मैंने अंत मे पूछा कि चलो मान लेते हैं कि ये सब तकनीक और साइंस ऋषि मुनियों के पास था, तो आज उनके वंशज विज्ञान तकनीक के मामले में यूरोप अमेरिका का मुह क्यों ताकते हैं? इसका जवाब और भयानक दिया उन्होने। वे बोले कि हम लोग अपने पुराने साइंस को भाषा को इतिहास को भूल चुके हैं, बीच के समय मे मुसलमानों, अंग्रेजों ने हमारे ज्ञान विज्ञान को नष्ट कर दिया। इसीलिए न हमारा विज्ञान बचा न तकनीक के कोई सबूत। इसीलिए हम दूसरों पर निर्भर हैं।

    इस चर्चा के बॉद मैं सोचता रहा कि ये उच्च शिक्षित मोटी तनख्वाह वाले शहरी युवा हैं या कि गांव के किसी मंदिर के सामने बैठे तोते वाले ज्योतिषी और पंडित हैं? मैं बार बार उनकी शक्लें और उनके महंगे मोबाइल और कपड़े जूते आदि देखता रहा। ऐसा लग रहा था जैसे कि चार पाषाण कालीन जीवाश्मों से बात कर रहा हूँ। फिर बार बार यही ख्याल आता रहा कि ये युवक, या इनके जैसे युवक भारत मे कोई साइंस या तकनीक पैदा कर सकते  हैं?

  • मेधा पाटकर का धरना, अमित शाह का आगमन और लोकप्रिय मामा!

    मेधा पाटकर का धरना, अमित शाह का आगमन और लोकप्रिय मामा!

    Vijay Manohar Tiwari

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    सियासत में अपनी कतई दिलचस्पी नहीं है। सुना ही है कि अमित शाह थोड़े दिन बाद भोपाल आ रहे हैं। वे तीन दिन राजधानी की शोभा बढ़ाएंगे। वे कई राज्यों में पार्टी और सरकारों की हालत पर बात करने के बाद अब मध्यप्रदेश का रुख कर रहे हैं। वे पार्टी कार्यालय में ही रहेंगे। किसी ने बताया कि एक राज्य के मुख्यमंत्री को उनके अफसरों ने तीन दिन प्रजेंटेशन देना सिखाया ताकि वे अपनी सरकार के प्रदर्शन को शाह के सामने स्क्रीन पर आंकड़ों, ग्राफ और चार्ट के माध्यम से समझा सकें। उनके अफसरों ने अपने बॉस के बेहतर प्रदर्शन के लिए खासी मशक्कत की।

    अमित शाह जब भोपाल आएंगे तो शायद उन्हें याद आए कि यहां पिछले दिनों किसान आंदोलन का जानलेवा शोर कितना कर्कश था। लाखों टन प्याज प्रबंधन का अफसरों के लिए मुनाफेदार मॉडल भी दूसरों को बताने की एक मिसाल हो सकता है। इनके अलावा कुछ ताजा हेडलाइन भी होंगी। जैसे-पुलिस ने मेधा पाटकर को अनशन से उठाया। उनके आने में दस दिन बीच में हैं। तब तक सरदार सरोवर के गांवों में क्या होगा, आज कहना कठिन है। इस सिचुएशन में मैं कहना चाहूंगा कि मध्यप्रदेश के अफसरों ने यहां के बच्चों के लोकप्रिय मामा के अच्छे प्रदर्शन के लिए कुछ अलग तरीके की तैयारी की हुई है। अपने काबिल अफसरों के प्रति शिवराज के भरोसे की दाद देनी होगी।

    मेधा पाटकर को अरेस्ट करने की खबर जब मिली, तब मैं पिछले 13 साल बाद हुए मध्यप्रदेश के दूसरे बड़े विस्थापन के इलाके से लौटा ही हूं। करीब एक हफ्ता वहां बिताया। मुझे 2004 का हरसूद याद आ गया। जैसा हरसूद, वैसा निसरपुर। हरसूद इंदिरा सागर डैम की डूब में सबसे आखिर में आया इकलौता शहर था। निसरपुर सरदार सरोवर बांध की डूब में व एक आखिर कोने में सबसे बड़ा कस्बा है। टीवी चैनल के समय साल भर तक हम हरसूद को लगातार कवर किए थे। एक किताब भी आई थी। तब भी सरकार बीजेपी की ही थी। नई सरकार की मुख्यमंत्री उमा भारती थीं। उनकी दम से बनी सरकार को एक साल भी नहीं हुआ था कि इंदिरा सागर बांध की लहरें हरसूद से टकराने लगीं। उमाजी के चेहरे से जीत की खुशी के रंग फीके भी नहीं पड़े थे कि सामने लंबा-चौड़ा बांध था। हरसूद खत्म हो गया। उसके खत्म होते-होते तिरंगे में तूफान आया। उमा भारती बह गईं। सत्ता से भी, संगठन से भी। अब निसरपुर में खड़े होकर देखें तो उस पार गुजरात में सरदार सामने है-सरदार सरोवर। 17 मीटर के गेट उस जल सिंह के माथे का चमचमाता ताज हैं। यहां तक पानी आने का मतलब निसरपुर तक डूब।

    नर्मदा बचाओ आंदोलन का कहना है कि 40 हजार प्रभावित परिवार हैं। सरकार कहती है कि भूल जाओ, आप 38 हजार थे। फिर नए सर्वे में 23 हजार ही रह गए थे। अब हमारे पास सिर्फ 7 हजार ऐसे हैं, जिनका पुनर्वास करना है। ये आंकड़ों का चक्कर दिलचस्प है। 1992 में पहली बार सर्वे हुआ कि सरदार सरोवर में कितने गांव और लोग डूबेंगे? तब न सरदार सरोवर बांध था और न इसका पेट भरने वाला इंदिरा सागर बांध था। जब दोनांे बन चुके तब 2008 में एक नया सर्वे नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी ने कराया। पहले सर्वे में 193 गांवों के 38 हजार परिवार डूब में थे। दूसरे में 23 हजार बचे तो बाकी 15 हजार को नमस्कार करते हुए शुभ सूचना दी गई-श्रीमान आप यहीं रहिए। आप नहीं डूब रहे। मुबारक हो।

    गांव वालों के लिए नहीं डूबने की यह खबर गुड न्यूज क्यों नहीं थी, यह जानने के लिए निसरपुर में ही आइए। 28 परिवार हैं। पहले पूरे डूब में थे। फिर 365 परिवारों को डूब में नहीं माना गया। अब ये डूब से बाहर हुए लोग कह रहे हैं कि अब चारों तरफ से पानी से घिरकर कैसे काम चलाएंगे। अफसरों ने खुश होकर बताया कि नाव से आ-जा सकते हैं। रोचक बात यह कि बचे हुए 15 हजार लोग भी मुआवजा पा चुके हैं। कोई बात नहीं पैसा तो हाथ का मैल है। जनता का ही है। यह रकम अपने पास रखिए। बस शुक्र मनाइए कि आप डूबने से बच गए! अब इनकी लड़ाई यह है कि हमें डूब में मानिए।

    मुआवजे से ज्यादा अहम पुनर्वास का मामला है। मुआवजा तो उसका एक मामूली हिस्सा है। तो डेढ़ दशक पहले मिला मुआवजा यहां-वहां खर्च हो गया। कुछ लोगों ने ही दूसरे कारोबार में लगाया। कम लोग ही उन 2500 प्लाटों पर रहने गए, जो उन्हें पुनर्वास के लिए सरकार ने दिए थे। कपास के लिए मिट्‌टी की मोटी परत वाले खेतों को अधिगृहीत कर मकान बनाने के लिए टुकड़े दे दिए। खेतों से तीन फुट ऊंची संपर्क सड़कें निकाल दीं, जो अब जर्जर हो चुकी हैं। कई जगह खाली खंभे थे, जहां से बिजली आनी थी। न लोग आए, न ये पुनर्वास जैसे स्थल बन सके। ऐसे 88 ठिकानों को बनाने में सरकारी कारिंदों ने 15 सौ करोड़ रुपए खर्च किए। इन जगहों को दूर से देखकर भी अंदाजा लगा सकते हैं कि पैसे की किस तरह बंदरबांट हुई होगी। मुआवजा समेत सारे भुगतान 36 सौ करोड़ के हैं। गुजरात को पानी और मध्यप्रदेश को बिजली का बड़ा हिस्सा देने को तैयार सरदार सरोवर बांध को सरहद मानें तो सरहद के दोनों तरफ बीजेपी का डंका बज रहा है।

    यहां की बीजेपी के राज में निसरपुर हरसूद पार्ट-2 ही है। अमित शाह की आमद के पहले बड़ा सवाल यह है कि सरकार ने 13 साल में क्या सबक सीखा? दूसरा बड़ा विस्थापन हरसूद से ढाई सौ किलोमीटर के फासले पर इसी नर्मदा के एक छोर पर होने वाला था। तो अफसरों ने क्या सबक लिया था? वे एक बार फिर बुरी तरह नाकाम हुए हैं और यह झमेला सरकार की झोली में डालकर मौज में हैं। हरसूद में 2004 जून में मेधा सिर्फ दौरे पर ही आईं थी। धरना नहीं दिया था। आलोक अग्रवाल जो मोर्चा संभाले थे। इस विस्थापन में जनसंघर्ष के इस आईआईटी पास जिद्दी सिपाही का किरदार भी बदला हुआ है। वे अब आम आदमी पार्टी के नेता हैं। इस बीच वे इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जमीन पर अंतहीन संघर्ष करके कुछ हासिल नहीं होने वाला। सीधे राजनीति में आकर ही कुछ बदलाव किए जा सकते हैं। अब वे दिल्ली के चक्रव्यूह में फंसे अति उत्साही केजरीवाल की सेना के एक जमीनी सूबेदार हैं। विस्थापितों के पुराने जोड़ीदार आलोक सरदार सरोवर के प्रभावित इलाके में दौरा करने गए। धरने पर मेधा थीं यहां।

    2017 के मध्यप्रदेश के मीडिया में इस विस्थापन का शोर 2004 के हरसूद जैसा नहीं है। हालांकि चैनल और अखबार पहले से ज्यादा हैं। सहारा प्रणाम कहते हुए बताना चाहूंगा कि तब मैंने सहारा समय के लिए हरसूद कवर किया था। तीन कैमरा यूनिटों में दिल्ली से भुवनेश सेंगर और खंडवा से प्रमोद सिन्हा के साथ मैं भी था। वह देश का एक चर्चित कवरेज था। टीवी के लाइव प्रसारणों से हरसूद एक डिसास्टर टूरिज्म डेस्टीनेशन बन गया था। तीन मंत्री और छह पीएस उमा भारती ने वहां तैनात कर दिए थे। ताबड़तोड़ इंतजामों ने कुछ मामूली सी राहत हरसूद को डूबने के पहले दे दी थी।

    शिवराज ने तीन हजार पुलिस वालों के साथ कलेक्टर-एसपी को भेजकर मामला निपटाने कोशिश की। वे काफी टेक्नोफ्रेंडली हैं सो ट्वीट पर मेधा के प्रति सहानुभूति जाहिर करते रहे। मेधा ने उनके दोनों कारिंदों को यह कहकर विदा किया कि ट्वीट से संवाद ऐसे गंभीर मसले पर समझ के परे है। सामने आकर बातचीत कीजिए। उसके लिए धरना खत्म करने की क्या जरूरत है। बातचीत हाे सकती है। एक हाई पावर कमेटी बना दीजिए। शर्तें तय कीजिए। मेधा का राष्ट्र के नाम संदेश भोपाल आया। इधर श्यामला हिल्स की भृकुटि पर बल पड़े और उधर कलेक्टर-एसपी को ताव आ गया। गांव वालों से एक जोरदार मुठभेड़ के बाद ही वे मेधा को उठा सके। रात के सवा दस बजे वाट्सएप से मुझे पता चलाब कि मेधा को इंदौर के बांबे हास्पिटल ले जाया जा रहा है। कुल 12 लोग मंच से उठाए थे। कुछ बड़वानी और धार भेज दिए। एक का पता नहीं। पुलिस वाले छह को पहले ही गांव में टपकाते हुए निकले थे, जिन्हें बाद में उठा लिया गया।

    मेधा के जाते ही चिखल्दा की बिजली गुम है। इंटरनेट भी काम नहीं कर रहा। हरसूद अपने सामने बीती हर घड़ी के साथ बिखरता गया था। मगर जब हम वहां गए थे तब वहां जिंदगी रोज जैसी आम चहल-पहल से भरी थी। सिर्फ तीन हफ्तों के भीतर यह शहर उजड़ना शुरू हो गया था। 2004 का वह भारी अफरातफरी और परेशानी से भरपूर मानसून था। हरसूद समय की एक कड़वी याद बनकर मेरी किताब में सिमट गया। मैं अब रिपोर्टिंग से मुक्त हूं। भारत की यात्राओं की पूर्णाहुति किए ढाई साल गुजर गए। मगर नियति मुझे एक बार फिर इंसानी बेदखली के दूसरे ठिकाने पर लेकर गई। मैं दो दिन पहले निसरपुर में हरसूद जैसी ही रौनक देखकर आया हूं। वैसा ही हरा-भरा बाजार। दिन में भूख लगी, होटल-ढाबे हैं नहीं सो एक पाटीदार के यहां भोजन किया। उनकी पंद्रह साल की मुश्किलें हर निवाले के साथ सुनीं। कुछ कह नहीं सकते, शायद उन पाटीदार के पुश्तैनी घर के टूटकर डूबने के पहले हम उनके आखिरी मेहमान साबित न हों!

    मैंने वहां खापरखेड़ा के टीलों में ताकझांक की, जहां दो-ढाई हजार साल पुराने एक सलीके से बसे शहर के अवशेष अभी पूरी तरह सामने आ ही नहीं पाए थे। यह जगह नर्मदा के उथले प्रवाह वाली जगह पर सोच-समझकर बसाई गई थी। यहां से हर मौसम में नदी के दोनों किनारों से कारोबार मुमकिन था। उत्तर से दक्षिण के एक रास्ते में यह एक प्रमुख कारोबारी शहर था। खुदाई में ऐसे सबूत मिले, जिससे पता चला कि यहां का सीवेज सीधा नदी में नहीं जाता था। उन्होंने शहर के चारों कोनों पर बड़े-बड़े कुएं खुदवाए थे। सारा सीवेज इनमें फिल्टर होकर ही नदी की तरफ जाता था। जानकारों का कहना है कि इस काम को करने के लिए वहां के राजाओं ने तब कोई नदी की यात्रा वगैरह निकाले बगैर यह सब कर दिखाया था। यहां मिट्‌टी के बर्तनों, खिलौनाें और सजावट के सामानों का बड़ा कारोबार था। ऐसा अनुमान है कि मिट्‌टी का बड़ा उद्योग यहां था और ये सामान यहां से बनकर सब तरफ जाते थे। खापर यहां पकी हुई मिट्‌टी को कहते हैं। अतीत में एक बार न जाने क्यों उजड़कर टीलों में दफन होने के बाद बचा-खुचा यह पुराना गांव खापरखेड़ा एक बार फिर आखिरी सांसें ले रहा है।

    12 सौ आबादी के जिस चिखल्दा गांव में मेधा धरने पर रहीं, वह रियासत के दौर में चार रियासतों की सीमा चौकी था। होलकर, सिंधिया, पवार और स्थानीय बड़वानी रियासत। तहसील के खंडहर सबसे पहले पानी में आएंगे। बगल में रंगापुता नीलकंठेश्वर महादेव का मंदिर परिसर भी जलसमाधि लेगा। गांव-गांव में गुस्सा है। 2007 तक बांध बनकर तैयार था। यूपीए सरकार के समय बांध पर गेट लगने का मसला ठंडे बस्ते में रहा। उन्हें क्या पड़ी थी कि मोदी के गुजरात की प्यास बुझाएं और शिवराज के मध्यप्रदेश को रोशन करें। 2014 में मोदी ने गांधीनगर से आकर दिल्ली में अपना सामान खोलने के पहले नर्मदा कंट्रोल अथॉरिटी को कंट्रोल में किया। बांध पर धूमधाम से गेट लगे। जब लग चुके तो मोदी के गुजरात से अलार्म बज गया। यह वहां के चुनावों का बिगुल था। इधर, चमचमाती नर्मदा सेवा यात्रा का पुण्य लाभ देने के लिए तैयार नर्मदा मैया की पुकार बड़वानी में सुनवाई दी। यात्रा और विस्थापन के बीच मंदसौर में किसानों की अर्थिंयां उठ चुकी हैं। यात्रा का फल देने के लिए नर्मदा शिवराज सरकार को बड़वानी बुलाएंगी, यह यात्रा के कल्पनाकारों ने सपने में भी सोचा होता तो वे अपने विजनरी बॉस को नर्मदा के आसपास कभी न फटकने को कहते।

    कई राज्यों में बीजेपी और उनकी सरकारों की खैरखबर लेते हुए आगे बढ़ रहे हैं अमित शाह। बिहार में बेहिसाब सियासी ताकत का पर्याय रहे लालू यादव को जिंदगी का सबसे यादगार झटका देते हुए पधार रहे हैं वे। साथ में गुजरात से राज्यसभा की तरफ ताक रहे अहमद पटेल का केस भी उनकी अदालत में पूरे दमखम से चला। बेंगलुरू में गुजरात के बंधक विधायकों को पनाह देने वाले ताकतवर मंत्री के यहां छापों की सुर्खियां बता रही हैं कि शाहों से पंगा लेना कमजाेरों का काम नहीं। किस्से यहां तक चले सोशल मीडिया पर कि इस्लामाबाद में अदालत से लतियाए जाने के बाद नवाज शरीफ के अलविदा कहते ही शाह अपने सिपहसालारों को लेकर पाकिस्तान का रुख कर चुके हैं ताकि सरहद पार बीजेपी की सरकार की संभावनाएं तलाश सकें। ऐसे जोक आसानी से पैदा नहीं होते। यह शाह की जबर्दस्त ताकत का ही अहसास कराते हैं। जोक मध्यप्रदेश में भी खूब चले। सीएम शिवराजसिंह चौहान ने एक मीटिंग में कुपित होकर कलेक्टरों को फटकारा कि काम नहीं करोगे तो उल्टा टांग दूंगा। जोक आया कि भोपाल में कमलापार्क के पुराने पेड़ से लटके एक चमगादड़ ने दूसरे से कहा अब कलेक्टर जैसा फील कर रहा हूं!


    This article is republished with the permission of the writer. The originally published article could be read at,
    http://apniaayten.blogspot.com.au/2017/08/blog-post.html

     

  • बोरियत में बुराई क्या है?

    बोरियत में बुराई क्या है?

    Chaitanya Nagar


    हाल ही में बीती गरमी की छुट्टियों के दौरान संपन्न और शौकीन लोग देश-विदेश की यात्राओं पर निकले होंगे। जो किन्हीं कारणों से घर पर रह गए, उन्हें अपने बच्चों से यह सुनने को मिला होगा कि ‘हम बोर हो रहे हैं!’ यह बोरियत किसी का पीछा नहीं छोड़ती। लेकिन कभी पूछा जाए कि क्या बुराई है बोर होने या ऊबने में! ऊबा हुआ इंसान उत्तेजना ढूंढ़ता है, एक से ऊबने के बाद अगली की खोज में निकल पड़ता है। यह अंतहीन यात्रा है। बोरियत से मुक्ति की यात्रा भी बहुत ऊबाऊ है!

    पश्चिमी देशों में रहने वाले मेरे मित्र कहते हैं कि भारत में बच्चे गरीब होते हुए भी मुस्कराते दिखते हैं, जबकि हमारे यहां बच्चे हमेशा दुखी ही रहते हैं, चाहे उन्हें कितने भी खिलौने दे दो। अक्सर मोबाइल, टीवी और ई-पैड बोरियत के लिए जिम्मेदार होते हैं। जिन चीजों को मनोरंजन के लिए बनाया गया, वही बोरियत का कारण बन गर्इं। यह दिलचस्प है कि बोरियत को जानबूझ कर भी पैदा किया जाता है। दरअसल, मनोरंजन का उद्योग अरबों डॉलरों का है। अगर इंसान बोर न हो तो कैसे यह उद्योग चलेगा? जरा सोचिए, जो खालीपन बहुत सृजनात्मक भी हो सकता था, उसे कैसे बाजार ने चीजों से भर दिया और साथ ही उसे अधूरा भी बनाए रखा। आइंस्टाइन सड़क पर बैठा घंटों कीड़ों को देखता था! क्यों? सीखने वाला, सृजनात्मक मन कभी ऊब नहीं सकता। उत्तेजना की तलाश में लगा मन हमेशा भूखा और ऊबा हुआ होता है। जब हम कोई प्याला, पात्र या मर्तबान लेने जाते हैं तो उसे खाली लेकर ही घर आते हैं। मगर जीवन में एक भी पल खाली हुआ तो हमें कितना बेचैन कर देता है! इस खालीपन और उससे भागने की इच्छा का नाम ही है बोरियत। इसे और कुरेदें तो इसके भीतर भय का चेहरा भी झांकता दिखेगा।
    आइंस्टाइन ने बहुत पहले चेतावनी दी थी कि एक ऐसी पीढ़ी जल्दी ही आने वाली है जो तकनीक की वजह से मूढ़ हो जाएगी! हमारी और हमारे ठीक बाद वाली पीढ़ी का जीवन हर वक्त किसी न किसी स्क्रीन या फ्रेम के साथ बंधा रहता है। इसने हमें बहुत सीमित कर दिया है। क्या हम समुद्र के किनारे की नमकीन, भीगी हुई हवा की गंध को सूंघने, लहरों के थपेड़ों को अपने घुटनों तक महसूस करने और उसे एचडी स्क्रीन पर देखने का फर्क समझ सकते हैं? स्क्रीन को देखता हुआ मन एक निष्क्रिय सजगता में रहता है और तेजी से भागती स्क्रीन उसके मस्तिष्क में कहीं प्रवेश कर जाती है और वह उसे ही वास्तविक मान लेता है।
    यह कोई जटिल मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया नहीं। हम सभी बड़ी आसानी से इसे खुद के और बाकी लोगों के भीतर भी होता हुआ देख सकते हैं। स्क्रीन पर घटने वाली उत्तेजक चीजें एक रसायन पैदा करती हैं दिमाग में। डोपामाइन नाम के इस रसायन का संबंध होता है सुखदायी उत्तेजना के साथ। एक बार मस्तिष्क इसका आदी हो जाए तो फिर बहुत मुश्किल है इससे छुटकारा। आप हिमालय के विराट सौंदर्य के सामने खड़े होकर भी अपने मोबाइल का स्क्रीन देखते रहेंगे! एक शोध में पता चला है कि अगर कोई व्यक्ति रोजाना दस घंटे बैठे-बैठे बिताता है तो पूरी संभावना है कि अगले दस सालों में उसकी मृत्यु हो जाएगी! स्क्रीन के साथ जुड़े होने का मतलब ही है एक जगह बैठ जाना। और इसके साथ कई जीवन-शैली से जुड़ी बीमारियां हैं, मसलन, मधुमेह, रक्तचाप, हड्डियों की बीमारियां।
    जब बच्चे कहते हैं कि वे ऊब रहे हैं तो सबसे आसान तरीका है उन्हें कोई इलेक्ट्रॉनिक सामान पकड़ा देना, या टीवी चालू कर देना। मगर यह अस्थायी और सतही समाधान है। क्या ऐसे समय में बच्चे के साथ बैठ कर थोड़ी बात की जा सकती है? उसके साथ कोई ऐसा खेल खेला जा सकता है, जिसमें शारीरिक श्रम भी लगे? megacanabisdispensary.com ambien cr generic हम खुद अगर मोबाइल के आदी हो गए हों, तो यह मुमकिन है कि उससे बचने के लिए हम थोड़ा बाहर या घर के भीतर ही टहल लें! बर्टेंड रसल अपनी किताब ‘द कॉन्क्वेस्ट आॅफ हैप्पीनेस’ में लिखते हैं- ‘किसी बच्चे का विकास तभी होता है जब उसे एक छोटे पौधे की तरह उसी मिट्टी में छोड़ दिया जाए। बहुत अधिक यात्राएं, कई तरह के प्रभाव उनके लिए अच्छे नहीं। जब वे बड़े होते हैं तो वे जीवन की उपयोगी ऊब को बर्दाश्त कर पाने में विफल हो जाते हैं।
    जीवन कई तरह के कचरे से भर गया है और बगैर खाली हुए यह कचरा दिखाई नहीं देगा। हमेशा उचाट रहेगा मन, किसी न किसी वस्तु, मित्र, अतिथि, किसी के प्रेम की खोज में बुझा, उदास रहेगा। एक बार हम सीखें कि ऊबना कोई बीमारी नहीं। कभी खाली पात्र की तरह हो लें और जीवन को उतरने दें अपने भीतर आहिस्ता-आहिस्ता। पूरी तरह मशीन बन जाने से पहले। पास्कल तो यहां तक कहते थे कि इंसान अगर कुछ पल भी खुद को किसी कमरे में बंद करके अकेला रह सके तो इस दुनिया की ज्यादातर समस्याएं निपट जाएंगी।

  • जामुन का भूत

    जामुन का भूत

    Shayak Alok


    किसी गाँव में जब गोबर नाम का गरीब मरा
    तो भूत हो गया
    तो वह भूत रहने लगा उसी गाँव के बँसवारी में
    पहलेपहल तो यह बात गाँव की कानी बुढ़िया ने कही और
    फिर किस्से शुरू हो गए

    एक दिन जब गोबर ने उठा पटक मारा
    पास वाले गाँव के सुखला साहूकार को
    और उसका बटुआ भी छीन लिया तब तो बड़ा हंगामा हुआ
    सुखला का गमछा पाया गया गाँव से दो कोस दूर
    ऐसा बिछा हुआ जैसे गोबर ही उस पर सुस्ताने दो दम मारा हो

    तो तय यह पाया गया कि हाथ पैर जोड़
    कर बुला लिया जाय रामनारायण पंडित को
    और खूब जोर से कच्चे धागे से बंधवा दिया जाय उस नासपीटे जामुन को
    जामुन जो बँसवारी का अकेला ऐसा पेड़ था
    जो बांस नहीं था

    लेकिन उसी रोज रात में घटी एक और घटना
    ‘न देखा न सुना’ – कहते हैं गाँव के बड़े बुजुर्ग
    बिशो सिंह के दरवाजे सत्तनारायण संपन्न करा
    के लौट रहे रामनारायण पंडित को
    बँसवारी के आगे धर दबोचा गोबर ने
    और ऐसा भूत मन्त्र मारा कि गूंगे हो गए बेचारे
    बोलते हैं तो सिर्फ चक्की के घिर्र घिर्र की आवाज़ आती है

    कहते हैं कि गोबर के दोमुंहे पुराने घर थी ऐसी ही एक चक्की जो
    उसके बाप ने अपने बाप के श्राद्ध में
    रामनारायण को गिरवी बेचा था

    खैर, जामुन के भूत को बाँध दिया गया और
    गोबर से शांत रहने की प्रार्थना की गई

    गोबर जो पूरी ज़िन्दगी दो जून की रोटी की फिक्र में रहा
    उसका भूत
    हर शनिवार को खाता है बताशे
    कभी भूख बढ़ने पर जन्मते ही खा जाता है
    मवेशियों के बच्चे
    अपने साथी भूतों के भोज के लिए एक दिन जला डाला
    मुर्गों का दड़बा
    चबाई हड्डियाँ डोभे में फेंक दी

    गोबर के भूत ने न्याय लाया है गाँव में
    मुंह अँधेरे अब शौच जाने से नहीं डरती चंपा
    हर महीने सरसतिया के जिस्म पर आने वाला भूत
    अब नहीं आता
    गुनगुनाते हुए बड़े दालान से गुजर लेती है अठोत्तरी

    सुना है गोबर अन्य भूतों संग रोज रात को बँसवारी में करता है बैठकें
    हंसने और जोर जोर से बतियाने की आवाज़ आती है

    टीवीन्यूज़ पर जब से आई है गोबर की कहानी
    सरकार फिक्रमंद है आम जान माल को लेकर
    भूतों की सत्ता चुनौती है सरकार के लिए
    और इसलिए सेना निपटेगी उनसे
    लोकसभा चुनाव के पहले पहल

    मज़े में जी रहे जामुन के भूत को दूसरा जामुन ढूंढना होगा.

    जामुन के भूत के साथी
  • दलितों, आदिवासियों, शूद्रों व मुसलमानों के लिए ट्रेनिंग मोड्यूल –Sanjay Jothe

    दलितों, आदिवासियों, शूद्रों व मुसलमानों के लिए ट्रेनिंग मोड्यूल –Sanjay Jothe

    Sanjay Jothe

    लीड इंडिया फेलो हैं। मूलतः मध्यप्रदेश के निवासी हैं। समाज कार्य में पिछले 15 वर्षों से सक्रिय हैं। ब्रिटेन की ससेक्स यूनिवर्सिटी से अंतर्राष्ट्रीय विकास अध्ययन में परास्नातक हैं और वर्तमान में टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान से पीएचडी कर रहे हैं।

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    भारत के दलितों आदिवासियों, ओबीसी (शूद्रों) और मुसलमानों को मानविकी, भाषा, समाजशास्त्र, दर्शन इतिहास, कानून आदि विषयों को गहराई से पढने/पढाने की जरूरत है. कोरा विज्ञान, मेडिसिन, मेनेजमेंट और तकनीक आदि सीखकर आप सिर्फ बेहतर गुलाम या धनपशु ही बन सकते हैं, अपना मालिक और अपनी कौम के भविष्य का निर्माता बनने के लिए आपको मानविकी विषयों को पढ़ना चाहिए.

    अंबेडकर को पढ़िए, पेरियार को, मार्क्स को लोहिया को ज्योतिबा फूले को पढ़िए, भगत सिंह, राहुल सांस्कृत्यायन और देश दुनिया के सभी क्रांतिकारियों को पढ़िए. इन्हें पढ़े समझे बिना अगर आप पैसा कमा रहे हैं तो ये पैसा आपसे आपके ही लोगों के भविष्य की ह्त्या करवा रहा है. आप सीधे सीधे अपने ही बच्चों के भविष्य की हत्या कर रहे हैं.

    दलितों आदिवासियों, ओबीसी (शूद्रों) और मुसलमानों से आने वाले जितने अधिकारी, उद्योगपति, नेता, इंजीनियर, प्रोफेसर, वकील, डाक्टर या धनपति हैं वे अपनी कौमों के लिए कुछ नहीं कर रहे हैं. वे सिर्फ अपने आप को “ऊँचे लोगों” के बीच स्वीकृत बनाये रखने के लिए ही मरे जा रहे हैं, ऐसे सभी लोग अपनी कौम के अपने समाज के गद्दार हैं. ये गद्दारी उनका अपना चुनाव है. उन्हें माफ़ कीजिये, आज नहीं तो कल उन्हें बुद्धि आयेगी. न भी आई तो इतिहास उनपर हंसेगा, और उनके खुद के समझदार बच्चे उनपर हसेंगे.

    अभी आप एक जरुरी काम करना शुरू करें. अपने परिवारों में अपने मित्रों में और खासकर अपनी महिलाओं के साथ ऊपर गिनाये हुए लेखकों बुद्धिजीवियों क्रांतिकारियों की किताबें और विडिओ (अगर हों तो) पढ़ाएं/दिखाएँ. उनसे इन विषयों पर चर्चा करें. बच्चों और घर की औरतों को धार्मिक अंधविश्वास, त्यौहार, वृत, उपवास और कर्मकांडों से दूर ले जाते हुए उनके साथ सीधे सीधे सामाजिक राजनीतिक मुद्दों पर सरल भाषा में चर्चा करें. छोटी कवितायें, कहानियां, बाल साहित्य (धार्मिक नहीं) की किताबें खोजें और अपनी महिलाओं और बच्चों को बाटें, समय निकालकर उनके बीच जाकर उन्हें समझाने की कोशिश करें. और जब भी अवसर मिले खुद इन मुद्दों को समझने की कोशिश करें.

    अगर आप ये कर सकते हैं तो आप बिना शोर मचाये दुनिया का सबसे बड़ा काम कर सकते हैं. इस काम को चौराहे या सडक पर डंडा या झंडा लहराते हुए नहीं करना है. इसे आपको अपने परिवार में अपने बच्चों और स्त्रीयों के बीच और समाज के भीतर करना है. इसमें कोई सरकार, कोई कानून, कोई संगठन किसी तरह की रुकावट नहीं डाल सकता.

    ये सबसे सुरक्षित और सबसे कारगर काम है, आप अगर तैयार हैं तो बस इतना ही काफी है. बहुत कम धन और बहुत कम समय में ये काम आप कर सकते हैं. आपको इसमें मदद करने के लिए हजारों लेखक, पत्रकार, टीचर, प्रोफेसर, शोधकर्ता, सामाजिक कार्यकर्ता और प्रगतिशील स्त्री पुरुष मिल जायेंगे. आप शुरू करें तो ये बहुत कम समय में एक आन्दोलन बन सकता है.

    इसके लिए मैं एक पूरा ट्रेनिंग मोड्यूल डेवेलप करने का विचार कर रहा हूँ, इस तैयारी में कुछ महीनों का समय लग सकता है. जो मित्र उत्सुक हों उन्हें इसमें प्रशिक्षित किया जा सकता है और वे इसे एक काडर डेवेलपमेंट प्रोग्राम की तरह अपने घरों, परिवारों, मुहल्लों में लागू कर सकते हैं.